मंगलवार, 5 मई 2015

नेपाल में भूकंप से उपजी मानवीय त्रासदी, पूंजीवाद की विफलता का निर्विवाद और जीवंत प्रमाण है

नेपाल में आए भूकंप में करीब ६७०० जानें जा चुकी हैं और लगभग पंद्रह हज़ार घायल हुए हैं. मलबे के हटने के साथ यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है और लोगों के जिन्दा बचने की आशा भी ख़त्म हो रही है.
नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला का कहना है कि मरने वालों की तादाद दस हज़ार से ऊपर जा सकती है. इसका अर्थ होगा कि यह भूकंप, १९३४ में नेपाल में आए अब तक के सबसे बड़े भूकंप में ८५०० लोगों की मौत के आंकड़े को भी, पार कर जायेगा.
राजधानी काठमांडू सहित, नेपाल के पचहत्तर जिलों में से पश्चिमी नेपाल के लगभग चालीस जिले, भूकंप की चपेट में आए हैं.

२५ अप्रैल, शनिवार को दोपहर के समय आए इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर ७.८ मापी गई, जिसका केन्द्रक नेपाल की राजधानी, काठमांडू से ८० किलोमीटर पश्चिम में था. शनिवार को लगभग १२ छोटी-बड़ी कम्पन हुईं और अगले दिन रविवार को फिर ६.७ तीव्रता का भूकंप आया. इस भूकंप का विस्तार भारत में दिल्ली तक था, जहां बिहार और उत्तर प्रदेश में ७२ लोगों के मारे जाने की सूचना है. भारत के अतिरिक्त भूटान और बांग्लादेश में भी भूकंप से कई जानें गईं. माउन्ट एवरेस्ट पर १८ टूरिस्ट और पर्वतारोही हिमस्खलन के शिकार हुए, जबकि ६० से ज्यादा घायल हुए. ऐतिहासिक महत्त्व की कितनी ही महत्वपूर्ण इमारतें ज़मींदोज़ हो गईं. भूकंप से कुल नुकसान करीब सात हज़ार करोड़ से अधिक का बताया जा रहा है.
दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक, नेपाल में, इस तबाही से, जान-माल की भारी क्षति हुई है. इस क्षति को काफी कम किया जा सकता था यदि समय रहते नेपाल के भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में समुचित अंतर्राष्ट्रीय सहायता पहुंचाई जाती. मगर सच्चाई यह है कि यह सहायता न सिर्फ नाममात्र की रही बल्कि काफी देरी से भी पहुंची. राहत के लिए आई सामग्री का बड़ा हिस्सा आज भी काठमांडू हवाई अड्डे पर ही पड़ा है, जिसे आगे भेजने की कोई व्यवस्था नहीं है. सैंकड़ों टन फल-सब्जियां और तैयार खाद्य सामग्री इसी तरह नष्ट हो रही है. राहत कार्य, काठमांडू तक ही सीमित हैं, जबकि सैंकड़ों दूर-दराज़ के गाँवों की खबर लेने वाला भी कोई नहीं है.
यूक्रेन से यमन तक सामरिक अभियानों में जुटी साम्राज्यवादी ताकतों ने, नेपाल की इस त्रासदी में कोई विशेष मदद नहीं दी. यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग दस लाख बच्चों को तुरंत सहायता की जरूरत थी, जो पूरी नहीं हुई. खाने और पानी के लिए तरसते लाखों बेघर लोगों को बस किसी तरह टेंटों के भीतर ठूंसा गया और अधिकतर को तो टेंट भी नहीं मिले.
पचास लाख की आबादी वाली, राजधानी काठमांडू में, यातायात, बिजली और पानी की व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो गई. सबसे बुरा हाल स्वास्थ्य सेवाओं का रहा. सुचारू चिकित्सा व्यवस्था न होने के कारण, सैंकड़ों जानें गईं. लोगों को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया.
नेपाल सरकार और तमाम पूंजीवादी देशों स्वर किए जा रहे खोखले दावों के बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि विपत्ति के शिकार लोगों के पास न खाना है न पानी, न रहने का ठिकाना, जिसके चलते खाने-पीने की वस्तुओं और रहने की सामग्री की कालाबाजारी जोरों पर है. बताया जा रहा है कि पानी की एक बोतल पचास रुपये और मैगी का एक पैकेट, काठमांडू में, सौ रुपये तक में बेचा जा रहा है.
हालात इस कदर खराब हैं कि नेपाल से, विशेष रूप से काठमांडू से, बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है. बचे हुए लोगों की, राहत सामग्री के लिए लम्बी कतारें लगी हैं. इस अव्यवस्था, अराजकता और नेपाली शासकों की लापरवाही से दुखी लोगों ने प्रधानमत्री सुशील कोइराला का विरोध करते हुए, ३० अप्रैल को उसे राहत शिविर में नहीं घुसने दिया. नेपाल के पूंजीवादी शासकों के इस अनाचार के चलते ही, भूकंप में कई गुना अधिक क्षति हुई है.
यह भूकंप अचानक नहीं आया. २००८ में चीन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सिचुआन प्रान्त में आए भूकंप के बाद से ही, जिसमें लगभग एक लाख लोग मारे गए थे, नेपाल में इस भूकंप की आशंका व्यक्त की जा रही थी. २०१३ से, इसकी पूर्व-सूचना, भूगर्भशास्त्रियों द्वारा बाकायदा और निरंतर दी जा रही थी. भूगर्भशास्त्री विनोद कुमार गौड़ ने ‘द हिन्दू’ में छपे अपने लेख में रिक्टर स्केल पर ८ के लगभग शक्ति वाले इस भूकंप की आशंका व्यक्त की थी. इस आपदा से एक हफ्ता पहले ही काठमांडू में वैज्ञानिकों की एक सभा भी हुई थी. मगर नेपाली सरकार द्वारा इस आगामी महा-विपदा की ओर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण, कोई ठोस उपाय नहीं किए जा सके.
नेपाल सरकार और साम्राज्यवादी देश, जिनके पास इस विपदा से निपटने के सभी साधन मौजूद हैं, दोनों से पहले इसे अनदेखा किया और न इससे पहले और न ही बाद में कोई कारगर कदम उठाये, जिसकी वजह से हजारों जानें गईं.
भूकंप की स्थिति में, पहले कुछ घंटे, सुरक्षा और बचाव की दृष्टि से अत्यंत महत्पूर्ण होते हैं. मगर इस वक़्त में न तो नेपाली प्रशासन ने और न ही दूसरी पूंजीवादी सरकारों ने फौरी कदम उठाये.
सबसे बड़े साम्राज्यवादी देश अमेरिका ने पहले ६२ राहतकर्मियों के साथ मात्र छह करोड़ की मदद की घोषणा की और बाद में इसे बढाकर ५४ करोड़ रुपये किया, जो इस महाविपत्ति में एक मजाक ही है. हां इसके साथ ही एयरफोर्स के सी-१७ प्लेन भी भेजे हैं जो राहत के लिए नहीं बल्कि नेपाल में अमेरिकी सामरिक हितों को मज़बूत करने की दिशा में कदम है. इसी तरह भारत ने ३०० राहतकर्मी, चार जहाज़ और १३ सैनिक हेलीकाप्टर भेजे हैं, जिन पर बार-बार नेपाल से सटी चीनी सीमा में घुसकर जासूसी करने का आरोप लग रहा है. ब्रिटेन ने ४० करोड़ और नॉर्वे ने २० करोड़ की मदद का आश्वासन दिया है, जबकि चीन ने चार जहाज, ७२ विशेषज्ञ और १७० सैनिक भेजे हैं, जो कतई अपर्याप्त है. विपत्ति में घिरी जनता को राहत देने के बजाय, ये पूंजीवादी सरकारें, नेपाल की इस विपदा को, अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को अग्रसर करने के लिए प्रयोग कर रही हैं.
बेघर हुए लोगों के पुनर्वास और बुरी तबाह हुए नेपाल के पुनर्निर्माण के लिए जिन संसाधनों को जुटाने की जरूरत है, पूंजीवादी सरकारों के पास न तो उसके लिए कोई नीयत है और न ही कोई कार्यक्रम.
विज्ञान ने हमें ऐसी भवन निर्माण तकनीकों से लैस किया है जो बड़े भूकम्पों को भी सरलता से निष्प्रभावी कर देती हैं. दुबई का तीन सौ मंजिलों वाला टावर 'बुर्ज' और ताइवान में बन रहा हज़ार मंजिलों वाला टावर इसका उदाहरण है. मगर एक ओर तो गरीबी और साधनहीनता के चलते, जिसकी पूंजीवाद ने कृत्रिम रूप से सृष्टि की हुई है, ये तकनीक मुट्ठी भर संपन्न लोगों तक ही सीमित होकर रह गई हैं, और दूसरी ओर असीमित मुनाफों की ओर उन्मुख पूंजीवादी प्रसार और विकास के चलते, नाभिकीय बमों के परीक्षणों, छोटे-बड़े हमलों, युद्धों में हजारों टन बारूद के प्रयोग, अनियंत्रित जंगल कटान, खनन के अबाध जारी रहते, पर्यावरण को जो भारी क्षति हो रही है, उससे अकाल, बाढ़, भूकंप जैसी आपदाएं तेज़ी से बढ़ी हैं.  
भूकंप से पहले ही नेपाल साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच राजनीतिक संघर्ष का अखाडा बना हुआ था. अमेरिका और उसके नेतृत्व में नाटो शक्तियां, नेपाल की जमीन को चीन के विरुद्ध प्रयोग करने के लिए तैयारी में जुटे थे, जिसके चलते अमेरिकी विशेष सुरक्षा दलों की दो टुकडियां नेपाल में सांझे सैनिक अभ्यास के लिए मौजूद थीं. भूकंप की स्थिति का लाभ उठाकर अमेरिका ने नेपाल में अपने सशस्त्र सैनिकों की संख्या को १६० से अधिक कर दिया है.

२०१३ में फिलिपीन्स में आये तूफ़ान से पैदा हुई त्रासदी का लाभ उठाकर, अमेरिका ने इसी तरह फिलिपीन्स में अपनी सैनिक उपस्थिति को स्थायी बना लिया था. अमेरिकी सैनिक-रणनीतिक अभियान में एकाकार हुई भारत सरकार ने भी, ‘ऑपरेशन मैत्री’ के नाम पर, नेपाल में अपनी बड़ी सैनिक उपस्थिति, विदेशी धरती पर अब तक की सबसे बड़ी उपस्थिति, बनाई है. भारत के नाभिकीय कार्यक्रम को समर्थन देते, उससे हाल ही में यूरेनियम सप्लाई का करार करने वाले कनाडा ने भी, दक्षिण-एशिया में अपना कूटनीतिक अभियान शुरू करते, राहत टीम के साथ, नेपाल में सशस्त्र सैनिकों की एक टुकड़ी भी रवाना की है. ‘मानवीय सहायता’ साम्राज्यवादी सामरिक रणनीति का अटूट हिस्सा है, जिसके जरिये विपत्तिग्रस्त राष्ट्रों के आर्थिक-राजनीतिक तंत्र को अपने प्रभाव-क्षेत्र में लाने के लिए साम्राज्यवादी शिविर एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं.
इसके बावजूद इनमें से किसी देश ने नेपाल को पर्याप्त मदद नहीं दी. उलटे, नेपाल की बदहाली, विपन्नता और साधनहीनता को, विशेष रूप से हालिया मानवीय त्रासदी को, एक हथियार के रूप में प्रयोग करते हुए, नेपाल को और दबाने, झुकाने और पूरी तरह अधिगृहित कर लेने के लिए, ये पूंजीवादी शक्तियां सन्नद्ध हैं.
भूकंप के जरिये आई इस आपदा ने, नेपाली और इसके साथ ही दुनिया भर की पूंजीवादी सरकारों के सारे झूठे दावों की कलई खोलकर रख दी है. इस आपदा ने दिखा दिया कि निष्क्रियता और भ्रष्टाचार से लथपथ, पूंजीपतियों और स्तालिनवादियों-माओवादियों के सांझे नेतृत्व वाली नेपाली सरकार, नेपाल की मेहनतकश जनता को गरीबी और विपत्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे सकती. अपने संकीर्ण राजनीतिक-सामरिक उद्देश्यों पर खरबों डॉलर फूंकने वाली पूंजीवादी सरकारें, मानवीय त्रासदियों के लिए, सिर्फ खानापूर्ति ही करेंगी और इन त्रासदियों को भी अपने क्षुद्र उद्देश्यों के लिए, जनता पर शोषण-उत्पीडन के शिकंजे कसने के लिए, प्रयोग करेंगी.
नेपाल में २००६ में राजशाही के पतन बाद सत्ता में आई बुर्जुआ सरकारों ने नेपाली जनता के प्रति पूरी तरह उदासीन रवैया अपनाया है. बुर्जुआ सत्ता के साथ एकाकार हुए माओवादियों ने भी इस सत्ता को कोई चुनौती देने की जगह इसे मज़बूत करने में योगदान दिया है. माओवादियों के नेतृत्व वाली सांझा सरकार ने न सिर्फ नेपाली अर्थव्यवस्था को विश्व बैंक और आई.एम्.ऍफ़ के निर्देशों पर संचालित किया और बड़े कारोबारियों के हित में इसे चलाया, बल्कि हड़तालों पर प्रतिबन्ध लगाकर बड़े अंतर्राष्ट्रीय पूंजी-निवेश के लिए वातावरण तैयार करके नेपाल को सस्ते मानव श्रम के आधार-क्षेत्र के बतौर विकसित किया.
महाविपदा के इस वक़्त में भी, नेपाल की पूंजीवादी सरकार का ध्यान, जनता को राहत मुहैया कराने के बजाय, सेना को अक्षुण्ण बनाये रखने पर केन्द्रित है, ताकि जनता की ओर से किसी संगठित विरोध की स्थिति से निपटा जा सके. आधुनिक शस्त्रों से लैस,  सेना की टुकड़ियों को पशुपतिनाथ जैसे विशाल मंदिरों, नारायणहिती जैसे महलों, स्क्वायारों और विशिष्ट भवनों की सुरक्षा में तैनात किया गया है. इन मंदिरों, भवनों में दसियों हज़ार बेघर लोगों को शरण दी जा सकती है, मगर संकट की इस घड़ी में भी जनता को इनमें शरण नहीं लेने दी जा रही है. ज्ञात हुआ है कि इन मंदिरों, महलों के दरवाजों, मूर्तियों और दूसरे हिस्सों में सैंकड़ों टन सोना लगा है. इनके खजानों में भी बेशुमार सोना और बेशकीमती हीरे जवाहरात होने की सूचना है. बताया जा रहा है कि इस दौलत का परिमाण इतना है कि नेपाल का दो बार पुनर्निर्माण संभव है. नेपाल की अथाह गरीबी के ठीक बीचों-बीच दौलत और प्रचुरता के ये अम्बार इस बात की तसदीक करते हैं कि नेपाल के लाखों-लाख  सर्वहारा और मेहनतकशों के पास समाजवादी क्रांति के जरिये, पूंजीवाद को उलटने और मजदूर-किसान सरकार की स्थापना के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है.
भूकंप ने नेपाल में दबे हुए शोषण और बदहाली को भी बाहर निकाला है. अथाह गरीबी और असहनीय जीवन दशाओं के बीच जीवन व्यतीत कर रही नेपाली मेहनतकश जनता के सामने फिर क्रान्तिकारी चुनौती को पेश किया है. मगर यह खुलासा सिर्फ नेपाल तक ही सीमित नहीं है. बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, भारत और तमाम दक्षिण एशियाई देशों में कहीं भी सर्वहारा और मेहनतकश जनता के हालात, नेपाल से बेहतर नहीं कहे जा सकते. इस दृष्टि से नेपाल का यह संकट, समूचे दक्षिण एशिया में एक क्रान्तिकारी चुनौती प्रस्तुत कर रहा है. चुनौती यह है कि किस तरह पूंजीवाद के इस नर्क को ख़त्म कर देने, पूंजीवादी सरकारों को उखाड़ फेंकने और दक्षिण एशियाई राष्ट्रों का ‘संयुक्त समाजवादी संघ’ स्थापित करने के लिए, सर्वहारा को क्रान्तिकारी कार्यक्रम के चारों ओर एकजुट और तैयार किया जाय.

बुधवार, 29 अप्रैल 2015

जोखिम जनता के मत्थे, मुनाफा कम्पनियों का

एम रंजन
कौन कहता है कि अच्छे दिन नहीं आ रहे हैं! अच्छे दिन की बहार है! देश के वजीरे आला जनाब नरेन्द्र मोदी ने अभी-अभी अपने तीन देशों की यात्रा के दौरान फ्रांस, जर्मनी, कनाडा में जाकर क्या कहा, आपने नहीं सुना? हर जगह उन्होंने उद्योग जगत की शीर्ष हस्तियों से गुहार लगाई कि ‘भारत अब बदल चुका है। आप पुरानी धारणाओं पर न चलें। ...आप आएं और भारत के माहौल में बदलाव महसूस करें।’
वे मुनाफे की गारण्टी देते हुए कहते हैं कि उनकी सरकार ने एफडीआई ;सीधा विदेशी निवेशद्ध को निवेशकों के अनुरूप बनाया है। हमने कई तरह की प्रतिगामी कराधान व्यवस्था को खत्म कर दिया है। हम लगातार कारोबारी माहौल और बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। बड़े गर्व से बताते हैं कि श्रम कानून बदलकर
तमाम बाधायें वे दूर कर रहे हैं। जहाँ जितनी जमीन चाहिए, आसानी से मिलेगी। पर्यावरण मंजूरी व औद्योगिक लाइसेंस की अवधि के विस्तार, औद्योगिक व बुनियादी ढा़चा परियोजनाओं के प्रस्तावों की मंजूरी, रक्षा उत्पादों के विनिर्माण के लाइसेंसों की अनिवार्यता जैसी तमाम ‘बाधाएं’ खत्म करने के लिए सरकार ने ठोस कदम उठाए हैं।
क्या ये अच्छे दिन की शुरुआत नहीं है? किसी के हित में तो ‘माहौल बदल’ बदल रहा है, कानून बन-बिगड़ रहा है! तभी तो इस बार के बजट में भी मोदी सरकार की प्राथमिकताएं साफ थीं। कार्पोरेट जगत को 5.90 लाख करोड़ रुपये का कर रियायत दिया और कल्याणकारी योजनाओं के मद में सब्सिडी को 2.6 फीसदी से घटाकर 2.4 फीसदी कर दिया। खाद्य सुरक्षा कानून का दायरा 67 फीसदी आबादी से घटाकर 40 फीसदी आबादी तक
करने का प्रस्ताव दे दिया। पहले से ही कयामत ढा रही सेवाकर के दायरे को 12.3 फीसदी से बढ़ाकर 14 फीसदी कर दिया। यानी महँगाई को और बढ़ाने का इन्तेजाम कर दिया। क्या यह मोदी रूपी अच्छे दिन का सूचक
नहीं है कि जो धनपति आसानी से सरकारी कर दे सकते हैं, उनकी टैक्स दरें कम कर दीं और आम मेहनतकश जनता पर टैक्स बढ़ा दिया!
धनपतियों के लिए सरकार ने बजट में सम्पदा कर समाप्त करने के साथ ही कॉर्पोरेट टैक्स 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दिया। जबकि आम गरीब जनता से जुड़े प्राथमिक शिक्षा के मद में 21 फीसदी, मिड-डे मील पर 25 फीसदी और बाल विकास मद में 50 फीसदी कटौती पेश कर दी। सारे मानकों को धता बताते हुए बीमा व रक्षा क्षेत्रों में एफडीआई 49 फीसदी, बैंक में 51 फीसदी और कई रेल परियोजनाओं में 100 फीसदी तक विदेशी निवेश की सीमा अच्छे दिन के लिए ही तो किये हैं जनाब! मतलब मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती कांग्रेसी
नीत सरकार के ही नक्शेकदम पर चलते हुए उसकी गति को तेज कर दी। यह तो अच्छे दिन की ही बात है कि मनमोहन सरकार के दौर में जनता को रौंदने वाला जो घोड़ा खच्चर की चाल चल रहा था, उसे मोदी साहब ने अरबी नस्ल के घोड़े की रफ्तार दे दी।
यह मोदी सरकार की उदारता ही तो है कि ऐसी योजनाओं को अम्ली रूप देने में जुटे हैं, जिसमें हर प्रकार का जोखिम व घाटा सरकार यानी जनता के हिस्से आये, और सारा मुनाफा देशी-विदेशी निजी कम्पनियों की झोली में समा जाए। इसीलिए उन्होंने पिछली कांग्रेसी सरकार की पीपीपी ;सार्वजनिक-निजी भागेदारीद्ध
योजना को गति दे दी है। अच्छे दिन यानी पीपीपी। मतलब सरकार आसानी से किसानों की जमीन हथियायेगी, उस पर कारखाना निजी कम्पनी की होगी। किसान पहले अपनी जमीन से हाथ धो बैठेगा। फिर वहाँ लगने वाले कारखाने में दिहाड़ी के लिए ठेकेदार की हुज्जत सहेगा। बाद में मुनाफा बटोर कर कम्पनी कंकरीट का ढेर छोड़कर पलायन कर जाएगी। ऐसे ही, रेल की पटरी सरकारी होगी, उस पर टेªन दौड़ेगी किसी जापानी या अमेरिकी कम्पनी की।
यही तो हैं अच्छे दिन! आखिर किसी के लिये तो आ ही रहे हैं न अच्छे दिन! सबकी खुशहाली तो एक साथ आ नहीं सकती। जनाब मोदी और उनकी जमात में शामिल बौ(िक जमात का मानना है कि ऊपर के थोड़े लोग खुशहाल होंगे तो नीचे की आबादी के पास भी ऊपर से छलक कर थोड़ी खुशहाली आ जाएगी! सो पहले अच्छे
दिन तो मुट्ठीभर ऊपरी तबके की ही तो लाने में जुटी है मोदी सरकार! बाद का कौन जाने...?

कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं है लहू का सुराग

40 साल पहले, 26 जून 1975 को तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने देश में आंतरिक आपातकाल लागू करके जनता को मिले सीमित जनवादी अधिकार भी छीन लिये थे। हालांकि ढाई साल बाद चुनाव में इंदिरा कांग्रेस का पतन हो गया था। जनता पार्टी की सत्ता बनी और नयी आजादी का शोर मचा। लेकिन हुआ क्या? राज्य सत्ता के दमनकारी चरित्र पर वास्तव में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। दमनकारी मीसा कानून का स्थान मिनी मीसा ने ले लिया। कभी टाडा, कभी पोटा तो कभी मकोका जैसे काले कानून बनते रहे, सरकारी निरंकुशता बढ़ती रही और मेहनतकश अवाम का दमन और तेज होता गया।
राज्य मशीनरी के एक महत्वपूर्ण अंग के बतौर दमनकारी खौफ की पर्याय बन चुकी खाकी वर्दी के कारनामें नित नये रूप में सामने आते रहे हैं। इसी कड़ी में पिछले रोज एक ही दिन में दो राज्यों में कथित पुलिसिया मुठभेड़ के नाम पर 25 नागरिकों की मौत से पुलिसिया चरित्र की एक और पटकथा लिख गयी।
पहली घटना आंध्र प्रदेश के चित्तूर में सेषचलम पहाडि़यों की है जहाँ कथित तौर पर मुठभेड़ के बहाने बीस कथित चंदन तस्करों को पुलिस ने मार दिया। खुद पड़ोसी राज्य तमिलनाड़ु (मृतक जहाँ के नागरिक थे) सरकार का दावा है कि मारे गये लोग श्रमिक थे। तथ्य जो उजागर हुए हैं उसके अनुसार जिन पर गोलियां दागी गयीं, वे हथियारबंद नहीं थे, जिनसे जान को खतरा होता। तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? यही नहीं यदि पुलिस कथित भीड़ से प्रतिरक्षा में गोली चलाती तो नियमतः उसे कमर के नीचे के हिस्से में गोली दागना चाहिए था, लेकिन उसने सीधे जान से क्यों मार दिया? सभी प्रमाण स्पष्ट हत्या के हैं।
दूसरी घटना नवोदित तेलंगाना राज्य का है। यहाँ वारंगल में विचाराधीन पाँच कैदियों को पेशी पर ले जाने के दौरान कथित ‘जवाबी फायरिंग’ में मौत की है। पुलिस का तर्क है कि एक कैदी ने पुलिस की रायफल छीनने की कोशिश की। अब सवाल उठ रहा है कि हथकड़ी में जकड़े कैदी ने रायफल कैसे छीनी होगी? सोशल मीडिया पर आई तस्वीरें इस बात की तस्दीक कर रही हैं कि वे राइफल छीन या भाग नहीं सकते थे। तस्वीरों में मृतकों के हाथ में हथकडि़यां हैं।

ये दो घटनाएं तो महज बानगी हैं। आजाद भारत के पिछले 68 सालों का इतिहास पुलिसिया मुठभेड़ की अनगिनत हत्यारी घटनाओं से भरा पड़ा है। जो मामले खुलकर सामने आ जाते हैं, उनमें भी पूरी राज्य मशीनर हत्यारों को बचाने का ही काम करती है। पिछले 22 मार्च को दिल्ली की एक अदालत का फैसला इस नंगी सच्चाई का दर्पण है। 42 लोगों का कत्ल, 28 साल चला मुकदमा, पाँच चश्मदीद गवाह और पहचान की नाकामयाबी में हत्यारे बरी।
1987 में उत्तर प्रदेश के मेरठ दंगे के दौरान पीएससी की बटालियन ने 47 मुसलमानों को उठा लिया था और गाजियाबाद जिले के हाशिमपुरा के सूनसान इलाके में गोलियों से भुनकर शवों को नहर में फेंक दिया था। इसमें 42 लोगों की मौत हो गयी थी, पाँच इत्तेफाक से मौत के मुंह से बच गये थे। जो चश्मदीद गवाह बने। इस बारे में घटना के दौरान गाजियाबाद के पुलिस कप्तान रहे विभूति नारायण राय 24 मार्च को अमर उजाला में प्रकाशित अपने लेख में लिखते हैं कि ‘‘हाशिमपुरा का नरसंहार स्वतंत्रता बाद की सबसे बड़ी हिरासत में मौत की घटना है। इसके पहले जहाँ तक मुझे याद है, कभी इतनी बड़ी संख्या में पुलिस ने अपनी हिरासत में लेकर लोगों को नहीं मारा था। इसके बावजूद एक भी अपराधी को दण्डित नहीं किया जा सका। अदालत के फैसले से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। मैंने पहले ही दिन से यही अपेक्षा की थी। दरअसल भारतीय राज्य का कोई भी स्टेक होल्डर नहीं चाहता था कि दोषियों को सजा मिले।’’
यही आज की सच्चाई है। आपातकाल के काले अंधेरे दौर से भी भयावह दौर में आज भारतीय समाज खड़ा है।
[ संघर्षरत मेहनतकश पत्रिका के 23वें  अंक का सम्पादकीय।
Cotact no. 09412969989] 09873057637

सोमवार, 23 मार्च 2015

शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहादत दिवस पर भगत सिंह के लेखों के लिंक





प्रिय साथी,
कल 23 मार्च है, शहीदे आजम भगत सिंह और उनके दो क्रान्तिकारी साथियों  सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस। आज से 84 वर्ष पूर्व इसी दिन को ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें लाहौर में पूर्वनिर्धारित तारिख से एक दिन पहले शाम सात बजे फांसी पर लटका दिया थातब से यह दिन पूरे भारत के परिवर्तनकामी और क्रान्तिकारी शक्तियों के लिए अपनी विरासत और परम्परा को याद करने का पवित्र दिन बना हुआ है।
अपने अमर शहीदों को हमारी श्रद्धांजलि के तौर पर प्रस्तुत है भगत सिंह के प्रमुख रचनाओं के लिंक पहले हिन्दी में और उसके बाद अंग्रेजी में —    


घर को अलविदा, 1923
अछूत समस्या, 1923
युवक!,
मई 1925
नौजवान भारत सभा, लाहौर का घोषणापत्र,
अप्रैल 1928
धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम,
मई 1928
साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज,
जून 1928
नये नेताओं के अलग-अलग विचार,
जुलाई 1928
विद्यार्थी और राजनीति, 1928
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन का घोषणा पत्र, 1929
भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम,
अप्रैल 1929
असेम्बली हॉल में फेंका गया पर्चा,
अप्रैल 1929
बम काण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान,
जून 1929
विद्यार्थियों के नाम पत्र,
अक्तूबर 1929
सम्पादक, माडर्न रिव्यू के नाम पत्र,
दिसम्बर 1929
बम का दर्शन,
जनवरी 1930
इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है,
जनवरी 1930
लेनिन मृत्यु वार्षिकी पर तार,
जनवरी 1930
पिताजी के नाम पत्र,
अक्तूबर 1930
क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा,
फरवरी 1931
मैं नास्तिक क्यों हूँ,
फरवरी 1931
छोटे भाई कुलतार के नाम अन्तिम पत्र,
मार्च 1931
कुलबीर के नाम अन्तिम पत्र,
मार्च 1931
शहादत से पहले साथियों को अन्तिम पत्र,
मार्च 1931
हमें गोली से उड़ाया जाए,
मार्च 1931
कौम के नाम सन्देश, 1931

Documents
Beware, Ye Bureaucracy  (December 18, 1928)
Letter to Shaheed Sukhdev  (April 5, 1929)
“The Red Pamphlet”  (April 8, 1929)
Joint Statement with B.K. Dutt  (June 6, 1929)
Hunger-strikers' Demands  (June 24, 1929)
Regarding the LCC Ordinance  (May 2, 1930)
Statement of the Undefended Accused with J.N. Sanyal, B.K. Dutt, Dr. Gayal Prasad, and Kundan Lal  (May 5, 1930)
Letter to Jaidev Gupta  (July 24, 1930)
Justice Hilton Must Also Go  (June 25, 1930)
Letter to Father  (October 4, 1930)
Why I am an Atheist  (October 5, 1930)
Letter to B. K. Dutt  (November, 1930)
To Young Political Workers  (February 2, 1931)
Last Petition  (1931)
Introduction to Dreamland  (Unknown)

sabhar: Red tulip

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

लालकुंआ में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने वालों का विरोध करो


लालकुआँ (नैनीताल), उत्तराखण्डः  10 दिसंबर को एक लड़का और लड़की के घर से चले जाने के की घटना को हिंदुत्ववादी संगठनों के सांप्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश की क्योंकि लड़का मुस्लिम था और लड़की हिंदु। लड़की के घर वालों ने लड़के पर अपहरण का केस दर्ज कराया जिसको पुलिस ने दर्ज कर लिया लेकिन लड़के के परिजनों द्वारा अपने लड़के की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने पर पुलिस ने गुमशुदगी भी दर्ज नहीं की। इसी बीच ऐसे मुद्दों की ताक में बैठे रहने वाले सांप्रदायिक संगठन (आर.एस.एस, बजरंग दल, भाजपा और एबीवीपी) अपने पूरे दम खम से इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने और मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलने में मशगूल हो गए। उन्होंने जुलूस निकालकर, कोतवाली का घेराव कर डीएम से मिलकर अपनी सक्रियता का प्रदर्शन किया।  इससे पूर्व लालकुंआ में ही 7 वर्षीय बालिका चंचल के गुम होने पर हमारे द्वारा किए गए आंदोलन के दौरान निमंत्रण देने के बाद भी एक भी दिन संगठनों के नेताओं/कार्यकर्ताओं ने अपनी शक्ल तक भी नहीं दिखाई। असल में यही पाखंड ही इन का चरित्र है।
14 दिसंबर में इन संगठनों ने सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर महिला सुरक्षा के नाम पर एक महापंचायत का आयोजन किया जिसका प्रचार पूरे इलाके भर में माईक से किया गया। यह जानते हुए कि इस मुद्दे को लेकर शहर में पहले ही काफी तनाव हैए पुलिस प्रशासन ने इन महापंचायत को नहीं रोका। महापंचायत में परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के कार्यकर्ता भी पहुंचे। महापंचायत में मुस्लिमों के खिलाफ जमकर जहर उगला गया। आर.एस.एस और भाजपा के नेताओं से आगे बढ़कर सपा के जिलाध्यक्ष संजय सिंह अपनी कट्टरपंथी और सांप्रदायिक सोच का मुजाहिरा कर रहे थे। वे अपने को आर.एस.एस और भाजपा से भी बड़ा सांप्रदायिक राजनीति का चैंपियन घोषित करना चाह रहे थे। संजय सिंह ने कहा कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होने पर हमें दंगा मंजूर है जिससे हमारे हिंदु समाज का सर गर्व से ऊंचा उठा रहे। आर.एस.एस के नेता राधेश्याम यादव ने कहा कि हिंदू समाज का सर शर्म से ना झुके इसके लिए जरूरी है कि  उस लड़के को लालकुंआ में कदम न रखने दिया जाए। बजरंग दल के नेता ने कहा कि हिंदू लड़कों द्वारा मुस्लिम लड़कियों से शादी करने पर उनको कोई नहीं पूछता सब मुस्लिमों को पूछते हैं। इसलिए हमें एक ऐसा हिंदू कोष बनाना चाहिए ताकि ऐसे लड़कों पर उससे खर्च किया जा सके। ये बातें तो खुलेआम 400 लोगों के बीच कही जा रही थी। सुनने मे ये भी आ रहा है कि कई गुप्त बैठकें शहर में की गईँ। उनमें कितना जहर उगला गया होगा इसकी कल्पना की जा सकती है।
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र व पछास के कार्यकर्ता को अपनी बात रखने नहीं दी गई। जब पछास कार्यकर्ता बात रख रही थी, जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक विचारों का विरोध किया थाए तो उनका माइक छीनकर उनके व अन्य महिला कार्यकर्ताओं के साथ धक्कामुक्की की गई। पछास कार्यकर्ता के साथ संघी मंडली ने मारपीट की। ये बात गौरतलब है महिला सुरक्षा के नाम पर बुलाई गई इस महापंचायत में महिलाओं को नहीं बुलाया गया था और जो महिलाएं अपनी पहलकदमी पर पहुंची उनके साथ संघियों द्वारा अभद्र व्यवहार किया गया। ये है संघियों की महिला सुरक्षा। दरअसल महिला सुरक्षा की आड़ लेकर वह सांप्रदायिकता व दंगा फैलाने के फिराक में थे।
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र व परिवर्तनकामी छात्र संगठन कार्यकर्ताओं ने जब मारपीट की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो पुलिस ने एफ.आई.आर दर्ज करने के बजाए समझौता कराने वाली समझौताकार की भूमिका में उतर आई। कई घंटों बाद जाकर ही उन्होंने तहरीर ली। पुलिस प्रशासन यह जानती है कि मुजफ्फरनगर में ऐसी ही एक महापंचायत के बाद दंगे हुए थे लेकिन फिर भी उसमें न सिर्फ महापंचायत को नहीं रोका बल्कि महापंचायत के समय वहां एक भी पुलिस कर्मी नहीं था न ही उसने भाषणों की रिकॉर्डिंग की। जबकि थाना 50 मीटर दूर था।

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

किसानों ने इ.सी.एल. को आईना दिखाया

                                                      डॉ. मिथिलेश दाँगी
इस्टर्न कोल लिमिटेड (इ.सी.एल.) का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक खदान है राजमहल खनन परियोजना ललमटिया। यह परियोजना झारखण्ड प्रदेश के गोडा जिला के बोआरीजोर प्रखण्ड में स्थित है। कुछ लोग बताते हैं कि यह परियोजना एशिया की सबसे बड़ी परियोजना है। इस परियोजना का कोयला एन.टी.पी.सी. के फरक्का तथा कहलगांव बिजली उत्पादन केन्द्रों को दी जाती है।
जैसा कि सभी जानते हैं इस तरह की खनन परियोजनाओं की जब शुरुआत की जाती है तब विकास की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। लोग उसी विकास के झांसे तथा मालिक से नौकर बनकर अपने आने वाली संतानों के उज्ज्वल भविष्य का दिया स्वप्न देखकर अपनी पूर्वजों की थाती को बेरहम परियोजनाओं के हवाले कर देते हैं। ज्यों-ज्यों समय गुजरता जाता है त्यों-त्यों इन जमीन मालिकों को अपने इस कुकृत्य पर रोना आता है। कहते हैं न ‘‘अब पछताए होत क्या जब चिडि़या चुग गई खेत।’’ ऐसे लालची लोग अपने तथा कथित उदार कृत्यों के कारण देश के करोड़ों विस्थापितों में शामिल होकर गुमनामी के अंधेरे में गुम हो चुके हैं तो कुछ लोग आज भी लालच के चश्मे के कारण आंखों से देखकर भी मक्खी निगल रहे हैं।
राजमहल परियोजना में भी प्रारम्भिक दौर के बड़े-बड़े वायदों के साथ लोगों की जमीने ली गई। लोग ने बड़े सपनों के कारण अपनी स्थायी संपत्ति से हाथ धो बैठे। हांलाकि प्रारम्भ में इस परियोजना ने कुछ लोगों को पुनर्वासित भी किया तथा कुछ मुट्ठीभर चालाक एवं पहुंच वालों को नौकर भी बनाया परन्तु 1990 के बाद विश्व के कॉरपोरेट जगत में कुछ घिनौने परिवर्तन हुए वह था ‘‘सामाजिक सरोकारों के स्थान पर सिर्फ लाभ की ललक’’। इस परिवर्तन ने उत्पादन को बेतहाशा बढ़ाने
की सोची और अधिक लाभ के वशीभूत होकर सारे कार्यों को निजी कम्पनियों के हवाले कर दिया, नतीजतन नयी बहालियाँ
रूक गईं। सामाजिक कार्यों के नाम पर लीपापोती शुरू हो गई। जमीन दाताओं को नौकरी के नाम पर किसान से ठेका
मजदूर बना दिया गया और फिर 5-8 साल के भीतर उन्हें नगरों में दैनिक मजदूरी करने पर विवश कर दिया। कम्पनी द्वारा
नौकरी, घर, पानी, बिजली, स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपलब्ध कराने का वादा हमारे राजनेताओं के वायदों की तरह हवा हो गए। ललमटिया परियोजना के खनन पीट 100-200 मीटर की दूरी पर बसा है लोहण्डिया बाजार। यहाँ अधिकांश लोग व्यापारी वर्ग के हैं। अतः वे चल सम्पत्ति के प्रति ज्यादा आसक्ति रखते हैं। इन्हें अपने पुरखों द्वारा प्रदत्त अचल सम्पत्ति में ‘अ’ उपसर्ग इनके व्यवसाय की वृद्धि में नकारात्मक दिखाई दिया अतः उसे विकास हेतु नष्ट करने की ठानी और ललमटिया परियोजना में जाकर अंचल को ‘चल’ में बदल दिया। इस परिवर्तन ने कम्पनी के अधिकारियों को गाँवों में विरोध एवं लोगों के संघर्ष के कारण भीगी बिल्ली बने थे आज बब्बर शेर बना दिया। अब कम्पनी ने इस गाँव के कुछ लालची युवकों को ग्राम विकास समिति की सलाह दी और यह लालच दिया कि सी.एस.आर. (सामाजिक दायित्व निर्वहन) का कार्य उनके माध्यम से ही कराया जाएगा। लड़के लालच के दलदल में फंस गए। कम्पनी ने गाँव के बीच से जाने वाली सड़क को बन्द कर दिया
तथा गाँव के बाहर से उसे तीनों ओर से घेरते हुए कच्ची सड़क बना दिया जिस पर चौबीसों घण्टे यातायात के वाहनों का आवागमन जारी रहता है। इधर इस गाँव की महिलाओं को शौच के लिए परेशानी होनी शुरू हो गई क्योंकि ना तो कम्पनी ने इतने करीब गाँव में लोगों के लिए न्यूनतम आवश्यक शौचालय की व्यवस्था की और ना ही कम्पनियों के माध्यम से विकास का ढिंढोरा पीटने वाली सरकारों ने इस सम्बन्ध में सोचा। इस तत्कालिक कारण के अलावे कम्पनी ने जमीन लेने के समय जितने भी वायदे किए थे उनमें से एक भी पूरा नहीं किया गया। कम्पनी के इस वादा खिलाफी के खिलाफ गाँवों के कुछ युवक तथा महिलाओं ने कम्पनी के कार्यों का खिलाफत करने का मन बना लिया। संघर्ष के नए पौधों को सींचने का कार्य आजादी बचाओ आन्दोलन के संघर्ष वीरो ने किया। अब वे संघर्ष में परिपक्व हो गए हैं। इन लोगों ने इ.सी.एल. एवं उनकी
अनुषंगी कम्पनियों के कार्यों को पहली बार जून माह में 15 दिनों के लिए रोक दिया। कम्पनी के लोग आन्दोलनकारियों से वार्ता करने को तैयार हुए। जिला प्रशासन की मध्यस्थता में कम्पनी के अधिकारियों एवं ग्रामीणों के बीच वार्ता हुई। ग्रामीणों ने कम्पनी को पूर्व में किए गए सभी वायदों को याद दिलाया और पुनः लिखित माँग पत्र सौंपा। कम्पनी ने उन सभी कार्यों को पूरा करने के लिए 15 दिन का समय लिया। परन्तु जैसा आज तक होता आया है। जिला प्रशासन ने कम्पनी के साथ मिलकर अपने वायदे के अनुसार काम करने के स्थान पर नेतृत्व कर रहे लोगों को झूठे मुकदमें में फंसा दिया। 
काम बंदी के दौरान हुए हानि का ठिकरा इन युवकों के सिर डाल दिया तथा करोड़ों के हर्जाने का भय इन युवकों को दिखाया। एक बार भी प्रशासन एवं कम्पनी के लोगों ने यह विचार नहीं किया कि आज जो स्थिति उत्पन्न हुई है उसके असली जिम्मेदार वे ही लोग हैं। हर्जाना तो इन्हें ही भरना चाहिए आन्दोलनकारियों को नहीं। यहाँ युवकांे ने साहस का परिचय दिया और अभयता के साथ आन्दोलन को जारी रखा। आज कम्पनी द्वारा किए जा रहे गैर कानूनी कार्यों के विरुद्ध लोगों में जबरदस्त संघर्ष का उबाल आ गया है।
अब कम्पनी के वादा ‌िखलाफी पर एक नजर -
1. कम्पनी ने वादा किया था कि स्थानीय युवकों को कम्पनी में स्थायी नौकरी देंगे। इसके विपरीत कम्पनी ने अपने आउटसोर्सिंग का कार्य करने वाली कम्पनियों में युवकों को अस्थायी तौर पर ठेका मजदूर बनाया फिर 2-3 वर्षों में 90ः की छंटनी कर उन्हें पलायन करने को मजबूर कर दिया।
2. घनी आबादी के अंतिम मकान से 100 मीटर की दूरी से कम में ब्लास्टिंग करना मना है परन्तु कम्पनी ने 10-20 मीटर की दूरी पर हैवी ब्लास्टिंग शुरू कर दीया। इससे आसपास के सभी घर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। घर की क्षतिपूर्ति का मुआवजा मांगने गए 15 युवकों पर रंगदारी का मुकदमा कम्पनी ने ठोक दिया। इस प्रकार कम्पनी ने चोरी और सीना जोरी की कहावत को चरितार्थ किया है।
3. ब्लास्टिंग एक निश्चित अवधि दिन के 12-1 बजे के बीच करना निर्धारित किया गया था। हैवी ब्लास्टिंग तो रात के 8 बजे भी करना शुरू किया। कई बार शाम के समय कई घण्टों में चूल्हे पर बन रहा भोजन ब्लास्टिंग के कंपन से जमीन पर गिर गया। इस हैवी ब्लास्टिंग का विरोध करने पर इसका असर एक दिन तक पड़ता है दूसरे दिन वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस ब्लास्टिंग का कंपन खदान से 3-4 किमी. तक अनुभव किया जा सकता है।
4. कम्पनी ने सभी घरों में शौचालय निर्माण के लिए लोहंडिया बाजार के गृहस्वामियों के खातों में नगद रुपए 25 जुलाई से 10 अगस्त 2014 तक जमा करने का लिखित आश्वासन दिया था परन्तु सितम्बर बीत जाने तक भी ऐसा नहीं किया गया।
5. खदान का पानी बरसात में लोगों के खेतों में नहीं छोड़कर नाले में छोड़ना था परन्तु कम्पनी लोगों की फसलों को बर्बाद करने की नीयत से उनके खेतों में छोड़ देती है जिससे कई किसानों की फसल नष्ट हो गयी।
6. पेयजल, शिक्षा, बिजली एवं स्वास्थ्य सुविधा देने का वचन आज तक अपने पूर्ण होने का बाट जोह रहा है।
7. कम्पनी ने वार्त्ता के समय लोगों को आश्वस्त किया था कि वे सभी मुकदमें बिना शर्त वापस लेगी लेकिन वक्त आने पर वह गिरगिट की तरह रंग बदलती है और भ्रष्ट झारखण्डी पुलिस को अपने वश में करके नेतृत्वकारी युवकों को गिरफ्तार करने आधी रात में उनके घरों पर जाती है और घर के सदस्यों के साथ गाली गलौज करती है। ऐसे कुकृत्यों एवं दमन ने लोगों को भयभीत करने के स्थान पर एकजुट कर शोषण के खिलाफ दृढ़ संकल्पित कर दिया है जिसका नतीजा है कि सितम्बर के प्रथम सप्ताह में पुनः खदान का खनन कार्य लोगों ने दूसरी बार पूरी तरह ठप कर दिया। अब लोगों ने 8 जुलाई 2013 में आए सर्वोच्च न्यायालय के एक अहम फैसले जिसमें कहा गया है कि ‘‘खनिज का मालिक जमीन मालिक ही है सरकार नहीं’’ के अनुरूप आगे होने वाले विस्तार को रोकने के लिए पूरी तरह कमर कस के तैयार हैं। 
साभ्‍ाारः पीपुल न्यूज नेटवर्क (पीएनएन)

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

छत्तीसगढ़ में कोयला खदान आवण्टन में महाघोटाला

                                                                     एस.के. राय
आजादी बचाओ आन्दोलन के अथक प्रयास से देश की कोयला खदान घोटाले पर कैग (मुख्य लेखाधिकारी) के साथ देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी इसे संज्ञान में लेने को बाध्य होना पड़ा, कैग ने तो सम्पूर्ण देश में 1.86 लाख करोड़ का नुकसान बताया जबकि यह लगभग 50 लाख करोड़ का होता है। आन्दोलन ने देश के कोने-कोने में जब इस विषय पर जनजागरण का बीड़ा उठाया तो एक नया विकल्प भी सामने रखा कि प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? जब संसाधनों की मालकियत के बारे में सवाल उठाया जाने लगा तो न्यायालय को भी यह कहना पड़ा कि प्राकृतिक संसाधनों की मालिक जनता है, इसी आधार पर जब जाँच शुरू हुई तो देश के 218 कोयला खदान आवण्टन को ही अवध्ै ा पाया गया, इन अवैध खदानो ं में 62 कोयला खदानों का केवल छत्तीसगढ़ राज्य में पाया जाना और अधिकांश खदान भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमन्त्री श्री रमनसिंह के शासन में आवण्टन करना सीधा श्री रमणसिंह पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने के लिए पर्याप्त है।
कोयला मन्त्रालय की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ में कोयले का कुल भण्डार 49280.25 मिलियन टन है, इनमें से 11170.6 मिलियन टन कोयला अवैध खदानों में बाटा गया है जिसका न्यूनतम अनुमानित मूल्य 33,51,180 करोड़ रुपये है। शासन के साथ मिलकर उद्योगपतियों ने जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट को अंजाम दिया उसका तार मध्यप्रदेश के एसएमएस इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की एक कम्पनी जिसके ज्वाइण्ट एमडी अजय संचेती बीजेपी के राज्यसभा सांसद हैं और बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी वर्तमान में केन्द्रीय मन्त्री के करीबी माने जाते हैं। भटगाँव कोयला खदान के साथ-साथ नवीन जिंदल स्टील एण्ड पावर जो रायगढ़ जिले में स्थित हैं।
आजादी बचाओ आन्दोलन के साथी यहाँ स्थानीय संगठनों के साथ मिलकर तमनार क्षेत्र में गैर कानूनी रूप से आवंटित गारे की कोयला ब्लाक को निरस्त करने में सफलता के साथ यहाँ पर प्राकृतिक संसाधनों में जन भागीदारी और मालकियत स्थापित हेतु उत्पादक कम्पनी का गठन किया गया जो कम्पनी कानून के अनुसार पंजीकृत भी हो चुकी है, शीघ्र ही यहाँ कोयला उत्पादन शुरू होने की सम्भावना है।
जब तमनार क्षेत्र में आन्दोलन के साथी अवैधानिक कार्य में लिप्त नवीन जिन्दल जो सांसद भी हैं के विरोध में सक्रिय थे तब यह जानकर हैरानी हुई कि आदिवासियों के नाम पर बेनामी जमीन खरीद कर कम्पनी ने किस तरह कानून को मजाक बना दिया। छत्तीसगढ में आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासी नहीं खरीद सकते उसके लिए 170 ख कानून बनाया गया है, इस कानून को धोखा देने के लिए किसी भी आदमी को आदिवासी बनाकर पंजीयन कार्यालय में खड़ा कर दिया जाता है और बनामी पंजीयन भी हो जाता है, यह कार्य शासन-प्रशासन की मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता, डरा धमका कर जन सुनवाई करना,  विरोध करने पर पुलिस द्वारा लाठियाँ चलाने की बात तो आम हो चुकी है, तमनार में भी जन सुनवाई के दौरान नवीन जिन्दल के साथ मिलकर पुलिस ने लाठी चार्ज किया इसमें कई पुरुष महिलाएँ घायल हुए। नवीन जिंदल पर एफ.आई.आर. दर्ज हो चुका है निकट भविष्य में इसकी गिरफ्तारी को कोई टाल नहीं सकता।
वनाच्छादित जैविक संसाधनों से पूर्ण, वन्यजीवों से भरपूर, छत्तीसगढ में आदिवासियों की जीविका का एक मात्र साधन इस प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने के लिए उद्योगपतियों के साथ शासन भी जिस तरह से जनता पर अत्याचार का पर्याय बनता जा रहा है उससे न केवल जनसमुदाय त्रस्त है बल्कि वन्यजीवों के लिए भी अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है, खदान के नाम पर बीहड़ जंगल की बलि दी जा रही है वहाँ के वन्यजीव गाँव की ओर चले आते हैं अब तो शहर पर भी उन्होंने हमला करना शुरू कर दिया है, खदान के कारण मनुष्य और हाथियों के भी संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
सम्पूर्ण क्षति का आंकलन करना किसी भी स्थिति में सम्भव नहीं, पर्यावरण का जो नुकसान होगा उसकी तो भरपाई सैकड़ों वर्षो तक सम्भव नहीं, छत्तीसगढ ही नहीं देश-दुनियाँ में जहाँ भी प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन हुआ है वहाँ प्रकृति का रौद्ररूप देखने को मिला जिसने सम्पूर्ण प्राणिजगत के लिए अस्तित्व का सवाल खड़ा कर दिया है, अब समय आ चुका है कि हम ठहरें और विचार करें कि विकास मनुष्य के लिए या मनुष्य विकास के लिए हैं, उत्तराखण्ड और अभी हाल कश्मीर का महाजलप्लावन, जल सैलाब प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही दुष्परिणाम है। छत्तीसगढ का कोरबा, भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है पिछले 3 वर्ष पूर्व की रिपोर्ट के अनुसार चौथे स्थान पर था आज यदि जाँच हो तो यह दूसरे स्थान पर अवश्य होगा, इसका मुख्य कारण कोयला खदान और ताप विद्युत कम्पनियाँ ही हैं। विकास के नाम पर विनाश की ओर बढ़ते हुए छत्तीसगढ को इन गम्भीर समस्याओं पर विचार करना होगा।
साभारः पीएनएन