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शनिवार, 18 सितंबर 2010

भगत सिंह होने का मतलब

इरफ़ान हबीब
'मैं घोषणा करता हूं कि मैं आतंकवादी नहीं हूं और अपने क्रांतिकारी जीवन के आरंभिक दिनों को छोड़कर शायद कभी नहीं था। और मैं मानता हूं कि उन तरीकों से हम कुछ हासिल नहीं कर सकते।'
-भगत सिंह
निस्संदेह भगतसिंह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सर्वाधिक प्रसिद्ध शहीदों में से एक रहे हैं। हालांकि अधिकतर उन्हें गोली चलाने वाले युवा राष्ट्रवादी की रोमांटिक छवि से परे नहीं देख पाते। इसका कारण शायद यह है कि उनकी यही छवि औपनिवेशिक दौर के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई। लोग भगतसिंह को एक ऐसे शख्स के रूप में देखते थे,जो अपने हिंसात्मक कारनामों से ब्रिटिश शासन को आतंकित कर देता था। उनकी जबरदस्त हिम्मत ने उन्हें एक प्रतिमान बना दिया। भगतसिंह को आज भी प्यार और श्रद्धा की नजर से देखा जाता है,लेकिन क्या हमें उनकी राजनीति और विचारों के बारे में कुछ पता है?और क्या उनके हिंसा व आतंक में विश्वास के शुरुआती नजरिए के बारे में भी कुछ पता है (जो मौजूदा आतंकवादी हिंसा से एकदम अलग चीज थी),जिसे उन्होंने शीघ्र ही एक ऐसे क्रांतिकारी दृष्टिकोण में बदल लिया जो स्वाधीन भारत को एक धर्मनिरपेक्ष,समाजवादी और समतावादी समाज में बदलने से वास्ता रखता था।
भगत सिंह को जनता की ओर से इस तरह का मुक्त समर्थन क्यों मिला,जबकि उसके पास पहले से ही नायकों की कमी नहीं थी?इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है। जब देश के सबसे बड़े नेताओं का तात्कालिक लक्ष्य स्वतंत्रता प्राप्ति था,उस समय भगत सिंह,जो बमुश्किल अपनी किशोरावस्था से बाहर आये थे,उनके पास इस तात्कालिक लक्ष्य से परे देखने की दूरदृष्टि थी। उनका दृष्टिकोण एक वर्गविहीन समाज की स्थापना का था और उनका अल्पकालिक जीवन इस आदर्श को समर्पित रहा। भगत सिंह और उनके साथी दो मूलभूत मुद्दों को लेकर सजग थे,जो तात्कालिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक थे। पहला,बढ़ती हुई धार्मिक व सांस्कृतिक वैमन्स्यता और दूसरा,समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन। भगत सिंह और उनके कामरेडों ने क्रांतिकारी पार्टी के मुख्य लक्ष्यों में से एक के बतौर समाजवाद को लाने की जरूरत महसूस की। सितंबर 1928 में दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में महत्वपूर्ण क्रांतिकारियों की बैठक में इस पर विचार विमर्श के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) में सोशलिस्ट शब्द जोड़ कर एचएसआरए बना दिया गया। भगत सिंह अपने साथियों को यह समझाने में सक्षम थे कि भारत की मुक्ति सिर्फ राजनीतिक आजादी में नहीं,बल्कि आर्थिक आजादी में है।
समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता 8 अप्रैल 1929 को उनके द्वारा असेंबली में बम फेंकने की कार्रवाई में भी प्रकट हुई। भगतसिंह दरअसल 1920 के दौर में सांप्रदायिकता के बढ़ते खतरे के प्रति सजग हुए। उसी दशक में आरएसएस और तबलीगी जमात का उदय हुआ। उन्होंने सांप्रदायिकतावादी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की नीति पर सवाल किए।
एक राजनीतिक विचारक के रूप में वह तब परिपक्व हुए जब अपनी शहादत से पहले उन्होंने दो साल जेल में रहते हुए गुजारे। उनकी जेल डायरी पूरी स्पष्टता से उनकी राजनीतिक बनावट के विकास को दिखाती है। जेल में ही उन्होंने अपना विख्यात लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं' लिखा। यह लेख तार्किकता की दृढ़ पक्षधरता के साथ अंधविश्वास का पुरजोर खंडन करता है। भगत सिंह मानते थे कि धर्म शोषकों के हाथ का औजार है जिसका इस्तेमाल वे जनता में ईश्वर का भय बनाए रखकर उनका शोषण करने के लिए करते हैं।
एचएसआरए के नेताओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण समय के साथ विकसित हुआ और उनमें से अधिकतर समाजवादी आदर्श या साम्यवाद के करीब आए। वे व्यक्तिगत कार्रवाइयों के बजाय जनांदोलन में भरोसा रखते थे। भगत सिंह उस संघर्ष को लेकर एकदम स्पष्ट राय रखते थे। उन्होंने अपने आखिरी दिनों में कहा था-
‘भारत में यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठी भर शोषक आम जनता के श्रम का शोषण करते रहेंगे। यह कोई मायने नहीं रखता कि ये शोषक खालिस ब्रिटिश हैं, ब्रिटिश व भारतीय दोनों सम्मिलित रूप से हैं या विशुद्ध भारतीय हैं।’
हमें भगतसिंह की जन्मशती के मौके पर उनके द्वारा सोचे गए शासन के वैकल्पिक ढांचे पर रोशनी डालनी चाहिए,जिसमें आतंक या हिंसा नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय सर्वोपरि होगा।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

भगत सिंह- राजगुरु- सुखदेव की याद

Nasiruddin
आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत का दिन है। मुझे नहीं मालूम कि हम में से कितने लोगों को यह दिन याद रहता है। लेकिन इनकी शहादत को याद रखना मेरे लिए काफी अहम है। मैं भूलना भी चाहूँ तो शायद मुमकिन नहीं। इसीलिए महीनों से ब्‍लॉग की दुनिया से दूर रहने के बावजूद मैं यह पोस्‍ट करने पर मजबूर हो रहा हूँ।
तेइस साल। यही उम्र थी भगत सिंह की जब उन्‍हें फाँसी दी गई। मैं तो तेइस साल में कुछ नहीं कर पाया। भगत सिंह के बारे में आप जितना ही पढ़ते जाएँगे, आप अपने होने पर सवाल खड़े करने लगेंगे। आपको लगेगा कि क्‍या वाकई में हम एक ऐसे नौजवान के वारिस हैं, जिसने इतनी कच्‍ची उम्र में इतने पक्‍के खयालात बनाए। देश-दुनिया के बारे में इतना पढ़ गया, जितना हममें से कई दश्‍कों में नहीं पढ़ पाते। इतना कह और सोच गया कि लाख छिपाने पर उसके विचार छिप न सके।
यह कहना की भगत सिंह महान थे, जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है उस राह पर चलना जिस पर भगत सिंह ने हँसते-हँसते जान न्‍यौछावर कर दिया। यह काम कोई सिरफिरा या पागल नहीं कर सकता था। यह काम वही कर सकता था, जिसे अपने मकसद के बारे में जरा भी गलतफहमी नहीं थी।
जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो अक्‍सर ऐसे टीचर और नेताओं से मुलाकात होती, जो हमें तो भगत सिंह के विचारों से प्रेरित होने और उनके रास्‍ते पर चलने की सलाह देते। लेकिन अपने बेटे- बेटियों से हमेशा यह राह छिपा कर रखा करते। अगर किसी का बेटा या बेटी भटकता हुआ उधर गुजरने की कोशिश करता तो उसे यह समझाकर वापस लौटा लाते कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं। (भौतिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हुई हैं।) ‘यानी भगत सिंह बहुत महान। बहुत अच्‍छे। लेकिन भगत सिंह मेरे घर में नहीं बल्कि पड़ोसी के घर पैदा लें।‘ यही आज के मध्‍यवर्ग का मानस भी है। आज इसी मानस का फैलाव दूर-दूर तक है। इसलिए भगत‍ सिंह की वीरता के गान हम भले ही आज जितना गा लें। उनके विचार से दो चार होने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते क्‍योंकि विचार बड़े बदलाव की ओर ले जाते हैं। बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती।