Saturday, August 3, 2019

मजदूर विरोधी वेतन संहिता विधेयक पारित

एक तरफ जहां आज पूरे देश में मजदूर विरोधी वेतन संहिता के विरोध में राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन हो रहा था, वहीं दूसरी ओर व्यापक मजदूरों की भावना को रौंदते हुए मोदी सरकार ने वेतन संहिता विधेयक 2019 को राज्यसभा में भी पारित कर लिया। लोकसभा में 30 जुलाई को ही यह विधेयक पारित हो गई थी। इस प्रकार मजदूर विरोधी इस विधेयक पर संसद की मुहर लग गई।

आज राज्यसभा में इस विधेयक को प्रवर समिति में भेजे जाने की वाम दलों की मांग को भी सरकार ने खारिज कर दिया और विधेयक को स्थाई समिति के पास भेज दिया। अब केवल राष्ट्रपति की मुहर ही लगनी बाकी है।

यह पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मिले प्रचंड बहुमत का ही कमाल है कि मोदी सरकार ने 2 महीने के कार्यकाल के दौरान एक के बाद एक ताबड़तोड़ मजदूरों पर हमले बोल रही है।

दरअसल, देसी विदेशी पूंजीपतियों ने भारी चंदा देकर इसीलिए मोदी की सरकार दोबारा बनवाई है। और अब मोदी सरकार बेखौफ होकर पूँजीपतियों का कर्ज़ उतारने में पूरी ताक़त से जुट गई है।

मोदी सरकार का यह कदम मजदूरों को अधिकार विहीन बंधुआ मजदूर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसकी हर तरह से नींदा किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी सोचने की जरूरत है की प्रचंड बहुमत की इस सरकार के खिलाफ व्यापक जन संघर्ष को कैसे लामबंद किया जाए!

Friday, August 2, 2019

श्रम संहिताएं : मज़दूरों को बनायेंगी बंधुआ

*मज़दूर विरोधी दो बिल पारित -
पहली किस्त*प्रचंड बहुमत - प्रचंड हमला*

मज़दूरों के विरोधों के बीच मोदी-2 सरकार ने वेज कोड बिल और व्यावसायिक सुरक्षा बिल लोक सभा से पारित कर दिया।
यह मेहनतकश आवाम के लिए ख़तरनाक़ क्यों है, इसे हम तीन किस्तों में धारावाहिक दो रहे हैं।


अपने पहले कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी ने ख़ुद को ‘मज़दूर नम्बर वन’ बताया और ‘श्रमेव जयते’ जैसा जुमले की आड़ में मज़दूरों के रहे-सहे अधिकारों पर डाका डालने का काम बदस्तूर जारी रहा। मोदी-1 सरकार ने पूँजीपतियों को किये गये वायदों के अनुसार तमाम मज़दूर विरोधी क़दम उठाए। इनमें सबसे प्रमुख हैं लंबे संघर्षों के दौरान हासिल श्रम कानूनों को मालिकों के हित में बदलना। इसके मूल में है- ‘हायर एण्ड फॉयर’ यानी देशी-विदेशी कंपनियों को रखने-निकालने की खुली छूट के साथ बेहद सस्ते दाम पर मजदूर उपलब्ध कराना। स्थाई प्रकृति के रोजगार को समाप्त करके फिक्स्ड टर्म करना, कौशल विकास के बहाने फोक़ट के मज़दूर नीम ट्रेनी भरती करना, पिछले दरवाजे से मालिकों के लाभ के लिए नये-नये रास्ते बनाना आदि।

इस पूरे उपक्रम का महत्वपूर्ण पहलू है केन्द्र सरकार द्वारा मौजूदा 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को खत्म करके 4 संहिताओं में बदलना। ये संहिताएं हैं- मजदूरी पर श्रम संहिता, औद्योगिक संबंधें पर श्रम संहिता, सामाजिक सुरक्षा व कल्याण श्रम संहिता तथा व्यवसायिक सुरक्षा एवं कार्यदशाओं की श्रम संहिता।

*द्वितीय श्रम आयोग से श्रम संहिता तक*
ये संहिताएं बाजपेयी की भाजपा नीत सरकार के दौरान प्रस्तुत दूसरे राष्ट्रीय श्रम आयोग (2002) की ख़तरनाक़ सिफ़ारिशों पर आधरित हैं। लेकिन उस समय व्यापक विरोध के कारण यह क़ानून का रूप नहीं ले सका, लेकिन धीरे-धीरे उसके आधार पर क़ानून बदलते रहे।

*प्रचंड बहुमत से हौसले बुलन्द*
प्रचंड बहुमत से लौटी मोदी-2 सरकार के हौसले और बुलन्द हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजे आते ही भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने श्रम क़ानूनों में फेरबदल की बात उछाली, तो नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने शपथ ग्रहण से पहले ही देशी-विदेशी पूँजीपतियों को श्रम सुधारों सहित तमाम आर्थिक सुधारों की गति तेज़ करने का भरोसा दिया। राजसिंहासन संभालते ही एनडीए सरकार ने मेहनतकश वर्ग पर आक्रामक हमले के साथ मालिकों के हित में विकास के घोडे़ को सरपट दौड़ा दिया है। सरकार ने 4 श्रम संहिताओं को वर्तमान बजट का हिस्सा बनाया। पिछले 23 व 30 जुलाई को 2 संहिताओं - मज़दूरी पर श्रम संहिता-2019 तथा व्यवसायिक सुरक्षा एवं कार्यदशाओं की श्रम संहिता-2019 लोक सभा में परित करके अपने प्रचंड बहुमत का करिश्मा भी दिखा दिया।

*ये क्षेत्र होंगे प्रभावित*
इन संहिताओं से निजी कंपनियों के साथ रेलवे, खानों, तेल क्षेत्र, प्रमुख बंदरगाहों, हवाई परिवहन सेवा, दूरसंचार, बैंकिंग और बीमा कंपनी, निगम व प्राधिकरण, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या सहायक कंपनियां, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों सहित सभी प्रकार के नौकरी पेशा व श्रमजीवी पत्रकार प्रभावित होंगे।

उल्लेखनीय है कि गए 5 सालों में जैसे-जैसे देश व्यापार करने की सुगमता सूचकांक (इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स) में बढ़ा है वैसे ही बेरोज़गारी भी पिछले 45 सालों के अपने चरम पर पहुँची है।

*विधेयकों की मूल बातें :*
विधेयक के अनुसार ‘प्रवर्तन में प्रौद्योगिकी का उपयोग’ क़ानूनों के उलझाव में घटोत्तरी करेगा। असल में प्रौद्योगिकी का यह इस्तेमाल निरीक्षण प्रणाली को पूरी तरह से नष्ट करने पर केन्द्रित है। निरीक्षण किसी की सूचना या शिकायत दर्ज कराने पर नहीं वरन कंप्यूटर द्वारा चयनित कार्यस्थलों पर करके औपचारिकता पूरी होगी।

*वही मुल्ज़िम वही मुख़्तार*
मालिकों को निरीक्षण होने की सूचना भी पहले से मिल जाएगी। साथ ही मालिकों पर निरीक्षण में मदद करने या साथ देने की भी बाध्यता ख़त्म कर दी गयी है। विधेयक के अंतर्गत नव-नियुक्त ‘निरीक्षक/फैसीलेटर’ का काम है मालिकों को श्रम कानूनों का अनुपालन करने में सहायता प्रदान करना, इनके पास मालिकों द्वारा श्रम कानूनों की अवमानना को माफ़ करने के भी अधिकार होंगे। मौजूदा विधेयक में मालिकों को आपराधिक मामलों तक में जेल जाने के सारे प्रावधान ख़त्म हो गये। साथ ही वे सारे प्रावधान भी ख़त्म कर दिए हैं जिन से मालिकों पर अंकुश लगता था।

सरलता के नाम पर जटिलता यह कि संहिताओं के तहत एक नया प्राधिकरण गठित होगा, जो समझौते की प्रक्रिया और न्यायालय के बीच खड़ी की जाएगी। इस नए प्राधिकरण के परिणामस्वरूप मज़दूरों को न्याय मिलना लगभग असंभव होगा।

*ठेकेदारी को मान्यता*
लोक सभा से पारित दोनों ही विधेयकों में साफ़ तौर पर ठेकेदारों की जिम्मेदारी को अंतिम बताया गया है। यह एक बड़ा बदलाव है। इससे मूल नियोक्ता को मज़दूरी या बोनस के संदान की अपनी जिम्मेदारी से बच निकलने का मौका मिल जायेगा, यहाँ तक कि कार्यस्थल पर दुर्घटना या मृत्यु होने पर भी ठेका मज़दूरों के प्रति उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनेगी, न ही कोई अपराधिक मामला चलाया जा सकेगा।

ठेके पर दिए जाने वाले काम के लिए एक समान संयुक्त लाइसेंस लाने की भी बात है, जिससे स्थई व अस्थाई (पेरेनिअल व नॉन-पेरेनिअल) काम का अंतर गड्ड-मड्ड हो जायेगा। यह ठेका मज़दूरी अधिनियम पर सीधा वार है। मालिक मनमाने तरीके से कोई भी काम अस्थायी व ठेका श्रमिक से करवा सकेगा।

*वेतन व बोनस में कटौती का अधिकार*
इसका असर देश के हर मज़दूर पर पड़ेगा, मुनाफा न होने के कथित कारणों से घाटे के नाम पर कंपनियां न सिर्फ मज़दूरों के बोनस की चोरी करेंगी, वरन उन्हें न्यूनतम मज़दूरी की दर भी कमतर रखने का रास्ता मिल जायेगा।

उदाहरण सामने है- मोदी सरकार ने राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन दर 178 प्रतिदिन किया।

मोदी-1 के 5 सालों में सरकार ने त्रिपक्षीय प्रणाली को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है और भारतीय श्रम सम्मेलन को नेस्तोनाबूद। आम चुनावों के बाद भाजपा सांसदों का संबोधन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि सरकार का ध्येय अब ‘जीवन को आसान बनाना’ (इज़ ऑफ़ लिविंग) होना चाहिए। न्यूनतम वेतन की बढ़ोत्तरी मजदूरों का पेट काट कर मुट्ठीभर अमीरजादों के जीवन को आसान बनाएगा।

क्रमशः जारी...

प्रचंड बहुमत - प्रचंड हमला: मज़दूर विरोधी दो बिल पारित - 3

तीसरी किस्त : व्यावसायिक सुरक्षा पर श्रम संहिता

मोदी सरकार ने व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशाओं की श्रम संहिता-2019 द्वारा देश के सभी कार्यबल के लिए सुरक्षा और स्वस्थ कार्य स्थितियों का विस्तार करने के बहाने एक और बड़ा हमला बोला है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह संहिता व्यावसायिक सुरक्षा के लिए ही है। 44 मौजूदा श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके चार संहिताओं की कड़ी में यह बिल 10 जुलाई को केन्द्रीय मंत्रीमण्डल द्वारा पारित होकर 23 जुलाई को लोक सभा में प्रस्तुत हुआ।

संहिता में कार्यबल के स्वास्थ्य, सुरक्षा कल्याण के दावों के साथ बेहतर कार्य स्थितियों, व्यवसाय की सुगमता, संहिता परिपालन व्यवस्था को एक लाइसेंस, एक पंजीकरण तथा एक रिटर्न के साथ विवेक संगत बनाने, नियोक्ता के संसाधनों और प्रयासों की बचत, श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच संतुलन बनाने आदि द्वारा कुल मिलाकर मालिकों के लाभ और मुनाफे को बढ़ाने की बात लिखी है। इससे स्पष्ट है कि संहिता मज़दूरों को कुचलकर मालिकों को हर तरीके से लाभ पहुँचाने के लिए बनी है।

*इससे प्रभावित होंगे-*

जहाँ मालिकों को देने की बारी है, उन क्षेत्रों में 10/20 के दायरे से बढ़ाकर 50 से अधिक श्रम बल पर लागू करने की बात की है (औद्योगिक संबंध संहिता)। लेकिन इस संहिता में 10 या अधिक कर्मचारियों वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू किया गया है। इसमें आईटी व सेवा क्षेत्र सहित सभी उद्योग, व्यापार, व्यवसाय और विनिर्माण प्रतिष्ठानों, एक मात्र कर्मी वाले खदानों और गोदी में लागू होगा।

यही नहीं, श्रमजीवी पत्रकारों और सिनेमा कर्मियों की परिभाषाओं के अंदर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्यरत श्रमिकों और ऑडियो विजुअल उत्पादन के सभी रूपों को शामिल किया गया है और अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक की परिभाषा को बदल दिया गया है।

*मौजूदा 13 क़ानून ख़त्म होंगे*

इस संहिता से 13 केंद्रीय श्रम अधिनियम- फैक्ट्री अधिनियम, 1948; खदान अधिनियम, 1952; डॉक वर्कर्स अधिनियम, 1986; भवन और अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम, 1996; प्लांट श्रमिक अधिनियम, 1951; अनुबंध श्रम अधिनियम, 1970; अंतर-राज्य प्रवासी कामगार अधिनियम, 1979; श्रमजीवी पत्रकार और अन्य न्यूज़ पेपर एम्प्लाइज अधिनियम, 1955; श्रमजीवी पत्राकार अधिनियम, 1958; मोटर ट्रांसपोर्ट श्रमिक अधिनियम, 1961; बिक्री संवर्धन कर्मचारी अधिनियम, 1976; बीड़ी और सिगार श्रमिक अधिनियम, 1966 और द सिने वर्कर्स और सिनेमा थियेटर वर्कर्स अधिनियम, 1981 - निरस्त हो जायेंगे।
संहिता में अनुच्छेद की संख्या 622 से घटकर 134 हो गई है।

*यह संहिता भी घातक है क्योंकि-*
> विधेयक में कर्मचारी एवं मज़दूर की परिभाषा स्पष्ट नहीं किया गया है। इससे कंपनियों को सीधा लाभ होगा जबकि वेतनभोगी श्रमिकों के अधिकारों का हनन होगा।
> एक बड़ा हमला काम के मनमाने घण्टों की छूट का है। ‘सरकारी इजाजत’ से मनमाने शिफ्ट ड्यिटी कराने की छूट होगी।
> सप्ताह में 6 दिन काम की सीमा के साथ यह जोड़ा गया है कि ‘विशेष स्थिति में’ अनुमति लेकर लगातार दिवसों में काम कराया जा सकता है। इस दौरान के साप्ताहिक अवकाश दो माह में कभी देने की छूट होगी। 10 दिन लगातार काम के बाद अवकाश देने की बाध्यता भी खत्म होगी।
> व्यावसायिक सुगमता के प्रोत्साहन के बहाने विधेयक में अनेक पंजीकरणों के बदले एक प्रतिष्ठान के लिए एक पंजीकरण का प्रस्ताव है। अभी श्रमिक हित के लिए 6 कानूनों के अंतर्गत अलग पंजीकरण की व्यवस्था है।
> मालिकों की सरलता के लिए पाँच श्रम कानूनों के अंतर्गत अनेक समितियों का स्थान एक राष्ट्रीय व्यावसायिक सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सलाहकार बोर्ड लेगा।
> प्रतिष्ठानों के लाभ के लिए 13 श्रम कानूनों में अनेक लाइसेंसों और रिटर्न के स्थान पर एक लाइसेंस तथा एक रिटर्न के प्रावधान।
वर्तमान में विभिन्न कानूनों में क्रेच, कैंटीन, प्रथम चिकित्सा सहायता, कल्याण अधिकारी जैसे विभिन्न प्रावधानों को खत्म करके कर्मचारियों के ‘कल्याण’ के लिए एक प्रावधान होंगे।
> नियोक्ता उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रतिष्ठान के निर्धारित आयु के ऊपर के कर्मियों के लिए वार्षिक स्वास्थ्य जांच की सुविधा होगी।
> प्रबन्धन कम्पनी हित में स्वयं नियम बनाएगा, निर्धरित मानकों का पालन करेगा, स्वयं प्रमाणित करके फैसिलिटेटर को देगा। मज़दूर उन्हीं नियमों को मानने के लिए बाध्य होगा।
< निरीक्षण व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किए गए हैं। इनमें वेब आधारित रेंडम कम्प्यूटरीकृत निरीक्षण योजना, अधिकार क्षेत्र मुक्त निरीक्षण, निरीक्षण के लिए इलेक्ट्रॉनिक रूप से जानकारी माँगना और जुर्मानों का संयोजन आदि शामिल हैं। यानी नियोक्ता को बताकर निरीक्षण होगा।
> इस संहिता में स्वास्थ्य व सुरक्षा मानकों पर काफी लम्बे-चौड़े प्रावधान किये गये हैं। लेकिन अनुपालन की गारण्टी में काफी झोल है।
> संहिता में महिलाओं की सुरक्षा के कई दावों के बीच असल में सस्ते श्रम के श्रोत के रूप में उनसे मनमाने काम व शिफ्ट ड्यिटी के रास्ते खुल गये हैं।
> इसमें सस्ते श्रम के लिए बाल श्रम के लिए भी रास्ता सुगम बनाया गया है।
> कारखानों में आये दिन दुर्घटनाएं आम बात हैं, जहाँ अंगभंग से लेकर मौत की घटनाएं लगातार घटित होती रहती हैं। लेकिन दुर्घटना मुआवजे से संहिता में मालिकों को भारी राहत दी गयी है। यहाँ तक कि संसद की प्रवर समिति ने भी दुर्घटना से पीड़ित श्रमिकों के लिये 10 लाख रुपए तक के मुआवज़े की सिफारिश की थी, फिर भी इस विधेयक में महज पचास हज़ार रुपए का प्रावधान किया गया है।
> स्वास्थ्य व सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर विषेष स्थिति में चीफ फैसिलिटेटर जाँच कमेटी बनायेगा, जिसकी स्थिति सलाहकार बोर्ड प्रकृति की होगी। रिपोर्ट के आधार पर वह सलाह देगा।
> फ़ैक्टरी मालिकों पर मज़दूरों की जान से खेलने के लिए दण्ड प्रावधान कमजोर हो जायेगा, जबकि फ़ैक्टरी दुर्घटनाओं और उसमें अपाहिज होने और जान गँवाने वाले मज़दूरों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी हुई है।
> इंस्पेक्टर के स्थान पर फैसिलिटेटर की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। लेबर इंस्पेक्टर की भूमिका मुख्यतः कंपनियों द्वारा कानून का पालन कराने तथा नियोक्ताओं से कर्मचारियों एवं श्रमिकों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने में निहित होती थी। जबकि अधिकार विहीन फैसिलिटेटर के पद का सृजन वस्तुतः कंपनियों के हितों की सेवा के लिए है।
> निरीक्षक/फैसिलिटेटर उद्योग की ‘गोपनियता’ को बनाए रखेगा और कोई सूचना बाहर नहीं करेगा। यानी मालिकों की मनमानी पर पर्दा डालेगा।

तो मज़दूरों की गर्दन को काट, मालिकों की सेवा में होगा काम, जय श्री राम!

Thursday, August 1, 2019

मज़दूर विरोधी दो बिल पारित

मज़दूर विरोधी दो बिल पारित - 2
दूसरी किस्त :  1- मज़दूरी_पर_श्रम_संहिता*

वेतन संहिता विधेयक पहले 10 अगस्त, 2017 को लोकसभा में पेश किया गया था, जिसे संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था। समिति की रिपोर्ट 18 दिसंबर, 2018 को प्रस्तुत हुई थी। लेकिन लोकसभा चुनाव के कारण यह स्थगित रहा। अब प्रचंड बहुमत के बाद वेतन विधेयक, 2019 संहिता नाम से विधेयक आया।

>इससे मौजूदा 4 श्रम क़ानून - न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, मजदूरी संदाय अधिनियम, बोनस संदाय अधिनियम और समान पारिश्रमिक अधिनियम समाप्त हो जायेंगे।

> वेतन संहिता विधेयक मे मज़दूरी तय करने के उस फार्मूले को पूरी तरह से बदल दिया है, जिसे 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन में तय किया गया था। केन्द्रीय श्रम राज्य मंत्री ने 10 जुलाई को 4,628 रुपए प्रति माह (178 रुपये दैनिक) राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की घोषणा की है। जबकि सातवें वेतन आयोग ने 1 जनवरी, 2016 सें 18000 रुपए प्रतिमाह की अनुशंसा की थी, जो वर्तमान में 22000 रुपये मासिक हो चुकी है। यह भी ध्यानतलब है कि जुलाई, 2018 में सरकारी पैनल की एक्सपर्ट कमेटी ने प्राइस इंडेक्स के आधार पर देश में न्यूनतम दैनिक मज़दूरी 375 रुपये करने का सुझाव दिया था। इससे वेतन नीति की धोखाधड़ी साफ है।
> विधेयक में लिखा है- इससे कामगार की क्रय शक्ति बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था में प्रगति को बढ़ावा मिलेगा। यानी मालिकों को सीधे लाभ।
> तर्क दिया गया है कि विभिन्न श्रम कानूनों में वेतन की 12 परिभाषाएं हैं, जिन्हें लागू करने में कठिनाइयों व मुकदमेबाजी को बढ़ावा मिलता है। इसको सरल बनाया गया है, जिससे मुकदमेबाजी कम हो और एक नियोक्ता के लिए इसके अनुपालन में सरलता हो। यानी न्यूनतम वेतन के लिए क़ानूनी संघर्ष का रास्ता भी बन्द होगा।
> विधेयक में स्पष्ट लिखा है कि इससे प्रतिष्ठान लाभान्वित होंगे, क्योंकि रजिस्टरों की संख्या, रिटर्न और फॉर्म आदि केवल इलेक्ट्रॉनिक रूप से भरे जा सकेंगे। यानी यह झंझट भी ख़त्म!
> पहले न्यूनतम वेतन निर्धारित करने के लिए त्रिपक्षीय प्रणाली थी जिसमें विभिन्न क्षेत्र के मज़दूर प्रतिनिधि, नियोक्ता और सरकार के प्रतिनिधि मिलकर सेण्ट्रल/स्टेट एडवाइज़री बोर्ड में न्यूनतम वेतन निर्धारित करते थे। पर अब मज़दूरों का प्रतिनिधित्व कमज़ोर कर दिया गया है जिससे मज़दूरों की भागीदारी लगभग ख़त्म हो जायेगी।
> रोजगार के विभिन्न प्रकारों को अलग करके न्यूनतम वेतन के निर्धारण के लिए एक ही मानदंड बनाया गया है। जो मुख्य रूप से स्थान और कौशल पर आधारित होगा। यानी अलग-अलग प्रकृति और श्रेणियों जैसे अकुशल, अर्धकुशल, कुशल, अतिकुशल खत्म!
> जीवन सरल बनाने की लफ़्फ़ाजी के साथ कोड में साफ लिखा है कि आराम से व्यापार करने को बढ़ावा देने के लिए वेतन पर कोड है।

*वेतन संहिता खतरनाक है, क्योंकि-*

> वेतन-आयोग या वेतन-पुनरीक्षण आदि खत्म होंगे। एक ‘सलाहकार बोर्ड’ बनेगा जो वेतन तय करेगा।
> पारिश्रमिक घंटे, दिन या महीने के हिसाब से तय होगा जो, पूरे समय काम के लिए या टुकड़े के काम के लिए मज़दूरी की एक न्यूनतम दर के हिसाब से मिलेगा।
> टाइम वर्क व पीस रेट पर न्यूनतम मजदूरी तय करने की भी होगी व्यवस्था। मनमाने काम के घंटे तय करने की खुली छूट।
> एक आम दिन में कुल काम के निर्धारित घण्टे के अतिरिक्त किसी आपातकालीन या पूरक काम, अनिरन्तर रोजगार, तकनीकी कारणों से ड्यूटी खत्म होने से पहले करने वाले काम, प्रकृति की अनियमितता पर निर्भर काम आदि के बहाने ओवर टाइम भुगतान की बाध्यता नहीं होगी।
> महिलाओं के लिए न्यूनतम वेतन निर्धारण की प्रक्रिया में पुरुषों के बराबर वेतन मिलने के लिए कोई तय नियम नहीं है।
> न्यूनतम वेतन, बोनस, समान वेतन आदि के दावे दाखिल करने को एक समान बनाया गया है। यानी सब धान एक पसेरी!
> नई कंपनियो के लिए बोनस न देने की 5 साल की सीमा भी खत्म होगी।
> बोनस या वेतन में धोखाधड़ी पर भी मालिक की गिरफ्तारी का प्रावधन खत्म, क्रिमिनल की जगह सिविल वाद बनेगा।
> असंतोषजनक काम के बहाने मालिक को वेतन काटने की छूट रहेगी।
> किसी को भी केवल 2 दिन के नोटिस पर काम से निकाला जा सकेगा।
> 15 साल से कम उम्र के बालश्रमिकों को काम पर रखने की छूट होगी।

क्रमशः जारी...

Monday, July 29, 2019

उत्तराखंड में एमकोर एलेक्सीबल्स इंडिया में गैरकानूनी तालाबंदी

सितारगंज (उत्तराखंड)। सितारगंज औद्योगिक पार्क, सिडकुल स्थित एमकोर एलेक्सीबल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बगैर पूर्व सूचना के गैरकानूनी रूप से बंद हो गई। इससे डेढ़ सौ से ज्यादा मज़दूर बेरोजगार हो गए।

आज 29 जुलाई को फैक्ट्री के मजदूर जब कंपनी पहुंचे थे 26 जुलाई का नोटिस मिला, जिसमें कथित रूप से घाटे का रोना रोते हुए कंपनी बंद होने की सूचना थी। मालिकों की धोखाधड़ी की मिसाल यह कि शनिवार 27 जुलाई को प्रबंधन ने मजदूरों के साथ सुरक्षा आदि बिंदुओं पर चर्चा की। मज़दूरों को इसकी भनक भी नहीं थी कि अगले दिन से फैक्ट्री बंद हो रही है।

मज़दूरों के अनुसार लेमिनेशन व पैकेजिंग मैटेरियल बनाने वाली इस कंपनी में गैरकानूनी बंदी के बाद अधिकारियों ने अपने फोन की बंद कर लिए हैं।

ज्ञात हो कि उत्तराखंड की तमाम कंपनियां सरकारी सब्सिडी व टैक्स आदि की छूटों का लाभ उठाकर दूसरे राज्यों में नई सब्सिडी और रियायतों के साथ मज़दूरों के पेट पर लात मारकर पलायन कर रही हैं।

गौरतलब है कि राज्य में सिडकुल की स्थापना के साथ कंपनियों को भारी सब्सिडी के साथ राज्य व केंद्र सरकारों से तमाम रियायतें मिली थीं। छूटों की अवधि समाप्त होने के बाद संसाधनों व मजदूरों को निचोड़कर व भारी मुनाफा पीटकर कंपनियों की बंदी, छँटनी और राज्य से पलायन तेज हो गयी है।

भगवती प्रोडक्ट्स (माइक्रोमैक्स) में 303 मज़दूरों की ग़ैरकानूनी छँटनी और बचे मज़दूरों की अवैध ले-ऑफ के बाद से मज़दूर पिछले 7 महीने से लगातार संघर्ष कर रहे हैं, जबकि शासन-प्रशासन, श्रम विभाग, राज्य सरकार सभी मालिकों के हित में खड़े हैं।

ऐसे में अलग-अलग फैक्ट्रियों में संघर्ष की जगह पूरे इलाके के मजदूरों को एक साथ संघर्ष के लिए आगे बढ़कर एकजुट संघर्ष से शासन प्रशासन के बहरे कानों तक आवाज पहुँचाया जा सकता है।

कार्यबहाली की माँग को लेकर 22 दिनों से एडविक श्रमिकों का गेट पर धरना जारी

पंतनगर (उत्तराखंड)। एडविक हाईटेक प्राइवेट लिमिटेड में मजदूरों का सवा साल से जारी संघर्ष के तहत गेट पर विगत 22 दिनों से लगातार धरना जारी है।

दरअसल सवा साल पहले एडविक कर्मचारी संगठन के नाम से यूनियन पंजीकृत होने के बाद कंपनी प्रबंधन ने मज़दूरों पर दमन बढ़ा दिया था। उसने विगत 2018 से ही श्रमिकों के वार्षिक वेतन वृद्धि को रोक दिया था और यूनियन कार्यकारिणी सदस्य राजू विश्वास की गैरकानूनी गेटबंदी करने के बाद निलंबित कर दिया था।

यूनियन महामंत्री निरजेश यादव के अनुसार पिछले 1 साल से कथित जांच के बहाने राजू का उत्पीड़न जारी है। दूसरी ओर प्रबंधन दो-दो बार सहायक श्रम आयुक्त के समक्ष हुए समझौतों का भी पालन नहीं किया। इसी के विरोध में कंपनी गेट पर मजदूरों का धरना लगातार जारी है।

इस बीच सहायक श्रम आयुक्त की मध्यक्षता में वार्ता शुरू हुई लेकिन प्रबंधन की हठधर्मिता बनी हुई है। वह 2019 से 5 साल के लिए सीटीसी पर समझौता करने का दबाव बना रहा है। यूनियन ने इसको नकार दिया है। मजदूर 2018 से वेतन वृद्धि और राजू विश्वास की कार्यबहाली की मांग पर अडिग है और संघर्ष जारी है।

Sunday, July 28, 2019

जलते मजदूर, सोती सरकार

शनिवार को सुबह रोज की तरह फ्रेंडस कॉलोनी गली नं. 4 में चहल-पहल थी। इसी गली में कॉरस बाथ नामक फैक्ट्री है, जो कि पीतल और प्लास्टिक की टूटी बनाने का काम करती है। फैक्ट्री के गेट पर न तो नम्बर लिखा है और ना ही कोई नाम, यानी कोई अनजान व्यक्ति वहां नहीं पहुंच सकता। यही हाल उसी गली के सभी फैक्ट्रियों का है, या यों कहा जाये कि यह सुरते हाल पूरी दिल्ली का है-जहां पर मजदूर को पता नहीं होता कि वह किस कम्पनी में काम करता है और कम्पनी का नम्बर क्या है। वह पहचान के लिए लाल, काला या पीला गेट बताता है। मजदूरों को यह भी जानने का हक नहीं होता है कि वे किस कम्पनी के लिए मॉल तैयार करते हैं। इसकी चिंता न तो श्रम मंत्री को है और न ही श्रम अधिकारियों को, जिसके लिए उन्हें हर महीने मोटी रकम मिलती है।
कॉरस फैक्ट्री में रोजना की तरह 13 जुलाई, 2019 (शनिवार) को भी मजदूर भागते हुए फैक्ट्री पहुंच रहे थे। कुछ मजदूर पहुंच चुके थे और अपनी काम करने की तैयारी में थे। इन्हीं मजदूरों में संगीता, मंजू और सुहेल भी थे, जो रोज की तरह अपने घरों से निकले थे कि शाम को वे फिर वापस घर आ जाएंगे। मंजू, लोनी (एकता बिहार) में रहती है और ट्रेन से ड्युटी पर आती थी। लेकिन उस दिन ट्रेन देर होने के कारण वह बेटे के साथ बाईक से आ गई। उनको मालूम था कि आधे घंटे की देर भी महीने में मिलने वाली पगार में कमी ला सकता है, जिससे परिवार चलाने में मुश्किल हो सकती है। संगीता बिहार के नालन्दा जिले से है और अपने पति के साथ वह कृष्णा बिहार (जिला गाजियाबाद) में किराये के मकान में रहती थी। संगीता के तीन बच्चे हैं, जिनको वह गांव पर ही रख कर पढ़ाती थी। वह 9-10 साल से कॉरस फैक्ट्री में काम करती थी। संगीता रोजाना दो टैम्पू बदल कर फैक्ट्री पहुंचती थी, जिसके बदले उसे 8,500 रू. महीने की पगार मिलती थी। संगीता टाइफाइड बुखार से पीड़ित थी तो कुछ दिन तक वह 1 घंटा देर से फैक्ट्री पहुंच रही थी, लेकिन उस दिन बच्चों को पैसा भेजने के लिए जल्दी ही फैक्ट्री पहुंच गई थी।
संगीता के साथ 10 साल से काम करने वाली कुसुम पटना जिले से हैं और कृष्णा बिहार में ही रहती हैं। वह बताती है कि सन् 2010 से वह इस कम्पनी में 2,400 रू. पर काम पर लगी थी जो अभी जून 2019 में 6,100 रू. बढ़कर 8500 रू. हो गई थी। इसी फैक्ट्री में संगीता, कुसुम से एक माह पहले से इस फैक्ट्री में काम करती थी। ये लोग पहले कृष्णा बिहार के गली नं. 12 में ही काम करते थे जहां पर कॉरस फैक्ट्री की एक और यूनिट चलती है। 2015 से यहां से कुछ लोगों को झिलमिल की फ्रेंडस कॉलोनी गली नं. 4 की दूसरी यूनिट में शिफ्ट कर दिया गया, जहां पर भट्ठी से लेकर मॉल तैयार करने और पैकिंग तक काम होता है। कृष्णा बिहार से झिलमिल पहुंचने में करीब इनको एक घंटा लग जाता था और 40 रू. रोज का खर्च होता था। कुसुम बताती हैं कि इस फैक्ट्री में करीब 300 मजदूर काम करते थे, जिनमें से 50-60 महिला मजदूर थी। इनमें से 3-4 महिला के पास ही ईएसआई कार्ड और पीएफ कार्ड है और पैकिंग डिर्पाटमेंट में एक ही महिला का ईएसआई कार्ड था, जो कि 2003 से काम करती हैं। फैक्ट्री में सप्ताहिक छुट्टी और कुछ सरकारी छुट्टी ही मिलती थी। इसके अलावा कोई भी छुट्टी करने से पैसा कट जाता था। फैक्ट्री का समय सुबह 9 से शाम 5.30 बजे तक है। सुबह 9.15 से लेट होने पर पैसे कटते थे। कुसुम बताती हैं कि मालिक अच्छा था और वह 10 तारीख को तनख्वाह और 25 को एडवांस दे देता था। महिलाएं अगर खड़ी होती थीं तो उनको पहले पैसा देता था। संगीता, कुसुम जैसे दिल्ली के लाखों मजदूरों के लिए अच्छा मालिक होने का मतलब है कि समय से पैसा दे देना, यानी दिल्ली में मजदूरों को अपना पैसा भी समय से नहीं मिलता है।
कुसुम बताती हैं कि वह चौथी मंजिल पर काम करती थी और संगीता तीसरी मंजिल पर। सुबह हमलोग अपने काम पर लगे ही थे कि धुंआ ऊपर आने लगा। संगीता मेरे पास आई और कही कि पता नहीं धुंआ कहां से आ रहा है और हमें लेकर वह नीचे वाली फ्लोर पर आ गई। हम चार महिलाएं दूसरी मंजिल के फ्लोर पर आकर ऑफिस वाले केबिन में चले गये कि यहां ए.सी. चलता है तो धुंआ नहीं लगेगा। लेकिन ए.सी भी बंद थी और दफ्तर में धुंआ भरने लगा। कुसुम चिल्लाने लगी - ‘‘हमारा प्राण चला जायेगा, मेरा बच्चा का क्या होगा’’? संगीता, कुसुम को हिम्मत दे रही थी और अपनी भाषा में बोल रही थी कि ‘‘बहिनी का करीयो, जो लिखल होई वहीं होई, निकल जाओ’’ (बहन क्या कर सकती हो जो लिखा होगा वो होगा, हम लोग निकलते हैं)। चारं महिलाएं नीचे आ रही थी, एक दूसरे को पकड़े हुए। उसमें संगीता की बहन की बेटी भी थी। कुसुम बताती है कि संगीता को कुछ याद आया और वह ऊपर चली गई। हम किसी तरह बाहर निकले, संगीता बाहर नहीं आ पाई। इस हादसे में संगीता, मंजू और सुहेल की दम घुटने से जान चली गई। कुसुम अभी सदमे है और वह संगीता की लाश को भी नहीं देखना चाहती। बस वह याद कर रही है कि किस तरह संगीता उसको हिम्मत देते हुए बाहर निकलने के लिए कह रही थी।
संगीता के रिश्तेदार बताते हैं कि संगीता का पति शराबी था और वह अपनी कमाई पूरा खर्च कर जाता था। संगीता ही बच्चों की देख-भाल के लिए पैसा जुटा कर गांव भेजती थी और वह बहुत ही मिलनसार स्वभाव की थी। पोस्टमार्टम होने के बाद लाश जब एम्बुलेन्स में रखी गई तो मालिक की तरफ से संगीता के परिवार को 10 हजार, मंजू के परिवार को 7 हजार और सुहेल के परिवार को 5 हजार रू. अंतिम संस्कार के लिये दिये गये और किसी तरह का आश्वासन नहीं दिया गया। कुसुम कहती हैं कि मालिक पैसा नहीं देगा, वह छुट्टी का भी पैसा नहीं देगा। कुसुम कहती हैं -‘‘उस फैक्ट्री में दुबारा जाने का दिल नहीं करता है, लेकिन बच्चे पालने हैं -जब मालिक बुलायेगा तो जाना ही पड़ेगा, क्योंकि दूसरी जगह काम करने पर 4-5 हजार रू. ही मिलेंगे। मेरी हाथ एक्सीडेंट में कमजोर हो गयी है तो दूसरे जगह काम मिलने में भी मुश्किल होगी। वहां पुरानी थी तो हमें काम का आइडिया है तो मैं काम कर लेती हूं‘‘।
दिल्ली में आग लगने और मजदूरों की जान जाने की न तो यह पहली घटना है और ना ही आखिरी। इससे पहले कुछ ही सालों में आग लगने के कई बड़े-बड़े हादसे हो चुके हैं, जिसमें सैकड़ों मजदूरां की जानें जा चुकीं हैं। बवाना, नरेला, पीरागढ़ी, शादीपुर, सुल्तानपुरी, मुंडका आदि जगहों पर आग लगने से मजदूरों की जानें जा चुकीं हैं और प्रशासन लाशें गिनने और अवैध वसूली करने में लगा हुआ है। फ्रेंड्स कॉलोनी गली नं. 1 में 14 जुलाई को आग लगने की घटना हुई थी। इससे दो माह पहले इसी गली में आग लगी थी। दिल्ली के आधुनिक कहे जाने वाले इंडिस्ट्रयल एरिया बवाना, नरेला और भोरगढ़ में औसतन प्रतिदिन एक से दो फैक्ट्री में आग लगती है, जैसे कि बवाना में 2017 अप्रैल से 2018 मार्च तक 465 फैक्ट्रियों में आग लगी, उसी तरह नरेला में यह संख्या 600 से अधिक है। बवाना में अक्टूबर, 2017 में लगी आग में 17 मजदूरों की जानें चली गईं थीं, उसके बाद भी दर्जनों मजदूर आग लगने से मर चुके हैं।
मंडोली के उस श्मसान घाट, जहां पर संगीता का पार्थिव शरीर को लिटाया गया था, एक श्लोक लिखा हुआ था -
‘‘मानुष तन दुर्लभ है, होय ना दूजी बार।।
पक्का फल जो गिर पड़े, बहूरी ना लगे डारि।।’’
यह श्लोक जहां इंगित करता है कि मनुष्य का शरीर दुबारा नहीं मिलता है वहीं पर मुनाफाखोरों के लिए इस शरीर की कोई कीमत नहीं है। एक शरीर खत्म होते ही दूसरा शरीर के शोषण के लिए मुनाफाखोर तैयार रहता है। जहां इस अमानवीय बर्ताव के लिए मुनाफाखोर पूंजीपतियों पर कड़े कानून लाकर शिकंजा कसने की जरूरत थी वहीं पर सरकार श्रम कानूनों में बदलाव कर और भी अमानवीय तरीके से मजदूरों के शोषण की  छूट दे रही है। शासन-प्रशासन मजदूरों की लाशों पर पैसा उगाही का काम करते हैं। अगर हम देखें तो हालिया घटना में किसी भी मालिक को कोई सजा नहीं हुई है। एक दिखावटी कानूनी खाना-पूर्ति करने के बाद उनको छोड़ दिया जाता है और वे दुबारा से मजदूरों के खून पीने के लिए तैयार रहते हैं। उनकी लूट का एक हिस्सा शासन-प्रशासन और सरकार में बैठे लोगों तक पहुंचता है। आखिर हम कब तक इस तरह के अमानवीय शोषण को बर्दाश्त करते रहेंगे? क्या हमारे पास इससे छुटकारा पाने के लिए कोई हथियार नहीं हैं? कब तक सरकार सोती रहेगी और मजदूरों को लूटने वालों को संरक्षण देती रहेगी? मंजू, संगीता और सुहेल की मौत की जिम्मेवारी किसकी है, इसके लिए किसको सजा मिलेगी?