गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

इटली और यूनान पर बैंकरों का शासन

जिन्होंने दर्द दिया अब वे ही दवा देंगे
    ऐसा लगता है कि कल यानी सोमवार की सुबह तक यूनान और इटली दोनों देशों पर तथाकथित 'टेकनोक्रेटिक' सरकार का शासन हो जायेगा। हालाँकि ये दोनों प्रधान मन्त्री, यूनान के जिओर्ज पपेंद्रेयू और इटली के सिल्विओ बर्लुस्कोनी संसदीय चुनावों में बाकायदा जीत कर सत्ता में आये थे और कभी संसद में विश्वास मत में पराजित नहीं हुए, फिर भी उन्हें हटा दिया गया है और उनकी जगह पर दो अनिर्वाचित केन्द्रीय बैंक के पूर्व बैंकर और हेज फण्ड और इनवेस्टमेंट बैंकों के पूर्व एक्सेक्युटिव प्रधान मन्त्री बन रहे हैं। हम कह सकते हैं कि अब से यूनान और इटली की जनता पर सीधे वित्तीय बाजार का शासन होगा।
    पपेंद्रेयू का कहना है कि जनतान्त्र को बाजार से ऊपर रखा जाना चाहिए। बर्लुस्कोनी फरमाते हैं कि तकनीकशाहों का शासन "एक गैरजनवादी तख्ता पलट होगा" जो 2008 के चुनाव परिणामों के खिलाफ होगा। लेकिन हो यही रहा है। यूनान में लुकास पपादेमोस प्रधान मन्त्री बनाने वाले हैं। वे यूनान के केन्द्रीय बैंक के मुखिया थे जब यूनान ने 'यूरो' में प्रवेश किया और इसे हासिल करने में अपनी प्रधान भूमिका को ही अपनी उपलब्धि बताते हैं। अब वे यूनान को 'यूरो' में बनाये रखने के लिए पद सम्हाल रहे हैं. जबकि सरकोजी का कहना है कि यूनान को 'यूरो' में शामिल किया जाना एक गलती थी। जब यूनानी अधिकारी यूरोपीय संघ के आधिकारियों को अपनी वित्तीय स्थिति के बारे में गुमराह कर रहे थे तो उनके मुखिया पपादेमोस ही थे और उन्होंने ही अमीरों से टैक्स न लेने के फैसलों द्वारा यूनान की अर्थ व्यवस्था को इस दशा में पहुँचाया है। यूनान का शासन उसी व्यक्ति के हाथ में होगा जो यूनान को रसातल में पहुचने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। यह उसी प्रकार होगा जैसे ओबामा को इसलिए पद छोड़ना पड़े कि वे कल्याणकारी खर्चों में पर्याप्त कटौती करके बजट को सन्तुलित करने में असफल रहे और उसकी जगह एलन ग्रीनस्पान काबिज हों जाएँ।
    इटली में मारिओ मोंटी और ग़िउलिअनो अमाटो पद सम्हालने वाले हैं। मोंटी मुख्यधारा के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने थोड़े समय के लिए गोल्डमैन शैक्स (चौंकिए मत) में काम किया और फिर लम्बे समय के लिए यूरोपीय संघ के प्रतिस्पर्धा आयुक्त बन गए, जहाँ उन्होंने बाजार के 'उदारीकरण और विनियमन' के लिए काम किया। वे यूरोपीय केन्द्रीय बैंक (इसीबी) के नए प्रधान सुपर मारिओदराघी के गहरे मित्र हैं, जो खुद भी एक इतालवी बैंकर है। 1990 के दशक में जब इटली औए यूनान सहित अनेक देशों ने सरकारी ऋण और घाटे को आधिकारिक खातों से गायब करने के लिए, खासकर, गोल्डमैन शैक्स के साथ मिलीभगत से जानबूझ कर ऋण की अदला-बदली में हिस्सा लिया, तब यह शख्स दराघी इतालवी कोष का महा निदेशक था, उसके बाद वह गोल्डमैन शैक्स में शामिल (2002-2005) हो गया। दराघी और पपादेमोस दोनों ने अमेरिका के एमआईटी से 1978 में अर्थशास्त्र में डाक्टरेट हासिल किया था। अमाटो एक सेंटर लेफ्टपूर्व प्रधान मन्त्री हैं जो नब्बे के दशक के भ्रष्ट और बदनाम सामाजिक जनवादी प्रधान मन्त्री क्राक्सी के करीबी हैं। वे इतालवी एंटी ट्रस्ट आयोग के प्रधान थे और इन्होने भी अपने कार्यकाल में अर्थव्यवस्था खासकर वित्तीय सेवाओं के विनियमन के लिए काम किया।
    ये साहब सिल्विओ बर्लुस्कोनी इटली के रुपर्ट मुर्दोक की तरह हैं, या उससे भी गए गुजरे। वे इटली के मीडिया मुग़ल हैं जो पार्टिओं और युवा महिलाओं में अपनी बदनाम दिलचस्पी के साथ साथ तीन तिकड़मों, घूस और भ्रष्टाचार के अनगिनत कारनामों के बूते पिछले पंद्रह सालों से राजनीति में छाए हुए हैं। अपनी दूसरी कारगुजारियों की ही तरह यूरो संकट से उनकी किनाराकशी भी कमाल की थी। सिर्फ पिछले ही सप्ताह उन्होंने कहा, " इटली का जीवन एक समृद्ध देश का जीवन है। उपभोग में कोई कमी नहीं आयी है, हमारे हवाई जहाजों में सीट मिलना मुश्किल हैहमारे रेस्टुरेंट लोगों से भरे हुए हैं". इसके पहले न्यू यार्क स्टाक एक्सचेंज में बोलते हुए उन्होंने फ़रमाया था " इटली अब निवेश करने के लिए बड़ा ही उम्दा देश है... हमारे यहाँ कम्युनिस्टों की तादात घट गयी है और जो अभी बचे हुए हैं वे भी कभी कमुनिस्ट थे, इससे इनकार करते हैं। इटली में निवेश करने का एक और कारण यह है कि हमारे यहाँ खूबसूरत सेक्रेटेरियाँ हैं..... बेहतरीन लडकियाँ। 2009 में मध्य इटली में जब भूकम्प आया था, तो बेघर हुए भूकम्प पीड़ितों से उन्होंने कहा था कि उन्हें अपनी परेशानी को "सप्ताहान्त की कैम्पिंग" की तरह लेना चाहिए।लेकिन यह भांड कम से कम चुन कर आया था। अब उसकी जगह कोई नया निर्वाचित नेता नहीं केन्द्रीय और निवेशक बैंकों का बन्दा होगा। वो सीधे यूरोपीय संघ, यूरोपीय केन्द्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की खतरनाक तकड़ी से आदेश प्राप्त करेगा। अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रधान हैं पूर्व फ़्रांसिसी वित्त मन्त्री क्रिस्तीन लगार्द। लगार्द सरकारों को उनके ऋणों के 'सृजनात्मक लेखाकरण' के लिए सुझाव देने वाले एक वैश्विक फर्म की प्रमुख थीं और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दूसरे नम्बर का अधिकारी डेविड लिप्टन एक वैश्विक हेज फण्ड मूर कैपिटल में काम करता था। यूनान के बेलआउट (ऋणोद्धार) पैकेज को सम्हालने वाला यूरोपीय संघ का निकाय है 'इएफएसएफ' और यही इतालवी ऋण को भी खरीद सकता है। इस फण्ड 'इएफएसएफ' का प्रमुख क्लाउस रेग्लिंग भी हेज फण्ड मूर कैपिटल में काम कर चुका है। 2009 में उसने भाषण दिया कि "पूरी योजना के मद्देनजर मौद्रिक संघ आनेवाले दस वर्षों में पिछले दस वर्षों की तुलना में अधिक बेहतर काम करेगा।" 'इएफएसएफ' द्वारा बांड जारी करने के शुल्क की दर 1 प्रतिशत की होगी और इसके सम्भावित कुल राशि 100 अरब अमेरिकी डॉलर का यह हिस्सा बड़े यूरोपीय बैंकों और गोल्डमैन शैक्स जैसों के खाते में जाएगा। वे ही 'बेल आउटके पैसे से मालामाल होंगे।
     ये बैंकर अब सत्ता में इसीलिए हैं कि यूनानी और इतालवी जनता द्वारा चुने गए नेता सरकारी बांडों में पैसा लगाने वाले निवेशकों की माँगों को पूरा करने में असफल रहे। यूरोप के बैंकों, पेनशन और बिमा कम्पनियों और हेज फंडों ने यूनान और इटली में सरकारी ऋणों को खरीदना बन्द कर दिया। ऐसा नहीं है कि इन निर्वाचित नेताओं ने वित्तीय क्षेत्र की माँगों को पूरा करने की कोशिश नहीं की। यूनान के सामाजिक जनवादी नेता वित्तीय पूँजी की धुनों पर थिरकने के लिए दंगे, हड़ताल और अपनी पार्टी में ही विरोध झेलने के लिए तैयार थे। इटली का मध्य-वाम विपक्ष संसद में एक और निष्ठुर बजट को पारित करने देने में सहमत हो गया है। लेकिन ये सारी कोशिशें उनके ऋणदाताओं की क्षुधापूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं थीं। अब बैंकर यही चाहते हैं कि उनके अपने लोग ही कमान सम्हालें। और इनकी योजना क्या है ? ये बैंकर सार्वजनिक क्षेत्र के खर्चों पर और अधिक कटौती, जनता पर और ऊँचे टैक्सों का बोझ , राज्य की सम्पद्दा के भरी पैमाने पर निजीकरण और ऐसे ही दूसरे उपायों पर अमल के द्वारा वे यह सुनिश्चित करना चाहेंगे कि यूरोपीय वित्तीय क्षेत्र द्वारा खरीद रखे गए बांडों का पूरा भुगतान हो और उसमें कोई व्यतिक्रम न हो यानी उसका कोई भी हिस्सा नहीं डूबे। यूनान को उसके निजी क्षेत्र के 50 % कर्जों पर आंशिक रूप से व्यतिक्रम के इजाजत दी गयी है, लेकिन इसके बावजूद एक औसत यूनानवासी को अगले दशक तक उसके जीवन स्तर 30% की गिरावट झेलनी पड़ेगी। ;लेकिन इससे भी उसे बोझ से मुक्ति नहीं मिलेगी। दशक के अन्त तक सरकारी कर्ज सकल घरेलू उत्पाद का अन्ततः 120% होगा, जबकि अधिक सम्भावना यही है कि यह 140% हो। इसके भुगतान की जिम्मेदारी यूनानियों की एक पूरी पीढ़ी पर होगी। इतालवी जनता के साथ भी यही कुछ हो रहा है। बारी के निवासी एक 58 वर्षीय इतालवी नागरिक पिएत्रो पप्पगाल्लो बताते हैं, "मैं अपनी बचत के बारे में चिन्तित हूँ कि यह रद्दी कागज में तब्दील हो जा सकता है। इतनी कोशिशों से कुछ जोड़ा था लेकिन मुझे उसका कुछ भी नहीं मिलेगा। अब तक मेरे पेनशन में चार बार बदलाव हो चुका है। मैंने सेवानिवृति की योजना बनायी थी और अब वे कह रहे हैं कि और काम करना होगा। एक पिता के तौर पर मुझे अपने बच्चों की फ़िक्र है जिनके लिए शायद पेनशन होगा ही नहीं
     वित्तीय पूँजी पूरा भुगतान चाहती है और उसे यह बर्दाश्त नहीं है कि उसका जरा सा निवेश भी डूबे। लेकिन यूरो नेतृत्व यह भी चाहता है कि यूनान और इटली जैसे देश जिन्हें वह लम्पट राज्य समझता है वित्तीय होशियारी का अनुसरण करें और सन्तुलित बजट पर अमल करें तथा अपने कर्जे को कम करें जिससे कि पूँजीपतियों के मुनाफों पर टैक्स का बोझ घटाया जा सके। और वे चाहते है कि यूरोज़ोन बचा रहे क्योंकि यह अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में यूरोप के महत्व और महत्वाकांक्षा का आधार है। इस दृष्टि से 'यूरो' का बिखरना घातक होगा। लेकिन पिछले महीनों के घटनाक्रम के बाद ऐसा लगता है कि अब वे यूनान को 'यूरो' से निकल भगाने का मन बना चुके हैं यदि वह उनके वित्तीय लक्ष्यों को पूरा नहीं करता है और अपनी जनता के जीवन स्तर में भरी कटौती नहीं करता। लेकिन यदि इटली डूबता है तो यह यूरो को भी ले डूबेगा। और इसे दुरुस्त करने के लिए ही बैंकरों का आगमन हुआ है।
    सचाई यही है कि सामाजिक जनवादी नेताओं द्वारा वित्तीय मितव्ययिता, निजीकरण, पेनशन लाभों में कटौती और श्रम सुरक्षा कानूनों के विनाश की 'नव उदारवादी' नीतियों को लागू करने की सभी कोशिशों के बावजूद यूनान तिकड़ी द्वारा दिए गए लक्ष्यों को पूरा नहीं कर सकता। 2012 में उसका ऋण भुगतान में व्यतिक्रम होना तय है। इटली का मामला थोडा अलग है। हालाँकि इसका सरकारी ऋण का अनुपात यूरोपीय स्तर से ऊँचा है, ज्यादातर क़र्ज़ इतालवी बैंकों से लिए गए है विदेशी बैंकों से नहीं। अगर आप कर्जों पर ब्याज के भुगतान को छोड़ दें तो सरकार ने 'अपने बही खातों को सन्तुलित करना' शुरू कर दिया है और इतालवी अभी भी विदेशों में सामन बेच सकते हैं। इस तरह इटली जीवन स्तर, नौकरियों और सार्वजनिक सेवाओं की कीमत पर भुगतान संकट से बच सकता है।
    साम्राज्यवाद का दौर वित्तीयपूँजी के शासन का दौर होता है। लेकिन सरकारों के उठने बैठने से लेकर रोजमर्रा के कामकाज और जीवन के हर क्षेत्र में उनकी जो दखलन्दाजी आज देखने में आ रही है वह अभूतपूर्व है। इटली और यूनान को वित्तीय पूँजी के हाथों जो जलालत झेलनी पड़ रही है, उसने बहुत सारे लोगों को चिंतित और परेशान कर दिया है। कीन्स के अनुयायी यह तर्क दे रहे हैं कि यदि लोकतान्त्रित ढंग से चुनी हुईं ये सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र द्वारा लिए गए कर्ज को वापस लेने की कोशिश करें और इस प्रक्रिया में यदि बैंक भड़क जाएं तो उपभोक्ताओं की बचत को सुरक्षित रखते हुए बैंकों को अधिग्रहित कर लिया जाए और उद्योग एवं जनसामान्य को आसान शर्तों पर ऋण देकर अर्थव्यवस्था को गतिमान किया जाए तो समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन आज की स्थिति में यह एक हवाई कल्पना ही है। अतीत में जब ऐसी चीजें हुईं थीं तो दुनिया भी दूसरी थी और पूँजीवाद भी दूसरे किस्म का था। आज दुनिया के पैमाने पर जिस तरह पूँजीवादी लूट है और उसको सम्भव बनाने वाली नव उदारवादी नीतियों का जो स्वरूप है उसमें यह किसी भी तरह से सम्भव नहीं है कि दुनिया के नए शहंशाहों को अपने मुनाफे में रत्ती भर की कटौती करने को बाध्य किया जा सके। अगर यूरोप जैसे मजबूत राष्ट्रों की सरकारें उनके आदेशों को सामने नतमस्तक होने के लिए तैयार हैं तो फिर दूसरों का पूछना ही क्याइस बात की थोड़ी समझदारी कि यूनान और इटली को यह जलालत क्यों झेलनी पड़ी इसे समझने से हो सकती है कि आखिर यह संकट पैदा ही क्यों हुआ? दरअसल बजट घाटों से पैदा हुए भुगतान के संकट से निकलने का सरकारों के पास परम्परिक तौर पर दो रास्ते हुआ करते थे। पहला यह कि वह टैक्सों की दर को ऊँचा कर राजस्व वसूली को बढ़ा कर घाटे की पूर्ति करती थी। ऐसा करने का उसके पास कानूनी अख्तियार होता था और अमूमन ऐसा ही किया जाता था। लेकिन अगर किसी कारण से ऐसा करना तात्कालिक तौर पर सम्भव नहीं हो तो उसके पास दूसरा रास्ता यह होता था कि वह अपने केन्द्रीय बैंक से पैसा उधर ले लेती थी और आवश्यकतानुसार केन्द्रीय बैंक अधिक नोट छाप कर उसकी भरपाई कर सकता था।  

    सरकारों के भुगतान की इस क्षमता के कारण उनके द्वारा लिए गए ऋणों को ऋणदाता वित्तीय संस्थाओं द्वारा अत्यन्त ही सुरक्षित समझा जाता था और इसीलिए उन्हें 'सोवेरेन' ऋणों का नाम मिला था। लेकिन जब राष्ट्र और उनकी सरकारें ही 'सोवेरेन' न रह जायें तो उनके ऋणों का क्या हो?कुछ ऐसा ही मामला 'यूरो जोन' के देशों के साथ हो रहा है। ये दोनों ही पारम्परिक समाधान आयरलैण्ड, पुर्तगाल, यूनान और इटली जैसे संकटग्रस्त देशों को उपलब्ध नहीं हैं। दरअसल, इन अधिकारों को यूरोपीय केंद्रीय बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ की तिकड़ी ने अधिग्रहित कर लिया। इस तिकड़ी की मिलीभगत से पूरी दुनिया की तरह ही यूरोप की सरकारें नीतियों के जिस ताने बाने का अनुसरण कर रही हैं, उसके अनुरूप अमीरों के मुनाफे और बचत से किसी छेड़खानी का अधिकार नहीं है। इसके चलते, सरकारों द्वारा टैक्स उगाही कर अपने घाटे की पूर्ति करने की सम्भावना बहुत ही कम हो जाती है। दूसरी ओर, अधिक नोट छाप कर घाटे की पूर्ति करने का विकल्प भी 'यूरो' के आने के साथ समाप्त हो चुका है। क्योंकि 'यूरो' किसी एक सरकार के इच्छाओं और आवश्यकताओं के अनुसार न संचालित होकर कुछ ऐसे आर्थिक नियम कानूनों से संचालित होता है, जिनकी देख रेख और उनको लागू करने की जिम्मेदारी यूरोप के पैमाने पर कुछ बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से पूरी की जाती है। इस प्रक्रिया पर भी इसी तिकड़ी का एकाधिकार है। ऐसी हालत में सरकारों के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं रहा है कि वे अपनी समस्याओं का खुद समाधान कर सकें। सरकारों के सार्वभौमिकता का ह्वास का यह पहलू यूरोप के संकट के पैदा होने से पहले प्रत्यक्ष नहीं हुआ था और अब जब वह खुल कर सामने आ गया है तो 'यूरो जोन' का अस्तित्व ही खतरे में है।
    यहाँ यह बात स्पष्ट कर देनी चाहिए कि सरकारों की यह ऋणग्रस्तता इसलिए नहीं पैदा हुई है कि उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं या अन्य मदों में अनाप-शनाप खर्च किया है, जैसा कि यह तिकड़ी हमें मानने को मजबूर कर रही है। दरअसल, बहुत सारा कर्ज तो इन्हीं बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को ऋणोद्धार (बेलआट) के द्वारा रक्षा करने के कारण हुआ है। इसके अलावा इसका एक बड़ा हिस्सा अमीरों को न छूने की रुढ़िवादिता के कारण इकट्ठा हुआ है। ऐसी परिस्थिति में अब वही बैंक और वित्तीय संस्थाएं उन कर्जों को सरकार को वापस मांग रही हैं जो दरअसल उन्हीं का उद्धार करने के लिए ली गईं थीं। वस्तुतः यह एक ऐसा गड़बड़झाला है जिसमें वे ही संस्थाएं जो संकट के पैदा होने के मूल में है, उसके समाधानकर्ता के रूप में हाजिर हुई हैं। समाधान का उनके पास जो एक मात्र रास्ता है वह यही है कि जनता को हासिल हो रही सुविधाओं में और कटौती किया जाए और तथाकथित मितव्ययिता के द्वारा उन्हें उनके वेतन, पेंशन, बचत आदि पर और डाका डाला जाए। यह एक ऐसा समाधान है जो लंबे समय में नहीं बल्कि तत्काल ही समस्या को और अधिक घनीभूत रूप से वापस ला देगी। यह एक ओर तो पूरे यूरोप में मितव्ययिता के खिलाफ जारी आक्रोश को और बढ़ा देगी और दूसरी ओर अति संचय के संकट को और घनीभूत कर देगी।
    ऐसे में असली समाधान तो एक ही है कि इस बात को पुरजोर तरीके से रखा जाए कि यह संकट दरअसल पूँजीवाद का संकट है। नवउदारवादी नीतियों ने संकट को गहरा बना दिया है लेकिन संकट उसके चलते नहीं है। इन नीतियों में बदलाव करने के बाद भी संकट टल सकता है, खत्म नहीं हो सकता है। मजदूरों की ताकत का उठ खड़ा होना और पूँजीवाद का नाश ही समस्या का समाधान है।

साभार 


शनिवार, 3 दिसंबर 2011

मारुति आंदोलन : लड़ाई सिर्फ स्थगित हुई है

-देवेन्द्र प्रताप
1981 में स्थापित मारुति उद्योग लिमिटेड से 2007 में बने मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड तक कि कहानी हमारे देश के हुक्मरानों के बड़े साम्राज्यवादी मुल्कों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने लगातार समर्पण करने की कहानी है। भारत सरकार ने मारुति इंडिया लिमिटेड की स्थापना एक सार्वजनिक कंपनी के तौर पर की थी। 1982 में इस कंपनी में जापानी कंपनी सुुजुकी का शेयर महज 16 प्रतिशत था। धीरे-धीरे मारुति कंपनी में सरकार का शेयर घटता गया और सुजुकी का शेयर बढ़ता गया। आज सुजुकी, इस कंपनी की वास्तविक मालिक बन गई है। यह सब बाजार की स्वस्थ प्रतियोगिता के नतीजे के रूप में नहीं हुआ। हमारे हुक्मरानों ने जानबूझकर जबर्दस्त मुनाफा देने वाले इस उद्यम को साजिशन एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के हाथों सौंप दिया।
 जिस '80 के दशक में जापानी कंपनी सुजुकी, भारत की सार्वजनिक कंपनी मारुति की पार्टनर बनी, वह दशक भारत में भविष्य में होने वाले कई तरह के मजदूर विरोधी बदलावों की पूर्वपीठिका तैयार करने के लिए जाना जाता है। इसी दशक में पहली बार (1982) भारत में एशियार्ड का आयोजन हुआ। एशियार्ड के चार साल बाद भारत में नई शिक्षा नीति लागू होती है। इस शिक्षानीति के कारखाने से तैयार लोग भविष्य में ‘‘महाशक्तिशाली भारत’’ के लिए ‘कलपुर्जे’ बनने वाले थे। जाहिर है कि यह एक ऐसा दौर था, जब भारत का उभरता हुआ मध्यवर्ग भी यूरोप और अमेरिका के मध्यवर्र्ग की बराबरी करने के सपना बुनने लगा था। आज हमारे देश के मध्यवर्ग का वह हिस्सा, जो अमेरिका की हर ‘आतंकी कार्रवाई’ पर खुश होता है, उसे इसी दौर में खाद-पानी देकर तैयार किया गया। 1991 में जब भारत सरकार ने नई आर्थिक नीति लागू की तब एक तरफ जहां समूचे देश के मजदूरों ने इसका तगड़ा विरोध किया, वहीं साम्राज्यवाद और पूंजीवाद परस्त मध्यवर्ग के एक तबके ने निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों का गुणगान करने का काम किया। भारत के पूंजीवादी मीडिया ने इसी मध्यवर्ग के सुर में सुर मिलाया और धीरे-धीरे एक ऐसी मानसिकता तैयार की कि जैसे भारत का विकास साम्राज्यवादी पूंजी के बेरोकटोक देश में प्रवेश और सरकारी उद्यमों के निजीकरण के बिना संभव ही नहीं है। जाहिर है मजदूर विरोधी इन नीतियों के लागू होने के रास्ते में श्रम कानून बाधक थे, इसलिए देश की पूंजीवादी सरकारों ने पहले से ही श्रम कानूनों की भोथरी धार को और कुंद करने का काम किया। जनतंत्र का लबादा ओढ़ने वाली देश की पूंजीवादी पार्टियों का चरित्र भी इसी के साथ बेपर्दा होना शुरू हुआ। इसलिए 1982 में सुजुकी ने मारुति की भागीदार बनने का निर्णय लेकर कोई जुआ नहीं खेला था। सुजुकी के मालिकान इस बात को बखूबी जानते थे कि भारत सरकार कभी भी उनके खिलाफ अपने देश की मेहनतकश जनता का पक्ष नहीं लेने वाली। हुआ भी वही। मारुति के साथ भागीदार बनने के बाद जहां एक तरफ सुजुकी का शेयर लगातार बढ़ता गया, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार का शेयर घटता गया। दस साल बाद यानी 1992 में भारत सरकार ने मारुति का निजीकरण करके मारुति के मजदूरों को पूरी तरह मैनेजमेंट के रहमोकरम पर छोड़ दिया।
इसलिए इस वर्ष 4 जून को शुरू हुआ आंदोलन ऐसा कोई आंदालन नहीं था, जो स्वत: स्फूर्त ढंग से पैदा हो गया हो। इसकी नींंव उसी समय पड़ गई थी, जब भारत सरकार ने मारुति का निजीकरण करके उसके अंदर भारत
सरकार का बिल्ला टांगे और जापानी कंपनी सुजुकी के एक दलाल के रूप में वहां अपना एक प्रबंध निदेशक नियुक्त किया। बस फिर क्या था-जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहें का। यहीं से मजदूरों और मैनेजमेंट के बीच टकराहट बढ़ने लगी। वर्ष 2000 में प्रोत्साहन भत्ते को लेकर शुरू हुआ मारुति सुजुकी के मजदूरों का आंदोलन मैनेजमेंट के इसी तरह के तानाशाहाना व्यवहार का नतीजा था। इस आंदोलन की गूंज संसद तक सुनाई पड़ी। लेकिन, लगता है उस समय कंपनी के मजदूरों को मालिकान की वास्तविक ताकत का अंदाजा नहीं था। वे सोचते थे कि उनकी बात संसद में जाने पर उसे सुना जाएगा। कहीं न कहीं उन्हें इस बात का भरोसा था कि देश के राजनेता उनकी जायज मांगों के लिए उनका पक्ष लेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। संसद में इस मसले का लेकर पार्टियों ने नाटक किया, बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाई, लेकिन कंपनी ने इस सर्वदलीय बैठक के सुझावों को भी मानने से इंकार कर दिया। इस पर भी कंपनी के मजदूर मारुति के मालिकान की वास्तविक ताकत का सही अंदाजा नहीं लगा सके। हकीकत यही है कि उसे भारत की किसी भी संस्था (चाहे वह न्यायालय हो या फिर संसद) से कोई डर नहंी है। सच कहा जाए तो ये सभी संस्थाएं पूंजीपतियों के हितों की पूर्ति के लिए ही बनाई गई हैं और वे मूलत: उन्हें के हितों की पूर्ति भी करती हैं। नतीजतन इस आंदोलन को बुरी तरह पराजय का मुंह देखना पड़ा। कंपनी ने तीन हजार से ज्यादा स्थाई मजदूरों की छंटनी की और कंपनी के काम का बड़ा हिस्सा ठेका मजदूरों के हवाले कर दिया। जो लोग कंपनी में बचे थे, उनको मैनेजमेंट की ओर से जलील किया गया। 
इस आंदोलन ने समूचे गुड़गांव ही नहीं देश के मजदूरों के सामने भी संसद, पूंजीवादी पार्टियों, न्यायालय और मीडिया की जनपक्षधरता को तार-तार कर दिया। इसके बावजूद भी मजदूरों का इन कानूनी संस्थाओं से मोहभंग नहीं ुुहुआ। उन्होंने अपनी व्यापक और ठोस एकता बनाने और पूंजीपति वर्ग द्वारा मजदूर वर्ग के शोषण कोअंतिम तौर पर खात्मा करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ने की तैयारी करने के बजाय कहीं न कहीं शार्टकट से सुविधाएं हासिल करने की मानसिकता से प्रभावित रहे। दूसरी बात चूंकि हर कंपनी की यूनियन किसी न किसी केंद्रीय ट्रेड यूनियन से ही जुड़ी होती है और केंद्रीय ट्रेड यूनियन किसी न किसी संसदीय राजनीतिक पार्टी से जुड़ी होती है, इसलिए कंपनी के मजदूरों का अवसरवादी और संशोधनवादी चुनावबाज पार्टियों और अर्थवाद की राजनीति करने वाली उनकी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों से मोहभंग नहीं हो पाता। इसके अलावा उनके पास फिलहाल कोई विकल्प भी नजर आता। जहां तक गुड़गांव क्षेत्र में क्रांतिकारी राजनीति करने वाले मजदूर संगठनोें का सवाल है, वे इस तरह के हर आंदोलन में एक बेहद नेक इरादे से शामिल जरूर होते हैं, लेकिन कुल मिलाकर ऐसे आंदोलनों में उनकी स्थिति किसी तमाशबीन से ज्यादा नहीं हो पाती। इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि जिस सर्वहारा वर्ग को लेकर वे इस पूंजीवादी व्यवस्था से लड़ना चाहते हैं, वही उनके इर्द-गिर्द नहीं नजर आता। कई संगठन तो ऐसे हैं, जिन्हें पहले दूर दृष्टि दोष था। इसी के चलते उन्होंने अपनी बिरादरी वालों के सामने यह घोषणा तक कर दी कि फिलहाल निकट भविष्य में अभी कोई मजदूर आंदोलन नहीं खड़ा किया जा सकता, इसलिए वे जनता के बीच में अपनी ‘क्रांतिकारिता’ को ‘कैश’ कराने में लग गए। इस समय जिस तरह की घटनाएं अरब, अमेरिका, यूरोप और अपने देश को झकझोरने में लगी हैं, इनसे इन भाइयों की दूरी को देखकर तो अब ऐसा लगने लगा है कि अब इन्हें निकट दृष्टि दोष भी हो गया है, या फिर इनकी आंखों ने अब देखना ही बंद कर दिया है। बहरहाल ये लोग क्रांतिकारी घेरे में जनता को लूटने-खसोटने के लिए बदनाम हैं, इसलिए अब वे देश के मौजूदा क्रांतिकारी घेरे बाहर जा चुके हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की अर्थवादी राजनीति में ‘भद्र क्रांतिकारिता’ का तड़का मारकर उसे मजदूरों को के मुंह में जबर्दस्ती ठूंसने का काम कर रहे हैं, तो कुछ बुद्ध बाबा की तरह मजदूरों के बीच में ‘ज्ञान का प्रकाश’ फैलाने में लगे हुए हैं। बहरहाल संक्षेप में कहा जाए तो मजदूरों के शुभचिंतकों की ऐसी जमात से बेहद संगठित और दूरदर्शी पूंजीपति वर्ग से निपटने की बात तो दूर किसी एक कारखाने में भी किसी लड़ाई को जीत तक ले जाने की कल्पना करना भी मुश्किल ही लगता है। जहां तक मारुति सुजुकी मैनेजमेंट की बात है, वह मजदूरों के हर हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पहले से तैयार रहता है। कंपनी में मैनेमेंट परस्त यूनियन के गठन को भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए।
इस वर्ष 4 जून को शुरू हुए मारुति सुजुकी में मजदूर आंदोलन की जड़ में यही यूनियन थी। जब कंपनी के मजदूर अपने अनुभव से इस बात को जान गए कि इस यूनियन से वे अपनी मांगों के लिए मैनेजमेंट पर कोई दबाव नहीं बना सकते, तो उन्होंने 4 जून को नई यूनियन के गठन के लिए आंदोलन शुरू किया। संविधान और श्रम कानूनों के बारे में ककहरा जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात को अच्छी तरह जानता है कि संगठित होने या यूनियन बनाने का अधिकार एक संविधान प्रदत्त अधिकार है, जो देश के हर नागरिक को हासिल है। इस आंदोलन में ठेका और अप्रेंटिस मजदूरों की भी अच्छी खासी तादात थी। शासन-प्रशासन किस तरह मजदूरों का साथ देता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब मजदूरों ने नई यूनियन के गठन के लिए श्रम आयुक्त कार्यालय, चंडीगढ़ में इससे संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए, तो श्रमायुक्त महोदय ने उन कागजों को मारुति मैनेजमेंट के पास भेज दिया। नतीजतन आंदोलन के 11 नेताओं को निकालने के बाद कंपनी ने मजदूरों की छंटनी और उनके दमन-उत्पीड़न का सिलसिला शुरू कर दिया। इस आंदोलन में शामिल ठेका मजदूरों को सबसे ज्यादा मुसीबतें झेलनी पड़ीं, जिनके सिर पर हरदम लटकती छंटनी की तलवार उन्हें  पागल किए रहती थी। इसके बावजूद वे इस आंदोलन में लगातार डटे रहे। जहां तक केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की बात है, तो उनका शुरू से मुख्य जोर आंदोलन से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने पर ही केंद्रित रहा। इन्होंने मजदूर वर्ग को अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने और एकताबद्ध होने का पाठ तो जरूर सिखाया, लेकिन यह सब सिर्फ इसलिए ताकि मालिकों से कुछ सहूलियतें हासिल की जा सके। उनका यही रवैया मजदूरों को अवसरवादी और संशोधनवादी राजनीति का पिछलग्गू बना देता है। अगर यह सब लंबे समय तक जारी रहता है, और ट्रेडयूनियन से जुड़े नेता मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक ध्येय के संघर्ष से खुद को नहीं जोड़ते, तो उनमें से एक तबका ऐसा भी पैदा होता है, जो मालिकों का एजेंट बनकर, मजदूरों का काम करने के एवज में उनसे कमीशन खाकर अपने को पतन के गड्ढे में गिरा लेता है।  अगर ये ट्रेडयूनियनें चाहतीं तो अपनी इलाकाई एकता कायम करके मारुति मैनेजमेंट को मजदूरों के सामने घुटने टेकने को विवश कर सकतीं थीं। अगर वे इस इलाके में काम करने वाले 20 लाख से ज्यादा मजदूरों में से वे आटोमोबाइल उद्योगों में काम करने वाले 10 लाख मजदूरों के एक चौथाई को भी सड़क पर उतार पाते, तो नतीजा कुछ और होता। बहरहाल आज चुनावबाज पार्टियों से जुड़ी ट्रेड यूनियनों से इस तरह की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। आज के दौर में हकीकत तो यही है कि ट्रेड यूनियनों का बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक ध्येय के बारे में सोचता तक नहीं। इसलिए वहां से अगर सोनू गुर्जर और शिवकुमार जैसे लोग पैदा हों, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बहरहाल इस बार के आंदोलन के चलते कंपनी को 74,500 कारों यानी करीब 2200 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस आंदोलन के दौरान मानेसर प्लांट के मारुति सुजुकी कंपनी ने 94 लोगों को कंपनी से बाहर निकाल दिया था। समझौते के बाद 64 कर्मचारियों को काम पर वापस लिया गया, जबकि 30 अभी भी बाहर हैं। मीडिया की खबरों की मानें तो कंपनी ने अंदरखाने इनके साथ लाखों रुपये देकर सेटेलमेंट किया है। आंदोलन के दो प्रमुख नेताओं शिवकुमार और सोनू गुर्जर को भी 40 लाख से ऊपर देकर मारुति ने खरीद लिया। आंदोलन के एक नेता ऋषिपाल भी बीच में ही कंपनी साथ सेटेलमेंट करके किनारे हो गए। इस समय ज्यादातर लोग मजदूर वर्ग के इन गद्दारों को ही कोसने में लगे हुए हैं, जबकि जरूरत ऐसे गद्दारों को पैदा करने वाली राजनीति को समझने और उसे समाप्त करने के रास्ते को तलाश करने की जरूरत है। जिस तरह की राजनीति ट्रेडयूनियनें आज कर रही हैं, उसमें सोनू और शिवकुमार जैसे लोग पैदा होते रहेंगे। इसलिए इनसे निजात पाने के लिए मजदूरों को सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी राजनीति से लैस होना ही होगा। मारुति के मजदूरों के बारे में यह कहना बिल्कुल सही नहंी होगा कि अपने नेताओं के बिकने के बाद वे निराश हो गए हैं। क्योंकि वे ट्रेड यूनियन की राजनीति में इस तरह चीजों से परिचित होते हैं। वे निराश होने के बजाय आंदोलन की इस परिणति को देखकर भयंकर गुस्से में हैं। इसलिए मारुति सुजुकी मैनेजमेंट को अपनी इस चाल के लिए खुश नहीं होना चाहिए, क्योंकि मजदूर वर्ग अपनी हर हार से सीखता है और अगली बार पहले से ज्यादा फौलाद बनकर सामने आता है।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

हम सभी आक्युपाइयर हैं

 अरुंधती रॉय
(अनुवाद: मनोज पटेल)
मंगलवार की सुबह पुलिस ने जुकोटी पार्क खाली करा लिया, मगर आज लोग वापस आ गये हैं। पुलिस को जानना चाहिए कि यह प्रतिरोध जमीन या किसी इलाके के लिए लड़ी जा रही कोई जंग नहीं है। हम इधर-उधर किसी पार्क पर कब्जा जमाने के अधिकार के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं। हम न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। न्याय, सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों के लिए ही नहीं बल्कि सभी लोगों के लिए।
17 सितंबर के बाद से, जब अमेरिका में इस आकुपाई आंदोलन की शुरुआत हुई, साम्राज्य के दिलो दिमाग में एक नयी कल्पना, एक नयी राजनीतिक भाषा को रोपना आपकी उपलब्धि है। आपने ऎसी व्यवस्था को फिर से सपने देखने के अधिकार से परिचित करा दिया है, जो सभी लोगों को विचारहीन उपभोक्तावाद को ही खुशी और संतुष्टि समझने वाले मंत्रमुग्ध प्रेतों में बदलने की कोशिश कर रही थी।
एक लेखिका के रूप में मैं आपको बताना चाहूंगी कि यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसके लिए मैं आपको कैसे धन्यवाद दूं।  हम न्याय के बारे में बात कर रहे थे। इस समय जबकि हम यह बात कर रहे हैं, अमेरिकी सेना इराक और अफगानिस्तान में कब्जे के लिए युद्ध कर रही है। पाकिस्तान और उसके बाहर अमेरिका के ड्रोन विमान नागरिकों का कत्ल कर रहे हैं। अमेरिका की दसियों हजार सेना और मौत के जत्थे अफ्रीका में घूम रहे हैं। और मानो आपके ट्रीलियनों डालर खर्च करके ईराक और अफगानिस्तान में कब्जे का बंदोबस्त ही काफी न रहा हो, ईरान के खिलाफ एक युद्ध की बातचीत भी चल रही है। महान मंदी के समय से ही हथियारों का निर्माण और युद्ध का निर्यात वे प्रमुख तरीके रहे हैं, जिनके द्वारा अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है। 
अभी हाल ही में राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ 60 बिलियन डालर के हथियारों का सौदा किया है। वह संयुक्त अरब अमीरात को हजारों बंकर वेधक बेचने की उम्मीद लगाये बैठा है। इसने मेरे देश भारत को 5 बिलियन डालर कीमत के सैन्य हवाई जहाज बेचे हैं. मेरा देश भारत ऐसा देश है जहां गरीबों की संख्या पूरे अफ्रीका महाद्वीप के निर्धमतम देशों के कुल गरीबों से ज्यादा है। हिरोशिमा और नागासाकी पर बमबारी से लेकर वियतनाम, कोरिया, लैटिन अमेरिका के इन सभी युद्धों ने लाखों लोगों की बलि ली है … ये सभी युद्ध ”अमेरिकी जीवन शैली” को सुरक्षित रखने के लिए लड़े गये थे। आज हम जानते हैं कि “अमेरिकी जीवन शैली” … यानी वह मॉडल जिसकी तरफ बाकी की दुनिया हसरत भरी निगाह से देखती है … का नतीजा यह निकला है कि आज 400 लोगों के पास अमेरिका की आधी जनसंख्या की दौलत है।
इसका नतीजा हजारों लोगों के बेघर और बेरोजगार हो जाने के रूप में सामने आया है, जबकि अमेरिकी सरकार बैंकों और कारपोरेशनों को बेल आउट पैकेज देती है, अकेले अमेरिकन इंटरनेशनल ग्रुप (एआईजी) को ही 182 बिलियन डालर दिये गये। भारत सरकार तो अमेरिकी आर्थिक नीतियों की पूजा करती है। 20 साल की मुक्त बाजार व्यवस्था के नतीजे के रूप में आज भारत के 100 सबसे अमीर लोगों के पास देश के एक चौथाई सकल राष्ट्रीय उत्पाद के बराबर की संपत्ति है, जबकि 80 प्रतिशत से अधिक लोग 50 सेंट प्रतिदिन से कम पर गुजारा करते हैं; ढाई लाख किसान मौत के चक्रव्यूह में धकेले जाने के बाद आत्महत्या कर चुके हैं। 
हम इसे प्रगति कहते हैं, और अब अपने आप को एक महाशक्ति समझते हैं। आपकी ही तरह हम लोग भी सुशिक्षित हैं, हमारे पास परमाणु बम और अत्यंत अश्लील असमानता है.अच्छी खबर यह है कि लोग ऊब चुके हैं और अब अधिक बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। आकुपाई आंदोलन पूरी दुनिया के हजारों अन्य प्रतिरोध आंदोलनों के साथ आ खड़ा हुआ है, जिसमें निर्धनतम लोग सबसे अमीर कारपोरेशनों के खिलाफ खड़े होकर उनका रास्ता रोक दे रहे हैं। हममें से कुछ लोगों ने सपना देखा था कि हम आप लोगों को, संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों को अपनी तरफ पाएंगे और वही सब साम्राज्य के ह्रदय स्थल पर करते हुए देखेंगे. मुझे नहीं पता कि आपको कैसे बताऊं इसका कितना बड़ा मतलब है. उनका (1 फीसदी लोगों का) यह कहना है कि हमारी कोई मांगें नहीं हैं। शायद उन्हें पता नहीं कि सिर्फ हमारा गुस्सा ही उन्हें बर्बाद करने के लिए काफी होगा। मगर लीजिए कुछ चीजें पेश हैं, मेरे कुछ “पुराने क्रांतिकारी ख्याल” हमारे मिल-बैठकर इन पर विचार करने के लिए:  
हम असमानता का उत्पादन करने वाली इस व्यवस्था के मुंह पर ढक्कन लगाना चाहते हैं। हम व्यक्तियों और कारपोरेशनों दोनों के पास धन एवं संपत्ति के मुक्त जमाव की कोई सीमा तय करना चाहते हैं. “सीमा-वादी” और “ढक्कन-वादी” के रूप में हम मांग करते हैं कि :
  • व्यापार में प्रतिकूल-स्वामित्व (क्रास-ओनरशिप) को खत्म किया जाए। उदाहरण के लिए शस्त्र-निर्माता के पास टेलीविजन स्टेशन का स्वामित्व नहीं हो सकता; खनन कंपनियां अखबार नहीं चला सकतीं; औद्योगिक घराने विश्वविद्यालयों में पैसे नहीं लगा सकते; दवा कंपनियां सार्वजनिक स्वास्थ्य निधियों को नियंत्रित नहीं कर सकतीं।
  • प्राकृतिक संसाधन एवं आधारभूत ढांचे … जल एवं बिजली आपूर्ति, स्वास्थ्य एवं शिक्षा का निजीकरण नहीं किया जा सकता।
  • सभी लोगों को आवास, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा का अधिकार अवश्य मिलना चाहिए।
  • अमीरों के बच्चे माता-पिता की संपत्ति विरासत में नहीं प्राप्त कर सकते। इस संघर्ष ने हमारी कल्पना शक्ति को फिर से जगा दिया है। पूंजीवाद ने बीच रास्ते में कहीं न्याय के विचार को सिर्फ “मानवाधिकार” तक सीमित कर दिया था, और समानता के सपने देखने का विचार कुफ्र हो चला था। हम ऎसी व्यवस्था की मरम्मत करके उसे सुधारने के लिए नहीं लड़ रहे हैं, जिसे बदले जाने की जरूरत है। एक “सीमा-वादी” और “ढक्कन-वादी” के रूप में मैं आपके संघर्ष को सलाम करती हूं।
भाषण के वीडियो का लिंक :
http://rabble.ca/rabbletv/program-guide/2011/11/best-net/arundhati-roy-peoples-university-washington-square-park

साभार

शनिवार, 12 नवंबर 2011

भारत के पॉल राब्सन 'भूपेन हजारिका'

प्रणय कृष्ण
वे असम की मोजैक जैसी एकता के अलम्बरदार थे. बीच-बीच में असम जातीय संघर्षों और अफरा-तफरी के दौरों से गुजरा पर भूपेन दा के गीतों में साझी असमी संस्कृति की गहरी एका हमेशा मौजूद रही आयी. यह अवाम के साझे दुःख-दर्द और संघर्षों से बनी एका थी...

सरकारों के दमन से लरजती दमन उत्तर-पूर्व की भीषण सुन्दर ऊँची-नीची सड़कों पर कभी आपको गुजरने का मौक़ा मिलेगा तो औचक ही भूपेन हजारिका के गाये गीत के बोल कानों में बज उठेंगें- ‘हे डोला, हे डोला, हे डोला...’. भूपेन दा ने वंचितों के श्रम को जिस तरह इस गीत की लय में आबद्ध किया था, वह अपने आपमें एक प्रतिरोध था. उन्होंने ऐसे गीतों की मार्फ़त संगीत की दुनिया को बताया कि संगीत का श्रम से कितना गहरा रिश्ता है कि संगीत की बेहतरी का कोई भी रास्ता अवाम के संगीत से ही होकर आगे जा सकता है.
असम में १९२६ में पैदा हुए भूपेन हजारिका को अध्ययन की ललक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय और शिकागो विश्वविद्यालय तक खींच ले गयी, पर वे हिन्दुस्तान लौटे. १२ साल की छोटी उम्र में ही उन्होंने असमी लोकसंगीत गायक के रूप में ख्याति अर्जित कर ली थी. अपने इलाके की मुश्किलों और संघर्षों के बीच सीखते हुए उन्होंने अपने संगीत को अवाम की जिंदगी का आईना बना दिया.
चायबागान के मजदूर हों या मछुवारा समुदाय, इन जुझारू तबकों की जिंदगी को उकेरते उनके लिखे-गाये गीत हमेशा याद किये जाते रहेंगें. इन गीतों में करुणा की एक गहरी अंतर्धारा व्याप्त है जो श्रोता को संघर्ष की जिंदगी के पास खडा कर देती है. भूपेन दा की गहरी मद्धिम आवाज़ में गूंजते ये गीत श्रोता के साथ अद्भुत तादात्म्य बनाते हैं, एका स्थापित करते हैं.
संसद में भी असम का प्रतिनिधित्व करने वाले भूपेन दा का जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव रहा आया. असम जन सांस्कृतिक परिषद के वे संस्थापक अध्यक्ष थे. उल्फा के खिलाफ लड़ते हुए मारे गए शहीद का. अनिल बरुआ और आज के असमी के मशहूर जनगायक लोकनाथ गोस्वामी सहित असमिया आंदोलनधर्मी लोकगीतकारों कलाकारों से उनके गहरे रिश्ते थे. भूपेन दा का गायन एक तरह से प्रगतिशील आंदोलन के साथ ही बना-बढ़ा. प्रगतिशील आंदोलन के इन पिछले पचहत्तर सालों पर नज़र डालिए तो अनिल बिश्वास, हेमंग विश्वास, शैलेन्द्र आदि जन गीतकारों की धारा ही भूपेन दा के गीतों की ऊर्जा भरती थी. वे इस श्रृंखला की एक मज़बूत कड़ी थे. असमी लोक संगीत को उन्होंने जमीन में गहरे धंस कर हासिल किया था, और उसे उसी गहराई से जमीन और आन्दोलनों से जोड़े भी रखा. उनका लोक, परलोक नहीं है, यह रोजमर्रा की लड़ाईयां लड़ता, संघर्ष की तैयारी करता लोक है.
वे असम की मोजैक जैसी एकता के अलम्बरदार थे. बीच-बीच में असम जातीय संघर्षों और अफरा-तफरी के दौरों से गुजरा पर भूपेन दा के गीतों में साझी असमी संस्कृति की गहरी एका हमेशा मौजूद रही आयी. यह अवाम के साझे दुःख-दर्द और संघर्षों से बनी एका थी.
सुनते हैं भूपेन दा अपने अध्ययन के दिनों में महान अश्वेत नायक-गायक पाल राब्सन के संपर्क में आये थे और उनके मिसीसिपी पर लिखे गीत से प्रेरित हो ‘गंगा, तुमि बहिछो कैनो’ (गंगा, बहती हो क्यों) नाम का कालजयी गीत लिखा था. जॉन लेनन, पॉल रॉब्सन जैसे क्रांतिकारी कालजयी गीतकारों के गीतों के साथ इस गीत की जगह दुनिया के प्रतिरोधी गीतों पहली सफ में है.
गीतकार, कवि, कम्पोज़र अभिनेता भूपेन दा के व्यक्तित्व की बहुत सी छवियाँ थीं. बहुमुखी प्रतिभा के धनी भूपेन दा ने असमिया फिल्म और संगीत को दुनिया के पैमाने पर खडा करने में अपना योगदान तो दिया ही, हिन्दी और बांग्ला फिल्म उद्योग को भी उन्होंने कई अभूतपूर्व गीत दिए. रुदाली फिल्म का ‘दिल हूम हूम करे, घबराए’ जैसा गीत विरले ही संभव हो पाता है. उन्होंने फिल्म उद्योग में भी अपनी मूल असमी गायकी की ताकत को ही और विकसित किया था.
दादा साहेब फाल्के, संगीत नाटक एकेडमी और पद्मश्री जैसे पुरस्कारों से सम्मानित भूपेन दा कुछ वर्ष पूर्व सत्ता (भाजपा) के बहुत नजदीक पहुँच गये थे, पर जल्दी ही वे इस मोह से छूट गए. आम मजूरों-मेहनतकशों के गायक के रूप में किया गया काम आज भी आंदोलन के गीतों की तरह कानों में गूंजता है.

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

आर्थिक मंदी, फिर मची खलबली

 बनवारी लाल शर्मा 
अमरीका की क्रैडिट रेटिंग क्या घटी, पूरी दुनिया में हलचल मच गई। लगता है जैसे एक बार फिर आर्थिक मंदी पूरे विश्व को चपेट में लेने की तैयारी में है। आखिर क्या और क्यों हुआ ऐसा और भारत पर इस का क्या असर पड़ेगा, इस पर लेख में चर्चा की गयी है। अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारक संस्था स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स यानी एसऐंडपी ने अमरीकी क्रैडिट की रेटिंग एएए से घटा कर एए प्लस कर दी। बताया जाता है कि 95 सालों में ऐसा पहली बार हुआ है। इस खबर ने दुनिया भर के शेयर बाजारों को हिला कर रख दिया। भारतीय शेयर बाजार भी औंधे मुंह गिरा। उसका सूचकांक अपने 14 महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। यही हाल दुनिया के अन्य शेयर बाजारों का भी रहा। असर ऐसा हुआ कि महज एक ही घंटे में कुछ लोगों का दिवाला पिट गया। इसी के साथ पूरी दुनिया में एक बार फिर मंदी हावी हो गई। 2007 की मंदी का असर यह रहा कि अमरीका में गरीबी का प्रतिशत बढ़ गया है और 2007 से लेकर 2010 तक के आंकड़ों में उल्लेखनीय फर्क नजर आने लगा है। बताया जाता है कि इसका असर आने वाले सालों में और भी दिखाई देगा। हाल ही में अमरीका के सेंसेक्स ब्यूरो की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया है कि 2010 में गरीबी की प्रतिशत में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 15.1 प्रतिशत पर पहुंच गई है। 2007 में मंदी की शुरुआत में यह प्रतिशत 2.6 थी, जबकि 2009 में 14.3 प्रतिशत पर थी। गौरतलब है कि 15.1 का आंकड़ा रेटिंग से पहले का है। चूंकि मंदी का दूसरा दौर चल रहा है, इसलिए जाहिर है अभी इस प्रतिशत में और वृद्धि होगी। पहली नजर में देखने में यही लगता है कि इस रेटिंग में कोई ज्यादा फर्क तो नहीं है लेकिन जानकारों का मानना है कि चूंकि अमरीकी अर्थव्यवस्था पर विश्वबाजार निर्भर करता है इसलिए रेटिंग में हल्की सी भी कमी का असर दिखना स्वाभाविक है। इस रेटिंग का कुल मिला कर आशय यह है कि अमरीका को कर्ज देने में जोखिम है। दुनिया भर में अब तक यह आम धारणा थी कि अमरीकी सरकार का कोषागार काफी मजबूत है। यह खत्म न होने वाला कुबेर का खजाना है। इसीलिए इसे कर्ज देने में कोई खतरा नहीं है, लेकिन एसऐंडपी द्वारा हाल ही में की गयी रेटिंग से इस आम धारणा को गहरा धक्का लगा है। लेहमैन ब्रदर्स समेत तमाम दिग्गज बैंक 2008 में आर्थिक मंदी के दौर से गुजर चुके हैं, जिसका असर पूरी दुनिया में देखा गया। अभी दुनिया उस झटके से पूरी तरह उबर भी नहीं पायी है कि एक बार फिर से मंदी के बादल मंडराने लगे। ऐसे में भविष्य को सुरक्षित कर लेने की गरज से अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कर्ज लेने की सीमा बढ़ाने का फैसला किया। यह मामला जब अमरीकी कांग्रेस में अनुमोदन के लिए आया तो बहुमत न होने के कारण ओबामा के प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं मिल सकी। विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी को इसके लिए मनाने का प्रयास किया गया लेकिन वह तैयार नहीं हुई। इसको लेकर रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच लंबी बहस चली। कई दिनों की मशक्कत के बाद आखिरकार ओबामा सरकार को रिपब्लिकन पार्टी को इसके लिए तैयार करने में सफलता मिल ही गयी। दुनिया में यह संदेश गया कि अमरीकी अर्थव्यवस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि वह कट्टरपंथियों और सिरफिरे नेताओं के हाथ में है। इससे पहले अमरीका में दिनोदिन बढ़ती जा रही बेरोजगारी के मद्देनजर राष्ट्रपति बराक ओबामा पर आउटसोर्सिंग को बंद कराने के लिए दबाव डाला गया। बराक ओबामा अमरीका में निवेश के लिए दूसरे देशों को राजी करने हेतु विभिन्न देशों का हाल ही में दौरा भी कर चुके हैं। इससे यह आशंका और पुख्ता हो जाती है कि दुनिया का सबसे सम्पन्न देश अमरीका अब कंगाली के कगार पर है।
साख की रेटिंग का फंडा
रेटिंग पर चर्चा करने से पहले देखें कि स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स कैसी संस्था है। 1906 में अमरीका में स्टैंडर्ड स्टैटिस्टिक ब्यूरो नाम की एक संस्था हुआ करती थी जो अर्थव्यवस्था से संबंधित तमाम सूचनाओं को इकट्ठा किया करती थी। वह उन सूचनाओं को पूरे साल एक कार्ड के रूप में प्रकाशित किया करती थी। इसकी स्थापना लुतर ली ब्लेके ने की थी। वहीं, 1860 में हेनरी वर्मनम पुअर्स ने अमरीका में एक और कंपनी की स्थापना की थी जो अमरीका की अर्थव्यवस्था पर सालाना तौर पर तमाम सूचनाओं को एक किताब के रूप में प्रकाशित किया करती थी। बाद में हेनरी वर्मनम के बेटे हेनरी विलियम ने इसे संभाला और इसका नाम एचवीऐंडएचडब्लू पुअर्स कंपनी रखा, लेकिन 1941 में इन दोनों कंपनियों का विलय हुआ और यह स्टैंर्डउ ऐंड पुअर्स बन गयी तथा यह वित्तीय सेवा कंपनी के रूप में जानी जाने लगी। वित्तीय शोध, दुनिया भर के स्टाक व बान्ड का विश्लेषण करने के साथ यह कंपनी सार्वजनिक और निजी कारपोरेशनों की रेटिंग करती है। इसकी रेटिंग को अमरीकी स्टाॅक एक्सचेंज द्वारा मान्यता प्राप्त है। क्रेडिट रेटिंग के लिए गे्रड निर्धारित हैं। ये गे्रड एएए से लेकर डी तक हैं। हाल ही में स्टैंर्डउ ऐंड पुअर्स ने विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करके अमरीकी अर्थव्यवस्था की साख की रेटिंग की है। इसकी रेटिंग के अनुसार, मौजूदा समय में अमरीका की रेटिंग एएए से गिरकर एए भी नहीं रही, बल्कि उससे भी नीचे एए प्लस हो गई है। यानी अमरीकी अर्थव्यवस्था की क्रडिट रेटिंग सर्वोच्च एएए की सर्वोच्च रेटिंग से एए प्लस के तीसरे पायदान पर पहुंच चुकी है। एसऐंडपी ने यह भी कहा है कि यदि आगे भी यही हाल रहा तो वह अमरीकी ऋण साख को अगले 12 से 18 महीनों में और घटा सकती है। यही दुनिया भर के निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की रेटिंग का असर इतना जबरदस्त रहा कि शेयर बिकवाली का दौर शुरू हो गया। अमरीकी बान्ड के ग्राहक देशों, संस्थाओं और लोगों को भी यह आशंका होने लगी कि अगर अमरीका का खजाना खाली है तो उनकी रकम का डूबना तय है। वहीं अमरीका को कर्ज देने वाली संस्थाओं को भी कर्ज की रकम की वापसी को लेकर शंका होने लगी और लगने लगा कि 2008 की आर्थिक मंदी का जिन्न एक बार फिर से बोतल से बाहर निकल आया है। इसका असर विश्व की अर्थव्यवस्थाओं पर देखने को मिला और विश्व के तमाम प्रमुख शेयर बाजारों में भारी उथलपुथल मच गयी।
विशेषज्ञों की नजर में
विशेषज्ञों का इस मुद्दे पर नजरिया अलग-अलग है। कुछ का यह मानना है कि 2008 की स्थिति इससे बिल्कुल अलग थी। बल्कि दोनों स्थितियों में जमीन और आसमान का फर्क है। कोलकाता के जानेमाने अर्थशास्त्री शैबाल कर का मानना है कि यह महज एक आशंका है कि अमरीका एक बार फर आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकता है। 2008 में जो स्थिति पैदा हुई थी, अर्थशास्त्र की भाषा में वह ‘सबप्राइम क्राइसिस’ कहलाती है। उस समय अमरीकी बैंक और वित्तीय संस्थानों ने ऐसी कंपनियों को कर्ज दिया था जो कर्ज को चुकाने में सक्षम नहीं थीं और कंपनियाँ डूब गयीं। इसीलिए कर्ज देने वाले बहुत सारी संस्थाओं को रकम वापस न मिलने के कारण मंदी का संकट देखने को मिला। इस बार मामला वैसा नहीं है। इस बार एसऐंडपी की रेटिंग के कारण बाजार में हड़कंप मचा है। माना यह भी जा रहा है कि अगर यह आशंका सच साबित हुई तो अमरीका को अपनी परियोजना से बाहर जाकर कई लाख करोड़ डाॅलर कर्ज लेना पड़ सकता है। अर्थशास्त्री अभिजीत राय चैधरी कहते हैं कि कर्ज लेने से अमरीका के सरकारी खजाने पर असर पड़ेगा। ऐसे में कर्ज चुकाने में भी अमरीका को दिक्कत पेश आएगी। जाहिर है कि कर्ज देने वाले का जोखिम बढ़ जाएगा।
एसऐंडपी से नाराजगी
एसऐंडपी की रेटिंग से अमरीका में बड़ी नाराजगी है। अमरीकी वित्तमंत्री टिमोथी गेथनर ने अपने एक बयान में कहा है कि रेटिंग एजेंसी एसऐंडपी ने अमरीका के वित्तीय बजट के गणित का अच्छी तरह अध्ययन नहीं किया है और उसने गलत निर्णय ले लिया। एजेंसी ने अन्य मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय पिछले कुछ महीनों से चल रही बकवास बहस पर ज्यादा ध्यान दिया। वहीं, ओबामा ने भी अमरीकी ट्रेजरी सुरक्षित होने का दावा करते हुए कहा कि अमरीका हमेशा ‘ट्रिपल ए’ देश बना रहेगा, भले ही बाजार ऊपर नीचे होता रहे। अमरीका केन्द्रीय बैंक फैडरल रिजर्व ने अपने एक बयान में कहा है कि स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स की रेटिंग का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी सिक्युरिटी पर कुछ ही समय के लिए असर रहेगा, क्योंकि अन्य कई बड़ी रेटिंग एजेंसियों की नजर में अमरीका की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था है। चीन ने अमरीका के सरकारी बाँडों में 1,600 अरब डाॅलर का निवेश कर रखा है, जाहिर है, चीन को बड़ा धक्का लगा है।
भारत की स्थिति
अमरीका के मौजूदा हालात पर भारत ने निश्चित तौर पर बड़ी चैकस प्रतिक्रिया जतायी है, लेकिन रिजर्व बैंक से लेकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया तक ने दावा किया है कि यह गंभीर चिंता का विषय नहीं है। इनका कहना है कि भारतीय बाजार की अपनी स्थिति मजबूत है और वह अमरीका के भरोसे नहीं है। लेकिन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने संकट के इस दौर में चिंता जतायी है और कहा है कि ऐसे में विश्व बैंक को अपना पूंजी आधार बनाने के तरीके ढूँढने होंगे। साथ ही विश्व बैंक को कुछ अलग हट कर सोचने की जरूरत है।
(सरिता के अक्टूबर (द्वितीय) 2011 अंक से साभार)

रविवार, 6 नवंबर 2011

कल अमेरिका में प्रतिरोध की लहर के केंद्र में था ओकलैंड

ऐसा लगता है कि अमेरिका फ़िलहाल विरोध के एक असाधारण और अभूतपूर्व लहर के आगोश में आ चुका है। एक ऐसी लहर जो नवउदारवादी नीतियों और कारपोरेट लोभ, लालच और लूट के खिलाफ पूरी दुनिया में फैलाते जा रहे गुस्से का हिस्सा है। इन नीतियों और उनको निर्धारित करने वाले नए ज़माने के उन शहंशाहों ने, जिन्हें अमेरिका में अब 1% का नाम दिया गया है, वर्षों तक दुनिया के एक बड़े हिस्से को युद्ध, भुखमरी और तबाही में झोंकने और इस जीवनदायिनी ग्रह को विनाश के कगार पर पहुँचा देने के पश्चात् अब अपने देश की की जनता को ही रोजी-रोटी, पनाह और जिंदगी के सुख-चैन से महरूम करना शुरू कर दिया है। इसी के खिलाफ गुस्से को इजहार करने का ही नाम है "आक्युपाई"। और शोषण और विनाश के उस वर्त्तमान दुष्चक्र से निकलने की एक मासूम पर ईमानदार कोशिश का नाम है "आक्युपाई" जिसे पूँजीवाद कहते है। मुमकिन है इस आन्दोलन के प्रणेता या नेता ऐसा नहीं सोचते या मानते हों लेकिन अपने जिन नारों और मुद्दों से से उन्होंने "शैतान की आँत" में खलबली मचा रखी है वह सीधे सीधे लोभ-लालच-लाभ पर टिकी इस व्यवस्था के खिलाफ जाती हैं।

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कल ओकलैंड के प्रदर्शन का एक दृश्य 
इसी के चलते मुख्यतः नौजवानों के नेतृत्व वाले इस आन्दोलन को मजदूरों, अमेरिका के विभिन्न ट्रेड यूनियनों एवं वामपन्थी संगठनों, शिक्षकों, छात्रों और समाज के अनेक तबकों का समर्थन हासिल हो रहा है। कल के ओकलैंड के "आम हड़ताल" की सफलता के बाद यही उम्मीद की जा सकती है कि आन्दोलन के प्रभाव और पहुँच में और विस्तार होगा। इसके पहले ही यह अमेरिका के 900 छोटे बड़े शहरों में पहुँच चुका था। कल की सफलता के बाद उसे और अधिक फ़ैलाने से रोका नहीं जा सकता है। ओकलैंड के कल के कार्यक्रमों में 30,000 से भी अधिक लोगों के शामिल होने का समाचार मिला है और आम हड़ताल के तौर पर देखा जाय तो यह काफी हद तक सफल रहा है कैलीफोर्निया प्रान्त का यह शहर पूरी तरह बन्द तो नहीं हुआ लेकिन अपराह्न को स्थानीय सिटी हॉल के सम्मुख स्थित फ्रांक ओगावा प्लाज़ा से (जिसे अब ओस्कार ग्रांट प्लाज़ा का नया नाम दिया गया है और जहाँ आक्युपाई शिविर कायम है) जुलूस जब यहाँ के बंदरगाह पर पहुँचा तो उसे पहले ही बन्द घोषित किया जा चुका था। यह आन्दोलनकारियों द्वारा घोषित योजना के अनुरूप हासिल एक उल्लखनीय सफलता थी। इसके अलावा कैलीफोर्निया प्रान्त के बे एरिया में और पूरे अमेरिका में इस आम हड़ताल के समर्थन में आयोजित 'राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस' के तहत जुलूस और प्रदर्शनों की गहमागहमी रही। दिन भर पूरी तरह शान्तिपूर्ण रहे इस आन्दोलन को देर रात को कुछ अराजकतावादी तत्वों ने तोड़फोड़ और पुलिस के साथ हिंसा में संलग्न होकर नुकसान पहुँचाया है जिसकी हड़ताल के अह्वानकर्ता आक्युपाई ओकलैंड ने कड़े शब्दों में निन्दा की है
से साभार

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

क्रांति को प्रेम से क्या खतरा है

क्रांति और प्रेम एक सिक्के के दो पहलू हैं. क्रांति प्रेम से ही पनपती है. दुनिया की बड़ी-बड़ी क्रांतियां प्रेम की वजह से ही हुई हैं. चाहे देश प्रेम हो या फिर किसी के प्रति प्रेम. ऐसे में एक क्रांतिकारी को प्रेम हो जाए तो इसमें ग़लत क्या है? जबसे यह ख़बर आई है कि आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को मणिपुर से हटवाने के लिए पिछले 11 सालों से आमरण अनशन कर रहीं 39 वर्षीय इरोम शर्मिला को ब्रिटिश मूल के देसमोंड कोटिंहो से प्यार है, मानो भूचाल आ गया हो. मणिपुर के लोग इस ख़बर से ख़़फा हैं. आख़िर क्यों?
मामले की शुरुआत तब हुई, जब कोलकाता से प्रकाशित होने वाले एक अख़बार ने शर्मिला के उस बयान को सार्वजनिक किया, जिसमें उन्होंने यह स्वीकार किया था कि उन्हें ब्रिटिश मूल के देसमोंड कोटिंहो से प्यार है. यह ख़बर बीते 5 सितंबर को आई थी. 48 वर्षीय देसमोंड लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं. शर्मिला ने कहा था, जिसे मैं प्यार करती हूं, वह मेरा बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है. वह यहां मुझसे मिलने आया था, मगर मेरे समर्थकों ने मना कर दिया. एक साल से पत्र द्वारा उनका देसमोंड  से संपर्क चल रहा है. पिछले 9 मार्च को शर्मिला और देसमोंड के बीच एक अल्प समय की मुलाक़ात हुई थी. देसमोंड द्वारा लिखे पत्र शर्मिला ने अपने बेड के बगल में एक कॉर्ड बॉक्स में संभाल कर रखे हैं. शादी को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में शर्मिला कहती हैं, मैं तभी शादी करूंगी, जब मेरी मांग पूरी हो जाएगी. उन्होंने कहा कि वह (देसमोंड) ब्रिटिश सिटीजन होने के नाते हमारे रिश्ते को मना कर रहे हैं. शर्मिला नाराज़गी मिश्रित लहज़े में कहती हैं, वह बहुत एकपक्षीय और निर्दयी हैं.
इधर शर्मिला के समर्थक अख़बार में छपी यह ख़बर देखते ही भड़क गए और उन्होंने उक्त अख़बार की प्रतियां जलाते हुए इस ख़बर का विरोध किया. शर्मिला के समर्थकों का मानना है कि 11 सालों से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट-1958 को लेकर आमरण अनशन कर रहीं शर्मिला के बारे में मुख्य धारा के किसी भी अख़बार ने जब आज तक कोई पॉजिटिव स्टोरी नहीं छापी, तो उनके निजी जीवन की बातों को इतना उछालने की क्या ज़रूरत है. जस्ट पीस फाउंडेशन ऑफ मणिपुर के अध्यक्ष एवं शर्मिला के भाई इरोम सिंहजीत ने कहा कि शर्मिला भी एक इंसान हैं और कोई भी इंसान प्रेम कर सकता है. इसमें ग़लत क्या है? उनके संघर्ष पर फोकस न करके उसकी निजी ज़िंदगी पर ज़्यादा फोकस किया जा रहा है. गृहमंत्री पी चिदंबरम द्वारा अफसपा क़ानून में संशोधन से संबंधित ताजा बयान पर सिंहजीत ने कहा कि शर्मिला की मांग साफ है, अफसपा हटाया जाना चाहिए, न कि उसमें संशोधन हो. सिंहजीत ने कहा कि अगर अन्ना हजारे मणिपुर में पैदा होते तो उनकी मांगों को भी सरकार न सुनती, चुप रहती.  हालांकि मणिपुर में प्रेम विवाह के 95 प्रतिशत मामलों को समर्थन मिलता है, बावजूद इसके इस राज्य में किसी सामाजिक कार्यकर्ता को प्यार होने पर आपत्ति जताना अटपटा लगता है. क्या शोषित और पीड़ित लोगों की सेवा में अपना जीवन बिताने वाली शर्मिला को एक आम इंसान की तरह किसी से प्यार नहीं हो सकता? यह एक निजी मामला है. इंसान प्यार न करे तो कौन करेगा. यह एक इंसानी फितरत है. शर्मिला कहती है कि ग़रीब, शोषित और पीड़ितों के लिए लड़ना और आवाज़ उठाना एक अलग चीज है और प्यार एक अलग चीज है. दोनों अलग-अलग काम हैं. इससे मेरे संघर्ष पर कोई असर नहीं पड़ेगा. मेरी मांग जब तक पूरी नहीं होगी, तब तक मेरा अनशन जारी रहेगा. देसमोंड और हमारे बीच दोस्ती है, यह मैं मानती हूं, मगर इससे मेरे संघर्ष पर कोई फर्क़ नहीं पड़ने वाला. मैं भी एक मनुष्य हूं, मुझे एक मनुष्य की नज़र से देखिए, शर्मिला के रूप में देखिए.
(Pardes blog se sabhar)