शनिवार, 16 मई 2026

आखिर ईरान ने कैसे अमेरिका की नाक में दम कर दिया

                                                                      देवेंद्र प्रताप

ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले से पहले ऐसा माना जाता था कि जिस भी देश की तरफ अमेरिका ने जरा सी आंख तरेरी, उसकी शामत आ गई। ईरान इसलिए भी याद किया जाएगा कि उसने अपने सीमित संसाधन के बल पर अमेरिका की नाक में दम कर दिया। इसके पीछे उसकी लंबी सैन्य साजो-सामान की तैयारी है। युद्ध से पहले ईरान में लोगों की बहुत कम दिलचस्पी थी। उसे महज एक कट्टरपंथी मुल्क के रूप में जाना जाता था। अब लोग चैंक गए हैं कि आखिर ईरान ने कैसे अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर देश की नाक में दम कर दिया। अमेरिका को ज्ञान-विज्ञान के हर क्षेत्र में दुनिया में सबसे आगे रहा है। ऐसे में यदि ईरान सदियों पुरानी दकियानूसी सोच में यकीन करने वाला देश ही होता तो वह अमेरिका के आगे कभी नहीं टिक सकता था। जाहिर है कि हम ईरान को कम जानते हैं या उतना ही जानते हैं, जितना पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी सूचना तंत्र ने हमें जानने का मौका दिया। अपने पाठकों के लिए हम ईरान की सैन्य ताकत, धर्म और कला-संस्कृति, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, महिला शिक्षा, सामाजिक ढांचा आदि के बारे में अवगत करवाएंगे। इसी क्रम में इस बार हम एक सैन्य शक्ति के रूप में ईरान की स्थिति के बारे में बताएंगे।


सबसे पहले यह जान लें कि ईरान पश्चिम एशिया में ही नहीं दुनिया में सबसे बडा शिया मुल्क है। आबादी और क्षेत्रफल दोनों लिहाज से। शिया आबादी के लिहाज से इराक दूसरे स्थान पर है। इसके बाद अजरबैजान और बहरीन आते हैं। ईरान की कुल आबादी का करीब 85-90 शिया धर्म को मानने वाले हैं। यदि यह माना जाए कि ईरान कट्टर इस्लामिक देश है तो सवाल यह उठता है कि युद्ध के दौरान इसने खाड़ी के अन्य देशों पर हमले क्यों किए। दूसरा, यदि यह माना जाए कि यहां के शिया बड़े कट्टर हैं, इसलिए इसने सुन्नी बहुल मुस्लिम देशों को निशाना बनाया, तो सवाल यह उठता है कि ईरान ने शिया बहुल ईराक और बहरीन पर हमले क्यों किए।जाहिर है इन तर्कों में दम नहीं है। जाहिर है कि बात कुछ और है। हम इन सवालों को पाठकों के लिए छोड़े जा रहे हैं। अगली किसी कड़ी में हम इस पर अपनी बात रखेंगे। फिलहाल, इस लेख में हम खुद को ईरान की सैन्य ताकत तक की सीमित रखेंगे। 

अब तो यह सभी को पता चल ही गया है कि ईरान भी का एक शक्तिशाली देश है। उसके पास भले ही परमाणु बम नहीं है, लेकिन यह दुनिया की 16वीं सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। इसके पास बड़ी सेना है, जिसमें छह लाख से अधिक सैनिक हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग 3.5 लाख रिजर्व सैनिक हैं, जो जरूरत पड़ने पर सेना में शामिल हो सकते हैं। इरान के पास बासिज फोर्स सहित कुल लगभग दो लाख बीस हजार अर्धसैनिक बल के जवान हैं। 

इसके अलावा इरान के पास इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी आईआरजीसी के रूप में एक शक्तिशाली सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक संगठन है। इसकी स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति की रक्षा के लिए की गई थी। यह इरान के सर्वोच्च नेता के अधीन काम करती है। इसमें करीब दो लाख सैनिक हैं। इतना ही नहीं, इसके पास विशाल मिसाइल शस्त्रागार है। इसके बावजूद अमेरिकी सैन्य ताकत, तकनीक और वैश्विक पहुंच के सामने ईरान बहुत कमजोर है। ईरान को पता था कि कभी न कभी अमेरिका उसके तेल पर कब्जा करने के लिए इजरायल से या खुद हमला करेगा। इसके लिए ईरान ने लंबी तैयारी की। वह कई वर्ष से जमीन के अंदर मिसाइल सिटी बना रहा था। उसने हजारों की संख्या में ड्रोन भी बनाए, जिसका युद्ध में जमकर इस्तेमाल किया गया।


दबाव बनाने की रणनीति से ईरान ने तोड़ा महाबली का गुरूर

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका दुनिया का दादा बनने की राह पर बढ़ गया था। इसके बाद उसने खाड़ी देशों, लैटिन अमेरिकी और तीसरी दुनिया के देशों में अपनी दलाल सरकारें बनाने का सिलसिला शुरू कर दिया था। जिसने उसका विरोध किया, उसे अमेरिका के क्रोध को झेलना पड़ा, लेकिन कई बार अमेरिका को बेहद छोटे देशों से भी रणनीति में ही नहीं युद्ध में भी हारना पड़ा। जैसे 1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो की सरकार ने बे आफ पिग्स में अमेरिका को हराया था। इसी तरह 1955 से 1975 तक चले वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका को हारना पड़ा था। ईरान को पता था कि सीधी पारंपरिक लड़ाई में वह अमेरिका के सामने एक महीने भी नहीं टिक पाएगा। इसलिए उसने दबाव बनाने की बेहद सटीक रणनीति बनाकर उसके सैन्य बेसों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। इसी तरह उसने हार्मूज को ब्लाक कर वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित करने का प्रयास किया, जिससे पूरी दुनिया में कीमतें बढ़ गईं। इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिका को आलोचना झेलनी पड़ी। इसके साथ ही ईरान ने क्षेत्रीय सहयोग और प्राक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल भी इस युद्ध में किया है। इससे सीधी जंग के बजाय कई मोर्चों पर तनाव पैदा हुआ। सबसे बड़ी बात, ईरान ने युद्ध को लंबा खींचने की रणनीति पर काम किया, जबकि अमेरिका सब कुछ जल्दी में पा लेना चाहता था। इस दृष्टि से देखा जाए तो भले ही अमेरिका ने ईरान पर काफी घातक हमले किए, लेकिन ईरान अपनी इस रणनीति में काफी हद तक कामयाब रहा है। उसके प्रति पूरी दुनिया में सहानुभूति पैदा हुई है। इसका बहुत बड़ा महत्व है।


ईरान ने परमाणु ऊर्जा तकनीक और यूरेनियम संवर्धन तकनीक कैसे हासिल की

1950-70 के दशक में अमेरिका ने ईरान को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के लिए शुरुआती तकनीक रिसर्च रिएक्टर और प्रशिक्षण दिया। यह शाह के समय हुआ था। वहीं, जर्मनी और फ्रांस ने 1970 के दशक में ईरान के परमाणु बिजलीघर प्रोजेक्ट्स में सहयोग किया। 1990 के बाद रूस ने खासकर ईरान के बुशहर न्यूक्लियर पावर प्लांट को पूरा करने में मदद की। वहीं, ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तानी वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान के नेटवर्क से ईरान को सेंट्रीफ्यूज तकनीक मिली जो यूरेनियम संवर्धन के लिए अहम है। ध्यान रहे कि परमाणु ऊर्जा की तकनीक और परमाणु बम बनाना अलग बातें हैं। परमाणु बम बनाने के लिए उच्च स्तर करीब 90 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम होना चाहिए। दुनिया की कई एजेंसियों का दावा है कि ईरान ने 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार तैयार कर लिया है। इसे 90 प्रतिशत तक ले जाने में कम समय लगता है। परमाणु युद्ध की विनाशलीला तो जापान में दुनिया ने देखी है। इसलिए यह युद्ध कदापि नहीं होना चाहिए, लेकिन सभी को पता है कि जापान पर परमाणु कम गिराने वाला अमेरिका ही था। आज वही शांतिदूत बनता फिर रहा है। दुनिया में रूस के बाद अमेरिका के पास सबसे अधिक परमाणु हथियार हैं, लेकिन वही परमाणु निरस्त्रीकरण का मुखिया बनता फिर रहा है। 

बुधवार, 6 मई 2026

2500 साल से अधिक समय से भारत और ईरान के बीच रहे हैं संबंध और अमेरिका से?

जब से ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला बोला है, तब से भारत के साथ ईरान के रिश्तों की भी काफी बातें हो रही हैं। लोग पुराने रिश्तों का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि हमें अपने पुराने मित्र देश ईरान का साथ देना चाहिए। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम अपने पुराने रिश्तों को याद करें। निश्चित ही अमेरिका के साथ भी अपने संबंधों को हमें याद करना चाहिए, लेकिन इस सवाल का जवाब मैं पाठकों पर छोड देता हूं।  

                          

                                                          देवेंद्र प्रताप

भारत और फारस के बीच करीब 2500 साल से व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता आया है। प्राचीन काल में भारत से मसाले, कपड़ा और कीमती फारस पत्थर भेजे जाते थे, जबकि फारस से घोड़े और अन्य सामान आते थे। भारत और फारस के बीच व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान प्राचीन काल से आधुनिक काल तक चलता रहा। 

प्राचीन काल मतलब लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से जब साइरस और डेरियस जैसे फारसी शासकों का समय था, तब से उसका भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से संपर्क शुरू हुआ। व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का यह सिलसिला मध्यकाल (8वीं से16वीं शताब्दी) तक खूब फला-फूला। इस समय व्यापार, भाषा और संस्कृति का आदान-प्रदान बहुत बढ़ा। समुद्री और स्थलीय दोनों रास्तों से व्यापार होता था।

मुगल काल में 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारत और फारस के संबंध बहुत मजबूत हुए। यह भारत-फारस संबंधों का सबसे मजबूत दौर था। दोनों देशों के बीच यह संबंध आधुनिक काल (18वीं शताब्दी के बाद) में यूरोपीय शक्तियों के आने के बाद थोड़ा कम हुआ, लेकिन व्यापार और सांस्कृतिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए। यानि अगर सीधे कहें तो भारत और फारस के संबंध लगभग 2500 साल से भी ज्यादा समय तक अलग-अलग रूपों में चलते रहे।


दोनों देशों ने एक-दूसरे पर डाला असर

भारत से काली मिर्च, इलायची, दालचीनी जैसे मसाले फारस जाते थे। इनका इस्तेमाल वहाँ के खाने में बढ़ा। भारतीय मसालों को फारस के लोग बहुत पसंद करते थे। एक तरफ हमारे मसाले उनका जायका बढाते थे, तो दूसरी तरफ भारत का सूती और रेशमी कपड़ा भी फारस में बहुत पसंद किया जाता था। भारतीय वस्त्र व्यापार ने वहां की संस्कृति को भी बहुत प्रभावित किया।

इतना ही नहीं, दोनों देशों के बीच के संबंधों का ज्ञान-विज्ञान ने मजबूती दी। भारत की गणितीय खोजें, खासकर शून्य (0) और दशमलव पद्धति, अरबों के माध्यम से फारस तक पहुंचीं। इससे वहां के विज्ञान और गणना पद्धति पर असर पड़ा। यह प्रभाव साहित्य के माध्यम से भी पडा। पंचतंत्र जैसी भारतीय रचनाओं का फारसी में अनुवाद हुआ। इन कहानियों ने फारसी साहित्य को प्रभावित किया। इसी तरह महाभारत का भी फारसी में अनुवाद हुआ, जिसे रज्मनामा कहा जाता है।

भारतीय आयुर्वेद और दार्शनिक विचारों का कुछ प्रभाव फारसी विद्वानों पर भी पड़ा। यहां तक कि कई भारतीय वैद्य और विद्वान फारसी दरबारों तक पहुंचे। कई औषधीय पौधों और इलाज की जानकारी फारसी चिकित्सकों ने अपनाई। इससे भारतीय जड़ी-बूटियों का उपयोग फारसी चिकित्सा में भी होने लगा। भारत की कुछ आध्यात्मिक परंपराओं का असर सूफी विचारधारा के कुछ पहलुओं पर भी देखा जाता है।

फारस से भी भारत में कई तरह की चीजें आती थीं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक वस्तु घोड़े थे। फारसी और मध्य एशियाई घोड़े तेज और मजबूत माने जाते थे। इसलिए भारतीय राजा फारस के घोडों को खरीदने में खास दिलचस्पी रखते थे। इसी तरह वहां से बादाम, किशमिश जैसे सूखे मेवे भी आते थे। फारस अपने केसर, गुलाबजल और सुगंधित इत्र के लिए प्रसिद्ध था। इसलिए इनका भी भारत में व्यापार होता था। इसके अलावा वहां से सुंदर कालीन, रेशमी कपड़े और ऊनी शाल, चांदी के बर्तन, सजावटी सामान, धातु की कलाकृतियां भी आती थीं। कुछ फल और उनकी किस्में, जैसे अनार और अंगूर की बेहतर नस्लें भी फारसी व्यापार के जरिये भारत पहुंचीं।

यानि भारत और फारस का रिश्ता एकतरफा नहीं था। दोनों एक-दूसरे के साथ व्यापार करते थे औैर दोनों ने एक-दूसरे की भाषा, खानपान, ज्ञान और कला-संस्कृति को समृद्ध किया।