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मंगलवार, 16 अगस्त 2011

तिरुपुर: 'डालर शहर' में आत्महत्या की बाढ़

राजकुमार

तमिलनाडु के तिरुपुर शहर का नाम देश के कोने-कोने में जाना जाता है। गंजी-बनियान इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति कभी न कभी तिरुपुर में तैयार इस वस्त्र का जरुर इस्तेमाल किया होगा। लेकिन यह अब एक पुरानी बात हो गयी है। तिरुपुर अब विदेशों को सिले-सिलाए वस्त्र निर्यात करने वाला भारत का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया है। इसलिए आजकल इसे डालर शहर कहा जाता है। लेकिन पिछले साल भर से पूरे तिरुपुर जिले में गार्मेंट मजदूरों की आत्महत्या की घटनाओं में भारी बढ़ोत्त्री हुई है। बीस स्त्री पुरुष हर रोज! इन घटनाओं के चलते डालर शहर की चकाचौंध का दूसरा पक्ष भी उजागर हुआ है, जो कि बहुत ही ज्यादा बदसूरत और बर्बर है।
तिरुपुर और उसके आस-पास गार्मेंट उद्योग से जुड़ी कुल 6250 फैक्ट्रियां मौजूद हैं। इनमें करीब चार लाख मजदूर काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बाहर से आये हुए मजदूर हैं। इन प्रवासी मजदूरों में तमिलनाडु के विभिन्न जिलों तथा उड़ीसा, विहार, झारखण्ड व राजस्थान के मजदूरों की संख्या ज्यादा है। अधिकांश मजदूर अभी 30 साल से कम उम्र के युवा हैं। मजदूरों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
सिले-सिलाए या बुने हुए वस्त्रों की विदेशों में निर्यात कर डालर कमाने में तिरुपुर ने कमाल कर दिखाया है। सन् 1985 में यहां से मात्र 15 करोड़ मूल्य के कपड़े निर्यात हुआ था। जबकि पिछले साल यह 11,500 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। तिरुपुर की फैक्ट्रियां जिन कम्पनियों या ब्राण्डों के लिए कपड़े बनाती हैं उनमें वालमार्ट, एच एण्ड एम, स्विचर, केयर फोर, गैप, टामी हिल फिगर आदि हैं। ये कम्पनियां या ब्राण्ड दुनियां भर में मशहूर हैं। यूरोप और अमेरिका में इनकी सैकड़ों आलीशान दुकाने हैं जो अरबों डालर का व्यापार करती हैं। इन विदेशी कम्पनियों, तिरुपुर के निर्यातकों और व्यापारियों की अरबों डालर की कमाई जिन लाखों मजदूरों की बेहिसाब मेहनत के बल पर सम्भव होती है, उन मजदूरों का हाल दुनियां की नजरों से तब तक ओझल रहता है, जब तक कि कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता। लेकिन क्या गार्मेंट मजदूरों की आत्महत्या की घटनाओं के चर्चा में आ जाने से यहां काम करने वाले मजदूरों को कोई राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है? ऐसा नहीं लगता। गार्मेंट उद्योग का पूरा ढांचा ही मजदूर विरोधी है। इस ढांचे में सबसे ऊपर वे विशालकाय विदेशी कम्पनियां होती हैं जिनके आर्डर पर रेडीमेड गार्मेंट बनाए जाते हैं। ये कम्पनियां सबसे ज्यादा मुनाफा कमाती हैं और ढांचे के हर स्तर पर कीमतों का नियंत्रण करती हैं। देश के निर्यातकों, छोटी-छोटी इकाइयों, और ठेकेदारों का स्थान इनके बाद आता है। गार्मेंट उद्योग में मजदूरों का स्थान सबसे आखिर में होता है, जिनके ऊपर यह समूचा ढांचा टिका होता है। चूंकि कीमतें विदेशी कम्पनियों के पूरी तरह कब्जे में होती हैं और ये कम्पनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरने की होड़ में लगी रहती हैं। इसलिए, इस ढांचे में शामिल हर हिस्सा जबरदस्त प्रतियोगिता में शामिल रहता है। इन प्रतियोगिताओं का कुुल असर मजदूरों को कम से कम पैसे पर ज्यादा से ज्यादा काम कराने के रुप में होता है।तिरुपुर में भी निर्यातकों और फैक्ट्री मालिकों ने मजदूरों पर खर्च कम करने के लिए तरह-तरह के हथकण्डों को अपनाया। पिछड़े इलाकों से मजदूरों को लाकर 'हास्टल योजनाÓ के तहत फैक्ट्री परिसर में ही एक-एक कमरे में ठूंस-ठूंस कर रखा जाने लगा। इन्हें अन्य मजदूरों से कम मजदूरी दी जाती है। लड़कियों के लिए भी 'सुमंगली योजनाÓ चालू की गयी। इसके तहत लड़कियों को कमरे में एक साथ रहने व भोजन की व्यवस्था की गयी। इन्हें तीन साल के काम के बाद बीस हजार से पचास हजार रुपये एकमुस्त देने का वादा किया गया। ऐसी योजनाओं के तहत रखे गये स्त्री और पुरुषों के कामों के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती है। इन्हें हर रोज न्यूनतम 12घंटे तक करना होता है। जरुरत पडऩे पर आधी रात में जगाकर भी इनसे काम लिया जाता है। इतनी ज्यादा मेहनत एक नौजवान शरीर ही बर्दाश्त कर सकता है। इसलिए कोई लम्बे समय तक इसमें टिकने का सपना नहीं पालता।गार्मेंट उद्योग में ढेरों काम इस तरह के हैं जिनके लिए किसी विशेष ट्रेनिंग की जरुरत नहीं होती है। इसलिए गांवों और कस्बों की बेरोजगार युवक-युवतियां बड़े पैमाने पर इस उद्योग की ओर आकर्षित होते हैं। कम्पनियां भी दूर-दराज के गांवों तक जाकर फिल्मों के जरिए इस उद्योग की हसीन तस्वीर दिखाकर नौजवानों की भर्ती करती हैं। लेकिन गार्मेंट उद्योग में कुछ दिन काम करने के बाद ही उनके सपने टूटने लगते हैं। काम की कठोर परिस्थितियां, रोजगार की अनिश्चितता, और बिना किसी मनोरंजन के लगातार काम करते जाना, अभाव-गरीबी और अनिश्चित भविष्य मजदूरों में रोज-रोज हताशा और निराशा पैदा कर रहा है। परिवार के साथ रहने वाले मजदूरों के लिए मंहगाई का बोझ, बच्चों की चिन्ता तथा कर्ज का दबाव अलग से है। यही वे परिस्थितियां हैं जो तिरुपुर के डालर शहर में मजदूरों की आत्महत्या की जमीन को तैयार कर रही है।

रविवार, 14 अगस्त 2011

गार्मेन्ट उद्योग: सस्ते श्रम पर टिका साम्राज्य

शान्तनु
दुनिया के मशहूर ब्राण्ड या कम्पनियां जैसे वालमार्ट, गैप, हिल फीगर आदि के अरबों-खरबों डालर का साम्राज्य और हमारे देश के पांच सितारा होटलों में अक्सर होने वाले फैशन शो व फैशन की दुनिया के जलवों का भारत, बांग्लादेश, वियतनाम, कम्बोडिया आदि जगहों के गरीबी से जूझते करोड़ों गार्मेन्ट मजदूरों का क्या रिस्ता क्या हो सकता है इसे गार्मेन्ट उद्योग से परिचित हर आदमी जानता है ।
भारत में कुल सिले-सिलाए या बुने हुए कपड़ों का मात्र 25 प्रतिशत हिस्सा ही निर्यात होता है और 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत में इस्तेमाल होता है। लेकिन गार्मेन्ट निर्यात का ग्लैमर कहीं ज्यादा है। क्योंकि निर्यात या एक्सपोर्ट के जरिए थोड़े समय में ही ज्यादा कमाई हो जाती है और यह कमाई भी अमेरिकी डालर में होती है।
इसके अलावा एक्सपोर्ट के धन्धे में काली कमाई की गुंजाइश भी बहुत ज्यादा होती है। आज भारत का कुल गार्मेन्ट निर्यात लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का है। दिल्ली, गुडग़ांव, नोएडा, तिरुपुर, सूरत और मुम्बई इसके प्रमुख केन्द्र हैं। इस क्षेत्र में आज लगभग 15 लाख मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही संगठित क्षेत्र में आता है जबकि बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है। गार्मेन्ट उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की 50 प्रतिशत गार्मेन्ट तैयार करने का मुख्य काम करता है जबकि शेष अप्रत्यक्ष काम करते हैं। अप्रत्यक्ष कामों में-हाथ की सिलाई, एम्ब्रायडरी, बटन, बकल, जिप, स्टीकर आदि लगाना तथा पैकिंग आदि आता है। चूंकि इस क्षेत्र के ज्यादातर कामों के लिए कोई अलग से प्रशिक्षण देने की जरुरत नहीं होती है इसलिए गरीब व पिछड़े इलाकों से भारी आबादी इस ओर आकर्षित होती है। इस कारण गार्मेन्ट उद्योग में प्रवासी मजदूरों की संख्या ज्यादा होती है।
गार्मेन्ट निर्यात क्षेत्र की बनावट और इसका ताना बाना बेहद महत्व का होता है। इस क्षेत्र के सबसे शीर्ष में वे विदेशी ब्राण्ड या कम्पनियां होती हैं जिनके आर्डर पर गार्मेंट तैयार किया जाता है। पहले ये कम्पनियां आमतौर पर अपने-अपने ब्राण्डों का लेबल लगवाकर थोक बिक्री का काम करती थीं। लेकिन पिछले 20-25 साल के दौरान ये अपने ब्राण्डों की खुदरा बिक्री भी करने लगी हैं। आज पूरी दुनियां में इनकी हजारों आलीशान दुकानें मौजूद हैं। ये कम्पनियां गार्मेन्ट बनाने वाले हर देश में या उत्पादन क्षेत्र में अपने एजेन्ट (बायर) नियुक्त करती हैंै। इसके बाद एक्सपोर्टर की बारी आती है। एक्सपोर्टर के पास खुद अपनी फैक्ट्री हो भी सकती है या वह बाहर से माल बनवाकर एक्सपोर्ट कर सकता है।
गार्मेन्ट तैयार करने वाली फैक्ट्रियां सारा काम खुद नहीं करती हैं। वे ढेरों काम फैब्रिकेटर से करवाती हैं। ये फैब्रिकेटर छोटी-छोटी इकाइयों में थोड़े बहुत मजदूरों के बल पर अपना काम करते हैं। सिर्फ हाथ से होने वाले छोटे या बारीक कामों (जैसे- बटन लगाना, मोती सितारा लगाना, हैण्ड एम्ब्रायडरी आदि)को ठेकेदारों के द्वारा करवाया जाता है। ठेकेदार द्वारा करवाये जाने वाले इन कामों को महिलाएं और बच्चे भी करते हैं। इस तरह स्पस्ट है कि गार्मेन्ट उद्योग के इस विशाल ढांचे में मजदूरों का स्थान सबसे नीचे है। पर बैठी विदेशी कम्पनियों और देशी पूंजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो इसके लिए जरुरी है कि माल की ज्यादा से ज्यादा खपत हो, मजदूरी की दर कम हो और मजदूर संगठित भी न होने पाएं। लोग ज्यादा से ज्यादा कपड़ों को खरीदें इसके लिए माहौल बनाना भी जरुरी है। इस काम में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है। फैशन डिजाइनर, फैशन शो और माडलिंग की मायानगरी का निर्माण मीडिया ही करती है। इसके चलते ही मध्यवर्ग के एक तबके में इन कपड़ों को पाने की हवस बढ़ जाती है। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ गार्मेन्ट उद्योग के पूरे तंत्र में भीषण प्रतियोगिता को जन्म देता है जिसकी चपेट में मजदूर भी आ जाता है। देश की सीधी-सादी जनता की मेहनत पर खड़ा गार्मेन्ट निर्यात का पूरा तंत्र इतना स्वच्छन्द तरीके से काम ही नहीं कर पाता अगर उसे सरकारी नीतियों की मदद नहीं मिली होती। 1991 से जारी उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों ने जहां पूंजी और माल के आयात निर्यात पर लगी बंदिशों को ढीला कर दिया वहीं श्रम कानूनों को मानने की बाध्यता को भी व्यवहार में खत्म कर दिया। न्यूनतम मजदूरी कानून और ठेका मजदूरी कानून की धज्जियां उड़ा दी गयी। ईएसआई और पीएफ की बात कौन करे लाखों की संख्या में ऐसे मजदूर हैं जिन्हें कानून की नजर में मजदूर ही नहीं माना जाता। फैक्ट्रियों में मजदूरों के साथ मारपीट व गाली गलौज करना, 12-16 घंटे तक काम करवाना, जब चाहा निकाल देना, मजदूरों के पैसे को मार लेना-यही वे जमीनी हालात हैं जिसके ऊपर गार्मेन्ट और फैशन उद्योग का पूरा महल खड़ा है। दरअसल गार्मेन्ट एक्सपोर्ट उद्योग का पूरा अस्तित्व ही सस्ते श्रम पर टिका हुआ है। गार्मेन्ट उद्योग का मुख्य बाजार और कम्पनियां अमेरिकी और यूरोपीय देश हैं। सस्ते श्रम की खोज में ये कम्पनियां पूरी दुनिया में खाक छानती फिरती हैं। आज अमेरिका में मजदूरी की न्यूनतम दर 14 डालर (644 रुपये) प्रति घंटे की है जबकि चीन में यही दर 1.44 डालर (66.24 रुपये),भारत में 0.51 डालर (23.46 रुपये), इन्डोनेशिया में 0.44 डालर (20.24 रुपये), वियतनाम में 0.38 डालर (17.48 रुपये) और बांग्लादेश में 0.31 डालर (14.26 रुपये) है। आज बांग्लादेश ने इसी सस्ती मजदूरी के कारण दुनिया के 30 प्रतिशत कपड़े के बाजार को दूसरे देशों से छीन लिया है। यहां तक कि भारत की गार्मेन्ट फैक्ट्रियां भी बांग्लादेश में कपड़े तैयार करवाकर निर्यात करने लगी हैं। सस्ते श्रम की यह लूट गरीब देशों में भारी तबाही फैला रही है और सामाजिक ताने बाने को नष्ट कर रही है। यह सब आज इसलिए सम्भव हो पा रहा है क्योंकि गार्मेन्ट मजदूरों की जुबान आज बन्द है तथा वे संगठित नहीं हैं। उसके संगठन बनाने के रास्ते में बाधाएं खड़ी की गयी हैं। लेकिन जिस दिन मजदूर संगठित होकर अपनी मजदूरी का वाजिब दाम मांगेगा, सस्ते श्रम की लूट, फैशन के ग्लैमर की दुनियां और लाखों परोपजीवियों की शानोशौकत का यह सामा्रज्य भहराकर गिर जायेगा।
(शान्तनु एक सामाजिक कार्यकर्त्ता और मेहनतकश पत्रिका के संपादक हैं)

बुधवार, 27 जुलाई 2011

मेक्सिको: पहला शिकार, लंबी है कतार

देवेन्द्र प्रताप
मेक्सिको लैटिन अमेरिका का सर्वाधिक आबादी वाला देश है। 2007 में मेक्सिको में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 21 प्रतिशत बढ़कर 1 करोड़ 57 लाख डालर पर पहुंच गया। यह 2007 से पहले का सर्वाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश था। इससे पहले 2001 में यहां 2 करोड़ 95 लाख डालर का प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश हुआ था। दूसरे देशों की तरह मेक्सिको में भी 1991 से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ना शुरू हुआ। उदारीकरण और निजीकरण ने मेक्सिको की अर्थव्यथा को साम्राज्यवाद के साथ नाभिनालबद्ध कर दिया। 1990 में लैटिन अमेरिका में सकल वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश 32 प्रतिशत था, यह 1998 में 43 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसलिए यह समझना भूल होगी कि एफडीआई का कुप्रभाव सिर्फ मेक्सिको पर पड़ा। अर्जेंटीना, चिली, निकारागुआ, ब्राजील जैसे देश भी सामा्रज्यवाद के ऊपर निर्भर होते जाने के साथ ही उनकी अर्थव्यवस्था असाध्य तौर पर संकटग्रस्त होती गई।
इस समय मेक्सिको में होने वाले कुल विदेशी निवेश का करीब आधा अमेरिका की ओर से किया जाता है। हालैंड (15%) और स्पेन (10%) का स्थान अमेरिका के बाद आता है। मेक्सिको में निवेशकर्ताओं ने यह आश्वासन दिया कि इससे वहां के लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा। हालांकि बाद में यह साबित हो गया कि यह एक कोरी गल्प के सिवा कुछ नहीं था। एफडीआई बढ़ने के साथ ही वहां के पारंपरिक रोजगार के अवसर भी खत्म होते गए। सबसे खतरनाक बात यह रही कि मेक्सिको की अर्थव्यवस्था की इस प्रवृत्ति ने उसे निवेशकर्ता देशों के ऊपर पूरी तरह निर्भर बनाने का काम किया। यही वजह रही कि 2008 में अमेरिका में आर्थिक मंदी के आते ही मेक्सिको बुरी तरह बर्बादी के कगार पर पहुंच गया।
मेक्सिको में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर रहा। भारत की तरह ही वहां भी रिटेल क्षेत्र रोजगार का दूसरा बड़ा स्रोत रहा है। इसलिए वहां कृषि क्षेत्र में एफडीआई के बढ़ने के साथ ही मेक्सिको में खाद्य संकट पैदा हो गया। इसके पहले खाद्यान्न के मामले में मेक्सिको लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर था। इस समय वह रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली खाद्य वस्तुओं तक के लिए अमेरिका, स्पेन जैसे देशों की खाद्य पदार्थों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के ऊपर निर्भर हो चुका है। आज मेक्सिको को कुल सोया उपभग का 95 प्रतिशत, कुल चावल उपभोग का 58 प्रतिशत, गेहूं 49 प्रतिशत और कुल मांस उपभोग का 40 प्रतिशत विशालकाय खाद्य वस्तुओं का व्यापार करने वाली वालमार्ट जैसी कंपनियों से खरीदना पड़ता है। वालमार्ट के बारे में अमेरिका और लैटिन अमेरिका में कहा जाता है कि उसने अमेरिका/लैटिन अमेरिका के जिस भी इलाके में अपने स्टोर खोले, वहां के किसान तुलनात्मक रूप में और भी गरीब हो गए। आज वह यह कारनामा समूची दुनिया में दोहराने की तैयारी कर रही है। लैटिन अमेरिका को तबाह करने के बाद अब भारत उसकी पहली पसंद बनने वाला है। बहरहाल, मक्का उत्पादन के लिए प्रसिद्ध मेक्सिको की हालत यह है कि वहां के किसान आज बर्बाद हो रहे हैं। एक आंकलन के अनुसार इस समय वहां मक्का उत्पादन करने वाले करीब 20 लाख किसान भयंकर गरीबी में जीवन जीने का अभिशप्त हैं। वहां पर हर दिन करीब 600 किसानों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ रहा है। उत्पादन और वितरण पर साम्राज्यवादी पूंजी की इजारीदारी का खामियाजा मेक्सिको को सबसे पहले झेलना पड़ा, लेकिन आज दुनिया भर में उसके कई और संगी साथी पैदा हो गए हैं। जिस तरह भारत की अर्थव्यवस्था आज उधारी की सांस पर जिंदा रहने को मजबूर है, ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले समय में यहां के हालात भी मेक्सिको जैसे ही विस्फोटक हो सकते हैं।