सोमवार, 18 मार्च 2013

जब कार धोना भी होगा अपराध

                                                         नूर उल हक
सन् 1860 के दमनकारी कानून के बदले जम्मू कश्मीर सरकार ने जो नया अधिनियम प्रस्तावित किया है, वह मध्यकाल की मनोवृत्ति को ही दर्शाता है। इसके कुछ प्रावधान बेहद हास्यास्पद हैं। सार्वजनिक स्थलों पर शांति बनाए रखने हेतु धारा 136 एवं 137 के अंतर्गत दंड के प्रावधान के तहत एक महीने की सजा जुर्माने के साथ, या जुमार्ने के साथ 6 माह की सजा। ये निम्न वजहों से दी जा सकती है-
(अ) ऐसा व्यक्ति जो सार्वजनिक स्थानों पर फर्नीचर, वस्तु, वाहन या किसी पशु की साफ-सफाई कर रहा हो।
(ब) सूर्यास्त के आधा घंटे पहले और सूर्योदय के एक घंटे पहले वाहन चलाना, किसी गैर मशीनीकृत वाहन से टकरा जाना।
(स) सार्वजनिक स्थान पर मल-मूत्र का त्याग करना।
(द) 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे से जेवरात, घड़ी, सायकल, बर्तन या कोई मूल्यवान वस्तु खरीदना।
(ई) सार्वजनिक स्थानों पर पंक्ति को तोड़ना, जोकि निजी या सार्वजनिक किसी भी प्रवृत्ति की हो सकती है।


जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित नए पुलिस कानून के कुछ प्रावधान मध्ययुगीन राजसत्ता की विरासत सी जान पड़ते हैं। जम्मू एवं कश्मीर पुलिस अधिनियम 2013, यदि वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो यह भ्रष्टाचार का पिटारा ही खोल देगा। ‘विशेष सशस्त्र बल क्षेत्र अधिनियम’ का विरोध करने से पहले उमर अब्दुल्ला को अपने प्रस्तावित पुलिस कानून पर भी गौर करना चाहिए।
पिछले इतवार मैं अपने ग्यारह वर्षीय बेटे के साथ शहर के बाहर कार से घूम रहा था। सड़क किनारे कार धोने की बात तब तक मेरे दिमाग में नहीं थी, लेकिन वहां कार धोते लोगों को देख मैं भी अपनी कार से बाहर निकल आया। मेरा बेटा भी उत्साह में आकर मग्गे से कार पर पानी फेंकने लगा। एकाएक मुझे अपना बचपन याद आया, जब मैं भी इसी उत्साह से अपनी खिलौना कार को धोता था। इसी दौरान एक पुलिस जिप्सी वहां से गुजरी। जैसा कि कश्मीर में सामान्य प्रवृत्ति बन गई है, मेरे बेटे ने भी पुलिस जिप्सी की ओर अपनी ऊंगलियां बढ़ाते हुए गोली चलाने का अभिनय शुरू कर दिया। एकाएक पुलिस की गाड़ी रुक गई और मेरे बेटे ने खुश होते हुए सोचा होगा कि शायद उसने सबको मार दिया है।
तभी पुलिस गाड़ी पीछे की ओर चली और मेरी कार के पास आकर रुक गई। उसमें से एक ठिगना अफसर अपने तीन अंगरक्षकों के साथ नीचे उतरा। गालियां निकालते मुंह से उसने कहा, ‘तुम अपने इस कबाड़ को घर पर नहीं धो सकते? सड़क किनारे पानी क्यों डाल रहे हो? क्या तुम्हें हमारे नए निर्देश पता नहीं हैं? जो भी सार्वजनिक स्थानों पर अपना फर्नीचर, वस्तु या कार या किसी पशु की साफ-सफाई करेगा उस पर जुर्माने के अलावा 6 महीने की सजा भी हो सकती है। तुम तो सा.. पढ़े लिखे दिखते हो, तो ऐसा क्यों कर रहे हो? क्या यह तुम्हारे बाप की जागीर है? तुम्हें किसने आदेश दिया कि अपनी (फिर एक गाली) यहां धोओ? नाराज पुलिस अफसर ने कार से बजाए गाड़ी के कागजात के मेरी नोटबुक उठा ली और पुलिस गाड़ी की ओर इशारा करते हुए वाहन में बैठने का इशारा किया।
अचानक मेरे बेटे ने कहा, ‘थानेदार अंकल, देखो कुत्ता पेशाब कर रहा है। उसको भी थाने ले चलो ना। इसने भी रास्ता खराब किया।’ इस चुटकले ने कमोवेश पुलिस वाले का गुस्सा कुछ कम किया। वह बोला सुनो यह मेरा काम है, मैं तो अच्छी भावना से काम कर रहा हूं। वह धीमे-धीमे मेरी कॉपी के पन्ने पलट रहा था। एकाएक उसकी आंख एक पन्ने पर अटक गई और वह बोल पड़ा, ओह तो तुम एक राष्ट्र विरोधी भी हो। तुम आतंकवादियों के समर्थक और उनसे सहानुभूति रखने वाले भी हो? तुम सत्ता के खिलाफ कार्य करते हो। मैंने जवाब दिया, नहीं श्रीमान, मैं तो एक पत्रकार हूं। जवाब मिला, अच्छा तभी तुम गलतियां कर रहे हो और कानून भी तोड़ रहे हो। और तुम्हें यह अधिकार किसने दिया कि तुम राष्ट्रीय हित और कश्मीर में पुलिस द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ लिखो? तुरंत गाड़ी में बैठो, मैं तुमसे थाने में ही बात करूंगा और तुम्हें कुछ तमीज भी सिखाऊंगा। तुम पत्रकार लोग दुनिया के सबसे बद्तमीज लोग होते हो।
ये देखकर मेरा बेटा रोने लगा। पुलिस अफसर ने कहा पत्रकार साहब अब क्या सोच रहे हो। थाने जाना चाहते हो और बरसों जेल में रहना चाहते हो या समझौता? मैंने कहा श्रीमान मैं क्या कर सकता हूं? गाली देते हुए वह गुर्राया। इसी बीच ड्राइवर ने गाड़ी चालू कर दी। अफसर फिर चीखा इसे थाने ले जाओ और अच्छा सबक सिखाओ। घबड़ाकर मैंने अपनी जेबें टटोली। उसमें 500 रुपये का एक नोट मिला, जिसे मैंने उस अफसर की ओर बढ़ा दिया। मुस्कराते हुए उसने कहा किसी से इस बात का जिक्र मत करना, वरना! मैं उदास होकर अपनी कार में बैठ गया। इस घटना को मैं अपनी डायरी में लिखना चाहता था। मैंने अपने बेटे से पेन मांगा। उसने मेरी ओर पेन बढ़ाया ही था कि मैंने अपने हाथ पीछे खींच लिए। प्रस्तावित पुलिस कानून में आदेशित था कि यदि तुमने 14 वर्ष से कम के किसी बच्चे से किसी भी तरह के जेवरात, घड़ी, पेन, सायकल, बर्तन या कुछ भी मूल्यवान खरीदा तो तुमको छ: महीने के लिए जेल भेजा जा सकता है।
घर लौटते समय मेरे नटखट बेटे ने वातावरण को हल्का बनाते हुए कहा, ‘पापा क्या ये सेना के लोग उनको जो कि अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब आदि करते दिखाई देते हैं, उन्हें भी अंदर करेंगे?’ मेरे पास इसका एकमात्र उत्तर यही था कि सारे नियम सिर्फ आम कश्मीरियों के लिए ही हैं। घर लौटते में सेना के शिविर के नजदीक से गुजरते ही रोकते हुए कहा गया। ‘बाहर निकलो और लाइन में चलो। मेरा बेटा नाचते हुए चल रहा था। मैं डरा क्योंकि लाइन तोड़ना भी अब एक जुर्म है। वैसे मैं सूर्यास्त के पहले अपने घर लौट जाना चाहता था, क्योंकि नए पुलिस कानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो गाड़ी चला रहा है यदि सूर्यास्त के आधे घंटे बाद एवं सूर्यास्त के एक घंटे पहले बिना मोटरचलित वाहन से भिड़ जाता है, तो उसे एक महीने की सजा और जुमार्ना या 6 महीने की सजा और जुमार्ना हो सकता है।
फर्नीचर पर धूल की परतें चढ़ जाने दो लेकिन मैं उसे धोऊंगा नहीं। मेरे घर अब कोई पालतू जानवर नहीं होगा, क्योंकि कब किसी अफसर की आंख मुझ पर चढ़ जाए? पुलिस राज चलने दो, जिससे कि अफसरों को आम आदमी से अतिरिक्त कमाई हो सके। आम आदमी मरे तो मरे, अधिकारियों की स्थिति बेहतर होनी चाहिए। चूंकि नई दिल्ली कश्मीर में शांति चाहती है, तो इस नए पुलिस कानून को पारित हो ही जाना चाहिए।
इसके अलावा ग्रामीण रक्षा समितियों एवं विशेष पुलिस अफसरों की वापसी एवं मुखबिरों को इनाम का प्रावधान भी इस कानून में किया गया है। यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम वाले मामले में दिए गए उस निर्णय के विपरीत है, जिसमें साफ कहा गया है कि राज्य आम नागरिकों को हथियारबंद नहीं कर सकता और उन्हें मारने की अनुमति भी नहीं दे सकता। प्रस्तावित मसौदे के अनुसार पुलिस स्वयं के विशिष्ट सुरक्षा क्षेत्र घोषित कर सकती है और लोगों को विभिन्न अधिकारों से बेदखल कर सकती है। इस बात की पूरी संभावना है कि भ्रष्टाचार की जबर्दस्त गिरफ्त में फंसे कश्मीर में इस कानून के लागू हो जाने के बाद भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। 
-स्वतंत्र पत्रकार, श्रीनगर 

इरोम के बहाने उत्तरपूर्व

                                                                चिन्मय मिश्र
इरोम शर्मिला पर आत्महत्या का मुकदमा चलाने की प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि यह देश संवेदना की भाषा भूल चुका है। बहुत से लोग शायद इस तर्क से सहमत नहीं होंगे कि इंफाल ओर साबरमती आश्रम में कोई समानता भी है। गांधी ने दिल्ली को अपने संघर्ष का केंद्र कभी नहीं बनाया। वे स्वयं को साबरमती आश्रम ले आए और जिस दिन भारत आजाद हुआ, उस दिन भी वे दिल्ली में नहीं, बल्कि नोआखली में थे। 4 मार्च को इरोम दिल्ली की अदालत में थीं और उसी के समानांतर चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार चैनलों की सुर्खियों में भी। 5 मार्च को वे देशभर के अखबारों के पहले पन्ने पर थीं और 6 मार्च को एक बार पुन: सब चर्चाओं से दूर मणिपुर के अस्पताल के अपने जेल वार्ड में पहुंच गईं।
मीडिया के सामने नए मुद्दे आ गए। अंग्रेजी कहावत भी है, ‘जैसे ही आप नजरों से दूर होगे वैसे ही दिमाग से भी विस्मृत हो जाओगे।’ मीडिया ने भी अपने वार्षिक कैलेंडर में 2 नवंबर के दिन पर लाल गोला बना दिया होगा, जिस दिन इरोम का अनशन 12वें से 13वें वर्ष में प्रवेश करेगा और सारा देश एक बार पुन: उस दिन इरोम के साथ होगा और अगले दिन अपने-अपने रोजमर्रा के काम में जुट जाएगा। इधर सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियम के खिलाफ चल रही सुगबुगाहट को थोड़ी आवाज उमर अब्दुल्ला ने दी। हाल ही में बारामुला में एक युवक सेना की गोली से मारा गया है। परन्तु उमर अब्दुल्ला का यह विरोध कमोवेश घड़ियाली आंसू जैसा है, क्योंकि वे प्रस्तावित जम्मू-कश्मीर पुलिस अधिनियम के अंतर्गत ऐसे अधिकार राज्य पुलिस को देना चाहते हैं, जिसके अंतर्गत पुलिस अपने विशेष सुरक्षा क्षेत्र घोषित कर सकती है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सन 2010 में घाटी में फैला युवा असंतोष से कश्मीर में जो 100 से अधिक नवयुवक राज्य पुलिस बल की गोलियों से ही मारे गए थे।
लेकिन मणिपुर की कहानी कुछ अलग है। वहां यह कानून पिछले 50 वर्ष से लागू है। इतना ही नहीं शाम होते न होते वहां कर्फ्यू जैसी स्थितियां निर्मित हो जाती हैं। पिछले दिनों भोपाल में मणिपुर व देश के प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक रतन थियाम के नाटकों पर केंद्रित एक अनूठा समारोह  ‘रंग सोपान’ आयोजित हुआ। इसमें उनके सात नाटकों का मंचन हुआ। वे अपने नाटकों के जरिए एक ऐसा अलौकिक संसार रचते हैं, जिसमें बहुत कुछ रंगों और पार्श्व ध्वनियों से संप्रेषित होता है। उनके अनेक नाटकों में सामूहिक क्रंदन एवं रुदन मानोंं कलेजा चीरता सा प्रतीत होता है। उन अंधेरे पलों में हमारे सामने वहां की कारुणिक परिस्थिति और उन सबके बीच बैठी इरोम साफ नजर आती हैं। मंच पर भी अंधेरा है, हमारे अंदर भी अंधेरा उतरता है और धर्मवीर भारती का नाटक ‘अंधायुग’ युद्ध की विभीषिका को अभिव्यक्त करते हुए समझाता है कि गांधारी का विलाप और श्रम अकारण नहीं है, कृष्ण चाहते तो महाभारत रोक सकते थे। आज दिल्ली में बैठा सत्ता वर्ग बजाए किसी हल पर पहुंचने के हठधर्मिता का प्रयास कर रहा है। वह स्वयं नियुक्त न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी आयोग की सिफारिशें मानने से भी इंकार कर रहा है।
हम चीन से सीमा विवाद पर बात करने को तैयार हैं, पाकिस्तान से संबंध ठीक करने में दिन रात एक कर रहे हैं, लेकिन अपने आंतरिक विवादों के निराकरण को लेकर ठंडापन बनाए हुए हैं। रतन थियाम कहते हैं, ‘मणिपुर में बहुत सारे युद्ध हुए हैं। बहुत से आक्रांता बाहर से आए हैं। हम भी गए हैं। समकालीन युद्ध का क्या स्वरूप है? किसी को मार देना या किसी पर बम फेंक देना भर युद्ध नहीं है। कई विराट शक्तियां हैं जो समूची सभ्यताओं, परंपराओं संस्कृतियों और आचार संहिताओं पर आक्रमण करती हैं।’ मणिपुर और कमोवेश पूरे उत्तरपूर्व में ऐसा ही युद्ध चल रहा है। वह विस्तारित होकर पूरे हिमालय, जिसमें जम्मू-कश्मीर शामिल है, में फैलता जा रहा है। मध्यभारत का वन क्षेत्र नक्सलवाद की चपेट में है। 130 से अधिक जिले विस्थापन के खिलाफ  संघर्ष कर रहे हैं। हर जगह अपनी-अपनी शर्मिला संघर्ष कर रही है। रतन थियाम अपनी सज्जनता में समकालीन युद्ध के सर्वाधिक घातक स्वरूप आर्थिक युद्ध को सीधे-सीधे इसमें नहीं जोड़ते। लेकिन वे सच्चाई से मुंह छुपाने की आधुनिक रणनीति को बहुत कोमलता से अभिव्यक्त करते हुए याद दिलाते हैं,
धूल से ढके होने के बाद भी
संध्या के सूर्य की लालिमा
सुंदर बनी रहती है
आंख बचाने की सोचकर
उन्हें बंद करने से वह कैसे दिखाई देगी?
परंतु चुभन से डर कर नीति निमार्ताओं ने उत्तर पूर्व से आंख फेर ली हैं। वहां के आधे युवा नशीली दवाओं के आदी होते जा रहे हैं। उत्तरपूर्व की लड़कियां पलायन स्थलों पर यौन हिंसा का सर्वाधिक शिकार होती हैं। अपनी जिद को पूरा करने के दंभ में राष्ट्रहित की ओट में गलत को भी सही ठहराने का प्रयास कागजों में तो सफल दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक धरातल पर उसकी प्रतिक्रिया दिन-ब-दिन खतरनाक रूप लेती जा रही है।

शनिवार, 16 मार्च 2013

सरमाएदारों के नुमाइंदे मोदी

                                                  देवेन्द्र प्रताप
किसी भी सरकार की अच्छी या बुरी छवि उसमें शामिल विधायकों या सांसदों की छवि से सीधे तौर पर जुड़ी होती है। इस मानक को गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी की हेट्रिक बनाने वाली सरकार पर लागू करने पर बड़े चौंकाने वाले नतीजे सामने आते हैं। मोदी सरकार में शामिल नवनिर्वाचित विधायकों का लेखा-जोखा इस बात की गवाही देता है कि उनकी सरकार में शामिल विधायक किसी भी तरह बमुश्किल रोजी-रोटी कमाने वाली आम आवाम की किसी भी तरह नुमाइंदगी नहीं करते। बावजूद इसके तथ्य यही है कि वह उन्हीं के द्वारा निर्वाचित सरकार है। पहले ही साफ कर दें कि कांग्रेस और अन्य पार्टियों के जीते हुए प्रतिनिधि भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। बहरहाल, गुजरात विधानसभा चुनाव में शामिल प्रतिनिधियों की ओर से चुनाव आयोग के सामने दिए गए हलफनामे के अनुसार वहां के 182 में से 57 अर्थात लगभग 31 प्रतिशत विधायकों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले लंबित होने की घोषणा की है। यानी मोदी सरकार में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं, जिन पर कई तरह के आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। 2007 के चुनाव में ऐसे लोगों की संख्या 25 प्रतिशत थी। इस बार चुने गए 57 में से 24 विधायकों यानी 13 प्रतिशत पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं।
निर्वाचन क्षेत्र नारनपूरा से भाजपा विधायक अमित अनिल चन्द्र शाह (2 मामले हत्या / 2 मामले अपहरण), निर्वाचन क्षेत्र वाव से भाजपा विधायक चौधरी शंकरभाई लगधीरभाई (हत्या के प्रयास के 3 मामले), निर्वाचन क्षेत्र शेहरा से भाजपा विधायक जेठाभाई जी अहीर (1 मामला बलात्कार / 1 मामला अपहरण) आदि लोगों की सूची लंबी है, जो आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। तुर्रा यह कि इस चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है।  
     इस चुनाव में भले ही मोदी की पार्टी ने हेट्रिक लगाई हो, लेकिन निर्वाचित विधायकों में सबसे ज्यादा संपत्ति वृद्धि मानवदार निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेसी विधायक छावडा जवाहरभाई पेथालालभाई के पास है। 2007 में इनके पास घोषित संपत्ति 18.32 करोड़ थी, जो 2012 में बढ़कर 82.90 करोड़ हो गई। जहांं तक भाजपा विधायकों की संपत्ति में वृद्धि की बात है, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि वे तो लगातार तीन बार से सत्ता सुख भोग रहे हैं। भाजपा के लोगों में सबसे ज्यादा संपत्ति वृद्धि (5525 प्रतिशत)धरनगडर निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा विधायक कावडिया जयंतीभाई रामजीभाई की हुई। 2007 में इनके द्वारा घोषित संपत्ति 10.50 लाख रुपये थी, जो 2012 में बढ़कर 5.91 करोड़ हो गई। पाडरा निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के विधायक पटेल दिनेशभाई बालूभाई की संपत्ति में 34.89 करोड़ की वृद्धि हुई है। इनके द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार 2007 में इनके पास 4.51 करोड़ रुपये की संपत्ति थी, जो 2012 में बढ़कर 39.41 करोड़ हो गई। इसी तरह निर्वाचन क्षेत्र भूज से भाजपा के विधायक आचार्य डॉ. नीमाबेन भावेशभाई की संपत्ति में भी 32.30 करोड़ रुपये का इजाफा देखा गया। इनके पास 2007 में 2.34 करोड़ की संपत्ति थी, जो 2012 में बढ़कर 34.64 करोड़ हो गई।
    2012 के विधानसभा चुनाव में उतरे भाजपा के 65 विधायकों द्वारा चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत हलफनामों के अध्ययन से साफ पता चलता है कि इनमें से लगभग हर प्रत्याशी की औसत संपत्ति में 2007 की तुलना में 4.66 करोड़ की वृद्धि हुई है। वहीं कांग्रेस के 33 नवनिर्वाचित विधायकों की संपत्ति में भी औसतन 5.94 करोड़ की वृद्धि हुई है। यानी चाहे वर्तमान भाजपा सरकार हो या फिर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस-दोनों की सरमाएदारों की पार्टियां हैं।

2013 से दरपेश कुछ जिंदा सवाल

13 का अंक ज्योतिष में शुभ नहीं माना जाता। समाज में भी किसी की मृत्यु के बाद तेरहवीं की जाती है।  2013 के बारे में कई ज्योतिषियों की राय है कि इसे सामाजिक मुद्दे परेशान करेंगे। देश के मौजूदा हालात भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। 2012 विदा ले रहा है, लेकिन समूची दुनिया अभी भी आर्थिक मंदी से आतंकित है, अरब में अभी भी क्रांति का दावानल सतह के नीचे सुलग रहा है, वहीं हमारा मुल्क भी ऐसी कई समस्याओं से परेशान है। एफडीआई पर रार अभी भी बरकरार है, भ्रष्टाचार पर फिलहाल अन्ना मौन हैं, लेकिन अब समूचा देश बोल रहा है।  2012 को ऐसे ही कई सवालों से उलझना पड़ा। नए साल (2013) के स्वागत के साथ यह उम्मीद की जानी चाहिए कि यह जनता के जीवन में नई खुशियां लेकर आएगा।
                                             देवेन्द्र प्रताप
अगर किसी देश की सरकार पर ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हों, तो मसला संगीन हो जाता है। भारत के मामले में यह नई बात नहीं है। बोफोर्स घोटाला (64 करोड़), यूरिया घोटाला (133 करोड़ रुपये), चारा घोटाला (950 करोड़ रुपये), शेयर बाजार घोटाला (4000 करोड़ रुपये), सत्यम घोटाला (7000 करोड़ रुपये) स्टैंप पेपर घोटाला (43 हजार करोड़ रुपये), कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला (70 हजार करोड़ रुपये), 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (1 लाख 67 हजार करोड़ रुपये), अनाज घोटाला (करीब 2 लाख करोड़ रुपये) जैसे कई ऐसे घोटाले हैं, जिन्होंने देश का नाम दुनिया में बदनाम किया है। 2012 ऐसे ही घोटालों का ही वर्ष रहा। हमारे देश के घोटाले बाज जिस स्विस बैंक में अपना धन जमा करते हैं, उसके डायरेक्टर ने कहा है,‘भारतीय गरीब हैं, लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा’ उनके अनुसार स्विस बैंक में हमारे मुल्क का 280 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा धन जमा है। यह रकम इतनी बड़ी है कि अगर यह देश में आ जाए तो 2013 के बाद अगले 30 सालों जनता को सरकार को कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। अगर सरकार ऐसा होने दे तो। इस रकम से 60 करोड़ से ज्यादा रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं अगर यह रकम देश में आ जाए तो भारत के हर गांव से राजधानी तक फोर लेन सड़क बनाई जा सकती है। इस रकम से हर नागरिक को 60 सालों तक 2000 रुपये हर माह मदद दी जा सकती है। भ्रष्टाचार को रोकने में वर्ष 2012 तो विफल साबित हुआ, अब इसे रोकने की जिम्मेदारी 2013 के कंधों पर है।
        इस साल अक्टूबर माह की 13 तारीख को ब्लूमबर्ड टीवी के सहयोग से एक चर्चा का आयोजन किया गया। इसमें मणिशंकर अय्यर, अरुणा राय, प्रो. दीपांकर गुप्ता और जय पांडा जैसे नामी लोग मौजूद थे।इस चर्चा के दौरान अय्यर और अरुणा राय का निश्चित मत था कि भारत क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहा है, जबकि अन्य दो वक्ताओं की राय थी कि तमाम समस्याओं के बावजूद मुद्दों को अभी भी देश के संविधान के ढांचे के तहत हल किया जा सकता है। इस असहमति के बावजूद सभी इस बात से सहमत थे कि भ्रष्टाचार, कुशासन, प्रशासन की संवेदनहीनता आदि के कारण पैदा असहायता से आम जनता में गुस्सा और क्षोभ लगातार बढ़ता जा रहा है। इस चर्चा में मौजूद 58 प्रतिशत लोगों ने विषय के पक्ष में वोट दिया। अगर यह बात सही है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है हमारा देश भी मिस्र और ट्यूनिशिया का रास्ता अख्तियार कर सकता है।
        सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में पिछड़ों को आरक्षण देने के मुद्दे ने भी सरकार को काफी परेशान किया। हालांकि 2012 के जाते-जाते संविधान संशोधन से संबंधित विधेयक का प्रस्ताव पारित हो गया, लेकिन रार अभी बरकरार है। अलग-अलग पार्टियां नौकरियों में आरक्षण देने के मसले पर एक राय नहीं हैं। उधर इस मुद्दे को बहस के केंद्र में लाने वाली सर्वजन हिताय संरक्षण समिति इस मसले पर ‘करो या मरो’ के मूड में है। अब देखना यह है कि नए साल (2013) में यह मुद्दा क्या गुल खिलाता है।
         2012 में जमीन अधिग्रहण के विरोध में समूचे देश में तीखा विरोध हुआ। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, महाराष्ट्र, प. बंगाल आदि राज्यों में पुलिस ने भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों के ऊपर लाठियां भांजी। देश में 5.37 करोड़ परिवार भूमिहीन हैं और 6.1 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास जमीन का इतना टुकड़ा भी नहीं है। वहीं दूसरी ओर 20 साल पहले जिस डीएलफ को कोई नहीं जानता था, आज वही कंपनी तीन लाख करोड़ की मालिक है। सरकार की ओर से पिछले 20 वर्षों में 81 लाख हेक्टेयर जमीन औद्योगिकीकरण के नाम पर देश  के 200 घरानों को दी गई। ये ऐसे घराने हैं, जिनमें देश की सत्ता को नियंत्रित करने की ताकत है और वे करते भी हैं। वर्ष 2012 में ऐसे कई घरानों के उद्योगों के लिए किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया। अकेले सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) के लिए ही देश में एक लाख 50 हजार हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। यह क्षेत्रफल देश की राजधानी के बराबर बैठता है।
     एक अनुमान के मुताबिक इतने बड़े क्षेत्रफल में करीब 10 लाख टन अनाज की पैदावार की जा सकती है। सेज का विरोध ज्यादा बड़े पैमाने पर है। इसका विरोध किसान तो कर ही रहे हैं, क्योंकि उनकी जमीनें जाएंगी। दूसरी ओर देश के कई बड़े सामाजिक संगठन सेज को एक नई गुलामी लादने का प्रयास करार दे रहे हैं, क्योंकि सेज के अंदर किसी तरह के श्रम कानूनों का पालन अनिवार्य नहीं होगा। यानि वहां काम करने वाले मजदूर और कर्मचारी सिर्फ मालिकों के रहमोकरम पर रहेंगे। उन्हें संवैधानिक अधिकारों हड़ताल करने और संगठित होने के लिए यूनियन बनाने से भी वंचित होना पड़ेगा। वर्ष 2012 में आदिवासी इलाकों में उद्योंगों के लिए किए जाने वाले जमीन अधिग्रहण के चलते हजारों आदिवासी विस्थापित होकर बंधुआ मजदूर बनने को मजबूर हुए। अकेले उड़ीसा में ही दिसंबर 2012 तक पास्को परियोजना का विरोध कर रहे 600 से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता जेल में ठूंस दिए गए।
      2012 में समूची दुनिया वैश्विक आर्थिक मंदी से पीड़ित रही। यूरोप और अमेरिका को इस मंदी ने सबसे ज्यादा निशाना बनाया। इस समय ग्रीस, स्पेन आदि देशों की हालत बहुत बुरी है। स्पेन में आम जनता की बदहाली का आलम यह है कि परिवार में किसी की मृत्यु के बाद क्रियाकर्म के लिए भी उनके पास पैसे नहीं हैं। ऐसे में लोगों ने परिवार में किसी की मृत्यु होने पर शव को मनुष्यों पर शोध करने वाली वैज्ञानिक संस्थाओं को दान देना शुरू कर दिया है। 2012 में इस तरह के आवेदन करने वाले लोगों में रिकार्ड बढ़ोत्तरी देखी गई।
खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को केंद्र सरकार ने 14 सितंबर 2012 को मंजूरी दे दी। सरकार की ओर से ऐसा दावा किया जा रहा है कि इसके लागू होने से देश के उपभोक्ताओं को फायदा होगा, वहीं अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा। दूरसंचार, वाहन और बीमा क्षेत्र में पहले ही एफडीआई को स्वीकृति मिल चुकी है। केंद्र ने मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को मंजूरी दी है, जबकि एकल ब्रांड में सौ प्रतिशत। सारा काम करने के बाद अब केंद्र ने गेंद को राज्यों के पाले में डाल दिया है।
    केंद्र सरकार के अनुसार राज्यों में एफडीआई लागू करने का निर्णय राज्य सरकारों का होगा। देसी एयरलाइंस कंपनियों में 49 फीसद की एफडीआई, चार सरकारी कंपनियों -एमएमटीसी और आॅयल इंडिया में दस प्रतिशत, हिंदुस्तान कॉपर में 9.59 प्रतिशत और नाल्को में 12.5 प्रतिशत विदेशी निवेश को भी इसी साल मंजूरी मिली। इतना ही नहीं इसी वर्ष ब्रॉडकास्ट मीडिया क्षेत्र में भी सरकार ने एफडीआई को 74 प्रतिशत कर दिया। सरकार के इन कदमों का समूचे देश में विरोध हुआ। अगर देश के खुदरा व्यापार की बात करें तो इस समय देश में खुदरा व्यवसाय 29.50 लाख करोड़ रुपये का है। यह जीडीपी के 33 प्रतिशत के आसपास बैठता है। जाहिर है यदि इस क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश होता है, तो इसका फायदा भी उन्हें ही मिलेगा। इस समय देश में खुदरा व्यापार करने वाली करीब 1 करोड़ 20 लाख छोटी दुकाने हैं। इन दुकानों से करीब 4 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी चलती है। इसलिए सरकार के इस कदम से देश के खुदरा व्यापारियों पर विदेशी गाज गिरना तय है। सरकार और छोटे-मंझोले व्यापारियों के बीच रार अभी थमी नहीं है। देखना यह है 2013 इस मामले में क्या फैसला सुनाता है।
2012 में मेरठ, दिल्ली, मुंबई, बंगलरू, देहरादून समेत 57 बड़े शहरों में हर 25 मिनट पर एक महिला के छेड़छाड़ हुई, जबकि हर एक घंटे में दुष्कर्म और अपहरण की वारदातें अंजाम दी गर्इं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2012 में हुए कुल अपराध का 60-70 प्रतिशत महिलाओं से जुड़ा हुआ रहा। इस साल देश की राजधानी में 500 से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। यह 2011 की अपेक्षा 18 प्रतिशत ज्यादा है। ऐसी घटनाओं को लेकर यह धारणा बनने लगी थी कि ‘होना जाना कुछ नहीं’। दिल्ली में 23 साल की युवती के साथ हुए बहशियाना दुष्कर्म के बाद समूचे देश में हुए विरोध प्रदर्शनों में जनता का यही गुस्सा मौजूद था। इस हिंसक प्रदर्शन में 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारी घायल हुए। युवती के लिए न्याय मांगने वालों पर लाठियां फटकारी गर्इं, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कड़ाके की ठंड में उनके ऊपर पानी की बौछार डाली गई। दुष्कर्म की तरह दिल्ली सरकार के इस कारनामे को भी अमानवीयता कहा गया। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगे।

...तो आजाद हो जाता मुल्क

काकोरी कांड के बाद ज्यादातर क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए थे। बिस्मिल, असफाक उल्ला, राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी,रोशन सिंह आदि साथियों को फांसी की सजा सुना दी गई, लेकिन आजाद टूटे नहीं। किसी ने उनके आंसू नहीं देखे। उन्होंने आजादी की जंग के लिए दूसरी यात्रा शुरू की। इस बार उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, शिववर्मा आदि साथियों के साथ ऐसा क्रांतिकारी नेटवर्क खड़ा किया कि ब्रिटिश साम्राज्य थरथर कांपने लगा।

                                                       देवेन्द्र प्रताप
     देश के आजाद होने के बाद जिंदा रहे भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के साथी शिव वर्मा ने आजाद के साथ बिताए वक्त को अपनी पुस्तक ‘संस्मृतियां’ में दर्ज किया है। उनकी इस पुस्तक को सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिल चुका है। वे लिखते हैं: ‘एक दिन जब सुरेन्द्र पांडे ने धीरे से मेरे कान में आकर बताया कि नं.2 आए हैं और आज रात तुम्हें उनसे मिलना है, तो मेरे सारे शरीर में बिजली सी दौड़ गई। दूसरों से आजाद के बारे में जो कुछ सुना था, उसके सहारे कल्पना में मैंने आजाद की एक तस्वीर बना ली थी। सुरेन्द्र की बात से यह तस्वीर चलने-फिरने लगी।’ आजाद उस समय प्रख्यात बुद्धिजीवी राधामोहन गोकुल जी के यहां रुके थे। आमतौर पर लोग आजाद को बम-पिस्तौल वाला क्रांतिकारी समझते हैं, लेकिन उनकी अपने समय के कई बुद्धिजीवियों से बहुत ही गाढ़ी दोस्ती थी।
        राम विलास शर्मा अपने लेख ‘मेरे साक्षात्कार’ में बताते हैं कि चंद्रशेखर आजाद की उस समय के क्रांतिकारी साहित्यकार राधामोहन गोकुल जी से बहुत ही करीबी दोस्ती थी। वे उनके यहां आकर अक्सर रुकते थे। महाकवि निराला राधामोहन गोकुल जी को अपना गुरु मानते थे, इस तरह उनका भी चंद्रशेखर आजाद से परिचय हुआ। इसी तरह प्रख्यात बुद्धिजीवी वैशंपायन और रामचंद्र शुक्ल से भी आजाद की गाढ़ी दोस्ती थी। इसका प्रमाण राधामोहन गोकुल जी के यहां चंद्रशेखर आजाद जिस अधिकार से रहते थे, उससे चल जाता है। जब शिववर्मा राधामोहन गोकुल जी के यहां पहुंचे तो उन्हें देखते ही राधामोहन गोकुल जी ने ऊपर जाने का इशारा कर दिया।
     शिववर्मा ने देखा कि चांद के रुपहले प्रकाश एक व्यक्ति उधारे बदन बैठा हुआ है। सांवला रंग, गठा हुआ जिस्म, औसत लंबाई से कुछ नाटा कद, तेज चुभती हुई आंखें और चेहरे पर चेचक के दाग और घुटने के पास रखा उनका रिवाल्वर-पहली मुलाकात में आजाद कुछ ऐसे ही नजर आए थे, शिववर्मा को। शिववर्मा के लिए यह आश्चर्य का विषय था कि जिस व्यक्ति का नाम ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए आतंक का पर्याय बन चुका था, वह राधामोहन गोकुल जी के यहां इतने इत्मिनान से बैठा उनका हाल-चाल पूछ रहा था। शिववर्मा लिखते हैं, ‘मैंने आजाद की जो तस्वीर बनाई थी, वह बेहद सुंदर और दुर्लभ थी। उसकी आराधना हो सकती थी। लेकिन, मैंने देखा मेरे साथ जो व्यक्ति बैठा हुआ है, वह मेरी तरह ही एक सामान्य नौजवान है-बेहद कोमल, मिलनसार, विनोद प्रिय किंतु दृढ़ और अटल।’ अन्य क्रांतिकारी साथियों की तहत ही शिववर्मा पर भी आजाद का गहरा रंग चढ़ा था। उन्होंने आजाद को एक ऐसे सिपाही के रूप में पाया जो ‘मौत को सामने देखकर भी मुस्कुरा सकता है, उसे ललकार सकता है और सबसे बड़ी बात यह कि वह एक ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी इतनी बड़ी शख्सियत होने के बावजूद अहंकार उन्हें छू तक नहीं पाया है।’ये वही आजाद थे, जिन पर 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान पिकेटिंग के आरोप में मुकदमा चला था। ये वही आजाद थे, जिन्होंने अदालत में अपना नाम आजाद और घर जेलखाना बताया था। हालांकि यह उनकी पहली और अंतिम गिरफ्तारी थी। वे अपने इस घर (जेलखाना) दोबारा कभी नहीं गए और सदा आजाद ही रहे।
       23 जुलाई 1906 में जन्मे आजाद बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों को पसंद करते थे। सबसे पहले वे गांधी जी से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। लेकिन काकोरी कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। उनके इस निर्णय की समूचे देश में आलोचना हुई। इस घटना के बाद आजाद ने भी ‘अहिंसा’ का दामन छोड़कर ‘हिंसा’ के रास्ते अंग्रेजों को देश से बाहर करने का फैसला किया। लेकिन, इसका मतलब कदापि नहीं था कि क्रांतिकारी हिंसा के ही पुजारी थे। गांधी जी ने जहां अहिंसा को ही अपना मूल हथियार बनाया, वहीं क्रांतिकारियों ने हिंसा और अहिंसा दोनों को ही अपना हथियार बनाया।  सशस्त्र क्रांति के लिए जहां उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) का गठन किया, वहीं अहिंसात्मक आंदोलन के लिए नौजवान भारत सभा का गठन किया।
      ध्यान देने की बात यह है कि जहां कांग्रेस पार्टी क्रांतिकारियों से दूरी बनाकर चलती थी, वहीं नौजवान भारत सभा उसके आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करती थी। जगमोहन सिंह और चमनलाल द्वारा लिखी गई किताब ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ में इसका जिक्र किया गया है। साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए जब लाल लाजपत राय ने आंदोलन किया, तो ‘नौजवान भारत सभा ने न सिर्फ आंदोलन को संगठित करने के लिए पूरा जोर लगाया वरन इसमें नेतृत्वकारी भूमिका भी निभाई।’ वहीं दूसरी ओर जब लाला जी पुलिस लाठीचार्ज में शहीद हो गए, तो कांग्रेस तो अहिंसक आंदोलन ही करती रही, जबकि क्रांतिकारियों ने उनकी मौत का बदला लिया। मिलिटैंट नेशनलिज्म इन पंजाब में कमलेश मोहन लिखते हैं कि यह निर्णय आजाद की सलाह पर लिया गया। 18 दिसंबर को एचएसआरए के कमांडर इन चीफ बलराज (चंद्रशेखर) के हस्ताक्षर के साथ पर्चे चिपकाए गए। पर्चे में कहा गया था :‘हमें एक आदमी की हत्या का खेद है। परंतु, यह आदमी उस निर्दयी, नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था, जिसे समाप्त कर देना आवश्यक था। इस आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के एक कारिंदे के रूप में की गई है। यह सरकार दुनिया की सबसे अत्याचारी सरकार है।’
     नेहरू जी ने अपनी पुस्तक ‘मेरी कहानी’ में खुद यह लिखा है: ‘उस समय लोगों ने ऐसा महसूस किया कि क्रांतिकारियों ने लाला जी और लाला जी के रूप में कौम की इज्जत रख ली।’ इसलिए ऐसा नहीं कह सकते कि जनता क्रांतिकारियों की कार्रवाइयों को सही नहीं मानती थी। हकीकत यह थी कि वह धीरे-धीरे उनके साथ खड़ी हो रही थी। जबकि गांधी जी लार्ड इरविन की बग्घी पर क्रांतिकारियों की ओर से फेंके गए बम के बाद इस घटना के बिल्कुल उल्टी बात कह रहे थे: ‘उस विशाल आवाम को हिंसा की भावना छू तक नहीं पाई है।...जरा सोचिए अगर वायसराय इस घटना में गंभीर रूप से जख्मी हो गए होते तो...।’ इसी तरह उन्होंने असेंबली बम कांड के बाद भी क्रांतिकारियों की यह कहकर आलोचना की कि जो लोग विवेक से परे नहीं हैं, उन्हें इस ताजातरीन बम कांड की छिपे या खुले तौर पर समर्थन देना बंद कर देना चाहिए। हालांकि हुआ इसके उल्टा। इसके बाद क्रांतिकारी कार्रवाइयों में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में जबरदस्त उठान देखने को मिलता है।
      एचएसआरए में भी दो तरह की जिम्मेदारियां थीं। संगठन की स्थापना बैठक में ही सदस्यों की जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया था। कमलेश मोहन अपनी किताब में इस बारे में भी रोशनी डालते हैं: ‘फिरोजशाह कोटला के मैदान में हुई एचएसआरए की स्थापना बैठक में सुखदेव को पंजाब, फणीन्द्र नाथ घोष को बिहार और उड़ीसा, शिववर्मा को उत्तर प्रदेश, जयदेव कपूर उर्फ प्रताप को झांसी में खुलने वाले केंद्रीय आॅफिस के लिए तथा भगत सिंह और विजय कुमार सिन्हा को पार्टी संयोजक की जिम्मेदारी सौंपी गई।’ पार्टी के अंदर ही एक सैन्य विभाग ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ खोला गया। ‘चंद्रशेखर आजाद को इसी सैन्य विभाग का कमांडर इन चीफ चुना गया।’ दिल्ली कांस्पिरेशी केश के एक मुख्य सरकारी गवाह (जो कि पहले क्रांतिकारियों का साथी था) का बयान अभी भी होम डिपार्टमेंट की फाइल संख्या ‘11/15 प्रोसीडिंग्स 1931’ में सुरक्षित है। इसके अनुसार, ‘एचएचआरए के क्रांतिकारियों ने क्रांतिकारी कामों को अंजाम देने, अपनी गुप्त मीटिंगों और बड़े पैमाने पर बम के निर्माण के लिए दिल्ली, लाहौर, अमृतसर, गुजरांवाला, रावलपिंडी, लालपुर, शेखूपुरा, रोहतक, फिरोजपुर, कानपुर, कलकत्ता, सहारनपुर, आगरा, ग्वालियर, अजमेर, झांसी, बेतिया (बिहार) और श्रीनगर में किराए पर कमरे/घर लिए थे।’ यह समूचा नेटवर्क आजाद के ही नेतृत्व में खड़ा किया गया।
       दिल्ली में सिरकी बाजार, पराठा वाली गली, न्यू हिन्दू हॉस्टल, कश्मीरी गेट और झंडेवालान में कमरे लिए गए थे। नया बाजार वाले ठिकाने पर भगवती चरण बोहरा एक बीमा एजेंट के रूप में रहते थे। हिन्दू हॉस्टल में हुई बैठक में चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ने के ऊपर विस्तार से बात की। इस बारे में भी कैलाशपति की गवाही एक महत्वपूर्ण सबूत है : ‘चंद्रशेखर आजाद ने इस मीटिंग में कहा था कि हिमालयन ट्वायलेट नाम से बनी फैक्ट्री में तैयार किए गए पिक्रिक एसिड और दिल्ली में अन्य जगहों तथा कानपुर में तैयार किए गए बम के खोलों की मदद से हम बड़े पैमाने पर बम तैयार कर सकेंगे। उसके बाद हम पूरे देश में इनका वितरण करके पूरे देश में सरकार के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ देंगे।’ बाद में कुछ क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने इस फैक्ट्री पर छापा मारा। हालांकि आजाद का सूचना तंत्र इतना मजबूत था कि वे वहां से काफी सामान दूसरे ठिकाने पर पहुंचाने में सफल रहे। इसके बावजूद पुलिस को जितनी सामग्री मिली उससे छह हजार बम बनाए जा सकते थे। आजाद पुलिस की गतिविध को ताड़ने में माहिर थे। इसी वजह से वे विस्फोटकों की एक बड़ी मात्रा को बचाने में सफल रहे।
       झंडेवालान वाले घर के बाहर हिमालयन ट्वायलेट का बोर्ड टंगा हुआ था। इस बोर्ड को देखकर कोई भी इसे साबुन फैक्ट्री समझता। आजाद के निर्देश पर इसे पार्टी के कवर के रूप में प्रयोग करने का निर्णय लिया गया था। कैलाशपति के ही बयान के अनुसार, ‘नंद किशोर निगम (हिन्दू हॉस्टल) के यहां 9 जून 1930 को हुई बैठक में चंद्रशेखर आजाद ने साथियों के साथ साबुन फैक्ट्री की योजना पर विस्तार से बात की थी। इसी बैठक में तय निर्णय के आधार पर विमल प्रसाद जैन को साबुन फैक्ट्री का मैनेजर बनाया गया।’
     दिल्ली के बाद पुलिस को ऐसी एक फैक्ट्री लाहौर में भी मिली। पुलिस पीछे पड़े रही और आजाद नई जगह पर बम फैक्ट्रियां लगाते रहे। लाहौर में पुलिस ने छापा मारा तो आजाद ने ऐसी ही एक बम फैक्ट्री ग्वालियर में खड़ी कर दी। उन्होंने यहां टिन बमों को बनाने की भी एक फैक्ट्री लगाई थी, जिसके सिर्फ वही विशेषज्ञ थे। ग्वालियर में भी पुलिस ने छापा मारा। लेकिन एक बार फिर आजाद पुलिस को चकमा देने में सफल रहे। यहां से भागकर उन्होंने पूना में बम फैक्ट्री खड़ी कर दी। यहां भी पुलिस ने छापा मारा और बड़ी मात्रा में विस्फोटक जब्त किया। भगत सिंह के अनन्य मित्र राजगुरु को यहीं से गिरफ्तार किया गया। यहां से भी आजाद ने विस्फोटक सामग्री को बचाने की भरसक कोशिश की। इसके बाद आजाद को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने पूरी ताकत लगा दी। अंतत: 27 फरवरी 1931 को एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया। यहीं पर पुलिस से लड़ते हुए आजाद शहीद हो गए। जिस समय पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेरा हुआ था, उस वक्त भी एक शहीद की मां को पैसा भेजवाना नहीं भूले। आजाद की इसी खूबी के चलते उनके साथी उन्हें जान से ज्यादा प्यार करते थे।

रविवार, 10 मार्च 2013

जिंदा है बेहतर दुनिया का ख्वाब

     इस समय समूचा विश्व जबरदस्त वैचारिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। लोगों के सवाल बेहद साफ हैं-क्या वर्तमान दुनिया ऐसे ही चलेगी? क्या इसमें अभी कुछ सुधार की गुंजाइश है?...आदि, आदि। दुनिया के किसी भी देश में चले जाइए, आपको इन सवालों की गंूज सुनाई देगी। इसकी वजह भी बेहद साफ है। पहले लोगों को बताया गया कि पुरानी दुनिया (सामंती) बुरी है, इसलिए नई दुनिया (पूंजीवादी) बनाओ। जनता को भी इसमें अपना बेहतर भविष्य नजर आया। फायदा भी हुआ। उद्योगधंधे खुले, बेकारी मिटी, जनता को लोकतंत्र के रूप में एक नई व्यवस्था मिली। लेकिन इतिहास ठहरता नहीं है। वह हमेशा आगे ही बढ़ता है।आज यही व्यवस्था लोगों के विकास में रोड़ा बन गई है। लोकतंत्र होते हुए भी समूची दुनिया अपने को बेसहारा समझने लगी है। वहीं, विश्व स्तर पर पूंजीवाद के मॉडल रहे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, इटली, जर्मनी आदि देशों की अर्थव्यवस्था अपने ही पाप के बोझ तले दबी कराह रही है। स्पेन, यूनान, पुर्तगाल, हालैंड जैसे कई देशों का पूंजीवादी मॉडल धूल-धूसरित हो रहा है। स्पेन में जहां बेरोजगारी की दर जहां 56 प्रतिशत तक पहुंच गई है, वहीं एक समय दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले यूनान में यह दर 50 प्रतिशत को पार कर गई है। स्पेन की हालत इतनी खस्ता है कि वहां के लोग अपने परिवार में किसी की मौत होने पर उसका दाह संस्कार का खर्च तक उठाने की स्थिति में नहीं हैं। यही वजह है कि इससे बचने के लिए लोग परिवार में किसी मौत होने पर मृतक के शव को मेडिकल कालेज में दान दे रहे हैं। हालत यह है कि वहां के मेडिकल कालेज मोर्चरी में तब्दील हो गए हैं। 900 अरब यूरो की संपत्ति होने के बावजूद इटली भी इस मंदी से खुद को नहीं बचा पाया। मंदी की इन अंधेरी रातों में अब उसे भी जर्मनी में पैदा हुए मार्क्स का भूत दिखाई देने लगा है।
पंूजीवाद अपनी पैदाइश के साथ ही मंदी को भी लेकर पैदा हुआ। 200 सालों से ज्यादा का इसका इतिहास बताता है कि मंदी ने कभी भी इसका साथ नहीं छोड़ा। वजह यह है कि इसका अस्तित्व ही लगातार मुनाफे के बढ़ने पर टिका हुआ है। जाहिर है मुनाफा तभी बढ़ेगा, जब लोगों को उनकी श्रमशक्ति का उचित मूल्य नहीं दिया जाएगा। मानव के श्रम का यही शोषण पूंजीवादी व्यवस्था का बुनियादी चरित्र है। मानव श्रम की इसी लूट से मुनाफा पैदा होता है। ऐसे में कोई कैसे कह सकता है कि इस तरह की अमानवीय व्यवस्था के रहते कैसे सभी को रोटी, कपड़ा और मकान दिया जा सकता है।
      अमेरिका में भी यही हुआ। जब वह लोगों को रोजी-रोटी देने में असफल साबित हुआ तो उसने सभी को आशियाने का लालच दिया। उसने सोचा कि संतृप्ता अवस्था में पड़ी अपनी अर्थव्यवस्था को वह अपनी इस योजना से गति दे सकेगा। इसके लिए वहां के बैंकों ने लोगों को बहुत ही कम व्याज पर आशियाना खरीदने का लालच दिया। अब चूंकि लोगों के पास पैसे ही नहीं थे, तो वे भला व्याज कैसे चुका पाते। 2008 का सबप्राइम संकट इसी का नतीजा था। एक बार फिर से इस आधुनिक तानाशाह ने साबित कर दिया कि वह न सिर्फ मानव मन को समझने के मामले में निरा मूर्ख है, वरन वह बेहद अमानवीय भी है।
अमेरिका में मीडिया पर कड़ा पहरा है। बेहतर दुनिया के रूप में बहुप्रचारित इस मुल्क के बदन से जैसे-जैसे कपड़े उतरते गए, वैसे-वैसे उसने लोकलाज के भय से अपने बदन को और ढकने का प्रयास किया। अब चूंकि मीडिया को किसी के नंगे बदन को दिखाने में कुछ ज्यादा ही मजा आता है, इसलिए उसने इस दृश्य को अपने दर्शकों को दिखाना शुरू कर दिया। बस यहीं से इस आधुनिक तानाशाह ने मीडिया पर पहरा बिठा दिया।
हकीकत यह है कि वहां के सबप्राइम संकट के बाद से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव रहे कई बैंक दिवालिया हो गए। नतीजतन लेहमन ब्रदर्श, फ्रैडी, फैनी, सीटी बैंक, मोर्गन स्टेनले, बीयर स्टर्न और बीमा कंपनी एआईजी बर्बादी की कगार पर आ गए। संकट से बचने के लिए इन बैंकों ने दसियों हजार लोगों की नौकरियों से बाहर कर दिया। यही हाल दूसरे संस्थानों में भी हुआ। अमेरिकी सरकार ने पूंजीपतियों को मंदी से बचाने के लिए राहत पैकेज दिया, उधर जनता से उसके मुंह का निवाला छिना। यानी कुल मिलाकर निजी उद्यमों को लाभ पहुंचाने और उन्हें मंदी के बोझ से बचाने के लिए जनता को दंड मिला। सब्सिडी खत्म कर दी गई, लाखों लोगों की नौकरियां छीनी गर्इं। यह सब कुछ उस जनता के साथ किया गया, जिसका मंदी लाने में कोई रोल नहीं था। आखिर यह कहां का न्याय है? जाहिर है ऐसा कदम जनता की सरकार नहीं उठा सकती। इसीलिए हमने अमेरिका को आधुनिक तानाशाह की संज्ञा दी है। आज अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश बन चुका है। यह अलग बात है कि हमें चूंकि चकाचौंध भरी दुनिया देखने की आदत पड़ चुकी है या फिर हमें ऐसी ही दुनिया देखने की आदत डाल दी गई है, इसलिए इस चकाचौंध से भरी दुनिया के नीचे भयंकर अंधेरे में जीने वाली विशाल मेहनतकश जनता हमें दिखाई नहीं देती। हकीकत यह है कि अमेरिका में तलछट की जिंदगी जीने वालों की एक बड़ी फौज जमा है। यह फौज लगातार बढ़ती जा रही है।
       अमेरिका में दिसंबर 2012 में बेरोजगारी की दर 7.8 प्रतिशत थी, जो 2013 के जनवरी माह में (सिर्फ एक माह बाद ही, एक साल बाद नहीं) 7.9 प्रतिशत हो गर्र्र्ई। दिसंबर 2012 में वहां बेरोजगारों की संख्या करीब 1.22 करोड़ थी, जो जनवरी 2013 में वह 1.23 करोड़ हो गई। इसलिए भले ही अमेरिका मंदी से उबरने के लाख दावे कर ले, या हो सकता है कि वह कुछ समय के लिए इससे उबर भी जाए, लेकिन वह पंूजीवादी व्यवस्था के रहते अपने पापों से कभी कभी मुक्ति नहीं पा सकता।
     दूसरी ओर इस महामंदी के अंधेरे में समूची दुनिया के आवाम ने एक बेहतर दुनिया का ख्वाब भी देखना शुरू कर दिया है। इस ख्वाब में भविष्य का अक्श अभी बहुत साफ तो नहीं है, लेकिन इसे हकीकत में उतारने के लिए समूची दुनिया में जद्दोजहद शुरू हो गई है। अमेरिका के वॉल स्ट्रीट से उठी यह आवाज आज समूचे यूरोप और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सुनाई पड़ रही है। भूलना नहीं चाहिए कि सामाजिक जड़ता किसी भी समाज की मृत्यु का दूसरा नाम है, वहीं सामाजिक तब्दीली किसी भी कौम के जिंदा होने का सबूत है। रूस के महान साहित्यकार और विचारक प्लेखानोव ने कहा है कि ‘जिंदा आदमी जिंदा सवालों पर सोचता है।’ यह भी सत्य है कि ‘कुछ नहीं सोचने, कुछ नहीं बोलने से आदमी मर जाता है।’ आज की दुनिया पर ये दोनों बातें लागू होती हैं। आज लोग जिंदा सवालों पर सोच भी रहे हैं और बोल भी रहे हैं। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य कुछ बेहतर तो होगा ही।
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नहीं रुक रहा पलायन

                                                           देवेन्द्र प्रताप
भारत में विकास के लाख दावों के बावजूद आज भी पलायन बड़ी समस्या बना हुआ है। पलायन की जब भी बात होती है, आमतौर पर लोगों की निगाह में सबसे पहले यूपी और बिहार राज्यों की तस्वीर उभरती है। इस समय किसी एक प्रांत से उसी प्रांत में या एक प्रांत से दूसरे किसी प्रांत में रोजी रोटी के लिए पलायन कर गए लोगों की संख्या पिछले एक दशक में 9 करोड़ 80 लाख हो गई है। इसमें 6 करोड़ 10 लाख लोगों ने एक गांव से उसी प्रांत के किसी अन्य गांव में पलायन किया, जबकि 3 करोड़ 60 लाख लोग रोजगार की तलाश में अपने गांव को छोड़कर शहर में चले गए।
रोजगार देने में महाराष्ट्र सबसे आगे
इस समय भले ही गुजरात और नरेन्द्र मोदी का खूब गुणगान किया जा रहा हो, लेकिन रोजगार देने में महाराष्ट्र सबसे आगे है। महाराष्ट्र में आने वालों की तादाद यहां से जाने वालों की तादाद से कहीं ज्यादा है। अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन की रिपोर्ट, ‘मैनेजिंग द एक्जोड्स-ग्राउंडिंग माइग्रेशन इन इंडिया’ के अनुसार पिछले एक दशक में कांग्रेस शासित राज्य महाराष्ट्र में आने वालों की तादाद यहां से जाने वालों की तादाद से 20 लाख 30 हजार रही। वहीं, देश की राजधानी और कांग्रेस शासित राज्य दिल्ली आने वालों की संख्या के आधार पर यह राज्य लोगों को रोजगार के लिए आकर्षित करने में दूसरे स्थान पर है। यहां पिछले एक दशक में करीब 10 लाख 70 हजार लोग रोजगार की तलाश में आए। गुजरात रोजगार देने में तीसरे स्थान (0.68लाख) पर है, जबकि हरियाणा रोजगार देने (0.67 लाख) में चौथे स्थान पर है।
पलायन में यूपी, बिहार अव्वल
देश के सबसे पिछड़े राज्यों में यूपी और बिहार की गिनती होती है। भारत सरकार की 11 वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार रोजी-रोटी की तलाश में यूपी से बाहर जाने वालों की तादाद यहां आने वालों की तादाद से 20 लाख 60 हजार ज्यादा रही। जबकि, बिहार से बाहर जाने वालों की संख्या यहां आने वालों की संख्या से 10 लाख 70 हजार ज्यादा रही।
1991 के बाद बढ़ा पलायन
जब हमारे देश में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, तो उन्होंने नई आर्थिक नीति को यह कहकर लागू किया था कि इससे रोजगार में बढ़ोत्तरी होगी और पलायन पर लगाम लगेगी। जबकि आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि पलायन रुकने के बजाय और बढ़ता गया। 1991 से 2001 के बीच 7 करोड़ 30 लाख लोगों ने अपनी खेतीबाड़ी और अपने ग्रामीण परिवेश को इसलिए अलविदा कह दिया, क्योंकि उनके पास रोजगार के पारंपरिक साधन या तो खत्म हो गए या फिर वे उनकी जरूरतों के लिए नाकाफी साबित हुए। इस आंकड़े में 5 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे रहे, जिन्होंने उसी प्रांत के एक गांव को छोड़कर दूसरे गांव चले गए, जबकि करीब 2 करोड़ लोग गांव से शहरी इलाकों में चले गए। इस समयांतराल में करीब 30 करोड़ 90 हजार लोग अपना मूल स्थान छोड़ने को विवश हुए। यह संख्या हमारी जनसंख्या की 30 प्रतिशत के आसपास बैठती है। आज मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हैं तथा अपने पहले की ही नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। 1971 में पलायन की दर 13.6 प्रतिशत थी, यह 2001 में बढ़कर 14.7 प्रतिशत हो गई।
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