गुरुवार, 8 सितंबर 2011

तुगलकाबाद फैक्ट्री हादसे के शिकार मजदूरों की कहानी


यहां तो जीवन से मौत है सस्ती
शांतनु
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली) का इलाका भारत के नगरों पर एक सितारे की तरह चमकता रहता है। यहां अथाह पैसा है। रोजगार के साधन हैं। फैक्ट्रियों, कंपनियों की भीड़ है और काम करने वालों की जरूरत भी। इसलिए देश के पिछड़े इलाकों से लाखों-लाख गरीब आबादी अपनी मेहनत के बदले एक बेहतर जिंदगी की तलाश में यहां आती रहती है, लेकिन बेहतर जिंदगी तो शायद ही किसी को मिल पाती है, ज्यादातर को महानगर के किसी कोने में, गंदी बस्ती में सिर छुपाने की जगह नसीब होती है। फिर शुरू होता है सुबह से लेकर शाम तक पिसने का दौर, जिसमें वह तिल-तिल कर मरता रहता है। चमक-दमक के पीछे की सच्चाई से वह जल्दी ही रूबरू हो जाता है, लेकिन बदकिस्मती तो देखिए, जिंदगी की जरूरत उसे वहां से भागने नहीं देती। इन लोगों में से एक आबादी, जिनमें नौजवान लड़के-लड़कियां ज्यादा होते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि वह जो काम कर रहे हैं, वह कितना खतरनाक है। इसी दुश्चक्र में ऐसे लोग कई बार मौत के मुंह तक पहुंच जाते हैं।
दिल्ली की तुगलकाबाद क्षेत्र की गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की मौत इसका एक उदाहरण है। अमेजिंग क्रिएशन नाम की इस फैक्ट्री में पिछले 25 जनवरी की शाम आगजनी में सरकारी आंकड़ों में 16 लोग जलकर मर गए और पांच घायल हो गए।
लालच की नींव पर खड़ी फैक्ट्रियां
हर फैक्ट्री मालिक का उद्देश्य यही होता है कि मजदूरों के श्रम को निचोड़ कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जाए। पहले देश का श्रम कानून उनके इस लालच को बेलगाम होने से रोकता था, लेकिन उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से फैक्ट्री मालिकों को मजदूरों के श्रम को निचोड़ने के लिए बेलगाम कर दिया गया। इन नीतियों ने एक्सपोर्ट (निर्यात) उद्योगों को खूब बढ़ावा दिया, जिसके कारण पूरे देश में निर्यात उद्योगों का जाल सा बिछ गया। इन एक्सपोर्ट उद्योगों की बुनियाद ही सस्ते श्रम पर टिकी हुई है। इससे सरकार और एक्सपोर्ट फैक्ट्री मालिकों को डालर में जबरदस्त कमाई होती है। इन फैक्ट्रियों में तैयार मालो के खरीददार विदेशी कंपनियों को भी भारी मुनाफा होता है। वहीं दूसरी ओर मजदूरों को इसकी कीमत, अपनी सेहत या जान देकर चुकानी पड़ती है। कम समय में ज्यादा मुनाफे के लालच में नए-नए खिलाड़ी, इस मैदान में कूदते रहते हैं और जल्दी ही करोड़ों के मालिक बन जाते हैं। तुगलकाबाद के अमैजिंग क्रिएशन का मालिक मुन्ना मास्टर भी इस खेल में ऐसा ही एक नया खिलाड़ी था।
अस्सी के दशक में मुन्ना मास्टर एक अच्छे कारीगर के रूप में जाना जाता था। उस समय वह एक गार्मेंट फैक्ट्री में पैटर्न मास्टर के पद पर काम करता था। किसी गार्मेंट फैक्ट्री में यह पद महत्वपूर्ण होता है। विदेशी कंपनी के एजेंट, जिसे ‘बायर’ कहा जाता है, से पैटर्न मास्टर का सीधा संबंध होता है। बायर की जरूरत के मुताबिक, वह नमूना तैयार करता है और अपने कारीगरों को माल का डिजाइन देता है। इस संबंध का फायदा उठाकर मुन्ना मास्टर ने 1987-88 में खुद की एक फैक्ट्री शुरू की, हालांकि इसमें वह सफल नहीं हो सका। 1993-94 में उसने फिर से फैब्रिकेटर का काम शुरू कर दिया। अब तक उसने अपने लड़के को डिजाइनिंग में डिप्लोमा करा दिया था। इस दौरान देश का औद्योगिक माहौल भी काफी बदल चुका था। इस बदले माहौल ने एक तरफ जहां मजदूरों की जिंदगी को नर्क बनाना शुरू कर दिया, वहीं देश-विदेश के पूंजीपति इसकी बदौलत मालामाल होने लगे। स्थिति यह हो गई कि देश के श्रम कानूनों का फैक्ट्री मालिकों के लिए कोई मायने नहीं रह गया। मुन्ना मास्टर ने भी इस माहौल में खूब मुनाफा कमाया और जल्दी ही अमैजिंग क्रिएशन कंपनी बना ली। मुन्ना की कंपनी में तैयार माल निर्यात किया जाता था।
अमैजिंग क्रिएशन: जहां हर पल घात लगाए रहती है मौत
तुगलकाबाद स्कूल के पीछे पतली सी गली के शुरुआत में बने बमुश्किल 8-10 फिट चौड़े इस मकान बाहर से देखने पर पता ही नहीं चलेगा कि यह एक गार्मेंट फैक्ट्री है। रिहाइशी इलाके में महज 80 गज की जमीन पर बने इस चार मंजिला इमारत लगभग 150 मजदूर काम करते थे। मजदूरों की यह संख्या आर्डर के मुताबिक घटती-बढ़ती रहती थी।
चौथे मंजिल पर जहां यह हादसा हुआ, वहां शिफान व जॉर्जेट के कपड़ों पर अड्डा वर्क यानी हाथ की कसीदाकारी, तैयार कपड़ों की धुलाई और उनको सुखाया जाता था। हादसे के दिन, वहां लेडीज सूट का काम चल रहा था। कपड़ों की धुलाई का काम एक ऐसे सॉल्वेंट से किया जाता है, जिसे पेट्रोल में केमिकल मिलाकर तैयार किया जाता है। जानकार लोगों का कहना है कि यह सॉल्वेंट पेट्रोल से कई गुना ज्वलनशील होता है। इससे कपड़ों को धुलने के बाद, उन्हें खुले में सुखाया जाता है, लेकिन इस फैक्ट्री में कपड़ों को एक मशीन में डालकर इसका सॉल्वेंट निकाल लिया जाता है।
गार्मेंट उद्योग से लंबे समय से जुड़े रहे तस्कीमुद्दीन, जिनका बेटा आमिर, इस फैक्ट्री में हादसे का शिकार हुआ, का कहना है कि मशीन में कपड़ों को सुखाना गैर-कानूनी है, क्योंकि इससे आग पकड़ने का खतरा होता है। मालिक सॉल्वेंट बचाने के लालच में मशीन का इस्तेमाल करते हैं। फैक्ट्री में हादसे के वक्त एक जनरेटर, डीजल और सॉल्वेंट का स्टॉक भी मौजूद था।
हादसे के दिन काम का बहुत दबाव था। मालिक ने मजदूरों को ओवर टाइम के लिए रोक लिया था, यहां तक कि उसने अपने लड़के को भी धुलाई के काम में लगा दिया था। जल्दबाजी में काम होने के कारण, सॉल्वेंट मशीन से बाहर बिखरने लगा और वह अड्डा वर्क कर रहे मजदूरों तक पहुंच गया। मजदूरों को सॉल्वेंट की गंध का अंदाजा हो गया था, लेकिन मालिक के डर से किसी ने मुंह नहीं खोला। वैसे भी अड्डा वर्क ज्यादातर बच्चों से ही कराया जाता है। धुलाई मशीन में स्पार्किंग या किसी शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लग गई और देखते ही देखते आग की लपटों ने चौथे माले को अपनी आगोश में लिया। सॉल्वेंट, डीजल, शिफॉन और जॉजेट के कपड़ों के अंबार में आग लगने के साथ ही विस्फोट हो गया, जिससे कोठरी की छत उड़ गई। आस-पास के लोगों ने इस विस्फोट को बॉयलर फटना समझा। उधर अंदर मजदूर बिजली के करंट और आग में जलने से तड़प-तड़प कर मर रहे थे। वहां काम कर रहे मजदूरों में, सिर्फ वही किसी तरह जान बचाने में सफल रहे, जो सीढ़ी के पास काम कर रहे थे।
कितने मरे?
ऐसी किसी फैक्ट्री में हादसा होने पर मरने वालों की सही संख्या का पता लगाना, बहुत कठिन होता है, क्योंकि इस तरह की फैक्ट्रियों में ठेका और कैजुअल मजदूरों की संख्या स्थाई मजदूरों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है। बाहर से आए गरीब मजदूरों की ओर से वैसे भी कोई नहीं बोलता। अमेजिंग क्रिएशन के मामले में सरकार ने अब तक 16 मजदूरों के मरने और पांच के घायल होने की ही बात को माना है। जबकि, हादसे के दूसरे दिन ही स्थानीय लोगों ने फैक्ट्री से लाशों को निकालते हुए देखा। आगजनी में मरने वाली, लालती देवी ने हादसे के दो दिन पहले अपने परिवार के लोगों को बताया था कि उस फैक्ट्री में बिहार की पांच महिलाओं को एक दिन पहले काम पर रखा गया था। उसने यह भी बताया था कि उनके पास पैसे नहीं थे और वे लालती से 500 रुपये उधार मांग रही थीं। लालती के पास भी पैसे कम ही थे, इसलिए वह उन्हें 50 रुपये ही दे सकी। वे पांचों महिलाएं कहां गर्इं, इसका कुछ पता नहीं चला। हादसे के बाद पुलिस की मिलीभगत से मुन्ना मास्टर ने गैर-कानूनी तौर पर फैक्ट्री की सफाई कराई थी। अब ऐसे में कौन जाने कि इस दौरान कितनी लाशों को ठिकाने लगाया गया।
मालिक और प्रशासन का रवैया
इस दिल दहला देने वाली वारदात के बाद मालिक और प्रशासन के रवैये से एक बार फिर यही साबित हुआ कि हुकमरान लोग मजदूरों को पूंजी पैदा करने वाले पुरजे के अलावा और कुछ नहीं समझते हैं। इस घटना के बाद, जहां मालिक अपनी गर्दन बचाने के लिए गोटी बिठाने लगा, वहीं प्रशासन ने सारा दोष फैक्ट्री मालिक पर डालकर छुट्टी पा ली। प्रशासन को डर था कि कहीं दिल्ली की चकाचौंध के पीछे मजदूरों की नारकीय जिंदगी की झलक, दुनिया वालों को न दिख जाए। इस लिए उसने मामले को जल्दी-जल्दी खत्म करवा दिया। मजदूरों का गुस्सा इस बात पर था कि फैक्ट्री मालिक ने मजदूरों के घरों में हादसे की खबर तक नहीं पहुंचने दी। मजदूरों के परिवार वाले दुखी थे, कि वे अपने कलेजे के टुकड़ों को बचाने की आखरी कोशिश तक नहीं कर पाए। मालिक की चिंता इससे अलग थी, वह इस बात की जल्दी में था कि उसके पास दो करोड़ का जो माल बचा है, उसे जल्दी से जल्दी विदेश भेजा जाए। हादसे के दूसरे दिन, उसने थाने में अपनी गोटी सेट कर ली, फैक्ट्री से माल निकलवाया, बची हुई लाशों को ठिकाने लगाया और फैक्ट्री की अच्छी तरह से धुलाई करवा दी। यह मालिक और प्रशासन के बीच साठगांठ का ही नतीजा था कि मजदूरों के दबाव के बावजूद, कहीं आठवें दिन फैक्ट्री को सील किया गया। इस दौरान फैक्ट्री की चाभी थानेदार के पास रहती थी। मृतक मजदूरों के परिवार वालों की मुसीबतों का सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा। जिन लोगों की हादसे में मौत हुई, उनमें से अधिकांश अपने परिवार की आमदनी का मुख्य जरिया थे। उनके मरने के साथ ही, परिवार वालों के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया। इसके बावजूद फैक्ट्री के बचे मजदूरों और मृतकों के परिवार वालों ने थाना, श्रम विभाग, एसडीएम कार्यालय से लेकर नेताओं तक के चक्कर लगाए। नतीजतन इनके ऊपर कर्ज का भारी बोझ लद गया। घायल मजदूरों के परिवार की हालत तो और भी खराब हो गई। सरकारी अस्पताल ने घायलों का आधा-अधूरा इलाज कर, उन्हें भगा दिया गया। इसलिए उनके परिवार वालों को घायलों खुद के पैसे से इलाज करवाना पड़ा। पीलीभीत के रहने वाले वली अहमद और तुगलकाबाद गांव के कल्लू को अपने घायल बेटों को बचाने के लिए 50-50 हजार रुपये कर्ज लेकर खर्च किया। एक मजदूर के लिए 50 हजार का कर्ज, बड़ी रकम होती है। इतनी बड़ी रकम बच्चों के इलाज पर खर्च करने के बाद भी, वे उन्हें चलने फिरने-लायक नहीं बना पाए। वे विकलांग जैसी स्थिति में अभी भी बिस्तर पर पड़े हुए हैं।
इधर दिल्ली सरकार के श्रम विभाग ने हादसे के दसवें दिन आश्चर्यजनक मुस्तैदी दिखाते हुए फैक्ट्री मालिक के नाम पर पत्र जारी किया। इसमें 12 मृतक मजदूरों को पांच-पांच लाख और सात घायलों को 50-50 हजार का हर्जाना देने को कहा गया। एक स्थानीय दैनिक की खबर के अनुसार फरवरी माह में ही दिल्ली विधानसभा के बजट सत्र में एक स्थानीय विधायक द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा कि 14 मृतक और पांच घायल मजदूरों के परिवारों को मुआवजा देने के लिए कंपनी से 79 लाख 74 हजार 841 रुपये की रिकवरी से संबधित प्रमाण पत्र जारी कर दिया है। इसी सिलसिले में मार्च के महीने में मृतक मजदूर परिवारों को दिल्ली सरकार ने एक लाख रुपये की अंतरिम सहायता हेतु चेक जारी कर दिया। जून माह में मजदूरों को श्रम विभाग ने एक पत्र भेजा। जिसमें उन्हें सूचित किया गया कि मालिक से हर्जाना वसूलने के लिए श्रम विभाग ने केस को सिविल कोर्ट में भेज दिया है। इस तरह श्रम विभाग और सरकार ने इस भयानक कांड से अपना पल्लू झाड़ लिया।
दोषी कौन?
इस हादसे के शिकार ज्यादातर मजदूर युवा थे। इन्हीं के सहारे इनके पूरे परिवार को रोटी मिलती थी। अपनी जिंदगी को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश में ये भोले-भाले लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे। इनकी मौत के बाद इनके परिवार पर दुख और गरीबी का जैसे कहर ही टूट पड़ा। मुहम्मद इदरीश की हालत से इसे समझा जा सकता है। इदरीश इस हादसे में मारे गए 18 वर्षीय रहीस के अब्बू हैं। इदरीश का बड़ा लड़का कुछ समय पहले बीमारी की भेंट चढ़ गया। उसकी बीबी और दो छोटे बच्चों का भार इदरीश पर ही है। इदरीश अब बुजुर्ग हो चुके हैं और काम करने की हालत में नहीं हैं, इसलिए परिवार के गुजारे की जिम्मेदारी रहीस पर थी। रहीस के गुजरने के बाद अब उसके अब्बू के अलावा परिवार में सिर्फ औरतें और बच्चे ही बचे हैं। इदरीश की जिंदगी में अब अंधेरा ही अंधेरा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह परिवार की गाड़ी को कैसे खींचे। यही हालत किसी न किसी रूप में आज ज्यादातर मजदूरों की है। इन मजदूर परिवार को हुए नुकसान की भरपाई आज कोई नहीं कर सकता। सरकार फैक्ट्री मालिक को दोषी कहकर मजदूरों को कोर्ट कचहरी के चक्रव्यूह में डाल देना चाहती है। इसलिए उसने अपने को पाक-साफ दिखाने के लिए बहुत जल्द ही मृतकों के परिवारों के नाम एक-एक लाख का चेक जारी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेना चाहती है। हालांकि, मजदूरों को पता है कि कोर्ट कचहरी की अंतहीन लड़ाई में सामान्यत: मालिक ही जीतता है, इसलिए उन्होंने सरकार की इस कार्रवाई को मानने से इंकार कर दिया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस हृदय विदारक कांड के लिए मुन्ना मास्टर दोषी है और उस पर मजदूरों की हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए (इस फैक्ट्री के कागजात के हिसाब से इसका मालिक मुन्ना मास्टर का लड़का शमीम खान है, जबकि वास्तविक कर्ताधर्ता मुन्ना मास्टर ही है)। गौर करने वाली पहली बात यह है कि वह फैक्ट्री गैर कानूनी तौर पर चल रही थी। दूसरी बात यह है कि इतनी तंग जगह में ज्वलनशील व विस्फोटक सामान और तेजी के साथ आग पकड़ने वाले कपड़ों के अंबार के बीच मजदूरों से जिस तरह काम करवाया जा रहा था, वह मौत को दावत देने वाली थी और पूरी तौर पर गैर कानूनी थी। वास्तव में इस हालात ने ही मजदूरों को मौत के मुह में धकेला है। इसलिए सरकार इस मामले में अपनी जिम्मेदारी से किसी भी तरह बच नहीं सकती है। इसलिए मजदूरों को हर तरह का मुआवजा देने या दिलवाने की जिम्मेदारी सरकार की ही बनती है।
वैसे तो भारत का संविधान मालिक वर्ग के हितों की ही रक्षा करता है। आजादी के आंदोलन के दौरान एक मजबूत मजदूर आंदोलन के कारण मजदूरों के हितों से संबंधित कुछ धाराएं भी संविधान में दर्ज की गर्इं। श्रम कानून इसी श्रेणी में आते हैं। अगर श्रम कानूनों को सही ढंग से लागू किया जाए, तो मजदूरों को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन 1991 में लागू उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने इन श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं। इसने मजदूरों व अन्य मेहनतकशों की जिंदगी को नरक बना डाला। कानून का रक्षक ही मालिक वर्ग के साथ खड़ा हो गया। प्रधानमंत्री उदारीकरण की नीतियों का गुणगान करने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। उन्हें तो यही अफसोस रहता है कि वे इन नीतियों को और तेजी से क्यों नहीं लागू कर पा रहे हैं। उदारीकरण की नीतियां आज तीन दशक बाद पूरी तरह बेनकाब हो चुकी हैं। अगर मजदूरों व मेहनतकशों को अपनी अस्तित्व की हिफाजत करना है, तो उसे इन नीतियों के खिलाफ एक सशक्त मजदूर आंदोलन खड़ा करना ही होगा।
जिन्हें जिन्दगी हारकर बैठने नहीं देती
युद्ध, नेताओं की गद्दारी, नरसंहार, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अमीरों की अय्यासी, जनता का दमन और उत्पीड़न जैसी रोज-रोज की घटनाएं, किसी संवेदनशील मन में भविष्य की एक निराशापूर्ण तस्वीर बना सकती हैं। लेकिन दुनिया के मजदूरों व मेहनतकशों के जीवन को अगर नजदीक से देखा जाए तो मन में यह भरोसा पैदा होता है कि पूरी मानवता एक बेहतर भविष्य की ओर ही आगे बढ़ेगी। अथाह दुख-तकलीफ और परेशानियों के बावजूद करोड़ों मजदूर जनता जिस तरह जिंदगी से बगैर हारे एक बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष करते रहते हैं, यह बात और किसी तबके में देखने को नहीं मिलती। जिंदगी के प्रति यह बेमिसाल जज्बा ही मानवता के एक बेहतर भविष्य की गारंटी करता है। तुगलकाबाद की फैक्ट्री में हादसे के बाद मजदूर परिवारों से बात करने के बाद मेहनतकश टीम को यही अहसास हुआ। हमारे लिए संभव नहीं था कि मजदूरों के कभी पस्त न किए जा सकने वाले हौसलों और जीवन के प्रति उनके आशावादी नजरिए को बहुत विस्तार से यहां प्रस्तुत कर पाएं। फिर भी इस हादसे से प्रभावित कुछ मजदूरों व उनके परिवार से जुड़ी कुछ बातों को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
हामिद-कमरुन्निसा
हामिद और कमरुन्निसा शब्बो के अब्बू और मम्मी हैं। 18 साल की शब्बो उन मजदूरों में से एक थी, जो मुन्ना मास्टर की फैक्ट्री में लगी आग की भेंट चढ़ गए। शब्बो का परिवार तुगलकाबाद गांव के छुरिया मोहल्ले में रहता है। इस गांव के एक हिस्से में खाते-पीते लोग रहते हैं, जबकि शेष बड़े हिस्से में लोग टूटे-फूटे हिस्से और झोपड़ियों में रहते हैं। यह हिस्सा उबड़-खाबड़ है और गंदगी के अंबार पर बसा हुआ है।
बाहर से गया कोई आदमी अगर यहां आ जाए तो वह विश्वास ही नहीं करेगा कि वह दिल्ली में है। हम जब शब्बो के घर गए, तो कमरे में कमरुन्निसा बच्चों के पास बैठी थी। उसे जब पता चला कि हम शब्बो के बारे में जानकारी लेने आए हैं, तो उसकी आंखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी। वह बोली, ‘हम लोगों के ऊपर इतनी बड़ी मुसीबत टूट पड़ी है, लेकिन आज तक कोई एक बार भी हाल-चाल पूछने तक नहीं आया।’ उसके रुंधे गले ने इसके आगे उसे नहीं बोलने दिया। हामिद ने हमें शब्बो के बारे में विस्तार से बताया।
हामिद का परिवार उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले का रहने वाला है। हामिद आठवीं पास हैं। वे फिलहाल सिलाई का काम करके अपने घर के लिए रोटी का इंतजाम करते हैं। वर्ष 1988 में बेहतर काम की तलाश में वे दिल्ली आए थे। 1999 में वे कतर में नौकरी करने गए। 2002 मे वहां कंपनी बंद हो जाने के कारण गांव लौटना पड़ा। गांव में भी वे तीन साल से ज्यादा समय नहीं गुजार सके। गुजारे के लिए उन्हें फिर से दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में वे एक फैब्रिकेटर के यहां सिलाई का काम करते हैं। उनकी एक माह की औसत आमदनी 4000 रुपये है। रहने के लिए 8 गुणा 10 फीट का एक कमरा है। इसका किराया 700 रुपया है। पीने के पानी के लिए 500 रुपया हर माह अलग से खर्च करना पड़ता है। उनका कमरा इतना छोटा है कि बारिस के मौसम में पूरे परिवार के लिए रातभर सोना मुश्किल हो जाता है। हामिद और कमरुन्निसा के छह बच्चे हैं। 18 साल की सब्बो सबसे बड़ी थी। सब्बो ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। अपनी मां से एक बार उसने कहा था, ‘मम्मी अगर मैं भी कमाने लगूं, तो भाई लोग पढ़ सकेंगे।’
पहली जनवरी 2011 से सब्बो ने मुन्ना मास्टर के फैक्ट्री में 5278 रुपये महीने पर नौकरी शुरू कर दी। अभी उसको फैक्ट्री आए एक माह भी नहीं पूरा हुआ था कि 25 जनवरी को यह हादसा हो गया। जलने के बाद करीब पांच दिनों तक सब्बो सफदरजंग अस्पताल में एक बिस्तर पर तड़पती रही। भर्ती होने के बाद ऐसा लगा था कि वह बच जाएगी। बीच-बीच में वह बातचीत भी करने लगी थी। हामिद को लगा, चलो जल तो गई, लेकिन जान बच जाएगी। लेकिन पांचवे दिन वह चल बसी। हामिद को यही अफसोस सालता रहा कि वह सब्बो का सही ढंग से इलाज नहीं करवा पाए। अस्पताल में चौथे दिन सब्बो ने हामिद से कहा था, ‘अब्बू वे लोग हम मजदूरों को अस्पताल के पास भी नहीं पहुंचाए थे। हम लोग पैदल ही सड़क पार कर अस्पताल पहुंचे।’ हामिद कल्पना भी नहीं कर पा रहे थे कि इतनी बुरी तरह जलने के बाद कि कैसे उनके सब्बो और दूसरे मजदूर सड़क पार करके अस्पताल पहुंचे होंगे।
चलते समय हामिद ने हमसे बार-बार आग्रह करते हुए कहा, ‘भाई साहब मालिक लोग कितने जालिम हैं, इसे आप जरूर लिखिएगा।’ हमें यह भी पता चला कि सब्बो की शादी गांव में तय भी हो चुकी थी। लेकिन, इस आग ने उसके सारे सपनों को जलाकर राख कर दिया। इस भयंकर हादसे के बाद भी मजदूरों की जिंदगी ऐसी होती है कि वे हार मानकर नहीं बैठते।
यही वजह है कि अब हामिद फिर से अपने परिवार को पटरी पर लाने के लिए जी जान से जुट गए हैं। अब सब्बो की छोटी बहन हसीना ने अपनी बड़ी बहन की जगह ले ली है। उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है और घर का खर्च उठाने में पिता का हाथ बंटा रही है। जिंदगी ने फिर से रास्ता ढूंढ़ ही लिया।
रामलखन
48 वर्षीय रामलखन लालती देवी के पति हैं। लालती देवी अमेजिंग क्रिएशन में काम करने वाले उन मजदूरों में से एक थी, जो फैक्ट्री में लगी आग की भेंट चढ़ गए। रामलखन और लालती देवी की 12-18 साल के उम्र के बीच की चार लड़कियां हैं। चूंकि परिवार की आजीविका का मुख्य स्रोत लालती देवी की मजदूरी ही थी, इसलिए उनकी मौत के बाद ने पूरे परिवार के लिए रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। रामलखन जो झोपड़ी लालती के रहते हमेशा चहचहाती रहती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा रहता है। सन्नाटे और अकेलेपन में आज रामलखन अपनी झोपड़ी में कैद जिंदगी की उन सच्चाइयों को जज्ब करने की कोशिश में लगा रहता है, जिनसे उसका अभी हाल में ही सामना हुआ है।
रामलखन का उत्तर प्रदेश में मऊ जिले का रहने वाला है। वे जाति से चमार हैं। गांव में रहते हुए, उन्होंने उन सभी विडम्बनाओं को झेला, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव में दलित और संपत्तिहीन लोगों को झेलना होता है। अपनी जीविका के लिए रामलखन ने कभी रिक्शा चलाया, तो कभी सिलाई का काम किया। गांव में मजदूरी बहुत कम मिलने के कारण वे 1991 में शादी के बाद दिल्ली आ गए और एक गार्मेंट फैक्ट्री के लिए सिलाई का काम करने लगे। लालती देवी ने भी भरपूर मेहनत मजदूरी से परिवार को सहारा दिया। पांच साल पहले रामलखन को ब्लड सुगर की बीमारी हो गई। ऐसे में उनका काम पर जाना कम होता गया। ऐसे में लालती की कमाई से ही रामलखन की दवा और परिवार का किसी तरह गुजर-बसर होता।
मुन्ना मास्टर की फैक्ट्री में लालती 28 दिसंबर 2010 से काम कर रही हैं। इस कंपनी में उसे अभी एक महीना भी नहीं गुजरा होगा कि वह 25 जनवरी को फैक्ट्री में लगी आग की भेंट चढ़ गई। इस दिन को रामलखन कभी नहीं भूल सकता। उस दिन जब दोनों अपने-अपने काम पर थोड़े-थोड़े समयांतराल पर निकले तो मोहल्ले के चौराहे पर वे टकरा गए। इस पर लालती ने रामलखन की चुटकी लेते हुए कहा, ‘आ गए पीछा करते हुए।’ पत्नी से उसकी वही आखिरी मुलाकात थी। आग लगने की खबर लगते ही रामलखन जयप्रकाश नारायण अस्पताल की ओर भागे। वहां उसे एक पूरी तरह जली हुई औरत को दिखाकर कहा गया कि यही लालती देवी है। रामलखन ने उसकी पायल देखते हुए कहा, ‘नहीं यह लालती नहीं है।’ बाद में पता चला कि वह लाश एक दूसरी मजदूर अनिता की थी। रात 12 बजे जब वह भागा-भागा सफदरजंग अस्पताल पहुंचा, तो उसे बताया गया कि लालती देवी का इलाज चल रहा है। उसने पुलिस वालों से लाख मिन्नत की उसे एक बार पत्नी से मिलने दिया जाए, लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी। दूसरे दिन अस्पताल से उसे लालती देवी की लाश मिली। लालती देवी के जाने से रामलखन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। जिन समस्याओं पर पहले उसे सोचने की जरूरत नहीं होती थी, वह सब अब उसकी छाती पर सवार हो गर्इं। रामलखन ने लड़कियों को गांंव भेज दिया है। गांव में वैसे तो एक अदद कमरे के अलावा और कुछ भी नहीं है, लेकिन रामलखन सोचते हैं कि गांव में लड़कियां सुरक्षित रहेंगी। लड़कियों ने पिता पर बोझ बनने के बजाए, मददगार बनने का फैसला किया है। हालात ने जैसे चारों को जैसे चारों को अपनी उम्र से बड़ी और बेहद जिम्मेदार बना दिया। अब चारों बहनों ने दिल्ली में ही रामलखन के साथ रहते हुए अपनी पढ़ाई और रोजगार एक साथ करने के लिए फैसला किया है।
जमील और शकीरा
18 साल का किशोर निजामुद्दीन गार्मेंट फैक्ट्री में मरने वाला एक और मजदूर है। जमील और शकीरा निजामुद्दीन के अब्बू और मम्मी हैं। अपने लाडले को खोकर जमील महज 35 साल में ही बूढ़ा सा दिखने लगा है। शकीरा भी 31 साल की उम्र में ही जिंदगी की मुसीबतों से लड़ते-लड़ते कभी न थकने वाली एक योद्धा जैसी बन गई है। अपने मृत बेटे के बारे में बात हो या उसकी खुद की जिंदगी के बारे में-शकीरा की बात एक बार शुरू हो जाती है, फिर खत्म नहीं होती। जमील और शकीरा उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रहने वाले हैं। साल भर पहले वे अपने परिवार के साथ दिल्ली आए। निजामुद्दीन उनका बड़ा बेटा था। गरीबी और मुश्किल हालात से शकीरा का बचपन से ही वास्ता है। शादी के बाद वे लखनऊ आ गए, क्योंकि जमील के गांव में उनके रहने के लिए जगह नहीं बची थी। यहां वे 13 साल तक रहे। चूंकि लखनऊ चिकन के सिले-सिलाए कपड़ों का एक बड़ा केंद्र है, इसलिए यहां काम मिलना मुश्किल नहीं था। लेकिन, यहां मजदूरी बहुत कम थी। उस समय (1995-1996 के आसपास) एक लेडीज सूट सिलने का ढाई रुपये मिलता था। शकीरा के अब्बू ने उसकी शादी में एक सिलाई मशीन दी थी। लखनऊ में उन्होंने कर्ज लेकर दो और सिलाई मशीन खरीद ली। देर रात तक मेहनत करके वे बहुत मुश्किल से 100 रुपये रोज कमा पाते थे। इस बीच परिवार बढ़ता गया और खर्च भी। इस बीच शकीरा गंभीर रुप से बीमार पड़ गई। उसके इलाज में 40 हजार लग गए। इसके लिए जमील को एक महाजन से 10 प्रतिशत व्याज पर कर्ज लेना पड़ा। यह महाजन कुख्यात सूदखोर था। जिसने एक बार उससे कर्ज ले लिया, फिर उसे कोई नहीं बचा सकता था। जमील के परिवार ने दिन रात एक करके महाजन का कर्ज तो पूरा कर दिया, लेकिन इसकी लिए की गई मेहनत ने जमील और शकीरा के शरीर को बुरी तरह तोड़ दिया।
अब तक निजामुद्दीन 17 साल का हो चुका था। उसने दिल्ली में मजदूरी ज्यादा मिलने के कारण अपने अब्बू से दिल्ली चलने की जिद की। वहां वह बहुत लगन से काम करने लगा। वह सुबह से शाम तक गार्मेंट फैक्ट्री में काम करता था। यहां तक कि बीमार होने पर भी वह ड्यूटी जाता था।
कई बार वह धागा कटिंग जैसे छोटे मोटे काम को घर पर करने के लिए भी ले आता था। इस तरह वह महीने में सात-साढ़े हजार रुपये कमा लेता था। वह अपने ऊपर ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी मानता था। लेकिन शकीरा के लिए यह सब बीते दिनों की बातें हो चुकी हैं। वह अपने होनहार बेटों में से एक को खो चुकी है। निजामुद्दी का छोटा भाई अब अपनी पढ़ाई छोड़कर काम पर जाने लगा है। शकीरा धागा काटते हुए हमसे बात किए जा रही थी। मेहनत के सिलसिले को वह टूटने नहीं देगी। उसके ऊपर अभी बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं।
तसकीनुद्दीन
19 साल का नौजवान आमिर भी मुन्ना मास्टर की गार्मेंट फैक्ट्री में हुए विस्फोट में मारा गया था। तसकीनुद्दीन के चार बच्चों में आमिर भी सबसे बड़ा था। तसकीनुद्दीन का परिवार करीब 25 साल पहले उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से आया था। अब वे अपने आप को दिल्ली का बासिंदा ही मानते हैं। इस समय वे हौजरानी में रहते हैं।
मुन्ना मास्टर और तसकीनुद्दीन बहुत पुराने मित्र हैं और एक ही मोहल्ले में रहते हैं। मुन्ना मास्टर जब करोड़ों कमाने लगा, तो उनके बीच फासला पैदा हो गया। फिर भी सामाजिक तौर पर अब भी उन्हें लोग दोस्त ही मानते हैं। तसकीनुद्दीन अपने पास छह सिलाई मशीन रखकर फैब्रिकेटर का काम करते थे, इसलिए उनके घर में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। आमिर का मन पढ़ाई में नहीं लगने के कारण उसे काम करने के लिए मुन्ना मास्टर की फैक्ट्री में भेज दिया गया। आमिर ने वहां छह महीने तक काम सीखा। लेकिन मन न लगने के कारण उसने अमेजिंग क्रियेशन का काम छोड़ दिया। जाड़े में काम ज्यादा होने पर मुन्ना मास्टर ने आमिर को फिर से काम पर लगवा दिया।
25 जनवरी को सुबह फैक्ट्री जाते समय मुन्ना मास्टर तसकीनुद्दीन को कहता गया कि आज काम ज्यादा है, इसलिए आमिर आज घर नहीं आएगा। आमिर फिर घर नहीं लौटा। तसकीनुद्दीन को हैरानी इस बात पर थी, कि पड़ोसी और दोस्त होने के बावजूद मुन्ना मास्टर ने हादसे की खबर उसे नहीं दी। दूसरे दिन किसी ने अखबार पढ़कर तसकीनुद्दीन को फैक्ट्री में हादसे की सूचना दी। मुन्ना मास्टर को तसकीनुद्दीन की दोस्ती की चिंता नहीं थी। वह रात भर फैक्ट्री से सामान निकलवाने और थाने से गोटी सेट करने में लगाया। इसके बावजूद तसकीनुद्दीन हिम्मत नहीं हारे। आज वे इस हादसे के शिकार मजदूरों और उनके परिवार वालों को इंसाफ दिलवाने के लिए मैदान में उतर चुके हैं।
(शांतनु मेहनतकश पत्रिका के संपादक हैं. यह लेख मेहनतकश पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित हुआ है. जो भी साथी शांतनु से संपर्क करना चाहते हैं वे उनसे इस नंबर (०९३१०८१८७५०) पर सम्पर्क कर सकते हैं. म्हणत काश पत्रिका की ई मेल : mehnatkash2010@gmail.com है. )

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

पैदा हुई जनवादी विकल्प की जरूरत


दिनकर कपूर
अन्ना आन्दोलन की जीत ने देश में काफी समय बाद जनता की प्रभुसत्ता को स्थापित किया है। इस आन्दोलन ने पुनः साबित किया कि सत्ता और सरकार चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो उसे सच और इस सच के साथ खड़ी हुई जनता की भावनाओं के सामने झुकना पडता है। इस आंदोलन ने पिछले बीस वर्षों के आर्थिक सुधार के दौर में देश में पैदा हुई इस निराशा की भावना के कि कुछ नहीं हो सकता, को भी एक हद तक कम करने का काम किया। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स ने लिखा था कि पूंजीवाद विकास के क्रम में मात्र उन हथियारों को ही पैदा नहीं करता, बल्कि उन्हें चलाने वालों को भी पैदा करता है जो उसके विनाश का कारण बनते है। रामलीला मैदान में अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में लगातार पांच दिन रहते हुए मैने खुद करीब से देखा कि जिसे मध्यम वर्ग का आंदोलन कह कर खारिज किया जा रहा है, उसमें और कोई नहीं पिछले 20 वर्षा से मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के बदौलत पैदा हुई मजदूर वर्ग की नयी पीढ़ी रही है। साफ्टवेयर, शापिंग माल्स, पत्रकारिता, सर्विस सेन्टरों, एनजीओं आदि में काम करने वाले ऐसे नौजवान है, जो इस सुधार के बाद दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके में बसने आये और जिन्हें चौतरफा शोषण का शिकार रोज ब रोज की जिन्दगी में होना पडता है। रामलीला मैदान में पश्चिम उ0प्र0, एनसीआर और हरियाणा के उन इलाकों से किसानों की बड़ी जमात आयी जिनकी जमीनें कारर्पोरेट और बडे घरानों के मुनाफे के लिए सरकारों ने धोखा धड़ी कर लूट ली है। वह आदिवासी थे जिन्हे प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए कारपोरेट-सरकार-माफिया गठजोड़ ने बर्बाद कर दिया। वह घरेलू महिलाएं थी जो नित बढ़ती महंगाई के चलते अपनी गृहस्थी के तनाव में तिल-तिल कर घुट रही है। उन छात्र नौजवानों की मौजूदगी थी, जिन्हें पहले पढ़ने के लिए जूझना होता है और फिर पढ़ाई के बाद रोजगार की चिन्ता के साथ जीना पडता है।
आंदोलन शुरू जरूर हुआ भ्रष्टाचार के खिलाफ पर वास्तव में यह केन्द्र बन गया हर उस आक्रोष का जो व्यवस्था के खिलाफ था। इसलिए इस आंदोलन को समझने के लिए जितने पुराने फ्रेमवर्क थे, बुद्धिजीवी थे, तथाकथित आंदोलनकर्ता थे या देष के राजनीतिक दल थे वह असफल साबित हुए। आंदोलन के शुरू से ही बुद्धिजीवीयों का एक बड़ा हिस्सा इसे संविधान व संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने वाला और लोकतंत्र के लिए खतरा बताता रहा। कांग्रेस का समूचा नेतृत्व दिशाविहीन हो इसे पूर्व में हुए रामदेव के आंदोलन की तरह ही कुचलकर खत्म कर देने पर अमादा था। भाजपा इस आंदोलन के प्रति अपने रूख को ही तय नहीं कर पा रही थी। पहले उसने अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ जेल भरों का आव्हान किया पर बाद में उसे वापस ले लिया। यदि आशा कहीं से पैदा हुई तो वामपंथ की तरफ से ही जिसने 70 के दशक में जय प्रकाश आंदोलन के समय की गयी गलती से सबक लेते हुए अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ पूरे देश में लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले को मुद्दा बनाकर विरोध प्रदर्शन किया और 9 पार्टियों के साथ मिलकर २३ अगस्त को देशभर में सरकारी लोकपाल को रद्द करने और नया सशक्त लोकपाल बनाने के लिए अन्ना हजारे के प्रतिनिधियों से तत्काल वार्ता करने की मांग को उठाया। दरअसल इस आंदोलन ने देश के लोकतंत्र की सीमाओं को एक बार फिर उजागर किया है। चाहे हम कितना भी समृद्ध और मजबूत लोकतंत्र के, पूरी दुनिया में सबसे बडे लोकतंत्र होने के कसीदे पढ़े सच तो यह है कि इस देश में न्यूनतम लोकतंत्रिक सुधार भी बडे आंदोलनों के बाद ही सम्भव हो पाते है। इस मामले में भी अन्ना पक्ष की मांग महज इतनी ही थी कि देश में जो कानूनी रास्ते से, नीतियां बनाकर लूट और भ्रष्टाचार किया जा रहा है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय तक ने गहरी चिंता जाहिर की है, उस पर रोक के लिए प्रभावी और सशक्त लोकपाल कानून बनाया जाए। यह मांग 2 जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, केजी बेसिन, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले की पृष्टभूमि में और भी प्रासंगिक हो गयी। कहीं न कहीं देश के जनमानस में यह संदेश था कि सरकार देश की सम्पत्ति की लूट पर प्रभावशाली रोक लगाने से बचने की कोशिश कर रही है। इसीलिए उसने पिछले चालीस साल से भी ज्यादा समय से लोकतांत्रिक सुधार के इस न्यूनतम काम को पूरा करने के बजाए मुहं बचाने के लिए नख दंत विहीन सरकारी लोकपाल को संसद में पेष कर उसे स्थायी समिति के हवाले कर दिया है। संसद सर्वोच्चता की दुहाई देने वालों से कोई पूछे कि यदि संसद और सरकार ने अपने न्यूनतम लोकतंत्रिक सुधार के दायित्व को पूरा किया होता तो क्या अन्ना जैसे किसी भी बुजुर्ग को अनशन पर बैठने की जरूरत पडती। वास्तव में जबसे मनमोहनी सुधार शुरू हुआ है इस देश में जनआंदोलन के दबाव में जो भी जनपक्षधर कानून बने थे या सरकार के सामाजिक दायित्व तय किये गये थे उनसे एक-एक कर हर तरह की सरकारों ने अपने कदम पीछे खीचें और उन्हें पलट देने का ही प्रयास किया। सरकारों ने सचेतन ढ़ग से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की ही को कोशिशें की चाहे वह राज्यों की विधानसभाएं हो या फिर सर्वोच्च संसद। बिना संसद में बहस किए पेट्रोलियम पदार्थो की कीमत बाजार के हवाले कर दी गयी। बजट के बाद भी आए दिन कीमतें बढ़ाकर महंगाई थोपी गयी। सदनों की बहस के स्तर को चैराहे की गप्पबाजी में बदल दिया गया। सत्रों की अवधि घटाकर हर मसले पर होने वाली बहस का दायरा खत्म कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट, कैग, मानवाधिकार आयोग तक को धमकाया गया और महिला आयोग, अनुसूचित जाति- जनजाति आयोग और पिछड़ा वर्ग आयोग तो सरकारों के जेबी संगठन बन गए। सीबीआई जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं का केन्द्र में अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए दुरूपयोग किया गया उ0 प्र0 के एक उदाहरण से हम स्थिति समझ सकते है जहां की दोनो प्रमुख पार्टियां सपा-बसपा के मुखिया आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई की जद में है और जेल जाने से बचने के लिए केन्द्र सरकार की हर मसले में सुर में सुर मिलाते रहते है। यही नहीं इस दौर में देश में जितनी भी लोकतांत्रिक आवाजें उठी उन्हें या तो निर्ममता के साथ कुचल दिया या फिर अनसुना कर दिया गया। देशभर में किसानों, नौजवानों समेत समाज के विभिन्न तबकों के आंदोलनों पर दमन और मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून जैसे काले कानून के खात्में के लिए दस वर्षो से भी ज्यादा समय से अनषनरत इरोम शर्मिला के प्रति भारतीय राजव्यवस्था की अनदेखी
इसके उदाहरण है। इस आंदोलन के प्रति भी भारतीय शासक वर्ग का और उसकी दो प्रतिनिधि पार्टियों कांग्रेस और भाजपा का यही रूख था। हद तो यह हो गयी कि इन दलों ने बजाए इसके कि पिछले 20 वर्षों से जारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के सरकारों द्वारा उडाए जा रहे मजाक और उन्हे बार-बार कमजोर करने की दलों द्वारा की गयी कोशिशों पर आत्माआलोचना करने के, इस बात की समीक्षा करने कि आखिर वह कौनसी कारगुजारियां रही है जिन्होने इतना अविश्वास आमजनमानस के अंदर पैदा कर दिया, इस
आंदोलन का भण्डाफोड करने में और इसे अलगाव में डालने में ही अपनी पूरी ताकत लगा दी। आंदोलन के वक्त दिल्ली में तो आमचर्चा थी कि उन दलित-मुस्लिम-पिछडे़ नेताओं के लिए सरकार ने अटैची खोल दी है जो इस आंदोलन का विरोध कर सकें। एक दलित नेता ने तो बकायदा दिल्ली में इसी पैसे के बदौलत आंदोलन के विरोध में मार्च तक किया। इस आंदोलन के बरखिलाफ संविधान की दुहाई देते हुए डा० अम्बेडकर को खडा करने की कोषिष की। जबकि इतिहास गवाह है कि डा0अम्बेडकर ने खुद मौजूदा संविधान से अपने को अलग कर लिया था। एक मुस्लिम नेता ने आंदोलन के तौर तरीके पर सवाल उठाएं। लेकिन इन तबकों के बीच से पैदा हुयी नयी पीढ़ी ने जो आज मुख्यधारा में रहकर विकास चाहती है इन तमाम प्रयासों को नकार दिया। इतना ही नहीं हमने देखा कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने यूपीए और एनडीए के उन लोगों को आंदोलन के खिलाफ संसद में बोलने के लिए उतारा जो खुद आंदोलन से पैदा हुए है चाहे वह शरद यादव हो या लालू यादव। यह संसद में लोकपाल कानून के जरिए देश में दलित, पिछडा, अल्पसंख्यक कार्ड खेलने में लग गए। हमारे जैसे लोगों को आष्चर्य होता है कि दलित, पिछडा, अल्पसंख्यक के सामाजिक न्याय का नाम लेकर लोकतांत्रिक सुधार के महिला आरक्षण से लेकर लोकपाल के कानूनों को रोकने में शासक वर्ग के औजार बने इन तथाकथित सामाजिक न्याय के मसीहाओं का जलवा पिछडे मुसलमानों को अलग आरक्षण देने, दलित ईसाइयों व मुसलमानों को अनु-जाति का दर्जा देने की संस्तुति करने वाली रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पोट को लागू कराने व अति पिछडों को पूरे देश में अलग आरक्षण कोटा देने पर क्यों नही दिखाई देता ? जहां-जहां इनकी सरकारें रही है या इस समय है वहां इनका पालन क्यों नहीं हो रहा। सबने देखा कि इस आंदोलन को सहयोग कर रहे हर तरह के लोगों पर हमला किया गया। मीडिया के खिलाफ चिल्ला- चिल्ला कर भाषण देने वालों को समाचार चैनलों में राखी सांवत के नाच और लाफ्टर शो से इतनी बड़ी दिक्कत कभी नहीं हुई जितना कि इस आंदोलन की कवरेज से। ओमपुरी जैसे लोगो पर भाजपा ने शराब पीकर भाषण देने का आरोप लगाया और जिन्हें आज भी आतंकित किया जा रहा है। इतना ही नहीं अग्निवेश जैसो का इस्तेमाल आंदोलन को तोड़ने के लिए किया गया। 'रस्सी जल गयी ऐठन नहीं गयी' की कहावत को चरितार्थ करते हुए अभी भी सरकार का रूख आत्मविश्लेषण का नही अपितु आंदोलन को पुनः अलगाव में डालने का ही है। एक तरफ अन्ना को फूल का गुलदस्ता दिया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ बदले की भावना से कार्य करते हुए उनके सहयोगियों की हर तरह से धेरेबंदी की जा रही है। इस आंदोलन में रहते हुए मैने महसूस किया कि आंदोलन में कहीं भी धर्म, जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं था। बल्कि गोविन्दाचार्य, चेतन चैहान, सीपी ठाकुर, वरूण गांधी से लेकर तमाम ऐसे नेता थे, जिन्हें आयोजकों ने सचेत ढ़ग से मंच पर बुलवाने से मना कर दिया। बहरहाल हर प्रकार के कुत्सित प्रचार, दमन और अवहेलना के कोशिशों को नकार कर यह आंदोलन सफल हुआ। इस आंदोलन की जो भी कमियां हों उन पर खुले दिल से विचार हो सकता है पर इसने सत्ता से टकराने और जीत जाने की जनाकांक्षाओं को निश्चित रूप से बहुत बढ़ा दिया है। इसको चलाने वालों के ऊपर यह एक बड़ी जबाबदेही है कि वह इन जनाकांक्षाओं को देश में प्रतिरोध की एक बडी शक्ति में तब्दील करें। साथ ही यह भी कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जिन सुधारात्मक सवालों को वह उठा रहे है वह राजनीतिक क्षेत्र में भी उनसे दखल देने की मांग करेगा क्योंकि मौजूदा राजनैतिक परिपाटी इसके खिलाफ है। इस नाते शुरूवात चाहे जहां से आंदोलनकर्ताओं ने की हो उन्हें जनपक्षधर जनवादी राजनीतिक विकल्प का केन्द्र भी बनाना होगा।
(दिनकर कपूर, राष्ट्रीय प्रवक्ता, जन संघर्ष मोर्चा, ई0 डी0 17 डायमण्ड़ डेरी कालोनी, उदयगंज, लखनऊ। मो0 न0 09450153307)

रविवार, 4 सितंबर 2011

दस दिन का अनशन


हरिशंकर परसाई
10 जनवरी
आज मैंने बन्नू से कहा, " देख बन्नू, दौर ऐसा आ गया है की संसद, क़ानून, संविधान, न्यायालय सब बेकार हो गए हैं. बड़ी-बड़ी मांगें अनशन और आत्मदाह की धमकी से पूरी हो रही हैं. २० साल का प्रजातंत्र ऐसा पक गया है कि एक आदमी के मर जाने या भूखा रह जाने की धमकी से ५० करोड़ आदमियों के भाग्य का फैसला हो रहा है. इस वक़्त तू भी उस औरत के लिए अनशन कर डाल."
बन्नू सोचने लगा. वह राधिका बाबू की बीवी सावित्री के पीछे सालों से पड़ा है. भगाने की कोशिश में एक बार पिट भी चुका है. तलाक दिलवाकर उसे घर में डाल नहीं सकता, क्योंकि सावित्री बन्नू से नफरत करती है.
सोचकर बोला, " मगर इसके लिए अनशन हो भी सकता है? "
मैंने कहा, " इस वक़्त हर बात के लिए हो सकता है. अभी बाबा सनकीदास ने अनशन करके क़ानून बनवा दिया है कि हर आदमी जटा रखेगा और उसे कभी धोएगा नहीं. तमाम सिरों से दुर्गन्ध निकल रही है. तेरी मांग तो बहुत छोटी है- सिर्फ एक औरत के लिए."
सुरेन्द्र वहां बैठा था. बोला, " यार कैसी बात करते हो! किसी की बीवी को हड़पने के लिए अनशन होगा? हमें कुछ शर्म तो आनी चाहिए. लोग हँसेंगे."
मैंने कहा, " अरे यार, शर्म तो बड़े-बड़े अनशनिया साधु-संतों को नहीं आई. हम तो मामूली आदमी हैं. जहाँ तक हंसने का सवाल है, गोरक्षा आन्दोलन पर सारी दुनिया के लोग इतना हंस चुके हैं क उनका पेट दुखने लगा है. अब कम-से-कम दस सालों तक कोई आदमी हंस नहीं सकता. जो हंसेगा वो पेट के दर्द से मर जाएगा."
बन्नू ने कहा," सफलता मिल जायेगी?"
मैंने कहा," यह तो 'इशू' बनाने पर है. अच्छा बन गया तो औरत मिल जाएगी. चल, हम 'एक्सपर्ट' के पास चलकर सलाह लेते हैं. बाबा सनकीदास विशेषज्ञ हैं. उनकी अच्छी 'प्रैक्टिस' चल रही है. उनके निर्देशन में इस वक़्त चार आदमी अनशन कर रहे हैं."
हम बाबा सनकीदास के पास गए. पूरा मामला सुनकर उन्होंने कहा," ठीक है. मैं इस मामले को हाथ में ले सकता हूँ. जैसा कहूँ वैसा करते जाना. तू आत्मदाह की धमकी दे सकता है?"
बन्नू कांप गया. बोला," मुझे डर लगता है."
"जलना नहीं है रे. सिर्फ धमकी देना है."
"मुझे तो उसके नाम से भी डर लगता है."
बाबा ने कहा," अच्छा तो फिर अनशन कर डाल. 'इशू' हम बनायेंगे."
बन्नू फिर डरा. बोला," मर तो नहीं जाऊँगा."
बाबा ने कहा," चतुर खिलाड़ी नहीं मरते. वे एक आँख मेडिकल रिपोर्ट पर और दूसरी मध्यस्थ पर रखते हैं. तुम चिंता मत करो. तुम्हें बचा लेंगे और वह औरत भी दिला देंगे."


11 जनवरी
आज बन्नू आमरण अनशन पर बैठ गया. तम्बू में धुप-दीप जल रहे हैं. एक पार्टी भजन गा रही है - 'सबको
सन्मति दे भगवान्!'. पहले ही दिन पवित्र वातावरण बन गया है. बाबा सनकीदास इस कला के बड़े उस्ताद हैं. उन्होंने बन्नू के नाम से जो वक्तव्य छपा कर बंटवाया है, वो बड़ा ज़ोरदार है. उसमें बन्नू ने कहा है कि 'मेरी आत्मा से पुकार उठ रही है कि मैं अधूरी हूँ. मेरा दूसरा खंड सावित्री में है. दोनों आत्म-खण्डों को मिलाकर एक करो या मुझे भी शरीर से मुक्त करो. मैं आत्म-खण्डों को मिलाने के लिए आमरण अनशन पर बैठा हूँ. मेरी मांग है कि सावित्री मुझे मिले. यदि नहीं मिलती तो मैं अनशन से इस आत्म-खंड को अपनी नश्वर देह से मुक्त कर दूंगा. मैं सत्य पर हूँ, इसलिए निडर हूँ. सत्य की जय हो!'
सावित्री गुस्से से भरी हुई आई थी. बाबा सनकीदास से कहा," यह हरामजादा मेरे लिए अनशन पर बैठा है ना?"
बाबा बोले," देवी, उसे अपशब्द मत कहो. वह पवित्र अनशन पर बैठा है. पहले हरामजादा रहा होगा. अब नहीं रहा. वह अनशन कर रहा है."
सावित्री ने कहा," मगर मुझे तो पूछा होता. मैं तो इस पर थूकती हूँ."
बाबा ने शान्ति से कहा," देवी, तू तो 'इशू' है. 'इशू' से थोड़े ही पूछा जाता है. गोरक्षा आन्दोलन वालों ने गाय से कहाँ पूछा था कि तेरी रक्षा के लिए आन्दोलन करें या नहीं. देवी, तू जा. मेरी सलाह है कि अब तुम या तुम्हारा पति यहाँ न आएं. एक-दो दिन में जनमत बन जाएगा और तब तुम्हारे अपशब्द जनता बर्दाश्त नहीं करेगी."
वह बड़बड़ाती हुई चली गई.
बन्नू उदास हो गया. बाबा ने समझाया," चिंता मत करो. जीत तुम्हारी होगी. अंत में सत्य की ही जीत होती है."
13 जनवरी
बन्नू भूख का बड़ा कच्चा है. आज तीसरे ही दिन कराहने लगा. बन्नू पूछता है, " जयप्रकाश नारायण आये?"
मैंने कहा," वे पांचवें या छठे दिन आते हैं. उनका नियम है. उन्हें सूचना दे दी है."
वह पूछता है," विनोबा ने क्या कहा है इस विषय में?"
बाबा बोले," उन्होंने साधन और साध्य की मीमांसा की है, पर थोड़ा तोड़कर उनकी बात को अपने पक्ष में उपयोग किया जा सकता है."
बन्नू ने आँखें बंद कर लीं. बोला,"भैया, जयप्रकाश बाबू को जल्दी बुलाओ."
आज पत्रकार भी आये थे. बड़ी दिमाग-पच्ची करते रहे.
पूछने लगे," उपवास का हेतु कैसा है? क्या वह सार्वजनिक हित में है? "
बाबा ने कहा," हेतु अब नहीं देखा जाता. अब तो इसके प्राण बचाने की समस्या है. अनशन पर बैठना इतना बड़ा आत्म-बलिदान है कि हेतु भी पवित्र हो जाता है."
मैंने कहा," और सार्वजनिक हित इससे होगा. कितने ही लोग दूसरे की बीवी छीनना चाहते हैं, मगर तरकीब उन्हें नहीं मालूम. अनशन अगर सफल हो गया, तो जनता का मार्गदर्शन करेगा."
14 जनवरी
बन्नू और कमज़ोर हो गया है. वह अनशन तोड़ने की धमकी हम लोगों को देने लगा है. इससे हम लोगों का मुंह काला हो जायेगा. बाबा सनकीदास ने उसे बहुत समझाया.
आज बाबा ने एक और कमाल कर दिया. किसी स्वामी रसानंद का वक्तव्य अख़बारों में छपवाया है. स्वामीजी ने कहा है कि मुझे तपस्या के कारण भूत और भविष्य दिखता है. मैंने पता लगाया है क बन्नू पूर्वजन्म में ऋषि था और सावित्री ऋषि की धर्मपत्नी. बन्नू का नाम उस जन्म में ऋषि वनमानुस था. उसने तीन हज़ार वर्षों के बाद अब फिर नरदेह धारण की है. सावित्री का इससे जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है. यह घोर अधर्म है कि एक ऋषि की पत्नी को राधिका प्रसाद-जैसा साधारण आदमी अपने घर में रखे. समस्त धर्मप्राण जनता से मेरा आग्रह है कि इस अधर्म को न होने दें.
इस वक्तव्य का अच्छा असर हुआ. कुछ लोग 'धर्म की जय हो!' नारे लगाते पाए गए. एक भीड़ राधिका बाबू के घर के सामने नारे लगा रही थी----
"राधिका प्रसाद-- पापी है! पापी का नाश हो! धर्म की जय हो."
स्वामीजी ने मंदिरों में बन्नू की प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना का आयोजन करा दिया है.
15 जनवरी
रात को राधिका बाबू के घर पर पत्थर फेंके गए.
जनमत बन गया है.
स्त्री-पुरुषों के मुख से यह वाक्य हमारे एजेंटों ने सुने---
"बेचारे को पांच दिन हो गए. भूखा पड़ा है."
"धन्य है इस निष्ठां को."
"मगर उस कठकरेजी का कलेजा नहीं पिघला."
"उसका मरद भी कैसा बेशरम है."
"सुना है पिछले जन्म में कोई ऋषि था."
"स्वामी रसानंद का वक्तव्य नहीं पढ़ा!"
"बड़ा पाप है ऋषि की धर्मपत्नी को घर में डाले रखना."
आज ग्यारह सौभाग्यवतियों ने बन्नू को तिलक किया और आरती उतारी.
बन्नू बहुत खुश हुआ. सौभाग्यवतियों को देख कर उसका जी उछलने लगता है.
अखबार अनशन के समाचारों से भरे हैं.
आज एक भीड़ हमने प्रधानमन्त्री के बंगले पर हस्तक्षेप की मांग करने और बन्नू के प्राण बचाने की अपील करने भेजी थी. प्रधानमन्त्री ने मिलने से इनकार कर दिया.
देखते हैं कब तक नहीं मिलते.
शाम को जयप्रकाश नारायण आ गए. नाराज़ थे. कहने लगे," किस-किस के प्राण बचाऊं मैं? मेरा क्या यही धंधा है? रोज़ कोई अनशन पर बैठ जाता है और चिल्लाता है प्राण बचाओ. प्राण बचाना है तो खाना क्यों नहीं लेता? प्राण बचाने के लिए मध्यस्थ की कहाँ ज़रुरत है? यह भी कोई बात है! दूसरे की बीवी छीनने के लिए अनशन के पवित्र अस्त्र का उपयोग किया जाने लगा है."
हमने समझाया," यह 'इशू' ज़रा दूसरे किस्म है. आत्मा से पुकार उठी थी."
वे शांत हुए. बोले," अगर आत्मा की बात है तो मैं इसमें हाथ डालूँगा."
मैंने कहा," फिर कोटि-कोटि धर्मप्राण जनता की भावना इसके साथ जुड़ गई है."
जयप्रकाश बाबू मध्यस्थता करने को राज़ी हो गए. वे सावित्री और उसके पति से मिलकर फिर प्रधानमन्त्री से मिलेंगे.
बन्नू बड़े दीनभाव जयप्रकाश बाबू की तरफ देख रहा था.
बाद में हमने उससे कहा," अबे साले, इस तरह दीनता से मत देखा कर. तेरी कमज़ोरी ताड़ लेगा तो कोई भी नेता तुझे मुसम्मी का रस पिला देगा. देखता नहीं है, कितने ही नेता झोलों में मुसम्मी रखे तम्बू के आस-पास घूम रहे हैं."
16 जनवरी
जयप्रकाश बाबू की 'मिशन' फेल हो गई. कोई मानने को तैयार नहीं है. प्रधानमन्त्री ने कहा," हमारी बन्नू के साथ सहानुभूति है, पर हम कुछ नहीं कर सकते. उससे उपवास तुडवाओ, तब शान्ति से वार्ता द्वारा समस्या का हल ढूँढा जाएगा."
हम निराश हुए. बाबा सनकीदास निराश नहीं हुए. उन्होंने कहा," पहले सब मांग को नामंज़ूर करते हैं. यही प्रथा है. अब आन्दोलन तीव्र करो. अखबारों में छपवाओ क बन्नू की पेशाब में काफी 'एसीटोन' आने लगा है. उसकी हालत चिंताजनक है. वक्तव्य छपवाओ कि हर कीमत पर बन्नू के प्राण बचाए जाएँ. सरकार बैठी-बैठी क्या देख रही है? उसे तुरंत कोई कदम उठाना चाहिए जिससे बन्नू के बहुमूल्य प्राण बचाए जा सकें."
बाबा अद्भुत आदमी हैं. कितनी तरकीबें उनके दिमाग में हैं. कहते हैं, "अब आन्दोलन में जातिवाद का पुट देने का मौका आ गया है. बन्नू ब्राम्हण है और राधिकाप्रसाद कायस्थ. ब्राम्हणों को भड़काओ और इधर कायस्थों को. ब्राम्हण-सभा का मंत्री आगामी चुनाव में खड़ा होगा. उससे कहो कि यही मौका है ब्राम्हणों के वोट इकट्ठे ले लेने का."
आज राधिका बाबू की तरफ से प्रस्ताव आया था कि बन्नू सावित्री से राखी बंधवा ले.
हमने नामंजूर कर दिया.
17 जनवरी
आज के अखबारों में ये शीर्षक हैं---
"बन्नू के प्राण बचाओ!
बन्नू की हालत चिंताजनक!'
मंदिरों में प्राण-रक्षा के लिए प्रार्थना!"
एक अख़बार में हमने विज्ञापन रेट पर यह भी छपवा लिया---
"कोटि-कोटि धर्म-प्राण जनता की मांग---!
बन्नू की प्राण-रक्षा की जाए!
बन्नू की मृत्यु के भयंकर परिणाम होंगे !"
ब्राम्हण-सभा के मंत्री का वक्तव्य छप गया. उन्होंने ब्राम्हण जाति की इज्ज़त का मामला इसे बना लिया था. सीधी कार्यवाही की धमकी दी थी.
हमने चार गुंडों को कायस्थों के घरों पर पत्थर फेंकने के लिए तय कर किया है.
इससे निपटकर वही लोग ब्राम्हणों के घर पर पत्थर फेंकेंगे.
पैसे बन्नू ने पेशगी दे दिए हैं.
बाबा का कहना है क कल या परसों तक कर्फ्य लगवा दिया जाना चाहिए. दफा 144 तो लग ही जाये. इससे 'केस' मज़बूत होगा.
18 जनवरी
रात को ब्राम्हणों और कायस्थों के घरों पर पत्थर फिंक गए.
सुबह ब्राम्हणों और कायस्थों के दो दलों में जमकर पथराव हुआ.
शहर में दफा 144 लग गयी.
सनसनी फैली हुई है.
हमारा प्रतिनिधि मंडल प्रधानमन्त्री से मिला था. उन्होंने कहा," इसमें कानूनी अडचनें हैं. विवाह-क़ानून में संशोधन करना पड़ेगा."
हमने कहा," तो संशोधन कर दीजिये. अध्यादेश जारी करवा दीजिये. अगर बन्नू मर गया तो सारे देश में आग लग जायेगी."
वे कहने लगे," पहले अनशन तुडवाओ ? "
हमने कहा," सरकार सैद्धांतिक रूप से मांग को स्वीकार कर ले और एक कमिटी बिठा दे, जो रास्ता बताये कि वह औरत इसे कैसे मिल सकती है."
सरकार अभी स्थिति को देख रही है. बन्नू को और कष्ट भोगना होगा.
मामला जहाँ का तहाँ रहा. वार्ता में 'डेडलॉक' आ गया है.
छुटपुट झगड़े हो रहे हैं.
रात को हमने पुलिस चौकी पर पत्थर फिंकवा दिए. इसका अच्छा असर हुआ.
'प्राण बचाओ'---की मांग आज और बढ़ गयी.
19 जनवरी
बन्नू बहुत कमज़ोर हो गया है. घबड़ाता है. कहीं मर न जाए.
बकने लगा है कि हम लोगों ने उसे फंसा दिया है. कहीं वक्तव्य दे दिया तो हम लोग 'एक्सपोज़' हो जायेंगे.
कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा. हमने उससे कहा कि अब अगर वह यों ही अनशन तोड़ देगा तो जनता उसे मार डालेगी.
प्रतिनिधि मंडल फिर मिलने जाएगा.
20 जनवरी
'डेडलॉक '
सिर्फ एक बस जलाई जा सकी.
बन्नू अब संभल नहीं रहा है.
उसकी तरफ से हम ही कह रहे हैं कि "वह मर जाएगा, पर झुकेगा नहीं!"
सरकार भी घबराई मालूम होती है.
साधुसंघ ने आज मांग का समर्थन कर दिया.
ब्राम्हण समाज ने अल्टीमेटम दे दिया. १० ब्राम्हण आत्मदाह करेंगे.
सावित्री ने आत्महत्या की कोशिश की थी, पर बचा ली गयी.
बन्नू के दर्शन के लिए लाइन लगी रही है.
राष्ट्रसंघ के महामंत्री को आज तार कर दिया गया.
जगह-जगह- प्रार्थना-सभाएं होती रहीं.
डॉ. लोहिया ने कहा है क जब तक यह सरकार है, तब तक न्यायोचित मांगें पूरी नहीं होंगी. बन्नू को चाहिए कि वह सावित्री के बदले इस सरकार को ही भगा ले जाए.
21 जनवरी
बन्नू की मांग सिद्धांततः स्वीकार कर ली गयी.
व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक कमेटी बना दी गई है.
भजन और प्रार्थना के बीच बाबा सनकीदास ने बन्नू को रस पिलाया. नेताओं की मुसम्मियाँ झोलों में ही सूख गईं. बाबा ने कहा कि जनतंत्र में जनभावना का आदर होना चाहिए. इस प्रश्न के साथ कोटि-कोटि जनों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं. अच्छा ही हुआ जो शान्ति से समस्या सुलझ गई, वर्ना हिंसक क्रान्ति हो जाती.
ब्राम्हणसभा के विधानसभाई उमीदवार ने बन्नू से अपना प्रचार कराने के लिए सौदा कर लिया है. काफी बड़ी रकम दी है. बन्नू की कीमत बढ़ गयी.
चरण छूते हुए नर-नारियों से बन्नू कहता है," सब ईश्वर की इच्छा से हुआ. मैं तो उसका माध्यम हूँ."
नारे लग रहे हैं -- सत्य की जय! धर्म की जय!

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

अन्ना आंदोलन: शासक वर्ग का फासिस्ट पुनर्गठन


अंजनी कुमार
अन्ना आंदोलन का भूत सत्ता में बैठे लोगों को सताया हो या न हो पर वामपंथ के एक हिस्से को खूब सता रहा है। वह वामपंथ के पूरे इतिहास व वर्तमान के गिरेबान में झांककर बोल रहा है कि जैसा अन्ना ने किया वैसा आज तक तुम न कर सके, कि तुम अपनी कमियों से चिपके रहे और देष की जनता के नब्ज को टटोल सकने में आज अक्षम बने रहे, कि यह तुम्हारी ही कमियां है जिसके चलते शासक वर्ग और मजबूत होता जा रहा है और जितना तुम लोग को आज तक कुल जमा राजनीति सिखा पाए उससे कई गुना यह चंद दिनों का आंदोलन सिखा गया, कि तुम सीखने को तैयार नहीं हो और न ही सुधरने को, कि तुम देश के सबसे वाहियात और अकर्मण्य लोग हो, कि तुम्हें इस बात के लिए अपना अपराध स्वीकार करना चाहिए और नए तरह के उभर रहे आंदोलनों मे खुद को समाहित कर देना चाहिए। वामपंथ का एक हिस्सा इस झोंक में खुद को समाहित करने के लिए एड़ी चोटी लगा दिया। इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ वंदेमातरम् और भारत माता की जय के नारे को अपना लिया। पर इससे भी बात बनी नहीं। धारा के बहाव में उनके तैरने की आवाज भी सुनाई न दी। और जिस दिन अन्ना ने रामलीला मैदान से अस्पताल का रास्ता लिया उस दिन से सड़कें खाली हो गईं और जनता नारों तख्तों के साथ नदारद हो गई। यह सब कुछ सिनेमा हाल में बैठे फिल्म देखने जैसा था। जब तक फिल्म चलती रही सभी दृश्य के मर्म के साथ उतराते बैठते रहे। फिल्म खत्म होने के साथ ही इसके असर के साथ एक दूसरे तरह की दुनिया में घुस जाने जैसा था। सारा दामोरदार एक बार फिर संसद के पास है कि वह जन लोकपाल बिल कितने हिस्से को समाहित करेगा। बात नहीं बनी तो अन्ना एक बार फिर आएंगे। वामपंथियों का यह समूह बेहद स्वाभाविकता के साथ अन्ना आंदोलन के नारों, झंडों व कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया। भारत माता की जय! वंदेमातरम्! और तिरंगें को हथियार की तरह फहराने से उसके अंदर भी झुरझुरी उठी। इस नारे को देश के असली नब्ज की पकड़ के रूप में देखा। प्रगतिशील आवरण के लिए इंकलाब जिंदाबाद का नारा था। और जिस किसी ने अन्ना आंदालन का विरोध किया उसके खिलाफ इस नारे का धारदार हथियार तरह प्रयोग किया। जो समूह पूरे आंदोलन पर छाया रहा और कस्बों से लेकर दिल्ली के ठेठ संसद तक हो रहे प्रदर्शनों पर काबिज रहा उसके साथ यह वामपंथी समूह स्वभाविक मित्रता महसूस कर रहा था। उसके साथ वह मजे ले रहा था। उसकी पीठ थपथपाकर फोटो खींच व खिंचा रहा था। यह उसके हमजोली का हिस्सा था और उनकी आकांक्षा को पूरा करने का असली हमसफर भी। यह समूह इन आंदोलनकारियों की आवाज में अपनी दबी आवाज के को देख रहा था। वामपंथियों का यह समूह लगातार किसानों, मजदूरों, गरीबों को खोज रहा था, मानों इसके बिना यह आंदोलन वैध साबित नहीं हो पाएगा। वे इस देश के पायदान पर पड़े लोगों को लगातार खोज रहा था और नहीं मिलने पर बेचैन हो कम्युनिस्ट पार्टियों को लगातार गरिया रहा था कि वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे है, कि इस आंदोलन में उनकी भी वैधता सिद्ध होगी, कि उन्हें भी इस देष का सही नेतृत्वकारी मान लिया जाएगा। इस समूह की यह बेचैनी दरअसल इस हिंदूत्व के जलसे में उसकी बन स्वभाविक एकता को वैध बना लेने की छटपटाहट थी। यह किसी भी वामपंथ धड़े के छोटे से छोटे वाक्यांशों को अन्ना आंदोलन के समर्थन का नारा बना देने को उतावला हो उठा था। यह पूरे वक्तव्य को संदर्भ और समय से काट कर मचान का झंडा बना कर पेश कर रहा था। वह काट पीटकर किसी भी तरह एक दुनिया गढ़ लेने के लिए उतावला हो रहा था जो उसके मन मुताबिक हो, जो उसकी आकांक्षा के अनुरूप हो, आदि। वामपंथियों का यह समूह अन्ना आंदोलन की पृठिभूमि, इतिहास व राजनीतिक उद्देश्य, संगठन आदि किसी पक्ष को देखने समझने व उसकी व्याख्या भी करने को तैयार नहीं था। हालांकि यह सबकुछ पिछले छह महीने के भीतर हुआ है और आंख के सामने घटित हुआ है। इसके लिए कोई मोटी किताब या किसी जांच पड़ताल से भी नहीं गुजरना था। पर यह समूह इस आंदोलन के संदर्भ में उपरोक्त बातों को फालतू बता कर जयकारे में लग गया। इस समूह का मानना है कि इस तरह के विश्लेषण से अन्ना आंदोलन पर क्या फर्क पड़ जाएगा, कि जनता तो चल चुकी है और आप सिद्धांत बघार रहे है, कि यदि आप भागीदार नहीं हुए तो आपको कुत्ता तक नहीं पूछेगा। यह तर्कहीनता और राजनीति में दृटिहीनता यह समूह जानबूझकर अपना रहा था। वह इस पचड़े में पड़कर उमड़ रहे नवधनिकों से किसी भी स्तर पर अलग नहीं होना चाहता था। यह इस एकता की गुहार थी कि पुराने ढ़ाचों व मूल्यों और दृटि को तोड़कर फेंक दिया जाय। और उलट कर कम्युनिस्टों को इस बात की गाली दी जाय कि वे आज के समय को समझ नहीं पा रहे हैं, कि वे सत्तर साल के बूढ़े की मर्दानगी को समझ नहीं पा रहे हैं, कि वे अब कूड़ेदान में ही पड़े रहेंगे और अन्ना जैसा आंदोलन ही भविय का असल मर्द आंदोलन होगा। इस आंदोलन की राजनीतिक इकाई का गठन, जिसे आज अन्ना टीम के नाम से जाना जा रहा है, को बने हुए बहुत दिन नहीं गुजरे। संसद के पिछले सत्र में प्रस्तावित लोकपाल बिल के खिलाफ दिल्ली के जंतर मंतर पर एनजीओ से जुड़े लोगों ने बैठक किया था। उस बैठक को लेकर कारपोरेट सेक्टर काफी उत्साहित था। और सबसे ज्यादा उत्साहित थी भाजपा। उस सत्र में भाजपा की ओर से सुषमा स्वराज ने मनमोहन सरकार को नंगा कर देने की चुनौती दिया था। बाद के दिनों में भ्रटचार की घटनाओं के बाढ़ में भाजपा खुद ही डूबने लगी। कांग्रेस और भाजपा दोनों एक ही नाव पर सवार हो किसी तरह पार हो जाने की जुगत में लग गए। संसद में अरूण जेतली और मनमोहन सिंह के बीच इस बात पर तनातनी हुई कि संसद में अन्ना को बुलाकर भाषण क्यों दिलाया गया। पर दोनों ही अन्ना को साधने में लगे रहे और सफल रहे। लोकपाल बिल के खिलाफ जन लोकपाल बिल का प्रस्ताव आया और भ्रटचार के खिलाफ आंदोलन अन्ना आंदोलन में बदल गया। इस बदलाव में उपरोक्त एनजीओ के कई भागीदार इस आंदोलन से अलग हो गए। कई नाराज हुए। और कई नयो की भर्ती हुई। कुछ दबे हुए चेहरे चमक उठे। इस पूरी प्रक्रिया में पार्टियों के प्रतिनीधि, एनजीओ, कारपोरेट सेक्टर के प्रबंधकों और मीडिया समूहों ने निर्णायक भूमिका को अंजाम दिया। यह एक आंदोलन की पूर्वपीठिका की एक राजनीतिक गोलबंदी थी। राजनीति सिद्धांत की शब्दावली में यह इस आंदोलन की नेतृत्वकारी इकाई थी जिसने बाद के दिनों में अपनी क्षमता व दिषा का प्रदर्शन किया। बाद के दिनों में बस इतना ही फर्क आया कि अन्ना के बिना अन्ना टीम अवैधानिक व्यवस्था जैसी बन चुकी थी। और आंदोलन मैं अन्ना हूं में बदल गया। अन्ना व टीम अन्ना के बाद मीडिया घरानों से लेकर आरएसएस के विभिन्न संगठनकर्ता, नेता, विभिन्न पार्टियों के प्रतिनीधि व दलाल और कारपोरेट प्रबंधन के एलीट हैं। मीडिया प्रसारण के तौर तरीकों और मुद्दों को उछालने की नीति तय करने में लगा है। भाजपा आरएसएस राट्रवादियों के पुराने व नए घरानों को साधने में लगा है। कारपोरेट एलीट भ्रटाचार को नेता नौकरशाह तक सीमित कर अपने लूट और कब्जा की नीति को पूरी तरह मजबूत कर लेने के लिए प्रयासरत है। वह वहां उबल रहे राट्रवाद में पैसा झोंक रहा है कि यह और भड़क उठे। उसे आर्थिक मंदी की मार सता रही है। उसे और अधिक लूट की नीतियां चाहिए। उसे अब दूसरे दौर के भूमंडलीकरण की जरूरत है। इसके लिए राट्रव्यापी राट्रवादी आंदोलन व माहौल चाहिए। इस घेरे के बाद 1990 के बाद उभरे नव धनाढ़्य मध्यवर्ग अपने परिवारों और गैरसरकारी संगठनों के साथ सक्रिय भागीदार है। यह समूह सरकार में राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए छटपटा रहा है। यह देष की कुल कमाई में हिस्सेदार होने के लिए राट्रीय अंतर्राट्रीय संस्थानों से गठजोड़ कर एनजीओ के माध्यम से सक्रिय है। यूथ फार इक्वलिटी से लेकर यूथ फार डेमोक्रेसी जैसे संगठन अपने नारों संगठनों व आर्थिक स्रोतों की बदौलत मीडिया के सहयोग से रातोंरात इनकी हजारों नेतृत्वकारी ईकाइयां उभर आयी हैं। ये भाजपा नहीं है। ये आर एस एस नहीं है। ये राट्रवादी ब्राहमणवाद का नया स्वायत्त समूह है। इन्हें भाजपा आरएसएस का भरपूर समर्थन और इनके साथ स्वभाविक गठजोड़ है। इन्होंने ‘गर्व से कहो मैं हिंदू हूं’ को ‘मैं अन्ना हू में बदल दिया है। इस आंदोलन के भागीदारों में सबसे निचले पायदान पर स्वतःस्फूर्त जनता का हिस्सा है जिनकी हिस्सेदारी कस्बों में अधिक पर दिल्ली के रामलीला मैदान में कम थी। यह समूह रोजमर्रा के भ्रटाचार से लेकर वर्तमान फासिस्ट जनविरोधी मनमोहन सरकार व विभिन्न पार्टियों की राज्य स्तर के दमनकारी सरकारों के खिलाफ विरोध व अपने क्षोभ को दर्ज कराने के लिए भागीदार रहा। यह अन्ना आंदोलन का सबसे बाहरी हिस्सा है। इस समूह का न तो अन्ना टीम तक पहुंच थी और न ही इस टीम को अपनी हिस्सेदारी के एजेंडे को पहुंचा सकने के हालात थे। सच्चाई यह भी थी कि टीम अन्ना व उसके घेरे के एजेंडे पर यह समूह था ही नहीं। यद्यपि टीम अन्ना बीच बीच में मीडिया से यह आग्रह करती रही कि कैमरे का मुंह इन तबाह हिस्सों की ओर भी कर लिया जाय। यह आग्रह इस समूह का प्रतिनिधित्व करने के उद्देष्य से नहीं बल्कि पूरे भारत के आम व खास सभी का अन्ना का आंदोलन में भागीदारी को वैधता देने के मद्देनजर ही किया जा रहा था। यह समूह उपरोक्त राजनीतिक गोलबंदी से बाहर था। यह समूह इस आंदोलन को प्रभावित करने के किसी भी टूल से वंचित था। ऐसी स्थिति में यह खुद उनका टूल बन रहा था और तेजी से उनके प्रभाव में आ रहा था। 1995 के बाद के दौर में वित्तीय पूंजी की खुली आवाजाही व तकनीक सेवा ओर प्रबंधन की संस्थाओं से पैदा हुए नवधनाढ़्यों और सट्टेबाजों की दावेदारी ने पुनर्गठन की जरूरत को पैदा किया है। यह वर्ग इसके बदले में कारपोरेट सेक्टर को लूटने की खुली छूट दे रहा है। इस पुनर्गठन से शासक वर्ग के किसी भी हिस्से को नुकसान नहीं होना है। यह जनता के लूट- शोषण, दमन का फासिस्ट पुनर्गठन है। समाज में जीवन स्तर, आय और जरूरत के आधार पर बंटवारे की गति और तेज होगी। चंद लोगों के हाथ में अथाह संपत्ति होगी और देश की बहुसंख्य आबादी भोजन के लिए पहले से और अधिक मोहताज होगी। अन्ना का जनलोकपाल बिल, राट्रवाद वर्तमान दमनकारी फासीवादी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का प्रवर्तन है। इस आंदोलन में अल्पसंख्यक खासतौर से मुसलमान समुदाय की भागीदारी न होना, दलित व आदिवासी समुदाय का इससे दूरी बनाए रखने के पीछे आत्मगत से अधिक वस्तुगत कारण ही प्रमुख रहे हैं । भूमंडलीकरण का सबसे अधिक नुकसान इन्हीं समुदायों का हुआ। बैंकों ने मुसलमान समुदाय के खाता खोलने तक से कोताही बरती। इनके एनजीओ पर पचास तरह के जांच व रोक लगे। इनकी आजीविका के साधनों को नीतियां बनारक नुकसान पहुंचाया गया। इसका विस्तार पूर्वक वर्णन सच्चर कमेटी ने प्रस्तुत किया है। यही हालात दलित व आदिवासी समुदाय का रहा। दलित समुदाय एक छोटा हिस्सा जरूर ऊपर गया है पर वह अन्ना आंदोलन के फासिस्ट हिंदूत्ववादी पुनर्गठन का हिस्सा नहीं बनना चाहता। अन्ना आंदोलन भारतीय समाज की एक प्रतिगामी परिघटना है। यह शासक वर्ग का फासिस्ट पुनर्गठन की मांग है। इसमें भागीदारी इसके दार्शनिक पहलू को आत्मसात करना है।

बुधवार, 31 अगस्त 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार


आनंद स्वरूप वर्मा
जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उद्धारक की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना। अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिद्धि के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए। अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है। क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उद्धारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्तारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फिल्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी। अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।
(आनंद स्वरुप वर्मा तीसरी दुनिया पत्रिका के संपादक हैं. जिन साथियों को पत्रिका की सदस्यता लेनी हो वे उनसे क्यू-63, सेक्टर-12, नोएडा के पते पर संपर्क कर सकते हैं.)

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

यूरोप- अमेरिका दलदल में

जितेंद्र

भारत के पुराणों में एक कहानी है। एक था राजा ययाति। जीवन में भरपूर सुख और ऐश भोगने के बाद जब उसका बुढ़ापा आया तो उसने वृद्ध होना नहीं चाहा। उसे लगातार सुख भोगते जाने की लालसा थी। लेकिन बुढ़ापा उसकी लालसा में बाधक बन रहा था। उसने अपनी तीनों लड़कों को बुलाया और पूछा कि कौन अपने यौवन के बदले उसका बुढ़ापा ले सकता है। दो लड़कों ने तो इंकार कर दिया लेकिन तीसरा लड़का जो संवेदनशील था, अपना यौवन ययाति को देकर खुद बूढ़ा होकर जंगल चला गया। ययाति एक बार फिर युवा बनकर हजारों साल तक जीवन का सुख लेता रहा। धन की ऐसी महिमा है कि उसकी हवस कभी खत्‍म नहीं होती है। आज की विश्‍व पूंजीवादी व्‍यवस्‍था धनी व्‍यक्तियों का ही तंत्र है जिसका यौवन खत्‍म हुए सौ साल से ज्‍़यादा का समय बीत चुका है। अब तक तो उसे इस धरती से विदा हो जाना चाहिए था। लेकिन वो दुनिया के मेहनतकश वर्ग के यौवन की कीमत पर न सिर्फ अभी तक कायम है बल्कि बहुत मजबूती के साथ कायम है। युद्ध, आतंकवाद और भुखमरी जैसी समस्‍याएं आज अगर पूरी मानवता को अभी भी रौंद रही है तो सिर्फ इसलिए कि यह धरती एक अस्‍वस्‍थ और अप्राकृतिक व्‍यवस्‍था की गिरफ्त में है। यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्‍य देशों का ताजातरीन आर्थिक संकट इसी का एक लक्षण है।
यूरोप:- यूरोप की अर्थव्‍यवस्‍थाएं पिछले छह-सात साल से लगातार आर्थिक संकट को झेल रही है। ग्रीस, पुर्तगाल, स्‍पेन, इटली और फ्रांस की जनता ने भारी तादाद में सड़कों पर उतरकर आर्थिक नीतियों का विरोध किया। यूरोप के ये देश 2008-09 की आर्थिक मंदी से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि वे एक बार फिर मंदी के दलदल में फंस गए। मौजूदा संकट भी इतना व्‍यापक और गहरा कि यूरो मुद्रा के अस्तित्‍व पर ही सवाल खड़ा हो गया और यूरोपीय संघ की सारी चमक फीकी पड़ गई। ग्रीस लगभग दिवालिया हो चुका था, स्‍पेन और इटली भी दिवालिया होने की कगार पर है हालांकि यूरोप के केंद्रीय बैंक ने धन उपलब्‍ध कराकर समस्‍या को फिलहाल टाल तो दिया लेकिन इसके एवज में इन देशों की जनता से इसकी भारी कीमत वसूली गई थी। अब इन देशों की सरकारों को खर्च में कटौती के नाम पर उन नीतियों को लागू करना पड़ेगा जो आम जनता के जीवन को और ज्‍यादा दूभर बनाती हैं। इन नीतियों के विरोध में स्‍पेन और ग्रीस में लाखों की तादाद में जनता सड़कों पर उतर आई। ग्रीस की जनता ने अपनी संसद के सामने हजारों की संख्‍या में इकट्ठा होकर चोर-चोर के नारे भी लगाए। जनता की राय बहुत स्‍पष्‍ट है कि जिस संकट के लिए पूंजीपति और राजनेता जिम्‍मेदार हैं उसकी कीमत आम जनता से क्‍यों वसूली जाए। इस बीच ग्रीस को दिवालिया होने से बचाने के लिए कर्ज दिया जाए या नहीं यह तय करने के लिए जर्मन अधिकारी ग्रीस आए और जांच-पड़ताल की। उन्‍होंने वहां के कर्मचारियों से भी सवालात किए। ग्रीस की जनता को यह बेहद अपमानजनक और नागवार गुजरा। अतीत में ग्रीस सभ्‍यता और संस्‍कृति का केंद्र रहा है। उसने साम्राज्‍य के उत्‍थान और पतन को भी देखा है। उन्‍हें ये बर्दाश्‍त करना कठिन होता है कि यूरोप के बड़े देश और थैलीशाह पहले तो उन्‍हें भिखमंगा साबित करें, फिर उन पर कर्ज और शर्तें थोपें।
बहरहाल, इस संकट ने एकबार फिर यह साबित कर दिया कि यूरोपीय संघ का बनना और यूरो मुद्रा की जरूरत यूरोप के पूंजीपति वर्ग और खासतौर जर्मनी और फ्रांस जैसे धनी देशों की आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए थी। जबकि यूरोप की आम जनता खासतौर छोटे और कम धनी देशों को इसकी कीमत चुकानी थी।
अमेरिका:- अमेरिका भी ऐतिहासिक आर्थिक संकट के दलदल में फंस चुका है। दरअसल वह 2008-09 की भीषण आर्थिक मंदी के दौर से कभी उबर नहीं पाया। मंदी से उबरने की झूठी घोषणाएं होती रहीं जबकि उसकी आर्थिक विकास दर एक से डेढ़ प्रतिशत से अधिक कभी नहीं हो पाया। लेकिन कर्ज के संकट को हल करने के लिए 1 अगस्‍त के दिन सरकार और विपक्ष ने मिलकर जो समझौता किया उससे अमेरिकी समाज का संकट अधिक तीखा हो जाएगा इसमें और कोई संदेह नहीं रह गया है। इस समझौते की वजह से अमेरिकी सरकार को अगले दस साल के दौरान अपने खर्चों में 2.4 खरब डॉलर की कटौती करनी पड़ेगी। जाहिरा तौर पर ये कटौतियां आम जनता के लिए होने वाले सामाजिक सुरक्षा और मेडिकल खर्चों में ही की जाएगी। हालांकि कर्ज के संकट का समाधान अमीरों पर टैक्‍स लगाकर भी किया जा सकता था क्‍योंकि अमेरिका की कुल आमदनी का 83 प्रतिशत हिस्‍सा मात्र 20 प्रतिशत लोगों की जेब में जाता है। लेकिन सरकार और विपक्ष ने उस विकल्‍प को नहीं चुना। ऐसी आर्थिक नीतियों का मतलब बहुत साफ है कि मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को 1) टैक्‍स छूट के रास्‍ते अमीरजादों तक पहुंचाना तथा 2) तीसरी दुनिया के देशों पर कब्‍जा जमाने और दुनिया में चौधराहट कायम रखने के लिए सैन्‍य खर्च की भरपाई करना। पिछले तीस सालों के दौरान अमेरिका में इस नीति को बार-बार अपनाया गया है लेकिन वर्ष 2000 से तो लगातार यही नीति लागू हो रही है। अभी चार साल पहले अमेरिकी जनता ने देखा कि किस तरह वहां की सरकार ने उन्‍हीं वित्तीय संस्‍थानों और बैंकों को सैकड़ों-अरबों डॉलर की मदद की जिनकी बेइंतहा मुनाफाखोरी ने आर्थिक मंदी को जन्‍म दिया था। जबकि पूरी दुनिया में उन पर नकेल कसने की आवाज उठी थी। जनता ने यह भी देखा बल्कि आज भी देख रही है कि किस तरह अमेरिका पूरी दुनिया पर अपना सैन्‍य प्रभुत्‍व कायम रखने के लिए इराक, अफगानिस्‍तान, पाकिस्‍तान, मिस्र और लीबिया में खरबों डॉलर लुटा रहा है। यह सारा का सारा धन अमेरिका के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मेहनतकशों के श्रम और उनकी प्राकृतिक संपदाओं की लूट से हासिल किया गया है। इन नीतियों ने अमेरिकी समाज में अमीर-गरीब की खाई को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। अमेरिका में आज काम करने वाली कुल आबादी का 42 प्रतिशत हिस्‍सा बेरोजगार हो चुका है। ये आंकड़ा और भी बढ़ने वाला है। स्थितियां इतनी निराशाजनक हैं कि अमेरिका के भविष्‍य को लेकर कोई भी अच्‍छी उम्‍मीद नहीं बांध पा रहा है। वैश्‍वीकरण के झंडाबरदारों के मुंह से आज सिर्फ विलाप के शब्‍द ही फूट रहे हैं। न्‍यूयार्क टाइम्‍स का थॉमस फ्रीडमैन विलाप करते हुए कहता है ''हमने शीतयुद्ध की समाप्ति को एक ऐसी विजय मान लिया था जो हमारे लिए नई समृद्धि का रास्‍ता खोल देगी। लेकिन हम गलत थे। उसने वास्‍तव में हमारे सामने अब तक की सबसे भीषण चुनौतियां पेश कर दी हैं।'' इसी तरह लंदन का मशहूर अखबार टेलीग्राफ कहता है ''इस बार हम जल्‍दी ही दोबारा मंदी के खतरों से घिर गए हैं। लेकिन इस बार हमारा सहारा बनने वाला कोई नहीं है। चीन अपने सफल घरेलू उत्‍पाद का 200 प्रतिशत कर्ज के रूप में पहले ही झोंक चुका है।''
संकट के कारण:- यूं तो आर्थिक संकट का पूंजीवाद से नाता उसके जन्‍मकाल से ही है। पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था की मूल प्रेरक शक्ति मुनाफा होता है। इसलिए मुनाफे के लिए तीव्र होड़ करना, कुछ लोगों के हाथों पूंजी या संपति का इकट्ठा होते जाना व शेष आबादी का संपतिहीन होते जाना और इस कारण बीच-बीच में आर्थिक मंदी पैदा होते रहना पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था के लिए बड़ी आम सी बात है। लेकिन मौजूदा संकट कोई आम संकट नहीं है। पूंजीवाद का संकट और मुनाफे के लिए होड़ अब एक नई मंजिल तक पहुंच गई है। आज कुछ लोगों के हाथों में पूंजी या संपति इतनी इकट्ठा हो गई है कि उसकी कल्‍पना भी आम आदमी नहीं कर सकता है। इस पूंजी में वित्तीय और सट्टेबाजी की पूंजी की मात्रा सबसे ज्‍यादा है इसलिए मुनाफे के लिए होड़ भी उतनी ही तीखी हो चुकी है। इस होड़ में जो सबसे आगे और सबसे ताकतवर व प्रभावशाली होगा वही सबसे ज्‍यादा मुनाफे का भागीदार होगा। इसी कारण पूंजी को पैदा करने वाले मजदूर और मेहनतकश तबके का शोषण और उसकी तबाही भी उतनी ही तेज हो गई है। इसलिए आज का शासनतंत्र पूरी तरह एक परजीवी तंत्र में तब्‍दील हो चुका है। गरीब देशों की तीव्र लूट के बिना अमेरिकी-यूरोपीय तंत्र आज कायम नहीं रह सकता। ठीक इसी तरह मजदूरों और मेहनतकशों की तीव्र लूट के बिना आज पूंजीपति भी अपनी हैसियत नहीं बनाए रख सकता। भारत में भी इस परिघटना को देखा जा सकता है। उदारीकरण के जिस दौर में यहां पूंजीपतियों की संपतियों में तीन गुना की बढ़ोतरी हुई, उसी दौर में मजदूरों और मेहनतकशों का शोषण भी उसी मात्रा में बढ़ा। यह परजीवी तंत्र ही दुनिया के तमाम संकटों का मूल कारण है और इसका खात्‍मा इसका एकमात्र समाधान है। (मेहनतकश पत्रिका, अंक-५ से साभार. मेहनतकश पढ़ने के लिए के-२१४१, चितरंजन पार्क, नयी दिल्ली, पर संपर्क कर सकते हैं. या ०९३१०८१८७५० पर फोन कर सकते हैं.)

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अरुंधति तुमने चिदंबरम को ऑक्सीजन क्यों दिया?


विश्वदीपक
करीब एक दशक पहले इलाहाबाद के आनंद भवन (जहां हिंदुस्तान के कॉरपोरेट नीति के पैगंबर जवाहर लाल नेहरू पैदा हुए थे जिसका एक छोर अन्ना तक जाता है और दूसरा तुम तक) के सामने फुटपाथ पर लगने वाली किताबों की दुकान पर तुम्हे देखा था… नीली बरसाती के ऊपर धूल से सनी हुई. मटमैली सी. अनेक मोटी-पतली, नई-ताजी, सड़ी-गली किताबों के बीच तुम्हारे चेहरे पर इलाहाबाद युनिवर्सिटी के ग्योथिक स्टाइल में बने बुर्ज की छाया पड़ रही थी. लापरवाही से (बाद में पता चला कि सावधानी पूर्वक) चेहरे की आखिरी सीमा को छूती तुम्हारी लटों में हमने गुस्सा महसूस किया था. लेकिन हमारा मन तुम्हारे दाएं नाक के समानांतर उभरे तिल और पार्ददर्शी आंखों पर अटक गया. तब हम तुम्हारा नाम भी नहीं जानते थे. फ्लैप पलटकर देखा तो पता चला कि तुम ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ की लेखिका अरूंधति हो.तब से लेकर आज तक किसी आयत की तरह तुम हमारी जिंदगी में घुली मिली हो.तुमने लिखा है कि ऐसा कोई दिन नहीं जब तुमने ‘नोम चोम्स्की जिंदाबाद’ (the loneliness of Nom Chomski) न बोला हो. और आज हम तुम्हें ये बता रहे हैं कि हमारी जिंदगी का शायद ही ऐसा कोई पल रहा होगा जब हमने ‘अरुंधति जिंदाबाद’ न गुनगुनाया होगा. बाद में जब हमने तुम्हें दिल्ली में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के दौरान देखा तो समझ आया कि ‘अंधेरे में’ जीने वाले हिंदी के कवि मुक्तिबोध ने ‘संवेदनात्क ज्ञान’ किसे कहा था. तुमने शायद मुक्तिबोध का नाम भी नहीं सुना होगा. लेकिन ये तय है कि ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उन्होंने ये बातें तुम्हारे जैसी किसी अरुंधति को देखकर ही लिखा होगा! अरुंधति, तुम्हारे तर्क हमें सम्मोहन की हद तक ले जाते हैं. अकाट्य. पुख्ता. बेजोड़. दुनिया के अनजान रहस्यों से पर्दा उठाने वाली तुम्हारी नर्म कोमल आवाज, लापरवाह दिखने वाली मासूम मर्मभेदी आंखों की चमक ने हमें ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ (ऐसा अमेरिकी साम्राज्यवाद का मानना है) पर शक करना सिखा दिया, हमें सोचने के लिए मजबूर किया. कॉरपोरेट लूट के प्रति आगाह किया. पर आज… इस देश को वास्तविक गृहयुद्ध में झोंकने वाला (जबकि तुमने आंदोलन पर गृहयुद्ध का आरोप लगाया है) गृहमंत्री जश्न मना रहा होगा. जिसके माथे पर माओवादी प्रवक्ता, आज़ाद की हत्या का दाग़ है. और जिसने पूरे मध्यभारत को नरसंहार की जमीन बना दिया है. और जो पिछले काफी समय से आंतरिक दबाब में घुट रहा था तुमने उसके लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था कर दी है. यह इतिहास का सबसे विचित्र किंतु दुखदायी तालमेल है. एक असंगत त्रासदी. क्या तुम बता सकती हो कि तुमने अपने लेख में इंकलाब जिंदाबाद का जिक्र क्यों नहीं किया? जबकि ये नारा भी लोगों ने प्रमुखता से लगाया है. ये तुम्हारी लापरवाही है या जानबूझकर तुमने इसे ड्रॉप किया है? क्या तुमने भी वामपंथी-प्रगतिशील-क्लब की सदस्यता ले ली है? जिस भारतीय राज्य को तुम ‘बनाना रिपब्लिक’ कहती हो उसके लिए इस नए नवेले मोह का कारण क्या है? (अरूणा रॉय का हश्र हमें मालूम है) किस आधार पर तुमने ये निष्कर्ष निकाल लिया कि अन्ना के आंदोलन में शामिल लोग भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं? क्या तुम्हें माओवादियों और अन्ना के आंदोलन के लक्ष्य का फर्क समझाने की जरूरत है? तुम न सिर्फ माओवादी आंदोलन को रिड्यूस कर रही हो बल्कि उसी सरकारी तर्क को हवा दे रही हो जिसके मुताबिक हर विरोध करने वाले को माओवादी करार दिया जाता है. ताकि उसकी हत्या करने में आसानी हो. गनीमत है कि इस आंदोलन में अब तक कोई हिंसा नहीं हुई है. तुमने इस आंदोलन की नीयत पर ‘कॉरपोरेट भ्रष्टाचार’ को लेकर सवाल उठाया है. क्या तुमसे ये कहने की जरूरत है कि भारतीय राजनीति में संभवत सबसे विनम्र, ईमानदार, प्रधानमंत्री, जो पहले वित्तमंत्री भी रह चुके हैं, की देखरेख में कॉरपोरेट लीडरान को बकायदा लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर संसदीय नेता बनाया गया. चिदंबरम क्या हैं—कॉरपोरेट या नेता? विजय माल्या, नवीन जिंदल? इन्हें किस जातिवाचक संज्ञा के दायरे में रखा जा सकता है? राजनीतिक भ्रष्टाचार और कॉरपोरेट भ्रष्टाचार पानी और शक्कर की तरह आपस में घुल चुके हैं. इन्हें तुम कैसे अलग-अलग इकाई के रूप में देख रही हो यह समझ नहीं आता. हर देश, समाज और यहां तक कि व्यक्ति अपने-अपने तरीके से खुद को अभिव्यक्त करता है. (चीन, रूस, ईरान, दक्षिणी अमेरिकी आंदोलन इसके गवाह हैं. सबके कुछ न कुछ राष्ट्रीय प्रतीक हैं) क्या हिंदुस्तान का झंडा हमेशा ही सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का ही प्रतीक है? पिछले कई दशकों में तुम या तुम्हारे जैसे लोग जनता को दूसरा झंडा क्यों नहीं थमा सके? जब मिस्र में ‘मुस्लिम ब्रदर हुड’ लोकतांत्रिक तानाशाह, होस्नी मुबारक के ख़िलाफ़ आंदोलन का नेतृत्व करता है तो तुम जैसों को प्रगतिशीलता नजर आती है. गोएल गोनिम, सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय निगम, गूगल का कर्मचारी उस आंदोलन का नेतृत्व करता है तब तुम जैसे इंटरनेशनल-हिंदुस्तानी एलीट को दिक्कत नहीं होती. उस वक्त तुम लोगों के दिमाग में कॉरपोरेट नैतिकता का सवाल पैदा नहीं होता. तुमने आंदोलन को एक ‘तमाशा’ बताया है और जनता को “भीड़”. शायद तुम्हारी आंखें तमाशा देखने की आदी हो गई हैं. तब तो तुम ये भी कह सकती हो कि प्रशांत भूषण इस तमाशे के सबसे बड़े रिंग मास्टर हैं. सातारा, झांसी, बगहा, मुजफ्फरपुर, जबलपुर जैसे छोटे कस्बे के लोग जिनकी सम्मिलित कमाई तुम्हारी रॉयल्टी से कम होगी-तमाशा करने निकले हैं? बेशक तुम आंदोलन के इस रूप से असहमत हो सकती हो लेकिन क्या तुमने इस भीड़ के बीच उतरकर इसकी नाड़ी नापने की कोशिश की है? ये उबाल पहले, लोकतंत्राकि फासीवादी व्यव्स्था और उसी कॉरपोरेट लूट के खिलाफ है जिसकी तुम बात करती हो. दूसरे नंबर पर ये जनलोकपाल के साथ है. तुमने अरविंद केजरीवाल को फोर्ड फाउंडेशन से मिलने वाले 4 लाख डॉलर अनुदान की बात की है. हम इसकी आलोचना करते हैं. तुम पर संदेह करें हमारा दिल गवाही नहीं देता. हम फिर अरविंद की आलोचना करते हैं. और उनसे इस बारे में जवाब भी मांगेंगे. लेकिन -क्या तुम बता सकती हो कि दुनिया जिस बुकर पुरस्कार की वजह से तुम्हें जानती है उसको स्पांसर करने वाले ‘द मैन ग्रुप’ की पुरस्कार राशि तुमने इसलिए स्वीकार की क्योंकि ये निगम जनवादी है? सिडनी शांति पुरस्कार के पीछे कौन सा पवित्र कॉरपोरेट हाउस है? तुम्हारी किताबें हार्पर कॉलिन्स और पेंगुइन (दोनों मीडिया मुगल उर्फ मर्डौक की कंपनियां हैं जिनके ख़िलाफ़ अपराध और फर्जीवाड़े के जाने कितने आरोप हैं) से छपती हैं तो क्या हम तुम्हें मोहब्बत करना बंद कर दें. तुम्हारे साथ खड़े होना बंद कर दें? हम एजाज अहमद के उस तर्क को क्यों न स्वीकार कर लें जिसमें उन्होंने कहा था कि तुम्हें बुकर इसलिए दिया गया ताकि हिंदुस्तान के वामपंथी आंदोलन को कमजोर किया जा सके.

(‘The God of Small Things is too much anxiously written, and therefore overwritten…the book panders to the prevailing anti-Communist sentiment which damages it both ideologically and formally…she has neither a feel for Communist politics nor a rudimentary knowledge of it’— Aijaz Ahmed, ‘Reading Arundhati Roy Politically.)

तुमने भारतीय राज्य की दमनकारी ‘नीतियों का विरोध करने और अपनी असहमतियों को पुन: दृढ़ता से कहने के लिए’ (tehelka, jan 2006) में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया. लेकिन उससे पहले जब तुम्हें ‘अहिंसा की वकालत’ के लिए मई 2004 में ‘सिडनी शांति पुरस्कार’ दिया गया तब तुम चुप बैठ गई. पूरे इराक को क्रबगाह बना देने वाले और हमेशा हमेशा के लिए इराक को बंजर-नपुंसक बना देने वाले अमेरिका के छोटे प्यादे, ऑस्ट्रेलिया की नीतियों से तुम्हें दिक्कत नहीं हुई? और आखिर में. तुम जिस जनता को ‘बेवकूफ’ समझती हो. वो दरअसल है नहीं. वो झंडे लहराने से अगर प्रभावित होती तो हिंदुस्तान में कब की वामपंथी क्रांति हो चुकी होती. कब का इंडिया शाइन हो चुका होता. इसी जनता ने इंदिरा से लेकर अटल जैसे नेताओं को खारिज कर दिया है. अगर अरविंद और अन्ना इसके साथ धोखा करेंगे तो ये उन्हें भी खारिज कर देगी. और हां, तुम्हें भी. शायद तुम्हें भी.