बुधवार, 5 जुलाई 2017

मज़दूर पंचायत का श्रम भवन, रुद्रपुर में सफल आयोजन

रुद्रपुर, 4 जुलाई। प्रबन्धकों के मनमानेपन और श्रमविभाग व प्रशासन की उदासीनता के कारण क्षेत्र में मज़दूरों के बढ़ते शोषण के खिलाफ क्षेत्र के मजदूरों ने मजदूरों ने श्रम भवन पर मजदूर महा पंचायत का सफल आयोजन किया। जहाँ पूरे दिन शिफ्ट के अनुसार मज़दूूर आते रहे और अपने
आक्रोश व एकजुटता प्रदर्शित करते रहे। श्रमिक संयुक्त मोर्चा द्वारा आयोजित इस महा पंचायत के पंचों ऋषिपाल सिंह, दलजीत सिंह, दिनेश तिवारी, गणेश मेहरा व आशीश ने अपना फैसला सुनाया।

1 एरा कम्पनी की महिलाओं से बदसलूकी पर सहायक श्रमायुक्त के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित हुआ और सहायक श्रमायुक्त को बर्खाश्त करने की माँग हेतु श्रम मंत्री को पत्र भेजने का निर्णय बना।

2- 7 जुलाई को सांय 3 से मानव श्रृंखला बना डीएम कार्यालय का घेराव होगा।

3- 12 जुलाई को कुमाऊँ कमिश्नरी, नैनीताल में धरना दिया जाएगा।

4- यदि फिर भी प्रशासन नहीं चेता, संघर्षरत महिंद्रा, महिंद्रा सीआईई, एरा आदि मज़दूरों को न्याय नहीं मिला तो काबीना मंत्री अरविन्द पांडे के आवास पर मज़दूर कूच करेंगे।

इस अवसर पर मज़दूर नेताओं ने कहा कि मज़दूर अपने वेतन व सुविधाओं की जहाँ भी जायज माँग उठाते हैं, यूनियन बनाते हैं तो दमन शुरू हो जाता है। तमाम कम्पनियां सरकारी सब्सिडी और टैक्स की छूटों को खा-पचाकर मज़दूरों के पेट पर लात मार कर भाग रही हैं, जिसमें श्रमविभाग व शासन-प्रशासन की मौन सहमति साफ नजर आ रही है।

वक्ताओं ने कहा कि महिन्द्रा सीआईई के श्रमिकों ने माँगपत्र दिया तो प्रबन्धन ने यूनियन अध्यक्ष सहित चार साथियों को निलम्बित कर दिया, यूनियन को मान्यता देने से मना कर दिया। महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा के श्रमिकों ने वैधानिक रूप से यूनियन पंजीकृत कराई तो प्रबन्धन ने दमन बढ़ा दिया। उनपर अवैध वेतन प्रस्ताव को मानने का दबाव बनाया। यूनियन के विरोध करने पर पूरी कार्यकारिणी सहित मज़दूरों की कार्यबन्दी कर दी। अन्याय के खिलाफ महिन्द्रा ग्रुप के तीनो प्लाण्ट के मज़दूर श्रमभवन, रुद्रपुर में धरना और क्रमिक अनशन चला रहे हैं। महिन्द्रा सीआईई के साथी पिछले डेढ़ माह से भूखे रहकर कम्पनी में काम कर रहे हैं, लेकिन कोई पूछने वाला नहीं है।

मज़दूरों ने बताया कि एरा कम्पनी सब्सिडी व टैक्स की छूटों का लाभ उठाकर भागने की तैयारी में है। 24 जनवरी से कम्पनी की बिजली कटी हुई है, श्रमिकों का तीन माह से वेतन नहीं मिला है, दो साल से ईएसआई व पीएफ नहीं जमा है। महिलाएं बच्चे तक कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन को मजबूर हैं। मंत्री मेटेलिक्स का माँगपत्र 2013 से उलझा हुआ है जिसे साजिशन श्रम न्यायालय भेज दिया गया। 2016 के नये माँगपत्र की भी यही गत हो रही है। यूनियन बनने से खफा डेल्फी टीविएस प्रबन्धन मज़दूरों पर विगत दो साल से अवैधानिक दबाव बनाए रखा और समस्त मज़दूरों से इस्तीफे ले लिए। एस्काॅर्ट, भास्कर, बु्रशमैन आदि कम्पनियां मज़दूरों को धोखा देकर भाग चुकी हैं और शासन-प्रशासन व श्रम विभाग मौन बना रहा।

वक्ताओं ने कहा कि एलजीबी के मज़दूरों ने माँगपत्र दिया तो दमन के तौर पर पदाधिकारियों को नोटिसें दी जाने लगीं। आॅटोलाइन में यूनियन बनने के समय से ही दमन जारी है। इण्डोरेंस, व्योह्राॅक, ब्रिटानिया, कम्पनियों में यूनियनें अपने माँगपत्रों को लेकर संघर्षरत हैं। एडविक कम्पनी में स्थाई नियुक्ति पत्र की लड़ाई तो मज़दूर जीते, लेकिन प्रबन्धन मज़दूरों को फंसाने कोशिशें कर रहा है। पारले में यूनियन को बाईपास कर मनमाना वेतनबृद्धि हो गयी। थाई सुमित नील आॅटो में समझौते का अनुपालन नहीं हो रहा। रिचा कम्पनी, काशीपुर में प्रबन्धन की खुलेआम दबंगई, मज़दूरों से मारपीट, प्रतिनिधियों की अवैध बर्खास्तगी के बीच मज़दूरों का संघर्ष लम्बे समय से जारी है। इसलिए महा पंचायत ने संघर्ष का फैसला लिया है।

पचायत में मोर्चा अध्यक्ष दिनेश तिवारी, गणेश मेहरा, कैलाश भट्ट, मुकुल, के के बोरा, जनार्दन सिंह, धनवीर सिंहआनन्द नेगी, संजीत विश्वास, विरेन्द्र पाल, दिनेश आर्या, पूरन पाण्डे, सुबोध चौधरी, भगवान सिंह, अभिशेक सिंह, सुरेश पाल, नन्दू खोलिया, हेम चंद, संदीप, सुरेश, महेन्द्र शर्मा, उषा देवी, हरेन्द्र यादव, प्रदीप सिंह, प्रमोद तिवारी, निरंजन आदि ने अपनी बातें रखीं।

आज की मज़दूर पंचायत में महिंद्रा कर्मकार यूनियन, महिंद्रा सीआईई श्रमिक संगठन, एरा श्रमिक संगठन, ऑटो लाइन, ब्रिटानिया (दोनों यूनियनें), इंट्रक्ष, एलजीबी, परफेटी, नेस्ले कर्मचारी संगठन, पारले, राणे मद्रास, मंत्री मेटेलिक्स, थाई सुमित नील ऑटो, टाटा मोटर्स, इंडोरेंस (दोनों यूनियनें) टाटा यज़ाकी, एम के ऑटो, डेल्टा, असाल, पंतनगर से विश्वविद्यालय श्रमिक कल्याण संघ, राष्ट्रीय शोषित परिषद्, ट्रेड यूनियन संयुक्त मोर्चा आदि के आलावा इंक़लाबी मज़दूर केंद्र, मज़दूर सहयोग केंद्र, एक्टू, इंटक, यूकेडी के नेतृत्व में भारी संख्या में मज़दूरों ने भागेदारी निभाई। एरा के मज़दूरों की महिलाएं, बच्चे भी शामिल थे। गर्मजोशी भरे माहौल में पंचायत के फैसलों को अमल में लाने के निर्णय के साथ पंचायत समाप्त हुई।



मंगलवार, 13 जून 2017

कविता-गेहूं का उचित मूल्य/ अरुण देव

थाली में परसे गर्म रोटी को तोड़ते हुए
क्या तुम्हें उस किसान की याद आती है
जो इस उम्मीद में था कि इस वर्ष फसल अच्छी होगी

कौर और मुंह के बीच के अन्तराल में
क्या तुम्हें उस खेतिहर का जरा भी ख्याल आया
जो शीत में भीगते और धूप में जलते हुए दे रहा था जड़ों में पानी
उसके साथ ही मुरझाती हुई उसकी पत्नी
कुम्लाते हुए उसके बच्चे

वह पानी जिसे पहुंचना था खेत तक
पर जिसे वह किराये के पंपिंगसेट और डीजल की मदद से
ले आया है जड़ों तक
उगाता है फसलें, बालियों में उसका पसीना ही दूध बनता है

उसकी उनीदी रातें तुम्हारी नीद में तो नहीं ही टकराती होंगी कभी भी

बढ़ रहे हैं उदर
बढ़ रही है सेहत की बेशर्मी
स्वाद की निर्लज्जता के लिए बीमार हुए जमीन को चाहिए खाद, कीटनाशक

तुम्हारी रोटी के लिए बैंक के उस कर्ज़दार का क्या
कोई कर्ज़ नहीं है तुम पर

कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी पाला
अभी भी वह आसमान के नीचे है अपनी फसलों के साथ
अपनी मवेशियों और अपने परिवार के साथ
कभी दह जाता है कभी बह जाता है

कभी टूट कर नगरों में बिखर जाता है

जितने में तुम पीते हो एक लीटर पानी
उतने में अब भी आ जाता है एक किलों गेहूं

पानी नहीं, फसलें उगायी जाती हैं
उन्हें महीनों पाल पोशकर बड़ा करता है उसका परिवार

अब कभी तोडना रोटी तो सोचना क्या तुमने  चुकाया
है गेहूं का उचित मूल्य

किसान चुकाता है इसका मूल्य
कभी सल्फास खाकर, कभी लटकर पेड़ से.

रविवार, 7 मई 2017

आदिवासी जनता का गुलामी के खिलाफ जंग

(सुनील कुमार) ‘‘देश में आजादी के इतिहास की बात होती हैं तो कुछ लोगों की चर्चा बहुत होती है, कुछ लोगों की आवश्यकता
से अधिक होती है लेकिन आजादी में जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासियों का योगदान अप्रतीक था। वह जंगलों में रहते थे बिरसा मुंडा का नाम तो शायद हमारे कानों में पड़ता है लेकिन शायद कोई आदिवासी जिला ऐसा नहीं होगा जहां 1857 से लेकर अब (थोड़ा रूककर) आजादी आने तक आदिवासियों ने जंग न की हो, बलिदान न दिया हो। आजादी क्या होती है, गुलामी के खिलाफ जंग क्या होता है उन्होंने अपने बलिदान से बता दिया था।’’ - नरेन्द्र मोदी, 15 अगस्त 20176 भारत के प्रधानमंत्री ने यह बात लाल किले के प्राचीर से कहा और सही बात कहा लेकिन एक बात जो उनकी जुबान पर आयी लेकिन उन्होंने उसे दबा दिया और आदिवासियों की लड़ाई को आजादी तक ही सीमित कर दिया, वह लड़ाई अब भी जारी है। जिसका वर्तमान रूप माओवाद के नाम से जाना जाता है। आदिवासी जनता देशी-विदेशी पूंजीपतियों के रहमो करम पर जिन्दा नहीं रहना चाहती है इसके लिये वह हर रोज संघर्ष कर रही है। मोदी जी अपने भाषण में आदिवासी जनता के बलिदानों का जिक्र करके अपने आप को पूर्ववर्ती सरकारों से अलग दिखाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनकी पूरी कार्यप्रणाली पूर्ववर्ती सरकारों जैसी ही है। नई आर्थिक नीतियों को और तेज गति से लागू करने के लिये आदिवासियों की जीविका के साधनों जल-जंगल-जमीन छीन रही है। खनिज सम्पदा को देशी विदेशी लुटेरों को लूटने के लिये ‘मेक इन इण्डिया’ के नाम पर खूली छूट दी जा रही है। जंगल से लूटे गए माल को शहर और विदेशों तक पहुंचाने के लिये जंगली ईलाकों में छह लाईन की सड़क का निर्माण करवाया जा रहा है, समुद्री तटों पर बंदरगाह बनवाये जा रहे हैं। इस लूट के विरोध में आदिवासी कहीं माओवादी आंदोलन के नेतृत्व में हथियार बंद, तो कहीं अन्य जन संगठनों के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन के द्वारा इस लूट को रोकना चाहते हैं। कहीं कहीं आंशिक जीत भी मिल जाती है। माओवादी ईलाकों में कई साल पहले इकरारनामा (MOU) होने के बावजूद भी उसे जमीन पर लागू नहीं किया जा सका है जैसा कि बस्तर के लोहंडीगुडा में 2044 हेक्टेअर में बनने वाला टाटा का स्टील प्लांट का इकरारनमा 6 जून, 2005 से 4-5 नवीनीकरण के बावजदू 2016 में रद्द करना पड़ा, यही हाल अन्य इकरारनामों का भी है। सरकार आदिवासी जनता के संघर्ष के कारण इन कम्पनियों के लिये जमीन अधिग्रहण नहीं कर पा रही है। आदिवासियों ने जिस तरह से अंग्रेजों की गुलामी को नही स्वीकारा उसी तरह वह देशी-विदेशी पूंजीपतियों की गुलामी को स्वीकार नहीं करना चाहते। वह अपनी आजादी को बचाये रखने के लिये, अपने जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन पर अपना हक चाहते हैं उसके लिये वह संघर्ष कर रहे हैं जिसको सरकार पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए छीनना चाहती है। आदिवासी प्रकृति प्रेमी होता है और वह खुले में जीना चाहता है। इस जिन्दगी में उनको आजादी मिलती है। उनकी आजादी और जीविका के साधन को छीनने के लिये अर्द्ध सैनिक बलों के जवानों को खुली छूट सरकार ने दे रखी है कि आदिवासियों की हत्या, बलात्कार करो, घरों को लूटो आपको कुछ नहीं होने वाला है जिसकी झलक हम देख रहे हैं। इन कम्पनियों को भूमि उपलब्ध कराने के लिये ‘अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो’ नीति के तहत 2004 में सलवा जुडूम चलाया गया जिसमें 650 गांव को जला दिया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया, सैकड़ों लोगों को मार दिया गया, लाखों लोग गांव छोड़ने पर मजबूर हुए, हजारों लोगों को उनके गांव से उठाकर कैम्पों में रखा गया जिसका खर्च टाटा और एस्सार जैसी कम्पनियों ने उठाया। सरकार द्वारा गठित कमेटी का कहना है कि कोलम्बस के बाद जमीन हड़पने का सलवा जुडूम सबसे बड़ा अभियान था। गृहमंत्री चिदम्बरम द्वारा आदिवासी इलाकों में माओवादियों के सफाये के लिये ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया। इस अभियान के तहत काफी संख्या में सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, बीएसएफ, कोबरा, नागालैंड, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, ग्रे हाउंड भिन्न-भिन्न तरह के अर्द्ध सैनिक बल के जवानों को माओवादी ईलाकों में भेजा गया। आदिवासी ईलाकों में इतनी बड़ी फोर्स होने से अघोषित रूप से जंग का रूप ले लिया। इसे हिमांशु कुमार की भाषा में कहा जाये तो अमीर और गरीब की सेना के बीच छत्तीसगढ़ में जंग चल रही है। अमीर की सेना के द्वारा फर्जी मुठभेड़, गांव में लूट-पाट, बलात्कार बढ़ गया। मिशन 2016 के तहत बस्तर संभाग में 134 लोगों की हत्यायें की गई। आई.जी. एस.आर.पी. कल्लूरी सोशल साईट पर खुशी का इजहार करते हुये सुकमा एसपी कल्याण एलेसेला को बधाई देते है। इस तरह की घटनाओं के बाद पुलिस वालों को पुरस्कृत भी किया जाता है, जैसे सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अंकित गर्ग को 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। इसी तरह एसएसपी रहते हुए कल्लुरी को भी वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। सरकारी जुल्म 30 अक्टूबर, 2015 को राष्ट्रीय स्तर की महिलाओं का एक दल जगदलपरु और बीजापुर गया था। इस दल को पता चला कि 19/20 से 24 अक्टूबर, 2015 के बीच बासागुडा थाना अन्तर्गत चिन्न गेल्लूर, पेदा गेल्लूर, गुंडुम और बुड़गी चेरू गांव में सुरक्षा बलों ने जाकर गांव की महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और मारपीट की। पेदा गेल्लूर और चिन्ना गेल्लूर गांव में ही कम से कम 15 औरतें मिलीं, जिनके साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं। इनमें से 4 महिलायें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज कराइंर्। इन महिलाओं में एक 14 साल की बच्ची तथा एक गर्भवती महिला थीं, जिनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। गर्भवती महिला के साथ नदी में ले जाकर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। महिलाओं के स्तनों को निचोड़ा गया, उनके कपड़े फाड़ दिये गये। मारपीट, बलात्कार के अलावा इनके घरों के रुपये-पैसों को लूटा गया, उनके चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिए गये और जो बचा वह साथ में ले गये। घरों में तोड़-फोड़ किया गया और उनके टॉर्च, चादर, कपड़े भी लूटे गये। इस बीच में काफी फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार की घटनाएं हुईं। 15 जनवरी, 2016 को सीडीआरओ (मानवाधिकार संगठनों का समूह) और डब्ल्यूएसएस (यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) की टीम छत्तीसगढ़ गई थी। इस टीम का अनुभव भी अक्टूबर में गई टीम जैसा ही था। 11 जनवरी, 2016 को सुकमा जिले के कुकानार थाना के अन्तर्गत ग्राम कुन्ना गांव के पहाड़ियों पर ज्वांइट फोर्स (सी.आर.पी.एफ., कोबरा, डीआरजी, एसपीओ) के हजारों जवानों (लोकल भाषा में बाजार भर) ने डेरा डाल रखा था। कुन्ना गांव में पेद्दापारा, कोर्मा गोंदी, खास पारा जैसे दर्जन भर पारा (मोहल्ला) हैं। यह गांव मुख्य सड़क से करीब 15-17 कि.मी. अन्दर है और गांव के लोगों को सड़क तक पहुंचने के लिए 3 घंटे लगते हैं। 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बलों, एसपीओ और जिला रिजर्व फोर्स के जवानों ने गांव को घेर लिया। फोर्स ने ऊंगा के घर का दरवाजा तोड़ दिया, घर में रखे 500 रुपये ले लिये और 10 किलो चावल, 5 किलो दाल और 5 मुर्गे खा लिये। उनकी पत्नी सुकुरी मुसकी के अन्डर गारमेंट जला दिये और उनके घर के दिवार पर यह लिख दिये -‘‘फोन कर 9589117299 आप का बलाई सतडे कर।’’ ऊंगा का आधार कार्ड भी फोर्स वाले लेकर चले गये। इसी तरह गांव के अन्य घरों में तोड़-फोड़ की। चावल, दाल, सब्जी, मुर्गे, बकरी खाये और मरक्का पोडियामी के घर में लगे केले के पेड़ से केले काट कर ले गये। मुचाकी कोसी, करताम हड़मे, करतामी गंगी, हड़मी पेडियामी, कारतामी कोसी, पोडियामी जोगी व हिड़मे भड़कामी सहित कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार व लैंगिक हिंसा किया। महिलाओं ने सोनी सोरी के नेतृत्व में बस्तर संभाग के कमिश्नर के पास शिकायत की। इन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उनके स्तन को निचोड़ा गया यह देखने के लिये कि वह विवाहित है या अविवाहित। गांव में 17-18 साल की लड़की अगर शादी-शुदा नहीं है तो उसको माओवादी मान लिया जाता है। बीजापुर के बासागुड़ा थाना अर्न्तगत बेलम नेन्द्रा व गोटुम पारा में 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बल के ज्वांइट फोर्स गांव में तीन दिन तक रूकी रही। इन तीन दिनों में वे गांव के मुर्गे, बकरे को बनाये, खाये और दारू भी पिये। कराआईती के घर में 7 जगहों पर खाना बनाये और दारू पिये। कराआईती के घर के 40 मुर्गे, 105 कि.ग्रा. चावल, 2 किलो मूंग दाल, बरबटी खाये और दो टीन तेल (एक टीन कोईना का और एक सरसों का) खत्म कर दिये। घर में रखे 10 हजार रू. भी ले गये। कराआईती के घर में खाने के साथ दारू भी पिये, जिसके बोतल आस-पास पड़े हुये थे। मारवी योगा के घर के 14 मुर्गे, 10 किलो चावल, मूंग दाल, सब्जी और टमाटर खा गये, जिन्हें वे शनिवार को बाजार से लाये थे। वे अपने साथ बड़े भाई की बेटी को रखते हैं जिसको फोर्स वाले ने गोंडी में कहा कि सभी औरतें एक साथ रहो रात में बतायेंगे। यहां तक कि एक घर से कॉपी और पेन भी ले गये। गांव में रूकने के दौरान दर्जनों महिलाओं के साथ बलात्कार और यौनिक शोषण किये। इससे पहले भी 6 जनवरी को सुरक्षा बलों के जवान गये थे। तब उन्होंने मरकमनन्दे को पीटा था, उसकी बकरी ले गये थे और लैंगिक इस हिंसा भी की थी। इस गांव को सलवा जुडूम के समय दो बार जला दिया गया था। जब ये पीड़ित महिलाएं बीजापुर आयीं तो पुलिस अधीक्षक इनकी शिकायत लेने को तैयार नहीं थे। इनको थाने के अंदर डराया-धमकाया गया। दो-तीन दिन बाद देश भर से जब एसपी-डीएम को फोन गया तो इनकी शिकायत सुनी गई। सुकुमा जिले के कोटा थाना अन्तर्गत गोमपाड़ गांव में 13 जून, 2016 को घर से मड़कम हिड़मे को उठाकर अर्द्धसैनिक बल के जवान ले गये और दुष्कर्म करने के बाद हत्या कर दिया गया। उसको काली वर्दी पहनाकर और एक भरमार बंदूक रखकर माओवादी बतलाने की कोशिश की गई। जेल से जमानत पर रिहा हुये सत्रह वर्षीय अर्जुन को उसके घर से उठा कर 16 अगस्त, 2016 की हत्या कर दी गई। 24 सितम्बर, 2106 को दंतेवाड़ा जिले के गारदा गांव के दो लड़के सोनाकू राम और बिजनो जिनकी उम्र 16 व 18 वर्ष थी, अपने रिश्तेदार के घर मृत्यु की सूचना देने गये थे। रिश्तेदार के घर से सुबह चार बजे उठाकर उनकी हत्या कर दी गई। 28 जनवरी 2017 में बाजार गये भीमा और सुखमती की फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई। सुकमा जिले के चिंतागुफा गांव में 1 अप्रैल, 2017 को सुबह चार बजे ‘सुरक्षा’ बल के जवानों द्वारा बाप के सिर पर बंदूक रख कर 14 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया गया। इस तरह की खबरें आये दिन बस्तर संभाग से मिलते रहते हैं। यह खबर राष्ट्रीय समाचार पत्रों के मुख्य समाचार नहीं बन पाती। राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर तब आती है जब बीजापुर के सरकिनागुड़ा जैसी घटना होती है जिसमें 17 ग्रामीणों को (इसमें 6 बच्चे थे) मौत की नींद सुला दी जाती है या ताड़मेटला या उड़ीसा के मलकानगीरी जैसी घटना होती है। इस खबर पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती है कि बहादुर जवानों को बड़ी सफलता मिली है। नक्सलियों के मांद में घूसकर मारा, माओवादियों को धूल चटाया इत्यादि इत्यादि। झीरम घाटी या सुकमा जैसी बड़ी घटना होती है तो राष्ट्रीय अखबारों में इसको कायराना हमला, माओवादियों की हताशा बताया जाता है, इसी तरह के शब्द सरकार द्वारा इस्तेमाल होती है और माओवादियों को खत्म करने के लिये और अर्द्धसैनिक बल भेजा जाता है, आधुनिक हथियारें खरीदे जाते है, सेना और वायु सेना की मद्द की बात कि जाती है। गागड़ू राम दस साल पहले अपना गांव चिंगेर छोड़ कर कासोली राहत शिविर में रहने आए थे। इन्हें उम्मीद थी कि वो जल्दी ही अपने गांव लौट जाएंगे लेकिन वे कभी लौट नहीं पाए। कुछ ऐसे ही हाल में रह रहे हैं पल्लेवाल गांव के मुरिया आदिवासी मंगड़ू राम। मंगड़ू राम कहते हैं “मैं अपने गांव में मरना चाहता हूं. यहां कासोली कैंप में नहीं.” “मोदी आए थे, वो बोले हैं कि मैं दादा लोगों को ख़त्म कर दूंगा, उनको समझा दूंगा। कहां खत्म हो रहे हैं ये तो अब और बढ़ रहे हैं, लगता है, एक दिन यहीं कैंप में ही हम सब को ख़त्म होना होगा।” सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों पर हमले जब इस तरह के दमन का विरोध मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, वकील, बुद्धिजीवी करते हैं तो उनको भी माओवादी समर्थक कहकर उन पर झूठे केस बनाकर उन पर जुल्म किया जाता है। अर्द्धसैनिक बलों के अलावा सामाजिक एकता मंच, बस्तर विकास संघर्ष समिति, नक्सल पीड़ित संघर्ष समिति, अग्नि जैसे दर्जनों मंच सरकारी संरक्षण में बनाये गये हैं जिनकी सभाओं में आई जी कल्लूरी सहित जिले के एसपी शामिल होते रहे हैं। इन मंचों के माध्यम से राजसत्ता सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमले करवाती है, डराने धमकाने का काम करती है। महेन्द्र कर्मा के पुत्र छविन्द्र कर्मा सलवा जुडूम 2 की घोषणा कर चुके हैं। बस्तर के फरसपाल में आयोजित छविन्द्र कर्मा और कल्लूरी के प्रेस कान्फ्रेंस में अरविन्द सेवानी और रश्मि परास्कर भी शामिल थे। अरविन्द सेवानी और रश्मि परास्कर भूमकाल संगठन से जुड़े हुये हैं जो कि महाराष्ट्र सरकार के फडिंग से चलता है और इनका सम्बंध नागपुर से है। ये दोनों सलवा जुडूम के नेताओं से मिलते हैं और जगदलपुर लीगल एड ग्रुप (जगलक) को नक्सलियों का चेहरा बताते हैं। इन सब बातों के खुलासा करने वाले पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता है और धमकियां दी जाती है। सलवा जुडूम 1 के समय बस्तर की अंदरूनी ईलाके की खबरें बाहर नहीं आये इसके लिये पहले हिमांशु कुमार के आश्रम को तोड़ कर भगा दिया गया। ताड़मेटला जाते समय स्वामी अग्निवेश पर अंडे और पत्थर फेंके गये। सलवा जुडूम टू की तैयारी चल रही है तो जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल, पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम को जगदलपुर छोड़ना पड़ा। सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया के घर पर हमले किया गया और 24 घंटे के अंदर बस्तर छोड़ देने का अल्टीमेटम दिया गया। दिल्ली के प्रो. अर्चना प्रसाद और नंदनी सुंदर सहित 5 सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हत्या और माओवादियों से सम्बंध रखने का केस दर्ज किया गया। तेलंगाना डेमोक्रेटिक फ्रंट के लोगों को झूठे केसों में फंसा कर जेलों में डाल दिया गया । अग्नि संस्था से जुड़े बबू बोरई खुलेआम पोस्ट करता है कि हिमांशु कुमार और कमल शुक्ला को चप्पल से पिटाई और मुंह काला करने वाले को दो लाख रू. ईनाम दिया जायेगा और वह खुलेआम घूमता है। मोदी जी आप करहते हैं ‘‘जंगलों में माओवाद, सीमा पर उग्रवाद के नाम पर, पहाड़ में आतंकवाद के नाम पर कंधे पर बंदूक लेकर निर्दोषों को मारने का खेल चलाया जा रहा है।’’ आदिवासी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संगठित होकर लड़ रहे हैं, चाहे आप इनके संघर्ष को जिस नाम से पुकारें। रोज-रोज के फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियों से आदिवासियों के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है। इस लूट को बनाये रखने के लिये भारत सरकार, छत्तीसगढ सरकार जितना भी फर्जी मुठभेड़ में लोगों को मारे, महिलाओं के साथ बलात्कार करे, शांतिप्रिय-न्यायपसंद लोगों को धमकाये और उन पर हमले कराये, इस सब से शांति स्थापित नहीं हो सकती। शांति स्थापित करने के लिये लोगों को उनका अधिकार देना पड़ेगा। आप की राज्यव्यव्स्था की जड़ में शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार है। माओवाद उन्मूलन के नाम पर भी आपकी व्यवस्था भ्रष्टाचार करती है जवानों के हथियार खरीदने से लेकर उनके खाने के समान तक में कमीशन लेती है और उनको खराब क्वालिटी के खाने और साजो समान देती है। फर्जी माओवादी को आत्मसर्म्पण कराने के बाद पैसा डकार जाती है। प्रधानमंत्री से प्रश्न मोदी जी आप कहते हैं ‘‘हमारी आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से उतना परिचय नहीं है। सरकार की एक योजना है कि आने वाले दिनों में उन राज्यों में स्वतंत्रता सेनानी जो आदिवासी थे जंगलों में रहते थे, अंग्रेजों से जूझते थे, झुकने को तैयार नहीं थे उनके पूरे इतिहास को समावेट करते हुये इन वीर आदिवासियों को याद करते हुए एक स्थायी रूप से म्युज्यिम बनाते हुये जहां जहां राज्य के एक आध जगह हो सकती है जहां सब को समेट करके बड़े म्युजियम बनाया जा सकता है। .... ताकि आने वाली पीढ़ियों को हमारे देश के लिये मर मिटने में आदिवासी कितने आगे थे उसका लाभ मिलेगा।’’ क्या आप कभी इन आदिवासियों का इतिहास लिखेंगे जो मुनाफे के आग में हवस के शिकार हो रहे हैं; क्या उनका कभी इतिहास लिखा जायेगा जो इस लूट को बनाये रखने के लिये खूनी खेल रहे हैं? क्या उन सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार, बुद्धिजीवियों, वकीलों, पत्रकारों के इतिहास लिखे जायेंगे जिन पर झूठे केस बना कर जेलों में रखने का षड़यंत्र किया जा रहा है? क्या आपके उस म्युज्यिम में मड़कम हिड़मे, अर्जुन, सोनाकू राम, बिजनो, भीमा और सुखमती जैसे लोगों की तस्वीर लगेगी जिसकी आपके बहादुर सुरक्षा बल के जवानों ने बलात्कार कर हत्या कर दी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर सवाल सुरक्षा बल के जवान मारे जाते हैं तो सरकार, पुलिस अधिकारी, तथाकथित देशभक्त मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं को कोसते हैं, उनसे सवाल किया जाता है कि वह इस घटना की निन्दा क्यों नहीं कर रहे हैं। सरकार भूल जाती है कि जनता उसको टैक्स इसलिए देती है वह लोगों को सुरक्षा प्रदान करे और शांति बनाये रखें। लोगों को जीविका के साधन मुहैय्या कराये। मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं का काम है कि सरकार की गलती को दिखाना उनके चाहने से शांति कायम नहीं हो सकती, शांति के लिए सरकार को पहल करनी होगी। जवानों के मृत शरीर के साथ छेड़-छाड़ करने का आरोप माओवादी और डीजी नक्सल ऑपरेशन भी नकार चुके हैं। डीजी ने कहा कि अंग काटने की बात सोशल मीडिया की उपज है। सरकार से यह जरूर पूछा जायेगा कि 46 दिन पहले अभय मिश्रा को जब गोली लगी थी तो उन्हें ऑपरेशन के बाद छुट्टी पर क्यों नहीं भेजा गया, क्यों जंग के मैदान में एक घायल सिपाही को भेजा गया? सरकार से जरूर पूछा जायेगा कि आदिवासी महिलाआें द्वारा जो भी केस दर्ज है उसमें सरकार ने क्या कदम उठाया? ताड़मेटला कांड में सीबीआई ने चार्ज शीट में जिन अधिकारियों, जवानों का नाम आया है उस पर क्या कदम उठा रही है? चिंतागुफा हमला कोई भी व्यक्ति इंसानों की बहने वाली खून पर खुशी नहीं मना सकता यहां तक कि माओवादी भी अपने बयान में कह चुके हैं कि ‘‘जवान हमारे दुश्मन नहीं हैं। माओवादी कहते हैं कि आत्मरक्षा और मिशन 2016 के तहत दक्षिण बस्तर में 9 माओवादियों तथा उड़ीसा में 9 ग्रामीणों सहित 21 माओवादियों की हत्या के बदले के रूप में इसे देखना चाहिए; मिशन 2017 को रोकने तथा प्राकृतिक संसाधनों की लूट, जनता पर किये जा रहे हमले और महिलाओं पर यौन हिंसा के खिलाफ इस हमले को देखा जाना चाहिए।’’ जो जवान मारे गये हैं वे सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगे हुए थे। मारे गये जवानों को इस सड़क से कोई लाभ नहीं होने वाला था। यह जवान गरीब परिवार से आते हैं उनका परिवार जिस स्थान पर रहता है उनके यहां ऐसी सड़कें नहीं होंगी। उनके परिवारों को टूटी-फूटी रास्तों से ही अस्पताल व स्कूल, कॉलेज जाना पड़ता होगा। लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्गम इलाकों में भी अच्छी सड़कों का निर्माण किया जा रहा है ताकि टाटा, एस्सार, जिन्दल, मित्तल व अन्य पूंजीपतियों (लूटेरों) द्वारा छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर ले जाया जा सके। इन्हीं लूटों में से कुछ हिस्सा पाकर शासक वर्ग उन की रक्षा करने के लिए इन जवानों को वहां भेजती है, जिसका विरोध वहां की जनता कर रही है। प्रधानमंत्री जी आपने कहा था ‘‘चालीस साल हो गया धरती मां रक्तरंजित हो रही है लेकिन आंतकवाद के रास्ते पर जाने वालों ने कुछ नहीं पाया। मैं उन नौजवानों को कहना चाहता हूं कि यह देश हिंसा को, यह देश आतंकवाद को कभी सहन नहीं करेगा, यह देश आतंकवाद के सामने कभी झुकेगा नहीं, माओवाद के सामने। नौजवानों को कहता हूं कि लौट आईये अपने मां-बाप के सपनों की तरफ देखिये, मुख्यधारा में आईये, एक सुख चैन की जिन्दगी जीये हिंसा का रास्ता कभी किसी का भला नहीं करता।’’ आपके इस वक्तव्य का जवाब माओवादियों के इस वक्तव्य से मिलता है ‘‘हम हिंसावादी नहीं हैं, लेकिन सामंती शक्तियों, देसी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का प्रतिनिधित्व करने वाली केंद्र-राज्य सरकारों द्वारा हर पल किए जा रहे हिंसा के प्रतिरोध में और पीड़ित जनता के पक्ष में खड़े होकर अनिवार्यतः हिंसा को अंजाम देने के लिए हम बाध्य हैं।“ मार्च 2011 के पुलिस ने तीन गांव तिम्मापुर, ताड़मेटला और मोरपल्ली के 250 घरों को जला दिया गया था और इस दौरान तीन व्यक्ति मारे गए और कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। इस मामले में सीबीआई द्वारा सात विशेष पुलिस अधिकारियों के खि़लाफ़ चार्जशीट दायर की गई है। सीबीआई ने कहा कि इस त्रासदी में 323 विशेष पुलिस अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और सीआरपीएफ तथा कोबरा के 95 कर्मियों के शामिल होने के सबूत उनके पास हैं। स्वामी अग्निवेश के काफिले पर हमले के सिलसिले में सलवा जुडूम के 26 नेताओं के खि़लाफ भी चार्जशीट दायर की है। इन नेताओं का बस्तर में बीजेपी और कांग्रेस से सरुबंध है। इनमे से कुछ का विकास संघर्ष समिति, अग्नि और सामाजिक एकता मंच जैसे पुलिस समर्थक गुटों से भी सम्बंध है। कल्लूरी ने प्रेस कान्फ्रेंस करके यह स्वीकार किया था कि यह घटना मेरे रहते हुई थी कार्रवाई करनी है तो पहले हम पर करो लेकिन आज तक कल्लूरी पर कोई कार्रवाई नहीं कि गई। एन.एच.आर.सी. के बुलाने पर भी कल्लूरी आज तक दिल्ली नहीं आया। सीबीआई के चार्जशीट के बाद भी अभी किसी पुलिसकर्मी, अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। रायपुर के डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि- हम सभी को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए, सच्चाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी। घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं। इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना उनकी जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनको स्तन निचोड़कर देखा जाता है। टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान के 5 वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को हड़पने का। आखिर ये सब कुछ क्यों हो रहा है? सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल जंगल जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है। मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था। उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था, जिसके निषान मैंने स्वयं देखे। मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए? समस्या का समाधान सुकमा के कलेक्टर श्री अलेक्स पॉल मेनन के अपहरण पर सरकार और माओवादियों की बीच भी कुछ लोगों ने मध्यस्थता करवाई थी। ’’माओवादियों द्वारा सुकमा जिले के कलेक्टर श्री अलेक्स पॉल मेनन के अपहरण से उत्पन्न स्थिति को सुलझाने के लिए चार मध्यस्थों डॉ. बी.डी. शर्मा, और प्रोफेसर हरगोपाल, (जिन्हें सी.पी.आई. (माओवादी) द्वारा मनोनीत किया गया था) और श्रीमती निर्मला बुच और श्री एस.के. मिश्रा (जिन्हें छत्तीसगढ़ शासन द्वारा मनोनीत किया गया था) के बीच रायपुर में बैठक हुई। इस बैठक में अलेक्स पॉल मेनन को छुड़ाने के साथ-साथ दूसरी बात पर जो चर्चा हुई थी वह था कि छत्तीसगढ़ के विभिन्न जेलों में न्यायिक हिरासत में बंद आदिवासियों की संख्या काफी है। राज्य सरकार विवेचना/अभियोजन लंबित सभी व्यक्तियों जिसमें माओवादियों से सम्बंधित मामले भी थे, इन मामलों की समीक्षा के लिए सहमत हुई थी। विवेचना/अभियोजन बंदी के निकट रिश्तेदार/परिवार के सदस्यों को लंबी दूरी के कारण जेल में उनसे मिलने में तकलीफ होती है। इसके लिए उच्चाधिकार प्राप्त स्थायी समिति का गठन किया गया समिति की अध्यक्ष श्रीमती निर्मला बुच थी। बाद में सरकार ने इस समिति की बात को अनसुना कर दिया जिस पर निर्मला बुच ने नराजगी भी प्रकट की थी। समस्या का समाधान सैनिक हल नहीं है। अभी तक की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि नक्सलवाद/माओवाद का कारण सामाजिक, आर्थिक समस्या है। इस समस्या को हल करने के लिए मृत जवान सौरभ के पिता की बातों पर ध्यान देना होगा जो सुझाव देते हैं कि ‘‘सरकार ठंडे दिमाग से बातचीत के जरिये इस मामले का हल निकाले। नक्सलियों को मुख्यधारा में लाये, उन्हें काम दे, उनके बाल-बच्चे को पढ़ाये। लोगों को काम मिलेगा तो नक्सली नहीं पैदा होंगे।’’ इसी तरह का सुझाव बीबीसी से बातचीत के दौरान चिंतागुफा कैम्प (इसी कैम्प के 26 जवान माओवादी हमले में मारे गये) के जवानों ने दिया ‘‘सरकार नक्सली समस्या का राजनैतिक तरीके से हल ढूंढे, ताकी इस पूरी समस्या को पुलिस जवानों पर ही न मढ़ दिया जाये। वो मानते हैं कि वर्दीधारी से ज्यादा जिम्मेवारी प्रशासन की है, वो सुकुमा के सुदुर इलाकों में सक्रिय आदिवासी नौजवानों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए योजनाएं बनाएं।’’ एक जवान ने कहा ‘‘यहां कुछ भी नहीं है। एक सुनसान सड़क जो यहां तक आती है जिस पर कोई नहीं चलता और चारों तरफ घने जंगल जहां माओवादी छापामार जमे हुए हैं, हम कैंप तक सीमित रहते हैं, हर पल यहां रहना भारी गुजरता है।’’ क्या आप इन जवानों और उनके परिवार वालों के सुझाव पर ध्यान देंगे या अपने पूर्ववर्ती सरकार के ही नक्शे कदम पर चलेंगे जैसा कि गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे द्वारा 11 मार्च, 2014 को माओवादी हमले (झीरम घाटी में 11 सीआरपीएफ व 4 राज्य पुलिस बलों के जवानों समेत कुल 16 लोगों की मृत्यु हुई।) के बाद कहा गया था कि हम बदला लेंगे। बदला लेने से समस्या का हल नहीं होगा उससे धरती का गोद लाल ही होगी। सरकार को बदले की भावना जैसी मानसिकता से बचना चाहिये और समस्या के समाधान पर जोर देना चाहिये। क्या सरकार सीबीआई द्वारा आरोपित अधिकारियों को सजा देंगे? क्या आप वर्षा डोंगरे की बातों पर अमल करेंगे उनके द्वारा कही गई बातों पर कार्रवाई करेंगे? क्या आप गागड़ू राम और मांगडू राम कि आत्मा की बात सुनेंगे जो अपने गांव लौट जाना चाहते हैं लेकिन उनको कैम्प में रखा गया है उनकी आजादी छीन कर उन्हें गुलाम की तरह जिन्दगी जीने के लिये विवश किया गया है। अगर आपको शांति लानी है तो इन सभी लोगों की बातों पर अमल करना होगा। मैं फिर से कहूंगा कि इस समस्या का हल दमन से नहीं राजनीतिक वार्ता से निकलेगी, नहीं तो धरती रक्तरंजित होती रहेगी देशवासी मरते रहेंगे, जेलों में लोग सड़ते रहेंगे और लोग गुलाम जैसी जिन्दगी जीने को विवश रहेंगे और यह जंग चलती रहेगी।

रविवार, 30 अप्रैल 2017

आज के मजदूर आंदोलन के लिए मई दिवस का सवाल

(सुमित)। मई दिवस मजदूर आंदोलन की वो विरासत है जो मजदूरों के संघर्ष का इतिहास बताता है, नये संघर्ष की प्रेरणा देता है। 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों ने जो लड़ाई लड़ी वो किसी खास प्लांट या मजदूरों के किसी खास हिस्से की मांग को लेकर नहीं अपितु दुनिया के सभी मजदूरों के लिए थी यानी मजदूर वर्ग के लिए। आठ घंटे काम की मांग मई दिवस के संघर्षों से उभरकर सामने आयी थी और आज 129 सालों बाद ये अधिकार इस मौजूदा पीढ़ी से पूँजीपतियों ने छीन लिया है। 4 मई 1886 यानी मई दिवस की घटना के पीछे सतत संघर्ष मौजूद था जिसने मालिकों और उनकी दलाल सरकारों के तमाम षडयंत्र और दमन-शोषण का मुँह तोड़ जवाब देते हुए हार मानने से लगातार इंकार किया था। मई दिवस तथाकथित न्यायपालिका का मजदूर विरोधी चरित्र उजागर करता है। आठ घण्टे काम की मांग करने पर मई दिवस के शहीदों को जिस प्रकार पूँजीपतियों के षड़यंत्र के मुताबिक अदालत ने फांसी की सजा सुनाई आज ठीक उसी प्रकार यूनियन बनाने की मांग करने पर मारुति के 13 मजदूरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। एक बार फिर मालिकों ने मजदूरों को डराने के लिए अदालत का इस्तेमाल करते हुए ये बताना चाहा कि अगर मजदूर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने आगे आएंगे तो फांसी और उम्रकैद के जरिए उन्हें और उनके आंदोलन को कुचल दिया जाएगा। यह जटिल दौर है आज का मज़दूर मई दिवस के दौर से भी ज्यादा कठिन व जटिल दौर में है। बदलाव के नये रूप तमाम उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए आज पँूजीवादी उत्पादन प्रणाली में लगातार बदलाव हो रहा है। इसी के साथ शोषण की प्रक्रिया में अलग-अलग बदलाव हुए हैं। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था ने जहाँ मुनाफे की रफ्तार तेज कर दी है, वहीं सामाजिक बंटवारे को तीखा कर दिया है। दूसरी तरफ राजकीय नियंत्राण को घटा कर निजीकरण को खुला रूप दे दिया है। उदारीकरण के पिछले तीस साल में उत्पादन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ढांचागत बदलाव हुआ है। वे उच्च तकनीक से थोड़े से स्थाई और भारी पैमाने पर ठेका, ट्रेनी, स्किल डेवलपमेण्ट आधारित कम वेतन और कभी भी निकालने के अधिकार के साथ उत्पादन व भारी मुनाफा बटोरने में जुटे हैं। आज मज़दूर स्थाई-ठेका-ट्रेनी, मुख्य प्लाण्ट, वैण्डर, सब वैण्डर जैसे बहु संस्तरों में बंटा-बिखरा है। अधिकारों को छीनने का दौर मई दिवस की परम्परा में लम्बे संघर्षों के दौर में हासिल सीमित कानूनी अधिकारों को छीनने का यह दौर है। मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से ही इसे तेज कर दिया। एक-एक कर कानूनों को मालिकों के हित में बदलना उसका प्रमुख एजेण्डा है। जिसके मूल में है हायर एण्ड फायर, यानी जब चाहो काम पर रखो, जब चाहो निकाल दो। कम से कम वेतन पर ज्यादा से ज्यादा खटाओ। नस्ल-धर्म आधरित बंटवारे तेज आज पूरी दुनिया में मेहनतकश आवाम पर धर्म, नस्ल व जाति के आधार पर बंटवारे जुनूनी हद तक तेज हो गये हैं। पूरी दुनिया में नस्लवादी, फासीवादी मजदूर विरोधी ताकतें जाति और धर्म की पहचान को उभारकर जनता को घृणा और उन्माद के जरिए लामबंद कर सत्ता में आ रही हैं। देश के भीतर जातीय व मजहबी हमले और बंटवारे बेहद तीखे हो गये हैं। इसी के साथ, वाट्सऐप, फेसबुक जैसे सोसल मीडिया झूठ और भ्रम फैलाने के महत्वपूर्ण उपकरण बन गये हैं। मुनाफाखोरों की चालों को पहचानों यह मालिकों के मुनाफे को कायम रखने के लिए मजदूरों का शोषण बढ़ाने का मामला है। इनके खिलाफ मजदूरों को ठेका, स्थायी, कैजुअल के बंटवारे की दीवार को तोड़कर व्यापक एकता बनानी होगी - जाति और धर्म की पहचान से परे समान काम समान वेतन, सम्मानजनक वेतन व ठेका प्रथा के खात्मे जैसी तत्कालिक मांगों को लेकर ना सिर्फ प्लांट स्तर पर बल्कि इलाका स्तर पर एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। इन संघर्षो का नेतृत्व भी खुद मजदूरों को करना होगा और जिस तरह संघर्ष आगे बढ़ेगे नेतृत्व करने वाले मजदूर भी निकलकर आएंगे। लेकिन मौजूदा भ्रमपूर्ण स्थिति में मज़दूरों के सामने वैचारिक स्थिति भी साफ करना होगा। मई दिवस की विरासत हमें बताती है कि जब तक उत्पादन और राज-काज पर मेहनतकश वर्ग का नियंत्राण नहीं होगा, तब तक मज़दूरों की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए मज़दूरों को अपने तात्कालिक माँगों के साथ अपनी मुक्ति के दीर्घकालिक मुद्दों पर भी सतत संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। नयी राह पर आगे बढ़ना होगा! ऐसे में मई दिवस का रास्ता मजदूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई में ऐसा प्रेरणा स्रोत है जिसे हमें लगातार अपने सामने रखकर मजदूरों को संगठित करना होगा। आज वो दौर नहीं है कि लगातार बड़ी बड़ी हड़ताले हो रही हैं और मजदूर खूद अपनी पहलकदमी से मालिकों को, उत्पादन को चुनौती दे रहा है। स्थिति ठीक विपरीत है। आज के हालात में मजदूर आन्दोलन बिखरा हुआ है और लगातार पीछे जा रहा है। हालांकि बढ़ते शोषण के खिलाफ लगातार उठते स्वतःस्पफूर्त आन्दोलन प्रतिरोध की स्थितियां भी बयां कर रहे हैं। इन्हीं मौजूदा चुनौतियों के बीच मई दिवस पर ये सवाल उपस्थित है कि मज़दूर आन्दोलन को नयी राह पर आगे कैसे बढ़ाया जाये? (‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका से)

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

मारुती मज़दूर विवाद में निर्णय : न्याय या न्याय का ढकोसला

18 मार्च 2017 को दिए गए अपने निर्णय में, गुडगांव डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज RP Goel ने लगभग 5 साल से चल रहे मारुति मानेसर संबंधी केस ( State Vs. Ram Mehar Etc.) में निर्णय सुना दिया। निर्णय के तहत जज महोदय ने 148 आरोपियों में से 117 को बाइज्‍ज्‍ात बरी कर दिया गया। 13 आरोपियों को हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुनाई गयी, 4 आरोपियों को हिंसक प्रवेश (violent trespass) के जुर्म में 5 साल की जेल की सजा दी गयी तथा शेष 14 आरोपियों को गंभीर क्षति पहुँचाने का दोषी पाया गया, लेकिन चूंकि वे पहले से जेल में रहते हुए अपनी सजा काट चुके थे, इसलिए उन्हें रिहा कर दिया गया। 13 मज़दूर जिन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गयी है, उनमें से बारह मारुति मानेसर की यूनियन के पदाधिकारी सदस्य हैं (राम मेहर, संदीप ढिल्लों, रामविलास, सरबजीत सिंह, पवन कुमार, सोहन कुमार, प्रदीप कुमार, अजमेर सिंह, जियालाल, अमरजीत कपूर, धनराज भांबी, योगेश कुमार और प्रदीप गुज्जर) तथा तेरहवां आदमी जिया लाल है, जिसका 18 जुलाई 2012 की सुबह एक सुपरवाइजर के साथ विवाद हुआ था। यूं तो 2006 में स्थापित मारुति की मानेसर फैक्ट्री में प्रशाशन और मज़दूरों के बीच विवाद जून 2011 से ही चल रहा था। विवाद का विषय पहले था स्वतंत्र यूनियन बनाने का अधिकार और 1 मार्च 2012 को यूनियन के रजिस्टर हो जाने के बाद 13 सूत्री मांगपत्र पर प्रशसन से यूनियन की बातचीत चल रही थी। मारुति में जारी ठेका प्रथा का अंत और ठेका मज़दूरों को नियमित करना यूनियन की मुख्य मांगों में से एक थी, लेकिन जो केस पिछले 4 साल से गुडगांव डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में चल रहा था उसके संबंध में मज़दूरों का कहना है कि 18 जुलाई 2012 की सुबह जियालाल नामक मज़दूर और एक सुपरवाइजर के बीच हुआ विवाद था। इसमें प्रशासन ने जियालाल को निलंबित कर दिया। यह सब उस समय हुआ, जबकि मज़दूर यूनियन कुछ पुराने मुद्दों के संबंध में प्रबंधन के साथ बैठक कर रहा था। जब निलंबन की खबरें यूनियन तक पहुंचीं तो उन्होंने मांग की कि निलंबन रद्द किया जाए। मज़दूरों के अनुसार, उस दिन परिसर में कंपनी ने कई बाउंसर (भाड़े पर बुलाए गए मारपीट करने वाले पहलवान) भी तैनात किए थे और बातचीत के वक्त प्रशासन ने पुलिस भी बुला ली थी। निलंबन को रद्द करने के सवाल पर प्रशासन के टालमटोल के कारण, तनाव बढ़ता गया। उसके बाद हुई हाथापाई में कुछ प्रशासन कर्मी और मज़दूरों को चोटें आईं। इस बीच कार्यालय में आग लग गयी और सांस घुटने से एक एचआर प्रबंधक अविनाश देव की दुःखद मृत्यु हो गयी। मज़दूरों के विवरण को तवज्जो न देते हुए न्यायालय ने प्रशासन के नज़रिए को ही आधार बनाकर सुनवाई की। सुनवाई का आधार बनी मारुति मानेसर के जनरल मैनेजर दीपक आनंद की शिकायत। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया कि 18 जुलाई 2012 सुबह जियालाल नामक मज़दूर ने सुपरवाइजर राम किशोर माझी से हाथपाई की। इसकी सुपरवाइजर द्वारा शिकायत करने पर प्रशासन ने जियालाल को अनुशासनहीनता के इल्जाम पर सस्‍पेंड कर दिया। यूनियन प्रशासन पर निलंबन वापसी का जोर दे रही थी और जब बातचीत से कोई नतीजा न निकला, तो शाम को तकरीबन 7 बजे 500/600 मज़दूर 'बेलचे' लेकर दफ्तर में घुस गए और प्रशासन के नुमाइंदों से मारपीट की। दफ्तर में आग लगा दी, इस आग में एचआर प्रबंधक अविनाश देव जलकर मर गया। मारुति मानेसर के मैनेजर ने अपनी शिकायत में 55 आदमियों के नाम लिखवाए और दोषी व्यक्तियों के खिलाफ न्याय संगत कार्रवाई की मांग की। दीपक आनंद की शिकायत के आधार पर FIR बनाते समय 213 लोगों क़ो दोषी करार दिया गया, जिसमें से 148 लोगों पर केस चला, बाकि 65 क़ो गिरफ्तार न किया जा सका। इस केस में हुई कार्रवाई से स्पष्ट है की न्यायालय मज़दूरों को सख्त सजा देने को पहले से ही कटिबद्ध था। यह नीचे के तीन उदहारणों से स्पष्ट हो जाएगा। सबसे पहले 148 आरोपियों में से 117 मज़दूरों का बाइज़्ज़त बरी हो जाना, इस बात का सबूत है कि केस बहुत ही कमजोर था। कोर्ट के कागज़ बताते हैं कि नितिन सारस्वत नामक मारुति का एक अफसर 19 जुलाई 2012 की रात में तीन बजे फैक्ट्री में आया और 89 लोगों की लिस्ट बनाकर उसने सुबह पुलिस को सौंपी। पुलिस ने सुबह उन लोगों को गिरफ्तार किया और बाद में दोपहर में चार मज़दूर ठेकेदारों से उनकी शिनाख्त कराई गयी और उन्हें आरोपी बनाया गया। कानून की ऐसी धज्जियां उड़ाने पर जज को भी कहना पड़ा " जांच कर रहे अफसरों ने इन लोगों को गिरफ्तार करके ... बिना किसी औचित्य के देश के कानून का उल्लंघन किया है।" दूसरे, केस मारुति मानेसर के जनरल मैनेजर दीपक आनंद द्वारा लिखाई गयी FIR पर चला है। FIR में उन्होंने लिखवाया था कि वारदात के दिन शाम को करीब 7 बजे 500 /600 मज़दूर 'बेलचे' लेकर दफ्तर में घुस गए। वे एक वरिष्ठ अफसर हैं, इसलिए FIR लिखाते हुए उन्हें सभी जरूरी तथ्यों की जानकारी होने की उम्मीद की जा सकती है। गवाही के वक़्त उन्होंने बयान दिया कि मज़दूर door beams, shockers और लोहे की छड़ें लेकर दफ्तर में घुसे। बेलचों, door beams, shockers और लोहे की छड़ों से हमले के औजारों को बदलना आवश्यक था, क्योंकि यह साबित करना मुश्किल होता कि फैक्ट्री में 500/600 बेलचे क्यों रखे गए थे, जबकि कार में काम आने वाले सामान तो फैक्ट्री में होंगे ही। जब बचाव पक्ष के वकील वृंदा ग्रोवर ने हमले के लिए इस्तेमाल में लाए गए साधनों में परिवर्तन का सवाल उठाते हुए दलील दी कि इस परिवर्तन से तो FIR झूठी साबित हो जाती है, तो जज साहब ने इस तर्क को ख़ारिज कर दिया। उनका कहना था कि FIR कोई विश्वकोष नहीं है और किसी मामले के हर विवरण का उल्लेख उसमें हो यह जरूरी नहीं है। कोई पूछे कि उन साधनों का विवरण जिससे हमला हुआ बताया गया है इतना गैर जरूरी भी तो नहीं माना जा सकता। यदि उसके बारे में ही स्पष्टता नहीं है तो FIR कितनी सच होगी। तीसरी बात, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि आखिर फैक्ट्री के दफ्तर MI में आग किसने लगाई पुलिस यह नहीं साबित कर पाई कि आग कैसे लगी और किसने लगाई। सबूत के तौर पर केवल इंस्पेक्टर प्रकाश ने एक माचिस को पेश किया। लेकिन उसने माना कि उंगलियों के निशान या DNA जांच उसने नहीं कराई। जज गोयल ने भी यह स्वीकार किया कि माचिस की बरामदगी संदेह के घेरे में है, लेकिन उन्होंने यह जिम्मेदारी मज़दूरों पर डाली कि वे साबित करें कि आग किसने लगायी. यानी अगर मज़दूर यह साबित न कर पाए कि आग किसने लगाई तो यह माना जाएगा कि आग मज़दूरों ने ही लगायी है। फैसले में कहा गया कि "अमरजीत (एक आरोपी) और उनके सहयोगियों द्वारा स्पष्टीकरण के अभाव में यह मानना होगा कि वे ही थे जिन्होंने MI दफ्तर में आग लगाई." इस प्रकार की और भी कई कमजोरियां केस के फैसले को पढ़ने से उजागर होती हैं। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि कुल मिलाकर यह फैसला कानून के आधार पर कम और शासक वर्ग की राजनीति से ज्यादा प्रेरित है। वर्तमान निज़ाम का मानना है की यदि मज़दूरों को सख्त सजा नहीं दी गई, तो देश में विदेशी पूंजी कैसे आएगी और वो विदेशी पूंजी के दम पर ही अपने राजकाज को चलाने का सपना देखते हैं। आमजन हितैषी आर्थिकी और राजनीति में इनका विश्वास नहीं है। यह पूछने पर कि उन्होंने दोषी कर्मचारियों के लिए मौत की सजा की मांग क्यों की। विशेष सरकारी अभियोजक अनुराग हुड्डा ने कहा, "हमारे औद्योगिक विकास में गिरावट आई है, एफडीआई सूख गया है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में मेक इन इंडिया के लिए उन्हें बुला रहे हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं हमारी छवि पर दाग हैं।" अब मारुति के मजदूरों के आंदोलन पर बात करते हैं। मारुति में होने वाले आंदोलन ने मज़दूर आंदोलन संबंधी कई स्थापित धारणाओं को तोड़ा है। यह तय है कि आने वाले समय में मारुति का यह आंदोलन औद्योगिक संबंधों की एक मानवीय अवधारणा को स्थापित करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। सर्वप्रथम यह ध्यान देना दिलचस्प होगा कि मारुति की फैक्ट्री दुनिया की अत्याधुनिक तकनीक से चलने वाली फैक्ट्री है। दूसरे, आज दुनिया के पैमाने पर मारुति फैक्ट्री सबसे शोषणकारी औद्योगिक संबंधों का अग्रणी उदहारण है। तीसरे सभी बड़ी यूनियंस जैसे aituc, citu, hms, bms, intec आदि के समर्थन न देने के बावजूद तथा विदेशी पूंजी को देश की समस्याओं का रामबाण हल मानने वाली सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों के विरोध के बावजूद मारुति मज़दूर पिछले 6-7 साल से आंदोलन चला रहे हैं, जो उत्तरोत्तर मज़बूत हो रहा है। इस संदर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि बेशक यूनियन नेतृत्व परमानेंट मज़दूरों का है, पर उनके 13 सूत्री मांगपत्र में मारुति में जारी ठेका प्रथा का अंत और ठेका मज़दूरों को नियमित करना यूनियन की मुख्य मांगों में से एक है। यह भी गौरतलब है क‌ि मारुति मैनेजमेंट को उसके पक्ष में गवाही देने के लिए एक भी मज़दूर नहीं मिला और आखरी बात न केवल देश में बल्कि दुनिया के पैमाने पर संघर्षरत मज़दूरों को व्यापक समर्थन मिला है। 4 अप्रैल 2017 को मारुति मज़दूरों के समर्थन में प्रतिवाद दिवस आयोजित किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों और दुनिया के कई देश के मज़दूरों ने अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। विरोध प्रदर्शन किया, रैलियां निकालीं। यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता कमजोर ही सही पर आज के समय में महत्वपूर्ण मिसाल है। इस संघर्ष ने आपसी मज़दूर भाईचारे का भी अभूतपूर्व उदहारण एक लंबे समय के बाद पेश किया है। मारुति मानेसर के 13 मजदूरों को उम्रकैद की सजा में एक भाई संदीप ढिल्लों को अपनी बहन की शादी में जाने की अनुमति नहीं मिली। भाई की कमी दूर करने सैकड़ों भाई संदीप के घर पहुंचे और संदीप की अनुपस्थिति में भाई की जिम्मेदारी निभाई। 'मारुति सुजुकी प्रोविजनल कमेटी' की अगुवाई में सभी मारुति सुजुकी मजदूर संघ के मजदूरों ने और बेल्सोनिका, एफएमआई, होन्डा, हीरो, सनबीम, ओमैक्स, जीकेएन, डाईकिन, मुन्जाल किरीयु, सोना कोयो स्टेरिंग, कैरियर, एक्साइड, अरस्टी आदि यूनियनों से जुड़े मजदूर साथियों ने शादी में पहुंचकर परिवारजनो का हौसला बढ़ाया और साथ ही 8 लाख 38 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी की। इस मदद ने जहां मानवता व भाईचारे का संदेश दिया है, वहीं जेल में बंद साथियों के मनोबल को भी बढ़ाया है और विश्वास दिलाया है कि उनके परिवार की जिम्मेदारी सब मजदूरों की है। संपर्कः रवींद्र गोयल, ई मेल आईडीः ravi_goel2001@yahoo.com

रविवार, 9 अप्रैल 2017

मारुति के मज़दूरों को दुनिया भर से मिल रहा समर्थन

इस समय जबकि पूरी दुनिया में फासिस्‍ट सत्ताएं मजबूत हो रही हैं, वहीं, साम्राज्यवाद को कब्र में ढकेलना वाला मजदूर वर्ग भी दुनियाभर में अपने बिरादर भाइयों की एकता को मजबूत रहने लगा है। अब भविष्य साफ दिख रहा है समाजवाद या बर्बरता। एक बार फिर पुरजोर ढंग से यह सवाल सबके सामने उठने लगा है, तय करो किस ओर हो तुम? यूपी में समाजवाद शब्द को सरकारी योजनाओ से हटाकर पूंजीवाद का कट्टर सेवक बाबा अपना गाल बजा रहा है। वैसे जिस समाजवाद को हटाया गया है उसकी तो लोहिया, मुलायम और चुनावी रास्ते को अपना चुकी लाल झंडे वाली पार्टियां पहले ही हत्या कर चुकी हैं। बीसवीं सदी में जो समाजवादी सत्ताएं अस्तित्व में आईं, आज भी वे दुनिया के मजदूर वर्ग में यह उम्मीद जगा रही हैं कि पूंजीवाद अजर अमर नहीं है। उसे हराया जा सकता है। इतिहास इसका भी गवाह है कि वह मजदूर वर्ग ही था जिसने न सिर्फ दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर की ताकत को धूल में मिटा दिया वरन उसे आत्महत्या तक करनी पड़ी। दुनिया में आज जिस तरह से फासिस्ट सत्ताएं अस्तित्व में आ रही हैं, उसने न चाहते हुए भी फिर से सोए हुए शेर को जगा दिया है। मजदूर वर्ग फिर से खुद को झाड़ पोंछ कर खड़ा हो रहा है। एक बार फिर मजदूर वर्ग अपनी विचारधारा पर पड़ी धूल राख को साफ कर और अपनी गलतियों से सबक लेने की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है। नए दौर में पूंजीवाद के खिलाफ और समाजवाद लाने के लिए लड़ी जाने वाली फैसलाकुन जंग में भारत का मजदूर वर्ग भी पीछे नहीं है। जो लोग आज फासिस्ट सत्ताओं के अट्टहास में अपनी अक्‍ल गिरवी रख चुके हैं, उनमें से ज्यादातर मध्यवर्ग से हैं। मीडिया में सारा कोलाहल इसी रीढ़विहीन वर्ग का है। इसमें कुछ चालाक भी हैं, जो प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़े हुए हैं। उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया है, जिसमें मजदूर वर्ग के संघर्ष के लिए कोई जगह नहीं है। इन मीडिया घरानों को जिनकी जूठन मिलती है उसे वे कभी नहीं छोड़ सकते। ऐसे में मजदूर वर्ग को खुद अपने अखबार पत्रिकाएं निकालनी होंगी। प्रचार के और नए तरीके खोजने होंगे। मारुति मज़दूरों की रिहाई व कार्यबहाली को लेकर दो दिवसीय विरोध के तहत 5 अप्रैल को देश के विभिन्न हिस्सों व दुनिया के कई देशों में आवाज बुलन्द हुई। लखनऊ में केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों व आल इण्डिया वर्कर्स काउन्सिल के नेतृत्व में मारुति मज़दूरों के समर्थन में हजरतगंज में गांधी मूर्ति के सामने प्रदर्शन व सभा हुई। सभा में मारुति के उम्र क़ैद की अन्यायपूर्ण सजा पाए 13 श्रमिकों की बिना शर्त रिहाई, 3-4 साल तक जेल में बन्दी के बाद बेकसूर साबित 117 मज़दूरों के मुआवजे व सभी मज़दूरों की कार्यबहाली की मांग के साथ ट्रेड यूनियन अधिकार पर हमले बन्द करने व ठेका-संविदा प्रथा बन्द करने की मांग उठी। शामिल संगठनों ने इस मुहिम को देशव्यापी रूप से चलाने का एलान किया। गुड़गांव में गुरुग्राम कोर्ट द्वारा मारुति के 13 श्रमिकों को आजीवन कारावास सहित अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ देश की 12 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर ट्रेड यूनियन काउंसिल गुड़गांव-रेवाड़ी ने कमला नेहरू पार्क में रैली निकाली। इसमें आईएनटीयूसी, एआईटीयूसी, सीआईटीयू, एचएमएस, रीको धरूहेड़ा, हीरोमोटो, मारुति मजदूर संघ के लोग शामिल हुए। जोरदार प्रदर्शन के साथ मांग की गई कि सजायाफ्ता मारूति मजदूरों को तुरंत रिहा किया जाए। बाइज्जत बरी किए गए 117 मजदूरों सहित 18 अप्रैल 2012 से मारूति कंपनी से निकाले गए 2500 के करीब स्थाई व अस्थाई वर्कर्स को दोबारा काम पर रखवाया जाए तथा उन्हें इस बीच गुजरे समय का पूरा मुआवजा दिलवाया जाए। तथा उत्पीड़न में शामिल मारूति कंपनी प्रबंधन, प्रशासनिक मशीनरी के खिलाफ कार्यवाही करने, ठेका प्रथा को पूरे तौर पर खत्म करने, समान काम-समान वेतन के बारे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अविलम्ब अनुपालन करने, ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले बंद करने व श्रम कानूनों में संशोधन वापिस लेने की मांग उठी। केन्द्रीय ट्रेड यूनियन दिल्ली, जयपुर, सिरसा, रोहतक, करनाल, भिवानी आदि स्थानों पर भी प्रदर्शन किया। पंजाब में वि​भिन्न ट्रेड यूनियनों, मज़दूर संगठनों और जन संगठनों ने लुधियाना के डी सी ऑफिस के सामने मारुति मज़दूरों के समर्थन में सामूहिक कार्यक्रम और विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ। दिल्ली में 5 अप्रैल को नेशनल हॉकर फेडरेशन दिल्ली ने जंतर मंतर पर दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली नगर पालिका परिषद व दिल्ली पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ प्रचंड विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया व मारुती के 13 आंदोलनकारियों की सजा के खिलाफ भी आवाज उठाई और साथ ही मांग रखी कि उन सभी 13 लोगों को रिहा किया जाए और उन पर जो भी झूठे मुकदमे लगाए गए है उन्हें वापस ले और बाकी 117 कर्मचारियों सहित सभी बर्खास्त कर्मचारियों को काम पर वापस लिया जाए। इस सन्दर्भ में प्रधान मंत्री, श्रम मंत्री और गृहमंत्री को ज्ञापन सौंपा। नारे लगे-जेल के ताले टूटेंगें, हमारे साथी छूटेंगे! फुटपाथ दुकानदार जिंदाबाद! मजदूर एकता जिंदाबाद! नेशनल हॉकर फेडरेशन जिंदाबाद! आध्र प्रदेश के कुर्नूल में 4 अप्रैल को पीओपी, एदटीयूआई, पीएडीएस द्वारा मारुति मज़दूरों के समर्थन में सामूहिक प्रदर्शन हुए। जबकि कन्याकुमारी में 4 अप्रैल को प्रतिवाद सभा हुई। हैदराबाद में आईएफटीयू के साथियों द्वारा प्रदर्शन किया गया। मुम्बई में टीयूसीआई व ट्रेड यूनियनों के संयुक्त प्लेटफार्म द्वारा मारुति मज़दूरों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ। इतना ही नहीं विदेशों में भी मारुति के मजदूरों को समर्थन मिला है। फ्रांस में मारुति मज़दूरों के समर्थन में अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिवाद दिवस पर फ्रांस के ड्रिक्स शहर में प्रेस कांफ्रेंस हुई। फ्रांस के पेरिस में 4 अप्रैल को अंतराष्ट्रीय प्रतिवाद दिवस पर प्रदर्शन हुए। वहीं हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में मारुति मज़दूरों के समर्थन में 4 अप्रैल को अंतराष्ट्रीय प्रतिवाद दिवस के रूप में मनाते हुए प्रदर्शन हुआ। इन प्रदर्शनों को गिनाने का मकसद यही था कि आज यदि हर तरफ पूंजीवाद फासिज्म के रूप में नजर आ रहा है, तो उसे मौत की नींद सुलाने वाला वर्ग भी आ चुका है। और उसने अपनी ताकत का एहसास भी करवाना शुरू कर दिया है।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

टाटा मोटर्स ने 6000 कर्मचारियों को निकाला

25 हज़ार लोगों पर पड़ेगा असर, 800 सहायक ऑटो इकाईयों पर भी पड़ेगा उल्टा असर 1 अप्रैल 2017 से बीएस तृतीय वाहनों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टाटा मोटर्स के लगभग 6,000 अस्थायी कर्मचारियों को निकाल दिया गया है. 2 9 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय ने 1 अप्रैल से भारत स्टेज III (बीएस -3) के वाहनों की बिक्री और पंजीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया था. कोर्ट का कहना था कि ये वाहन देश में हवा की गुणवत्ता को और ख़राब कर सकते हैं. उसने सभी ऑटोमोबाइल कंपनियों को बीएस तृतीय वाहनों की बिक्री रोकने के निर्देश दिए और कहा था कि नागरिकों के स्वास्थ्य व्यावसायिक हित से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। टाटा मोटर्स ने 31 मार्च और 3 अप्रैल को जमशेदपुर संयंत्र में दो दिवसीय बंदी की घोषणा की। इस संबंध में गुरुवार को एक नोटिस जारी किया गया। हिंदुस्तान टाइम्स का दावा है कि उसके पास इसकी एक प्रति है, जिसमें लिखा है, "स्थायी कर्मचारी और ट्रेनी कर्मचारी 4 अप्रैल को अपनी ड्यूटी के बारे में रिपोर्ट करेंगे." हैवी कैब फिटमेंट लाइन में काम करने वाले अस्थायी कर्मचारियों की बर्खास्तगी के अलावा, करीब 5,000 स्थायी कर्मचारी और विभिन्न सेगमेंट में काम करने वाले इतनी ही संख्या में प्रशिक्षुओं ने 31 मार्च की बंदी के दौरान काम में हिस्सा नहीं लिया. रिपोर्ट में कहा गया है कि 80,000 से ज्यादा वाहनों का वार्षिक उत्पादन प्रभावित होगा. टाटा मोटर्स, जमशेदपुर संयंत्र के प्रवक्ता रणजीत धर ने शुक्रवार को कहा कि अस्थायी कर्मचारी भविष्य में उत्पादन की मांग के मुताबिक सेवा में वापस लाए जाएंगे. हालांकि कंपनी के सूत्रों ने कहा कि बीएस चतुर्थ वाहनों का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू होने पर अस्थायी कर्मचारियों को ड्यूटी पर वापस बुलाया जाएगा. वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता डीडी त्रिपाठी ने कहा कि अस्थायी कर्मचारियों के परिवार के 25,000 सदस्य प्रभावित होंगे. कंपनी का निर्णय आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एआईएडीए) में करीब 800 सहायक इकाइयों के भविष्य पर काफी असर पड़ेगा. ये इकाइयां बड़े पैमाने पर टाटा मोटर्स पर निर्भर हैं. सिंहभूम चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष सुरेश सोथलिया ने कहा किस "इस फैसले से लगभग 800 सहायक इकाइयां प्रभावित होंगी, लेकिन टाटा मोटर्स इस स्थिति का सामना करने में सक्षम है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कंपनी पर लंबी अवधि का प्रभाव नहीं होगा." (मजदूरनामा से साभार)