Saturday, March 23, 2013

...फिर कैसे बाजे प्रेमधुन

कई बार ऐसा लगता है कि आजकल दुनिया में प्रेम के मायने बदल गए हैं। प्रेम के चर्चे तो खूब सुनाई देते हैं, लेकिन ऐसे प्रेम में आकर्षण ज्यादा और वास्तविक प्रेम बहुत कम होता है। आधुनिक संस्कृति में रमे दो युवा दिलों में बड़ी जल्दी-जल्दी दोस्ती होती है और उतनी ही तेजी से वह ‘प्रेम’ की डगर पर सरपट भागने लगती है। इस बेलगाम और सरपट भागती गाड़ी को उनके ही शब्दों में ब्रेक ‘धोखे’ से लगता है। यही वजह है कि प्रेम के बाद शादी के बंधन में बंधे लोगों में भी एक दूसरे को लेकर मन में गहरा अविश्वास दबा रहता है। यही अविश्वास इंतहा की सीमा पर कई बार प्रेमियों के लिए जानलेवा भी साबित होता है। जाहिर है ऐसे में प्रेमधुन बजे भी तो कैसे? इन्हीं सवालों से रु-ब-रु सुधीर कुमार का आलेख...  

कई बार ऐसा लगता है कि आजकल दुनिया में प्रेम के मायने बदल गए हैं। प्रेम के चर्चे तो खूब सुनाई देते हैं, लेकिन ऐसे प्रेम में आकर्षण ज्यादा और वास्तविक प्रेम बहुत कम होता है। आधुनिक संस्कृति में रमे दो युवा दिलों में बड़ी जल्दी-जल्दी   दोस्ती होती है और उतनी ही तेजी से वह ‘प्रेम’ की डगर पर सरपट भागने लगती है। इस बेलगाम सरपट भागती गाड़ी को ब्रेक धोखे से लगता है। यही वजह है कि प्रेम के बाद शादी के बंधन में बंधे लोगों में भी एक दूसरे को लेकर मन में गहरा अविश्वास दबा होता है। यही अविश्वास इंतहा की सीमा पर कई बार प्रेमियों के लिए जानलेवा साबित हो जाता है। अक्सर ही ऐसी घटनाएं खबरों में सुनाई देती हैं कि पति ने पत्नी की या फिर पत्नी ने पति के चरित्र पर शक के चलते एक दूसरे की जान ले ली।
          ऐसे में मानव मन के सबसे खूबसूरत तत्व प्रेम पर सवाल खड़ा हो जाता है। लोग यह कहने लगते हैं जो लोग प्रेम करके शादी करते हैं, उनके बीच तलाक जल्दी होते हैं। इस संबंध में हुए सर्वे इसे झुठलाते हैं। हकीकत यह है कि जिनमें महज आकर्षण वाला प्रेम होता है, उनके बीच ही सबसे ज्यादा दरार आती है। अमृता प्रीतम ने इमरोज से शादी की। उनके बीच न जाति, समाज और धर्म का बंधन था और न ही मन का। आज अमृता के न रहने के बावजूद इमरोज खुद को अकेले नहीं पाते। वे कहते हैं अमृता का शरीर मुझसे दूर चला गया, उसका प्यार, उसकी यादें और उसकी आत्मा आज भी मेरे साथ जिंदा है। प्रेम की यह भावना, यह एहसास सिर्फ सच्चे प्रेमी ही कर सकते हैं। इमरोज तो महज उदाहरण हैं। ऐसे लोगों की संख्या हमारे देश में कम नहीं है, जिन्होंने सच्चा प्यार किया और वह के साथ और भी गहरा होता गया।
इंसानी मूल्यों पर भारी बाजार
तलाक या फिर जीवन के ही अंत कर देने की सोच की एक अन्य और मुख्य वजह बाजारीकरण और उसकी संस्कृति है। इस दौर में एकल परिवारों की संख्या में इजाफा हुआ है। पहले के समाज की समरसता और सामूहिकता को खत्म कर बाजार ने इंसान को बिल्कुल अकेला कर दिया। अब वह पूरी तौर पर बाजार जरूरतों के हिसाब से चलता है। बाजार ने उसे अपने हाथ की कठपुतली बना लिया है। यही वजह है कि कामकाजी पति-पत्नी के लिए परिवार से अधिक महत्व बाहरी चीजों का हो गया है। नौकरी जरूरी है, लेकिन परिवार को भी तो समय देने की जरूरत होती है। रिश्तों के जिन्दा रहने के लिए उनको समय भी देना चाहिए। लेकिन आज लोगों के पास इस बेहद महत्वपूर्ण इंसानी मूल्य के लिए वक्त नहीं है। आदमी रोबोट में तब्दील होता जा रहा है। स्थिति यह है कि प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण और क्रिएटिव कार्य-अपनी संतान का पालन-पोषण- करने के लिए भी लोग क्रेच या फिर दूसरों का सहारा ले रहे हैं। ये स्थितियां इंसानी मूल्यों पर भारी पड़ रही हैं। इंसानी मूल्यों पर बाजार इस तरह हावी हो गया है कि उसने आज दुनिया भर में प्रेम को ‘सेक्स के बाजार’ के रूप में भी तेजी से तब्दील करना शुरू कर दिया है। इसने प्यार के सितार को बेतार कर दिया है, जबकि प्रेम का बाजार ‘आॅनलाइन’ हो गया है। इस बाजार में न तो प्रेम की मासूमियत है और न ही इसको लेकर  संवेदनशीलता।
लव, सेक्स और धोखा
आप भले ही इस तथ्य से आंखें चुराएं, लेकिन यह सच्चाई है कि जब भी स्त्री-पुरुष के बीच में लगाव बढ़ेगा, तो वहां सेक्स जैसा तत्व हमेशा मौजूद रहेगा। लेकिन जब इस तत्व की मात्रा ज्यादा हो जाती है और यह प्रेम की भावना पर कब भारी पड़ने लगता है, तो वहीं से प्रेम की गाड़ी भी पटरी से उतरना शुरू हो जाती है। प्रेम दुनिया का सबसे खूबसूरत मानवीय सत्य है। तकलीफ तब शुरू होती है जब लोग मोहब्बत को मस्ती मान लेते हैं। शुरुआत में तो यह बेपनाह आनंद देती है। इस मस्ती का खुमार तब उतरता है, जब जिम्मेदारी और गहरे कमिटमेंट की बात आती है। बस, यहीं से दो रास्ते हो जाते हैं। एक धोखे का और दूसरा जवाबदेही का।
दुष्कर्म का प्रेम से नहीं कोई नाता
नई दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म घटना ने इस बुराई को समूची दुनिया के सामने बेपर्दा कर दिया। इस घटना के बाद भी इन घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है। कहीं शादी का झांसा देकर दुष्कर्म, नाबालिग से दुष्कर्म, स्कूल, छात्रावास, राहत शिविर, थाना, अस्पताल और यहां तक कि अपने ही घर में दुराचार का शिकार बनने की घटनाओं की बाढ़ सी है। सवाल यह है कि आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं। क्या मनुष्य की संवेदना बिल्कुल शून्य पड़ गई है? देश के किसी भी हिस्से में मौजूद परामर्श केंद्र पर चले जाइए, वहां आपको ऐसे मामलों की भरमार मिलेगी। इस मामले के जानकारों के अनुसार ऐसी घटनाओं का प्रेम से कोई वास्ता नहीं होता।
दुधारी तलवार है प्रेम
ऐसा नहीं है कि प्यार परवान नहीं चढ़ता। वह परवान तो चढ़ता है, लेकिन अगर संभल कर नहीं चले तो यह बहुत ही तेजी से सीधी ढलान पर फिसलता भी है। वजह यह है कि यह सिर्फ भावनाओं का खेल है। यह खेल है मजबूत स्नेह और निजी लगाव का। जहां आकर्षण की अपनी एक निश्चित सीमा होती है, वहीं सच्चा प्रेम निस्सीम होता है। इसमें जितना उतरते जाइए, उसकी गहराई बढ़ती ही जाती है। महान नाटककार शेक्सपियर को लेकर आप किसी भी तरह का दृष्टिकोण बना सकते हैं। लेकिन यह बात तो आप मानेंगे ही कि इंसानी प्रेम पर शेक्सपियर ने बहुत ही शानदार लिखा है। एक जगह वे लिखते हैं, ‘प्रेम करना, समय बिताने का एक अच्छा साधन है।’ वह आगे यह भी लिखते हैं, ‘साधन यानी खेल। इस खेल में भी व्यक्ति को उस सीमा तक नहीं जाना चाहिए, जहां से सम्मानपूर्वक वापस लौटा नहीं जा सके।’ वाकई प्यार सिर्फ और सिर्फ भरोसे की भावना पर टिका होता है। प्रेम में अगर धोखा मिले तो जिंदगी नरक बन जाती है। दुर्भाग्य की बात है कि आजकल लोग शेक्सपियर के इस वाक्य के महज एक अधूरे हिस्से ‘वक्त काटने का बेहतर जरिया’ को ही अपनी जिंदगी में अपना रहे हैं। ऐसे में वे प्रेम के वास्तविक मूल्यों की तिलांजलि देकर प्रेम की परिभाषा को ही बदलने की कोशिश की जा रही है। प्रेम के नाम पर दोस्ती, प्यार, मोहब्बत, लव आदि नामों की लिस्ट तो लंबी हो गई है, लेकिन सच्चा प्रेम उसमें से गायब है। यही वजह है अब प्रेम में वह बांसुरी नहीं बजती, जिसे सुनकर राधा खिंची चली आती थी। या फिर जिस मीरा ने कन्हैया को कभी नहीं पाया वह जिंदगी भर उसकी माला जपती रही।
दुष्कर्म के मामले महानगर आगे
वर्ष                  2011        2010        2009
दिल्ली               453        414           404
मुंबई                 221        194           182
बंगलुरू               97          65            65
चेन्नई               76           47           39
हैदराबाद            59           45           47
कोलकाता           46           32          42

 भारत में लाक फिर भी कम
स्वीडन          54.9
अमेरिका        54.8
रूस               43.3
यू.किंगडम     42.6
जर्मनी          39.4
इजराइल       14.8
सिंगापुर        17.2
जापान          1.9
श्रीलंका         1.5
भारत           1.1
(दर प्रतिशत में)

तलाक से बच्चों पर पड़ता है असर
न्यूक्लियर फैमिली की धुंध ने सामाजिक तानेबानों से लगभग पूरी तरह दूर कर दिया है। ‘रिश्ते जोड़ने’ की दुकानें खुलने के साथ ही अविश्वास की खाई जो बढ़ी है, उसने दुनियाभर में तलाक के मामलों में इजाफा किया है। वर्तमान में हालत यहां तक है कि छोटी-छोटी बातों को लेकर भी तलाक की रट लगा दी जाती है। विवाह नामक परंपरा की वजह से भारत में दुनिया में फिर भी इससे काफी दूर है। विश्वास की कमी तलाक की बड़ी वजहों में से एक हैं। जरूरी है हर छोटी बात पर नोंकझोंक करने के बजाए, मुद्दे पर बात कर समाधाना खोजा जाए। आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए जरूरी नहीं होता कि  किसी बाहरी सदस्य से मदद ली जाए। तलाक सीधा मनोवैज्ञानिक असर बच्चों की जिंंदगी पर पड़ता है।
बढ़ रहे हैं दुष्कर्म के मामले
  1. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 में देशभर में दुष्कर्म के 24,206 मामले दर्ज, 5,724  दोषी ठहराए गए.
  2. 2010 में 22,172 मामले दर्ज हुए, 5,632 दोषी सबित हुए.
  3. 2009 में 21,397 मामले दर्ज, 5316 को दोषी ठहराया गया.
  4. 2009-11 में उत्तर प्रदेश में इस अवधि के दौरान दुष्कर्म के 5,364 मामले दर्ज। 3,816 लोगों का दोष साबित हो पाया। इस अवधि में प्रदेश में छेड़खानी के कुल 9,030 मामले दर्ज हुए और 7,958 लोगों का दोष साबित हुआ।

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