बुधवार, 19 जुलाई 2017

सहारनपुर में जातीय हिंसा और उसके निहितार्थ

(अमरपाल)।        2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर हुई में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के दाग अभी धुले भी नहीं थे कि 5 मई की सहारनपुर की जातीय हिंसा ने समाज के कुरूप चेहरे और शासकों की मक्कारी को फिर सामने ला दिया। हिंसा और आगजनी के खूनी खेल की शुरूआत ननौता तहसील
के गाँव शब्बीरपुर से हुई। शब्बीपुर मिश्रित आबादी का गाँव है और जिला मुख्यालय से लगभग 25
किलोमीटर दूर है। गाँव की लगभग आधी आबादी ठाकुरों की है। चौथाई आबादी चमार जाति के दलितों की है और बाकी की चौथाई आबादी में पिछड़ी जातियाँ और मुसलमान हैं। गाँव की अधिकांश जमीन ठाकुरों के पास है। कुछ दलित परिवारों के पास भी जमीन है। गाँव का प्रधान दलित है और उसके पास भी जमीन है। घटना के बारे में आयी रिपोर्टों के अनुसार 5 मई को दलितों पर हुए हमले
की तैयारी पहले से की जा रही थी। 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयन्ती के मौके पर दलित गाँव में जुलूस निकालकर रविदास मन्दिर में अम्बेडकर की मूर्ति की स्थापना करना चाहते थे। गाँव के ठाकुरों को इस पर एतराज होने के चलते पुलिस ने मूर्ति स्थापना रोक दी।
2013 के मुजफ्फरनगर हत्याकाण्ड की तरह ही हिन्दुत्ववादी ताकतों ने दलितों पर कातिलाना हमले की तैयारी भी पहले से कर रखी थी। कवाल पंचायत की तर्ज पर ही, 5 मई को शब्बीरपुर के पड़ोसी गाँव सिमलाना में ठाकुरों ने ‘‘महाराणा प्रताप जयन्ती’’ के अवसर पर पंचायत आयोजित की थी। इस पंचायत में शब्बीरपुर के कुछ ठाकुर भी लाठियों और तलवारों से लैस होकर पहुँचे थे और ठाकुर पक्ष के कुछ बाहरी लोग शब्बीरपुर में भी जुटे थे। 
 गौरतलब है कि इन गाँवों में पिछले कई सालों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाएँ लगती हैं। 5 मई को सुबह 10ः30 बजे मोटरसाइकलों पर सवार ठाकुर समुदाय के युवक डीजे बजाते और नारे लगाते हुए दलित मौहल्ले की ओर बढ़ रहे थे। इस कार्यक्रम की प्रशासन से अनुमति नहीं ली गयी थी। दलितों ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस ने आकर डीजे बन्द करा दिया। इसके बाद ठाकुर युवकों के उत्पाती जत्थे ‘राजपुताना जिन्दाबाद’, ‘महाराणा प्रताप जिन्दाबाद’, ‘अम्बेडकर मुर्दाबाद’ के नारे
लगाते हुए गलियों में घूमने लगे। 40 पुलिस वाले गाँव में मौजूद थे, उन्होंने इन उत्पातियों को रोकने की जहमत नहीं उठायी। दलित मोहल्ले में इसी तरह 2-3 चक्कर लगा लेने के बाद उत्पाती युवाआंे
की इस भीड़ ने प्रधान के परिवार द्वारा पथराव करने का शोर मचाते हुए रविदास मन्दिर पर धावा बोल दिया। रविदास मन्दिर पर हमला सुबह 11 बजे हुआ। मन्दिर में रखी रविदास की मूर्ति को तोड़ने और मन्दिर में आगजनी की कोशिश में एक बाहरी ठाकुर युवक की मौत हो गयी। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के
मुताबिक युवक की मौत दम घुटने से हुई। तुरन्त ही युवक की हत्या का आरोप दलितों के मत्थे मढ़ दिया गया और ठाकुर युवक की दलितों द्वारा हत्या किये जाने की झूठी खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैला दी गयी। पहले से ही सिमलाना में चल रही पंचायत से सैंकड़ों लोग लाठियों, तलवारों से लैस होकर शब्बीरपुर के दलितों पर चढ़ आये। आगजनी करने के लिए किसी ने उन्हें थिनर भी दे दिया। बहुत से दलित पुरुष हमले की सम्भावना से पहले ही घर छोड़कर भाग गये थे, बहुत से खेतों में काम
कर रहे थे। जो पुरुष गाँव में थे, उन पर और महिलाओं पर आफत टूटी। जय श्री राम, हर-हर महादेव, जय राजपुताना, शब्बीरपुर में रहना है तो योगी-योगी कहना है। जैसे नारे लगाते हथियारों से लैस ठाकुरों ने दलितों पर कतिलाना हमला और आगजनी शुरू कर दी। 7 पुरुषों व 5 महिलाओं को गम्भीर चोटों के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ग्राम प्रधान के बेटे को इतना पीटा गया कि उसकी जान बचना मुश्किल है। महाराणा प्रताप के इन ‘बहादुर’ वंशजों ने एक महिला की छाती काटने का भी प्रयास किया। उसके हाथ और सीना बुरी तरह जख्मी हैं और वह भी अस्पताल में पट्टियों में लिपटी पड़ी है और अपनी नवजात बेटी को अपनी घायल छातियों से किसी तरह दूध पिला देती है। चुन-चुन कर दलितों के 55 घरों में आग लगायी गयी। घर के किसी भी समान को साबुत नहीं छोड़ा गया। कपड़ो-लत्तों और सामान को घरों के बीच में रखकर होली जलायी गयी। साइकिलों मोटरसाइकिलों और यहाँ तक कि घर में बँधी गाय-भैंसों को भी आग के हवाले कर दिया गया। पास के महेशपुरा गाँव में भी दलितों की दस दुकानों को जलाया गया। किसी गैर दलित की दुकान को छुआ भी नहीं गया।
घटना के समय शब्बीरपुर में 40 पुलिस वाले तैनात थे, वे सभी मूकदर्शक बने, इत्मीनान से ढाई घण्टे तक चले इस तांड़व का मजा लेते रहे। घरों में आग लगने पर दलितों ने फायर बिग्रेड़ को फोन किया।
गाँव में फायर बिग्रेड़ की गाड़ी आयी तो लेकिन ठाकुरों ने बुग्गी अड़ाकर रास्ता रोक दिया। पुलिस ने रास्ता खुलवाने की भी जहमत नहीं उठायी। घटना की कुछ रिपोर्टों में पुलिस द्वारा भीड़ को उकसाने और जल्दी-जल्दी सब कुछ खत्म करने की बात भी सामने आयी है। पुलिस ने पीडि़तों और हमलावरों, दोनों को एक ही श्रेणी में रखा। 8 मई तक कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिनमें 7 दलित थे। घटना के तीन दिन बाद भी पुलिस ने अस्पतालों में पड़े घायलों का बयान दर्ज करने की जरूरत महसूस नहीं की और न ही सरकार का कोई नुमाइन्दा उनकी खोज-खबर लेने आया। जिला कलेक्टर ने गाँव का दौरा किया और लखनऊ से आये गृहसचिव व डीजीपी जिला मुख्यालय से ही वापस लौट गये। झुलसाती गर्मी में बेघर हो गये परिवारों को सर छुपाने के लिए प्रशासन एक तिरपाल का भी इन्जाम नहीं कर पाया। यहाँ तक कि जिन लोगों ने बाहर से मदद पहुँचाने की कोशिश की उन्हें भी पुलिस ने रोक दिया। तोड़-फोड़ और आगजनी के दौरान  मारे गये ठाकुर युवक के लिए सरकार ने तुरन्त 10 लाख के मुआवजे की घोषणा कर दी। इसके विपरीत जो घायल दलित अस्पतालों
में पड़े थे या जिनके घर जला दिये गये थे उन्हें सरकार ने कोई राहत नहीं दी। एकतरफा हमले, आगजनी और पुलिस, प्रशासन को हमलावरों के पक्ष में खड़े देखकर दलितों के गुस्से का पारा
चढ़ना लाजमी था। इस इलाके में पिछले दो सालों से दलित युवकों के बीच राजनीतिक, सामाजिक काम कर रहे संगठन ‘‘भीम आर्मी’’ की अगुवाई में 9 मई को सहारनपुर के गाँधी मैदान में दलितों ने सभा करने की घोषणा की। इनकी मुख्य माँग थी कि हमले में शामिल ठाकुरों को पुलिस जल्दी गिरफ्तार करे। प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी। इसके बावजूद काफी संख्या में दलित वहाँ पहुँचे। विरोधस्वरूप उन्होंने शहर की कई सड़कें जाम करने की कोशिश की और पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज की। इसके बाद भीड़ भड़क कर पुलिस के साथ सीधे टकराव की मुद्रा में आ गयी। लाठी-ड़ण्डों से लैस युवकों ने पुलिस को निशाना बनाते हुए हमला बोल दिया। पुलिस थाने में आग लगा दी, पुलिस की गाडि़याँ जला दी और जो भी पुलिसवाला उनके हाथ लगा उसे पीटा गया। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया और एक दो निजी वाहनों में भी आग लगायी गयी। अब सरकार इस मामले को लेकर
गम्भीर हो गयी। नाकामयाबी का ठीकरा जिले के दो आला अधिकारियां के सर फोड़कर उनका तबादला कर दिया गया। 
‘‘कानून का राज’’ फिर से कायम करने के के नाम पर भीम आर्मी पर निशाना साधा गया। दलित मोहल्लों, छात्रावासों पर पुलिस ने छापेमारी शुरू कर दी। भीम आर्मी का सम्बन्ध नक्सलियों से होने की जाँच शुरू की गयी। इसके वित्तीय स्रोतों की जाँच की जाने लगी और आई एस आई द्वारा मदद पहुँचाने की सम्भानाओं पर भी विचार किया जाने लगा। इसी दौरान ठाकुरों के बहुत से युवक पूरे इलाके में तलवारें हाथ में लेकर दलितों के बीच खौफ पैदा करते रहे, उन पर हमले करते रहे। दलितों के प्रति भेदभाव और उपेक्षा का शासन, प्रशासन और सरकार का रुख अब दमनकारी और सबक सिखाने
वाला हो गया है। जातीय और धार्मिक भेदभाव की सोच पर तैयार हुई पार्टी के शासन में इससे अलग उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी।
सदियों पुरानी सोच से इनसान द्वारा इनसान के शोषण वाली जाति व्यवस्था की सड़ांध हमारे समाज के रेशे-रेशे में भरी हुई है। जाति व्यवस्था का ही कमाल है कि पूरे देश के किसानों की चमड़ी उधेड़ रही सरकार चलाने वाली पार्टी के गुर्गों के हुलसावे में आकर ठाकुर जाति के किसानों के बेटों ने ही दलितों पर हमला किया। जबकि इन्हीं दलितों के साथ आपसी सहयोग से उनका रोजमर्रा का जीवन चलता है। दूसरी ओर, यही जाति व्यवस्था है जिसने आजादी के इतने सालों बाद भी दलितों को हर तरह से दोयम दर्जे का जीवन जीने के लिए मजबूर कर रखा है। क्या कारण है कि पहले ही कबीर, नानक, फूले, अम्बेडकर, पेरियार जैसे पुरोधाओं के जबरदस्त हमलों से वैचारिक शिकस्त खा चुकने के बावजूद जाति व्यवस्था आज तक कायम है। इन कारणों को समझे बगैर हम जाति व्यवस्था और जातिगत हमलों के समूल नाश का सपना नहीं देख सकते। बाबा साहब अम्बेड़कर का कहना था कि आर्थिक बराबरी के बिना सामाजिक और राजनीतिक बराबरी हासिल करना सम्भव नहीं है। आजादी मिलने के बाद देश में पूँजीवादी ढर्रे की सरकार बनी। सरकार ने राजा-रजवाड़ों और सामन्तों की भू-सम्पत्ति को मूलतः खत्म कर दिया।
जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने का भी कानून बना लेकिन पूरे देश में कोई ऐसा भूमि-सुधार नहीं किया गया जिससे समाज के सभी समुदायों के बीच जमीन का एक समान बँटवारा होता। जिन इलाकों में कुछ हद तक भूमि सुधार किया गया, वहाँ भी उच्च और मध्यम जातियांे के बीच ही जमीन बाँटी गयी। दलितों को इसमें वाजिब क्या कारण है कि पहले ही कबीर, नानक, फूले, अम्बेडकर, पेरियार जैसे पुरोधाओं के जबरदस्त हमलों से वैचारिक शिकस्त खा चुकने के बावजूद जाति व्यवस्था आज तक कायम है। इन कारणों को समझे बगैर हम जाति व्यवस्था और जातिगत हमलों के समूल नाश का सपना नहीं देख सकते। भूमि सुधार की असलियत यह थी कि देश की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 1.5 प्रतिशत का ही बँटवारा किया गया। इससे ऊपरी तौर पर तो सामन्त शाही खत्म हो गयी लेकिन छोटे स्तर पर पूरे समाज में उसका वजूद कायम रहा। आर्थिक आधार मौजूद रहने के चलते जीवन के हर क्षेत्रा में सामन्ती सोच बनी रही। दलितों से थोड़ी ही बेहतर स्थिति वाली जिन मध्यम जातियों को जमीन मिली उनका सामाजिक और आर्थिक उत्थान तेजी से हुआ और जल्दी ही वे सवर्ण जातियों की
तरह अपने-अपने क्षेत्रों की प्रभुत्वशाली जाति बन गयी। देश के नाममात्रा के औद्योगिकीकरण
में थोड़े से दलितों को स्थान मिला, बाकी विशाल दलित आबादी गाँव में खेती के ही भरोसे थी। नतीजतन दलितों का सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण लगभग ज्यों-ज्यों का त्यों-त्यों बना रहा।
सामाजिक बराबरी लाने के नाम पर आरक्षण का जो झुनझुना दलितों के हाथ में थमाया गया था वह भी जाति व्यवस्था पर कोई कारगर चोट नहीं कर पाया। आरक्षण पर तमाम हो-हल्ले के बावजूद सच्चाई यह है कि सरकारी नौकरियों में दलितों की हिस्सेदारी मात्रा 0.8 प्रतिशत है। इस नाम मात्रा की हिस्सेदारी का वितंडा खड़ा करके सवर्ण जातियों के दिमाग में यह बात बैठा दी गयी कि उन्हें नौकरी न मिलने का कारण आरक्षण है। इससे लाभ पाये मुट्ठी भर दलित भी शासक वर्गों के साथ जाकर
मिल गये, क्योंकि अब उनका हित भी शासकों के हित से जुड़ गया था उनका वर्ग चरित्र बदल गया और वे कोई क्रान्तिकारी जाति विरोधी आन्दोलन खड़ा करने लायक ही नहीं रहे। ले देकर अस्मितावादी दलित विमर्श के लायक ही बचे। दलित राजनीति के नाम पर जो लोग सत्ता के गलियारों तक पहुँचे, उनका हाल भी कमोबेश ऐसा ही रहा। लेकिन उनके अभियानों से अस्मिता को लेकर,
थोड़ी ही सही, जागृती आयी। कुल मिलाकर आजादी के बाद बने कानूनों और जातीय दमन विरोधी आन्दोलनों से जाति व्यवस्था पर कुछ ऊपरी चोट तो हुई, लेकिन उसके आधार को कोई नुकसान नहीं पहुँचा, इसके उलट इसने कई तरीकों से जाति व्यवस्था को मजबूत भी किया। जिस पूँजीवादी तौर-तरीके की सरकार आजादी के बाद बनी थी, 1990 तक आते-आते उसका अन्त हो गया और देश की व्यवस्था को नवउदारवादी सिद्धान्तों के अनुसार ढाला गया। इसने शासकों के सामने जातिवादी व्यवस्था और सामन्ती सोच को अपने अनुरूप ढालने की जरूरत पैदा की। उदारवाद की नीतियों ने देश की अर्थव्यवस्था को इस तरह से ढाला कि आबादी के बड़े हिस्से की आय में गिरावट आयी और जीवन लागत महँगी हुई। इस सब का एक प्रमुख मकसद देशी-विदेशी निवेशकों को सस्ते से सस्ते मजदूर उपलब्ध कराना था। सरकार की ओर से जनता को मिलने वाली सुविधाओं और सब्सिडी में कटौती की गयी। शिक्षा, इलाज, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सेवाओं का निजीकरण करके उन्हें मुनाफा कमाने का धन्धा बनाया गया। मजदूरों के हितों की सुरक्षा के लिए बनाये गये श्रम कानूनों को पलटकर पूँजीपतियों के हित में कर दिया गया। इन सभी बदलावों का असर देश की सर्वाधिक गरीब जनता पर सबसे ज्यादा पड़ना तय था। जातीय अनुपात के हिसाब से सर्वाधिक गरीब आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है। उदारवाद की नीतियों से इन जातियों की जीविका के सीमित साधन तबाह हो गये और इनके बीच भारी सख्या में कंगालीकरण हुआ।
उदारवाद से आर्थिक जीवन में होने वाली तबाही से उत्पन्न जनता के गुस्से को थोड़ा कम करने के लिए बीच-बीच में वृद्धावस्था पेंशन, मिड डे मील, 2 रुपये किलो अनाज जैसी भिखमंगई वाली या मनरेगा जैसी सजावटी योजनाएँ भी चलायी गयी। व्यवस्था में नख से शिख तक व्यापत भ्रष्टाचार और जनता के दब्बू चरित्रा के चलते, तबाह हो चुकी जीविकाओं पर इन नीतियों से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। धन्धा
बन चुके मीडिया द्वारा इन नीतियों का ढिंढोरा ऐसा पीटा गया जैसे गरीब काहिल हैं और सारी सरकारी आय को खाये जा रहे हैं। आबादी के थोड़ी बेहतर स्थिति वाले हिस्से की जीविका में हो रहे क्षरण के लिए भी घुमा-फिराकर इन्हीं योजनाओं को जिम्मेदार ठहराया गया। जातीय संरचना वाले हमारे समाज में जातियों के बीच टकराव बढ़ा और उदारवाद जनता के सीधे निशाने पर आने से बच गया। यह कांग्रेस की नीति थी। भाजपा की नीति इससे भी कहीं ज्यादा खतरनाक है। इसने कांग्रेस की नीतियों के बजाय समाज के सबसे सड़े हुए धर्मान्धता, जातिवाद, अतीत का महिमामंडन, अंधविश्वास, कर्मकाण्ड जैसे मूल्यों को योजनाबद्ध ढंग से बढ़ावा दिया। यह अंग्रेजी राज के उसूलों और ढाँचे परखड़ी, सामन्ती मूल्यों से ग्रस्त नौकरशाही, सेना, पुलिस के दम पर हर तरह के विरोध को लाठी-गोली के दम पर दबा देने या उसे देशद्रोही, समाजद्रोही साबित करने की नीति पर अमल करती है। इससे रोज-ब-रोज नये-नये टकराव खड़े हो रहे हैं और उनकी आड़ में उदारवादी लूट धड़ल्ले से जारी है।
सहारनपुर की जातीय हिंसा इन्हीं नीतियों का परिणाम है, जहाँ भाजपा सरकार की नीतियों से लुट रहे ठाकुर किसानों के लड़के उसी सरकार का महिमा मंडन करते हुए दलितों को मार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं। सच्चाई यह है कि जाति की समस्या केवल सामाजिक समस्या नहीं है। इसलिए इसका समाधान केवल सामाजिक आन्दोलनों या संघर्षों से नहीं हो सकता। यह एक आर्थिक-सामाजिक समस्या है और भारतीय समाज के आर्थिक और सामाजिक जीवन की रग-रग इससे विषाक्त है। सम्पत्ति और जीविका के साधनों के न्यायपूर्ण बँटवारे और उसके साथ-साथ सामाजिक आन्दोलनों
का अटूट सिलसिला शुरू किये बगैर जातिवाद का समूल नाश सम्भव नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें