बुधवार, 6 मई 2026

2500 साल से अधिक समय से भारत और ईरान के बीच रहे हैं संबंध और अमेरिका से?

जब से ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला बोला है, तब से भारत के साथ ईरान के रिश्तों की भी काफी बातें हो रही हैं। लोग पुराने रिश्तों का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि हमें अपने पुराने मित्र देश ईरान का साथ देना चाहिए। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम अपने पुराने रिश्तों को याद करें। निश्चित ही अमेरिका के साथ भी अपने संबंधों को हमें याद करना चाहिए, लेकिन इस सवाल का जवाब मैं पाठकों पर छोड देता हूं।  

                          

                                                          देवेंद्र प्रताप

भारत और फारस के बीच करीब 2500 साल से व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता आया है। प्राचीन काल में भारत से मसाले, कपड़ा और कीमती फारस पत्थर भेजे जाते थे, जबकि फारस से घोड़े और अन्य सामान आते थे। भारत और फारस के बीच व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान प्राचीन काल से आधुनिक काल तक चलता रहा। 

प्राचीन काल मतलब लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से जब साइरस और डेरियस जैसे फारसी शासकों का समय था, तब से उसका भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से संपर्क शुरू हुआ। व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का यह सिलसिला मध्यकाल (8वीं से16वीं शताब्दी) तक खूब फला-फूला। इस समय व्यापार, भाषा और संस्कृति का आदान-प्रदान बहुत बढ़ा। समुद्री और स्थलीय दोनों रास्तों से व्यापार होता था।

मुगल काल में 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारत और फारस के संबंध बहुत मजबूत हुए। यह भारत-फारस संबंधों का सबसे मजबूत दौर था। दोनों देशों के बीच यह संबंध आधुनिक काल (18वीं शताब्दी के बाद) में यूरोपीय शक्तियों के आने के बाद थोड़ा कम हुआ, लेकिन व्यापार और सांस्कृतिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए। यानि अगर सीधे कहें तो भारत और फारस के संबंध लगभग 2500 साल से भी ज्यादा समय तक अलग-अलग रूपों में चलते रहे।


दोनों देशों ने एक-दूसरे पर डाला असर

भारत से काली मिर्च, इलायची, दालचीनी जैसे मसाले फारस जाते थे। इनका इस्तेमाल वहाँ के खाने में बढ़ा। भारतीय मसालों को फारस के लोग बहुत पसंद करते थे। एक तरफ हमारे मसाले उनका जायका बढाते थे, तो दूसरी तरफ भारत का सूती और रेशमी कपड़ा भी फारस में बहुत पसंद किया जाता था। भारतीय वस्त्र व्यापार ने वहां की संस्कृति को भी बहुत प्रभावित किया।

इतना ही नहीं, दोनों देशों के बीच के संबंधों का ज्ञान-विज्ञान ने मजबूती दी। भारत की गणितीय खोजें, खासकर शून्य (0) और दशमलव पद्धति, अरबों के माध्यम से फारस तक पहुंचीं। इससे वहां के विज्ञान और गणना पद्धति पर असर पड़ा। यह प्रभाव साहित्य के माध्यम से भी पडा। पंचतंत्र जैसी भारतीय रचनाओं का फारसी में अनुवाद हुआ। इन कहानियों ने फारसी साहित्य को प्रभावित किया। इसी तरह महाभारत का भी फारसी में अनुवाद हुआ, जिसे रज्मनामा कहा जाता है।

भारतीय आयुर्वेद और दार्शनिक विचारों का कुछ प्रभाव फारसी विद्वानों पर भी पड़ा। यहां तक कि कई भारतीय वैद्य और विद्वान फारसी दरबारों तक पहुंचे। कई औषधीय पौधों और इलाज की जानकारी फारसी चिकित्सकों ने अपनाई। इससे भारतीय जड़ी-बूटियों का उपयोग फारसी चिकित्सा में भी होने लगा। भारत की कुछ आध्यात्मिक परंपराओं का असर सूफी विचारधारा के कुछ पहलुओं पर भी देखा जाता है।

फारस से भी भारत में कई तरह की चीजें आती थीं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक वस्तु घोड़े थे। फारसी और मध्य एशियाई घोड़े तेज और मजबूत माने जाते थे। इसलिए भारतीय राजा फारस के घोडों को खरीदने में खास दिलचस्पी रखते थे। इसी तरह वहां से बादाम, किशमिश जैसे सूखे मेवे भी आते थे। फारस अपने केसर, गुलाबजल और सुगंधित इत्र के लिए प्रसिद्ध था। इसलिए इनका भी भारत में व्यापार होता था। इसके अलावा वहां से सुंदर कालीन, रेशमी कपड़े और ऊनी शाल, चांदी के बर्तन, सजावटी सामान, धातु की कलाकृतियां भी आती थीं। कुछ फल और उनकी किस्में, जैसे अनार और अंगूर की बेहतर नस्लें भी फारसी व्यापार के जरिये भारत पहुंचीं।

यानि भारत और फारस का रिश्ता एकतरफा नहीं था। दोनों एक-दूसरे के साथ व्यापार करते थे औैर दोनों ने एक-दूसरे की भाषा, खानपान, ज्ञान और कला-संस्कृति को समृद्ध किया।

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