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मंगलवार, 13 सितंबर 2011

जीत अन्ना की नहीं, कारपोरेटों की हुई

डा. बनवारी लाल शर्मा
भ्रष्टाचार के खिलाफ असली लड़ाई को मजबूत करने की जरूरत है। चतुर कारपोरेट और उससे नियंत्रित मीडिया ने लड़ाई की दिशा बदल दी है। एक कानून बन जाय तो भ्रष्टाचार मिट जाएगा, ऐसी अवधारणा लोगों के दिमाग में बिठाई जा रही है। यह खतरनाक चाल है कारपोरेटों की, इससे सावधान रहने और असली मोर्चो पर संघर्ष करने की जरूरत है।

इस समय देश में ऐसा माहौल बन गया है मानो भ्रष्टाचार राजनेताओं, नौकरशाहों और न्यायाधीशों में समाया हुआ है। सभी मानते हैं कि इनमें ज्यादातर लोग भ्रष्टाचार में फंसे हैं। पर एक सवाल उठता है ये लोग तो 1991 से पहले भी थे। पहले भी भ्रष्टाचार करते होंगे। हां, करते थे, पर कितना ? 1991 से पहले बड़े-बड़े घोटालों में बोफोर्स का नाम आता है, सेना के लिए जीप खरीद का घोटाला हुआ, मुंदड़ा कांड हुआ, इन सबमें कोई 500 करोड़ रुपयो से ज्यादा गोलमाल नहीं था। इन घोटालों पर खूब हल्ला हुआ था, बोफोर्स घोटाला तो सरकार को ही ले डूबा। 1991 के बाद कितने घोटाले हुए और अभी भी हो रहे हैं और कितनी धनराशि की हेराफेरी उनमें हुई? हर्षद मेहता शेयर घोटाला कांड में 5000 करोड़ रुपयों से लेकर अब तक दर्जनों घोटाले हुए हैं जिनमें सबसे ताजे 2जी स्पैकट्रम घोटाले में 1,72,000 करोड़ की राशि की सरकार को हानि हुई। राष्ट्रकुल खेल घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला तो अभी-अभी हुए हैं। पिछले 20 साल में बड़े बड़े घोटालों की बाढ़ सी आ गयी है। क्या हो गया 1991 के बाद कि राजनेता, नौकरशाह और न्यायाधीश इतने बड़े घोटालों में फंसते गये? जो असली कारण है उसे लगातार छिपाया जाता रहा है और वर्तमान भ्रष्टाचार विरोधी अभियान इण्डिया अगेंस्ट करप्शन में भी छिपाया गया है। असली कारण यह है कि 1991 में डा. मनमोहन सिंह द्वारा विश्व बैंक, मुद्राकोष और गैट के दबाव में बनाई गई नई आर्थिक नीति ने भारत की अर्थव्यवस्था, वित्तीय व्यवस्था, सेवा क्षेत्र और कृषि को बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिया। हर्षद मेहता घोटाले में छह विदेशी बैंकों का हाथ था। डा. मनमोहन सिंह से पूछा गया क्या राय है आपकी इन विदेशी बैंकों के बारे में ? उत्तर मिला- बैंकों में मुझे अभी भी भरोसा है।
यह विश्व स्तर पर सिद्ध हो चुका है कि कारपोरेट और करप्शन (भ्रष्टाचार) समभावी शब्द हैं।
बड़े-बड़े कारपोरेट अर्थव्यवस्था और अन्तत: राजनीति पर (ए राजा को हमने ही संचार मंत्री बनवाया था- रतन टाटा) हावी हो गये है और व्यापक रूप से बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार देश में फैल गया है। यह सारा भ्रष्टाचार कानून सम्मत तरीके से हो रहा है। कारपोरेटी भ्रष्टाचार देश के संसाधनों की भरी लूट के रूप में हो रहा है। सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का अड्डा है कारपोरेटों द्वारा भूमि अधिग्रहण में। देश के किसानों की लाखों एकड़ उर्वरा भूमि सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र), परमाणु ऊर्जा प्लांट, थर्मल प्लांट, छह या आठ लेन वाले राजमार्ग, और रिहायशी कालोनियों के लिए जबरदस्ती ली जा रही है। किसान, आदिवासी उसे रोक रहे हैं और पुलिस की लाठी-गोली खा रहे हैं। दूसरा बड़ा अड्डा है भ्रष्टाचार का खानों में। लोहा, एल्यूमिनियम, कोयला आदि की खानों पर बड़ी कम्पनियों ने लाइसेंस ले लिये हैं। इनमें कितना बड़ा भ्रष्टाचार है, इसका एक उदाहरण कोयला का खनन है। देश में 54 लाख करोड़ रुपये का कोयला जो छह लाख करोड़ रपये की रॉयल्टी लेकर कम्पनियां सरकार से ले रही है। यानी 48 लाख करोड़ रुपये का कोयला कारपोरेट घराने ले जाने की जुगत में हैं। लौह अयस्क, बॉक्साइट, लाइमस्टोन (सीमेंट) में यही कहानी है। उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में दक्षिण कोरिया (असल में अमेरिका) की कम्पनी पोस्को को लोहे का कारखाना और निजी बंदरगाह लगाने का लाइसेंस मिल गया है। 12 अरब डालर की पूंजी यह कम्पनी लगाना चाहती है। 30 साल का इसके साथ ठेका है। हर साल 1.5 अरब डॉलर के मूल्य का कोयला इसे मिलेगा, यानी 8 साल में कम्पनी अपनी पूंजी वापस ले लेगी और अगले 22 साल में 33 अरब डॉलर का लोहा ले जाएगी। इससे बड़ा भ्रष्टाचार क्या हो सकता है। नदियों पर बांध या सुरंग बनाकर बिजली बनाने में भी कंपनियां बड़ा घोटाला कर रही हैं।
भ्रष्टाचार की असली लड़ाई इन अड्डों पर चल रही है। इन लड़ाइयों को मजबूत करने की जरूरत है। पर चतुर कारपोरेट और उससे नियंत्रित मीडिया ने लड़ाई की दिशा बदल दी है। एक कानून बन जाय तो भ्रष्टाचार मिट जायेगा, ऐसी अवधारणा लोगों के दिमाग में बिठायी जा रही है। यह खतरनाक चाल है कारपोरेटों की, इससे सावधान रहने और असली मोर्चो पर संघर्ष करने की जरूरत है। 28 सितम्बर को पूरे देश में अन्ना की जीत की लहर फैल गई। पिछले दिन संसद में अन्ना हजारे की तीन मांगों पर बहस हुई और ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित हो गया। प्रधानमंत्री ने अन्ना को पत्र भेजकर इस बात की सूचना कर दी। इस सूचना को मिलते ही रामलीला मैदान में जुटी जनता खुशी से नाच उठी। टीवी चैनलों ने बढ़-चढ़कर इस जीत की घोषणा की। अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने इस जीत के शीर्षकों से रंग गए। देश के अनेक शहरों-कस्बों में जीत का जश्न मनाया गया मिठाइयां बांटी गई। कहा गया कि आजादी के बाद जीत का इतना विशाल नजारा नहीं देखा गया। वंदे मातरम् के नारों से देशभक्ति का देश में समा बंध गया। इसे जनता की जीत कहा गया। कुछ ऐसा ही जीत का जश्न और देशभक्ति का समां कुछ महीनों पहले बंधा था, जब शहरों के नौजवान रात भर खुशी से नाचते रहे थे। वह मौका था जब भारत की क्रिकेट टीम ने विश्व कप में पहले पाकिस्तान को हराया था, फिर श्रीलंका को हराकर विश्व कप जीता था। अन्ना हजारे ने जिन्हें अब देश के मसीहा के रूप में मीडिया ने पेश किया है, अनशन तोड़ने के बाद आगे के कई कार्यक्रमों की घोषणा की, जिनमें चुनाव सुधार, चुने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने, पर्यावरण को सुधारने, गरीब-अमीर की खाई कम करने, किसानों के मुद्दों को हल करने की बातें शामिल हैं।
देश के हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार है, कहीं भी नियमानुसार, कानूनों के अनुसार काम नही होता। नीचे से ऊपर तक पैसे का चलन है। इससे लोगों के मन में गुस्सा है। इस गुस्से को मँहगाई ने और बढ़ा दिया है। नतीजन, अन्ना के अनशन से लोगों को आशा की किरण दिखी, शायद भ्रष्टाचार दूर हो जाय, इसी आशा में बहुत से लोग सड़क पर निकल आये। भाजपा और उसके सहयोगी संघ परिवार के लोगों ने इस अवसर का राजनैतिक लाभ उठाने के स्पष्ट उद्देश्य से अपनी ताकत भी झोंक दी और जहाँ-तहाँ रैली, जलूस, धरने प्रायोजित कर डाले। किस बात की जीत हुई ? पहली बात तो यह कि यदि गांधीवादी विचार का अनशन था तो इस विचार में हार-जीत नहीं होती। अपनी बात को सामने वाला माने, उसके चित्त में सत्य का दर्शन हो, यही गांधीवादी अनशन, सत्याग्रह का उद्देश्य होता है। सरकार का विचार बदला हो, अन्ना जिस बात का आग्रह कर रहे थे, क्या सरकार और संसद ने उसे माना? अन्ना की मांग थी कि 30 अगस्त तक संसद जनलोकपाल के उनकी टीम द्वारा बनाये गये मसविदे को पारित करे। सरकार उसे स्थायी समिति में भेजना चाहती थी। जिसे अन्ना टीम ने नामंजूर कर दिया और यह भी कह डाला नाम लेकर कि स्थायी समिति में भ्रष्ट लोग बैठे हैं। सरकार के प्रतिनिधियों और अन्ना टीम में बातचीत चलती रही, हर बातचीत के बाद घटिया तरीके से एक पक्ष ने दूसरे पक्ष पर प्रहार किये। अन्त में मराठी अन्ना ने एक मराठी मंत्री के माध्यम से मामला सुलटवाया। जनलोकपाल बिल की तीन मुद्दों पर संसद ने मौखिक प्रस्ताव पास कर दिया और उसे स्थायी समिति के पास भेजने का तय कर दिया। 30 अगस्त की समय सीमा खंडित हुई। स्थायी समिति में जनलोकपाल बिल को ले जाने की बात नहीं बनी फिर किस बात की जीत हुई? वे सार दावे कहां गये कि जब तक जनलोकपाल बिल पास नहीं होगा, यह अनशन नहीं टूटेगा, चाहे जान भले ही चली जाय?
सरकार अपनी बात पर कायम है, कई मसविदे स्थायी समिति के सामने हैं, उन सब पर विचार करके तब कोई अन्तिम प्रारूप संसद में रखा जायेगा। उसमें राहुल गांधी के लोकपाल आयोग का भी मसला आ गया है। जैसे अपने पड़ोसी देश, जो हमारे साथ इतिहास में रहे हैं, उन्हें खेल में हराकर विजय की खुशी मनाना बचकानी हरकत लगी, कुछ वैसा ही दृश्य इस ऐतिहासिक जीत पर भी दिखायी दिया। अन्ना ने घोषणा की थी कि मेरा अनशन तो टूट रहा है, लेकिन धरना चालू रहेगा। कहां चल रहा है धरना ? देश के लोग अपेक्षा कर रहे थे कि इस अभियान में कहीं से तो कारपोरेटों की बात उठेगी। अनशन के दौरान नहीं, तो आगे के कार्यक्रम जो घोषित किये हैं, उसमें भ्रष्टाचार के जनक कारपोरेटों को घेरने का आवाहन किया जायेगा, ऐसी अपेक्षा थी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। दरअसल अन्ना ने देश का ध्यान कारपोरेटों के खिलाफ, उनकी लूट और भयंकर भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा देश के हर प्रदेश में जो जमीनी आन्दोलन चल रहे हैं, उधर से लोगों का ध्यान हटाकर मात्र एक कानून बनाने तक सिमटा दिया। कारपोरेट और उनके कब्जे के मीडिया और छल पूरे अन्ना के अभियान को समर्थन देते रहे और वे लोगों के गुस्से से साफ बच गये। वस्तुत: जीत अन्ना की नहीं, कारपोरेटों की हुई।

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

पैदा हुई जनवादी विकल्प की जरूरत


दिनकर कपूर
अन्ना आन्दोलन की जीत ने देश में काफी समय बाद जनता की प्रभुसत्ता को स्थापित किया है। इस आन्दोलन ने पुनः साबित किया कि सत्ता और सरकार चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो उसे सच और इस सच के साथ खड़ी हुई जनता की भावनाओं के सामने झुकना पडता है। इस आंदोलन ने पिछले बीस वर्षों के आर्थिक सुधार के दौर में देश में पैदा हुई इस निराशा की भावना के कि कुछ नहीं हो सकता, को भी एक हद तक कम करने का काम किया। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स ने लिखा था कि पूंजीवाद विकास के क्रम में मात्र उन हथियारों को ही पैदा नहीं करता, बल्कि उन्हें चलाने वालों को भी पैदा करता है जो उसके विनाश का कारण बनते है। रामलीला मैदान में अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में लगातार पांच दिन रहते हुए मैने खुद करीब से देखा कि जिसे मध्यम वर्ग का आंदोलन कह कर खारिज किया जा रहा है, उसमें और कोई नहीं पिछले 20 वर्षा से मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के बदौलत पैदा हुई मजदूर वर्ग की नयी पीढ़ी रही है। साफ्टवेयर, शापिंग माल्स, पत्रकारिता, सर्विस सेन्टरों, एनजीओं आदि में काम करने वाले ऐसे नौजवान है, जो इस सुधार के बाद दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके में बसने आये और जिन्हें चौतरफा शोषण का शिकार रोज ब रोज की जिन्दगी में होना पडता है। रामलीला मैदान में पश्चिम उ0प्र0, एनसीआर और हरियाणा के उन इलाकों से किसानों की बड़ी जमात आयी जिनकी जमीनें कारर्पोरेट और बडे घरानों के मुनाफे के लिए सरकारों ने धोखा धड़ी कर लूट ली है। वह आदिवासी थे जिन्हे प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए कारपोरेट-सरकार-माफिया गठजोड़ ने बर्बाद कर दिया। वह घरेलू महिलाएं थी जो नित बढ़ती महंगाई के चलते अपनी गृहस्थी के तनाव में तिल-तिल कर घुट रही है। उन छात्र नौजवानों की मौजूदगी थी, जिन्हें पहले पढ़ने के लिए जूझना होता है और फिर पढ़ाई के बाद रोजगार की चिन्ता के साथ जीना पडता है।
आंदोलन शुरू जरूर हुआ भ्रष्टाचार के खिलाफ पर वास्तव में यह केन्द्र बन गया हर उस आक्रोष का जो व्यवस्था के खिलाफ था। इसलिए इस आंदोलन को समझने के लिए जितने पुराने फ्रेमवर्क थे, बुद्धिजीवी थे, तथाकथित आंदोलनकर्ता थे या देष के राजनीतिक दल थे वह असफल साबित हुए। आंदोलन के शुरू से ही बुद्धिजीवीयों का एक बड़ा हिस्सा इसे संविधान व संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने वाला और लोकतंत्र के लिए खतरा बताता रहा। कांग्रेस का समूचा नेतृत्व दिशाविहीन हो इसे पूर्व में हुए रामदेव के आंदोलन की तरह ही कुचलकर खत्म कर देने पर अमादा था। भाजपा इस आंदोलन के प्रति अपने रूख को ही तय नहीं कर पा रही थी। पहले उसने अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ जेल भरों का आव्हान किया पर बाद में उसे वापस ले लिया। यदि आशा कहीं से पैदा हुई तो वामपंथ की तरफ से ही जिसने 70 के दशक में जय प्रकाश आंदोलन के समय की गयी गलती से सबक लेते हुए अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ पूरे देश में लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले को मुद्दा बनाकर विरोध प्रदर्शन किया और 9 पार्टियों के साथ मिलकर २३ अगस्त को देशभर में सरकारी लोकपाल को रद्द करने और नया सशक्त लोकपाल बनाने के लिए अन्ना हजारे के प्रतिनिधियों से तत्काल वार्ता करने की मांग को उठाया। दरअसल इस आंदोलन ने देश के लोकतंत्र की सीमाओं को एक बार फिर उजागर किया है। चाहे हम कितना भी समृद्ध और मजबूत लोकतंत्र के, पूरी दुनिया में सबसे बडे लोकतंत्र होने के कसीदे पढ़े सच तो यह है कि इस देश में न्यूनतम लोकतंत्रिक सुधार भी बडे आंदोलनों के बाद ही सम्भव हो पाते है। इस मामले में भी अन्ना पक्ष की मांग महज इतनी ही थी कि देश में जो कानूनी रास्ते से, नीतियां बनाकर लूट और भ्रष्टाचार किया जा रहा है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय तक ने गहरी चिंता जाहिर की है, उस पर रोक के लिए प्रभावी और सशक्त लोकपाल कानून बनाया जाए। यह मांग 2 जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, केजी बेसिन, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले की पृष्टभूमि में और भी प्रासंगिक हो गयी। कहीं न कहीं देश के जनमानस में यह संदेश था कि सरकार देश की सम्पत्ति की लूट पर प्रभावशाली रोक लगाने से बचने की कोशिश कर रही है। इसीलिए उसने पिछले चालीस साल से भी ज्यादा समय से लोकतांत्रिक सुधार के इस न्यूनतम काम को पूरा करने के बजाए मुहं बचाने के लिए नख दंत विहीन सरकारी लोकपाल को संसद में पेष कर उसे स्थायी समिति के हवाले कर दिया है। संसद सर्वोच्चता की दुहाई देने वालों से कोई पूछे कि यदि संसद और सरकार ने अपने न्यूनतम लोकतंत्रिक सुधार के दायित्व को पूरा किया होता तो क्या अन्ना जैसे किसी भी बुजुर्ग को अनशन पर बैठने की जरूरत पडती। वास्तव में जबसे मनमोहनी सुधार शुरू हुआ है इस देश में जनआंदोलन के दबाव में जो भी जनपक्षधर कानून बने थे या सरकार के सामाजिक दायित्व तय किये गये थे उनसे एक-एक कर हर तरह की सरकारों ने अपने कदम पीछे खीचें और उन्हें पलट देने का ही प्रयास किया। सरकारों ने सचेतन ढ़ग से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की ही को कोशिशें की चाहे वह राज्यों की विधानसभाएं हो या फिर सर्वोच्च संसद। बिना संसद में बहस किए पेट्रोलियम पदार्थो की कीमत बाजार के हवाले कर दी गयी। बजट के बाद भी आए दिन कीमतें बढ़ाकर महंगाई थोपी गयी। सदनों की बहस के स्तर को चैराहे की गप्पबाजी में बदल दिया गया। सत्रों की अवधि घटाकर हर मसले पर होने वाली बहस का दायरा खत्म कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट, कैग, मानवाधिकार आयोग तक को धमकाया गया और महिला आयोग, अनुसूचित जाति- जनजाति आयोग और पिछड़ा वर्ग आयोग तो सरकारों के जेबी संगठन बन गए। सीबीआई जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं का केन्द्र में अपनी सरकार बनाने और बचाने के लिए दुरूपयोग किया गया उ0 प्र0 के एक उदाहरण से हम स्थिति समझ सकते है जहां की दोनो प्रमुख पार्टियां सपा-बसपा के मुखिया आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई की जद में है और जेल जाने से बचने के लिए केन्द्र सरकार की हर मसले में सुर में सुर मिलाते रहते है। यही नहीं इस दौर में देश में जितनी भी लोकतांत्रिक आवाजें उठी उन्हें या तो निर्ममता के साथ कुचल दिया या फिर अनसुना कर दिया गया। देशभर में किसानों, नौजवानों समेत समाज के विभिन्न तबकों के आंदोलनों पर दमन और मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून जैसे काले कानून के खात्में के लिए दस वर्षो से भी ज्यादा समय से अनषनरत इरोम शर्मिला के प्रति भारतीय राजव्यवस्था की अनदेखी
इसके उदाहरण है। इस आंदोलन के प्रति भी भारतीय शासक वर्ग का और उसकी दो प्रतिनिधि पार्टियों कांग्रेस और भाजपा का यही रूख था। हद तो यह हो गयी कि इन दलों ने बजाए इसके कि पिछले 20 वर्षों से जारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के सरकारों द्वारा उडाए जा रहे मजाक और उन्हे बार-बार कमजोर करने की दलों द्वारा की गयी कोशिशों पर आत्माआलोचना करने के, इस बात की समीक्षा करने कि आखिर वह कौनसी कारगुजारियां रही है जिन्होने इतना अविश्वास आमजनमानस के अंदर पैदा कर दिया, इस
आंदोलन का भण्डाफोड करने में और इसे अलगाव में डालने में ही अपनी पूरी ताकत लगा दी। आंदोलन के वक्त दिल्ली में तो आमचर्चा थी कि उन दलित-मुस्लिम-पिछडे़ नेताओं के लिए सरकार ने अटैची खोल दी है जो इस आंदोलन का विरोध कर सकें। एक दलित नेता ने तो बकायदा दिल्ली में इसी पैसे के बदौलत आंदोलन के विरोध में मार्च तक किया। इस आंदोलन के बरखिलाफ संविधान की दुहाई देते हुए डा० अम्बेडकर को खडा करने की कोषिष की। जबकि इतिहास गवाह है कि डा0अम्बेडकर ने खुद मौजूदा संविधान से अपने को अलग कर लिया था। एक मुस्लिम नेता ने आंदोलन के तौर तरीके पर सवाल उठाएं। लेकिन इन तबकों के बीच से पैदा हुयी नयी पीढ़ी ने जो आज मुख्यधारा में रहकर विकास चाहती है इन तमाम प्रयासों को नकार दिया। इतना ही नहीं हमने देखा कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने यूपीए और एनडीए के उन लोगों को आंदोलन के खिलाफ संसद में बोलने के लिए उतारा जो खुद आंदोलन से पैदा हुए है चाहे वह शरद यादव हो या लालू यादव। यह संसद में लोकपाल कानून के जरिए देश में दलित, पिछडा, अल्पसंख्यक कार्ड खेलने में लग गए। हमारे जैसे लोगों को आष्चर्य होता है कि दलित, पिछडा, अल्पसंख्यक के सामाजिक न्याय का नाम लेकर लोकतांत्रिक सुधार के महिला आरक्षण से लेकर लोकपाल के कानूनों को रोकने में शासक वर्ग के औजार बने इन तथाकथित सामाजिक न्याय के मसीहाओं का जलवा पिछडे मुसलमानों को अलग आरक्षण देने, दलित ईसाइयों व मुसलमानों को अनु-जाति का दर्जा देने की संस्तुति करने वाली रंगनाथ मिश्र आयोग की रिर्पोट को लागू कराने व अति पिछडों को पूरे देश में अलग आरक्षण कोटा देने पर क्यों नही दिखाई देता ? जहां-जहां इनकी सरकारें रही है या इस समय है वहां इनका पालन क्यों नहीं हो रहा। सबने देखा कि इस आंदोलन को सहयोग कर रहे हर तरह के लोगों पर हमला किया गया। मीडिया के खिलाफ चिल्ला- चिल्ला कर भाषण देने वालों को समाचार चैनलों में राखी सांवत के नाच और लाफ्टर शो से इतनी बड़ी दिक्कत कभी नहीं हुई जितना कि इस आंदोलन की कवरेज से। ओमपुरी जैसे लोगो पर भाजपा ने शराब पीकर भाषण देने का आरोप लगाया और जिन्हें आज भी आतंकित किया जा रहा है। इतना ही नहीं अग्निवेश जैसो का इस्तेमाल आंदोलन को तोड़ने के लिए किया गया। 'रस्सी जल गयी ऐठन नहीं गयी' की कहावत को चरितार्थ करते हुए अभी भी सरकार का रूख आत्मविश्लेषण का नही अपितु आंदोलन को पुनः अलगाव में डालने का ही है। एक तरफ अन्ना को फूल का गुलदस्ता दिया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ बदले की भावना से कार्य करते हुए उनके सहयोगियों की हर तरह से धेरेबंदी की जा रही है। इस आंदोलन में रहते हुए मैने महसूस किया कि आंदोलन में कहीं भी धर्म, जाति के नाम पर कोई भेदभाव नहीं था। बल्कि गोविन्दाचार्य, चेतन चैहान, सीपी ठाकुर, वरूण गांधी से लेकर तमाम ऐसे नेता थे, जिन्हें आयोजकों ने सचेत ढ़ग से मंच पर बुलवाने से मना कर दिया। बहरहाल हर प्रकार के कुत्सित प्रचार, दमन और अवहेलना के कोशिशों को नकार कर यह आंदोलन सफल हुआ। इस आंदोलन की जो भी कमियां हों उन पर खुले दिल से विचार हो सकता है पर इसने सत्ता से टकराने और जीत जाने की जनाकांक्षाओं को निश्चित रूप से बहुत बढ़ा दिया है। इसको चलाने वालों के ऊपर यह एक बड़ी जबाबदेही है कि वह इन जनाकांक्षाओं को देश में प्रतिरोध की एक बडी शक्ति में तब्दील करें। साथ ही यह भी कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जिन सुधारात्मक सवालों को वह उठा रहे है वह राजनीतिक क्षेत्र में भी उनसे दखल देने की मांग करेगा क्योंकि मौजूदा राजनैतिक परिपाटी इसके खिलाफ है। इस नाते शुरूवात चाहे जहां से आंदोलनकर्ताओं ने की हो उन्हें जनपक्षधर जनवादी राजनीतिक विकल्प का केन्द्र भी बनाना होगा।
(दिनकर कपूर, राष्ट्रीय प्रवक्ता, जन संघर्ष मोर्चा, ई0 डी0 17 डायमण्ड़ डेरी कालोनी, उदयगंज, लखनऊ। मो0 न0 09450153307)