देवेंद्र प्रताप
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले से पहले ऐसा माना जाता था कि जिस भी देश की तरफ अमेरिका ने जरा सी आंख तरेरी, उसकी शामत आ गई। ईरान इसलिए भी याद किया जाएगा कि उसने अपने सीमित संसाधन के बल पर अमेरिका की नाक में दम कर दिया। इसके पीछे उसकी लंबी सैन्य साजो-सामान की तैयारी है। युद्ध से पहले ईरान में लोगों की बहुत कम दिलचस्पी थी। उसे महज एक कट्टरपंथी मुल्क के रूप में जाना जाता था। अब लोग चैंक गए हैं कि आखिर ईरान ने कैसे अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर देश की नाक में दम कर दिया। अमेरिका को ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में दुनिया में सबसे आगे रहा है। ऐसे में यदि ईरान सदियों पुरानी दकियानूसी सोच में यकीन करने वाला देश ही होता तो वह अमेरिका के आगे कभी नहीं टिक सकता था। जाहिर है कि हम ईरान को कम जानते हैं या उतना ही जानते हैं, जितना पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी सूचना तंत्र ने हमें जानने का मौका दिया। अपने पाठकों के लिए हम ईरान की सैन्य ताकत, धर्म और कला-संस्कृति, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, महिला शिक्षा, सामाजिक ढांचा आदि के बारे में अवगत करवाएंगे। इसी क्रम में इस बार हम एक सैन्य शक्ति के रूप में ईरान की स्थिति के बारे में बताएंगे।
सबसे पहले यह जान लें कि ईरान पश्चिम एशिया में ही नहीं दुनिया में सबसे बडा शिया मुल्क है। आबादी और क्षेत्रफल दोनों लिहाज से। शिया आबादी के लिहाज से इराक दूसरे स्थान पर है। इसके बाद अजरबैजान और बहरीन आते हैं। ईरान की कुल आबादी का करीब 85-90 शिया धर्म को मानने वाले हैं। यदि यह माना जाए कि ईरान कट्टर इस्लामिक देश है तो सवाल यह उठता है कि युद्ध के दौरान इसने खाड़ी के अन्य देशों पर हमले क्यों किए। दूसरा, यदि यह माना जाए कि यहां के शिया बड़े कट्टर हैं, इसलिए इसने सुन्नी बहुल मुस्लिम देशों को निशाना बनाया, तो सवाल यह उठता है कि ईरान ने शिया बहुल ईराक और बहरीन पर हमले क्यों किए।जाहिर है इन तर्कों में दम नहीं है। जाहिर है कि बात कुछ और है। हम इन सवालों को पाठकों के लिए छोड़े जा रहे हैं। अगली किसी कड़ी में हम इस पर अपनी बात रखेंगे। फिलहाल, इस लेख में हम खुद को ईरान की सैन्य ताकत तक की सीमित रखेंगे।
अब तो यह सभी को पता चल ही गया है कि ईरान भी का एक शक्तिशाली देश है। उसके पास भले ही परमाणु बम नहीं है, लेकिन यह दुनिया की 16वीं सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। इसके पास बड़ी सेना है, जिसमें छह लाख से अधिक सैनिक हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 3.5 लाख रिजर्व सैनिक हैं, जो जरूरत पड़ने पर सेना में शामिल हो सकते हैं। इरान के पास बासिज फोर्स सहित कुल लगभग दो लाख बीस हजार अर्धसैनिक बल के जवान हैं।
इसके अलावा इरान के पास इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी आईआरजीसी के रूप में एक शक्तिशाली सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक संगठन है। इसकी स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति की रक्षा के लिए की गई थी। यह इरान के सर्वोच्च नेता के अधीन काम करती है। इसमें करीब दो लाख सैनिक हैं। इतना ही नहीं, इसके पास विशाल मिसाइल शस्त्रागार है। इसके बावजूद अमेरिकी सैन्य ताकत, तकनीक और वैश्विक पहुंच के सामने ईरान बहुत कमजोर है। ईरान को पता था कि कभी न कभी अमेरिका उसके तेल पर कब्जा करने के लिए इजरायल से या खुद हमला करेगा। इसके लिए ईरान ने लंबी तैयारी की। वह कई वर्ष से जमीन के अंदर मिसाइल सिटी बना रहा था। उसने हजारों की संख्या में ड्रोन भी बनाए, जिसका युद्ध में जमकर इस्तेमाल किया गया।
दबाव बनाने की रणनीति से ईरान ने तोड़ा महाबली का गुरूर
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका दुनिया का दादा बनने की राह पर बढ़ गया था। इसके बाद उसने खाड़ी देशों, लैटिन अमेरिकी और तीसरी दुनिया के देशों में अपनी दलाल सरकारें बनाने का सिलसिला शुरू कर दिया था। जिसने उसका विरोध किया, उसे अमेरिका के क्रोध को झेलना पड़ा, लेकिन कई बार अमेरिका को बेहद छोटे देशों से भी रणनीति में ही नहीं युद्ध में भी हारना पड़ा। जैसे 1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो की सरकार ने बे आफ पिग्स में अमेरिका को हराया था। इसी तरह 1955 से 1975 तक चले वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका को हारना पड़ा था। ईरान को पता था कि सीधी पारंपरिक लड़ाई में वह अमेरिका के सामने एक महीने भी नहीं टिक पाएगा। इसलिए उसने दबाव बनाने की बेहद सटीक रणनीति बनाकर उसके सैन्य बेसों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। इसी तरह उसने हार्मूज को ब्लाक कर वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित करने का प्रयास किया, जिससे पूरी दुनिया में कीमतें बढ़ गईं। इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिका को आलोचना झेलनी पड़ी। इसके साथ ही ईरान ने क्षेत्रीय सहयोग और प्राक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल भी इस युद्ध में किया है। इससे सीधी जंग के बजाय कई मोर्चों पर तनाव पैदा हुआ। सबसे बड़ी बात, ईरान ने युद्ध को लंबा खींचने की रणनीति पर काम किया, जबकि अमेरिका सब कुछ जल्दी में पा लेना चाहता था। इस दृष्टि से देखा जाए तो भले ही अमेरिका ने ईरान पर काफी घातक हमले किए, लेकिन ईरान अपनी इस रणनीति में काफी हद तक कामयाब रहा है। उसके प्रति पूरी दुनिया में सहानुभूति पैदा हुई है। इसका बहुत बड़ा महत्व है।
ईरान ने परमाणु ऊर्जा तकनीक और यूरेनियम संवर्धन तकनीक कैसे हासिल की
1950-70 के दशक में अमेरिका ने ईरान को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के लिए शुरुआती तकनीक रिसर्च रिएक्टर और प्रशिक्षण दिया। यह शाह के समय हुआ था। वहीं, जर्मनी और फ्रांस ने 1970 के दशक में ईरान के परमाणु बिजलीघर प्रोजेक्ट्स में सहयोग किया। 1990 के बाद रूस ने खासकर ईरान के बुशहर न्यूक्लियर पावर प्लांट को पूरा करने में मदद की। वहीं, ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तानी वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान के नेटवर्क से ईरान को सेंट्रीफ्यूज तकनीक मिली जो यूरेनियम संवर्धन के लिए अहम है। ध्यान रहे कि परमाणु ऊर्जा की तकनीक और परमाणु बम बनाना अलग बातें हैं। परमाणु बम बनाने के लिए उच्च स्तर करीब 90 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम होना चाहिए। दुनिया की कई एजेंसियों का दावा है कि ईरान ने 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार तैयार कर लिया है। इसे 90 प्रतिशत तक ले जाने में कम समय लगता है। परमाणु युद्ध की विनाशलीला तो जापान में दुनिया ने देखी है। इसलिए यह युद्ध कदापि नहीं होना चाहिए, लेकिन सभी को पता है कि जापान पर परमाणु कम गिराने वाला अमेरिका ही था। आज वही शांतिदूत बनता फिर रहा है। दुनिया में रूस के बाद अमेरिका के पास सबसे अधिक परमाणु हथियार हैं, लेकिन वही परमाणु निरस्त्रीकरण का मुखिया बनता फिर रहा है।
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