रविवार, 23 जुलाई 2017

निजी सुरक्षा कर्मियों के जीवन से खिलवाड़

             संजय उपाघ्याय, देवेन्द्र प्रताप
कोठी की सुरक्षा  में तैनात एक सुरक्षाकर्मी
सेवा क्षेत्र किसी देश अथवा समाज के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 1991 के बाद से विश्व अर्थव्यवस्था में रोजगार सृजन की दृष्टि से इस क्षेत्र ने महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है। हाल के कुछ वर्षों में इसकी विकास दर कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों के मुकाबले काफी ऊंची रही है। इस समय सेवा क्षेत्र कारपोरेट जगत के लिए बेहद आकर्षक निवेश का विकल्प बन चुका है। इसने आधारभूत संरचना सुविधाओं के सृजन को सुलभ  बनाया है और विभि न्न उद्योगों की उत्पादकता में वृद्धि की है। सेवा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण घटक निजी सुरक्षा क्षेत्र है। सामान्य अनुमानों के अनुसार विश्व के  विभि न्न देशों में सुरक्षा एवं गुप्तचर सेवा एजेंसियों की संख्या लगभग एक लाख है।  विभि न्न स्रोतों के अनुसार इन सुरक्षा एजेंसियों के माध्यम से लगभग 2 करोड़ निजी सुरक्षा कार्मिक दुनिया भर में नियोजित हैं। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार विश्व के केवल आठ देशों (भारतजर्मनीचीनकनाडारूसयूनाइटेड किंगडमआस्ट्रेलिया तथा नाइजीरियामें ही 60 हजार से अधिक निजी सुरक्षा सेवा एजेंसियां हैंजिन्होंने लगभग 1.2 करोड़ निजी सुरक्षा कर्मियों को रोजगार प्रदान किया हुआ है। ये कार्मिक सुरक्षा गार्डसशस्त्र सुरक्षा गार्ड तथा सुरक्षा पर्यवेक्षक आदि के रूप में कार्यरत हैं।
      तथ्य यह है कि वैश्विक स्तर पर निजी सुरक्षागार्ड की संख्या दुनिया में मौजूद पुलिस बल से काफी ज्यादा है और ये अपराधों की रोकथाम में भी  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैंलेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र में कहां-कहां कितनी सुरक्षा फर्में काम कर रही हैंउन्होंने कितने कर्मियों को काम पर रखा हुआ हैआदि से संबंधित प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसी प्रकार इस क्षेत्र के श्रमरोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दे क्या हैंजिनका सामना निजी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा रखे गए सुरक्षा कर्मियों को अक्सर करना पड़ता हैकी तरफ कम से कम भारत के अध्येताओं और नीति निमार्ताओं ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। इसी कमी को पूरा करने के उद्देश्य से दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की  विभि न्न स्तरों की 40 सुरक्षा एजेंसियों को आधार बना कर वीवीगिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान द्वारा हाल ही में एक अध्ययन किया गया।
जहां तक निजी सुरक्षा एजेंसियों की किस्मोंश्रेणियों और उनके द्वारा काम पर रखे गए सुरक्षा कर्मियों की दशाओं और कार्य स्थितियों आदि का संबंध हैदेश का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र इस संबंध में देश के लगाग सभी मुख्य महानगरों की विशेषताओं को अपने में समेटे हुए है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में  विभि न्न श्रेणियों की लगभग 500 सुरक्षा फर्मों ने 1.5 लाख के आसपास सुरक्षा कर्मियों को रोजगार प्रदान किया हुआ है। इन निजी सुरक्षा फर्मों में स्थानीयराष्ट्रीयतथा अंतर्राष्ट्रीय सभी  स्तरों पर काम करने वाली सुरक्षा एजेंसियां शामिल हैं।
     इन फर्मों द्वारा नियोजित सुरक्षाकर्मी सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानोंकाल सेंटर्सनिजी कंपनियों के निगमित कार्यालयोंराज्य सरकारोंस्थानीय स्वशासन के नियंत्रणाधीन कार्यालयोंअस्पतालोंआवासीय सोसाइटियों/अपार्टमेंटोंनिजी घरोंकोठियोंबैंकोंबीमा कंपनियों के कार्यालयोंमीडिया कार्यालयोंनिर्माण स्थलोंधार्मिक स्थानोंपेट्रोल पंपों आदि पर अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं। शोधकर्ताओं ने इन सभी स्थानों पर कार्यरत निजी सुरक्षा कर्मियों से बातचीत की। अध्ययन में मुख्य तौर पर सुरक्षाकर्मियों के काम के घंटोंपारिश्रमिक,  विभि न्न प्रकार के भत्तोंछुट्टियोंरोजगार सुरक्षाउन पर लागू मुख्य श्रम कानूनों के उपबंधों के कार्यान्वयन तथा  विभि न्न श्रम कानूनों के तहत अधिकारों की दृष्टि से सुरक्षा कर्मियों के बीच जागरूकता के स्तर पर आदि पर ध्यान केंद्रित किया गया। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में इस समय तकरीबन 15 हजार से अधिक सुरक्षा एजेंसी फर्मों में करीब 55 लाख से 60 लाख के बीच सुरक्षाकर्मी कार्यरत हैं।  विभिन्न अनुमानों के अनुसार भारत में निजी सुरक्षा सेवा उद्योग प्रतिवर्ष 25-35 प्रतिशत की  वार्षिक दर से बढ़ रहा है।
       इस उद्योग का कारोबार लगाग 25 हजार से 30 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। आकलनों से यह पता चलता है कि निजी कूरियर सेवा के साथ मिल कर निजी सेवा सुरक्षा उद्योग देश में सबसे बड़ा करदाता है। इन निजी सुरक्षा सेवा एजेंसियों द्वारा काम पर लगाए गए सुरक्षा कार्मिक (सुरक्षा गार्डसशस्त्र सुरक्षा गार्ड तथा सुरक्षा पर्यवेक्षक आदिइन सुरक्षा सेवा एजेंसियों की कार्य प्रणाली में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन अध्ययन में पाया गया कि इन सुरक्षा कर्मियों को अपने सेवा काल के दौरान जीवन जोखिमोंसामाजिक सुरक्षा के अभाव और निम्न कार्यदशाओं आदि की दृष्टि से अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत के अतिरिक्त कुछ अन्य देशों मेंजहां पिछले कुछ दशकों से यह उद्योग लगातार फल फूल रहा है उनमेंजर्मनीचीनकनाडारूसयूनाइटेड किंगडमआस्ट्रेलिया तथा नाइजीरिया आदि देश शामिल हैं। अधिकांश देशों में निजी सुरक्षा कार्मिकपुलिस बल से संख्या में अधिक हैं और कानून और व्यवस्था लगभग  ऐसी भूमिका और कर्तव्य निभाने की आशा की जाती हैजो पुलिस की भूमिका और कर्तव्यों के समान हैं। भारत समेत अन्य देशों में निजी सुरक्षाकर्मी अपने जीवन में कमोवेश उसी प्रकार की चुनौतियों और खतरों का सामना करते हैंजिनका सामना पुलिस को करना पड़ता है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश निजी सुरक्षा कार्मिक प्रवासी युवा (19 से 40 वर्ष आयु समूह के बीचशिक्षित, (हाई स्कूल तथा इससे उच्च स्तर की शैक्षिक योग्यता रखने वालेतथा विवाहित हंै। अध्ययन में पाया गया कि आमतौर पर एक सुरक्षाकर्मी के ऊपर 4-5 लोग निर्भर होते हैं। इसके बावजूद अधिकांश सुरक्षा कर्मियो का वेतन और कुल पारिवारिक आय बहुत ही मामूली है। शोधकर्ताओं ने पाया कि उनकी वेतन की आय को मिला कर 5000-6000 रुपये प्रतिमास ही बैठती है। जाहिर है मंहगाई के इस जमाने में उनकी बचत  के बराबर होती है। बहुत कोशिश करने के बाद ही वे प्रतिमाह 500 रुपये से लेकर 1500 रुपया बचा पाते हैं। ज्यादातर सुरक्षाकर्मी हमेशा ही कर्ज के बोझ तले दबे रहते हैं। और यह भी तब है जबकि वे 12 घंटे की सामान्य ड्यूटी करते हैं और महीने में 8-10 ओवरटाइम करते हैं। 
      इन कार्यस्थितियों के बावजूद यह पाया गया कि अधिकांश सुरक्षा कर्मियों को निजी कंपनियां कोई नियुक्ति पत्र तक नहीं जारी करतीं। यह भी  पता चला कि  उनके पास निजी सुरक्षा एजेंसियों के किसी जिम्मेदार अधिकारी के हस्ताक्षर युक्त पहचान पत्र तक नहीं होता। कंपनी उनके लिए आमतौर पर कार्यस्थल पर शौचालय और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक मुहैया नहीं करवाती। ज्यादातर सुरक्षा कर्मी इन सुरक्षा कंपनियों में इस उम्मीद से नौकरी की शुरुआत करते हैं कि उनकी जिन्दगी में सुधार आएगालेकिन होता यह है कि वे एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को अपनी बेहतरी की उम्मीद के साथ बदलते रहते हैंलेकिन उनकी आशाएं कभी-कभी फलीभूत नहीं हो पातीं। उनमें से अधिकांश सुरक्षा कर्मियों को  तो न्यूनतम मजदूरी मिलती है और  किए गए ओवर टाइम के लिए ओवर टाइम दर से वेतन। इतना ही नहींउन्हें इतनी लम्बी ड्यूटी अवधि के दौरान खाने का •ाी समय नहीं मिलता। कई-कई सालों तक उनका वेतन पहले के समान बना रहता है और उनको पदोन्नति (तरक्कीका मौका नहीं मिलता। अधिकांश निजी सुरक्षा कार्मियों को साल में पूरे 365 दिनों तक काम करना पड़ता है और इस दौरान उन्हें आकस्मिक अवकाश जैसी कोई छुट्टी तक नहीं मिलती। इनमें से बहुतों को होलीदीवालीईद या क्रिसमस आदि महत्वपूर्ण त्योहारों और राष्ट्रीय अवकाश के दिन भी छुट्टी नहीं मिलती। इतना ही नहीं अधिकांश सुरक्षा कर्मियों को संबंधित एजेंसी द्वारा भर्ती के समय और बाद में भी उनको दी जाने वाली वर्दी के लिए अपने वेतन से भुगतान करना पड़ता है।
       बहुत से सुरक्षा कर्मियों को भविष्य निधि(पी.एफ.) और कर्मचारी राज्य बीमा (.एस.आईके लिए अपने हिस्से के अभिदाय का भुगतान करने के साथ-साथ इस मद में नियोजकों के हिस्से का भुगतान भी करना पड़ता है। इस तरह अधिकांश निजी सुरक्षा एजेंसियां  विभि न्न गैर कानूनी तरीकों का इस्तेमाल करके इन सुरक्षाकर्मियों की बदौलत भारी मुनाफा कमाती हैं। शोधकर्ताओं ने इस मामले में सरकार को सुझाव दिया है कि वे सुरक्षाकर्मियों को नियुक्ति पत्र दिलवानेन्यूनतम मजदूरी अधिनियम और मजदूरी भुगतान अधिनियम से संबंधित कानूनों के प्रावधानों को लागू करवानेओवर टाइम कार्य और ओवर टाइम की दरों के मामले को सख्ती से लागू किए जाने जैसे कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।  अगर सरकार इन सुझावों पर गौर करती हैतो पूरी संभावना है कि इन सुरक्षाकर्मियों को भी संविधान प्रदत्त वे बुनियादी अधिकार हासिल हो सकेंगेजो कि किसी भी मेहनतकश को मिलना ही चाहिए।
(संजय उपाध्याय  वीवीगिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान में फैलो हैंजबकि देवेन्द्र प्रताप अमर उजाला जम्मू  में वरिष्ठ उपसंपादक हैंवी वी गिरी से इस शोध को संजय उपाध्याय के निर्देशन और देवेन्द्र प्रताप के सहयोग से  २००९ में किया गया. संपर्क: देवेंद्र प्रताप 8717079765,  devhills@gmail.com)

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

नोएडा में घरेलू कामगारों और फ्लैट निवासियों के बीच संघर्ष की पड़तालः एक रिपोर्ट

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घटना, पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
यह दक्षिण एशिया में स्वयंभू सुपर पॉवर और दुनिया में सबसे तेज ‘विकास’ कर रहे भारत देश की संसद से महज 35 किलोमीटर यानी एक घंटे की दूरी पर स्थित इलाक़ा है. ये इलाक़ा नोएडा सेक्टर 78 कहलाता है, जोकि अधबसे विश्वस्तरीय शहर ग्रेटर नोएडा और अभी बसने की खानापूर्ति में लटके ग्रेटर नोएडा एक्सटेंशन (नोएडा एक्सटेंशन नाम से पॉपुलर) से लगभग सटा हुआ है. यहां असंख्य हाईराइज़ इमारते हैं. पुराने शहरों के मुहल्ले और गांव वालों को बेशक लग सकता है कि वो किसी दूसरे देश में आ गए हैं.
नोएडा के इसी सेक्टर 78 में आस पास बसे महागुन मॉडर्न, अंतरिक्ष और सन शाइन नाम की तीन सोसाइटियां हैं जिनमें हज़ारों लोग रहते हैं हालांकि आस पास खड़ी इमारतों में युद्धस्तर पर काम चल रहा है. इन सोसाइटियों और अभी बन रही इमारतों में हज़ारों लोग काम करने के लिए देश के अलग अलग इलाक़ों से आए हुए हैं और पास ही झुग्गी बस्ती बसा ली है.
इन्हीं सोसाइटियों में से एक महागुन मॉडर्न में 11 जुलाई 2017 को फ्लैट नंबर 102, जिसमें कोई शेठी परिवार रहता है. एक घरेलू कामगार महिला, ज़ोहरा बीबी हर रोज़ की तरह सोसाइटी में काम करने गईं. आम तौर पर दोपहर 11-12 बजे तक काम ख़त्म करने के बाद लोग अपनी झुग्गी में लौट आते हैं और फिर शाम चार बजे के बाद जाते हैं. लेकिन उस दिन ज़ोहरा बीबी नहीं लौटीं. उनके पति अब्दुल भी मज़दूरी करते हैं, जब वो शाम को लौटते हैं तो उन्हें ज़ोहरा नहीं मिलती हैं. काफ़ी छानबीन के बाद वो और उनका बेटा राहुल 11 बजे महागुन मॉडर्न सोसाइटी के गेट के रिसेप्शन पर सुरक्षा गार्डों से पूछताछ करते हैं. गार्ड जब उन्हें टालने की कोशिश करते हैं, तो वो 100 नंबर पर पुलिस को फ़ोन करते हैं. दो सिपाही आते हैं. अब्दुल और उनके बेटे को लेकर सोसाइटी के 102 नंबर फ्लैट में पहुंचते हैं. सिपाही उन्हें गेट के बाहर ही रोक देते हैं और खुद अकेले अंदर दाखिल होते हैं. कुछ देर बाद वो लौट आते हैं और बताते हैं कि ज़ोहरा बीबी वहां नहीं हैं. वो गुमशुदगी की शिकायत सेक्टर 49 में स्थित संबंधित थाने में देने को कहकर चले जाते हैं. वो लोग रात में थाने जाते हैं, शिकायत दर्ज कराते हैं और तस्वीर आदि सुबह दे जाने की बात कह कर लौट आते हैं.
पूरी रात ज़ोहरा बीबी का पता नहीं चलता. 12 जुलाई, 2017 को सुबह 6 बजे फिर अब्दुल अपने बेटे राहुल को लेकर सोसाइटी गेट पर पहुंचते हैं. वहां गार्ड से वो एंट्री, एक्ज़िट का रजिस्टर दिखाने को कहते हैं, जिसमें ज़ोहरा का एक्ज़िट दर्ज़ नहीं होता है. अब्दुल अड़ जाते हैं कि उनकी बीबी सोसाइटी में ही है. उन्हें ये भी शक होता है कि ज़ोहरा के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई. इसी बीच घरों में काम करने के लिए घरेलू कामगार आना शुरू कर देते हैं. गेट पर अब्दुल की हुज्जत से एंट्री का काम रुक जाता है और फ्लैटों में काम करने वाले सफ़ाई कर्मचारी, माली, मेंटेनेंस, बिजली, चौका बर्तन करने वाली महिलाएं इकट्ठा होती जाती हैं. अब्दुल अपनी बस्ती से भी आठ दस लोगों को बुला लेते हैं. शोर शराबे के बीच लोग मांग करते हैं कि या तो ज़ोहरा बीबी को खोजा जाए या फिर उन्हें अंदर जाने दिया जाए. इस बीच नौबत धक्का मुक्की की आ जाती है, मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, इसे नियंत्रित करने के लिए ‘गार्ड एक के बाद एक तीन हवाई फ़ायर’ कर देते हैं. इसके बाद भीड़ उग्र हो गई. लोग पथराव करने लगे. इस पथराव में रिसेप्शन का शीसा टूट गया. 500 की भीड़ से कुल जमा इतना नुकसान दिखाई देता है.
विस्फोटक स्थिति के बीच मुठ्ठीभर सुरक्षा गार्ड कुछ नहीं कर पाते हैं और भीड़ धड़धड़ाते हुए फ़्लैट नंबर 102 के सामने पहुंच जाती है. रास्ते में गाड़ियां खड़ी मिलती हैं, लेकिन उन्हें खरोंच भी नहीं आई. भीड़ फ्लैट के सामने थी लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला, जब भीड़ लौट कर गेट पर आ आई तभी ज़ोहरा बीबी को आधी बेहोशी की हालत में दो लोग पकड़ कर लाते हुए दिख जाते हैं. पुलिस और गार्ड अब्दुल को बताते हैं कि वो उसे बेसमेंट से ला रहे हैं. भीड़ ज़ोहरा बीबी को लेकर पास के चौहारे पर पहुंचती है और उसे लिटा कर प्रदर्शन करने लगती है. हालांकि इस घटना के दौरान वहां हमेशा की तरह एक सब इंस्पेक्टर और चार कांस्टेबल मौजूद रहते हैं, लेकिन भीड़ के सामने वो भी कुछ नहीं कर पाते. हंगामे के घंटों बाद, पुलिस की एक टुकड़ी महागुन मॉडर्न के गेट पर सुबह 9 बजे पहुंचती है, जबकि सेक्टर 49 का थाना यहां से महज 20 मिनट की दूरी पर है. घटना की विस्तृत जानकारियां, दोनों पक्षों यानी मज़दूर, गार्ड और पुलिस अधिकारी के मुताबिक कमोबेश इसी क्रम में हैं. लेकिन बयान थोड़े बहुत अलग अलग हैं, जिसे बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है कि पुलिस क्या कहेगी और पीड़ित पक्ष क्या कहेगा. मसलन सेक्टर 49 के थानाध्यक्ष परशुराम का कहना है कि ‘ज़ोहरा पर फ़्लैट मालिक शेठी परिवार ने 70,000 रुपये चोरी का आरोप लगाया, जिसे उसने क़बूल कर लिया लेकिन जब शेठी परिवार ने उसे पुलिस के सुपुर्द करने की बात कही तो वो भागकर फ्लैट नंबर 2195 में पहुंच गई, जहां वो पहले काम करती थी. वहां उसने पति से नाराज़ होने का बहाना बनाया और रात वहीं रुक गई और सुबह गेट पर खुद आ भी गई. ’ वो इस बात से इनकार करते हैं कि सुरक्षा गार्ड ने गोली चलाई थी. वो अपने तर्क के पक्ष में सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हैं जिसे या तो उन्होंने देखा है या सोसाइटी के लोगों ने! लेकिन पुलिस को ये संदेह नहीं होता कि जब 11 जुलाई को दिन में उनका पैसा चोरी हुआ तो इस बारे में उन्होंने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई? साफ़ ज़ाहिर होता है कि हंगामा होने के बाद ये कहानी आरोपी शेठी परिवार ने बनाई और पुलिस उसे पुख्ता सबूत मानने को तैयार हो गई. ये इस कहानी की शुरुआत भर है. इसके बाद जो शुरू होता है, वो भारतीय राज्य की शासन व्यवस्था की जगज़ाहिर दास्तां है, जिसे बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय ने ‘ब्राह्मणवादी पूंजीवादी स्टेट’ का नाम दिया है, जिसकी नज़र में यहां के दलित, आदिवासी, मज़दूर, मुस्लिम महिलाएं और कमज़ोर वर्ग के लोग ‘जन्मजात अपराधी’ हैं.

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पुलिस, अदालत और अख़बार ने अपनी ड्यूटी कैसे पूरी की?
11 और 12 जुलाई की दरमियानी रात नोएडा पुलिस और उसका सचल दस्ता, बीट कांस्टेबल और सोसाइटी के गार्ड अपनी 200 साल की नींद से नहीं जगते हैं. उनकी जब नींद खुलती है तबतक हंगामा हो चुका होता है. लोग सड़क पर उतर चुके होते हैं. और फिर शुरू होती राज्य की कार्रवाई. सुबह 11 बजे ज़ोहरा बीबी को मेडिकल के लिए पुलिस अस्पताल ले जाती है और फिर तीन बजे तक उसका कोई पता नहीं चलता है. उधर 49 के थाने में शेठी परिवार के ख़िलाफ़ ज़ोहरा बीबी के साथ मारपीट, उत्पीड़न और बंधक बना कर रखने का एफ़आईआर दर्ज़ किया जाता है. लेकिन शाम होते होते अब्दुल समेत 500 लोगों पर एफ़आईआर दर्ज़ कर दी जाती है, जिसमें एक शेठी परिवार का काउंटर एफ़आईआर और दूसरा एफ़आईआर, महागुन मॉडर्न सोसाइटी का दो साल से मेंटेनेंस का जिम्मा समंभालने वाली एक बहुराष्ट्रीय अमरीकी कंपनी जेएलएल (www.joneslanglasalle.co.in) की तरफ़ से दायर कराया जाता है, जिसमें भीड़ पर जानलेवा हमले का आरोप है.
आम तौर पर शिकायत के बाद पुलिस अपनी जानकारी, जितनी भी हो, से धाराएं लगाती है. जैसा कि सेक्टर 49 पुलिस थाना के थानाध्यक्ष परशुराम कहते हैं, “उन्हें 500 लोगों पर धारा 307 लगाना उचित लगा यानी हत्या की कोशिश.” पर किसकी? इसका जवाब देना पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझती. 12 जुलाई को रात 11 से 12 के बीच जब कामगार झुग्गियों में खा पीकर गहरी नींद में सो रहे थे, पुलिस ने छापा मारकर कुल 58 मज़दूरों को उठाया. इसमें ज़ोहरा बीबी का 14 साल का बेटा राहुल भी था. सुबह 10 बजे इस थाने से उस थाने और इस घर से उस घर ले जाने के बाद 45 लोगों को छोड़ दिया गया. ध्यान देने की बात है कि उस बस्ती में वो सभी लोग रहते हैं जो अंतरिक्ष अपार्टमेंट या सन शाइन में काम करते हैं, रेहड़ी लगाते हैं या पास की इमारतों में मज़दूरी का काम करते हैं. जिन 13 लोगों को रोका गया उनपर 307 का मुक़दमा दिखाया गया. उन्हें जज साहब ने न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. जैसा कि 200 साल से होता आया है, हाकिम ने ये तक नहीं पूछा कि पुलिस ने किस बिना पर ये धारा लगाई है? भारतीय राज्य की न्याय प्रणाली ने अपने कर्तव्य से मुक्ति पा राहत की सांस ली. इलाके में छपने वाले एक से एक नंबर वन अख़बार के रिपोर्टर पहुंचे और सबको शेठी परिवार और पुलिस की कहानी सच्ची जान पड़ी और 13 जुलाई के अख़बारों में ज़ोहरा बीबी पर चोरी का इल्ज़ाम वाली सुर्खियां नामुदार हुईं. बस्ती के लोगों ने पूरे दिन अख़बारों में अपना बयान ढूंढते ढूंढते आंखें सुजा लीं. लेकिन भारतीय गणराज्य की शासन प्रणाली का सर्प्रराइज़ अभी ख़त्म नहीं हुआ था. व्हाट्सऐप पर मैसेज आने लगे कि ये लोग बांग्लादेशी मुस्लिम हैं, जो अवैध रूप से यहां रह रहे हैं.
जब फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम घटना के पांचवें दिन 16 जुलाई, दिन रविवार को पहुंची, तबतक हर झुग्गी वाला अपने आधार कार्ड और वोटर कार्ड लोगों को दिखा दिखा कर थक चुका था. बाहर से आने वाले सूटेड बूटेड लोगों के प्रति उनके मन में घोर उदासीनता और कुछ हद तक आक्रोष व्याप्त था. कोई बात करने को तैयार नहीं था. उन्हें सिर्फ अंतरिक्ष अपार्टमेंट में रह रहे मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी के पोते तथागत भट्टाचार्या और घरेलू कामगार यूनियन के लोगों पर भरोसा था. तथागत वहां मौजूद थे, उन्होंने जो बताया वो इस प्रकार है- “ये लोग पश्चिम बंगाल के उत्तरी ज़िले कूच विहार, मालदा और वहीं आस पास के रहने वाले लोग हैं. इसमें मिलीजुली आबादी है, यानी हिंदू भी हैं और मुस्लिम भी. अगर आप पश्चिम बंगाल को अपना देश नहीं मानते हैं और मुस्लिम पहचान की वजह से उन्हें बांग्लादेशी क़रार दे रहे हैं तो ये इलाकाई विभाजन को बढ़ाने वाली बात है.” उन्होंने सवाल किया, “अगर हिंदी भाषी लोग बंगालियों के ख़िलाफ़ इस तरह उत्पीड़न को बढ़ावा देंगे तो कल को बंगाल में हिंदी भाषियों के खिलाफ़ आक्रोष पैदा होने से आप कैसे रोकेंगे? ऐसे तो जुड़ने के बजाय समाज बिखराव की तरफ़ ही बढ़ेगा.”
उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस दिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर बंगाली मज़दूरों के उत्पीड़न का आरोप लगाया, उसके एक दिन आगे पीछे भाजपा के एक केंद्रीय मंत्री, महेश शर्मा फ्लैट निवासियों से मिलने पहुंच जाते हैं. इस फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम को ये भी पता चला कि 2600 फ़्लैटों वाली महागुन मॉडर्न सोसाइटी, अभी दो साल पहले ही बनकर तैयार हुई है, जिसमें अभी 2000 फ्लैट के लोग ही रहने आए हैं. इन फ्लैटों में रहने वाले, कथित तौर पर संघ से जुड़े लोग व्हाट्सऐप पर ये प्रचार करने लगे हैं कि ये कामगार बांग्लादेशी नागरिक हैं. यानी यहां केवल भारतीय गणराज्य ही सक्रिय नहीं है. कुछ गैर सरकारी तत्व भी सक्रिय हैं जो विशुद्ध ‘काम के हालात’ के मुद्दे पर मज़दूरों और मालिकों के बीच हुई तकरार को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश में जुट गए हैं. जिस दिन ये टीम पहुंची, उसी दिन इसी इलाक़े से भाजपा के सांसद और केंद्र में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा की गाड़ी उस महागुन मॉडर्न के गेट के अंदर दाख़िल होती दिखी, जहां पत्रकारों को भी जाने की इजाज़त नहीं दी जा रही थी. एसएचओ परशुराम का कहना था, “वो मंत्री हैं, इस इलाक़े से सांसद हैं, वो क्यों नहीं जा सकते? फ्लैट मालिकों की आज मीटिंग चल रही है, कुछ लोग उन्हीं बंगाली मज़दूरों से काम कराना चाहते हैं, कुछ लोग हाउस कीपिंग एजेंसियों से मदद लेना चाहते हैं. मंत्री जी उनसे बात करेंगे. जो भी तय होगा उसके अनुसार कार्रवाई होगी.”
यानी दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले, झुग्गी में रहने वाले 13 लोगों को जेल में भेजने के बाद भी और गिरफ़्तारियां या कुछ और कार्रवाई हो सकती है, परशुराम जिनके पीछे एक तरफ़ गांधी की और दूसरी तरफ़ हिंदुओं की देवी दुर्गा की फ़ोटो लटक रही थी, कहते हैं, “ये इस पर निर्भर है कि फ्लैटवाले क्या निर्णय लेते हैं. अगर उन्हें इन्हीं लोगों से काम कराना है तो हम क्या कर सकते हैं. लेकिन अगर नहीं तो क़ानूनी कार्रवाई करनी पड़ेगी.” और संकेत देते हैं कि ‘अभी कुछ और गिरफ़्तारियां हो सकती हैं.’
और इसका संकेत रविवार रात को ही मिल जाता है जब, इंडियन एक्स्प्रेस अख़बार के अनुसार, केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा फ्लैट वालों से मीटिंग के बाद ऐलान करते हैं कि “जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, ये सुनिश्चित किया जाएगा कि उन्हें ज़मानत न मिले. हम फ्लैट निवासियों के साथ हैं और उनकी तरफ़ से कोई ग़लती नहीं हुई है. भीड़ पहले से हिंसा की मंशा से हथियारबंद होकर आई थी. मीडिया, एनजीओ और मानवाधिकार के नाम पर दुकान चलाने वाले कुछ मुट्ठीभर लोग इस मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश में हैं. मैंने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वो इसका मुंहतोड़ जवाब दें.”
और दूसरे दिन महागुन के सामने फ़ुटपाथ की दुकानों पर बुलडोज़र चला दिया जाता है.
उधर छह दिन से झुग्गी के लोग रोजी रोटी जाने और गिरफ़्तारी की दोहरी चिंता में रात को भागे भागे फिर रहे हैं. जब हम बस्ती में पहुंचे तो कूचविहार की पूजा रॉय ने बताया, “रात में मर्द झुग्गियों में नहीं सो रहे हैं, सिर्फ बच्चे और महिलाएं यहां रहती हैं. पूरा दहशत का माहौल है, रात को ठीक से सो नहीं पाते. बच्चों को लेकर कहां कहां भागते फिरें.”
हालात का बयान करते करते एक महिला की आंखों में आंसू आ गए. वो उसी दिन पास के गांव में एक कमरे का मकान ढूंढ कर आई थी, “मेरे पति नोएडा की एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करते थे और पूरा परिवार इंदिरापुरम में रहता था. कुछ साल पहले पति के फ़ेफ़ड़े, दिल और गुर्दे में दिक्कत शुरू हो गई तो नौकरी छूट गई. साल भर पहले यहां झुग्गी में अपने तीन बच्चों और उनके साथ रहने आ गई. अब ये काम भी चला जाएगा तो रहेंगे कहां, खाएंगे क्या?” उनके पति अशरफ़ सोसाइटी के एक गेट के सामने सिलाई मशीन रख कर दो चार पैसे का जुगाड़ कर लेते हैं. पूरे घर का भार इस अकेली महिला के ऊपर है. रात को पुलिस के आने की खबर मिलती है तो अपनी दो जवान बेटियों, एक बेटे को लेकर अपने बीमार पति के साथ उन्हें खेतों की ओर भागना पड़ता है. इससे तंग आकर उन्होंने इस बस्ती को छोड़ने का मन बना लिया.
लेकिन जिस बात का संकेत थानाध्यक्ष परशुराम ने दिया था, वो आशंका दूसरे दिन ही सच्चाई में बदल गई. 16 जुलाई को फ़्लैट मालिकों की मीटिंग में तय हुआ कि विरोध प्रदर्शन में आगे आगे दिखने वाले कुछ लोगों को ब्लैक लिस्ट कर बाकी बंगाली कामगारों को महागुन मॉडर्न सोसाइटी में काम करने की इजाज़त दे दी जाए. सोसाइटी के लोगों ने इमारतों के सामने फुटपाथ पर रेहड़ी लगाकर खाने पीने का सामान बेचने वालों, गुमटी में पान बीड़ी बेचने वालों से अपनी असुरक्षा जताई. इंडियन एक्स्प्रेस की ख़बर के अनुसार, दूसरे दिन नोएडा अथॉरिटी ने इन रेहड़ी पटरी के दुकानदारों पर अवैध अतिक्रमण के नाम पर बुलडोजर चला दिया. शायद अथॉरिटी कार्रवाई कर ये संकेत देना चाह रही थी कि झुग्गी बस्ती भी उजाड़ी जा सकती है!  लेकिन क़रीब 100 परिवारों की ये छोटी सी बस्ती आई कहां से? असल में इसकी कहानी, पश्चिम बंगाल में माकपा सरकार के 35 सालों और पिछले सात आठ सालों से ममता बनर्जी के शासन (या कुशासन) और भारतीय गणराज्य के पूंजीवादी विकास के तह में ले जाती है.

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एक तरफ़ लेबर कैंप और दूसरी तरफ़ मैनचेस्टर, मैनहट्टन, मिलानो, रोमानो
बस्ती की कहानी बड़ी दिलचस्प है. मुख्य धारा के उत्पादन यानी फैक्ट्री, कल कारखाने या ऑफ़िसों से निकाल बाहर किए गए, लोग लेबर कैंप से भी बदतर हालात वाली इन झुग्गियों में आकर बसते हैं. इनमें बहुतायत आबादी खेती किसानी से दर बदर लोगों की है. उदारहण के लिए इस झुग्गी में रहने वाले अधिकांश लोग पश्चिम बंगाल के कूच बिहार के भूमिहीन किसान हैं. इन सोसाइटियों के समानांतर जाने वाले ग्रेटर नोएडा की मेट्रो के बीच खाली जगह में बसी ये झुग्गियां फूस की नहीं टीन की हैं. जो भी यहां रहना चाहता है उसे कथित रूप से पास के गांव के एक ठेकेदार को किराया देना पड़ता है. लेकिन इससे बड़ी बात ये है कि यहां 12X8 का एक टीन का बड़ा बक्सा खड़ा करने के लिए किरायेदार को 10 हज़ार रुपये खर्च करना पड़ता है. अपनी लागत से बने इस दड़बेनुमा झुग्गी का किराया 500 रुपये है, जो ठेकेदार पैसा वसूलता है उसने बिजली की भी व्यवस्था की है. गांव यहां से 500 मीटर दूर है. ये बिजली सिर्फ रात को दी जाती है. झुग्गी के बीचोबीच 15-20 टॉयलेट बनाए गए हैं, जिसके बाहर टाट का पर्दा लटका दिया गया है. क़रीब 75 घरों के बीच सिर्फ दो हैंडपंप ठेकेदार ने लगवाए हैं, वो भी हर घर से 500 रुपये चंदा वसूल कर. किसी भी घर में पंखा तक नहीं है. रात में लोग ऊंचाई पर जाकर सोते हैं, महिलाएं बच्चे इस टीन के बक्से में भयंकर गर्मी में बिताते हैं. दूसरी तरफ़, मैनचेस्टर, मैनहट्टन, मिलानो, फ़रेरा, रोमानों, सिएना, मांटोवा और ऐसे ही अनजान नाम के महागुन के कुल 15 टॉवरों में 800 वर्ग फ़ुट से लेकर दो दो हज़ार वर्ग फ़ुट के दो बेडरूम और तीन बेडरूम फ्लैट हैं. हर कमरे में एसी और सारी आधुनिक सुविधाएं. हर फ़्लैट वाले के पास औसतन एक कार है. एक अनुमान के अनुसार, फ़्लैटों की क़ीमत 50 लाख से लेकर 90 लाख रुपये तक है. सोसाइटी के गेट से अंतिम टॉवर के बीच क़रीब 500 मीटर की दूरी है, जिसके लिए गोल्फ़ क्लबों में आम तौर पर दिखने वाले इलेक्ट्रिक ऑटो का इंतज़ाम है.
मैनहट्टन निवासियों की आमदनी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं लेकिन अगर मोटामोटी तुलना की जाए तो किसी रेस्त्रा में इनके एक दिन के बिल के बराबर, उनके घरों में काम करने वाली महिला कामगारों को एक घर से आमदनी होती है. एक महिला कामगार को फ्लैट में पूरे महीने झाड़ू, पोछे और बर्तन के लिए 1500 रुपये दिए जाते हैं. इसमें भी कुछ फ्लैट मालिक मोलभाव करते हैं और 1200 रुपये देते हैं. खाना बनाने वाली कामगार औरतों का रेट यहां प्रति व्यक्ति 2000 रुपये है. लेकिन इसमें भी मोलभाव होता है और दो लोगों के खाने के तीन हज़ार रुपये दिये जाते हैं. एक महिला औसतन पांच से छह घरों में काम कर आठ से 10 हज़ार रुपया कमा लेती है. दूसरी तरफ़ यहां आए रहने वाले अभी नव धनाढ़्य वर्ग के लोग हैं, जिन्होंने बैंक से कर्ज़ लेकर फ्लैट खरीदा है और आने वाले कई सालों तक वो इसकी ईएमआई चुकाते रहेंगे. यहां रहने वाले लोग प्रभावशाली हैं. उनकी पहुंच, पुलिस प्रशासन से लेकर, अदालतों और मीडिया तक में है. राजनीतिक पार्टियां इससे अछूती नहीं हैं और यही कारण है कि एक बुलावे पर भाजपा के केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा यहां पहुंच जाते हैं, लेकिन झुग्गियों में जाने की जहमत नहीं उठाते. कुछ लोगों का कहना है कि उनका आगमन ‘बांग्लादेशी थ्योरी को सपोर्ट करने’ के लिए है. हालांकि नोएडा के पुलिस अधीक्षक पहले ही कह चुके हैं कि ‘कामगार बांग्लादेशी नागरिक नहीं हैं.’ लेकिन इन दो दुनियाओं के बीच फर्क को महसूस किया जा सकता है और दोनों की ताक़त का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. घरेलू कामगार यूनियन के कार्यकर्ता आलोक कुमार कहते हैं, “जब किसी महिला कामगार की एंट्री होती है तो गार्ड शरीर छूकर चेकिंग करती हैं. पर्स में रखे पैसे दर्ज किए जाते हैं और अगर लौटते समय 10 रुपये से 12 रुपये भी हो गए तो फ्लैट में फ़ोन कर पूछा जाता है कि, मैडम आपने दिए हैं? ऐसे में एक महिला लापता हो जाती है और जब पूछा जाता है तो एक के बाद एक बहाने बनाए जाते हैं. पहले कहा जाता है कि वो किसी के साथ भाग गई होगी, फिर कहा जाता है कि सुबह आना, फिर कहा जाता है कि उसने चोरी की थी. और उलटे पुलिस, इंसाफ़ मांगने वालों पर ही 307 का मुकदमा ठोंक देती है.”

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पूंजीवादी लोकतंत्र का कूच बिहार, दिल्ली और वॉशिंगटन कनेक्शन
इस पूरी कहानी का एक सिरा पश्चिम बंगाल के 35 साल के माकपाई शासन, करीब आठ साल के ममता बनर्जी के शासन और दिल्ली में विराजमान रहीं कांग्रेसी और भाजपाई सरकारों से जुड़ा है तो दूसरा सिरा विश्वपूंजीवाद के केंद्र वॉशिंगटन से जुड़ा है. बात पश्चिम बंगाल की करते हैं. कहा जाता है कि भूमि सुधार को लागू करने की वजह से ही पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार रिकॉर्ड सालों तक चली. बल्कि पूरे देश में भूमि सुधार लागू करने में वाम मोर्चा सरकार अभी भी नंबर वन गिनी जाती है. तो फिर कूच बिहार में इतने भूमिहीन कैसे पैदा हो गए? असल में कुछ विद्वानों का कहना है कि वाम मोर्चे का भूमि सुधार काग़ज़ी ज़्यादा था. वहां ज़मींदारी ख़त्म कर दी गई, दस्तावेज पर जिसके क़ब्ज़े में ज़मीन थी, उसे सौंप दी गई. इसमें किसी के पास 20 बीघे ज़मीन आई तो किसी के पास कुछ कट्टे खेत. हालांकि उस ज़माने में भी ये बड़ी उपलब्धि थी, ज़मींदार से सीधे किसानों के हाथ में ज़मीन आ गई. लेकिन तर्क संगत वितरण फिर भी नहीं हुआ. निचली जातियां जो दूसरे के खेतों पर मज़दूरी करती थीं, उनकी हालत जस की तस बनी रही. पहले खेतों में काम मिल जाता था लेकिन ट्रैक्टर और मशीनीकरण ने इनका वो रोज़गार भी छीन लिया. मनरेगा से भी इन्हें कोई खास मदद नहीं मिली. नोटबंदी की वजह से नकदी संकट ने उन्हें बिल्कुल ही बेज़ार बना डाला, तो इन्होंने पलायन करना शुरू कर दिया. आज इनके लिए महीने में 1000 रुपये भी बचा पाना कूच विहार के दूरस्थ इलाक़े के मुकाबले एक बड़ी पूंजी से कम नहीं.
दिलचस्प है कि जिस महागुन मॉडर्न को बने हुए अभी दो साल भी नहीं हुए हैं, वहां अभी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन नहीं बना है. वहां का मेंटेनेंस एक अमरीकी कंपनी जेएलएल देखती है. रियल सेक्टर में मेंटेनेंस का काम देखने वाली इस अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, कंपनी का प्रसार 16 देशों में है और जिसका कुल वैश्विक व्यापार लगभग 400 अरब रुपये है. ये भारत के 11 बड़े शहरों में अपनी सेवाएं दे रही है. हंगामे से अगर कंपनी के कार्पोरेट हित को नुकसान पहुंचता है तो इसे भारत सरकार अपना नुकसान समझती है क्योंकि विदेशी निवेश के माहौल पर इससे असर पड़ता है. भारत में चाहे जिसकी भी सरकार रही हो, 1992 में शुरू हुए वैश्विकरण के बाद से उसकी नज़र में पूंजी को ‘सुपर मानवाधिकार का दर्ज़ा’ मिल चुका है. ऐसा नहीं है कि इस कंपनी का अंतरविरोध श्रमिकों से है, बल्कि ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कूदने से भारत के छोटे वेंडरों का सूपड़ा साफ़ होना तय है. जैसा कि अब ये जगजाहिर हो चुका है, बहुराष्ट्रीय कंपनी क्लासिकीय पूंजीवाद के स्वतंत्र प्रतियोगिता के नियमों से नहीं चलती हैं, इसलिए उनकी कोशिश होती है मोनोपली यानी एकाधिकार स्थापित करने की.
इतनी बड़ी कंपनी के लिए एक कामगार औरत का ग़ायब हो जाना उतना मायने नहीं रखता जितना कंपनी की छवि का धूमिल हो जाना. शायद इसीलिए कंपनी की ओर से मज़दूरों पर 307 का मुकदमा दर्ज कराया गया हो. नोएडा प्रशासन के लिए विदेशी निवेश हमेशा से सर आंखों पर रहा है, इस घटना ने औद्योगिक अशांति को पैदा किया है इसलिए उसका दमन ज़रूरी है, इसलिए भी वो इन मज़दूरों से लोहे के हाथों से निपट रहा है. पूरा भारतीय गणराज्य पूंजी की तरफ़ खड़ा नज़र आने लगा है: पुलिस, माडिया, अदालत, अथॉरिटी, रेज़िडेंशियल सोसाइटी, सत्ताधारी पार्टी.
लेकिन जहां अंतरराष्ट्रीय पूंजी लगी हो, भारत सरकार की साख़ दांव पर लगी हो और नोएडा प्रशासन को विश्वमानचित्र पर अपनी छाप छोड़ने की चिंता लगी हो, ये बंगाली मज़दूर यहां क्या कर रहे हैं?

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करोड़पतियों को बंगाली मज़दूर ही क्यों चाहिए
महागुन मॉडर्न में जब ये हंगामा बाहर चल रहा था तो फ्लैट मालिकों में भी एक बात को लेकर मतभेद पैदा हो गया था. शायद मीटिंग इसीलिए बुलाई गई क्योंकि सभी एकमत नहीं थे कि इन बंगाली महिला घरेलू कामगारों से बिल्कुल भी काम न लिया जाए. दरअसल इसके पीछे भी मुनाफ़ा और पूंजी का तर्क काम कर रहा था. यहां आम तौर पर न्यूक्लियस फ़ैमिली वाले घरों में हाउस कीपिंग का खर्च अभी पांच हज़ार के आस पास है. ज्यादातर फ्लैट मालिक सर्विस क्लास के हैं यानी उन्हें नव धनाढ्य कहा जा सकता है. कर्ज चुकाने, अन्य खर्चों और बचत की चिंता में उन्हें बंगाली मज़दूर सस्ते पड़ रहे हैं. अगर ये काम किसी हाउस कीपिंग एजेंसी से कराए जाएं तो ये खर्च सीधे दो गुना या तीन गुना तक जा सकता है. कुछ फ्लैट मालिक गुड़गांव की तरह की व्यवस्था चाहते हैं, जहां हाउस कीपिंग सेवा देने वाली एजेंसियों के मार्फत घरेलू कामगार मुहैया कराए जाते हैं और इसका खर्च 20-20 हज़ार तक बैठता है. यूनियन के कार्यकर्ता आलोक कुमार का कहना है कि, ‘बंगाली मज़दूर बाज़ार भाव से सीधे आधे दामों पर काम करते हैं. अगर एजेंसियों की तरफ़ से मेड रखा जाए तो उसकी कुछ शर्तें होती हैं, उसे सर्वेंट क्वार्टर में रखेंगे तो उसके खाने का भी खर्च उठाना पड़ेगा.’
फ्लैट मालिकों का ये अंतरविरोध जेएलएल जैसी बड़ी पूंजी का एक प्रोटोटाइप भर है. बंगाली मज़दूर इसलिए सस्ते में काम कर लेते हैं कि वो अप्रवासी हैं, लोकल नहीं. लोकल उस तरह की स्थितियां सहन नहीं कर सकते जैसा एक माइग्रैंट लेबर कर सकता है. दूसरे ये अप्रवासी मज़दूर उन स्थानीय गांव वालों की कमाई का एक बड़ा ज़रिया हैं, जिनकी ज़मीनें अधिग्रहित कर अट्टालिकाएं तो खड़ी कर दी गईं लेकिन उनके रोज़गार का कोई इंतज़ाम नहीं किया गया. ये गांव वाले इन मज़दूरों को किराए पर कमरे देते हैं, उन्हें राशन देते हैं, इसी वजह से उनकी दुकानें चलती हैं और सबसे बड़ी बात कि, उन मज़दूरों से वे दबदबे के साथ तीन का तेरह वसूल सकते हैं.
इसलिए माइग्रैंट मज़दूर यहां के निचले स्तर की अर्थव्यवस्था की जान भी हैं. वैसे भी ग़रीबी के समंदर के बीच अमरी के ये छोटे छोटे टापू इन्हीं वजहों से चमकते दिखते हैं. हर पॉश कॉलोनी के ईर्द गिर्द झुग्गी झोपड़ी या अम्बेडकर कॉलोनी इसीलिए बसने दी जाती हैं.
महागुन मॉडर्न का मामला इससे अलग नहीं है. घरेलू कामगारों की कितनी फौज यहां काम करती है अगर देखना हो तो सुबह छह बजे महागुन या अंतरिक्ष अपार्टमेंट या ऐसे ही किसी बहुमंजिली रिहाइशी इमारत के सामने खड़े हो जाएं, आप देखेंगे कि फैक्ट्रियों में सुबह आठ बजे जिस तरह लाइन लगा कर मज़दूर अंदर जाते हैं, वही हाल यहां का है. बस फैक्ट्री मज़दूरों की तरह इनके वो अधिकार नहीं हैं, न इनका पीएफ़ कटता है, न मेडिकल की सुविधा होती है और पीरियड्स की छुट्टी, महिला सुरक्षा, रात की ड्यूटी और गर्भधारण जैसी छुट्टिओं की तो यहां कोई सोच भी नहीं सकता.
ऐसा लगता है कि जैसे इस देश में लेबर कैंप बना दिए गए हों. जैसे जैसे अमीरी गरीबी की खाई बढ़ती जाएगी लेबर कैंपों की संख्या भी बढ़ेगी और असंतोष भी. आखिर वो भी इसी आज़ाद भारत के नागरिक हैं और अट्टालिकाओं में रह रहे किसी नागरिक से उनका मानवाधिकार कम नहीं है! रूप रॉय के शब्दों में कहें तो, “यहां हमारे सुख दुख एक हैं, किसी के चेहरे पर नहीं लिखा है कि वो हिंदू है या मुसलमान.”
जब थानाध्यक्ष परशुराम ये सवाल किया गया कि ‘क्या क़ानून की नज़र में शेठी परिवार और ज़ोहरा बीबी में कोई अंतर है?, उनकी भी आवाज़ कांप जाती है.’ पर सच्चाई सभी जानते हैं. एक जेनुईन मुद्दे पर वर्गीय और जातीय नफ़रत को हथियार बना कर सत्ता, शासन और धर्म की राजनीति अपना खेल खेल रही है, पर कब तक!

फैक्ट फाइंडिंग टीम के सदस्य (टीम वहां 16 जुलाई को पहुंची थी. रिपोर्ट 18 जुलाई को बनकर तैयार हुई.)
डॉ सिद्धार्थ, कमलेश कमल, नन्हें लाल और संदीप राउज़ी

बुधवार, 19 जुलाई 2017

सहारनपुर में जातीय हिंसा और उसके निहितार्थ

(अमरपाल)।        2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर हुई में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के दाग अभी धुले भी नहीं थे कि 5 मई की सहारनपुर की जातीय हिंसा ने समाज के कुरूप चेहरे और शासकों की मक्कारी को फिर सामने ला दिया। हिंसा और आगजनी के खूनी खेल की शुरूआत ननौता तहसील
के गाँव शब्बीरपुर से हुई। शब्बीपुर मिश्रित आबादी का गाँव है और जिला मुख्यालय से लगभग 25
किलोमीटर दूर है। गाँव की लगभग आधी आबादी ठाकुरों की है। चौथाई आबादी चमार जाति के दलितों की है और बाकी की चौथाई आबादी में पिछड़ी जातियाँ और मुसलमान हैं। गाँव की अधिकांश जमीन ठाकुरों के पास है। कुछ दलित परिवारों के पास भी जमीन है। गाँव का प्रधान दलित है और उसके पास भी जमीन है। घटना के बारे में आयी रिपोर्टों के अनुसार 5 मई को दलितों पर हुए हमले
की तैयारी पहले से की जा रही थी। 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयन्ती के मौके पर दलित गाँव में जुलूस निकालकर रविदास मन्दिर में अम्बेडकर की मूर्ति की स्थापना करना चाहते थे। गाँव के ठाकुरों को इस पर एतराज होने के चलते पुलिस ने मूर्ति स्थापना रोक दी।
2013 के मुजफ्फरनगर हत्याकाण्ड की तरह ही हिन्दुत्ववादी ताकतों ने दलितों पर कातिलाना हमले की तैयारी भी पहले से कर रखी थी। कवाल पंचायत की तर्ज पर ही, 5 मई को शब्बीरपुर के पड़ोसी गाँव सिमलाना में ठाकुरों ने ‘‘महाराणा प्रताप जयन्ती’’ के अवसर पर पंचायत आयोजित की थी। इस पंचायत में शब्बीरपुर के कुछ ठाकुर भी लाठियों और तलवारों से लैस होकर पहुँचे थे और ठाकुर पक्ष के कुछ बाहरी लोग शब्बीरपुर में भी जुटे थे। 
 गौरतलब है कि इन गाँवों में पिछले कई सालों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाएँ लगती हैं। 5 मई को सुबह 10ः30 बजे मोटरसाइकलों पर सवार ठाकुर समुदाय के युवक डीजे बजाते और नारे लगाते हुए दलित मौहल्ले की ओर बढ़ रहे थे। इस कार्यक्रम की प्रशासन से अनुमति नहीं ली गयी थी। दलितों ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस ने आकर डीजे बन्द करा दिया। इसके बाद ठाकुर युवकों के उत्पाती जत्थे ‘राजपुताना जिन्दाबाद’, ‘महाराणा प्रताप जिन्दाबाद’, ‘अम्बेडकर मुर्दाबाद’ के नारे
लगाते हुए गलियों में घूमने लगे। 40 पुलिस वाले गाँव में मौजूद थे, उन्होंने इन उत्पातियों को रोकने की जहमत नहीं उठायी। दलित मोहल्ले में इसी तरह 2-3 चक्कर लगा लेने के बाद उत्पाती युवाआंे
की इस भीड़ ने प्रधान के परिवार द्वारा पथराव करने का शोर मचाते हुए रविदास मन्दिर पर धावा बोल दिया। रविदास मन्दिर पर हमला सुबह 11 बजे हुआ। मन्दिर में रखी रविदास की मूर्ति को तोड़ने और मन्दिर में आगजनी की कोशिश में एक बाहरी ठाकुर युवक की मौत हो गयी। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के
मुताबिक युवक की मौत दम घुटने से हुई। तुरन्त ही युवक की हत्या का आरोप दलितों के मत्थे मढ़ दिया गया और ठाकुर युवक की दलितों द्वारा हत्या किये जाने की झूठी खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैला दी गयी। पहले से ही सिमलाना में चल रही पंचायत से सैंकड़ों लोग लाठियों, तलवारों से लैस होकर शब्बीरपुर के दलितों पर चढ़ आये। आगजनी करने के लिए किसी ने उन्हें थिनर भी दे दिया। बहुत से दलित पुरुष हमले की सम्भावना से पहले ही घर छोड़कर भाग गये थे, बहुत से खेतों में काम
कर रहे थे। जो पुरुष गाँव में थे, उन पर और महिलाओं पर आफत टूटी। जय श्री राम, हर-हर महादेव, जय राजपुताना, शब्बीरपुर में रहना है तो योगी-योगी कहना है। जैसे नारे लगाते हथियारों से लैस ठाकुरों ने दलितों पर कतिलाना हमला और आगजनी शुरू कर दी। 7 पुरुषों व 5 महिलाओं को गम्भीर चोटों के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ग्राम प्रधान के बेटे को इतना पीटा गया कि उसकी जान बचना मुश्किल है। महाराणा प्रताप के इन ‘बहादुर’ वंशजों ने एक महिला की छाती काटने का भी प्रयास किया। उसके हाथ और सीना बुरी तरह जख्मी हैं और वह भी अस्पताल में पट्टियों में लिपटी पड़ी है और अपनी नवजात बेटी को अपनी घायल छातियों से किसी तरह दूध पिला देती है। चुन-चुन कर दलितों के 55 घरों में आग लगायी गयी। घर के किसी भी समान को साबुत नहीं छोड़ा गया। कपड़ो-लत्तों और सामान को घरों के बीच में रखकर होली जलायी गयी। साइकिलों मोटरसाइकिलों और यहाँ तक कि घर में बँधी गाय-भैंसों को भी आग के हवाले कर दिया गया। पास के महेशपुरा गाँव में भी दलितों की दस दुकानों को जलाया गया। किसी गैर दलित की दुकान को छुआ भी नहीं गया।
घटना के समय शब्बीरपुर में 40 पुलिस वाले तैनात थे, वे सभी मूकदर्शक बने, इत्मीनान से ढाई घण्टे तक चले इस तांड़व का मजा लेते रहे। घरों में आग लगने पर दलितों ने फायर बिग्रेड़ को फोन किया।
गाँव में फायर बिग्रेड़ की गाड़ी आयी तो लेकिन ठाकुरों ने बुग्गी अड़ाकर रास्ता रोक दिया। पुलिस ने रास्ता खुलवाने की भी जहमत नहीं उठायी। घटना की कुछ रिपोर्टों में पुलिस द्वारा भीड़ को उकसाने और जल्दी-जल्दी सब कुछ खत्म करने की बात भी सामने आयी है। पुलिस ने पीडि़तों और हमलावरों, दोनों को एक ही श्रेणी में रखा। 8 मई तक कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिनमें 7 दलित थे। घटना के तीन दिन बाद भी पुलिस ने अस्पतालों में पड़े घायलों का बयान दर्ज करने की जरूरत महसूस नहीं की और न ही सरकार का कोई नुमाइन्दा उनकी खोज-खबर लेने आया। जिला कलेक्टर ने गाँव का दौरा किया और लखनऊ से आये गृहसचिव व डीजीपी जिला मुख्यालय से ही वापस लौट गये। झुलसाती गर्मी में बेघर हो गये परिवारों को सर छुपाने के लिए प्रशासन एक तिरपाल का भी इन्जाम नहीं कर पाया। यहाँ तक कि जिन लोगों ने बाहर से मदद पहुँचाने की कोशिश की उन्हें भी पुलिस ने रोक दिया। तोड़-फोड़ और आगजनी के दौरान  मारे गये ठाकुर युवक के लिए सरकार ने तुरन्त 10 लाख के मुआवजे की घोषणा कर दी। इसके विपरीत जो घायल दलित अस्पतालों
में पड़े थे या जिनके घर जला दिये गये थे उन्हें सरकार ने कोई राहत नहीं दी। एकतरफा हमले, आगजनी और पुलिस, प्रशासन को हमलावरों के पक्ष में खड़े देखकर दलितों के गुस्से का पारा
चढ़ना लाजमी था। इस इलाके में पिछले दो सालों से दलित युवकों के बीच राजनीतिक, सामाजिक काम कर रहे संगठन ‘‘भीम आर्मी’’ की अगुवाई में 9 मई को सहारनपुर के गाँधी मैदान में दलितों ने सभा करने की घोषणा की। इनकी मुख्य माँग थी कि हमले में शामिल ठाकुरों को पुलिस जल्दी गिरफ्तार करे। प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी। इसके बावजूद काफी संख्या में दलित वहाँ पहुँचे। विरोधस्वरूप उन्होंने शहर की कई सड़कें जाम करने की कोशिश की और पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज की। इसके बाद भीड़ भड़क कर पुलिस के साथ सीधे टकराव की मुद्रा में आ गयी। लाठी-ड़ण्डों से लैस युवकों ने पुलिस को निशाना बनाते हुए हमला बोल दिया। पुलिस थाने में आग लगा दी, पुलिस की गाडि़याँ जला दी और जो भी पुलिसवाला उनके हाथ लगा उसे पीटा गया। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया और एक दो निजी वाहनों में भी आग लगायी गयी। अब सरकार इस मामले को लेकर
गम्भीर हो गयी। नाकामयाबी का ठीकरा जिले के दो आला अधिकारियां के सर फोड़कर उनका तबादला कर दिया गया। 
‘‘कानून का राज’’ फिर से कायम करने के के नाम पर भीम आर्मी पर निशाना साधा गया। दलित मोहल्लों, छात्रावासों पर पुलिस ने छापेमारी शुरू कर दी। भीम आर्मी का सम्बन्ध नक्सलियों से होने की जाँच शुरू की गयी। इसके वित्तीय स्रोतों की जाँच की जाने लगी और आई एस आई द्वारा मदद पहुँचाने की सम्भानाओं पर भी विचार किया जाने लगा। इसी दौरान ठाकुरों के बहुत से युवक पूरे इलाके में तलवारें हाथ में लेकर दलितों के बीच खौफ पैदा करते रहे, उन पर हमले करते रहे। दलितों के प्रति भेदभाव और उपेक्षा का शासन, प्रशासन और सरकार का रुख अब दमनकारी और सबक सिखाने
वाला हो गया है। जातीय और धार्मिक भेदभाव की सोच पर तैयार हुई पार्टी के शासन में इससे अलग उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।
सदियों पुरानी सोच से इनसान द्वारा इनसान के शोषण वाली जाति व्यवस्था की सड़ांध हमारे समाज के रेशे-रेशे में भरी हुई है। जाति व्यवस्था का ही कमाल है कि पूरे देश के किसानों की चमड़ी उधेड़ रही सरकार चलाने वाली पार्टी के गुर्गों के हुलसावे में आकर ठाकुर जाति के किसानों के बेटों ने ही दलितों पर हमला किया। जबकि इन्हीं दलितों के साथ आपसी सहयोग से उनका रोजमर्रा का जीवन चलता है। दूसरी ओर, यही जाति व्यवस्था है जिसने आजादी के इतने सालों बाद भी दलितों को हर तरह से दोयम दर्जे का जीवन जीने के लिए मजबूर कर रखा है। क्या कारण है कि पहले ही कबीर, नानक, फूले, अम्बेडकर, पेरियार जैसे पुरोधाओं के जबरदस्त हमलों से वैचारिक शिकस्त खा चुकने के बावजूद जाति व्यवस्था आज तक कायम है। इन कारणों को समझे बगैर हम जाति व्यवस्था और जातिगत हमलों के समूल नाश का सपना नहीं देख सकते। बाबा साहब अम्बेड़कर का कहना था कि आर्थिक बराबरी के बिना सामाजिक और राजनीतिक बराबरी हासिल करना सम्भव नहीं है। आजादी मिलने के बाद देश में पूँजीवादी ढर्रे की सरकार बनी। सरकार ने राजा-रजवाड़ों और सामन्तों की भू-सम्पत्ति को मूलतः खत्म कर दिया।
जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने का भी कानून बना लेकिन पूरे देश में कोई ऐसा भूमि-सुधार नहीं किया गया जिससे समाज के सभी समुदायों के बीच जमीन का एक समान बँटवारा होता। जिन इलाकों में कुछ हद तक भूमि सुधार किया गया, वहाँ भी उच्च और मध्यम जातियांे के बीच ही जमीन बाँटी गयी। दलितों को इसमें वाजिब क्या कारण है कि पहले ही कबीर, नानक, फूले, अम्बेडकर, पेरियार जैसे पुरोधाओं के जबरदस्त हमलों से वैचारिक शिकस्त खा चुकने के बावजूद जाति व्यवस्था आज तक कायम है। इन कारणों को समझे बगैर हम जाति व्यवस्था और जातिगत हमलों के समूल नाश का सपना नहीं देख सकते। भूमि सुधार की असलियत यह थी कि देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 1.5 प्रतिशत का ही बँटवारा किया गया। इससे ऊपरी तौर पर तो सामन्त शाही खत्म हो गयी लेकिन छोटे स्तर पर पूरे समाज में उसका वजूद कायम रहा। आर्थिक आधार मौजूद रहने के चलते जीवन के हर क्षेत्रा में सामन्ती सोच बनी रही। दलितों से थोड़ी ही बेहतर स्थिति वाली जिन मध्यम जातियों को जमीन मिली उनका सामाजिक और आर्थिक उत्थान तेजी से हुआ और जल्दी ही वे सवर्ण जातियों की
तरह अपने-अपने क्षेत्रों की प्रभुत्वशाली जाति बन गयी। देश के नाममात्रा के औद्योगिकीकरण
में थोड़े से दलितों को स्थान मिला, बाकी विशाल दलित आबादी गाँव में खेती के ही भरोसे थी। नतीजतन दलितों का सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण लगभग ज्यों-ज्यों का त्यों-त्यों बना रहा।
सामाजिक बराबरी लाने के नाम पर आरक्षण का जो झुनझुना दलितों के हाथ में थमाया गया था वह भी जाति व्यवस्था पर कोई कारगर चोट नहीं कर पाया। आरक्षण पर तमाम हो-हल्ले के बावजूद सच्चाई यह है कि सरकारी नौकरियों में दलितों की हिस्सेदारी मात्रा 0.8 प्रतिशत है। इस नाम मात्रा की हिस्सेदारी का वितंडा खड़ा करके सवर्ण जातियों के दिमाग में यह बात बैठा दी गयी कि उन्हें नौकरी न मिलने का कारण आरक्षण है। इससे लाभ पाये मुट्ठी भर दलित भी शासक वर्गों के साथ जाकर
मिल गये, क्योंकि अब उनका हित भी शासकों के हित से जुड़ गया था उनका वर्ग चरित्र बदल गया और वे कोई क्रान्तिकारी जाति विरोधी आन्दोलन खड़ा करने लायक ही नहीं रहे। ले देकर अस्मितावादी दलित विमर्श के लायक ही बचे। दलित राजनीति के नाम पर जो लोग सत्ता के गलियारों तक पहुँचे, उनका हाल भी कमोबेश ऐसा ही रहा। लेकिन उनके अभियानों से अस्मिता को लेकर,
थोड़ी ही सही, जागृती आयी। कुल मिलाकर आजादी के बाद बने कानूनों और जातीय दमन विरोधी आन्दोलनों से जाति व्यवस्था पर कुछ ऊपरी चोट तो हुई, लेकिन उसके आधार को कोई नुकसान नहीं पहुँचा, इसके उलट इसने कई तरीकों से जाति व्यवस्था को मजबूत भी किया। जिस पूँजीवादी तौर-तरीके की सरकार आजादी के बाद बनी थी, 1990 तक आते-आते उसका अन्त हो गया और देश की व्यवस्था को नवउदारवादी सिद्धान्तों के अनुसार ढाला गया। इसने शासकों के सामने जातिवादी व्यवस्था और सामन्ती सोच को अपने अनुरूप ढालने की जरूरत पैदा की। उदारवाद की नीतियों ने देश की अर्थव्यवस्था को इस तरह से ढाला कि आबादी के बड़े हिस्से की आय में गिरावट आयी और जीवन लागत महँगी हुई। इस सब का एक प्रमुख मकसद देशी-विदेशी निवेशकों को सस्ते से सस्ते मजदूर उपलब्ध कराना था। सरकार की ओर से जनता को मिलने वाली सुविधाओं और सब्सिडी में कटौती की गयी। शिक्षा, इलाज, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सेवाओं का निजीकरण करके उन्हें मुनाफा कमाने का धन्धा बनाया गया। मजदूरों के हितों की सुरक्षा के लिए बनाये गये श्रम कानूनों को पलटकर पूँजीपतियों के हित में कर दिया गया। इन सभी बदलावों का असर देश की सर्वाधिक गरीब जनता पर सबसे ज्यादा पड़ना तय था। जातीय अनुपात के हिसाब से सर्वाधिक गरीब आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है। उदारवाद की नीतियों से इन जातियों की जीविका के सीमित साधन तबाह हो गये और इनके बीच भारी सख्या में कंगालीकरण हुआ।
उदारवाद से आर्थिक जीवन में होने वाली तबाही से उत्पन्न जनता के गुस्से को थोड़ा कम करने के लिए बीच-बीच में वृद्धावस्था पेंशन, मिड डे मील, 2 रुपये किलो अनाज जैसी भिखमंगई वाली या मनरेगा जैसी सजावटी योजनाएँ भी चलायी गयी। व्यवस्था में नख से शिख तक व्यापत भ्रष्टाचार और जनता के दब्बू चरित्रा के चलते, तबाह हो चुकी जीविकाओं पर इन नीतियों से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। धन्धा
बन चुके मीडिया द्वारा इन नीतियों का ढिंढोरा ऐसा पीटा गया जैसे गरीब काहिल हैं और सारी सरकारी आय को खाये जा रहे हैं। आबादी के थोड़ी बेहतर स्थिति वाले हिस्से की जीविका में हो रहे क्षरण के लिए भी घुमा-फिराकर इन्हीं योजनाओं को जिम्मेदार ठहराया गया। जातीय संरचना वाले हमारे समाज में जातियों के बीच टकराव बढ़ा और उदारवाद जनता के सीधे निशाने पर आने से बच गया। यह कांग्रेस की नीति थी। भाजपा की नीति इससे भी कहीं ज्यादा खतरनाक है। इसने कांग्रेस की नीतियों के बजाय समाज के सबसे सड़े हुए धर्मान्धता, जातिवाद, अतीत का महिमामंडन, अंधविश्वास, कर्मकाण्ड जैसे मूल्यों को योजनाबद्ध ढंग से बढ़ावा दिया। यह अंग्रेजी राज के उसूलों और ढाँचे परखड़ी, सामन्ती मूल्यों से ग्रस्त नौकरशाही, सेना, पुलिस के दम पर हर तरह के विरोध को लाठी-गोली के दम पर दबा देने या उसे देशद्रोही, समाजद्रोही साबित करने की नीति पर अमल करती है। इससे रोज-ब-रोज नये-नये टकराव खड़े हो रहे हैं और उनकी आड़ में उदारवादी लूट धड़ल्ले से जारी है।
सहारनपुर की जातीय हिंसा इन्हीं नीतियों का परिणाम है, जहाँ भाजपा सरकार की नीतियों से लुट रहे ठाकुर किसानों के लड़के उसी सरकार का महिमा मंडन करते हुए दलितों को मार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं। सच्चाई यह है कि जाति की समस्या केवल सामाजिक समस्या नहीं है। इसलिए इसका समाधान केवल सामाजिक आन्दोलनों या संघर्षों से नहीं हो सकता। यह एक आर्थिक-सामाजिक समस्या है और भारतीय समाज के आर्थिक और सामाजिक जीवन की रग-रग इससे विषाक्त है। सम्पत्ति और जीविका के साधनों के न्यायपूर्ण बँटवारे और उसके साथ-साथ सामाजिक आन्दोलनों
का अटूट सिलसिला शुरू किये बगैर जातिवाद का समूल नाश सम्भव नहीं है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

भगत सिंह की फाँसी : सच और झूठ

शहीदे आजम भगतसिंह को फाँसी कब दी गई,क्यों दी गई ?

उनकी विचारधारा क्या थी ऐसी ढेर सारी बातें उनलोगों को नहीं मालूम जिन्हें यह पता है कि महात्मा गांधी चाहते तो भगतसिंह की फाँसी रुक सकती थी लेकिन उन्होंने नहीं चाहा।
यह एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि किन तत्वों ने इन गलत बातों को प्रचारित और प्रसारित किया?
अंग्रेजी हुक्मरानों को भी अपने इस षड्यंत्र के  सफलता की इतनी उम्मीद नहीं थी ,सत्तर सालों बाद भी उनके द्वारा रोपा गया विषवेल फलफूल रहा है।

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी किताब  "भारत का स्वाधीनता संघर्ष" में लिखा है--"महात्मा जी ने भगत सिंह को फाँसी से  बचाने की पूरी कोशिश की।अंग्रेजों को गुप्तचर एजेंसियों से पता चला कि यदि भगतसिंह को फांसी दे दी जाये और उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा ,अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जायेंगे।इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा।

पर शुक्र है उससमय भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन पर उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया।
यह सच है कि अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति -भगतसिंह की सजा कम करने के लिए कहने वाले गांधी जी की बात यदि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मान ली गई होती तो इसका सबसे अधिक लाभ गांधी जी का होता ,उनकी अहिंसा की विजय होती।"
अंग्रेजों की यह साजिश थी कि ऐसी रणनीति बनाई जाये कि अवाम को ऐसा लगे महात्मा के अपील पर फाँसी रुक जायेगी,महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगतसिंह की फाँसी रोक दी जाये। लेकिन अचानक समय से पहले ही करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना।

♂♂ भगतसिंह स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था - मेरा बहुत बहुत आभार पँ नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा ,जिन्होंने हमारी फाँसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किया।

♂♂ इतना ही नहीं भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे--आप सबों से आपलोगों को अपने जेनरल महात्माजी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देनी चाहिए।सिर्फ तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे।

इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था।पँ नेहरू ,पटेल,मालवीय जी के आँखों से आंसू गिर रहे थे।
◆◆◆◆◆◆◆
वैसे एक सवाल हम भी पूछ लेते हैं - जब भगत सिंह को फाँसी हो रही थी तो हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर, मुंजे उसे रुकवाने के लिए क्या कर रहे थे? जवाब ज़ाहिर तौर पर यही है कि कुछ नहीं। तो उस समय शाखा खेलकर पूड़ी सब्ज़ी खाकर सो रहे संघी आज किस मुंह सर्टिफिकेट बांट रहे हैं?

#राष्ट्रीयसत्यशोधकसमाज_RSS
#InDefenceOfDemocracy
(अभिनव जी की तरफ से व्हाट्स ऐप पर साझा पोस्ट)

कृषि संकट का गोलियों से समाधान!

अगर अंग्रेजों का राज होता तो खबर कुछ ऐसे लिखी जाती, ”अंग्रेज सरकार ने भारत के 6 किसानों की गोली मरवाकर हत्या कर दी।“ फिर देशभक्त अखबारों का आह्नान होता, ”ऐसी लुटेरी और अत्याचारी सरकार के खिलाफ भारतवासी एकजुट हो!“ दरअसल ऐसी कोई भी खबर अखबारों में नहीं है। खबर यह आयी कि गोली लगने से मध्य प्रदेश के 6 किसान मारे गये। मंदसौर या मध्य प्रदेश के किसान ही नहीं देशभर में अलग-अलग जगहों
के किसान आज आन्दोलन कर रहे हैं। वे शौक के चलते आन्दोलन नहीं कर रहे हैं और न ही किसी उन्माद के चलते पुलिस की गोली खा रहे हैं। उनकी जिन्दगी नारकीय बन गयी है। एक महीना गाँव के किसी मध्यम या गरीब किसान के घर रुककर
देख लीजिए। आपको पता चल जाएगा कि किसानों की जिन्दगी कैसे गुजर रही है। खेती की लागत आसमान छू रही है और फसल का दाम धराशाही हो गया है। मंदसौर के किसान फसल के वाजिब
दाम और कर्ज माफी के लिए आन्दोलन कर रहे थे। इस सिलसिले में किसानों ने सरकार के सामने 32 सूत्राीय माँग रखी थी। इसमें प्रमुख माँगें इस तरह हैं-- 1. मध्य प्रदेश की सरकार ने एक कानून
बनाकर किसानों की जमीन हथियाने का नायाब तरीका निकाला है, इस कानून में जमीन लेने के बदले मुआवजा देने की धारा 34 को हटा दिया गया है और भूमि अधिग्रहण के विरोध में किसानों के
अदालत जाने का अधिकार छीन लिया गया है। इस कानून को रद्द कराना किसानों की पहली मागँ है।  2. किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को भी लागू कराना चाह रहे हैं जो भाजपा के चुनावी
वादों में से एक रहा है। इनमें एक बिन्दु यह भी है कि सरकार किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाएँगी।
3. आन्दालन में जिन किसानों के  खिलाफ कसे दर्ज  है उन्हे वापस लिया जाए। 4. किसानों को कर्ज  के मकडज़ाल से म्क्ुक्त किया जाए। यानी सरकार किसान का कर्ज  माफ करे। 5. सरकार डये री के
माध्यम से जो दूध खरीदती है, उसके दाम बढ़ाये जाएँ। कोई भी न्यायप्रिय इनसान किसानों की इन माँगों के साथ खड़ा होगा।  ये माँग किसानों की तात्कालिक समस्याओं से सम्बन्धित हैं लेकिन खेती-किसानी का संकट इससे कहीं गहरा है और देश के आर्थिक ढाँचे के संकट से जुड़ा है। यह उन नीतियों का नतीजा है जिन्हें सरकार अन्धाधुन्ध लागू करती जा रही है। लेकिन यह कैसी सरकार है जो मुसीबत के मारे किसानों को तात्कालिक राहत देने के बजाय उनके खून से अपनी सत्ता की कुर्सी चमका रही है।
जिस समय अपनी माँगों को लेकर किसान आन्दोलन कर रहे थे उस दौरान सरकार की ओर से कार्रवाई के नाम पर किसानसंगठनों के नेताओं को बरगलाने और आन्दोलन को तोड़ने का काम जारी था। लाख कोशिशों के बावजूद सरकार आन्दोलन को तोड़ने में कामयाब न हो सकी। 5 जून को मंदसौर-नीमच रोड पर हजारों किसानों ने चक्का जाम कर दिया। अराजक तत्त्वों ने कई गाडि़यों को आग के हवाले कर दिया और पत्थरबाजी की। अपनी नाकामी छिपाने के लिए खुद को किसान-हितैषी कहने वाली सरकार ने निहत्थे आन्दोलनकारियों पर गोलियाँ बरसायी और 6 किसानों की हत्या कर दी। सरकार गोलियों के सहारे किसानों की समस्या का समाधान कर रही है। दूसरी ओर मुख्यमंत्राी कहते हैं कि ”चर्चा के माध्यम से हर समस्या के हल के लिए हमेशा तैयार हूँ... हमारी सरकार किसानों के साथ हमेशा खड़ी है।“ और किस तरह खड़ी है, यह सबके सामने आ चुका है। अब मध्य प्रदेश के गृहमंत्राी और मंदसौर के डीएम प्रशासन के इस कुकृत्य से अपना पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं। वे कह रहे हैं कि सरकार ने गोली
चलाने का आदेश नहीं दिया था। फिर क्या पुलिस के सिपाहियों की किसानों से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी थी, जो उन्होंने बिना उकसावे के निहत्थे किसानों पर गोली चलायी। गोलीकांड के बाद देशभर में हो रही बदनामी के डर से आनन-फानन में मुख्यमंत्राी शिवराज सिंह पंडाल सजाकर अनशन पर भी बैठ गये। भाजपा हमेशा गाँधीवादी रास्ते के खिलाफ रही है। फिर ऐसा क्या हो गया जो एक भाजपाई मुख्यमंत्राी को गाँधीवाद का ढोंग और दिखावा करने पर मजबूर होना पड़ा? एक तरफ उनकी सरकार
किसानों पर गोलियाँ बरसा रही है और तमाम भाड़े के कलमघसीट पत्रकार मृतकों के बारे में, यह कहकर उनके किसान होने पर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि उन्होंने जींस पहनी हुई थी। मुख्वायमंत्री का ढोंग करने को तो तैयार है लेकिन यह सोचने को तैयार नहीं कि किसानों की इतनी दुर्दशा क्यों हो रही
है? अमन-चैन से खेती करके जीवन-यापन करने वाला किसान क्यों आन्दोलन के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है? अगर मुख्यमंत्री उपवास करने के बजाय इन सवालों के जवाब ढूँढ़ते और अपने
चुनावी घोषणापत्रा पर अमल करके किसानों का कुछ भला कर पाते तो बेहतर होता। लेकिन वे बखूबी जानते हैं कि उनकी सरकार जिन नीतियों को लागू करके किसानों को तबाह कर रही है, उसे
पलटना उनके बूते के बाहर की चीज है। ये नीतियाँ विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष के आगे सरकार के 2 देश-विदेश जुलाई 2017 उस निर्लज्ज समर्पण का नतीजा है जो इन अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं ने दशकों पहले देश के शासकों के साथ दुरभिसन्धि करके शुरू
करवायी थी। भाजपा उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ा रही है। अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के दबाव के चलते ही किसानों की सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया। खेती को दैत्याकार देशी-विदेशी पूँजीपतियों के हवाले कर दिया गया। अब किसान अपने परम्परागत बीज से खेती नहीं कर सकते। उन्हें मजबूरन ड्यूपोंट, मोनसेंटो और करगिल जैसी कम्पनियों के महँगे बीज बोनेपड़ रहे हैं क्योंकि बीज बाजार पर इन कम्पनियों का दबदबा है। इसी तरह बाएर क्रॉप साइंस, मोनसेंटो, एक्सेल क्रॉप केयर और
भारत रसायन जैसी 20 कम्पनियाँ कीटनाशकों के बाजार पर काबिज हैं जो मनमानी कीमत पर अपने उत्पाद किसानों कोबेचती हैं। दूसरी और अपनी उपज का दाम उन्हें नहीं मिलता इस तरह खेती की लागत और कृषि जिंस के दाम दोनों मामलों में
किसानों को लूटा जा रहा है। जिसके चलते खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है।
मध्यम और गरीब किसान घाटे के चलते खेती छोड़ने को मजबूर हैं। पिछले 25 सालों से औसतन हर रोज 2052 किसानखेती छोड़ देते हैं और शहरों में रिक्शा चलाने या मजदूरी करने जाते
हैं। किसानों की तबाही के पीछे मुख्य तौर पर सरकार की वे नीतियाँ जिम्मेदार हैं जो कृषि क्षेत्रा की कम्पनियों को सीधे लाभ पहुँचाती हैं।
न्यूनतम समर्थन मूल्य के लगातार गिरते जाने से भी
किसानों को अपनी फसल का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। देश के सबसे बड़े प्याज उत्पादक क्षेत्रा नासिक और मंदसौर के किसान 2-3 रुपये किलो प्याज बेच रहे  हैं जबकि विभिन्न शहरों
में उपभोक्ता को 15-20 रुपये किलो प्याज मिल रहा है। इतना भारी अन्तर क्यों है? भाजपा ने 2014 के चुनाव में 50 प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया था। लेकिन 21 फरवरी 2015 को सरकार ने न्यायालय में शपथपत्रा दे कर बताया
कि 50 प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना सम्भव नहीं है। किसानों का आलू जब खेत से बाजार में पहुँचता है तो उसे मुश्किल से 1-2 रुपये किलो का दाम मिलता है, जबकि आलू से
चिप्स बनाकर बेचने वाली ‘लहर’ ब्रांड की पेप्सिको कम्पनी चिप्स को 200 रुपये किलो से भी ऊँचे दाम पर बेचती है। बात साफ है सरकार और इन कम्पनियों की साँठ-गाँठ के चलते न्यूनतम
समर्थन मूल्य मजाक बनकर रह गया है। इसी के चलते किसान सीधे-सीधे बिचौलिया कम्पनियों के शिकंजे में फँस गये हैं। इन कम्पनियों का खरीद बाजार पर पूरा कब्जा हो गया है। उत्पादन
के समय ये फसलों के दाम गिरा देती हैं और किसानों से फसल औने-पौने दाम में खरीद लेती हैं।
कृषि एक दुश्चक्र में फँस चुकी है। कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र का देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान घटकर 12 फीसदी से कम रह गया है। तबाह किसान खेती को जारी रखने और अगली फसल के
लिए कर्ज लेता है। बैंकों की व्यवस्था ऐसी है कि धनी किसान को अधिक कर्ज मिल जाता है, जबकि उनकी जिन्दगी पहले से ही खुशहाल है। वहीं मध्यम और गरीब किसान को कम कर्ज मिल
पाता है। इसके चलते मध्यम और गरीब किसान गाँव के ही साहूकारों से ऊँची ब्याजदर पर कर्ज लेता है। किसी सूदखोर द्वारा वसूले जाने वाली ब्याज की दर 3 से 5 प्रतिशत मासिक होती है, यानी 2-3 साल में उधार की रकम दुगुनी हो जाती है। यहीं से
मध्यम और गरीब किसानों की बर्बादी शुरू हो जाती है। वे कर्ज के मकड़जाल में बुरी तरह उलझ जाते हैं। अगर सरकार इन किसानों का बैंक कर्ज माफ कर दे तो उन्हें कुछ हद तक राहत मिल सकती है। हालाँकि किसानों के ऊपर बैंक से कई गुना
अधिक कर्ज साहूकारों का है। इसके चलते किसान तेजी से कंगाल हो रहे हैं। हर घंटे दो किसान आत्महत्या करते हैं और पिछले 15
सालों में 2.30 लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अपने हालातों से आजिज आकर किसान छोटे-बड़े सैकड़ों आन्दोलन में शिरकत कर रहे हैं और कुछ जगहों पर उनका आन्दोलन उग्र होता जा रहा है। आन्दोलन को दबाने के लिए
पुलिस किसानों पर बर्बर कार्रवाई कर रही है। कृषि क्षेत्र की ऐसी दयनीय दशा खेती को हाशिये पर डालने का नतीजा है। यह चीज  किसान-विरोधी उन नीतियों की परिचायक है, जिन्हें हमारे देश के
शासकों ने आजादी के बाद लागू किया और आर्थिक सुधारों के बाद जिन्हें और परवान चढ़ाया। इन्हीं नीतियों के चलते वे खाद, बीज और कीटनाशक की उन कम्पनियों के पाले में खड़े हैं, जो रात-दिन किसानों को लूटकर कंगाल बना रही हैं। इन्हीं नीतियों के चलते वे चीनी मिल, आटा मिल और अन्य कृषि माल उत्पादक और वितरक कम्पनियों के पाले में खड़े हैं जो आपस में साँठ-गाँठ करके किसानों की फसलों को औने-पौने दामों में खरीद लेती हैं। किसान इन दोनों तरह की कम्पनियों की लूट के पाटों में पिस रहा है और उसकी जिन्दगी तबाह हो रही है। हमारे देश के इन शासकों ने अंग्रेजों को भी मात दे दी है। ऐसा नहीं है कि किसान इन बातों को समझता नहीं। वह समझता है और बहुत अच्छी तरह से समझता है। इसी के चलते न केवल
मध्य प्रदेश बल्कि महाराष्ट्र सहित देश के कई अन्य जगहों के किसान आन्दोलन कर रहे हैं। महाराष्ट्र के किसान सम्पूर्ण कर्ज माफी की माँग और सरकार की किसान-विरोधी नीतियों के खिलाफ माल रोको आन्दोलन चला रहे हैं। किसानों ने सड़कों पर
सब्जियाँ और दूध बिखेरकर प्रदर्शन किया। मुख्यमंत्राी से बातचीत का भी कोई नतीजा नहीं निकला। वहाँ भी आन्दोलन उग्र होता जा रहा है। इसके चलते नासिक में धारा 144 लगा दी गयी। वहीं उत्तर प्रदेश में सरकार ने कर्जमाफी का शिगूफा छोड़ा था, वह जमीन पर कहीं नजर नहीं आ रहा है। किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। समय रहते अगर सरकार नहीं चेतती तो किसानों का
आन्दोलन आग की तरह फैलते देर नहीं लगेगी।
इंदौर में जनता के बीच तनाव किस कदर बढ़ गया है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंसा के दूसरे दिन इंदौर पुलिस ने हाइवे पर 1100 पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया। इसी बीच किसानों को समझाने गये एसपी और कलेक्टर
को पीट दिया गया। यह एक ऐसी चीज है जो न केवल सरकार को सोचने पर मजबूर कर रही है बल्कि उन स्वयं-भू बुद्धिजीवियों के माथे पर भी बल डाल रही जो यह कहते नहीं थकते कि हमारे
देश के किसान एकजुट होने और संघर्ष करके अपनी स्थिति बदलने में असमर्थ हैं। किसान आज जिस विकट स्थिति का सामना कर रहे हैं उसमें उनके आगे आत्महत्या करने या जुझारू संघर्ष करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। देशभर में किसानों का आन्दोलन जारी है और यह बढ़ता ही जाएगा तथा इससे व्यवस्था पर जरूर फर्क पड़ेगा। लेकिन ऐसे संघर्ष परिवर्तनकामी संगठन और पार्टी के अभाव में क्या इतने कारगर हो पाएँगे कि इस
अन्यायपूर्ण व्यवस्था का कोई विकल्प प्रस्तुत करें, कहना कठिन है। जनता के सैकड़ों आन्दोलन और उसकी हजारों कुरबानियाँ तात्कालिक रूप से थोड़ी राहत तो दिला सकती हैं लेकिन इससे कोई आमूल-चूल परिवर्तन सम्भव नहीं। खेती का अलाभकारी हो जाना और किसानों का कर्ज के जाल में फँसकर आत्महत्या करने को विवश होना खेती की उन
समस्याओं का ही अनिवार्य परिणाम है जिनसे यह आजादी के बाद से आज तक ग्रस्त रही है। पहले हरित क्रान्ति और बाद में नवउदारवादी सुधारों ने इन समस्याओं को बेहद तीखा बनाया है। कर्जमाफी किसानों को कुछ फौरी राहत तो दे सकती है लेकिन
खेती की बुनियादी समस्याओं पर कोई चोट नहीं कर सकती। भारतीय कृषि की समस्याओं पर स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में मुख्य जोर भूमि सुधार पर दिया था। क्या आज कोई भी राजनीतिक पार्टी या किसान नेता भूमि सुधार की माँग करने को तैयार है? भारत में खेती की समस्या के समाधान का रास्ता नवउदारवादी नीतियों को पूर्णतः खारिज करने से शुरू होकर क्रान्तिकारी भूमि
सुधार तक जाता है। इन समस्याओं के चरणबद्ध समाधान और किसान आन्दोलन को निर्णायक जीत तक ले जाने की शुरूआत किसानों को देशी-विदेशी कम्पनियों की लूट, राजनीतिक पार्टियों की धूर्तता, सरकार की किसान विरोधी नीतियों और खेती-किसानी की राजनीतिक-आर्थिक बारीकियों के बारे में चेतना सम्पन्न करके तथा उन्हें सच्चे जनसंगठनों में गोलबन्द करके ही होगी।
(देश-विदेश पत्रिका के जुलाई 2017 अंक का संपादकीय)

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

इजरायली गोलीबारी में दो युवकों की मौत

आजकल पूरी दुनिया में अपने हकों के लिए लड़ने वाले लोगों की आवाज मीडिया में नक्कारखाने में तूती ही साबित हो रही है। इजरायल के मामले में भी अमेरिका परस्त मीडिया कुछ ऐसी ही भूमिका निभा रहा है। वहां आए दिन इजरायली कब्जे वाले इलाके से इजरायली सैनिक फिलिस्तीन के कसबों पर गोलीबारी कर लोगों की जान लेते रहते हैं, लेकिन ये खबरें मीडिया की कभी सुर्खियां नहीं बनती हैं। अभी पिछले दिनों भी इजरायली सैनिकों ने फिलिस्तीन में भयंकर गोलाबारी की जिसमें दो युवकों की जान चली गई। इजरायल ने इन इलाकों में लोगों की जान लेने के लिए बाकायदे स्नाइपल शूटर्स तैनात कर रखे हैं, जिनकी हर गोली पर किसी की जान ले लेती है या अपाहिज बना देती है।
अमेरिकी के पश्चिम एशिया मामलों के राजदूत जेसन ग्रीनब्लैट और इजरायल में राजदूत फ्रीडमैन पिछले दिनों जिस समय रामल्ला में फिलिस्तीनी शासकों के साथ मुलाकात कर रहे थे, इजरायली कब्जे वाले इलाकों में तैनात उसकी सेना जेनिन में गोले बरसा रही थी। इस बार फिर इजरायली सैनिकों ने गोलीबारी में 17 साल के युवक सलामेह और 20 साल के साद सलाह की जान ले ली, जबकि स्नाइपर शॉट में (निशाना लगाकर गोली मारना) 13 साल की जेरूसलम की किशोरी नूर हमदान को अपनी आंख गंवानी पड़ी। इसी दिन ‌इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने संसद में एक ऐसा बिल पेश किया, जिसके लागू होने से इजरायली अपने देश के नागरिक से ज्यादा यहूदी हो जाएंगे। इसके बाद फिलिस्तीनियों के साथ इजरायल के टकराव और बढ़ने तय हैं।