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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

ये जो जल रहा है दंदाकरान्य के जंगलों में
चन्द्रिका, दण्डकारण्य के गाँवों से लौटकर (तहलका के अप्रैल अंक में प्रकाशित रिपोर्ट)
उन दिनों मिस्र के लोगों के चेहरों पर गुलाबी खुशियां थी और लीबिया से बारूद की महक दुनिया के हर देश तक पहुंच रही थी. हमारा पूरा देश बैट और बल्लों के खेल में अपना स्वाभिमान जगा रहा था. देश भक्ति के मायने थे कि हर जीत के बाद जश्न मनाओ और उस हुजूम में शामिल हो जाओ. देश के अधिकांश बुद्धिजीवी लोकतंत्र की दुहाई देते हुए भारत में तहरीर चौक बनने की किसी भी संभावना से इनकार कर रहे थे और कर रहे हैं. जब उनके घरों में आग लगाई गई और उन्हें तबाह कर दिया गया. जब उन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश में आग की लपटों के बीच अपने घरों के जलाये जाने का बस कारण पूछ रही थी. उस ६ साल की बच्ची को पीटा गया जो इतने सारे घरों को पहली बार एक साथ जलता हुआ देख कर रोने की जुर्रत कर रही थी. शायद यह रुदन की भाषा में घरों को जलाए जाने का प्रतिकार रहा होगा या फिर कोई सवाल. शायद बच्चों को यह तजुर्बा नहीं होता कि उन्हें कहाँ नहीं रोना चाहिए, उन्हें सैन्य बलों के साथ सुलूक का तजुर्बा भी नहीं होता. एक बच्चे की आखों में २०७ घरों को जलाए जाने की दहशत शायद ही समा पाए. छत्तीसगढ़ के दान्तेवाड़ा जिले की दहशतगर्दी में बच्चों को रोने के लिये सैन्य बलों और सलवा-जुडुम की इजाजत चाहिए. समय के साथ वे सबकुछ सीख रहे हैं. लड़ना और पीड़ाओं से उबरना, जलना और राख की ढेर पर फिर से निर्मित हो जाना. आदिवासियों के ये गाँव पिछले कुछ सालों से सैन्य बलों के लिए बरसात के कुकुरमुत्ते हो गये हैं जो राख की ढेर पर उग आते हैं और सलवा-जुडुम के बूटों तले कुचल दिए जाते हैं. २००५ से एक अंतहीन सा सिलसिला जिसमे तकरीबन ६०० गाँव अब तक उजड़ चुके हैं. इनकी जिंदगियां इतनी मामूली हो चुकी हैं कि इक्का-दुक्का हत्यायें और मौतें रोज-बरोज के जिंदगी का हिस्सा सी बन गयी हैं. इन पर कोई नहीं रोता, इनके लिए आंसू चुक से गये हैं..

दान्तेवाड़ा जिले में कोया कमांडो (सलवा-जुडुम के कार्यकर्ताओं) द्वारा जलाये गये ३ गाँव जंगलों से उठकर अखबारों के पन्नों के मोटे शब्द बन गये, ये गाँव छत्तीसगढ़ की विधानसभा में विपक्ष का मुद्दा बन गये और विधान सभा कई दिनों तक ठप्प पड़ गयी. मोरपल्ली, तीपापुरम और ताड़मेटला कोया कमांडो और सैन्य बलों के संयुक्त आगजनी के अभियान में ११ मार्च १४ मार्च और १६ मार्च को तबाह कर दिए गए. इस दौरान और इसके बाद भी इन इलाकों की नाकेबंदी कर दी गयी. सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों तक के जाने पर रोक लगा दी गयी. लगातार माओवादियों के साथ मुठभेढ़ की भ्रामक खबर फैलाई जाती रही ताकि इस तबाही को अंजाम दिया जा सके और आग बुझने व राख उड़ने के साथ वह सब कुछ दफ्न हो जाए जो उत्पात के तौर पर यहाँ किया गया.

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कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ हम किसी तरह इन गाँवों तक पहुंचने में सफल हुए. तब स्वामी अग्निवेश के रोके जाने और उन पर हमले किए जाने की खबरे लगातार आ रही थी, हमारे मोबाइल के मैसेज बाक्स में. बाद में उन्हें दलील दी गयी कि जंगल में भारी मुठभेड़ चल रही है लिहाजा किसी के भी जाने पर मनाही है. जंगल के रास्तों से पूरे एक दिन चलते हुए दूसरी सुबह हम उस गाँव तक पहुंच पाए थे जहाँ सबसे ज्यादा घरों को जलाया गया था, यह था तारमेटला. इस पूरे एक दिन और एक रात हमारे पास कोई खबर नहीं पहुंची. अलबत्ता जंगलों के बीच एक गाँव में जहाँ हम रुके वहाँ रेडियो के जरिये हमे पता चला कि स्वामी अग्निवेश और कई पत्रकारों के ऊपर अंडे फेंके गए और उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया गया. जंगल के इन इलाकों में रेडियो के अलावा संचार का कोई स्रोत नहीं था. एकतरफा संचार, जो आपको खबरें दे सकता है आपकी खबर नहीं ले सकता, जो अपने रोमांटिक गीतों के बीच उनके रुदन के स्वरों को दबा देता है. दिल्ली से लेकर दुनिया भर की तमाम खबरों से ये आदिवासी इसी रेडियो के जरिये भिज्ञ थे और दिल्ली से लेकर दुनिया भर के तमाम लोग अपनी तमाम तकनीकों के साथ इनकी खबरों से अनभिज्ञ. इन इलाकों में सब कुछ एकतरफा ही था, सुरक्षा भी जो सरकार ने भारी सैन्य बलों की तैनाती के साथ दे रखी थी. अब हम उन असुरक्षित गाँवों से होकर गुजर रहे थे जिसे प्रधानमंत्री देश के सबसे बड़े खतरे के रूप में इंगित करते हैं. ये माओवादियों की जनताना सरकार के गाँव थे. जिसे गाँव के लोग इस रूप में सुरक्षित मान रहे थे कि दुश्मन यानि कि सैन्य बल यहाँ कभी नहीं आ सकते. माओवादी यहाँ १९८० में पहली बार आये थे, शायद १९४७ से १९८० का लम्बा समय यहाँ के आदिवासियों ने भारतीय राज्य के आश और इंतज़ार में गुज़ारे थे.


जंगल की अंधेरी रातों के बीच गाँव होने का मतलब था, किसी सोलर लाइट की रोशनी, किसी बकरी की मिमियाहट, किसी मुर्गे के पंखों की फड़फड़ाहट. हम अपने रास्ते के दौरान कई गाँवों में रुके जो गोंडी आदिवासियों के मुरिया, कोया, राऊत समुदाय के गाँव होते थे. गाँव के किसी कोने पर खड़े होकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता कि गाँव में कितने घर हैं. वे खूबसूरत ऊची तिकोनी झोपडियों के बने होते और उनकी दीवालें लकड़ियों से बनाई हुई होती. घर काफी दूर-दूर तक बिखरे हुए होते और हर गाँव के अंत में प्रायः किसी माओवादी नेता या माओवादी सदस्य की शहादत के स्तूपम बने होते. लाल रंगों के स्तूपम, जिनमे शहीद होने वाले व्यक्तियों के नाम और उनके लिये सलाम के नारे होते. एक गाँव से गुजरते हुए हमने देखा कि माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो चेराकुरी राजकुमार आज़ाद का एक बड़ा स्तूपम बनाया गया था जिसे गाँव वालों ने मिलकर अभी हाल में ही तैयार किया था और उसके आसपास निर्माण प्रक्रिया के दौरान प्रयोग की गयी लकड़ियां अभी भी बिखरी हुई थी. उन्हें एक आदर्श नेता के रूप में सम्बोधित करते हुए लाल सलाम के नारे लिखे गये थे. आदिवासियों के इन गाँवों में यह एक परम्परा सी बन गयी है जिसमे गाँव के लोग शहादत के स्तूपम बनाते हैं और उसे संरक्षित भी करते है.

इन रास्तों से गुजरते हुए हमने कई कहानियां सुनी, वे कहानियाँ जो वर्षों पहले बीत चुकी हैं, कुछ अफसोसों के साथ. वो कहानियां जिनमे गांव लुटने के बाद फिर संवर चुके हैं, कहानियां जिनमे हत्याओं की दहशत और पीड़ा लोगों के चेहरे से उतर चुकी है और वे कहानिया भी जो कुछ बुजुर्गों की आंखों में अब भी बची हुई हैं, किसी पुरानी शिकार यात्रा की याद की तरह. कुंजाम बुधरी के पास बीते पैसठ सालों के किस्से हैं पर हमारे पास वक्त ही नहीं. देवा अपने २५ साल के नौजवान बेटे की हत्या को आधा ही बता पाते हैं....बाकी में खामोशी है. सोड़ी दीपक को अपनी उम्र का पता नहीं वे खुद को आपके सामने पेश करते हैं और कहते हैं आप खुद ही देख लो. गाँव के बच्चे आपको अचकचाई नजरों से देख रहे होते हैं और आपके तौर तरीकों पर हस रहे होते हैं.

उस सुबह हम ताड़मेटला गाँव में थे जहाँ बस घरों के दीवालों की मौजूदगी थी और आगजनी के कारण उन पर कालिख लिपट गयी थी. यह गोंडी आदिवासियों के मुरिया समुदाय का गाँव है. सोड़ी भीमा अपने जले हुए घर की लकड़ियां इकट्ठा कर रहे थे. हमे देखकर वे थोड़ी देर ठिठक गये, चुप रहे और फिर से अपने काम में जुट गये. हमने उनसे बात करने का प्रयास किया और वे अपने जले हुए घर की तरफ इशार करते हुए गोंडी मे देर तक कुछ बोलते रहे. उन्होंने हमे इशारा करते हुए घर के अंदर बुलाया, अंदर का मतलब उन जली हुई लकड़ियों और राख के ढेरों से था जिनके चारो तरफ दीवालों के महज निशान ही बचे हुए थे. जहाँ कुछ जले हुए बर्तन थे जो आधे पिघल से गये थे. एक टूटी हुई सायकिल उतनी ही बची थी जितना उसमे जलने के बाद बच जाना चाहिए. सोड़ी भीमा की आवाज कभी तेज तो कभी धीमी हो जाती जैसे उनकी आंखों की त्योरियों में कुछ उबल सा रहा हो. कोई आदमी पाकृतिक आपदाओं से मानसिक तौर पर शायद जल्दी उबर जाता हो पर मानवीय उपद्रव, सरकार की संरक्षण में किया गया उपद्रव, शायद उसमे बदले की भावना ही पैदा करता है. वे गुस्से में लगातार बोलते रहे. पास में खड़े एक व्यक्ति ने हमे हिन्दी में बताने का प्रयास किया भीमा कह रहे थे कि उनका पूरा साल भर का अनाज यहाँ रखा था जो जल गया. वे बता रहे थे कि १६ तारीख की सुबह जब लोग अपने घरों को बुहार रहे थे, जब लोग महुआ बीनने की तैयारी में थे और कुछ तो अभी सोकर उठे भी नहीं थे, ३०० की संख्या में सी.आर.पी.एफ. और कोया कमांडो आये. पहले उन्होंने हवा में फायरिंग की लोग डर के मारे अपने घरों से भागे और वे एक-एक कर गाँव के घरों को जलाते रहे. उन्होंने मेरा भी घर जला दिया आखिर हमारे गाँव वालों ने कोया कमांडो का क्या बिगाड़ा था.


माड़वी जोगी की आंखों में आंसू थे और कुछ भी बोलते हुए उनके होठ कंप रहे थे जैसे वो कोई इल्जाम कुबूल कर रही हो. शायद घरों को जलाने का कारण पूछना ही उनका इल्जाम था. उनके चेहरे पर घाव के निशान कुछ दिन पुराने और बासी से हो गये थे और पूरा चेहरा दर्द से फूल गया था. उनसे बात करते हुए ऐसा लगा जैसे हम फिर से उनके घावों को कुरेद रहे हो और हम ना को जानने के लिये शायद ऐसा कर भी रहे थे. यह उनके घर जलाने और पैसे लूटे जाने के मनाही का अंजाम था. जब घरों को जलाया जाने लगा तो वे जंगल में भागने के बजाय आगजनी का प्रतिकार करने लगी. पहले उन्हें बंदूक के बाटम से पीटा गया, उन्हें धक्के देकर जमीन पर गिरा दिया गया और फिर.....फिर वे चुप हो गई. वह बताने में माड़वी जोगी अक्षम हो गयी जो उनके साथ हुआ था. बाकी की कहानी किसी और को ही बतानी पड़ी कि कैसे उन्हें बगल के झाड़ी में ऊपर की तरफ ले जाया गया और बलात्कार किया गया. कुछ घटनाओं के एहसास एक शब्द में अपनी अहमियत नहीं दे पाते. बीतते दिनों के साथ वे चेहरे पर भी कमजोर से पड़ जाते हैं. एक शब्द को कहते हुए साहस चुक सा जाता है, यह भाषा की नाइंसाफी होती है जो तमाम पीड़ाओं की बयानगी को एक साथ तो रख देती है पर उन तकलीफों को कहीं कमजोर सा बनाती हुई. कई घंटों तक वे वहाँ बेसुध पड़ी रही. पूरे गाँव का हर सख्श अपने ही घर की तबाही से बदहवास और हैरान था बाद में लक्के जो माड़वी जोगी की बहन थी उसने उसे कपड़ा पहनाया और वहाँ से लेकर आयी. अभी तक माड़वी जोगी को न तो कोई चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध हो पायी है और न ही किसी तरह की रिपोर्ट दर्ज की गयी.

इस गाँव से माड़वी आयता और माड़वी अंदा दो लोगों को सैन्य बल साथ लेकर गये तब से अब तक उनका कोई पता नहीं चला है. ९०० की आबादी वाले इस गाँव में कुल १५० के आसपास ही लोग हमे दिख रहे थे बाकी जंगलों में इधर-उधर चले गये हैं. शायद वे अब तक लौट आये हों या शायद न लौटने का इरादा बना लिया हो. ताड़मेटला गाँव में सरकारी राहत के तौर पर कुछ चावल भेज दिया गया है. इस चावल के सहारे इन आदिवासियों को अपनी भूख मिटानी है, अपना क्रोध मिटाना है और भुलाना है अपना पूरा का पूरा दर्द भी. ६ साल की बच्ची मड़वी भीमे तक को पीटा गया हम गाँव में उसकी तलाश कर रहे थे पर वह नहीं मिल सकी. लोगों ने बताया कि उसे सिर्फ इसलिए पीटा गया कि वह अकेली घर के बाहर खड़ी होकर रो रही थी. इसके पहले भी सलवा-जुडुम द्वारा २००९ में ताड़मेटला के कुछ घरों में आग लगाई जा चुकी है. कुछ लोग फिर से अपने घरों को बनाने के बारे में सोच रहे हैं और कुछ जिंदा रहने के लिए भूख की जरूरतों के बारे में. गाँव के बीचोबीच गाँव वालों के सहयोग से माओवादियों ने एक तालाब बनवाया है और सरकार ने इनकी झोपड़ियों के लिये आग, आखिर इन्हें किधर कूदना चाहिये. सोड़ी भीमा, गोंचे भीमा, मिड़ियम आयता, ताती अड़मा, एलमा देवा, लेकम उंगा ये सब इमली के एक पेड़ के नीचे इकट्ठा होकर शायद ऐसा ही कुछ सोच रहे थे. एस.डी.एम. आकर जा चुके हैं उन्होंने लिस्ट बनाने को कहा है और यह भी कि वे नुकसान की पूरी भरपाई करेंगे. भरपाई पीड़ाओं की, दुखों की, त्रासदी की तरह बीत रहे समय की और उसकी भी जो माड़वी जोगी के साथ हुआ.

मोरपल्ली गाँव के ३३ घरों को ११ मार्च को ही जला दिया गया. इन तीन गाँवों को जलाने की शुरुआत इसी गाँव से हुई. गाँवों

में लगाई गयी आग और जले हुए घरों की शक्ल के अलावा भी इसकी कुछ अलग कहानी है. ११ मार्च की सुबह पहले इस गाँव को लूटा गया. आदिवासी समाज में लुटने के लिये बत्तखे होती हैं, बकरियाँ होती हैं और मुर्गे इसके अलावा थोड़े बहुत पैसे जिसे वे अपने साथ ही लेकर चलते हैं. यह लूट कर जब सलवा-जुडुम (कोया कमांडो) के लोग जा रहे थे तो गाँव से १ किमी. की दूरी पर माओवादियों ने इस लूट के विरुद्ध उन पर हमला कर दिया. गाँव के लोगों ने बताया कि इस कुछ घंटे की कार्यवाही के दौरान ३ कोया कमांडो मारे गये और ९ धायल हुए. इस घटना में सुदर्शन नाम से एक माओवादी की भी मौत हुई और दो माओवादी जिसमे एक महिला भी शामिल है घायल हुए. तेरह मार्च के अखबारों में ३२ माओवादियों के मारे जाने की यही खबर थी. एक माओवादी के मारे जाने को ३२ की संख्या बताई गयी. गाँव के लोगों का कहना था कि मारे गये कोया कमांडो में एक महत्वपूर्ण लीडर भी मारा गया, इसके बाद लगातार इन गाँवों पर हमले किए गये. ३२ माओवादियों के मारे जाने की खबर और लगातार चल रही मुठभेढ़ की भ्रामकता ने इस इलाके की नाकेबंदी करने में मदद की ताकि गाँवों में आगजनी और तबाही को अंजाम दिया जा सके. चिंतलनार के निकट पोलमपल्ली गाँव में लगातार हवाई फायरिंग की जाती रही ताकि यह दर्शाया जा सके कि मुठभेड़ चल रही है और पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इस बिना पर रोक दिया गया यहाँ तक कि स्थानीय प्रशासन को भी. किसी भी तरह की राहत सामाग्री नहीं पहुंचाई जा सकी. यह बताया गया कि माओवादियों ने आगे के रास्तों पर बम बिछा रखा है. मोरपल्ली में एमला गुडे और माडवी गुडे के साथ बलात्कार किया गया. माड़वी सुले जो आगजनी के भय से भागकर एक इमली के पेड़ पर चढ़ गये थे उन्हें पेड़ पर ही गोली मार दी गयी. अंदाजा लगाया जा सकता है एक चिड़िया के शिकार की तरह रहा होगा यह वाकिया. इसके पहले २००७ में मोरपल्ली के ५० से अधिक घरों को सलवा-जुडुम द्वारा जलाया गया था और अब जबकि गाँव के लोग फिर से जीने की मूलभूत जरूरतों को जुटा चुके थे और जुटा रहे थे इन्हें सलवा-जुडुम की तबाही का एक और मंजर देखना पड़ा. एलमा गुडे की उम्र तीस साल है. जब उनको पकड़ कर उनके साथ बलात्कार किया गया तो वे महुवा बीन कर लौट रही थी. माड़वी लके को उनके पिता माड़वी जोगा और भाई माड़वी भीमा के साथ चिंतलनार स्टेशन ले जाया गया. इसका महज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब लके के साथ बलात्कार किया जा रहा था तो बगल की कोठरी में भाई और पिता उसकी चीखने की आवाजें सुन रहे थे, बेबस और निःशब्द होकर या शायद भय और विभत्सता में उन्होंने इन चीखती आवाजों को मंजूर कर लिया हो. दूसरी सुबह लके को निरवस्त्र अवस्था में ही पिता और भाई के हाथ सौप दिया गया. जहाँ से गांव तक वह उसी स्थिति में आने को मजबूर थी. गाँव के लोग हमे आगजनी करने वाले लोगों के नाम गिना रहे थे और उनके गाँव भी. दण्डकारन्य के इस इलाके में दूर-दूर तक फैले आदिवासी गाँवों में सब एक दूसरे को जानते हैं. इन गाँवों तक पहुंचने का कोई एक रास्ता नहीं होता, दिशाएं होती हैं और सूखी हुई पत्तियों के नीचे एक लकीर जिनके सहारे जंगल की झाड़ियां और छोटे पहाड़ों को पार करते हुए दूसरे गाँव तक पहुंचा जा सकता है. यह एक कठिन डगर है किसी बाहरी व्यक्ति के पहुंचने पर ग्राम कमेटी के लोग उसकी तफ्सीस करते हैं और लगातार संदिग्ध निगाहों से उसे परखते हैं. रात के वक्त कुछ टार्चें आपके नजदीक आती हैं, अपने कंधों पर रेडियो टांगे एक बच्चे को गोंद में उठाये और वे आपसे वाकिफ होते हैं. दरअसल यह माओवादियों की इंटेलीजेंसिया है जो बच्चे के रूप में, किसी बूढ़े के रूप में या फिर किसी नवजवान के रूप में आपसे मुलाकात करती है. गाँवों में घूमते हुए हमने माओवादियों के वे पर्चे भी प्राप्त किये जिसमे इस घटना की निंदा की गयी थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से इसे उजागर करने की अपील की गयी थी. तीन गाँवों का जिक्र करते हुए वह चौथा गाँव छूट जाता है जहाँ से बाड़से भीमा को लाकर तीमापुरम में १३ मार्च को काट दिया गया था. उन्हें पुल्लमपाड़ से लाया गया था. मोरपल्ली में आगजनी के वे चश्मदीद गवाह थे और सलवा-जुडुम के पूरी तरह से खिलाफ. लिहाजा उन्हें सिर्फ जिंदगी से ही हाथ नहीं धोना पड़ा बल्कि उनके अंगों को विभत्स तरीके से काटा गया. बाड़से भीमा की हत्या के पहले ही गाँव के लोग घर छोड़कर भाग गये और ३३ घरों को कोया कमांडो ने आग के हवाले कर दिया. मिसमा गाँव के करतम दुला, चरकाम गाँव के वंजम देवा, जगन्ना गुड़ा गाँव से रमेश और न जाने कितने नामों को गाँव वाले बता रहे थे, ये उनके नाम थे जो आगजनी करने में शामिल थे. तारमेटला के अलावा मोरपल्ली और तीमापुरम में अभी तक कोई राहत सामाग्री सरकार द्वारा नहीं पहुंचाई जा सकी. गाँव के लोगों ने बताया कि माओवादियों की जनताना सरकार की तरफ से हर घर को १००० रूपए और कुछ अनाज तेल दिया गया है जिसके सहारे वे पेड़ों के नीचे अपना पेट भरते हुए, अपने जले हुए घरों को फिर से ठीक करने को सोच रहे हैं.

जब राज्य अपनी बनायी हुई संस्थाओं यहाँ तक कि सर्वोच्च संस्थाओं से मुंह मोड़ ले, उसके आदेशों की अवहेलना करे तो शायद लोगों के बीच उसकी वैधता खो ही जानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों सलवा-जुडुम को बंद
करने का आदेश दिया पर वह जारी है. सर्वोच्च न्यायालय ने सैन्य बलों के कैम्प के रूप में प्रयुक्त किए जा रहे स्कूलों को खाली करने का आदेश दिया उसे अभी तक लागू नही किया गया. माओवादियों के उन्मूलन के लिए ९० के दशक से अब तक कई प्रयोग किए जा चुके हैं जो विफल रहे हैं. जन जागरण के नाम पर, शांति अभियानों के नाम पर. पुलिस यहाँ स्कूल अध्यापक बन कर आती, माओवादी दलम की शक्ल में वह घूमती और आदिवासियों के साथ जमीन पर बैठकर माओवादियों जैसा व्यवहार करती. पर यह सब, कुछ दिन ही चल सका बाद में गाँव वालों द्वारा उन्हें पहचान लिया गया और पुलिस को वहाँ से भागना पड़ा. दण्डकारन्य एक नाटक के मंच सा हो गया जहाँ सबकुछ वास्तविक रूप में खेला जा रहा है. हत्या के बाद वहाँ कोई पात्र उठकर अपने कपड़े नहीं बदलता, घटनाओं की जगह और शक्ल बदल जाती है हर बार वे और बढ़ जाती हैं. एक कहानी जो लंबे समय से किसी खेल की तरह आदिवासियों के साथ खेली जा रही है. साल, दिन और मौसम बदल रहे हैं, जिंदगियां यहाँ ठहर सी गयी हैं, पुरानी दहशतों को याद करती हुई और नये दहशतों के इंतजार में.
सम्पर्क- 9890987458, mail- chandrika.media@gmail.com

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

नेपाली माओवाद और भारत नेपाल संबंधों पर अमलेंदु उपाध्याय की आनंद स्वरुप वर्मा से बातचीत


आनन्द स्वरूप वर्मा देश के जाने माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। संभवत:नेपाल की राजनीति और खासतौर पर वहां की माओवादी राजनीति पर भारत में उनसे ज्यादा गहराई के साथ कम ही लोग जानते हैं। अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाने वाले वर्मा जी जब रौ में बोलते हैं तो इतना सच कि जुबां कड़वी हो जाए। जाहिर है सच कड़वा ही होता है। छपास डॉट कॉम के राजनीतिक संपादक अमलेन्दु उपाध्याय ने उनसे नेपाली माओवाद और भारत नेपाल संबंधों पर लम्बी बातचीत की। साभार प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-
आपकी फिल्म 'फ्लेम्स ऑफ स्नोÓ पर सेंसर बोर्ड ने पाबंदी क्यों लगा दी?सेंसर बोर्ड का कहना है कि इस देश में अभी जो माओवादी आन्दोलन है, उसका जो विस्तार हुआ है उसे देखते हुए हम इस फिल्म पर रोक लगा रहे हैं। लेकिन हमारा कहना है कि इस फिल्म में भारत के माओवादी आन्दोलन के विषय में एक शब्द भी नहीं कहा गया है, कोई फुटेज भी नहीं है कोई स्टिल भी नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर नेपाल के आन्दोलन पर, केवल माओवादी आन्दोलन पर नहीं बल्कि वहां के समग्र आन्दोलन पर कोई फिल्म बनाई जा रही है तो उसको यह बहाना देकर रोकना एकदम अनुचित है। क्योंकि यह फिल्म माओवादी आंदोलन के ऊपर नहीं है बल्कि उसके ऊपर केन्द्रित है। क्योंकि इस फिल्म की शुरूआत होती है जब पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल की स्थापना की थी यानि दो सौ ढाई सौ साल के दौरान जो आन्दोलन हुए उनकी झलक देते हुए यह माओवादी आन्दोलन पर केन्द्रित हो जाती है। क्योंकि यह मुख्य आन्दोलन था जिसने वहां राजशाही को समाप्त किया। अब अगर आप यह कहते हैं कि इस फिल्म से यहां के माओवादियों को प्रेरणा मिलेगी तो किसी एक जनतांत्रिक देश में इस तरह की बात कहकर किसी फिल्म को रोकना अनुचित है। तब तो अगर नेपाल के आन्दोलन पर कोई पुस्तक लिखी जाएगी तो भी प्रेरणा मिलेगी? यह स्थिति तो बिल्कुल जो हमारा फन्डामेन्टल राइट यानि अभिव्यक्ति की आजादी है उसका गला घोंटना है।
क्या भारत का माओवाद और नेपाल का माओवाद अलग-अलग है?मेरे विचार में हर देश का माओवाद अलग-अलग होता है। क्योंकि जितने भी विचारक रहे हैं मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओत्से तुंग या आज के दौर में प्रचण्ड, सबका यही कहना है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद जो एक सिद्धान्त है, उसको आप अपने देश की सांस्कृतिक, भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप लागू कीजिए। हर देश की राजनीतिक सामाजिक पृष्ठभूमि अलग होती है। नेपाल में राजतंत्र था और वहां एक जबर्दस्त सामंती राजनैतिक व्यवस्था थी। उसमें उन्होंने वहां किस परिस्थिति में माओवाद को लागू किया यह उनका मामला है। भारत के माओवाद और नेपाल के माओवाद में बहुत फर्क है। क्योंकि उन्होंने तो चुनाव में भी हिस्सा लिया और सरकार बनाई। जबकि भारत में अभी ऐसी स्थिति नहीं है। दोनों स्थितियों में फर्क तो काफी है। लेकिन नेपाल के माओवादी आन्दोलन से भारत के माओवादी आन्दोलन को प्रेरणा लेने का सवाल है, जैसा कि सेंसर बोर्ड कहता है तो वह यह भी प्रेरणा ले सकते हैं कि किस तरह कोई आन्दोलन आम जनता के बीच न केवल आदिवासियों के बीच पॉपुलर हो सकता है, मध्यवर्ग को भी प्रभावित कर सकता है, मध्यवर्ग को भी अपने दायरे में ले सकता है और वह एक निरंकुश व्यवस्था के खिलाफ सफल हो सकता है। तो दोनों में फर्क तो है। अब भारत में जो लोग हैं जो सत्ता में बैठे हैं जो सेंसर बोर्ड देख रहे हैं उनकी अकल इतनी नहीं है कि इतना विश्लेषण कर सकें।
क्या आपको लगता है कि भारत की सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था माओवादियों के खिलाफ हो चुकी है?
भारत के माओवादियों के?
नहीं यह तो एक दूसरा सवाल हो गया क्योंकि इसका मुझसे कोई मतलब नहीं है। ( हंसते हुए) अगर आप हमसे भारत के माओवादी आन्दोलन पर बातचीत करना चाहते हैं तो एक अलग बात है। हमसे तो नेपाल पर ही बात करें।
चलिए नेपाल पर ही केन्द्रित होते हैं। अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि नेपाल के माओवादियों से भारत के माओवादियों को समर्थन और मदद मिलती रही है और नेपाली माओवादियों का रुख हमेशा से भारत विरोधी रहा है। क्या नेपाली माओवादी वास्तव में भारत विरोधी हैं?
इसके लिए तो आपको यह देखना होगा कि भारत के माओवादियों की केन्द्रीय समिति और उनके बड़े नेता गणपति के हस्ताक्षर से अब से एक डेढ़ साल पहले खुली चि_ी नेपाल के माओवादियों को लिखी गई जिसमें नेपाली माओवादी आन्दोलन की तीखी आलोचना की गई। इस पत्र में यह आलोचना की गई कि नेपाली माओवादी क्रांति का रास्ता छोड़ करके संशोधानवादी हो गए। यह तो दोनों के संबंधों की बात है। जहां तक नेपाल के माओवादियों से मदद मिलते रहने की बात है तो वह इस स्थिति में कभी नहीं रहे कि भारत जैसे किसी विशाल देश के किसी संगठन को मदद कर सकें। अगर आप दोनों देशों के एरिया और आबादी की और रिसोर्सेस से तुलना करें तो देखेंगे कि वह भारत के मुकाबले कहीं ठहरते ही नहीं हैं। ऐसे में वह अपने को संभालेंगे कि भारत के माओवादियों की मदद करेंगे। इसलिए कोई भौतिक मदद या इस तरह की मदद की बात नहीं है लेकिन बिरादराना संबंध वह मानते हैं। वह तो भारत के माओवादियों के साथ, पेरू के माओवादियों के साथ, कोलंबिया के माओवादियों के साथ, हर देश के माओवादियों के साथ एक बिरादराना संबंध मानते हैं। वैसे ही भारत के माओवादियों के साथ मानते हैं। इससे ज्यादा उनका कोई लेना देना नहीं है।
लेकिन प्रचण्ड प्रधानमंत्री बनते ही पहले चीन गए जबकि परंपरा रही है कि नेपाल का राजनेता पहले भारत आता है। वैसे भी हम नेपाल के ज्यादा नजदीक हैं, क्योंकि हमारे सदियों पुराने संबंधा नेपाल से हैं। इस कदम से नहीं लगा कि प्रचण्ड के मन में भारत के प्रति कोई गांठ है?
देखिए यह कौन सी परंपरा है कि कोई प्रधानमंत्री जो बनेगा वह पहले भारत आएगा? भारत कोई मंदिर है जो वहां जाएगा और मत्था टेकेगा? जहां तक मेरा सवाल है मैं इस परंपरा के एकदम खिलाफ हूं। दूसरी बात किन परिस्थितियों में प्रचण्ड भारत न आकर चीन गए उसे देखना पड़ेगा। किसी भी विषय पर बात करते समय उस पूरी प्रक्रिया को देख लीजिए न कि केवल परिणिति। केवल परिणिति को देखने पर सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेंगे। वह पूरी प्रक्रिया क्या थी मैं आपको थोड़ा संक्षेप में बता दूं। वहां पर बीजिंग में ओलंपिक खेल चल रहे थे चीन में। खेलों के उद्धाटन के समय चीन ने वहां के राष्ट्रपति को निमंत्रण दिया। रामबरन यादव को, जो नेपाली कांग्रेस के हैं। वह जब निमंत्रण मिला तो भारत के नेपाल में राजदूत राकेश सूद ने राष्ट्रपति से कहा कि आप चीन मत जाइए, इससे भारत को अच्छा नहीं लगेगा। तो राष्ट्रपति ने कहा कि हम नहीं जाएंगे। अब केवल बात राष्ट्रपति और राकेश सूद के बीच की होती तो यह किसी भी तरह स्वीकार्य हो सकती थी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह भी स्वीकार्य नहीं है। लेकिन डिप्लोमैटिक रूप से एकबारगी यह स्वीकार्य हो सकता है। लेकिन राकेश सूद ने यह जानकारी प्रेस को दी कि हमने मना कर दिया और राष्ट्रपति नहीं गए। अब नेपाल की आम जनता को यह बात बहुत अच्छी नहीं लगी कि हमारे राष्ट्रपति को एक, मतलब राष्ट्रपति तो बहुत बड़ा पद है न, राष्ट्रपति को एक ब्यूरोक्रेट भारत का मना कर दे और वह मान जाए। जब समापन समारोह के लिए, तब यह प्रचण्ड प्रधानमंत्री नहीं बने थे, 15 अगस्त 2008 को बने हैं, और उनको जाना था 16 या 17 अगस्त को, इनको भी निमंत्रण मिला समापन समारोह के लिए और प्रचण्ड ने स्वीकृति दे दी थी। राकेश सूद ने उन्हें भी मना किया कि आप मत जाइए। तब प्रचण्ड ने कहा कि मैंने स्वीकृति दे दी है तो फिर सूद ने कहा कि आप मत जाइए भारत को अच्छा नहीं लगेगा। उन्होंने कहा मैं क्यों नहीं जाऊं जब मैंने स्वीकृति दे दी है मैं जाऊंगा। और वह चले गए। मान लीजिए कि प्रचण्ड उस समय नहीं जाते और राकेश सूद इस बात को भी प्रेस में देता ही कि हमने मना किया तो एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति और प्रधाानमंत्री को भारत का राजदूत मना कर दे कि आप यह न करें वह न करो, यह उचित नहीं है। इसलिए अपनी देश की जनता की भावनाओं को देखते हुए प्रचण्ड के लिए चीन जाना जरूरी हो गया था। अगर राकेश सूद ने यह गड़बडिय़ां नहीं की होतीं तो शायद वह इसको एवायड भी कर सकते थे। इसलिए इस घटना का विश्लेषण पूरी परिस्थिति देखकर ही करना चाहिए। हालांकि प्रचण्ड ने भी इसके बाद जो कहा मैं उससे भी बहुत सहमत नहीं हूं कि 'मेरी पहली राजनीतिक यात्रा तो भारत की ही होगी। क्या जरूरत थी यह भी कहने की। नेपाल एक संप्रभु राष्ट्र है वह भारत का कोई सूबा नहीं है कोई प्रॉविंस नहीं है कोई प्रांत नहीं है।
देखने में आ रहा है कि माओवादियों का आन्दोलन नेपाल में भी कुछ कमजोर पड़ता जा रहा है और आम जनता पर उनकी पकड़ कुछ ढीली पड़ती जा रही है। क्या कारण हैं कि माओवादी कमजोर पड़ रहे हैं?यह कहने का आधार कोई है?
जी बिल्कुल। अभी उन्होंने हड़ताल का आह्वान किया और लोगों ने सड़को पर उतरकर उसका विरोधा किया तो उन्हें हड़ताल वापस लेनी पड़ी?
नहीं। एक मई को जो हड़ताल का आह्वान किया था, वह आप नेपाल के किसी भी सोर्स से पता कर लीजिए अखबार से, जो बुर्जुआ अखबार हैं उनसे मालूम कीजिए वह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। रहा सवाल यह हड़ताल वापस लेने का तो वैसे भी उस को चार पांच दिन से अधिक नहीं चलाते क्योंकि उससे वहां की आम जनता को काफी दिक्कतें उठानी पड़तीं। लेकिन एक चीज का ध्यान दीजिए कि राजतंत्र समाप्त तो हो गया, भौतिक रूप से समाप्त हो गया। लेकिन अभी तमाम राजावादी तत्व सभी पार्टियों में मौजूद हैं। सामन्तवाद वहां अभी मौजूद है, वह तो समाप्त नहीं हुआ है। तो बहुत सारे ऐसे तत्व हैं जो इस समय अपने को माओवादियों के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान माओवाद विरोधी ताकतों को नजदीक आने का एक अच्छा मौका मिला है। इसमें बहुत सारी अन्तर्राष्ट्रीय ताकतें जिसमें अमेरिका और स्वयं भारत भी शामिल है, इन्होंने माओवाद के खिलाफ तत्वों की मदद की है। निश्चित रूप से जो खबरें आई हैं वह सही हैं कि कुछ प्रदर्शन हुए हैं काठमांडू में लेकिन काठमांडू और शहर तो कभी भी माओवादियों के आधार नहीं रहे उनका आधार तो ग्रामीण इलाका है। काठमांडू में जरूर इस तरह के तत्व हैं लेकिन केवल इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि उनकी पकड़ कमजोर पड़ गई है। क्योंकि जिस दिन माओवादियों की पकड़ कमजोर पड़ जाएगी उन्हें नष्ट करने में एक मिनट का भी समय वह ताकतें नहीं लगाएंगी जो उनकी विरोधी हैं।
प्रचण्ड ने बीच में एक बार आरोप लगाया था कि उनकी सरकार गिराने में विदेशी ताकतों का हाथ था और खासतौर पर उन्होंने भारत की तरफ इशारा किया था और आपने सुना भी होगा कि योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया था कि राजतंत्र की बहाली के लिए वह नेपाल जाएंगे, बाबा रामदेव भी वहां गए और आरएसएस के प्रचारक इन्द्रेश जी के भी नेपाल में पड़े रहने की खबरें आई थीं। तो क्या आपको लगता है कि भारत की दक्षिणपंथी ताकतें माओवादियों के खिलाफ नेपाल में काम कर रही हैं?
जी हां, प्रचण्ड ने केवल संकेत ही नहीं दिया था बल्कि उन्होंने खुलकर कहा था कि भारत ने उनकी सरकार गिराने में पूरी मदद की थी। और उसकी वजह थी कि सेनाध्यक्ष रुकमांगद कटवाल वाला प्रकरण। कटवाल को जब प्रचण्ड ने बर्खास्त किया तो तीन-तीन बार कटवाल ने प्रधानमंत्री के आदेशों की अवहेलना की थी। इसलिए जरूरी हो गया था उन्हें बर्खास्त करना। उस समय भी राकेश सूद ने प्रचण्ड से कहा था कि अगर आप कटवाल को बर्खास्त करेंगे तो इसके बहुत गम्भीर परिणाम होंगे। अपमानजनक शब्दावली प्रयोग की थी हमारे राजदूत ने। इस राजदूत ने तो ठेका ले रखा है नेपाल की जनता को भारत विरोधी बनाने का। जबकि हम लोग लगातार यह प्रयास करते हैं कि दोनों देशों की जनता के बीच एक सद्भाव बना रहे। लेकिन राकेश सूद की वजह से यह सद्भाव बहुत समय तक बना नहीं रह पाएगा। इसके बाद प्रचण्ड ने कटवाल को बर्खास्त किया। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वह सेनाधयक्ष को बर्खास्त कर सके। उन्होंने बर्खास्त किया और राष्ट्रपति ने उन्हें बहाल कर दिया। उन राजनीतिक दलों ने खासतौर पर नेकपा एमाले जो वहां की प्रमुख राजनीतिक दल है उसके अधयक्ष झलनाथ खनाल ने, जिनकी पार्टी सरकार में शामिल थी, वायदा किया कि कटवाल की बर्खास्तगी का वह समर्थन करेंगे। लेकिन जब प्रचण्ड ने बर्खास्त किया तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। यह प्रचण्ड का मानना है और वहां की जनता का मानना है कि नेकपा एमाले ने जो समर्थन वापिस लिया वह भारत के इशारे पर वापिस लिया। अब यह बात सही है या गलत मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। लेकिन आम नेपाली जनता के अन्दर धारणा यही है, राकेश सूद की हरकतों की वजह से, कि भारत ने ही प्रचण्ड की सरकार गिराने में मदद की। और यही बात प्रचण्ड ने भी कही है। तो एक बात तो है कि भारत की भूमिका इस समय अच्छी नहीं रही। जिस समय नवंबर 2005 में बारह सूत्रीय समझौता हुआ था उसके बाद से भारत की बहुत अच्छी गुडविल बन गई थी नेपाल में। और नेपाली जनता भारत सरकार के प्रति सकारात्मक रुख अख्तियार कर रही थी। लेकिन कटवाल प्रसंग के बाद से लगातार एक के बाद एक कई घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं जिनसे नेपाली जनता को लग रहा है कि भारत उसके हितों के खिलाफ काम कर रहा है। हाल के ही अखबार उठाकर देखिए, कांतिपुर और काठमांडू पोस्ट जो वहां के दो बड़े अखबार हैं, और यह माओवादी अखबार नहीं हैं। बाकायदा अखबार हैं जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया है या इंडियन एक्सप्रेस है, इनके प्रिन्ट के कोटा को अ_ाइस दिन से यहां रोक रखा है कलकत्ता बंदरगाह पर भारत सरकार के अधिकारियों ने। महज इसलिए कि इस अखबार ने लगातार यह लिखा कि मौजूदा परिस्थिति में माधाव नेपाल को इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि एक आम सहमति की सरकार बन सके। माधाव नेपाल की सरकार को चूंकि भारत सरकार समर्थन कर रही है इसलिए इनको यह चीज नागवार लगी। इतना ही नहीं राकेश सूद ने वहां के उद्योगपतियों को जो भारतीय उद्योगपति हैं, बुलाकर कहा कि आप लोग कांतिपुर को, काठमांडू पोस्ट को और कांतिपुर टेलीविजन को विज्ञापन देना बन्द कर दें। तो यह सारी चीजें जो हो रही हैं वह दोनों देशों की जनता के संबंधों को बहुत खराब करेंगी। मेरी चिन्ता यह है और अगर दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण होते हैं तो उससे नेपाल का नुकसान तो होगा ही क्योंकि वह छोटा देश है लेकिन भारत का भी कोई बहुत भला नहीं होने जा रहा है।
अगर प्रचण्ड यह समझ लेते कि कटवाल को बर्खास्त करने से भारत की तरफ से इस तरह का हस्तक्षेप हो सकता है तो क्या स्थिति थोड़ी सुधार सकती थी?
नहीं प्रचण्ड को तो यह मालूम पड़ गया था कि अगर हम कटवाल को बर्खास्त करेंगे तो ऐसा होगा क्योंकि उन्हें बहुत खुलकर धामकी दी थी राकेश सूद ने और शायद इस धामकी के जवाब में ही उन्हें कटवाल को बर्खास्त करना और ज्यादा जरूरी हो गया था। क्योंकि अतीत में भारत सरकार के राजदूतों के या भारत सरकार के ब्यूरोक्रेट्स की यह आदत पड़ गई थी कि वह नेपाल के प्रधानमंत्रियों को कुछ भी कह कर अपनी मनमर्जी करवाते थे। कम से कम प्रचण्ड के साथ यह बात नहीं है। उन्होंने कभी यह नहीं कहा, देखिए अगर आज नेपाल के अन्दर साक्षात् माओत्से-तुंग भी शासन करने आ जाएं तो भारत के साथ किसी तरह की दुश्मनी एफोर्ड नहीं कर सकते। इसको प्रचण्ड अच्छी तरह जानते हैं कि भारत से नेपाल तीन तरफ से घिरा हुआ है, यूं कहिए इण्डिया लॉक्ड कंट्री है। ठीक है। भारत से यह नाराजगी मोल लेंगे तो भारत उनकी जनता को कितना कष्ट पहुंचाएगा? तो अगर कोई पार्टी या कोई पार्टी का राजनेता जो सचमुच जनता के हितों की परवाह करता होगा, मैं यह मानता हूं कि माओवादी जनता की हितों की ज्यादा परवाह करते हैं और पार्टियों के मुकाबले, तो वह कभी नहीं चाहेगा कि भारत के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधा हों, और प्रचण्ड ने कई मौकों पर यह कहा है कि हमारे पड़ोसी दो जरूर हैं चीन और भारत। हम राजनीतिक तौर से एक समान इक्वल डिस्टेंस रखेंगे दोनों से। लेकिन भारत के साथ हमारे जो संबंध हैं, सांस्कृतिक संबंध, भौगोलिक संबंध, इनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती चीन से। हमारे और भारत के बीच में रोटी और बेटी का संबंध है, यह शब्द प्रचण्ड ने इस्तेमाल किए थे। तो जब पूरा कल्चरली एक है, दोनों की खुली सीमा है। बिहार का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुले रूप से नेपाल आता जाता है। तो ऐसी स्थिति में प्रचण्ड खुद ऐसा नहीं चाहेंगे कि भारत के साथ हमारे संबंधा कटु हों। लेकिन उसके साथ-साथ एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते प्रचण्ड यह जरूर चाहेंगे कि भारत हमारी संप्रभुता का सम्मान करे। छोटे देश और बड़े देश में आकार तो हो सकता है कि अलगृअलग हों लेकिन कहीं यह नहीं होता है कि छोटे देश की संप्रभुता छोटी हो और बड़े देश की संप्रभुता बड़ी हो। अगर
ऐसा होता तो इंग्लैण्ड की संप्रभुता तो बड़ी छोटी होती, जो ढाई सौ तीन सौ साल तक भारत पर शासन कर सकी। इसलिए संप्रभुता छोटी बड़ी नहीं होती है देश का आकार छोटा बड़ा होता है। इस बात को भारत का ब्यूरोक्रेट नहीं समझता है। इसलिए जरूरत यह है रूलिंग क्लास के माइंड सेट को बदलने की।
एक आरोप यह लगता रहा है कि जैसा आपने भी कहा कि यहां का जो रूलिंग क्लास ब्यूरोक्रेट है, यह भारत की विदेश नीति के साथ हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ करता रहता है। कहीं न कहीं इसके पीछे इस वर्ग के अपने कुछ निहित स्वार्थ होते हैं या कुछ और इंट्रैस्ट होते हैं? क्या यह आरोप सही है?देखिए प्रमाण तो कोई नहीं हैं। लेकिन निश्चित तौर पर आखिर क्या वजह है कि किसी भी पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंधा अच्छे नहीं हैं। कुछ चीजें तो हैं जो हमारे वश में नहीं हैं। भौगोलिक सीमा, ठीक है भारत एक बड़ा देश है, उसके लिए हम कुछ नहीं कर सकते। बड़े देश का एरोगेन्स तो हम रोक सकते हैं न! तो यह जो प्रॉब्लम है। भूटान के राजतंत्र को हम लगातार समर्थन देते रहे हैं। आप समर्थन दीजिए लेकिन किसकी कॉस्ट पर? वहां की जनता जो रिफ्यूजी बना दी गई जनतंत्र की मांग करने पर! यह हमारी नीति है। और हम दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र हैं और हम दुनिया के सबसे सड़े गले राजतंत्र को समर्थन देते रहे आम जनता के साथ धोखा करके। तो यह बड़ी शर्मनाक स्थिति है और यह हमारी विदेश नीति की असफलता है कि आज सारे पड़ोसी देश हमसे खतरा महसूस करते हैं। बजाय इसके कि अगर आप एक बड़े भाई की तरह रहते या जुड़वां भाई की तरह रहते तो वह चीज नहीं है।

सोमवार, 28 जून 2010

हम माओवादियों पर लिखेंगे मिस्टर सी !

Saturday, 15 May 2010 18:39 अजय प्रकाश

गौर से देखिये मिस्टर सी : यह बंदूकों वाले बच्चे कभी बीजापुर ब्लाक के आश्रम में पढ़ने वाले छात्र थे. माओवादियों पर सरकारी कार्रवाई की बौद्धिक स्वीकृति लेने जेएनयू गये चिदंबरम को 5 मई की रात काफी तेज झटका लगा जब छात्रों ने सरकार विरोधी नारे लगाये और भाषण देकर जाते गृहमंत्री की सफेद गाड़ी पर काला झंडा फेंक असहमति को तिखाई से स्पष्ट कर दिया। सफेदी पहनने-ओढ़ने के आदी हमारे गृहमंत्री काले झंडे को देख ऐसे खुन्नस में आये कि अगले ही दिन आव देखा न ताव, देश के सजग नागरिकों पर आतंकी कानून लागू किये जाने का फतवा सुना दिया। गृह मंत्रालय से जारी बयान में कहा गया कि ‘बहुतेरे ऐसे बुद्धिजीवी,एनजीओ या संगठन हैं जो माओवादियों के सीधे प्रचारतंत्र का काम कर रहे हैं। वैसे लोगों और संस्थानों के खिलाफ आतंकवादी संगठनों के खिलाफ बनाये गये ‘आतंकवाद निरोधक गतिविधि कानून (यूएपीए 1967)’के तहत दस साल की कैद और आर्थिक दंड की सजा हो सकती है।’
इस कानून का प्रोमो करते हुए कर्नाटक पुलिस ने कन्नड़ अखबार ‘प्रजा वाणी’ में काम करने वाले राहुल बेलागली को एक माओवादी नेता के साक्षात्कार लिये जाने के अपराध में आरोपित किया है। शिमोगा जिले की पुलिस बेलागली को धमका रही है कि अगर उन्होंने स्रोत का खुलासा नहीं किया तो उनके खिलाफ यूएपीए के तहत कार्यवाही की जायेगी। पुलिस ने बेलागली के अलावा अखबार के एसोसिएट संपादक पदमराज को भी नोटिस जारी कर कहा है कि ‘अगर पुलिसिया जांच में सहयोग नहीं दिया तो इंडियन आम्र्स एक्ट,राष्ट्रीय संपंत्ति की क्षति समेत यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज किया जायेगा।’
बहरहाल, यह तो प्रोमो के दौरान का क्लाइमेक्स भर है। नहीं तो माओवाद प्रभावित राज्यों में लंबे समय से यही हालात बने हुए हैं। ऐसे राज्यों में वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, डॉक्टरों, ट्रेड यूनियन नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से लेकर जिला बदर किये जाने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है। इससे जाहिर होता है कि सरकार बिना बोले ही संविधान के उन तमाम बुनियादी सिद्धांतों को लंगोटी बना चुकी है जो हमारे अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए भारतीय कानून संहिता के उपबंधों में दर्ज हैं। इसलिए सरकार का नया शिकार क्षेत्र मेट्रो शहर हैं,जहां माओवाद का कोई असर तो नहीं है,मगर उसे जानने-समझने वालों की एक तादाद है। इस दृष्टि से गृह मंत्रालय का यह हालिया बयान एकदम से कहीं दूसरी ओर इशारा करता है जिसका अंदाजा लगाने में हम चूक रहे हैं।
इसे साजिश न कहा जाये तो और क्या है कि जाने-माने पत्रकार और पीयूडीआर से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा का नाम पहले दिल्ली से गिरफ्तार माओवादी नेता की चार्जशीट में दाखिल किया जाता है,फिर गृह मंत्रालय खबर देता है कि माओवादी क्षेत्रों में प्रसिद्ध विदेशी पत्रकार जॉन म्रिडल के साथ 15दिनी दौरे पर बस्तर के रास्ते दंतेवाड़ा के जंगलों में गये गौतम नवलखा एक पत्रकार की हैसियत से नहीं,बल्कि विदेशी पत्रकार के कूरियर के तौर पर गये थे। अगर सरकार साबित करने में सफल होती है कि गौतम कूरियर बनकर गये थे,तो उन पर उसी आतंकी कानूनी दायरे में कार्यवाही होगी जो पोटा को हटाये जाने के बाद यूपीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बनाया था। दूसरी घटना लेखिका अरूंधति राय को लेकर हुई। आतंकवाद के खिलाफ छत्तीसगढ़ राज्य के बनाये गये कानून ‘छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम’के तहत राज्य ने प्रायोजित ढंग से छत्तीसगढ़ में अरूंधति पर मुकदमा दायर कराया। इसकी प्रतिक्रिया में अरूंधति ने कहा कि ‘वे हमें गिरफ्तार कर सकते हैं,लेकिन मैं देश छोड़कर नहीं जाऊंगी।’
जाहिर है सरकार की इन गीदड़ भभकियों का न सिर्फ अरूंधति,बल्कि माओवादियों को लेकर सरकार की सैन्य और रणनीतिक गलतियों पर बिना रुके लगातार लिखने वालों पर कोई असर नहीं होना है। लेकिन हमारी चिंता पत्रकारिता के व्यावसायिक दायरे पर चिदंबरम के सीधे शुरू किये गये निर्देशों को लेकर है। पत्रकारिता के व्यावसायिक मानदंडों को तार-तार करने वाली पुलिसिया दबिश का लगातार बढ़ता यह तरीका साफ कर देता है कि गृह मंत्रालय अब हमें एक व्यावसायिक पत्रकार भी नहीं बने रहने देना चाहता, जो कि चैथे स्तंभ का बुनियादी मूल्य है। बेलागली का ताजा मामला समझने के लिए काफी है कि इन प्रत्यक्ष-परोक्ष धमकियों के जरिये हमें भविष्य में मजबूर किया जायेगा कि माओवाद को लेकर गृह मंत्रालय से जारी सरकारी विज्ञप्तियों और बयानों से लेकर मंत्रालय के बाबुओं और अधिकारियों की कानाफूसी को ही हम पत्रकारिता मानें।
वैसे तो पहले से ही जनविरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों-लेखकों को पुलिस और खुफिया ने रडार पर लगा रखा है। मगर मुंह पर जाबी लगाने की हिदायत देता यह बयान तो अब उस व्यापक मीडिया दायरे को अपने चपेट में लेने की फिराक में है,जो सिर्फ अपनी रोटी के लिए खबरों को हासिल करता है। कौन नहीं जानता कि जो भी पत्रकार जिस पार्टी या मसले को कवर करता है वह उससे जुड़े लोगों से बेहतरीन खबरें पाने की चाह में (जो मूलतः व्यावसायिक तरीका है), थोड़ा नजदीक होता है। क्या चिदंबरम यह नहीं जानते कि जिस पार्टी से वह ताल्लुक रखते हैं, वहां जाने वाले कई पत्रकार आज कांग्रेस के नेता हो गये। इससे बड़ी तादात ऐसे पत्रकारों की है जो अघोषित कांग्रेसी हैं। कांग्रेस से उन पत्रकारों का रिश्ता बड़ा साफ है कि उसको माहौल बनाने के लिए अपने पत्रकार चाहिए और उन पत्रकारों को अपने संस्थान में जमे रहने के लिए मालिक और संपादक की निगाह में जरूरत।
माओवाद से जुड़े मुद्दों पर लिखने वाले ज्यादातर पत्रकारों का भी यही रवैया और नजरिया है। दूसरी तरफ मैं यह भी मानता हूं समाज में जो कुछ भी घट रहा है उसके बारे में लिखने, सोचने और करने के बारे में पत्रकार खुद ही सोचता है,जो उसकी वैयक्तिक आजादी भी है। रही बात लिखने और छपने के दौरान उसके माओवाद के प्रति झुकाव, लगाव या जुड़ाव की तो अगर उसे प्रतिबंधित करने की कोई सोच चिदंबरम रखते हैं तो इस मुगालते से बाहर आ जायें। फिर भी अगर सरकार इस मसले पर धमकियों, गिरफ्तारियों, फॉलोअप आदि के रास्ते डंडे के जोर पर निपट लेने के मूड में है, तो करके देख ले।
चिदंबरम साहब आपको बता दें कि हम इस देश की आजीवन जनता हैं और आप पांच साल के मंत्री। हमारे साहस और आपकी ताकत में यही बुनियादी फर्क है। आपको ताकत कॉरपोरेट घराने देते हैं और हमें साहस संघर्षों की उस लंबी परंपरा से मिलती है जहां अन्याय के खिलाफ विद्रोह न्यायसंगत है,का इस्तेमाल मुहावरे जैसा होता है। हमारे बाबा सुनाया करते थे-‘अपराधी से बड़ा गुनहगार अपराध देखने वाला,उससे बड़ा गुनहगार देखकर नजरें हटा लेने वाला और सबसे बड़ा गुनहगार देखकर चुप्पी साध लेने वाला होता है।’ गृहमंत्री, आप चुप्पी साधने के लिए कह रहे हैं जो हो नहीं सकता।
आपको पता नहीं, तब मैं दसवीं का छात्र था जब बाबरी मस्जिद ढहने के जश्न की खुशी को अपने गांव में देखा। पूरा गांव अयोध्या की मस्जिद से उखाड़कर लायी गयी एक ईंट के पीछे पागल हुआ जा रहा था और मैं कुछ न कर सका। उसके बाद जब विश्वविद्यालय आया तो गोधरा-गुजरात होते सुना और नहीं सह पाने की स्थिति में उन खबरों से नजरें हटा लीं। दसवीं में पूरी एक इमारत ढही,विश्वविद्यालय के दौरान पूरा एक समुदाय छिन्न-भिन्न हुआ और अब जबकि मैं समाज को समझने लगा हूं तो आप पूरा एक देश तबाह करने पर आमादा हैं और चाहते हैं कि हम बोलें भी नहीं। यह कैसे संभव हैं!
इससे भी महत्वपूर्ण यह कि आज आप मंत्री बने हैं, कल पता नहीं आपका क्या होगा। लेकिन संघर्षों की कथाएं सुनाने वाले, जीवन में यह बातें लागू कराने वाले लोग तो हमारे घर, स्कूल और समाज के हैं जहां मैंने उंगली थामकर ककहरा सीखा है और आपकी भी जमीन वहीं से देखी है। सच बताऊ गृहमंत्री, हम इन सब जीवन मूल्यों को अगर आपके बूटों-संगिनों के डर से छोड़ भी दें, तो भी नहीं जी पायेंगे। हम जिस समाज में रहते हैं वह इतनी समस्याओं और मजबूरियों से त्रस्त है कि हम किसी एक ऐसे व्यक्ति की बात मान ही नहीं सकते जिसे एक लोकसभा क्षेत्र जीतने के लिए दो बार गणना करानी पड़ती है और तबाही का फैसला देने में चंद सेकेंड।
लेखक अजय प्रकाश हिंदी ब्लाग जनज्वार के माडरेटर हैं.

ंदण्डकारण्य से लौटकर :अरुंधती राय

दंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केंद्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।
दंतेवाड़ा में पुलिस सादे कपड़े पहनती है और बागी पहनते हैं वर्दी। जेल अधीक्षक जेल में है, और कैदी आजाद (दो साल पहले शहर की पुरानी जेल से करीब 300 कैदी भाग निकले थे)। जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है, वे पुलिस हिरासत में हैं। बलात्कारी बाजार में खड़े भाषण दे रहे हैं।
इंद्रावती नदी के किनारे का इलाका माओवादियों द्वारा नियंत्रित है। पुलिस इस इलाके को ‘पाकिस्तान’ कहती है। यहां गांव खाली हैं, लेकिन जंगल लोगों से अटे पड़े हैं। जिन बच्चों को स्कूलों में होना चाहिए था, वे जंगलों में भागे फिर रहे हैं। जंगल के खूबसूरत गांवों में कंक्रीट की बनी स्कूली इमारतें या तो उड़ा दी गयी हैं और उनका मलबा बचा हुआ है, या फिर इनमें पुलिस वाले भरे हुए हैं। इस जंगल में जो युद्ध करवट ले रहा है, भारत सरकार को उस पर गर्व भी है और कुछ संकोच भी। ऑपरेशन ग्रीनहंट भारत के गृहमंत्री (और इस युद्ध के सीईओ) पी चिदंबरम के लिए अगर गर्वोक्ति है, तो एक इनकार भी। वह कहते हैं कि ऐसा कोई युद्ध नहीं चल रहा, यह सिर्फ मीडिया द्वारा गढ़ा गया है। और इसके बावजूद ढेर सारा पैसा इस युद्ध में झोंका जा रहा है, दसियों हजार सैन्य टुकड़ियों को तैनात कर दिया गया है। भले ही, युद्ध भूमि मध्य भारत के जंगल हैं तो क्या हुआ, इसके गंभीर नतीजे हम सभी के लिए होंगे।
एक उदार चेतन मस्तिष्क के लिए यह मान लेना आसान है कि यह युद्ध भारत सरकार और उन माओवादियों के बीच है जो चुनावों को ढोंग और संसद को सुअरबाड़ा कहते हैं; जिन्होंने भारतीय राजसत्ता को उखाड़ फेंकने की अपनी मंशा खुलेआम जाहिर कर दी है। उनके लिए यह भुला देना आसान है और सुविधाजनक भी कि मध्य भारत के आदिवासियों के प्रतिरोध का इतिहास माओ से भी सदियों पुराना है (यही सचाई भी है, क्योंकि यदि उन्होंने प्रतिरोध नहीं किया होता, तो वे बचे ही नहीं होते)। हो, उरांव, कोल, संथाल, मुंडा, गोंड आदिवासियों ने एक नहीं, कई बार विद्रोह किया है, कभी अंग्रेजों के खिलाफ तो कभी जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ। इनकी बगावत को बर्बर तरीकों से कुचल दिया गया, हजारों आदिवासियों को मार दिया गया, इसके बावजूद इन लोगों को जीता नहीं जा सका। यहां तक कि आजादी के बाद पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए पहले जन उभार – जिसे हम माओवादी कह सकते हैं – के केंद्र में भी आदिवासी ही थे (जहां से नक्सलवादी नाम का शब्द पैदा हुआ, आजकल जिसे माओवादी के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है)। तब से लेकर अब तक नक्सली राजनीति अभिन्न रूप से आदिवासी उभार के साथ जुड़ी हुई है, जो हमें जितना नक्सलवादियों के बारे में बताती है, उतना ही वह आदिवासियों से भी सरोकार रखती है।
बगावत की यह विरासत अपने पीछे ऐसे असंतुष्ट और रुष्ट लोगों को छोड़ गयी है जिन्हें जान-बूझ कर भारत सरकार ने हाशिये पर धकेल दिया है और अलग-थलग छोड़े हुए है। भारतीय लोकतंत्र का नैतिक दस्तावेज यानी भारत का संविधान संसद द्वारा 1950 में अपनाया गया था। आदिवासियों के लिए यह एक त्रासदी का दिन था। संविधान ने औपनिवेशिक नीति को सही ठहराते हुए आदिवासी इलाकों का जिम्मा भारतीय राजसत्ता के हाथ में दे दिया। रातों-रात समूची आदिवासी आबादी अपनी ही जमीन पर गैर-कानूनी प्रवासियों में तब्दील हो गयी। इस संविधान ने वनोत्पादों पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को ही अस्वीकार कर दिया और इस तरह उनकी समूची जीवन पद्धति को आपराधिक करार दिया। वोट देने के अधिकार के बदले संविधान ने आजीविका और आत्मसम्मान के उनके अधिकार को ही छीन लिया।
सरकार ने पहले तो उनसे सब कुछ छीन लिया और उन्हें गरीबी के कुएं में धकेल दिया। इसके बाद वह उनकी गरीबी को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करने में लग गयी। हर बार जब उसे बड़ी आबादी को विस्थापित करने की जरूरत पड़ती – बांधों, सिंचाई परियोजनाओं, खनन आदि के लिए – तो सरकार अचानक ‘आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने’ या उन्हें ‘आधुनिक विकास का फल देने’ की बात करने लग जाती। इसका नतीजा यह हुआ है कि भारत की ‘प्रगति’ के शरणार्थी यानी आंतरिक रूप से विस्थापित करोड़ों लोगों (बड़े बांधों से अकेले तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित) में अधिसंख्य आदिवासी लोग ही हैं। जाहिर है जब यह सरकार आदिवासियों के कल्याण की बात शुरू करे, तो वह चिंता करने का वक्त होता है।
इस कड़ी में सबसे हालिया चिंता के स्वर गृहमंत्री पी चिदंबरम की ओर से आये हैं। उन्होंने कहा है कि वह नहीं चाहते कि आदिवासी ‘संग्रहालयी संस्कृति’ का हिस्सा रहें। जब वह एक कॉरपोरेट वकील के अपने करियर में तमाम प्रमुख खनन कंपनियों के हितों को आवाज दे रहे थे, तब तो आदिवासियों का कल्याण उनकी प्राथमिकताओं में ऐसे नहीं आता था। इसलिए जरूरी है कि उनकी इस नयी उत्तेजना के आधार को टटोला जाए।
पिछले तकरीबन पांच साल के दौरान छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के साथ कई खरब डॉलर के सैंकड़ों समझौतों पर दस्तखत किये हैं। स्टील प्लांट, स्पंज आयरन फैक्टरी, पावर प्लांट, एल्युमिनियम रिफाइनरी, बांधों और खदानों के लिए किये गये ये सारे समझौते गोपनीय हैं। इन्हें हरे नोटों में बदलने के लिए बेहद जरूरी है कि आदिवासियों को इन इलाकों से खत्म कर दिया जाए।
यह युद्ध, इसी के लिए है।
मेरे निकलने से एक दिन पहले मेरी मां ने कॉल किया। वह ऊंघते हुए बोली, ‘मैं सोच रही थी, कि इस देश को एक अदद क्रांति की जरूरत है।’
रायपुर से दंतेवाड़ा तक का सफर करीब दस घंटे का है। इसमें उन इलाकों से होकर गुजरना पड़ता है, जिन्हें ‘माओवादी संक्रमित’ कहा जाता है। ऐसे शब्द बेवजह नहीं बनाये गये। संक्रमण/संक्रमित जैसे शब्द बीमारी या कीटों के लिए इस्तेमाल में आते हैं। और बीमारियों को दूर किया ही जाना चाहिए। कीटों को खत्म करना ही पड़ता है। ठीक वैसे ही माओवादियों को साफ किया ही जाना होगा। बड़े चुपके से और अदृश्य तरीकों से नरसंहार की यह भाषा हमारी शब्दावली का हिस्सा बन चुकी है।
राजमार्ग को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा बलों ने दोनों ओर जंगलों की एक संकरी पट्टी को घेरा हुआ है। इसके पार ‘दादा लोगों’ का राज है यानी भाइयों का, कॉमरेडों का राज।
रायपुर के बाहरी इलाके में एक विशाल बिलबोर्ड पर वेदांता के कैंसर अस्पताल का विज्ञापन लगा है (वही कंपनी, जिसमें कभी हमारे गृहमंत्री नौकरी करते थे)। उड़ीसा में, जहां वेदांता बॉक्साइट का खनन कर रही है, वह एक विश्वविद्यालय भी बना रही है। ऐसे ही चुपके से और अदृश्य तरीकों से खनन निगम हमारी कल्पनाओं में प्रवेश कर जाते हैं ऐसी उदार ताकतों के रूप में, जो वास्तव में हमारा ख्याल रखते हों। कर्नाटक की हालिया लोकायुक्त रिपोर्ट के मुताबिक एक निजी कंपनी द्वारा खोदे गये एक टन लौह अयस्क के लिए सरकार को 27 रुपये की रॉयल्टी मिलती है और खनन कंपनी 5000 रुपये बनाती है। बॉक्साइट और अल्युमीनियम के क्षेत्र में तो हालत और भी बुरी है। ये अरबों डॉलर की दिनदहाड़े लूट की दास्तानें हैं। इतना तो चुनावों, सरकारों, जजों, अखबारों, टीवी चैनलों, एनजीओ और अनुदान एजेंसियों को खरीद लेने के लिए काफी है। ऐसे में यहां-वहां एकाध कैंसर अस्पताल बनवा देने में क्या जाता है?
मुझे याद नहीं कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दस्तखत किये गये समझौतों की लंबी फेहरिस्त में वेदांता का नाम है या नहीं। लेकिन इतना तो शक होता ही है कि अगर यहां एक कैंसर अस्पताल है, तो पास में ही कहीं बॉक्साइट का कोई पहाड़ भी होगा।
हम कांकेर से गुजरते हैं, जो अपने जंगल युद्धकौशल और प्रति उग्रवाद प्रशिक्षण कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसे ब्रिगेडियर बीके पंवार चलाते हैं, जो इस युद्ध के एक और प्यादे के रूप में भ्रष्ट पुलिसवालों को जंगल कमांडो में तब्दील करने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल का उद्देश पत्थरों पर रंगा हुआ है, ‘एक गुरिल्ला से लड़ने के लिए गुरिल्ला बनो।’
काफी देर हो चुकी थी। जगदलपुर सो चुका था, बस कुछेक होर्डिंगें जगमगा रही थीं जिनमें राहुल गांधी लोगों से यूथ कांग्रेस में आने का आह्वान करते दिख रहे थे। हाल के कुछ महीनों में वह दो बार बस्तर जा चुके हैं, लेकिन युद्ध के बारे में शायद उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा है। जनता के इस राजकुमार के लिए इस मसले पर कुछ भी कहना उसे मुश्किल में डाल सकता है। शायद उनके मीडिया प्रबंधकों ने ही उन्हें ऐसा करने से रोका होगा। राहुल गांधी का प्रचार अभियान इतनी सतर्कता से चलाया जा रहा है कि बलात्कार, हत्याओं, गांवों को जलाने और हजारों लोगों को उनके घरों से खदेड़ने के लिए जिम्मेदार सरकार प्रायोजित सेना सलवा जुड़ुम के कर्ताधर्ता कांग्रेसी विधायक महेंद्र कर्मा का नाम बीच में कहीं नहीं आ पाता।
मां दंतेश्वरी के मंदिर पर मैं समय से पहले ही पहुंच चुकी थी। मुझे नहीं पता था कि मुझे यहां क्या कहना है। उसने बताया कि उसका नाम मंगतू है। जल्द ही मैं जान गयी कि जिस दंडकारण्य में मैं प्रवेश करने जा रही थी, वह ऐसे लोगों से अटा पड़ा था, जिनके कई नाम थे और जिनकी पहचान अस्पष्ट थी। यह विचार मेरे लिए राहत से कम नहीं था कि कुछ देर के लिए दूसरा बन जाना और अपनी पहचान से अलग होना कितना खूबसूरत होता होगा।
मंदिर से कुछ ही दूरी पर एक बस स्टैंड था। हम वहां पैदल पहुंचे। वहां पहले से ही काफी भीड़ थी। काफी तेजी से यहां चीजें बदलीं। बाइक पर दो व्यक्ति थे। कोई संवाद नहीं – बस आंखों में ही नमस्ते बंदगी हुई, हमने बाइक पर अपना वजन संभाला और चल दिये। मुझे कोई आइडिया नहीं था कि हम कहां जा रहे थे। रास्ते में पुलिस अधीक्षक का आवास पड़ा। मैं पिछली बार के अपने दौरे में इधर आयी थी, सो मुझे पहचानने में दिक्कत नहीं हुई। वह स्पष्टवादी व्यक्ति था। उसने कहा था, ‘देखिए मैडम, साफ-साफ कहूं तो यह समस्या पुलिस या सेना से हल नहीं होने वाली। इन आदिवासियों की दिक्कत यह है कि वे लालच नाम की चीज नहीं समझते। जब तक वे लालच को नहीं समझेंगे और खुद लालची नहीं बनेंगे, हमारे लिए कोई भी उम्मीद करना बेकार है। मैंने अपने अधिकारी से कहा है कि सुरक्षा बलों को हटा कर उसकी जगह हर घर में एक टीवी लगवा दीजिए। सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।’
कुछ ही देर में हम चौड़े पाट वाली एक नदी के रेतीले किनारों पर पहुंच गये। यह बरसाती नदी थी। इसलिए अभी वह बची नहीं थी। चारों ओर रेत के बीच एक पतली सी धारा थी जिसमें टखने भर पानी था और उसे पार करना काफी आसान था। उस पार था ‘पाकिस्तान’। उस एसपी ने मुझसे कहा था, ‘मैडम, हमारे सिपाही उधर लोगों को जान से मार देते हैं।’ मुझे याद है कि हम जैसे ही उस पार जाने लगे, एक पुलिसवाले की राइफल का निशाना हमारी ओर ही था। इतने खुले में उन्हें पहचान पाना मुश्किल नहीं था। मंगतू को हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भी उसी के पीछे हो ली।
उस पार हमारा इंतजार कर रहा था चंदू, जिसकी हलकी हरी शर्ट पर लिखा था हॉर्लिक्स! ‘आंतरिक सुरक्षा का यह खतरा’ कुछ उम्रदराज था। उसकी मुस्कराहट काफी प्यारी थी। उसके पास एक साइकिल थी, एक जेरी कैन जिसमें उबला पानी और मेरे लिए कई पैकेट ग्लूकोज के बिस्कुट, जो पार्टी ने भिजवाये थे। हमने अपनी सांस थाम कर चलना शुरू किया। उसकी साइकिल हमारा ध्यान बंटा रही थी। हालांकि रास्ता ऐसा था जिस पर साइकिल चलाना संभव नहीं था। पहाड़ों और पथरीले रास्तों पर चढ़ते-उतरते हम चलते गये। जब साइकिल चलाना मुश्किल हो जाता, तो चंदू उसे अपने सिर पर ऐसे उठा लेता जैसे कि उसका कोई वजन ही न हो। सूरज ढलते ही उनके कंधों पर लटके बैग बांग देने लगे। उनमें मुर्गे भरे थे जिन्हें बेचने वे बाजार ले गये थे, लेकिन बेच नहीं पाये थे।
अब कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगी थीं। मैं कह नहीं सकती कि वे कितनी दूर थे। अब रास्ता मैदानी हो रहा था। मैंने नजरें चुरा कर आकाश की ओर देखा। खुला आकाश मुझे मदहोश करता है। मुझे उम्मीद थी कि हमारी मंजिल जल्द ही आने वाली है। चंदू ने कहा, हां। जल्दी यानी एक घंटे से भी ज्यादा। अब मुझे ढेर सारे पेड़ों की कतारें नजर आने लगी थीं। हम पहुंच चुके थे।
गांव काफी बड़ा था और मकान एक-दूसरे से काफी दूर बने थे। हम जिस घर में गये, वह काफी खूबसूरत था। आग जल रही थी, जिसके चारों ओर लोग बैठे थे। बाहर अंधेरे में उससे भी ज्यादा लोग थे। पता नहीं, कितने। उन्होंने अभिवादन किया, कॉमरेड लाल सलाम। मैंने भी जवाब दिया, लाल सलाम। मैं थक कर चूर हो चुकी थी। उस घर की महिला ने मुझे भीतर बुलाया। उसने मुझे खाने को रेड राइस के साथ हरी फलियों में पकी हुई चिकेन करी दी। जबर्दस्त खाना। उसकी बच्ची मेरे पास में ही सोयी हुई थी और उसके चांदी के कड़े धधकती हुई आग में चमक रहे थे।
हम सवेरे पांच बजे उठ गये। छह बजे तक हम निकल पड़े। एकाध घंटे के बाद एक और नदी हमने पार की। रास्ते में कुछ खूबसूरत गांव पड़े। हर गांव पर इमली के पेड़ों की छाया थी। इतने विशाल और विनम्र जैसे कि उन गांवों पर झुका हुआ कोई ईश्वर हो। यह थी बस्तर की मीठी इमली। ग्यारह बजते-बजते सूरज चढ़ चुका था। अब चलना सज़ा हो रहा था। दोपहर के खाने के लिए हम एक गांव में रुकते हैं। करीब दो बजे हम फिर से चल पड़ते हैं। इस गांव में हम दीदी से मिलने जा रहे हैं। दीदी यानी बहन कॉमरेड, जो हमें बताएंगी कि आगे क्या करना है। चंदू को नहीं पता कि आगे का सफर कैसा होगा। यहां सूचनाओं के भी स्तर होते हैं। हर व्यक्ति को हर चीज जानना जरूरी नहीं होता। जब हम वहां पहुंचते हैं, तो दीदी नहीं मिलती। उसकी कोई खबर नहीं है। पहली बार मैं देखती हूं कि चंदू के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। मैं और भी चिंतित हो जाती हूं। मैं नहीं जानती कि लोग यहां एक-दूसरे से कैसे संपर्क करते हैं, अगर कुछ गड़बड़ हुई तो फिर क्या?
हम एक पुराने स्कूल के बाहर डेरा डालते हैं। यह गांव से कुछ दूर है। आखिर गांवों के सारे सरकारी स्कूल कंक्रीट के क्यों होते हैं, जिनमें खिड़कियां स्टील शटर की तरह और दरवाजे भी स्टील के होते हैं, स्लाइड करने वाले? इन्हें भी गांव के घरों जैसा मिट्टी और फूस से क्यों नहीं बनाया जाता? ताकि इनका इस्तेमाल बैरक और बंकर की तरह भी हो सके। चंदू बताता है, ‘अबूझमाड़ के गांवों में स्कूल ऐसे ही होते हैं…’। एक लकड़ी से वह जमीन पर स्कूल के भवन का नक्शा खींचता है – एक दूसरे से जुड़ी तीन अष्टकोणीय आकृतियां – बिल्कुल मधुमक्खी के छत्ते की तरह। वह बताता है, ‘ताकि वे यहां से हर दिशा में गोली चला सकें।’ अपनी बात को समझाने के लिए वह बिल्कुल क्रिकेट के ग्राफिक की तरह तीर बनाता है। इन स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं। चंदू बताता है कि वे सभी भाग गये। मैंने पूछा, ‘कहीं तुम लोगों ने तो उन्हें नहीं खदेड़ दिया?’ ‘न, हम सिर्फ पुलिस को खदेड़ते हैं।’ वह पूछता है, ‘जब शिक्षकों को घर बैठे ही तनख्वाह मिल जाती है, तो वे यहां आने की जहमत क्यों उठाएंगे?’ बात तो सही है!
वह बताता है कि यह हमारा ‘नया इलाका’ है। पार्टी हाल ही में यहां आयी है।
तब तक करीब 20 युवा लड़के और लड़कियां आ जाते हैं। सभी किशोरवय के या 20 से 30 के बीच में हैं। चंदू बताता है कि यह गांव की मिलिशिया है। माओवादी सैन्य क्रम की सबसे निचली कतार। मैंने पहले कभी ऐसी कोई सेना नहीं देखी। ये साड़ी और लुंगी में हैं, कुछ हरे रंग के कपड़े पहने हैं। सभी के पास भरमार है यानी मजल लोडिंग राइफल। कुछ के पास चाकू, कुल्हाड़ी, तीर-कमान भी है। एक के पास जिंदा मोर्टार भी है, जिसे तीन फुट की जीआई पाइप से बनाया गया है। इसमें बारूद भरी है। यह चलने पर बहुत तेज आवाज करती है, लेकिन इसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। वे बताते हैं कि इसके बावजूद पुलिस इससे डरती है। ऐसा लगता नहीं कि इन लोगों के दिमाग में युद्ध के बारे में ख्यालात चलते होंगे, शायद इसलिए कि यह इलाका सलवा जुड़ुम के दायरे से बाहर है। इन्होंने दिन भर का काम पूरा कर लिया है। वे कुछ घरों के चारों ओर बाड़ लगा रहे थे ताकि खेतों में बकरियों को घुसने से रोका जा सके। इनमें काफी उत्सुकता और उत्साह है। लड़कियां यहां लड़कों के साथ काफी सहज और आत्मविश्वास में दिखती हैं और इन चीजों को पकड़ने में मैं बहुत तेज हूं। मुझे यह देखकर अच्छा लगता है। चंदू बताता है कि इनका काम गश्त लगाना है और चार-पांच गांवों की सुरक्षा करना है, खेतों की रक्षा करना है, उनके घरों की मरम्मत करना और कुओं को साफ करना है – यानी जो भी जरूरत पड़े उसे पूरा करना है।
दीदी अब तक नहीं आयी। अब क्या किया जाए? कुछ नहीं। इंतजार कीजिए और तब तक सब्जियां काटने और छीलने में मदद कीजिए।
रात के खाने के बाद सभी कतार में चल देते हैं। हम सब कुछ साथ लेकर बढ़ते हैं – चावल, सब्जियां, हांडी और बरतन। हम स्कूल परिसर को छोड़ चुके हैं। आधे घंटे से भी कम समय में हम एक सुरक्षित छांव में पहुंच जाते हैं। यहां हमें सोना है। निस्तब्ध शांति है। मिनट भर के भीतर हर कोई अपनी झिल्ली (नीली प्लास्टिक की चादर, जिसके बगैर क्रांति संभव नहीं) बिछा चुका है। चंदू और मंगतू एक में ही काम चला लेते हैं और मुझे एक अलग झिल्ली दी जाती है। मेरे लिए सबसे अच्छी जगह वे खोज निकालते हैं सोने के लिए, एक पत्थर के किनारे। चंदू ने दीदी को संदेश भेज दिया है। यदि उसे वह मिल गया, तो सवेरे वह यहां आ जाएगी। बशर्ते संदेश उस तक पहुंचे।
अब तक मैं जितने कमरों में सोयी हूं, यह सबसे खूबसूरत कमरा है। हजार स्टार वाले होटल में मेरा निजी सुइट। और मैं घिरी हूं इन अद्भुत, खूबसूरत बच्चों से, जिनके हाथों में हथियार हैं। ये सभी निश्चित तौर पर माओवादी ही हैं। तो क्या ये मरने जा रहे हैं? क्या जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल इन्हीं को मारने के लिए बनाया गया है? ये सारे हेलीकॉप्टर गनशिप, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंज फाइंडर क्या इन्हीं के लिए हैं?
सब सो चुके हैं, सिवाय इन संतरियों के, जो डेढ़ घंटे की पाली में सोते हैं। मेरी नजर तारों पर जाती है। जब मैं बच्ची थी, तो मीनाचल नदी के किनारे सूरज ढलते ही शुरू होने वाली झींगुरों की आवाज को मैं तारों की पुकार समझती थी, जैसे वे टिमटिमाने की तैयारी कर रहे हों। मुझे भरोसा नहीं हो रहा कि आखिर इस जगह से मुझे कितना प्यार हो गया है। दुनिया में इससे प्यारी और कोई जगह शायद नहीं होगी, जहां मैं होना चाहूंगी। आज रात मुझे क्या होना चाहिए? तारों की चादर के नीचे, कामरेड राहेल? खैर, दीदी कल आ जाएंगी।
वे दोपहर से पहले आ पहुंचे। कुछ दूरी पर मैं उन्हें देख पा रही हूं। करीब 15 थे, सभी हरी वर्दी में, हमारी ओर दौड़ कर आते हुए। जिस तरह से वे दौड़ रहे थे, मैं उन्हें देख कर समझ सकती थी कि वे मजबूत लोग हैं। जनमुक्ति गुरिल्ला सेना के लोग। वही, जिनके लिए थर्मल इमेजिंग और लेजर निर्देशित रायफलें हैं, जिनके लिए जंगल युद्धकौशल प्रशिक्षण स्कूल बनाया गया है।
कैंप तक पहुंचने में कुछ घंटे और लगेंगे। पहुंचते-पहुंचते अंधेरा हो चुका है। यहां संतरियों और गश्ती सैनिकों के कई स्तर हैं। शायद दो कतारों में करीब सौ कामरेड होंगे। सभी के पास हथियार हैं। और चेहरों पर मुस्कान। वे गाना शुरू करते हैं, ‘लाल लाल सलाम, लाल लाल सलाम, आने वाले साथियों को लाल लाल सलाम।’ वे काफी मीठा गाते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी नदी या महकते हुए जंगल पर यह कोई लोकगीत हो। गीत के साथ अभिवादन, हाथ मिलाना और बंधी मुट्ठियां। सभी एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए कहते हैं – लाल सलाम, लाल सलाम।
कैंप के नाम पर यहां 15 वर्ग फुट में बिछी हुई नीली झिल्ली के अलावा कुछ नहीं दिखता। छत भी झिल्ली की ही है। रात में मेरा कमरा यही होगा। शायद इतने दिनों तक पैदल चलने के बदले यह मेरा पुरस्कार था, या फिर आगे जो पड़ने वाला है, उसके बदले मुझे बहलाया जा रहा था। हो सकता है दोनों ही बातें रही हों। खैर, शायद इस सफर में यह आखिरी रात थी जब मेरे सिर पर छत थी। रात के खाने पर मुझे मिलती हैं कॉमरेड नर्मदा – क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन की प्रमुख (इनके सिर पर ईनाम है)। पीएलजीए की कॉमरेड सरोजा जो अपनी एसएलआर जितनी ही लंबी हैं। कॉमरेड मासे (गोंडी भाषा में इसका अर्थ होता है काली लड़की), जिनके सिर पर भी ईनाम घोषित है। तकनीक पारंगत कॉमरेड रूपी। कॉमरेड राजू, जो उस डिवीजन के प्रमुख हैं, जिसमें हम लोग चल रहे थे। और कॉमरेड वेणु (या कॉमरेड मुरली, सोनू, सुशील – आप उन्हें जो कहना चाहें), जो सबसे वरिष्ठ हैं। हो सकता है केंद्रीय कमेटी में हों, पोलित ब्यूरो में भी हो सकते हैं। मुझे बताया नहीं जाता। मैं पूछती भी नहीं। हमारे बीच में गोंडी, हलबी, तेलुगु, पंजाबी और मलयालम में बात हो रही है। सिर्फ मासे अंग्रेजी बोलती है। (इसीलिए हम तय करते हैं कि हम हिंदी में ही बात करेंगे)। कॉमरेड मासे लंबी है, शांत है और ऐसा लगता है कि संवाद में शामिल होने में उसे काफी दिक्कत हो रही हो। लेकिन जिस तरह से उसने मुझे गले लगाया, मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं कि वह आदमी को पहचानना जानती है। जंगल में किताबें न मिलना उसे बहुत अखरता है। जब उसे मुझ पर पूरा भरोसा हो जाएगा, शायद तब वह मुझे अपनी पूरी कहानी बताएगी।
जैसा कि इस जंगल में अक्‍सर होता है, बुरी खबर अचानक आयी। एक दौड़ते हुए व्यक्ति के साथ। जिसके पास बिस्कुट थे और छोटे-छोटे मुड़े हुए कागज के टुकड़ों पर कुछ लिखा हुआ था। ये टुकड़े एक बैग में ऐसे भरे थे जैसे चिप्स हों। हर जगह की खबर। ओंगनार गांव में पुलिस ने पांच लोगों को मार दिया है। इनमें चार मिलिशिया के हैं और एक आम ग्रामीण। संथु पोट्टाई (25), फूलो वाड्डे (22), कांडे पोट्टाई (22), रामोली वाड्डे (20), दलसाई कोराम (22)। हो सकता है ये सभी वे बच्चे हों जो पिछली रात तारों से नहायी हमारी डॉर्मिटरी का हिस्सा थे। फिर अच्छी खबर आती है कुछ लोगों के झुंड के साथ, जिसमें एक मोटा युवक भी है। वह भी उन्हीं के कपड़ों में है, लेकिन वे नये हैं। सभी उसके कपड़ों की बड़ाई करते हैं कि वे कितने फिट हो रहे हैं। वह शर्माता भी है और खुश भी होता है। वह एक डॉक्टर है जो अभी-अभी जंगल में कॉमरेडों के साथ रह कर काम करने आया है। पिछली बार दंडकारण्य में जब कोई डॉक्टर आया था, तो इस बात को बरसों बीत गये।
मुझे कॉमरेड कमला से मिलवाया जाता है। मुझे हिदायत दी जाती है कि मैं उसे बिना साथ लिये अपनी झिल्ली से पांच फीट दूर भी न जाऊं। क्योंकि अंधेरे में कोई भी रास्ता भूल कर गुम हो सकता है। (मैं उसे जगाती ही नहीं, बिल्कुल लट्ठ की तरह पड़ी रहती हूं)। सुबह कमला मुझे पॉलीथिन का बना एक पीला पैकेट देती है, जिसका एक कोना फटा हुआ था। यह अबिस गोल्ड रिफाइंड सोया तेल का पैकेट था, जो अब शौच में मेरे मग के रूप में काम आने वाला था। क्रांति की राह में कुछ भी बरबाद नहीं जाता।
(अब भी कॉमरेड कमला के बारे में मैं लगातार, रोजाना सोचती रहती हूं। वह सतरह बरस की है। उसके पीछे एक देसी पिस्तौल लटकी रहती है। और उसकी मुस्कान तो गजब है। फिर भी अगर पुलिस से कभी सामना हो गया, तो वे उसे मार डालेंगे। वे पहले शायद उसकी इज्जत लूटेंगे। उससे कोई सवाल नहीं किया जाएगा। क्योंकि वह ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा’ है।)
दंडकारण्य को अंग्रेज गोंडवाना कहते थे, यानी गोंडो की धरती। आज इस जंगल से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाएं जुड़ती हैं। समस्याग्रस्त लोगों को अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों में बांटना तो पुरानी तरकीब है। लेकिन ये माओवादी और गोंड राजकीय सीमाओं जैसी चीजों पर बहुत ध्यान नहीं देते। उनके दिमाग में तो अलग नक्शा चल रहा होता है। और जंगल के जीवों की तरह उनके रास्ते भी अलग होते हैं। इनके लिए सड़कें चलने के लिए नहीं बनीं। वे तो सिर्फ पार करने के लिए हैं, और धीरे-धीरे ऐसा चलन बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि वहां सेना तैनात होती है। कोया ओर दोरला जनजातियों में बंटे गोंड यहां बहुसंख्य हैं, हालांकि दूसरे आदिवासी समुदायों की भी यहां रिहाइश है। गैर-आदिवासी बसावट सिर्फ जंगलों के किनारे सड़कों और बाजारों के पास है।
पीडब्ल्यूजी के लोग दंडकारण्य में आने वाले पहले प्रचारक नहीं थे। प्रसिद्ध गांधीवादी बाबा आम्टे ने 1975 में वरोरा में कुष्ठ आश्रम और अस्पताल खोला था। अबूझमाड़ के सुदूर गांवों में रामकृष्ण मिशन ने ग्रामीण स्कूल खोलने शुरू किये थे। उत्तरी बस्तर में बाबा बिहारी दास ने ‘आदिवासियों को वापस हिंदू बनाने’ के लिए एक आक्रामक अभियान शुरू किया था, जिसके तहत आदिवासी संस्कृति को नष्ट कर उनमें हिंदू धर्म की सबसे बड़ी नेमत जाति को उनके भीतर प्रवेश कराया जाना था। शुरू में जिन्होंने धर्म बदला – गांवों के मुखिया और बड़े जमींदार – सलवा जुड़ुम के संस्थापक महेंद्र कर्मा जैसे लोग, उन्हें द्विज ब्राह्मण की उपाधि दी गयी। (जाहिर तौर पर यह एक घपला ही था, क्योंकि कोई भी ब्राह्मण नहीं बन सकता। ऐसा ही होता तो हम अब तक ब्राह्मणों के देश बन चुके होते)। लेकिन इस नकली हिंदूवाद को आदिवासियों के लिए पर्याप्त माना जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हर नकली चीज – बिस्कुट, साबुन, माचिस और तेल – जो गांवों के बाजारों में मिलती है। हिंदुत्व के इस अभियान ने भूमि रिकॉर्ड में गांवों के नामों को बदल दिया। अब इन गांवों के दो नाम हैं, एक जनता का दिया नाम और दूसरा सरकारी नाम। मसलन, इन्नार गांव को चिन्नारी बना दिया गया। मतदाता सूची में आदिवासियों के नाम बदल कर हिंदू नाम बना दिये गये। (मासा कर्मा बन गये महेंद्र कर्मा)। जिन्होंने हिंदू बनना स्वीकार नहीं किया, उन्हें ‘कटवा’ कह दिया गया (यानी अछूत), जो बाद में माओवादियों के स्वाभाविक समर्थक बन गये।
पीडब्ल्यूजी ने अपना काम सबसे पहले दक्षिणी बस्तर और गढ़चिरौली में शुरू किया। कॉमरेड वेणु उन शुरुआती महीनों के बारे में विस्तार से बताते हैं : कि गांव वाले कैसे उनसे भय खाते थे और अपने घरों में इन्हें घुसने नहीं देते। कोई उन्हें खाना-पानी नहीं देता। पुलिस ने अफवाह फैला दी थी कि वे चोर हैं। डर कर महिलाओं ने अपने जेवर लकड़ी के चूल्हे की राख में छुपा दिये। बड़े पैमाने पर इनका दमन किया गया। नवंबर 1980 में पुलिस ने गढ़चिरौली में एक गांव की सभा पर गोलीबारी की, जिसमें तकरीबन समूचा स्क्वाड ही मारा गया। यह दंडकारण्य की पहली ‘फर्जी मुठभेड़’ थी। यह बहुत बड़ा झटका था जिसके चलते कॉमरेड गोदावरी के उस पार अदीलाबाद लौट गये। लेकिन 1981 में वे फिर लौटे। उन्होंने इस बार आदिवासियों को तेंदू पत्ता के दाम बढ़ाने के मुद्दे पर संगठित करना शुरू किया। उस वक्त व्यापारी 50 पत्तों के एक बंडल का तीन पैसा देते थे। इस किस्म की राजनीति से बिल्कुल अनजान लोगों को इस मुद्दे पर संगठित कर के हड़ताल आयोजित करवाना अपने आप में एक बड़ा काम था। आखिरकार हड़ताल कामयाब हुई और मजदूरी को बढ़ा कर छह पैसे बंडल कर दिया गया। लेकिन पार्टी की असली कामयाबी एकता की ताकत का प्रदर्शन था कि कैसे राजनीतिक सौदेबाजी करने का यह एक नया तरीका हो सकता है। आज तमाम हड़तालों और प्रदर्शनों के सिलसिले के बाद एक बंडल की मजदूरी एक रुपया मिलती है। (मौजूदा दरों पर इसकी संभावना कम ही लगती है, लेकिन तेंदू पत्तों का कारोबार सैंकड़ों करोड़ रुपये का होता है)। हर सीजन में सरकार ठेके देती है और ठेकेदारों को एक निश्चित मात्रा में तेंदू पत्ता इकट्ठा करने की मंजूरी देती है – जो 1500 से 5000 मानक बोरे के बीच हो सकती है। हर मानक बोरे में करीब 1000 बंडल होते हैं (यह पता करने का कोई तरीका नहीं कि ठेकेदार इससे ज्यादा बंडल न निकालते हों)। बाजार में आते ही तेंदू पत्ता किलो में बिकने लगता है। बंडल को मानक बोरों और फिर किलो में बदलने वाले गणित पर पूरी तरह ठेकेदारों का नियंत्रण होता है और उनके पास इसमें हेर-फेर करने की पर्याप्त गुंजाइश रहती है। मामूली आकलन के हिसाब से भी एक ठेकेदार के पास हर मानक बोरे पर 1100 रुपये बचते हैं, वो भी पार्टी को हर बोरे पर 120 रुपये का कमीशन देने के बाद। इस हिसाब से एक छोटा ठेकेदार (1500 बोरे) एक सीजन में करीब 16 लाख रुपये बना लेता है और बड़ा ठेकेदार (5000 बोरे) कम से कम 55 लाख रुपये। वास्तविक राशि इसकी कई गुना हो सकती है। इस पूरे कारोबार में ‘आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक’ लोगों को सिर्फ इतना मिल पाता है कि वे अगले सीजन तक जिंदा रह सकें।
अचानक इस बातचीत में सबकी हंसी से खलल पड़ता है। पीएलजीए का एक कॉमरेड निलेश काफी तेजी से खाना पकाने वाली जगह की ओर दौड़ता हुआ आ रहा था। वह रह-रह कर खुद को मार भी रहा था। वह पास आया तो मैंने देखा कि उसके ऊपर लाल चींटियों का पत्ते वाला एक घोंसला था। चींटियां उसके पूरे शरीर पर रेंग गयी थीं और हाथ व गले में काट रही थीं। निलेश खुद भी हंस रहा था। कॉमरेड वेणु ने पूछा, ‘क्या आपने कभी चींटियों की चटनी खायी है?’ मैं लाल चीटियों से खूब वाकिफ हूं, केरल में बीते अपने बचपन से ही। उन्होंने मुझे काटा भी है, लेकिन मैंने कभी उन्हें चखा नहीं।
निलेश बीजापुर से है, जो सलवा जुड़ुम का केंद्र है। उसका छोटा भाई सलवा जुड़ुम में चला गया। उसे एसपीओ बना दिया गया है। वह अपनी मां के साथ बसागुड़ा कैंप में रहता है। उसके पिता ने साथ जाने से मना कर दिया। वह गांव में ही रुक गये। बाद में जब मुझे निलेश से बात करने का मौका मिला, तो मैंने पूछा कि उसका भाई सलवा जुड़ुम के साथ क्यों चला गया।
‘वह बहुत छोटा था। उसे लोगों को लूटने और घरों को जलाने का जब मौका मिला तो उसे बहुत मजा आने लगा। वह सनक गया। अब वह फंस चुका है। वह कभी गांव वापस नहीं आ सकता। उसे माफ नहीं किया जाएगा। और यह बात वह जानता है।’
हम इतिहास के अपने सबक पर लौट आये। कॉमरेड वेणु ने बताया कि पार्टी का अगला बड़ा संघर्ष बल्लारपुर पेपर मिल्स के खिलाफ था। सरकार ने थापर कंपनी को काफी रियायती दरों पर 1.5 लाख टन बांस निकालने का ठेका 45 साल के लिए दे दिया था (बॉक्साइट की तुलना में यह छोटा धंधा है, फिर भी इस इलाके में पर्याप्त है)। आदिवासियों को एक बंडल के लिए 10 पैसे मिल रहे थे – एक बंडल में बांस के 20 तने होते हैं (थापर इससे कितना मुनाफा कमा रहा था, यह बताने के लोभ में मैं नहीं पड़ना चाहती)। लंबे समय तक चले आंदोलन, हड़ताल, फिर पेपर मिल के अधिकारियों के साथ सबके सामने खुली बातचीत के बाद दाम को बढ़ा कर तीस पैसे कर दिया गया। आदिवासियों के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने वादे तो किये थे, लेकिन पूरे करने के कोई संकेत नहीं दिये। इसके बाद लोग पीडब्ल्यूजी के पास उसमें शामिल होने के लिए आने लगे।
सात स्क्वाड की टीम ने काफी लंबा रास्ता अब तय कर लिया था। इसका प्रभाव अब 60,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र, हजारों गांवों और लाखों लोगों के बीच था।
लेकिन वन विभाग का खात्मा पुलिस के आने का सबब बन गया था। अब खून-खराबे का सिलसिला चल निकला। पुलिस की फर्जी मुठभेड़, पीडब्ल्यूजी का घेराव। जमीन के पुनर्वितरण के बाद दूसरी जिम्मेदारियां भी आ गयीं : सिंचाई, खेती की पैदावार और आबादी बढ़ने की समस्या, जिसके चलते जंगल भूमि साफ होती जा रही थी। इसके बाद ‘जन कार्रवाई’ और ‘सैन्य कार्रवाई’ को अलग करने का फैसला लिया गया।
लोहंडीगुड़ा, जहां महज पांच घंटे में गाड़ी चला कर दंतेवाड़ा से पहुंचा जा सकता है, कभी भी नक्सली इलाका नहीं था। लेकिन आज है। कॉमरेड जूरी उसी इलाके में काम करती है। मैं चींटियों की चटनी खा रही थी, तब वह मेरे बगल में ही बैठी थी। वह बताती है कि उन्होंने वहां तब जाने का फैसला किया, जब गांवों की दीवारों पर लोग रंगने लगे, नक्सली आओ, हमें बचाओ। कुछ ही महीने पहले ग्राम पंचायत अध्यक्ष विमल मेश्राम को सरे बाजार गोली मार दी गयी थी। जूरी कहती है, ‘वह टाटा का आदमी था। वह लोगों पर जमीन देकर मुआवजा लेने का जबरन दबाव बना रहा था। ठीक ही हुआ कि वह खत्म हो गया। हमारा भी एक कॉमरेड हालांकि चला गया। उन्होंने उसे गोली मार दी। आप और चपोली लेंगी?’ वह सिर्फ 20 बरस की है। ‘हम टाटा को वहां नहीं आने देंगे। लोग नहीं चाहते कि वे आएं।’ जूरी पीएलजीए की नहीं है। वह पार्टी की सांस्कृतिक इकाई चेतना नाट्य मंच में है। वह गाती है। गीत भी लिखती है। अबूझमाड़ की रहने वाली है। (उसने कॉमरेड माधव से ब्याह किया है। माधव जब मंच की टुकड़ी के साथ गाते हुए उसके गांव आये थे, तो उसे उनसे प्रेम हो गया था)।
मुझे लगा कि अब कुछ कहना चाहिए। हिंसा की व्यर्थता के बारे में, या फिर जान से मार देने के संक्षिप्त फैसलों पर। लेकिन मैं उन्हें क्या करने को कहती? कि वे अदालत में जाएं? या दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना करें? रैली निकालें? या फिर आमरण अनशन पर बैठ जाएं? अजीब हास्यास्पद बात होती। नयी आर्थिक नीति के प्रचारकों से – जिनके लिए यह कहना काफी आसान होता है कि ‘देयर इज नो आल्टरनेटिव’ – पूछा जाना चाहिए कि वे एक वैकल्पिक प्रतिरोध नीति भी सुझाएं। बिल्कुल इन लोगों के हिसाब से, जो इस जंगल के हिसाब से फिट बैठती हो। अभी, इसी वक्त। आखिर ये लोग किस पार्टी को वोट दें? इस देश की किस लोकतांत्रिक संस्था के पास ये गुहार लगाएं? आखिर ऐसा कौन सा दरवाजा बचा है, जो नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बड़े बांधों के खिलाफ अपने बरसों से चल रहे संघर्ष के दौरान न खटखटाया हो?
अब अंधेरा हो चुका था। कैंप में काफी चहल-पहल थी, लेकिन मैं कुछ नहीं देख पा रही थी। बस कुछ प्रकाश बिंदु हरकत करते से दिख रहे थे। कह पाना मुश्किल है कि वे तारे थे, पतंगे या फिर माओवादी। अचानक नन्हा मंगतू प्रकट होता है। मुझे पता चलता है कि वह यंग कम्युनिस्ट्स मोबाइल स्कूल की पहली पीढ़ी का सदस्य है, जिन्हें साम्यवाद के बुनियादी सिद्धांतों को पढ़ना, लिखना और समझना सिखाया जा रहा है (जिसको लेकर हमारा कॉरपोरेट मीडिया भौंकता रहता है, ‘युवा मस्तिष्कों का सैद्धांतीकरण’। जो टीवी विज्ञापन बच्चों के कुछ सोचने-समझने के काबिल होने से पहले ही उनका ब्रेनवॉश कर देते हैं, उसे सैद्धांतीकरण के रूप में नहीं देखा जाता)। किशोर कम्युनिस्टों को न तो बंदूक रखने दी जाती है और न ही वर्दी पहननी होती है। लेकिन वे पीएलजीए के दस्तों के साथ अपनी आंखों में तारों की चमक लिये बिल्कुल किसी रॉक बैंड की तरह चलते रहते हैं।
हमारे चलने से पहले कॉमरेड वेणु पास आते हैं, ‘तो ठीक है कॉमरेड, मैं इजाजत चाहूंगा।’ मुझे एकबारगी झटका लगता है। एक गर्म टोपी और चप्पलों में वह एक छोटे से कीड़े की भांति लग रहे थे, अपने तीन महिला और तीन पुरुष गार्डों से घिरे हुए। सभी हथियारों से लैस थे। उन्होंने कहा, ‘कॉमरेड हम आपके बहुत आभारी हैं कि आप इतनी दूर से यहां तक आयीं।’ एक बार फिर हम हाथ मिलाते हैं और भिंची मुट्ठियां लहराती हैं, ‘कॉमरेड, लाल सलाम।’ वह जंगलों में कहीं गुम हो जाते हैं। उनके पास इन जंगलों की चाबी है। एक पल में ऐसा लगता है कि जैसे वे यहां कभी थे ही नहीं। मैं कुछ देर के लिए असहाय सी हो गयी थी, लेकिन मेरे पास सुनने के लिए उनकी घंटों की रिकॉर्डिंग है। और जैसे-जैसे ये दिन हफ्तों में बदलते जाएंगे, मैं ऐसे तमाम लोगों से मिलूंगी जो उस खांचे में रंग और शब्द भरेंगे जो उन्होंने मेरे लिए बनाया है। अब हम उल्टी दिशा में चलने लगे। कॉमरेड राजू, जिनके शरीर से एक मील दूर से ही आयोडेक्स महक रहा था, मुस्कुरा कर कहते हैं, ‘मेरे घुटने तो गये। अब तो मैं मुट्ठी भर पेनकिलर लेकर ही चल पाऊंगा।’
कॉमरेड राजू बिल्कुल सही हिंदी बोलते हैं और मनोरंजक किस्से एकदम मारक तरीके से सुनाते हैं। वे रायपुर में 18 साल तक वकालत कर चुके हैं। वह और उनकी पत्नी दोनों ही पार्टी में थे और पार्टी के शहरी नेटवर्क का हिस्सा थे। 2007 के अंत में रायपुर नेटवर्क का एक अहम व्यक्ति गिरफ्तार हो गया, उसे प्रताड़ित किया गया और अंत में मुखबिर बना दिया गया। उसे पुलिस ने एक बंद वाहन में बैठाकर रायपुर का चक्कर लगवाया और पुराने साथियों की निशानदेही करने को कहा। कॉमरेड मालती इन्हीं में से एक थीं। 22 जनवरी 2008 को उन्हें कई अन्य के साथ गिरफ्तार किया गया। उनके खिलाफ आरोप है कि उन्होंने सलवा जुडुम में किये गये अत्याचार के वीडियो वाली सीडी कई सांसदों को भेजी थी। उनका मामला कभी-कभार ही सुनवाई के लिए आता है क्योंकि पुलिस जानती है कि मुकदमा कमजोर है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत पुलिस के पास उन्हें बगैर जमानत के बरसों तक अंदर रखने की छूट मिली हुई है। कॉमरेड राजू कहते हैं, ‘अब सरकार ने छत्तीसगढ़ पुलिस की तमाम टुकड़ियां तैनात कर दी हैं ताकि बेचारे सांसदों की उन्हें भेजी गयी चिट्ठियों से सुरक्षा की जा सके।’ वह नहीं पकड़ा गया क्योंकि उस वक्त वह एक बैठक में दंडकारण्य आया हुआ था। तब से वह यहीं है। उसके दो छोटे बच्चे जो घर पर अकेले रह गये थे, पुलिस ने उनसे बहुत पूछताछ की। आखिरकार, ये बच्चे एक अंकल के साथ रहने चले गये और समूची गृहस्थी ही उठ गयी। कॉमरेड राजू को कुछ ही हफ्तों पहले पहली बार अपने बच्चों की खबर मिली। आखिर, उनके पास अपनी हंसी को बचाये रखने की ताकत और क्षमता कहां से आती है? जितना इन्होंने झेला है, उसके बाद भी ये क्यों लगातार आगे बढ़ पा रहे हैं? जाहिर है, पार्टी के लिए उनका प्यार, आस्था और एक उम्मीद इसके पीछे है। मेरा बार-बार तमाम निजी तरीकों से और कहीं ज्यादा गहराई में इस तथ्य से साक्षात्कार होता है।
अब हम सब एक साथ चल रहे हैं जहां मैं हूं और साथ हैं एक सौ ‘विवेकहीन रूप से हिंसक’ खून के प्यासे अतिवादी। कैंप छोड़ने से पहले मैंने एक नजर चारों ओर देखा था। एक भी निशान नहीं था इस बात का कि यहां करीब सौ लोगों ने डेरा डाला था, सिवाय राख के जहां आग जलायी गयी थी। मुझे इस सेना पर सहज भरोसा नहीं होता। जहां तक उपभोग का सवाल है, यह किसी भी गांधीवादी से ज्यादा गांधीवादी हैं और जलवायु परिवर्तन पर उपदेश देने वालों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन के मामले में सबसे आदर्श। लेकिन, फिलहाल तो विनाशकारी कामों में भी यह गांधीवादी रणनीति ही अपनाती है। मसलन, किसी पुलिस वाहन को जलाने से पहले उसके एक-एक हिस्से को तोड़ कर अलग कर लिया जाता है। स्टीयरिंग को सीधा करके भरमार बना ली जाती है, रेक्सीन को फाड़ कर हथियार रखने वाला पाउच और बैटरी को सोलर चार्जिंग में इस्तेमाल किया जाता है (अब हाईकमान से निर्देश आये हैं कि कब्जाये गये वाहनों को जलाया न जाए बल्कि दफना दिया जाए, ताकि जब जरूरत पड़े उन्हें दुरुस्त किया जा सके)।
अब हम घुप्प अंधेरे और मुर्दा शांति में चले जा रहे हैं। अकेली मैं हूं जो टॉर्च का इस्तेमाल कर रही हूं, वह भी नीचे की ओर ताकि हद से हद उसकी रोशनी में मुझे कॉमरेड कमला के पैर दिखते रह सकें और मैं जान सकूं कि मुझे कहां कदम रखना है। वह मुझसे 10 गुना ज्यादा वजन उठा रही है। अपना बैकपैक, राइफल, सिर पर रसद का एक भारी बैग, खाना पकाने वाला एक बर्तन और दोनों कंधों पर सब्जियों से भरे हुए झोले। उसके सिर पर रखा बैग जबरदस्त तरीके से संतुलित है और वह उन्हें बगैर हाथ लगाये ढलानों और फिसलनदार पथरीले रास्तों पर उतर सकती है। यह एक चमत्कार है। हम काफी लंबा चल चुके हैं। मैं इतिहास के अपने सबक की आभारी हूं क्योंकि उन तमाम चीजों के अलावा जो उससे मुझे मिलीं, कम से कम पूरे एक दिन मेरे पैरों को पूरा आराम मिला। जंगल में रात में पैदल चलना शायद सबसे खूबसूरत चीज है।
और अब मैं हर रात यही करने जा रही हूं।
नया दिन। नयी जगह। महुआ के विशाल पेड़ों तले उसिर गांव के बाहरी इलाके में हमने कैंप किया है। महुआ में अभी-अभी फूल आने शुरू हुए हैं और जंगल की छाती पर उसके मटमैले हरे ये फूल गहनों की तरह चू रहे हैं। हवा में इसकी मादकता घुली हुई है, जो सिर पर चढ़ रही है। हम भाटपाल स्कूल के बच्चों का इंतजार कर रहे हैं। ओंगनार की मुठभेड़ के बाद इसे बंद कर दिया गया था और अब यह पुलिस कैंप बन चुका है। बच्चों को घर भेज दिया गया। यही हाल नेलवाड़, मूंजमेट्टा, एडका, वेदोमकोट और धनोरा का है।
भाटपाल स्कूल के बच्चे नहीं आते।
मोस्ट वांटेड कॉमरेड नीति और कॉमरेड विनोद हमें एक लंबी सैर पर ले जाते हैं, जहां वे हमें स्थानीय जनताना सरकार द्वारा बनाये गये जल संग्रहण के ढांचे और सिंचाई तालाब दिखाते हैं। कॉमरेड नीति तमाम कृषि समस्याओं के बारे में बताती हैं। यहां सिर्फ दो फीसदी जमीन सिंचित है। दस साल पहले तक तो अबूझमाड़ में जुताई के बारे में सुना तक नहीं गया था। दूसरी ओर, गढ़चिरौली में संकर बीज और रासायनिक कीटनाशक तक घुस आये हैं।
कॉमरेड विनोद कहते हैं, ‘हमें अपने कृषि विभाग में तत्काल मदद की जरूरत है। हमें ऐसे लोग चाहिए जो बीज, जैविक खाद आदि के बारे में जानते हों। जरा सी मदद से हम बहुत कुछ कर ले जाएंगे।’
जनताना सरकार के इस इलाके के प्रमुख किसान हैं, कॉमरेड रामू। वह काफी गर्व से अपने खेत दिखाते हैं, जहां चावल, बैंगन, गोंगुरा, प्याज, कोलराबी उगाये गये हैं। इसके बाद उतने ही गर्व से वह हमें बहुत विशाल, लेकिन पूरी तरह सूखा हुआ एक सिंचाई तालाब दिखाते हैं। ये क्या है? ‘इसमें बरसात में भी पानी नहीं होता। दरअसल, यह गलत जगह खोदा गया है।’ यह कहते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, ‘यह हमारा नहीं है, इसे लूटी सरकार ने खोदा है।’ यहां दो समानांतर सरकारें हैं। जनताना सरकार और लूटी सरकार यानी लुटेरों की सरकार। मुझे कॉमरेड वेणु याद आते हैं : वे हमें सिर्फ इसलिए नहीं कुचलना चाहते कि उन्हें खनिज चाहिए, बल्कि इसलिए कि हम दुनिया को एक वैकल्पिक मॉडल दे रहे हैं।
हालांकि अब तक यह कायदे से विकल्प नहीं बन सका है – बंदूक के साथ ग्राम स्वराज का विचार। यहां जबरदस्त भुखमरी है, ढेरों बीमारियां हैं। इसके बावजूद इसने विकल्प की संभावनाएं तो पैदा की ही हैं। पूरी दुनिया के लिए नहीं, न अलास्का के लिए, न ही नयी दिल्ली के लिए और शायद समूचे छत्तीसगढ़ के लिए भी नहीं – सिर्फ अपने लिए। दंडकारण्य के लिए। और यह दुनिया का सबसे गूढ़ और गोपनीय रहस्य है। इसने अपने विनाश के एक विकल्प की नींव रखी है। इसने इतिहास को झुठलाया है। तमाम कठिनाइयों के बावजूद इसने अपने वजूद का एक खाका तैयार कर ही लिया। और आज इसे जरूरत है सहयोग की। इस जगह को डॉक्टर चाहिए, शिक्षक चाहिए, किसान चाहिए।
यहां युद्ध नहीं चाहिए।
लेकिन अगर इसे इन सबकी जगह सिर्फ युद्ध मिलता है, तो यह पलट कर मारेगा।
अगले कुछ दिनों के दौरान मेरी मुलाकात केएएमएस के नेताओं से होती है। जनताना सरकार के कई पदाधिकारी, दंडकारण्य आदिवासी किसान-मजदूर संगठन के सदस्यों समेत मैं मारे गये लोगों के परिवारों से भी मिलती हूं। और उन आम लोगों से भी, जो इतने भीषण समय में जीवन को संभालने की जद्दोजहद में लगे हैं।
इस शांत से दिखने वाले जंगल में जीवन का पूरी तरह सैन्यकरण हो चुका है। लोगों को कॉर्डन एंड सर्च, फायरिंग, एडवांस, रिट्रीट, एक्शन जैसे शब्द आते हैं। अपनी फसले काटने के लिए उन्हें पीएलजीए की जरूरत पड़ती है ताकि उसका संतरी गश्त दे सके। बाजार तक जाना तो एक फौजी कार्रवाई जैसा है। सारे बाजार मुखबिरों से भरे हुए हैं जिन्हें पुलिस ने पैसा देकर खरीद लिया है। मुझे बताया जाता है कि नारायणपुर में तो एक ‘मुखबिर मोहल्ला’ ही है, जहां कम से कम 4000 मुखबिर रहते हैं। आदमी तो खैर अब बाजार जा ही नहीं पाते। महिलाएं जाती हैं, लेकिन उन पर कड़ी नजर रहती है। वे जरा सा भी ज्यादा खरीदारी कर लें, तो पुलिस तुरंत आरोप लगाती है कि वे नक्सलियों के लिए खरीद रही हैं। दवा की दुकानों को साफ निर्देश है कि लोगों को बेहद कम मात्रा में दवाइयां दी जाएं। जन वितरण प्रणाली के तहत राशन की चीनी, चावल और मिट्टी का तेल पुलिस स्टेशनों के आसपास या उनके भीतर भंडारित किया जाता है, जिससे उसे खरीदना लोगों के लिए तकरीबन असंभव होता है।
आखिरी रात हम एक खड़ी चढ़ाई वाले पहाड़ के नीचे रुके। सवेरे हमें इसे पार कर सड़क पर निकलना था, जहां से एक मोटरसाइकिल मुझे ले जाएगी। पहली बार जब मैं इस जंगल में घुसी थी, तब से लेकर अब तक यह जंगल बदल चुका है। अब चिरौंजी, कपास और आम में बौर आने लगे हैं।
कुडुर गांव के लोगों ने हमारे लिए कैंप में ताजा पकड़ी हुई मछली से भरा एक बड़ा सा मटका भिजवाया है। और साथ में मेरे लिए उन 71 किस्म के फलों, सब्जियों, दालों और कीड़ों के नामों और उनके बाजार दाम की एक सूची भी, जो उन्हें जंगल में मिलते हैं या जिन्हें वे उगाते हैं। यह सिर्फ एक सूची है, लेकिन यह एक दुनिया का नक्शा भी है।
हम जंगल पोस्ट तक पहुंचते हैं। फिर से दो बिस्कुट! कॉमरेड नर्मदा की ओर से एक कविता और एक पिचका हुआ फूल मुझे भेंट किया जाता है! और एक प्यारा-सा खत मासे की ओर से (कौन है वह? क्या मैं कभी जान पाऊंगी?)।
कॉमरेड सुखदेव पूछते हैं कि क्या वह मेरे आइपॉड में से एक गीत अपने कंप्‍यूटर में डाल सकते हैं। हम सुनते हैं, फैज अहमद फैज का लिखा शेर, इकबाल बानो की आवाज में, जो उन्होंने जिया-उल-हक की जुल्मतों के चरम दौर में लाहौर के एक मशहूर कंसर्ट में गाया था -
जब अहल-ए-सफ़ा-मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाये जाएंगे सब ताज उछाले जाएंगे सब तख्त गिराये जाएंगे हम देखेंगे।
पाकिस्तान में इस गीत को सुनने वाले पचास हजार श्रोताओं के मुंह से इसके बाद बस एक ही आवाज निकली थी : इंकलाब जिंदाबाद! इंकलाब जिंदाबाद!
इतने सालों बाद यही नारा इस जंगल में गूंज रहा है। अजीब बात है। रिश्ते भी कैसे-कैसे बन जाते हैं।
(यह लेख आउटलुक अंग्रेजी में छपे अरुंधति रॉय के लेख वॉकिंग विद द कॉमरेड्स का संपादित और अनूदित अंश है। इसका अनुवाद युवा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्‍तव ने किया है।)