Sunday, July 31, 2011

पत्रकार हत्या-2 : वे जो अब नहीं रहे


 देवेन्द्र प्रताप
कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) संस्था ने 13 देशों पर आधारित एक रिपोर्ट में पत्रकारों की हत्या की गुत्थी सुलझाने वाले देशों में भारत को 13 वें पायदान पर रखा है। सीपेजे ने पाकिस्तान को 10 वें, जबकि बाग्लादेश को 11 वें स्थान पर रखा है। यह रिपोर्ट 1 जनवरी, 2001 से 31 दिसंबर 2010 के दौरान पत्रकारों पर हुए हमलों के ऊपर आधारित है। इस रिपोर्ट को पढ़कर पत्रकारिता के पेशे में किसी नए आगंतुक बेहद धक्का लगेगा, जब उसे पता चलेगा कि अभी तक पत्रकारों की ज्यादातर हत्याएं ड्यूटी के दौरान ही हुई हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट में इराक और फिलीपीन को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक स्थान साबित किया गया है। सीपीजे की रिपोर्ट भी यही दावा करती है। उसके अनुसार पत्रकारों की हत्या से सबसे ज्यादा अनसुलझे मामले इराक में हैं। वहां उपरोक्त समयावधि में 92 मामले अनसुलझे पाए गए, जबकि फिलीपीन में 56 मामलों पर कोई सुनवाई नहीं हुई। श्रीलंका और कोलंबिया का स्थान इसके बाद आता है। इराक को पत्रकारों के मामले में खलनायक करार देने से पहले, इस मामले में अमेरिका की भूमिका पर भी जरूर विचार करना चाहिए। इस मामले में यूनेस्को रिपोर्ट पूरी तरह मौन है। मध्यपूर्व के देशों में बड़े पैमाने पर पत्रकारों पर हुए हमलों और उनकी हत्याओं में अमेरिका की भूमिका पर पर्दा हटना अभी बाकी है।

भारत: जिन्हें अभी जाना नहीं चाहिए था
प्रदीप भाटिया हिंदुस्तान टाइम्स दिल्ली संस्करण के लिए फोटो रिपोर्टिंग का काम करते थे। वर्ष 2000 में वे हिजबुल मुजाहिद्दीन के श्रीनगर बंद की कवरेज के लिए वहां गए हुए थे। 10 अगस्त की दोपहर एक बम विस्फोट की सूचना पर वे घटनास्थल की ओर रवाना हुए। जब वे घटनास्थल पर पहुंचे, उसी समय एक और विस्फोट में प्रदीप के साथ वहां खड़े हुए 11 और लोगों की मौत हो गई। प्रदीप ने 1996 हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़े थे। इससे पहले उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड में काम किया था।
गोपाल सिंह बिष्ट आज तक में कैमरामैन थे। 30 सितंबर 2001 को वे कांग्रेस पार्टी के नेता माधवराव सिंधिया के साथ कानपुर में किसी रैली को कवर करने के लिए जार रहे थे। बिष्ट के 50 वर्ष का होने के बावजूद वे बहुत उत्साही प्रकृति के थे। इसलिए संस्थान उन्हें जहां भी कोई स्टोरी कवर करने के लिए कहता वे तुरंत तैयार हो जाते। उनके पास अपने क्षेत्र का करीब 25 साल का अनुभव था। विमान में उनके साथ पांच और पत्रकार थे। रास्ते में विमान में आग लगने के बाद हुए विस्फोट में उस पर सवाल सभी लोगों की मौत हो गई।
विक्रम बिष्ट एशियन न्यूज इंटरनेशनल में फोटोग्राफर थे। 13 दिसंबर को संसद भवन पर हुए हमले की कवरेज के दौरान उन्हें भी गोली लगी थी। इसके वे लगभग अपंग ही हो गए। हमेशा दौड़भाग करने वाले विक्रम को लगी आतंकवादियों की गोली ने उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेने का मजबूर कर दिया। 9 जनवरी 2003 को व्हीलचेयर से वे फिसलकर गिर पड़े। इस बार गिरने के बाद वे कभी नहीं उठ सके। अभी वे 28 साल के ही थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी के अलावा उनका एक छोटा बच्चा है।
रमेश चंद्र चोपरा सिख आतंकवाद के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने अपने कई लेखों में इसकी मुखालफत भी की। उनके पिता का नाम लाला नारायण था, जिन्होंने तीन भाषाओं

Thursday, July 28, 2011

पत्रकार हत्या-1: कलम के सिपाहियों की खतरे में जिंदगी

 देवेन्द्र प्रताप
जिस समय देश आजाद हुआ, उस समय सत्ता के साथ माफिया, भ्रटाचारियों और दूसरे जनविरोधी तत्वों की एक दूरी थी। यह बात हमारे देश के ऊपर ही नहीं लागू होती, वरन हर उस देश के ऊपर भी लागू होती है, जहां जनता को आजादी के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। 1990 वह मुकाम है, जिसके बाद से यह माहौल तेजी से बदला, भारत ही नहीं दुनिया के पैमाने पर भी। नई आर्थिक नीतियों के श्रीगणेश के साथ ही हमारे देश में निजीकरण और उदारीकरण का बढ़ावा मिला, जिसने समाज में पहले से मौजूद जनतांत्रिक मूल्यों को खत्म करने का काम किया। पत्रकारिता के पेशे में भी यह बदलाव आया। सत्ता के साथ माफिया और भ्रष्टाचारियों का गठजोढ़ बढ़ा और धीरे-धीरे इसने पूरी व्यवस्था को अपने शिकंजे में ले लिया। सत्ता, माफिया और भ्रष्टाचारियों के इस गठजोड़ ने लोकतंत्र के पहरेदार पत्रकारों से जब-जब खतरा महसूस हुआ, उसने उनके ऊपर हमला किया। कई पत्रकारों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। आगे भी यह सिलसिला तक तक जारी रह सकता है, जब तक कि इस माहौल में कोई आमूलचूल तब्दीली नहीं होती। पत्रकारों की हत्याओं के विविध पहलुओं की पड़ताल करती पेश है देवेन्द्र प्रताप की रिपोर्ट

सलीम शहजाद बनाम पाक लोकतंत्र
पाकिस्तान में पत्रकारों के काम की परिस्थितियां बहुत कठिन हैं। सलीम शहजाद को भी इस बारे में बहुत अच्छी तरह पता था। इसके बावजूद उन्होंने कभी भी अपने पेशागत वसूलों के साथ समझौता नहीं किया, जिसकी कीमत उन्हें अपने जान से चुकानी पड़ी। शहजाद से पहले भी पाकिस्तान में पत्रकारों की हत्याएं होती रही हैं, लेकिन उनके बारे में दुनिया को पता नहीं चल पाया। शहजाद की हत्या की इतनी चर्चा होने का एक बड़ा कारण एबटाबाद अभियान से भी जुड़ता है। अमेरिका द्वारा ओसामा के खिलाफ चलाए गए इस अभियान के बाद कुछ ऐसी परिस्थियां बनीं, जिसके बाद पाकिस्तान की बहुत ज्यादा फजीहत हुई। जाहिर सी बात है मीडिया पर भी इसका प्रभाव पड़ा। यही वजह रही कि इस दौरान जब शहजाद की हत्या हुई, तो वह तुरंत ही पूरी दुनिया की नजर में आ गया। नसरुल्लाह अफरीदी का मामला भी अब सामने आ चुका है। कुल मिलाकर देखा जाए, तो जनवरी 2000 से अभी तक पाकिस्तान में कुल 74 पत्रकार मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान में 2002 के बाद जिस तेजी से मीडिया का विस्तार हुई पत्रकारों की हत्याओं, उन पर हमलों और उनको दी जाने वाली धमकियों में भी इजाफा हुआ है। 2002 से 2011 के बीच नौ सालों में पाकिस्तान में 90 पत्रकारों का अपहरण किया जा चुका है, 270 से ज्यादा पत्रकारों को जान से मारने की धमकियां मिलीं, जबकि 19 पत्रकारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। जिस तरीके से पाकिस्तान अमेरिका का पिठ्ठू बना रहा है, जिस तरह से वहां धार्मिक कठमुल्लापन को बढ़ावा मिलता रहा है, ऐसे में प्रगतिशील और लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या तो होना ही है।
और कितने ज्योतीन्द्र
पाकिस्तान में सलीम शहजाद और भारत में ज्योतीन्द्र की हत्या के बाद, यूनेस्को की दुनिया भर में पिछले चार सालों में हुई पत्रकारों की हत्याओं पर रिपोर्ट ने इस मुद्दे को गरमाहट दी है। यही वजह है कि इस समय न सिर्फ पाकिस्तान, वरन भारत में भी पत्रकार संघों ने इसके खिलाफ नए सिरे से मोर्चा खोल दिया है। यूनेस्को ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि पूरी दुनिया में वर्ष 2006 से 2009 तक 247 पत्रकार मारे गए हैं। पत्रकारों की हत्याएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन आमतौर पर भारत ही नहीं दुनियाभर में सरकारें इस पर चुप्पी ही धारण करती रही हैं। जिस समय वीपी सिंह मुख्यमंत्री थे उस समय की बात अगर छोड़ दें, तो आमतौर पर पत्रकारों की हत्याएं तो लगभग हर साल होती रहीं, लेकिन चाहे राज्य सरकार हो या फिर केंद्र सरकार, सबने चुप्पी ही साधी है। यही वजह रही कि उपरोक्त समयावधि में यानी तीन सालों में भारत में छह पत्रकार मारे जाते हैं, लेकिन कहीं से चूं तक नहीं होती। आखिर लोकतंत्र की रक्षा में सबसे अहम भूमिका निभाने वालों की हत्याओं पर यह चुप्पी लोकतंत्र की सेहत के लिए कितनी सही कही जा सकती है।
यूनेस्को की पत्रकारों की हत्याओं से संबधित रिपोर्ट से अलग-अलग देशों के पत्रकार अगर सिर्फ अपने लिए नतीजे निकालते हैं, तो भी यह गलत होगा, क्योंकि पत्रकार चाहे जिस देश का हो, अगर उसकी हत्या होती है, तो इससे लोकतांत्रिक मूल्यों की भी हत्या होती है। इसलिए आज यह सोचना बेहद जरूरी है कि अगर दुनिया भर में आग लगी हुई है, तो उस आग में हमारा घर भी नहीं बचने वाला। वैसे भी वैश्वीकरण के बाद से श्रम और पूंजी का ही वैश्वीकरण नहीं हुआ है, अपराध का भी वैश्वीकरण हुआ है। हालांकि ऐसा लगता है कि फिलहाल अभी इस रूप में सोचने और फिर उस आधार पर व्यवहार में उतरने में काफी वक्त लगेगा। यूनेस्को की इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 में एक साल में ही दुनिया भर में 69 पत्रकार मारे जाते हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या इराक की है। वहां इस समयावधि में 29 पत्रकार मारे गए। इस समयावधि में फिलीपीन में छ, पाकिस्तान में दो, अफगानिस्तान में तीन, रूस में तीन और श्रीलंका में चार पत्रकार मारे गए। वर्ष 2008 में भी इराक में सबसे ज्यादा पत्रकार मारे गए। इस वर्ष दुनिया भर में कुल 49 पत्रकार मारे गए, जिसमें से अकेले इराक में 11 पत्रकारों की हत्या हुई। इस समयावधि में जार्जिया में पांच, मैक्सिको और रूस में चार-चार, भारत में चार और फिलीपीन में तीन पत्रकारों की हत्या हुई। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार 2009 में दुनिया भर में सबसे ज्यादा कुल 77 पत्रकारों की हत्या हुई। इस साल सबसे ज्यादा, कुल 34 पत्रकार फिलीपीन में मारे गए। इराक, रूस और अफगानिस्तान में इस वर्ष चार-चार पत्रकारों की हत्या हुई, जबकि सोमालिया और मैक्सिको में सात-सात पत्रकार मारे गए। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के मुताबिक पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में फिलीपीन का तीसरा स्थान है। इराक पहले स्थान पर, जबकि सोमालिया दूसरे स्थान पर हैं। फिलीपीन के राष्ट्रीय पत्रकार संघ की रिपोर्ट के अनुसार वहां वर्ष 1986 से 2011 के बीच 145 पत्रकार मारे गए, जबकि सिर्फ 10 लोगों को सजा हुई। 2009 में साउथ फिलपीन में राजनीतिक संघर्ष के दौरान 31 पत्रकार मारे गए। किसी को भी ताज्जुब हो सकता है कि इस संघर्ष कुल 57 लोग मारे गए थे। यानी पत्रकारों को निशाना बनाकर मारा गया।
क्यों जरूरी है पत्रकार सुरक्षा बिल
पत्रकारिता को लोकतंत्र का एक मजबूत स्तंभ माना जाता है। ऐसे में पत्रकारों की हत्या पर सरकार की चुप्पी किसी भी मायने में सही नहीं है। भारत में मिड के वरिष्ठ पत्रकार जेडे की हत्या के बाद से देश के पत्रकार सरकार से अपनी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। सामान्यतया पत्रकारों की हत्याएं उनके पेशागत कारणों की वजह से ही होती हैं। यह भी एक बड़ा कारण होता है रिपोर्टर जब फील्ड में होता है, उसी समय उसके ऊपर सबसे ज्यादा हमले की आशंका रहती है। उनका तर्क है कि आखिर बॉलीवुड हस्तियों को, नेताओं और बाबाओं की अगर सरकार सुरक्षा की जिम्मेदारी ले सकती है, तो पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उसे लेनी चाहिए। वैसे भी संविधान में हर व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी की बात कही गई है। इसके लिए पत्रकारों ने सरकार से पत्रकार सुरक्षा बिल लाने की मांग की है। सरकार इस बिल के प्रति अन्मयस्कता प्रदर्शित कर रही है। इसकी कुछ खास वजह है। वह जिन अपराधियों और माफिया तत्वों या भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ अपनी कलम चलाता है, वे आज पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली हैं। हालत यह है कि ये तत्व देश की व्यवस्था में इस तरह घुलमिल गए हैं कि सरकार उनके खिलाफ कोई भी फैसला लेने में हिचकिचाती है। माफिया तत्वों के साथ सांठगांठ कर चुनाव जीतने वाली पार्टियों से आखिर इससे ज्यादा उम्मीद ही क्या की जा सकती है। इस समय ज्यादातर पार्टियां खुद इस तरह के आरोपों का सामना कर रही हैं, जिनके खिलाफ पत्रकार लड़ता है। जाहिर है ऐसे में राजनीतिक पार्टियों अपने पांव में कुल्हाड़ी मानने का काम नहीं करेंगी।
महाराष्ट्र का मामला थोड़ा अलग होने के बावजूद ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र सरकार भी इस मामले में खानापूर्ति करने में ही लगी है। महाराष्ट्र में जहां कांगेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे ने पत्रकार सुरक्षा विधेयक की मांग का समर्थन किया है, वहीं मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इस विधेयक के बारे में पत्रकारों को आश्वस्त किया है कि वे कैबिनेट की बैठक में इस विधेयक के प्रारुप को जरूर रखेंगे। चव्हाण भले ही पत्रकारों को आश्वासन दे रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि वे इस विधेयक को वे पिछले तीन सालों में नहीं पारित करवा पाए हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना जैसी कुछ ऐसी पार्टियां भी हैं, जो इस विधेयक का विरोध करती है। ऐसे में चव्हाण साहब के आश्वासन पर कितना भरोसा किया जाए। पिछले साल चव्हाण साहब ने इस विधेयक पर आपसी सहमति के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, लेकिन उन्हें सभी दलों का इस बारे में समर्थन नहीं मिल सका। राजनीतिक पार्टियों इस विधेयक से इसलिए डर रही हैं क्योंकि यह विधेयक पत्रकारों पर हमले को गैरजमानती अपराध की श्रेणी में रखता है। इसलिए विधेयक के विरोधियों को आशंका है कि इसके लागू हो जाने से पत्रकारिता के नाम पर धंधा चमकाने वाले लोगों को शह मिलेगी। देश के राजनेताओं का यह बयान उनके इरादों को स्पष्ट करने के लिए काफी है। इस देश की बदकिस्मती ही है कि ऐसे ही लोग आज लोकतंत्र के नाम पर अपना धंधा चमकाने में लगे हैं। इस विधेयक का मामला पत्रकारों की जिंदगी से जुड़ा हुआ है, ऐसे में इस तरह का बयान देश की राजनीति में पतित तत्वों के प्रवेश को ही दर्शाता है।

Wednesday, July 27, 2011

मेक्सिको: पहला शिकार, लंबी है कतार

देवेन्द्र प्रताप
मेक्सिको लैटिन अमेरिका का सर्वाधिक आबादी वाला देश है। 2007 में मेक्सिको में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 21 प्रतिशत बढ़कर 1 करोड़ 57 लाख डालर पर पहुंच गया। यह 2007 से पहले का सर्वाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश था। इससे पहले 2001 में यहां 2 करोड़ 95 लाख डालर का प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश हुआ था। दूसरे देशों की तरह मेक्सिको में भी 1991 से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ना शुरू हुआ। उदारीकरण और निजीकरण ने मेक्सिको की अर्थव्यथा को साम्राज्यवाद के साथ नाभिनालबद्ध कर दिया। 1990 में लैटिन अमेरिका में सकल वैश्विक प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश 32 प्रतिशत था, यह 1998 में 43 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसलिए यह समझना भूल होगी कि एफडीआई का कुप्रभाव सिर्फ मेक्सिको पर पड़ा। अर्जेंटीना, चिली, निकारागुआ, ब्राजील जैसे देश भी सामा्रज्यवाद के ऊपर निर्भर होते जाने के साथ ही उनकी अर्थव्यवस्था असाध्य तौर पर संकटग्रस्त होती गई।
इस समय मेक्सिको में होने वाले कुल विदेशी निवेश का करीब आधा अमेरिका की ओर से किया जाता है। हालैंड (15%) और स्पेन (10%) का स्थान अमेरिका के बाद आता है। मेक्सिको में निवेशकर्ताओं ने यह आश्वासन दिया कि इससे वहां के लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा। हालांकि बाद में यह साबित हो गया कि यह एक कोरी गल्प के सिवा कुछ नहीं था। एफडीआई बढ़ने के साथ ही वहां के पारंपरिक रोजगार के अवसर भी खत्म होते गए। सबसे खतरनाक बात यह रही कि मेक्सिको की अर्थव्यवस्था की इस प्रवृत्ति ने उसे निवेशकर्ता देशों के ऊपर पूरी तरह निर्भर बनाने का काम किया। यही वजह रही कि 2008 में अमेरिका में आर्थिक मंदी के आते ही मेक्सिको बुरी तरह बर्बादी के कगार पर पहुंच गया।
मेक्सिको में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर रहा। भारत की तरह ही वहां भी रिटेल क्षेत्र रोजगार का दूसरा बड़ा स्रोत रहा है। इसलिए वहां कृषि क्षेत्र में एफडीआई के बढ़ने के साथ ही मेक्सिको में खाद्य संकट पैदा हो गया। इसके पहले खाद्यान्न के मामले में मेक्सिको लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर था। इस समय वह रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली खाद्य वस्तुओं तक के लिए अमेरिका, स्पेन जैसे देशों की खाद्य पदार्थों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के ऊपर निर्भर हो चुका है। आज मेक्सिको को कुल सोया उपभग का 95 प्रतिशत, कुल चावल उपभोग का 58 प्रतिशत, गेहूं 49 प्रतिशत और कुल मांस उपभोग का 40 प्रतिशत विशालकाय खाद्य वस्तुओं का व्यापार करने वाली वालमार्ट जैसी कंपनियों से खरीदना पड़ता है। वालमार्ट के बारे में अमेरिका और लैटिन अमेरिका में कहा जाता है कि उसने अमेरिका/लैटिन अमेरिका के जिस भी इलाके में अपने स्टोर खोले, वहां के किसान तुलनात्मक रूप में और भी गरीब हो गए। आज वह यह कारनामा समूची दुनिया में दोहराने की तैयारी कर रही है। लैटिन अमेरिका को तबाह करने के बाद अब भारत उसकी पहली पसंद बनने वाला है। बहरहाल, मक्का उत्पादन के लिए प्रसिद्ध मेक्सिको की हालत यह है कि वहां के किसान आज बर्बाद हो रहे हैं। एक आंकलन के अनुसार इस समय वहां मक्का उत्पादन करने वाले करीब 20 लाख किसान भयंकर गरीबी में जीवन जीने का अभिशप्त हैं। वहां पर हर दिन करीब 600 किसानों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ रहा है। उत्पादन और वितरण पर साम्राज्यवादी पूंजी की इजारीदारी का खामियाजा मेक्सिको को सबसे पहले झेलना पड़ा, लेकिन आज दुनिया भर में उसके कई और संगी साथी पैदा हो गए हैं। जिस तरह भारत की अर्थव्यवस्था आज उधारी की सांस पर जिंदा रहने को मजबूर है, ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले समय में यहां के हालात भी मेक्सिको जैसे ही विस्फोटक हो सकते हैं।

Monday, July 25, 2011

दूसरे दर्जे की नागरिकता का दर्द


शबनम हाशमी
हमारे देश का मुस्लिम समुदाय लोकतंत्र में विश्वास करता है . इसके बावजूद उनके मन में भय और उससे पैदा हुई निराशा की एक सार्वभौमिक भावना मौजूद है। एक प्रक्रिया में सत्ता से इनका मोहभंग हुआ है। यह मोहभंग सिर्फ पुलिस और न्यायपालिका के साथ ही हुआ हो, ऐसा भी नहीं है; राजनीतिक दलों के साथ और कुछ हद तक मीडिया पर भी उनका भरोसा धीरे-धीरे कम हुआ है। मीडिया ने मुसलमानों को आतंकवादी चेहरा पहनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी है। हमारे मुल्क में आज भी मुसलमानों को बेवजह लंबे समय तक हिरासत में रखना, गिरफ्तारी के बाद जमानत न मिलना, न्यायिक कार्रवाई में उनके प्रति पक्षपातपूर्ण जांच और परीक्षण एक आम बात है। दूसरी ओर शिक्षा, रोजगार, आवास और सार्वजनिक सेवाओं से यह समुदाय कमोवेश वंचित ही है। सत्ता आमतौर पर मुसलमानों के प्रति असंवेदनशीलता का प्रदर्शन करती है, यही वजह है कि उनके मन में दूसरे दर्जे की नागरिकता का दर्द गहरे बैठता जा रहा है।
संवैधानिक और वैधानिक गारंटी के बावजूद हकीकत तो यही है कि मुस्लिमों के ऊपर सत्ता की ओर से होने वाले हमलों में इजाफा ही हुआ है। मुसलमानों के बीच आधुनिक शिक्षा का प्रसार न होने के कारण भी आज इनके बीच का एक बड़ा हिस्सा देश की मुख्यधारा की शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से कटा हुआ है। सरकार की ओर से इनके लिए जो योजनाएं बनती हैं, वे दरअसल रस्म अदायगी भर हैं। इन योजनाओं का लाभ भी इस तबके के जरुरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाता।
जहां तक भारत के मुसलमानों के आतंकवाद से जुड़ने का मामला है वह एक सफेद झूठ है। अमेरिकी तक इस बात को मानता है कि भारत के मुसलमानों का आतंकवादी शक्तियों से कोई लेना देना नहीं है। यह बात विकीलीक्स द्वारा अमेरिकी दस्तावेजों के खुलासे के बात सामने आयी। भारत का मुसलमान न सिर्फ आतंकवाद से दूर है वरन वह अपने देश के प्रति पूरी तरह इमानदार है। अगर कोई इस प्रमाण को देखना चाहे तो गार्जियन के अंकों में इसकी छानबीन कर सकता है। पूर्व अमेरिकी राजनयिक डेविड मलफोर्ड ने इस मसले पर तो यहां तक कहा है कि भारत के मुसलमानों के ऊपर न तो अलगाववाद और न ही धार्मिक चरमंपथियों का ही कोई प्रभाव है। जहां तक देश में कट्टर इस्लामिक शक्तियों की पैठ का मामला है, यह बात भी आज दिन के उजाले की तरह साफ है कि भारत में मुसलमानों का बड़ा हिस्सा किसी भी धार्मिक संगठन से जुड़ा नहीं है। वह लोकतंत्र में कम ही सही, लेकिन विश्वास करता है। हकीकत तो यह है कि उसकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला आज न तो कोई धार्मिक संगठन है और न ही राजनीतिक संगठन। यानी समग्रता में देखा जाए तो वह आज एक ऐसी विकल्पहीन दुनिया में जी रहा है, जहां धार्मिक और राजनीतिक शक्तियां उसकी हितैषी बनकर उसे ठगने का काम करती हैं। यही हाल हिंदुओं का भी है, जिनका आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे सांप्रदायिक संगठन अपने हितों के हिसाब से उपयोग करते हैं।
2008-09 में संघ के नापाक इरादों का भंडाफोड़ करने के लिए अनहद, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन, फाउंडेशन आफ सिविल सोसाइटीज, इंसाफ, जामिया टीचरर्स सालिडरिटी एसोसिएशन, संदर्भ और सियायत से जुड़े सदस्यों ने देश भर के करीब 300 बुद्धिजीवियों, राजनेताओं ने एक बैठक की थी। इस बैठक में यह तय किया गया था कि देश में मुस्लिम समुदाय की स्थिति पर गम्भीर शोध करके सच्चाई को बाहर लाया जायेगा। देश भर में मुसलमानों के बीच काम करने वाले स्वयं सेवी संगठनों ने भी इस बात को गहराई से एहसास किया कि इस तरह का प्रयास बेहद जरुरी है। इस बैठक में एबी बर्धन, बिलाल काजी, दिग्विजय सिंह, इफ्खिर गिलानी, प्रशांत भूषण, सीताराम येचुरी और तरुण तेजपाल जैसे सैकड़ों गणमान्य लोग मौजूद थे। इसी का परिणाम था कि ‘मुस्लिम इन इंडिया टूडे’ रिपोर्ट सामने आयी। यह रिपोर्ट मुसलमानों की वास्तविक जिंदगी की जद्दोजहद को काफी हद तक सामने लाने में कामयाब हुई। इस रिपोर्ट में ऐसे सैकड़ों परिवारों की व्यथा दर्ज है, जो आज भी आजाद मुल्क में एक समुदाय विशेष से ताल्लुक रखने का दर्द झेलने के लिए अभिशप्त हैं। आज इस तरह के प्रयासों की और भी ज्यादा जरुरत है।

Sunday, July 24, 2011

जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोटी उस खेत के हर खोश-ए-गंदुम को जला दो -फैज


इस समय समूची दुनिया में मेहनतकशों के ऊपर पूजीपति वर्ग एकजुट होकर हमले कर रहा हैलेकिन अब जनता उसका प्रतिकार भी करने लगी है. जनता कि तरफ से किया जाने वाला यह प्रतिकार कहीं कमजोर है तो कहीं बहुत मजबूत. इस लेख में मैंने पाकिस्तान और ब्राजील कि जनता की ओर से किये जाने वाले प्रतिकार के रूप में वहां के किसान आन्दोलन पर कुछ बातें कि है.
देवेन्द्र प्रताप
आज तरह का माहौल है उसमें पाकिस्तान का नाम आते ही लोग तालिबान और आतंकवाद के बारे में सोचने लगते हैं। यह ध्यान में ही नहीं आता कि वहां की जनता की भी रोजी-रोटी की समस्याएं हैं। किसान आंदोलन की अगर बात करें, तो वहां का अन्नदाता भी देश के अन्नदाता की तरह ही परेशान है। तीन महीन पहले अप्रैल में पाक अधिकृत पंजाब में 15 हजार से ज्यादा किसान जुटे। ध्यान देने की बात यह है कि किसानों के इस आंदोलन में करीब 5000 किसान महिलाएं भी थीं। यह समूचा क्षेत्र फौज के कंट्रोल में है। इसलिए जब-जब किसानों ने आंदोलन किया उसके ऊपर सत्ता का दमन का पाटा चला दिया गया। पचास सालों में इस क्षेत्र के किसानों ने कई पार्टियों का रंग देखा, लेकिन किसी को भी अपना हमदर्द नहीं पाया। पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टियों पीपीपी और पीएमएल तक से किसानों का मायूसी मिली। किसान आंदोलन का राष्ट्रीय नेतृत्व न होने के बावजूद सामान्य किसान नेताओं ने अपने आंदोलन का राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने में कोई कोर कसर नहीं बाकी रखी। पाकिस्तान के वर्तमान किसान आंदोलन ने इस साल जनवरी से अप्रैल माह के बीच सबसे ज्यादा उग्र रहा। हालांकि मीडिया के कमोवेश बहिष्कार के चलते इसे ज्यादा बड़े पैमाने पर प्रचार नहीं मिल सका। कुल्याना मिलिट्री फार्म में किसानों के ऊपर फायरिंग में कई किसान मारे गए और आंदोलन का दबा दिया गया, लेकिन अभी भी वहां राख के नीचे जो आग जिंदा है वह कब दावानल बन जाएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। इस समय पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर कारपोरेट फार्मिंग का भी चलन शुरू हुआ है। जिस समय उपरोक्त आंदोलन शुरू हुआ उसी दौरान वहां की सरकार करीब 10 लाख हेक्टेयर जमीन को अरब मुल्कों की कई निजी कंपनियों को फार्मिंग के लिए देने का मन बना रही थी। एक आंकलन के अनुसार सरकार के इस कदम से कृषि क्षेत्र में 400 मिलियन से ज्यादा का पंूजीनिवेश होने की उम्मीद है। पाक सरकार पहले ही आठ लाख करोड़ एकड़ जमीन इस तरह की निजी कंपनियों के हवाले कर चुकी है। वहां की सरकार यह सब काम फूड सिक्योरिटी के नाम पर कर रही है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस देश की 16 करोड़ की आबादी का करीब 45 प्रतिशत खेती से जुड़ा हो, जहां सकल घरेलू उत्पाद का करीब 21 प्रतिशत खेती से प्राप्त होता हो, वहां कारपोरेट फार्मिंग से किसानों का कितना •ाला होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
अमेरिका की अगर प्रेत छाया देखना हो तो लैटिन अमेरिका से बेहतर शायद ही कोई जगह होगी। वहां साम्राज्यवाद का शोषण भी चरम पर है, तो उसका प्रतिरोध भी। जब से वहां कारपोरेट फार्मिंग ने गति पकड़ी वहां भी मिहीन किसानों की तादाद भी उसी अनुपात में बढ़ती गई। आज वहां भूमिहीन किसानों का आंदोलन व्यापक सामाजिक आंदोलन की शक्ल ले चुका है। इस समय वहां के 26 में से 23 राज्यों के 475,000 परिवारों के करीब 10.5 लाख भूमिहीन किसान इस आंदोलन से जुड़ चुके हैं। ब्राजील की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां की बमुश्किल 3-4 प्रतिशत आबादी देश की कुल कृषि योग्य भूमि के करीब तीन चौथाई हिस्से पर काबिज है। ब्राजील में 60 के दशक में शुरू हुई कारपोरेट फार्मिंग ने 1980 तक आते-आते अपने हाथ-पांव काफी पसार लिया। हालत यह हो गई कि 1980 में वहां के करीब 30.7 करोड़ में होने वाली कारपोरेट खेती का करीब 77 प्रतिशत यानी लग•ाग 28.5 करोड़ हेक्टेयर लैटिफुंडिया के पास चला गया। यह एक तरह की कारपोरेट फार्मिंग का ही रूप था, जिस पर भूमिहीन किसान गुलामों की तरह खटने का मजबूर थे। इन्हीं स्थितियों में वहां का किसान आंदोलन पैदा हुआ। इस आंदोलन का संक्षेप में एमएसटी कहा जाता है। इसने लैटिन अमेरिका की समाजवादी देश क्यूबा से प्रेरणा ली और देखते ही देखते सत्ता और पूंजीवादी समाज के खिलाफ वर्गीय रूप अख्तियार कर लिया। यह आंदोलन पचासों साल बाद आज भी जारी है। इस दरम्यान इसने करीब 50 हजार से ज्यादा किसानों का पढ़ना-लिखना सिखाया, ताकि वे इस आंदोलन का गति दे सकें। वैसे तो ब्राजील में 60 के दशक से ही भूमिहीन के आंदोलन ने गति पकड़ी, लेकिन 80 के दशक तक आते-आते यह व्यापक आधार बना चुका था। इससे घबराकर वहां की तानाशाह सरकार ने किसानों के आंदोलन का •ायंकर दमन किया। यह सरकार द्वारा समूचे ब्राजील के पैमाने पर किया गया किसानों का एक नेशनल इनकाउंटर था। इन्हीं परिस्थितियों में किसानों का संगठन एमएसटी बना। यह कोई केंद्रीकृत संगठन न होकर देश भर के किसान संगठनों की समन्वय समिति जैसा है। इस समय ब्राजील के 20 राज्यों से एमएसटी के कुल 400 सक्रिय राष्ट्रीय नेता हैं। इनमें से 60 सदस्य उसकी केंद्रीय राष्ट्रीय संयोजन समिति से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर नेत्त्व देने वाले एमएसटी के 15 सदस्य अलग-अलग संगठनों से जुड़े हैं और सभी गुप्त तौर पर ही काम करते हैं। इसकी वजह सरकारी दमन है। इस समय न सिर्फ लैटिन अमेरिका में वरन एक हद तक समूची दुनिया में एमएसटी जितने बड़े व्यापक आधार वाला कोई दूसरा किसानों का संगठन नहीं है। यह, धर्म, क्षेत्र और लैंगिक असमानताओं में विश्वास न करके वर्गीय विभेद को ही महत्व देती है। इसका मानना है कि समाज में मौजूद वर्गीय विभेद ही किसानों की गरीबी की मुख्य वजह हैं। यही इस संगठन कि सबसे बड़ी खूबी है। भारत के किसानों को ब्राजील के किसानों से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है।

दहंका
- किसान, खोश गंदुम- गेहूं कि बाली

मंहगाई ने छीना आम आदमी का निवाला


देवेन्द्र प्रताप
दो साल पहले आई वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से ऐसा लगता है कि आम जनता को मंहगाई की नजर लग गई है। अभी तक फ्रांस, अल्जीरिया, ग्रीस, ब्रिटेन आदि देशों की जनता मंहगाई के खिलाफ सड़कों पर उतर कर अपने दर्द को बयां कर चुकी है। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध ‘खाद्य और कृषि संस्था’ की रिपोर्ट ने भी स्वीकार किया है कि इस समय भारत समेत समूची दुनिया में खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। चीन, वियतनाम, श्रीलंका में तो और भी बुरा हाल है। यही हाल ब्राजील समेत ज्यादातर अफ्रीकी देशों का भी है, जहां खाद्य सामग्री की पहले से ही तंगी पर मंहगाई के तड़के ने लोगों के जीवन को नर्क बना दिया है। हालत यह है कि अल्जीरिया में अभी पिछले दिनों खाद्य सामग्री के लिए दंगे तक हुए हैं। एक समय यूरोप को सभ्यता का पाठ बनाने वाला ग्रीस इस समय भिखमंगा बना हुआ है। इस देश के ऊपर वर्तमान समय में कुल 340 अरब यूरो का कर्ज है, जबकि वहां का हर नागरिक 31 हजार यूरो के कर्ज के नीचे दबा हुआ है। यहां युवाओं में बेरोजगारी की दर 43 प्रतिशत पर पहुंच गई है। खाने-पीने की चीजों के दाम को लेकर वहां पहले से ही हाहाकार मचा हुआ है, ऊपर से सरकार 28 अरब यूरो बचाने के चक्कर में सरकारी खर्चे में कटौती और जनता के ऊपर अतिरिक्त कर लगाने जा रही है। सरकार के इस जनविरोधी कदम के खिलाफ वहां की जनता ने सड़क पर उतरकर सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रखा है। जल्दी ही वहां के सभी मजदूर संगठन भी हड़ताल पर जाने वाले हैं, इसके बाद पूरी उम्मीद है कि ग्रीस की स्थिति और विस्फोटक हो जाएगी। पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे ग्रीस को इस संकट से निकलने के लिए फिर से कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। उम्मीद है कि आईएमएफ और यूरोपीय संघ की ओर से ग्रीस को मिलने वाले 12 अरब यूरो के कर्ज के बाद फिलहाल वहां कुछ समय के लिए हालात सुधर सकते हैं, लेकिन उधार पर मिली यह स्थिरता कितने दिन तक रहेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।
दुनिया को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का पहला पाठ पढ़ाने वाले फ्रांस की स्थिति भी इस वर्ष की शुरुआत के साथ ही तेजी से बिगड़ी। अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता जब वहां के छात्रों और मजदूरों ने बेरोजगारी, कम वेतन, बेरोजगारी भत्ता, पेंशन में छेड़छाड़, रिटायरमेंट की उम्र में वृद्धि, बढ़ती हुई मंहगाई, कारखाना बंदी और मंहगाई के खिलाफ बहुत बड़ा आंदोलन किया। उनके इस आंदोलन को वहां की करीब 60 प्रतिशत जनता का समर्थन हासिल था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जी-7 में शामिल इस देश के आम नागरिकों किन स्थितियों में जीने को अभिशप्त हैं। यह अलग बात है कि उनकी स्थिति भारत, पाकिस्तान जैसे गरीब मुल्कों के आम लोगों से कई गुना बेहतर है। फ्रांस की हालत यह है कि वहां के राष्ट्रपति सरकोजी को विश्व बैंक से यह आग्रह करना पड़ा कि वह इस बात की जांच करे कि उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें इतने खतरनाक स्तर पर कैसे बढ़ीं। दुनिया का चौधरी बनने वाले अमेरिका में आर्थिक मंदी आई, तो वहां के प्रकांड अर्थशास्त्री तक मार्क्स की रचना ‘पूंजी’ का पाठ करते नजर आए थे। वे इतने बदहवास हो गए कि अपनी ओर से ‘रसातल में दफना दिए गए’ मार्क्स का भूत उन्हें सताने लगा। आर्थिक मंदी के बाद वहां बेरोजगारी छह प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत पर पहुंच गई। यही हाल एक आधुनिक दुनिया के सबसे पुराने सरगना का भी है। इंग्लैंड, जिसके बारे में एक समय यह कहावत चलती थी कि ‘इसका सूरज कभी नहीं डूबता’, वहां भी हालत सही नहीं हैं। हालत यह है कि वहां की डेविड केमरून सरकार को दुनिया की दूसरी जनविरोधी सरकारों की तरह अर्थव्यवस्था की स्थिति को सुधारने के लिए जन कल्याण के खर्चों में 80 अरब पौंड से ज्यादा की कटौती करनी पड़ी। इतना ही नहीं वहां सार्वजनिक क्षेत्र के मजदूरों का वेतन देने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। इस बहाने से उसने करीब 50 हजार कर्मचारियों की छंटनी का फरमान जारी किया हुआ है। पुर्तगाल, जर्मनी, इटली, स्पेन में भी यही हाल है। इनमें सबसे खराब स्थिति स्पेन और पुर्तगाल की है, जहां आज भी आए दिन मंहगाई के खिलाफ जनता आंदोलन करती रहती है। इन मुल्कों में हालत यह है कि वहां की सरकारें मंहगाई को रोकने के लिए छंटनी, तालाबंदी, कर्ज, जनकल्याण के खर्चों में कटौती जैसे कदम उठाकर स्थिति को और भी विस्फोटक बनाने में लगी हुई हैं। जर्मनी, ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल और इटली जैसे देशों में इस समय बेरोजगारी 7-14 प्रतिशत पर पहुंच गई है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक आर्थिक मंदी के बाद करीब 10 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया। यही लोग वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद पैदा हुई वैश्विक मंहगाई से सबसे से प्रभावित हुए हैं।

Friday, July 8, 2011

क्या भारतीय क्रान्तिकारी हिंसा के समर्थक थे?

डा. अजय कुमार मिश्र

आज न सिर्फ अपने मुल्क में वरन समूची दुनिया के युवाओं को उनके अपने देश के इतिहास, उनके नायकों और हर उस बात से दूर किया जा रहा है, जिससे वे प्रेरणा ले सकते हैं। सब कुछ इतने चुपचाप हो रहा है कि एक सामान्य आदमी यह समझ ही नहीं सकता कि इसके पीछे की वजह क्या है? ऐसी तमाम साजिशों में से एक है देश के क्रांतिकारियों के चरित्र के बारे में कुछ ऐसे विचारों का प्रस्तुतिकरण जो या तो अधूरे होते हैं या फिर पूरी तरह गलत। इस पहलू के बारे में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह ने लिखा है। भगत सिंह का क्रांतिकारी आंदोलन में पदार्पण ऐसे समय में हुआ, जब काकोरी कांड से ताल्लुक रखने वाले और आतंकवादी कार्यदिशा को अपनाने वाला संगठन विघटन के कगार पर था। इसके बाद ही उत्तरी भारत में नौजवान भारत सभा नामक नाम से एक क्रांतिकारी संगठन बनाया गया। इस संगठन को बनाने में भगत सिंह, भगवती चरण बोहरा, सुखदेव आदि क्रांतिकारियों का योगदान था। यह ऐसा संगठन था, जो खुले तौर पर देश को आजाद करवाने के लिए जनता के बीच प्रचार का काम करता था। जाहिर है यह काम कोई आतंकवादी संगठन नहीं कर सकता था। यह भारत का पहला क्रान्तिकारी संगठन था, जिसने समाजवाद को अपना ध्येय घोषित किया था। इसके घोषणा पत्र में कहा गया था कि क्रान्ति जनता द्वारा जनता के हित में होगी। क्रान्तिकारी का आशय बम और पिस्तौल वाले आदमी से नहीं हैं। पंजाब नवजवान सभा के पश्चात गठित एच़एस़आऱए. ने अपने घोषणा पत्र में कहा कि ‘‘हम हिंसा में विश्वास रखते हैं-अपने आप में अंतिम लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि एक नेक परिणाम तक पहुंचने के लिए अपनाये गये तौर एक तरीके के रुप में। हमें हमारी आतंकवादी नीति के कारण कई बार सजायें हुई हैं। हमारा जबाब है कि क्रान्तिकारियों का मुद्दा आतंकवाद नहीं होता. हम यह विश्वास रखते हैं कि आतंकवाद के रास्ते ही क्रान्ति आयेगी’’अंग्रेज भारत में इसलिए अपना राज चला सके क्योंकि वे सारे भारत को डराने में कामयाब हुये। क्रांतिकारियों ने जनता से सवाल किया, ‘‘ वे इस सरकारी दहशत का किस तरह मुकाबला करें? सिर्फ क्रान्तिकारियों की ओर से मुकाबले की दहशत ही उनकी दहशत को रोकने में कामयाब हो सकती है। समाज में एक लाचारी की गहरी भावना फैली हुयी है। इस खतरनाक मायूसी को कैसे दूर किया जाय? सिर्फ कुर्बानी की रूह को जगाकर खोये आत्म विश्वास को जगाया जा सकता है। आतंकवाद का एक अन्तर्राष्टय पहलू है। इंग्लैण्ड के काफी शत्रु हैं जो हमारी ताकत के पूर्ण प्रदर्शन से हमारी सहायता करने को तैयार हैं। यह एक बड़ा लाभ है।’’
आतंक के औचित्य को स्पष्ट करते हुये भगत सिंह ने लिखा है‘‘पूरी गलतफहमी की जड़ आतंक की गलत व्याख्या है, आतंक व जुल्म बल-प्रयोग से होते हैं, इसलिये बल प्रयोग से बहुत सारे अच्छे व बुरे काम होते हैं। जुल्म इनमें से एक है। बल प्रयोग को आतंक कहना बल-प्रयोग करने वाले की इच्छा पर विचार करने के बाद कहा जा सकता है। यदि बल-प्रयोग किसी नीच इच्छा से किया जाय तो वह आतंक कहलाता है, लेकिन वही बल-प्रयोग किसी गरीब, अनाथ की मदद के लिये या ऐसे ही किसी और काम के लिए किया जाय, तो वह आतंक नहीं, बल्कि पुण्य कहलाता है। बल प्रयोग करना कोई जुल्म, अत्याचार या आतंक नहीं, बल्कि बल-प्रयोग करने वाले की नीयत पर निर्भार करता है। यदि बल-प्रयोग किसी नेक काम के लिये किया जाता है तो उसे आतंक का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि वही बल प्रयोग उसने अपने व्यक्तिगत हित या निर्दोषों को दु:ख पहुचाने के लिये किया है तो उसे नि:संदेह ‘आतंकवादी’ कहा जा सकता है। आतंक हमेशा घृणा योग्य है। जालिमों व गुण्डो की गुण्डई रोकने के लिये बल-प्रयोग किया जाय, तो वह आतंक नहीं बल्कि अच्छा और भला काम होता है।’’ दुनिया के अच्छे कामो के परख की एक कसौटी है- यह कि वे काम दुनिया को सुख व आराम देने वाले हों। किसी को दुख देना आतंक है, लेकिन दुख देने वाले जालिम को मिटाना पुण्य है। ताकत का गलत इस्तेमाल आतंक कहलाता है जब कि जब कि इसको रोकना अच्छा कार्य कहलाता है। इसके पूर्व पंजाबी पत्र कीरती में लिखे गये अपने लेखों की श्रृंखला में भगत सिंह ने ‘आतंकवादी कौन? में ब्रिटिश सरकार को ही आतंकवादी की संज्ञा दी तथा लिखा कि भारतीय आतंकवाद के विरूद्ध संघर्ष कर रहे हैं और ऐसे भारतीयों को आतंकवादी कहा नहीं जा सकता।
सांडर्स वध के पश्चात 11 दिसम्बर 1928 को लाहौर में चिपकाये गये पर्चे में एच़ एस़ आऱ ए. की ओर से लिखा गया था ‘‘ हमें एक आदमी की हत्या करने का खेद है। परन्तु यह आदमी उस निर्दयी, नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का एक अंग था जिसे समाप्त कर देना आवश्यक था। इस आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के कारिन्दे के रूप में की गयी है। यह सरकार संसार की सबसे अत्याचारी सरकार है। मनुष्य का रक्त बहाने के लिये हमें खेद है। परन्तु क्रान्ति की बेदी पर रक्त बहाना आवश्यक हो जाता है। हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी।
केन्द्रीय एसेम्बली बम काण्ड पर 6 जून 1929 को अदालत में बयान देते हुये भगत सिंह ने कहा‘‘ जेल में कुछ पुलिस अधिकारी आये थे। उन्होने हमें बताया कि लार्ड इर्विन ने इस घटना बाद ही एसेम्बली के दोनो सदनो के सम्मिलित अधिवेशन में कहा है कि यह विद्रोह किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, वरन सम्पूर्ण शासन व्यवस्था के विरूद्ध था। यह सुनकर हमने भाप लिया कि लोगों ने हमारे काम के उद्देश्य को सही तौर पर समझ लिया है। मानवता का प्यार करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं। हमे किसी से व्यक्तिगत द्वेष नहीं है और हम प्राणि-मात्र को हमेशा आदर की दृष्टि से देखते है। हम न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कलंक हैं नही हम पागल है। हम तो केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवोचित आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्ण दावा भर कर सकते है। हमें ढोंग तथा पाखण्ड से नफरत है’’। इसी बयान में उन्होने आगे कहा कि ‘‘ गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य स्वर्गीय श्री एस़ आऱ दास ने अपने प्रसिद्ध पत्र में अपने पुत्र को लिखा था कि इंगलैण्ड की स्वप्ननिद्रा भाग करने के लिये बम का उपयोग आवश्यक था। श्री दास के इन्हीं शब्दो को सामने रखकर हमने एसेम्बली भवन में बम फेंके थे। हमने यह काम मजदूरों की तरफ से प्रतिरोध व्यक्त करने के लिये किया था। उन असहाय मजदूरों के पास अपने मर्मान्तक क्लेशों को व्यक्त करने का कोई और साधन नहीं था। हमारा एकमात्र उद्देश्य था ‘बहरों को सुनाना’ और उन पीड़ितों की मॉगो पर ध्यान न देने वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना’’। इसी केस की सुनवायी में उच्चन्यायालय में बयान देते हुये भगत सिंह ने कहा ‘‘ इन्कलाब जिन्दाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था जो आम तौर पर गलत अर्थों में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते, बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारो की सान पर तेज होती है और यही वह चीज है जो हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इन्कलाब का अर्थ पूजीवादी युद्धों की मुसीबतो का अन्त करना हैं मुख्य उद्देश्य और और उसकी प्रक्रिया समझे बिना निर्णय देना उचित नहीं है। गलत बातें हमारे साथ जोड़ना साफ-साफ अन्याय है’’।
क्रान्ति के बारे में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुये द्वितीय लाहौर षडयन्त्र केस में लाहौर की निचली अदालत में बयान देते हुये भगत सिंह ने कहा था कि क्रान्ति से उनका आशय एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसको घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग की सत्ता को मान्यता हो तथा एक विश्वसंघ मानवजाति को पूजीवाद के बन्धन से और साम्राज्यवादी युद्धों से उत्पन्न होने वाली बरबादी और मुसीबतों से बचा जा सके। इसी बयान में भगत सिंह ने यह कहा था कि ‘‘ क्रान्ति के लिये खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है, और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा का का कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है,। क्रान्ति: वर्तमान व्यवस्था, जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी हुयी है बदलनी चाहिये।
2 फरवरी 1931 में नवजवान कार्यकर्ताओं के नाम अपने संदेश में भगत सिंह ने लिखा- एसेम्बली बम काण्ड में दी गयी हमारी परिभाषा के अनुसार इन्कलाब का अर्थ मौजूदा ढांचे में पूर्ण परिवर्तन और समाजवाद की स्थापना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हमारा पहला कदम ताकत हासिल करना है। वास्तव में ‘राज्य’ यानी सरकारी मशीनरी, शासक वर्ग के हाथों में अपने हितो की रक्षा करने और उन्हे आगे बढ़ाने का यन्त्र ही है। हम इस यन्त्र को छीनकर अपने आदर्शों की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करना चाहते हैं। हमारा आदर्श है-नये ढंग से सामाजिक संरचना, यानी मार्क्सवादी ढंग से। इसी लक्ष्य के लिये हम सरकारी मशीनरी का प्रयोग करना चाहते हैं।भारत सरकार का प्रमुख लार्ड रीडिंग की जगह यदि सर पुरूषोत्तम दास ठाकुर दास हों या लार्ड इर्विन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू आ जायें तो जनता पर क्या फर्क पड़ने वाला है। जनता को समझना होगा कि क्रान्ति उनके हित में है और उनकी अपनी है। सर्वहारा श्रमिक वर्ग की क्रान्ति, सर्वहारा वर्ग के लिये। क़्रान्ति करना बहुत कठिन काम है। यह किसी एक आदमी की ताकत के वश की बात नहीं है और न ही एक निश्चित तारीख को आ सकती है। यह तो विशेष सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से पैदा होती है और एक संगठित पार्टी को ऐसे अवसर को सम्भालना होता है और जनता को इसके लिये तैयार करना होता है। क्रान्ति के दुस्साध्य कार्य, शक्तियों को संगठित करना होता है। इसके लिये क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को अनेक कुर्बानी देनी होती है। गांधीवाद पर टिप्पणी करते हुये उन्होने लिखा कि ‘‘साबरमती के सन्त’’ को गांधीवाद दूसरा शिष्य नहीं दे पायेगा। अपनी स्वयं की स्थिति स्पष्ट करते हुये उन्होने इसी संदेश में लिखा था-ऊपरी तौर पर मैने एक आतंकवादी की तरह काम किया है,लेकिन मै एक आतंकवादी नहीं हू। मैं एक क्रान्तिकारी हू, जिसके दीर्घ कालिक कार्यक्रम-सम्बन्धी ठोस व विशिष्ट विचार है।
गांधी जी के विचार ‘बम की पूजा’ का उत्तर देते हुये भगत सिंह ने लिखा था कि हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिये किया गया बल प्रयोग, परन्तु क्रान्तिकारियों का यह उद्देश्य नहीं है। दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्टय अधिकारों को प्राप्त करने के लिये किया जाता है। अपने आपको कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का हृदय परिवर्तन सम्भव हो सकेगा। क्रान्तिकारियो को विश्वास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतन्त्रता मिलेगी। वे जिस क्रान्ति के लिये प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों व उनके पिट्ठुओं से क्रान्तिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिये मुक्त हो जायें। क्रान्ति पूजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों के विशेषाधिकार दिलाने वाली परम्परा का अन्त कर देगी। यह राष्ट को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट और नये समाज का निर्माण होगा। क्रान्ति की सबसे बड़ी बात यह होगी कि यह मजदूर तथा किसानो का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनैतिक शक्ति को हथियाये बैठें है। आतंकवाद सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं और क्रान्ति आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं। यह तो क्रान्ति का एक आवश्यक अंग है। आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदा करता है और पीड़ित जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत कर उसे शक्ति प्रदान करता है। अस्थिर भावना वाले लोगों को इससे हिम्मत बंधती है तथा उसमें आत्मविश्वास पैदा होता है। जैसा दूसरे देशों में होता आया है वैसे ही भारत में आतंकवाद क्रान्ति कारूप धारण कर लेगा और अन्त में क्रान्ति से ही देश को सामाजिक राजनैतिक तथा आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।
भारतीय मुक्ति संघर्ष के इतिहास में गांधी जी के नेतृत्व में आन्दोलन के समानान्तर चले इस आन्दोलन के बैचारिक पक्ष का सही आकलन नहीं किया गया है तथा क्रान्तिकारियों का गलत आकलन किया गया है। जब कि वास्तविकता इसके विपरीत है। इसके प्रवर्तक व्यर्थ की हिंसा के विरूद्ध थे लेकिन अपरिहार्य परिस्थितियों मे वे हिन्सा को सही मानते थे।
डा. अजय कुमार मिश्र, मऊ, मोबाइल नं.09935226428