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गुरुवार, 8 सितंबर 2011

तुगलकाबाद फैक्ट्री हादसे के शिकार मजदूरों की कहानी


यहां तो जीवन से मौत है सस्ती
शांतनु
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली) का इलाका भारत के नगरों पर एक सितारे की तरह चमकता रहता है। यहां अथाह पैसा है। रोजगार के साधन हैं। फैक्ट्रियों, कंपनियों की भीड़ है और काम करने वालों की जरूरत भी। इसलिए देश के पिछड़े इलाकों से लाखों-लाख गरीब आबादी अपनी मेहनत के बदले एक बेहतर जिंदगी की तलाश में यहां आती रहती है, लेकिन बेहतर जिंदगी तो शायद ही किसी को मिल पाती है, ज्यादातर को महानगर के किसी कोने में, गंदी बस्ती में सिर छुपाने की जगह नसीब होती है। फिर शुरू होता है सुबह से लेकर शाम तक पिसने का दौर, जिसमें वह तिल-तिल कर मरता रहता है। चमक-दमक के पीछे की सच्चाई से वह जल्दी ही रूबरू हो जाता है, लेकिन बदकिस्मती तो देखिए, जिंदगी की जरूरत उसे वहां से भागने नहीं देती। इन लोगों में से एक आबादी, जिनमें नौजवान लड़के-लड़कियां ज्यादा होते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि वह जो काम कर रहे हैं, वह कितना खतरनाक है। इसी दुश्चक्र में ऐसे लोग कई बार मौत के मुंह तक पहुंच जाते हैं।
दिल्ली की तुगलकाबाद क्षेत्र की गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की मौत इसका एक उदाहरण है। अमेजिंग क्रिएशन नाम की इस फैक्ट्री में पिछले 25 जनवरी की शाम आगजनी में सरकारी आंकड़ों में 16 लोग जलकर मर गए और पांच घायल हो गए।
लालच की नींव पर खड़ी फैक्ट्रियां
हर फैक्ट्री मालिक का उद्देश्य यही होता है कि मजदूरों के श्रम को निचोड़ कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जाए। पहले देश का श्रम कानून उनके इस लालच को बेलगाम होने से रोकता था, लेकिन उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से फैक्ट्री मालिकों को मजदूरों के श्रम को निचोड़ने के लिए बेलगाम कर दिया गया। इन नीतियों ने एक्सपोर्ट (निर्यात) उद्योगों को खूब बढ़ावा दिया, जिसके कारण पूरे देश में निर्यात उद्योगों का जाल सा बिछ गया। इन एक्सपोर्ट उद्योगों की बुनियाद ही सस्ते श्रम पर टिकी हुई है। इससे सरकार और एक्सपोर्ट फैक्ट्री मालिकों को डालर में जबरदस्त कमाई होती है। इन फैक्ट्रियों में तैयार मालो के खरीददार विदेशी कंपनियों को भी भारी मुनाफा होता है। वहीं दूसरी ओर मजदूरों को इसकी कीमत, अपनी सेहत या जान देकर चुकानी पड़ती है। कम समय में ज्यादा मुनाफे के लालच में नए-नए खिलाड़ी, इस मैदान में कूदते रहते हैं और जल्दी ही करोड़ों के मालिक बन जाते हैं। तुगलकाबाद के अमैजिंग क्रिएशन का मालिक मुन्ना मास्टर भी इस खेल में ऐसा ही एक नया खिलाड़ी था।
अस्सी के दशक में मुन्ना मास्टर एक अच्छे कारीगर के रूप में जाना जाता था। उस समय वह एक गार्मेंट फैक्ट्री में पैटर्न मास्टर के पद पर काम करता था। किसी गार्मेंट फैक्ट्री में यह पद महत्वपूर्ण होता है। विदेशी कंपनी के एजेंट, जिसे ‘बायर’ कहा जाता है, से पैटर्न मास्टर का सीधा संबंध होता है। बायर की जरूरत के मुताबिक, वह नमूना तैयार करता है और अपने कारीगरों को माल का डिजाइन देता है। इस संबंध का फायदा उठाकर मुन्ना मास्टर ने 1987-88 में खुद की एक फैक्ट्री शुरू की, हालांकि इसमें वह सफल नहीं हो सका। 1993-94 में उसने फिर से फैब्रिकेटर का काम शुरू कर दिया। अब तक उसने अपने लड़के को डिजाइनिंग में डिप्लोमा करा दिया था। इस दौरान देश का औद्योगिक माहौल भी काफी बदल चुका था। इस बदले माहौल ने एक तरफ जहां मजदूरों की जिंदगी को नर्क बनाना शुरू कर दिया, वहीं देश-विदेश के पूंजीपति इसकी बदौलत मालामाल होने लगे। स्थिति यह हो गई कि देश के श्रम कानूनों का फैक्ट्री मालिकों के लिए कोई मायने नहीं रह गया। मुन्ना मास्टर ने भी इस माहौल में खूब मुनाफा कमाया और जल्दी ही अमैजिंग क्रिएशन कंपनी बना ली। मुन्ना की कंपनी में तैयार माल निर्यात किया जाता था।
अमैजिंग क्रिएशन: जहां हर पल घात लगाए रहती है मौत
तुगलकाबाद स्कूल के पीछे पतली सी गली के शुरुआत में बने बमुश्किल 8-10 फिट चौड़े इस मकान बाहर से देखने पर पता ही नहीं चलेगा कि यह एक गार्मेंट फैक्ट्री है। रिहाइशी इलाके में महज 80 गज की जमीन पर बने इस चार मंजिला इमारत लगभग 150 मजदूर काम करते थे। मजदूरों की यह संख्या आर्डर के मुताबिक घटती-बढ़ती रहती थी।
चौथे मंजिल पर जहां यह हादसा हुआ, वहां शिफान व जॉर्जेट के कपड़ों पर अड्डा वर्क यानी हाथ की कसीदाकारी, तैयार कपड़ों की धुलाई और उनको सुखाया जाता था। हादसे के दिन, वहां लेडीज सूट का काम चल रहा था। कपड़ों की धुलाई का काम एक ऐसे सॉल्वेंट से किया जाता है, जिसे पेट्रोल में केमिकल मिलाकर तैयार किया जाता है। जानकार लोगों का कहना है कि यह सॉल्वेंट पेट्रोल से कई गुना ज्वलनशील होता है। इससे कपड़ों को धुलने के बाद, उन्हें खुले में सुखाया जाता है, लेकिन इस फैक्ट्री में कपड़ों को एक मशीन में डालकर इसका सॉल्वेंट निकाल लिया जाता है।
गार्मेंट उद्योग से लंबे समय से जुड़े रहे तस्कीमुद्दीन, जिनका बेटा आमिर, इस फैक्ट्री में हादसे का शिकार हुआ, का कहना है कि मशीन में कपड़ों को सुखाना गैर-कानूनी है, क्योंकि इससे आग पकड़ने का खतरा होता है। मालिक सॉल्वेंट बचाने के लालच में मशीन का इस्तेमाल करते हैं। फैक्ट्री में हादसे के वक्त एक जनरेटर, डीजल और सॉल्वेंट का स्टॉक भी मौजूद था।
हादसे के दिन काम का बहुत दबाव था। मालिक ने मजदूरों को ओवर टाइम के लिए रोक लिया था, यहां तक कि उसने अपने लड़के को भी धुलाई के काम में लगा दिया था। जल्दबाजी में काम होने के कारण, सॉल्वेंट मशीन से बाहर बिखरने लगा और वह अड्डा वर्क कर रहे मजदूरों तक पहुंच गया। मजदूरों को सॉल्वेंट की गंध का अंदाजा हो गया था, लेकिन मालिक के डर से किसी ने मुंह नहीं खोला। वैसे भी अड्डा वर्क ज्यादातर बच्चों से ही कराया जाता है। धुलाई मशीन में स्पार्किंग या किसी शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई और देखते ही देखते आग की लपटों ने चौथे माले को अपनी आगोश में लिया। सॉल्वेंट, डीजल, शिफॉन और जॉजेट के कपड़ों के अंबार में आग लगने के साथ ही विस्फोट हो गया, जिससे कोठरी की छत उड़ गई। आस-पास के लोगों ने इस विस्फोट को बॉयलर फटना समझा। उधर अंदर मजदूर बिजली के करंट और आग में जलने से तड़प-तड़प कर मर रहे थे। वहां काम कर रहे मजदूरों में, सिर्फ वही किसी तरह जान बचाने में सफल रहे, जो सीढ़ी के पास काम कर रहे थे।
कितने मरे?
ऐसी किसी फैक्ट्री में हादसा होने पर मरने वालों की सही संख्या का पता लगाना, बहुत कठिन होता है, क्योंकि इस तरह की फैक्ट्रियों में ठेका और कैजुअल मजदूरों की संख्या स्थाई मजदूरों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है। बाहर से आए गरीब मजदूरों की ओर से वैसे भी कोई नहीं बोलता। अमेजिंग क्रिएशन के मामले में सरकार ने अब तक 16 मजदूरों के मरने और पांच के घायल होने की ही बात को माना है। जबकि, हादसे के दूसरे दिन ही स्थानीय लोगों ने फैक्ट्री से लाशों को निकालते हुए देखा। आगजनी में मरने वाली, लालती देवी ने हादसे के दो दिन पहले अपने परिवार के लोगों को बताया था कि उस फैक्ट्री में बिहार की पांच महिलाओं को एक दिन पहले काम पर रखा गया था। उसने यह भी बताया था कि उनके पास पैसे नहीं थे और वे लालती से 500 रुपये उधार मांग रही थीं। लालती के पास भी पैसे कम ही थे, इसलिए वह उन्हें 50 रुपये ही दे सकी। वे पांचों महिलाएं कहां गर्इं, इसका कुछ पता नहीं चला। हादसे के बाद पुलिस की मिलीभगत से मुन्ना मास्टर ने गैर-कानूनी तौर पर फैक्ट्री की सफाई कराई थी। अब ऐसे में कौन जाने कि इस दौरान कितनी लाशों को ठिकाने लगाया गया।
मालिक और प्रशासन का रवैया
इस दिल दहला देने वाली वारदात के बाद मालिक और प्रशासन के रवैये से एक बार फिर यही साबित हुआ कि हुकमरान लोग मजदूरों को पूंजी पैदा करने वाले पुरजे के अलावा और कुछ नहीं समझते हैं। इस घटना के बाद, जहां मालिक अपनी गर्दन बचाने के लिए गोटी बिठाने लगा, वहीं प्रशासन ने सारा दोष फैक्ट्री मालिक पर डालकर छुट्टी पा ली। प्रशासन को डर था कि कहीं दिल्ली की चकाचौंध के पीछे मजदूरों की नारकीय जिंदगी की झलक, दुनिया वालों को न दिख जाए। इस लिए उसने मामले को जल्दी-जल्दी खत्म करवा दिया। मजदूरों का गुस्सा इस बात पर था कि फैक्ट्री मालिक ने मजदूरों के घरों में हादसे की खबर तक नहीं पहुंचने दी। मजदूरों के परिवार वाले दुखी थे, कि वे अपने कलेजे के टुकड़ों को बचाने की आखरी कोशिश तक नहीं कर पाए। मालिक की चिंता इससे अलग थी, वह इस बात की जल्दी में था कि उसके पास दो करोड़ का जो माल बचा है, उसे जल्दी से जल्दी विदेश भेजा जाए। हादसे के दूसरे दिन, उसने थाने में अपनी गोटी सेट कर ली, फैक्ट्री से माल निकलवाया, बची हुई लाशों को ठिकाने लगाया और फैक्ट्री की अच्छी तरह से धुलाई करवा दी। यह मालिक और प्रशासन के बीच साठगांठ का ही नतीजा था कि मजदूरों के दबाव के बावजूद, कहीं आठवें दिन फैक्ट्री को सील किया गया। इस दौरान फैक्ट्री की चाभी थानेदार के पास रहती थी। मृतक मजदूरों के परिवार वालों की मुसीबतों का सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा। जिन लोगों की हादसे में मौत हुई, उनमें से अधिकांश अपने परिवार की आमदनी का मुख्य जरिया थे। उनके मरने के साथ ही, परिवार वालों के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया। इसके बावजूद फैक्ट्री के बचे मजदूरों और मृतकों के परिवार वालों ने थाना, श्रम विभाग, एसडीएम कार्यालय से लेकर नेताओं तक के चक्कर लगाए। नतीजतन इनके ऊपर कर्ज का भारी बोझ लद गया। घायल मजदूरों के परिवार की हालत तो और भी खराब हो गई। सरकारी अस्पताल ने घायलों का आधा-अधूरा इलाज कर, उन्हें भगा दिया गया। इसलिए उनके परिवार वालों को घायलों खुद के पैसे से इलाज करवाना पड़ा। पीलीभीत के रहने वाले वली अहमद और तुगलकाबाद गांव के कल्लू को अपने घायल बेटों को बचाने के लिए 50-50 हजार रुपये कर्ज लेकर खर्च किया। एक मजदूर के लिए 50 हजार का कर्ज, बड़ी रकम होती है। इतनी बड़ी रकम बच्चों के इलाज पर खर्च करने के बाद भी, वे उन्हें चलने फिरने-लायक नहीं बना पाए। वे विकलांग जैसी स्थिति में अभी भी बिस्तर पर पड़े हुए हैं।
इधर दिल्ली सरकार के श्रम विभाग ने हादसे के दसवें दिन आश्चर्यजनक मुस्तैदी दिखाते हुए फैक्ट्री मालिक के नाम पर पत्र जारी किया। इसमें 12 मृतक मजदूरों को पांच-पांच लाख और सात घायलों को 50-50 हजार का हर्जाना देने को कहा गया। एक स्थानीय दैनिक की खबर के अनुसार फरवरी माह में ही दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र में एक स्थानीय विधायक द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा कि 14 मृतक और पांच घायल मजदूरों के परिवारों को मुआवजा देने के लिए कंपनी से 79 लाख 74 हजार 841 रुपये की रिकवरी से संबधित प्रमाण पत्र जारी कर दिया है। इसी सिलसिले में मार्च के महीने में मृतक मजदूर परिवारों को दिल्ली सरकार ने एक लाख रुपये की अंतरिम सहायता हेतु चेक जारी कर दिया। जून माह में मजदूरों को श्रम विभाग ने एक पत्र भेजा। जिसमें उन्हें सूचित किया गया कि मालिक से हर्जाना वसूलने के लिए श्रम विभाग ने केस को सिविल कोर्ट में भेज दिया है। इस तरह श्रम विभाग और सरकार ने इस भयानक कांड से अपना पल्लू झाड़ लिया।
दोषी कौन?
इस हादसे के शिकार ज्यादातर मजदूर युवा थे। इन्हीं के सहारे इनके पूरे परिवार को रोटी मिलती थी। अपनी जिंदगी को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश में ये भोले-भाले लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे। इनकी मौत के बाद इनके परिवार पर दुख और गरीबी का जैसे कहर ही टूट पड़ा। मुहम्मद इदरीश की हालत से इसे समझा जा सकता है। इदरीश इस हादसे में मारे गए 18 वर्षीय रहीस के अब्बू हैं। इदरीश का बड़ा लड़का कुछ समय पहले बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसकी बीबी और दो छोटे बच्चों का भार इदरीश पर ही है। इदरीश अब बुजुर्ग हो चुके हैं और काम करने की हालत में नहीं हैं, इसलिए परिवार के गुजारे की जिम्मेदारी रहीस पर थी। रहीस के गुजरने के बाद अब उसके अब्बू के अलावा परिवार में सिर्फ औरतें और बच्चे ही बचे हैं। इदरीश की जिंदगी में अब अंधेरा ही अंधेरा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह परिवार की गाड़ी को कैसे खींचे। यही हालत किसी न किसी रूप में आज ज्यादातर मजदूरों की है। इन मजदूर परिवार को हुए नुकसान की भरपाई आज कोई नहीं कर सकता। सरकार फैक्ट्री मालिक को दोषी कहकर मजदूरों को कोर्ट कचहरी के चक्रव्यूह में डाल देना चाहती है। इसलिए उसने अपने को पाक-साफ दिखाने के लिए बहुत जल्द ही मृतकों के परिवारों के नाम एक-एक लाख का चेक जारी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेना चाहती है। हालांकि, मजदूरों को पता है कि कोर्ट कचहरी की अंतहीन लड़ाई में सामान्यत: मालिक ही जीतता है, इसलिए उन्होंने सरकार की इस कार्रवाई को मानने से इंकार कर दिया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस हृदय विदारक कांड के लिए मुन्ना मास्टर दोषी है और उस पर मजदूरों की हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए (इस फैक्ट्री के कागजात के हिसाब से इसका मालिक मुन्ना मास्टर का लड़का शमीम खान है, जबकि वास्तविक कर्ताधर्ता मुन्ना मास्टर ही है)। गौर करने वाली पहली बात यह है कि वह फैक्ट्री गैर कानूनी तौर पर चल रही थी। दूसरी बात यह है कि इतनी तंग जगह में ज्वलनशील व विस्फोटक सामान और तेजी के साथ आग पकड़ने वाले कपड़ों के अंबार के बीच मजदूरों से जिस तरह काम करवाया जा रहा था, वह मौत को दावत देने वाली थी और पूरी तौर पर गैर कानूनी थी। वास्तव में इस हालात ने ही मजदूरों को मौत के मुह में धकेला है। इसलिए सरकार इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से किसी भी तरह बच नहीं सकती है। इसलिए मजदूरों को हर तरह का मुआवजा देने या दिलवाने की जिम्मेदारी सरकार की ही बनती है।
वैसे तो भारत का संविधान मालिक वर्ग के हितों की ही रक्षा करता है। आजादी के आंदोलन के दौरान एक मजबूत मजदूर आंदोलन के कारण मजदूरों के हितों से संबंधित कुछ धाराएं भी संविधान में दर्ज की गर्इं। श्रम कानून इसी श्रेणी में आते हैं। अगर श्रम कानूनों को सही ढंग से लागू किया जाए, तो मजदूरों को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन 1991 में लागू उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने इन श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। इसने मजदूरों व अन्य मेहनतकशों की जिंदगी को नरक बना डाला। कानून का रक्षक ही मालिक वर्ग के साथ खड़ा हो गया। प्रधानमंत्री उदारीकरण की नीतियों का गुणगान करने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। उन्हें तो यही अफसोस रहता है कि वे इन नीतियों को और तेजी से क्यों नहीं लागू कर पा रहे हैं। उदारीकरण की नीतियां आज तीन दशक बाद पूरी तरह बेनकाब हो चुकी हैं। अगर मजदूरों व मेहनतकशों को अपनी अस्तित्व की हिफाजत करना है, तो उसे इन नीतियों के खिलाफ एक सशक्त मजदूर आंदोलन खड़ा करना ही होगा।
जिन्हें जिन्दगी हारकर बैठने नहीं देती
युद्ध, नेताओं की गद्दारी, नरसंहार, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अमीरों की अय्यासी, जनता का दमन और उत्पीड़न जैसी रोज-रोज की घटनाएं, किसी संवेदनशील मन में भविष्य की एक निराशापूर्ण तस्वीर बना सकती हैं। लेकिन दुनिया के मजदूरों मेहनतकशों के जीवन को अगर नजदीक से देखा जाए तो मन में यह भरोसा पैदा होता है कि पूरी मानवता एक बेहतर भविष्य की ओर ही आगे बढ़ेगी। अथाह दुख-तकलीफ और परेशानियों के बावजूद करोड़ों मजदूर जनता जिस तरह जिंदगी से बगैर हारे एक बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष करते रहते हैं, यह बात और किसी तबके में देखने को नहीं मिलती। जिंदगी के प्रति यह बेमिसाल जज्बा ही मानवता के एक बेहतर भविष्य की गारंटी करता है। तुगलकाबाद की फैक्ट्री में हादसे के बाद मजदूर परिवारों से बात करने के बाद मेहनतकश टीम को यही अहसास हुआ। हमारे लिए संभव नहीं था कि मजदूरों के कभी पस्त किए जा सकने वाले हौसलों और जीवन के प्रति उनके आशावादी नजरिए को बहुत विस्तार से यहां प्रस्तुत कर पाएं। फिर भी इस हादसे से प्रभावित कुछ मजदूरों उनके परिवार से जुड़ी कुछ बातों को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
हामिद-कमरुन्निसा
हामिद और कमरुन्निसा शब्बो के अब्बू और मम्मी हैं। 18 साल की शब्बो उन मजदूरों में से एक थी, जो मुन्ना मास्टर की फैक्ट्री में लगी आग की भेंट चढ़ गए। शब्बो का परिवार तुगलकाबाद गांव के छुरिया मोहल्ले में रहता है। इस गांव के एक हिस्से में खाते-पीते लोग रहते हैं, जबकि शेष बड़े हिस्से में लोग टूटे-फूटे हिस्से और झोपड़ियों में रहते हैं। यह हिस्सा उबड़-खाबड़ है और गंदगी के अंबार पर बसा हुआ है।
बाहर से गया कोई आदमी अगर यहां आ जाए तो वह विश्वास ही नहीं करेगा कि वह दिल्ली में है। हम जब शब्बो के घर गए, तो कमरे में कमरुन्निसा बच्चों के पास बैठी थी। उसे जब पता चला कि हम शब्बो के बारे में जानकारी लेने आए हैं, तो उसकी आंखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी। वह बोली, ‘हम लोगों के ऊपर इतनी बड़ी मुसीबत टूट पड़ी है, लेकिन आज तक कोई एक बार भी हाल-चाल पूछने तक नहीं आया।’ उसके रुंधे गले ने इसके आगे उसे नहीं बोलने दिया। हामिद ने हमें शब्बो के बारे में विस्तार से बताया।
हामिद का परिवार उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले का रहने वाला है। हामिद आठवीं पास हैं। वे फिलहाल सिलाई का काम करके अपने घर के लिए रोटी का इंतजाम करते हैं। वर्ष 1988 में बेहतर काम की तलाश में वे दिल्ली आए थे। 1999 में वे कतर में नौकरी करने गए। 2002 मे वहां कंपनी बंद हो जाने के कारण गांव लौटना पड़ा। गांव में भी वे तीन साल से ज्यादा समय नहीं गुजार सके। गुजारे के लिए उन्हें फिर से दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में वे एक फैब्रिकेटर के यहां सिलाई का काम करते हैं। उनकी एक माह की औसत आमदनी 4000 रुपये है। रहने के लिए 8 गुणा 10 फीट का एक कमरा है। इसका किराया 700 रुपया है। पीने के पानी के लिए 500 रुपया हर माह अलग से खर्च करना पड़ता है। उनका कमरा इतना छोटा है कि बारिस के मौसम में पूरे परिवार के लिए रातभर सोना मुश्किल हो जाता है। हामिद और कमरुन्निसा के छह बच्चे हैं। 18 साल की सब्बो सबसे बड़ी थी। सब्बो ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। अपनी मां से एक बार उसने कहा था, ‘मम्मी अगर मैं भी कमाने लगूं, तो भाई लोग पढ़ सकेंगे।’
पहली जनवरी 2011 से सब्बो ने मुन्ना मास्टर के फैक्ट्री में 5278 रुपये महीने पर नौकरी शुरू कर दी। अभी उसको फैक्ट्री आए एक माह भी नहीं पूरा हुआ था कि 25 जनवरी को यह हादसा हो गया। जलने के बाद करीब पांच दिनों तक सब्बो सफदरजंग अस्पताल में एक बिस्तर पर तड़पती रही। भर्ती होने के बाद ऐसा लगा था कि वह बच जाएगी। बीच-बीच में वह बातचीत भी करने लगी थी। हामिद को लगा, चलो जल तो गई, लेकिन जान बच जाएगी। लेकिन पांचवे दिन वह चल बसी। हामिद को यही अफसोस सालता रहा कि वह सब्बो का सही ढंग से इलाज नहीं करवा पाए। अस्पताल में चौथे दिन सब्बो ने हामिद से कहा था, ‘अब्बू वे लोग हम मजदूरों को अस्पताल के पास भी नहीं पहुंचाए थे। हम लोग पैदल ही सड़क पार कर अस्पताल पहुंचे।’ हामिद कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे कि इतनी बुरी तरह जलने के बाद कि कैसे उनके सब्बो और दूसरे मजदूर सड़क पार करके अस्पताल पहुंचे होंगे।
चलते समय हामिद ने हमसे बार-बार आग्रह करते हुए कहा, ‘भाई साहब मालिक लोग कितने जालिम हैं, इसे आप जरूर लिखिएगा।’ हमें यह भी पता चला कि सब्बो की शादी गांव में तय भी हो चुकी थी। लेकिन, इस आग ने उसके सारे सपनों को जलाकर राख कर दिया। इस भयंकर हादसे के बाद भी मजदूरों की जिंदगी ऐसी होती है कि वे हार मानकर नहीं बैठते।
यही वजह है कि अब हामिद फिर से अपने परिवार को पटरी पर लाने के लिए जी जान से जुट गए हैं। अब सब्बो की छोटी बहन हसीना ने अपनी बड़ी बहन की जगह ले ली है। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है और घर का खर्च उठाने में पिता का हाथ बंटा रही है। जिंदगी ने फिर से रास्ता ढूंढ़ ही लिया।
रामलखन
48 वर्षीय रामलखन लालती देवी के पति हैं। लालती देवी अमेजिंग क्रिएशन में काम करने वाले उन मजदूरों में से एक थी, जो फैक्ट्री में लगी आग की भेंट चढ़ गए। रामलखन और लालती देवी की 12-18 साल के उम्र के बीच की चार लड़कियां हैं। चूंकि परिवार की आजीविका का मुख्य स्रोत लालती देवी की मजदूरी ही थी, इसलिए उनकी मौत के बाद ने पूरे परिवार के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। रामलखन जो झोपड़ी लालती के रहते हमेशा चहचहाती रहती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा रहता है। सन्नाटे और अकेलेपन में आज रामलखन अपनी झोपड़ी में कैद जिंदगी की उन सच्चाइयों को जज्ब करने की कोशिश में लगा रहता है, जिनसे उसका अभी हाल में ही सामना हुआ है।
रामलखन का उत्तर प्रदेश में मऊ जिले का रहने वाला है। वे जाति से चमार हैं। गांव में रहते हुए, उन्होंने उन सभी विडम्बनाओं को झेला, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव में दलित और संपत्तिहीन लोगों को झेलना होता है। अपनी जीविका के लिए रामलखन ने कभी रिक्शा चलाया, तो कभी सिलाई का काम किया। गांव में मजदूरी बहुत कम मिलने के कारण वे 1991 में शादी के बाद दिल्ली आ गए और एक गार्मेंट फैक्ट्री के लिए सिलाई का काम करने लगे। लालती देवी ने भी भरपूर मेहनत मजदूरी से परिवार को सहारा दिया। पांच साल पहले रामलखन को ब्लड सुगर की बीमारी हो गई। ऐसे में उनका काम पर जाना कम होता गया। ऐसे में लालती की कमाई से ही रामलखन की दवा और परिवार का किसी तरह गुजर-बसर होता।
मुन्ना मास्टर की फैक्ट्री में लालती 28 दिसंबर 2010 से काम कर रही हैं। इस कंपनी में उसे अभी एक महीना भी नहीं गुजरा होगा कि वह 25 जनवरी को फैक्ट्री में लगी आग की भेंट चढ़ गई। इस दिन को रामलखन कभी नहीं भूल सकता। उस दिन जब दोनों अपने-अपने काम पर थोड़े-थोड़े समयांतराल पर निकले तो मोहल्ले के चौराहे पर वे टकरा गए। इस पर लालती ने रामलखन की चुटकी लेते हुए कहा, ‘आ गए पीछा करते हुए।’ पत्नी से उसकी वही आखिरी मुलाकात थी। आग लगने की खबर लगते ही रामलखन जयप्रकाश नारायण अस्पताल की ओर भागे। वहां उसे एक पूरी तरह जली हुई औरत को दिखाकर कहा गया कि यही लालती देवी है। रामलखन ने उसकी पायल देखते हुए कहा, ‘नहीं यह लालती नहीं है।’ बाद में पता चला कि वह लाश एक दूसरी मजदूर अनिता की थी। रात 12 बजे जब वह भागा-भागा सफदरजंग अस्पताल पहुंचा, तो उसे बताया गया कि लालती देवी का इलाज चल रहा है। उसने पुलिस वालों से लाख मिन्नत की उसे एक बार पत्नी से मिलने दिया जाए, लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी। दूसरे दिन अस्पताल से उसे लालती देवी की लाश मिली। लालती देवी के जाने से रामलखन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। जिन समस्याओं पर पहले उसे सोचने की जरूरत नहीं होती थी, वह सब अब उसकी छाती पर सवार हो गर्इं। रामलखन ने लड़कियों को गांंव भेज दिया है। गांव में वैसे तो एक अदद कमरे के अलावा और कुछ भी नहीं है, लेकिन रामलखन सोचते हैं कि गांव में लड़कियां सुरक्षित रहेंगी। लड़कियों ने पिता पर बोझ बनने के बजाए, मददगार बनने का फैसला किया है। हालात ने जैसे चारों को जैसे चारों को अपनी उम्र से बड़ी और बेहद जिम्मेदार बना दिया। अब चारों बहनों ने दिल्ली में ही रामलखन के साथ रहते हुए अपनी पढ़ाई और रोजगार एक साथ करने के लिए फैसला किया है।
जमील और शकीरा
18 साल का किशोर निजामुद्दीन गार्मेंट फैक्ट्री में मरने वाला एक और मजदूर है। जमील और शकीरा निजामुद्दीन के अब्बू और मम्मी हैं। अपने लाडले को खोकर जमील महज 35 साल में ही बूढ़ा सा दिखने लगा है। शकीरा भी 31 साल की उम्र में ही जिंदगी की मुसीबतों से लड़ते-लड़ते कभी न थकने वाली एक योद्धा जैसी बन गई है। अपने मृत बेटे के बारे में बात हो या उसकी खुद की जिंदगी के बारे में-शकीरा की बात एक बार शुरू हो जाती है, फिर खत्म नहीं होती। जमील और शकीरा उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रहने वाले हैं। साल भर पहले वे अपने परिवार के साथ दिल्ली आए। निजामुद्दीन उनका बड़ा बेटा था। गरीबी और मुश्किल हालात से शकीरा का बचपन से ही वास्ता है। शादी के बाद वे लखनऊ आ गए, क्योंकि जमील के गांव में उनके रहने के लिए जगह नहीं बची थी। यहां वे 13 साल तक रहे। चूंकि लखनऊ चिकन के सिले-सिलाए कपड़ों का एक बड़ा केंद्र है, इसलिए यहां काम मिलना मुश्किल नहीं था। लेकिन, यहां मजदूरी बहुत कम थी। उस समय (1995-1996 के आसपास) एक लेडीज सूट सिलने का ढाई रुपये मिलता था। शकीरा के अब्बू ने उसकी शादी में एक सिलाई मशीन दी थी। लखनऊ में उन्होंने कर्ज लेकर दो और सिलाई मशीन खरीद ली। देर रात तक मेहनत करके वे बहुत मुश्किल से 100 रुपये रोज कमा पाते थे। इस बीच परिवार बढ़ता गया और खर्च भी। इस बीच शकीरा गंभीर रुप से बीमार पड़ गई। उसके इलाज में 40 हजार लग गए। इसके लिए जमील को एक महाजन से 10 प्रतिशत व्याज पर कर्ज लेना पड़ा। यह महाजन कुख्यात सूदखोर था। जिसने एक बार उससे कर्ज ले लिया, फिर उसे कोई नहीं बचा सकता था। जमील के परिवार ने दिन रात एक करके महाजन का कर्ज तो पूरा कर दिया, लेकिन इसकी लिए की गई मेहनत ने जमील और शकीरा के शरीर को बुरी तरह तोड़ दिया।
अब तक निजामुद्दीन 17 साल का हो चुका था। उसने दिल्ली में मजदूरी ज्यादा मिलने के कारण अपने अब्बू से दिल्ली चलने की जिद की। वहां वह बहुत लगन से काम करने लगा। वह सुबह से शाम तक गार्मेंट फैक्ट्री में काम करता था। यहां तक कि बीमार होने पर भी वह ड्यूटी जाता था।
कई बार वह धागा कटिंग जैसे छोटे मोटे काम को घर पर करने के लिए भी ले आता था। इस तरह वह महीने में सात-साढ़े हजार रुपये कमा लेता था। वह अपने ऊपर ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी मानता था। लेकिन शकीरा के लिए यह सब बीते दिनों की बातें हो चुकी हैं। वह अपने होनहार बेटों में से एक को खो चुकी है। निजामुद्दी का छोटा भाई अब अपनी पढ़ाई छोड़कर काम पर जाने लगा है। शकीरा धागा काटते हुए हमसे बात किए जा रही थी। मेहनत के सिलसिले को वह टूटने नहीं देगी। उसके ऊपर अभी बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं।
तसकीनुद्दीन
19 साल का नौजवान आमिर भी मुन्ना मास्टर की गार्मेंट फैक्ट्री में हुए विस्फोट में मारा गया था। तसकीनुद्दीन के चार बच्चों में आमिर भी सबसे बड़ा था। तसकीनुद्दीन का परिवार करीब 25 साल पहले उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से आया था। अब वे अपने आप को दिल्ली का बासिंदा ही मानते हैं। इस समय वे हौजरानी में रहते हैं।
मुन्ना मास्टर और तसकीनुद्दीन बहुत पुराने मित्र हैं और एक ही मोहल्ले में रहते हैं। मुन्ना मास्टर जब करोड़ों कमाने लगा, तो उनके बीच फासला पैदा हो गया। फिर भी सामाजिक तौर पर अब भी उन्हें लोग दोस्त ही मानते हैं। तसकीनुद्दीन अपने पास छह सिलाई मशीन रखकर फैब्रिकेटर का काम करते थे, इसलिए उनके घर में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। आमिर का मन पढ़ाई में नहीं लगने के कारण उसे काम करने के लिए मुन्ना मास्टर की फैक्ट्री में भेज दिया गया। आमिर ने वहां छह महीने तक काम सीखा। लेकिन मन न लगने के कारण उसने अमेजिंग क्रियेशन का काम छोड़ दिया। जाड़े में काम ज्यादा होने पर मुन्ना मास्टर ने आमिर को फिर से काम पर लगवा दिया।
25 जनवरी को सुबह फैक्ट्री जाते समय मुन्ना मास्टर तसकीनुद्दीन को कहता गया कि आज काम ज्यादा है, इसलिए आमिर आज घर नहीं आएगा। आमिर फिर घर नहीं लौटा। तसकीनुद्दीन को हैरानी इस बात पर थी, कि पड़ोसी और दोस्त होने के बावजूद मुन्ना मास्टर ने हादसे की खबर उसे नहीं दी। दूसरे दिन किसी ने अखबार पढ़कर तसकीनुद्दीन को फैक्ट्री में हादसे की सूचना दी। मुन्ना मास्टर को तसकीनुद्दीन की दोस्ती की चिंता नहीं थी। वह रात भर फैक्ट्री से सामान निकलवाने और थाने से गोटी सेट करने में लगाया। इसके बावजूद तसकीनुद्दीन हिम्मत नहीं हारे। आज वे इस हादसे के शिकार मजदूरों और उनके परिवार वालों को इंसाफ दिलवाने के लिए मैदान में उतर चुके हैं।
(शांतनु मेहनतकश पत्रिका के संपादक हैं. यह लेख मेहनतकश पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित हुआ है. जो भी साथी शांतनु से संपर्क करना चाहते हैं वे उनसे इस नंबर (०९३१०८१८७५०) पर सम्पर्क कर सकते हैं. म्हणत काश पत्रिका की ई मेल : mehnatkash2010@gmail.com है. )

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

यूरोप- अमेरिका दलदल में

जितेंद्र

भारत के पुराणों में एक कहानी है। एक था राजा ययाति। जीवन में भरपूर सुख और ऐश भोगने के बाद जब उसका बुढ़ापा आया तो उसने वृद्ध होना नहीं चाहा। उसे लगातार सुख भोगते जाने की लालसा थी। लेकिन बुढ़ापा उसकी लालसा में बाधक बन रहा था। उसने अपनी तीनों लड़कों को बुलाया और पूछा कि कौन अपने यौवन के बदले उसका बुढ़ापा ले सकता है। दो लड़कों ने तो इंकार कर दिया लेकिन तीसरा लड़का जो संवेदनशील था, अपना यौवन ययाति को देकर खुद बूढ़ा होकर जंगल चला गया। ययाति एक बार फिर युवा बनकर हजारों साल तक जीवन का सुख लेता रहा। धन की ऐसी महिमा है कि उसकी हवस कभी खत्‍म नहीं होती है। आज की विश्‍व पूंजीवादी व्‍यवस्‍था धनी व्‍यक्तियों का ही तंत्र है जिसका यौवन खत्‍म हुए सौ साल से ज्‍़यादा का समय बीत चुका है। अब तक तो उसे इस धरती से विदा हो जाना चाहिए था। लेकिन वो दुनिया के मेहनतकश वर्ग के यौवन की कीमत पर न सिर्फ अभी तक कायम है बल्कि बहुत मजबूती के साथ कायम है। युद्ध, आतंकवाद और भुखमरी जैसी समस्‍याएं आज अगर पूरी मानवता को अभी भी रौंद रही है तो सिर्फ इसलिए कि यह धरती एक अस्‍वस्‍थ और अप्राकृतिक व्‍यवस्‍था की गिरफ्त में है। यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्‍य देशों का ताजातरीन आर्थिक संकट इसी का एक लक्षण है।
यूरोप:- यूरोप की अर्थव्‍यवस्‍थाएं पिछले छह-सात साल से लगातार आर्थिक संकट को झेल रही है। ग्रीस, पुर्तगाल, स्‍पेन, इटली और फ्रांस की जनता ने भारी तादाद में सड़कों पर उतरकर आर्थिक नीतियों का विरोध किया। यूरोप के ये देश 2008-09 की आर्थिक मंदी से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि वे एक बार फिर मंदी के दलदल में फंस गए। मौजूदा संकट भी इतना व्‍यापक और गहरा कि यूरो मुद्रा के अस्तित्‍व पर ही सवाल खड़ा हो गया और यूरोपीय संघ की सारी चमक फीकी पड़ गई। ग्रीस लगभग दिवालिया हो चुका था, स्‍पेन और इटली भी दिवालिया होने की कगार पर है हालांकि यूरोप के केंद्रीय बैंक ने धन उपलब्‍ध कराकर समस्‍या को फिलहाल टाल तो दिया लेकिन इसके एवज में इन देशों की जनता से इसकी भारी कीमत वसूली गई थी। अब इन देशों की सरकारों को खर्च में कटौती के नाम पर उन नीतियों को लागू करना पड़ेगा जो आम जनता के जीवन को और ज्‍यादा दूभर बनाती हैं। इन नीतियों के विरोध में स्‍पेन और ग्रीस में लाखों की तादाद में जनता सड़कों पर उतर आई। ग्रीस की जनता ने अपनी संसद के सामने हजारों की संख्‍या में इकट्ठा होकर चोर-चोर के नारे भी लगाए। जनता की राय बहुत स्‍पष्‍ट है कि जिस संकट के लिए पूंजीपति और राजनेता जिम्‍मेदार हैं उसकी कीमत आम जनता से क्‍यों वसूली जाए। इस बीच ग्रीस को दिवालिया होने से बचाने के लिए कर्ज दिया जाए या नहीं यह तय करने के लिए जर्मन अधिकारी ग्रीस आए और जांच-पड़ताल की। उन्‍होंने वहां के कर्मचारियों से भी सवालात किए। ग्रीस की जनता को यह बेहद अपमानजनक और नागवार गुजरा। अतीत में ग्रीस सभ्‍यता और संस्‍कृति का केंद्र रहा है। उसने साम्राज्‍य के उत्‍थान और पतन को भी देखा है। उन्‍हें ये बर्दाश्‍त करना कठिन होता है कि यूरोप के बड़े देश और थैलीशाह पहले तो उन्‍हें भिखमंगा साबित करें, फिर उन पर कर्ज और शर्तें थोपें।
बहरहाल, इस संकट ने एकबार फिर यह साबित कर दिया कि यूरोपीय संघ का बनना और यूरो मुद्रा की जरूरत यूरोप के पूंजीपति वर्ग और खासतौर जर्मनी और फ्रांस जैसे धनी देशों की आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए थी। जबकि यूरोप की आम जनता खासतौर छोटे और कम धनी देशों को इसकी कीमत चुकानी थी।
अमेरिका:- अमेरिका भी ऐतिहासिक आर्थिक संकट के दलदल में फंस चुका है। दरअसल वह 2008-09 की भीषण आर्थिक मंदी के दौर से कभी उबर नहीं पाया। मंदी से उबरने की झूठी घोषणाएं होती रहीं जबकि उसकी आर्थिक विकास दर एक से डेढ़ प्रतिशत से अधिक कभी नहीं हो पाया। लेकिन कर्ज के संकट को हल करने के लिए 1 अगस्‍त के दिन सरकार और विपक्ष ने मिलकर जो समझौता किया उससे अमेरिकी समाज का संकट अधिक तीखा हो जाएगा इसमें और कोई संदेह नहीं रह गया है। इस समझौते की वजह से अमेरिकी सरकार को अगले दस साल के दौरान अपने खर्चों में 2.4 खरब डॉलर की कटौती करनी पड़ेगी। जाहिरा तौर पर ये कटौतियां आम जनता के लिए होने वाले सामाजिक सुरक्षा और मेडिकल खर्चों में ही की जाएगी। हालांकि कर्ज के संकट का समाधान अमीरों पर टैक्‍स लगाकर भी किया जा सकता था क्‍योंकि अमेरिका की कुल आमदनी का 83 प्रतिशत हिस्‍सा मात्र 20 प्रतिशत लोगों की जेब में जाता है। लेकिन सरकार और विपक्ष ने उस विकल्‍प को नहीं चुना। ऐसी आर्थिक नीतियों का मतलब बहुत साफ है कि मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को 1) टैक्‍स छूट के रास्‍ते अमीरजादों तक पहुंचाना तथा 2) तीसरी दुनिया के देशों पर कब्‍जा जमाने और दुनिया में चौधराहट कायम रखने के लिए सैन्‍य खर्च की भरपाई करना। पिछले तीस सालों के दौरान अमेरिका में इस नीति को बार-बार अपनाया गया है लेकिन वर्ष 2000 से तो लगातार यही नीति लागू हो रही है। अभी चार साल पहले अमेरिकी जनता ने देखा कि किस तरह वहां की सरकार ने उन्‍हीं वित्तीय संस्‍थानों और बैंकों को सैकड़ों-अरबों डॉलर की मदद की जिनकी बेइंतहा मुनाफाखोरी ने आर्थिक मंदी को जन्‍म दिया था। जबकि पूरी दुनिया में उन पर नकेल कसने की आवाज उठी थी। जनता ने यह भी देखा बल्कि आज भी देख रही है कि किस तरह अमेरिका पूरी दुनिया पर अपना सैन्‍य प्रभुत्‍व कायम रखने के लिए इराक, अफगानिस्‍तान, पाकिस्‍तान, मिस्र और लीबिया में खरबों डॉलर लुटा रहा है। यह सारा का सारा धन अमेरिका के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मेहनतकशों के श्रम और उनकी प्राकृतिक संपदाओं की लूट से हासिल किया गया है। इन नीतियों ने अमेरिकी समाज में अमीर-गरीब की खाई को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। अमेरिका में आज काम करने वाली कुल आबादी का 42 प्रतिशत हिस्‍सा बेरोजगार हो चुका है। ये आंकड़ा और भी बढ़ने वाला है। स्थितियां इतनी निराशाजनक हैं कि अमेरिका के भविष्‍य को लेकर कोई भी अच्‍छी उम्‍मीद नहीं बांध पा रहा है। वैश्‍वीकरण के झंडाबरदारों के मुंह से आज सिर्फ विलाप के शब्‍द ही फूट रहे हैं। न्‍यूयार्क टाइम्‍स का थॉमस फ्रीडमैन विलाप करते हुए कहता है ''हमने शीतयुद्ध की समाप्ति को एक ऐसी विजय मान लिया था जो हमारे लिए नई समृद्धि का रास्‍ता खोल देगी। लेकिन हम गलत थे। उसने वास्‍तव में हमारे सामने अब तक की सबसे भीषण चुनौतियां पेश कर दी हैं।'' इसी तरह लंदन का मशहूर अखबार टेलीग्राफ कहता है ''इस बार हम जल्‍दी ही दोबारा मंदी के खतरों से घिर गए हैं। लेकिन इस बार हमारा सहारा बनने वाला कोई नहीं है। चीन अपने सफल घरेलू उत्‍पाद का 200 प्रतिशत कर्ज के रूप में पहले ही झोंक चुका है।''
संकट के कारण:- यूं तो आर्थिक संकट का पूंजीवाद से नाता उसके जन्‍मकाल से ही है। पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था की मूल प्रेरक शक्ति मुनाफा होता है। इसलिए मुनाफे के लिए तीव्र होड़ करना, कुछ लोगों के हाथों पूंजी या संपति का इकट्ठा होते जाना व शेष आबादी का संपतिहीन होते जाना और इस कारण बीच-बीच में आर्थिक मंदी पैदा होते रहना पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था के लिए बड़ी आम सी बात है। लेकिन मौजूदा संकट कोई आम संकट नहीं है। पूंजीवाद का संकट और मुनाफे के लिए होड़ अब एक नई मंजिल तक पहुंच गई है। आज कुछ लोगों के हाथों में पूंजी या संपति इतनी इकट्ठा हो गई है कि उसकी कल्‍पना भी आम आदमी नहीं कर सकता है। इस पूंजी में वित्तीय और सट्टेबाजी की पूंजी की मात्रा सबसे ज्‍यादा है इसलिए मुनाफे के लिए होड़ भी उतनी ही तीखी हो चुकी है। इस होड़ में जो सबसे आगे और सबसे ताकतवर व प्रभावशाली होगा वही सबसे ज्‍यादा मुनाफे का भागीदार होगा। इसी कारण पूंजी को पैदा करने वाले मजदूर और मेहनतकश तबके का शोषण और उसकी तबाही भी उतनी ही तेज हो गई है। इसलिए आज का शासनतंत्र पूरी तरह एक परजीवी तंत्र में तब्‍दील हो चुका है। गरीब देशों की तीव्र लूट के बिना अमेरिकी-यूरोपीय तंत्र आज कायम नहीं रह सकता। ठीक इसी तरह मजदूरों और मेहनतकशों की तीव्र लूट के बिना आज पूंजीपति भी अपनी हैसियत नहीं बनाए रख सकता। भारत में भी इस परिघटना को देखा जा सकता है। उदारीकरण के जिस दौर में यहां पूंजीपतियों की संपतियों में तीन गुना की बढ़ोतरी हुई, उसी दौर में मजदूरों और मेहनतकशों का शोषण भी उसी मात्रा में बढ़ा। यह परजीवी तंत्र ही दुनिया के तमाम संकटों का मूल कारण है और इसका खात्‍मा इसका एकमात्र समाधान है। (मेहनतकश पत्रिका, अंक-५ से साभार. मेहनतकश पढ़ने के लिए के-२१४१, चितरंजन पार्क, नयी दिल्ली, पर संपर्क कर सकते हैं. या ०९३१०८१८७५० पर फोन कर सकते हैं.)

रविवार, 14 अगस्त 2011

गार्मेन्ट उद्योग: सस्ते श्रम पर टिका साम्राज्य

शान्तनु
दुनिया के मशहूर ब्राण्ड या कम्पनियां जैसे वालमार्ट, गैप, हिल फीगर आदि के अरबों-खरबों डालर का साम्राज्य और हमारे देश के पांच सितारा होटलों में अक्सर होने वाले फैशन शो व फैशन की दुनिया के जलवों का भारत, बांग्लादेश, वियतनाम, कम्बोडिया आदि जगहों के गरीबी से जूझते करोड़ों गार्मेन्ट मजदूरों का क्या रिस्ता क्या हो सकता है इसे गार्मेन्ट उद्योग से परिचित हर आदमी जानता है ।
भारत में कुल सिले-सिलाए या बुने हुए कपड़ों का मात्र 25 प्रतिशत हिस्सा ही निर्यात होता है और 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत में इस्तेमाल होता है। लेकिन गार्मेन्ट निर्यात का ग्लैमर कहीं ज्यादा है। क्योंकि निर्यात या एक्सपोर्ट के जरिए थोड़े समय में ही ज्यादा कमाई हो जाती है और यह कमाई भी अमेरिकी डालर में होती है।
इसके अलावा एक्सपोर्ट के धन्धे में काली कमाई की गुंजाइश भी बहुत ज्यादा होती है। आज भारत का कुल गार्मेन्ट निर्यात लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का है। दिल्ली, गुडग़ांव, नोएडा, तिरुपुर, सूरत और मुम्बई इसके प्रमुख केन्द्र हैं। इस क्षेत्र में आज लगभग 15 लाख मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही संगठित क्षेत्र में आता है जबकि बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है। गार्मेन्ट उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की 50 प्रतिशत गार्मेन्ट तैयार करने का मुख्य काम करता है जबकि शेष अप्रत्यक्ष काम करते हैं। अप्रत्यक्ष कामों में-हाथ की सिलाई, एम्ब्रायडरी, बटन, बकल, जिप, स्टीकर आदि लगाना तथा पैकिंग आदि आता है। चूंकि इस क्षेत्र के ज्यादातर कामों के लिए कोई अलग से प्रशिक्षण देने की जरुरत नहीं होती है इसलिए गरीब व पिछड़े इलाकों से भारी आबादी इस ओर आकर्षित होती है। इस कारण गार्मेन्ट उद्योग में प्रवासी मजदूरों की संख्या ज्यादा होती है।
गार्मेन्ट निर्यात क्षेत्र की बनावट और इसका ताना बाना बेहद महत्व का होता है। इस क्षेत्र के सबसे शीर्ष में वे विदेशी ब्राण्ड या कम्पनियां होती हैं जिनके आर्डर पर गार्मेंट तैयार किया जाता है। पहले ये कम्पनियां आमतौर पर अपने-अपने ब्राण्डों का लेबल लगवाकर थोक बिक्री का काम करती थीं। लेकिन पिछले 20-25 साल के दौरान ये अपने ब्राण्डों की खुदरा बिक्री भी करने लगी हैं। आज पूरी दुनियां में इनकी हजारों आलीशान दुकानें मौजूद हैं। ये कम्पनियां गार्मेन्ट बनाने वाले हर देश में या उत्पादन क्षेत्र में अपने एजेन्ट (बायर) नियुक्त करती हैंै। इसके बाद एक्सपोर्टर की बारी आती है। एक्सपोर्टर के पास खुद अपनी फैक्ट्री हो भी सकती है या वह बाहर से माल बनवाकर एक्सपोर्ट कर सकता है।
गार्मेन्ट तैयार करने वाली फैक्ट्रियां सारा काम खुद नहीं करती हैं। वे ढेरों काम फैब्रिकेटर से करवाती हैं। ये फैब्रिकेटर छोटी-छोटी इकाइयों में थोड़े बहुत मजदूरों के बल पर अपना काम करते हैं। सिर्फ हाथ से होने वाले छोटे या बारीक कामों (जैसे- बटन लगाना, मोती सितारा लगाना, हैण्ड एम्ब्रायडरी आदि)को ठेकेदारों के द्वारा करवाया जाता है। ठेकेदार द्वारा करवाये जाने वाले इन कामों को महिलाएं और बच्चे भी करते हैं। इस तरह स्पस्ट है कि गार्मेन्ट उद्योग के इस विशाल ढांचे में मजदूरों का स्थान सबसे नीचे है। पर बैठी विदेशी कम्पनियों और देशी पूंजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो इसके लिए जरुरी है कि माल की ज्यादा से ज्यादा खपत हो, मजदूरी की दर कम हो और मजदूर संगठित भी न होने पाएं। लोग ज्यादा से ज्यादा कपड़ों को खरीदें इसके लिए माहौल बनाना भी जरुरी है। इस काम में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है। फैशन डिजाइनर, फैशन शो और माडलिंग की मायानगरी का निर्माण मीडिया ही करती है। इसके चलते ही मध्यवर्ग के एक तबके में इन कपड़ों को पाने की हवस बढ़ जाती है। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ गार्मेन्ट उद्योग के पूरे तंत्र में भीषण प्रतियोगिता को जन्म देता है जिसकी चपेट में मजदूर भी आ जाता है। देश की सीधी-सादी जनता की मेहनत पर खड़ा गार्मेन्ट निर्यात का पूरा तंत्र इतना स्वच्छन्द तरीके से काम ही नहीं कर पाता अगर उसे सरकारी नीतियों की मदद नहीं मिली होती। 1991 से जारी उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों ने जहां पूंजी और माल के आयात निर्यात पर लगी बंदिशों को ढीला कर दिया वहीं श्रम कानूनों को मानने की बाध्यता को भी व्यवहार में खत्म कर दिया। न्यूनतम मजदूरी कानून और ठेका मजदूरी कानून की धज्जियां उड़ा दी गयी। ईएसआई और पीएफ की बात कौन करे लाखों की संख्या में ऐसे मजदूर हैं जिन्हें कानून की नजर में मजदूर ही नहीं माना जाता। फैक्ट्रियों में मजदूरों के साथ मारपीट व गाली गलौज करना, 12-16 घंटे तक काम करवाना, जब चाहा निकाल देना, मजदूरों के पैसे को मार लेना-यही वे जमीनी हालात हैं जिसके ऊपर गार्मेन्ट और फैशन उद्योग का पूरा महल खड़ा है। दरअसल गार्मेन्ट एक्सपोर्ट उद्योग का पूरा अस्तित्व ही सस्ते श्रम पर टिका हुआ है। गार्मेन्ट उद्योग का मुख्य बाजार और कम्पनियां अमेरिकी और यूरोपीय देश हैं। सस्ते श्रम की खोज में ये कम्पनियां पूरी दुनिया में खाक छानती फिरती हैं। आज अमेरिका में मजदूरी की न्यूनतम दर 14 डालर (644 रुपये) प्रति घंटे की है जबकि चीन में यही दर 1.44 डालर (66.24 रुपये),भारत में 0.51 डालर (23.46 रुपये), इन्डोनेशिया में 0.44 डालर (20.24 रुपये), वियतनाम में 0.38 डालर (17.48 रुपये) और बांग्लादेश में 0.31 डालर (14.26 रुपये) है। आज बांग्लादेश ने इसी सस्ती मजदूरी के कारण दुनिया के 30 प्रतिशत कपड़े के बाजार को दूसरे देशों से छीन लिया है। यहां तक कि भारत की गार्मेन्ट फैक्ट्रियां भी बांग्लादेश में कपड़े तैयार करवाकर निर्यात करने लगी हैं। सस्ते श्रम की यह लूट गरीब देशों में भारी तबाही फैला रही है और सामाजिक ताने बाने को नष्ट कर रही है। यह सब आज इसलिए सम्भव हो पा रहा है क्योंकि गार्मेन्ट मजदूरों की जुबान आज बन्द है तथा वे संगठित नहीं हैं। उसके संगठन बनाने के रास्ते में बाधाएं खड़ी की गयी हैं। लेकिन जिस दिन मजदूर संगठित होकर अपनी मजदूरी का वाजिब दाम मांगेगा, सस्ते श्रम की लूट, फैशन के ग्लैमर की दुनियां और लाखों परोपजीवियों की शानोशौकत का यह सामा्रज्य भहराकर गिर जायेगा।
(शान्तनु एक सामाजिक कार्यकर्त्ता और मेहनतकश पत्रिका के संपादक हैं)