शनिवार, 18 मार्च 2017
13 साथियों को उम्रकैद की सजा पर मजदूरों में गुस्सा
कार बनाने वाली कंपनी मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में 18 जुलाई 2012 को हुई आगजनी और हिंसा मामले में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरपी गोयल की अदालत ने शनिवार को 13 मजदूरों को उम्रकैद व चार को पांच-पांच वर्ष सजा की सजा सुनाई। 14 लोगों को अब तक जेल में काटी गई सजा को ही पर्याप्त मानते हुए रिहा करने के आदेश दिए गए हैं।
10 मार्च को जिला अदालत ने 148 में से 31 मजदूरों को दोषी करार दिया था जबकि 117 को बरी कर दिया था। दोषियों की सजा पर फैसला शुक्रवार को होना था, लेकिन सजा को लेकर दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की ओर से दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। धारा 302, 307, 436, 427, 325, 323, 452, 201, 120 बी और 34 के तहत राम मेहर, संदीप ढिल्लों, रामबिलास, सर्वजीत सिंह, पवन कुमार, सोहन कुमार, प्रदीप गुर्जर, अजमेर सिंह, जियालाल, सुरेश कुमार, अमरजीत, धनराज भांबी, योगेश कुमार। इनमें से 12 लोग यूनियन पदाधिकारी थे जबकि जियालाल यूनियन से बाहर था। धारा 323,325,452,147,148,149 के तहत रामशबद, इकबाल सिंह, जोगिंद्र सिंह, प्रदीप को पांच वर्ष की कैद।
धारा 323,325,427,148,149 के तहत दोषी विजयपाल, आनंद, विशाल भारत, सुनील कुमार, प्रवीन कुमार, कृष्ण लंगड़ा, विरेंद्र सिंह, हरमिंदर सिंह सैनी, कृष्ण कुमार, शिवाजी, नवीन, सुरेंद्र पाल, प्रदीप कुमार, नवीन को अब तक काटी गई सजा के आधार पर रिहा करने के आदेश।
गौरतलब है कि 18 जुलाई 2012 को श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान हुई आगजनी और हिंसा में मारुति सुजुकी के जनरल मैनेजर (एचआर) अवनीश देव की आग में जलने से मौत हो गई थी। हिंसा में करीब 100 लोग घायल भी हुए थे। 18 जुलाई को हड़ताल के दौरान हिंसा के आरोप में 148 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया था।
गुरुग्राम अदालत द्वारा 18 जुलाई, 2012 की हिंसा मामले में कंपनी के 13 कर्मचारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने विरोध में कर्मचारियों ने टूल डाउन का निर्णय लिया। मारुति के सभी छह प्लांटों में शनिवार रात 9 से रात 10 बजे तक टूल डाउन (काम बिल्कुल ठप) रहा। अदालत द्वारा सजा की घोषण के बाद श्रमिकों ने लघु सचिवालय परिसर स्थित पार्क में एक बैठक की। इसमें गुरुग्राम, मानेसर, बावल, धारूहेड़ा व नीमराणा तक के श्रमिक यूनियन के लोगों ने सर्वसम्मति से टूल डाउन का निर्णय लिया।
कर्मचारी यूनियनों द्वारा बैठक के दौरान अदालत के निर्णय के विरोध में रोष जताया गया। मारुति उद्योग कामगार यूनियन के महासचिव कुलदीप जांघू ने कहा कि टूल डाउन का निर्णय बैठक में शामिल लोगों ने एकमत होकर लिया है। सभी शांतिपूर्ण ढंग से काम को एक घंटे तक पूरी तरह से बंद रखा। सीटू के प्रदेश अध्यक्ष सतबीर सिंह ने कहा कि श्रमिकों के साथ बड़ा अन्याय हुआ है। ठोस सबूत नहीं होने के बाद भी आजीवन कारावास जैसी सजा काफी हैरान करने वाली है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई लड़ी जाएगी। एटक के जिला महामंत्री ने कहा कि श्रमिक अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक ढंग से लड़ेंगे। मारुति के मानेसर और उद्योग विहार प्लांट में एक घंटे के टूल डाउन से करीब 400 कारों का उत्पादन प्रभावित हुआ। मारुति के जिन प्लांटों में एक घंटा टूल डाउन रहे, उसमें मारुति का मानेसर प्लांट, उद्योग विहार प्लांट, मारुति पावर ट्रेन, सुजुकी मोटरसाइकिल, वेलसोनिका व एमएमआई ऑटोकंपोनेंट के नाम शामिल हैं।
शुक्रवार, 17 मार्च 2017
फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष में शहीद हुई अमेरिकी युवती राचेल की याद में
16 मार्च 2003 के दिन इजरायली सेनाओं ने राफाह में 23 साल की एक बेहद नेकदिल अमेरिकी सोशल एक्टिविस्ट राचेल कूरी की बुलडोजर से कुचलकर बेरहमी से हत्या कर दी थी। हर आज हम उसे याद करते हैं कि किस तरह उसने अपनी जिंदगी को जिया और किस तरह वह न्याय के लिए शहीद हो गई। बिना दुखी हुए, उसकी यादों, उसके सपनों को दिल में जिंदा रखते हुए। हमें उस पर गर्व है। हम उसे प्यार करते हैं, उसके न रहने के बाद भी। उसका सपना जो लाखों लोगों की जिंदगी की बेहतरी से जुड़ा था, उसे अपनी आंखों में जिंदा रखते हुए। जब राचेल पांचवीं में थी तो उसने अपनी कक्षा के साथियों के बीच भाषण दिया था। उसे सुनिए, तो खुद ही समझ जाएंगे कि वह बचपन से ही दूसरों की कितनी फिक्र किया करती थी। वीडियो देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें-
https://youtu.be/iz0Vef4Fu8U)
पांचवी कक्षा की महज 10 साल की राचेल वीडियो में दुनिया में भुखमरी पर अपनी चिंता जताती है। वह कहती है तीसरी दुनिया के लोग उसी तरह सोचते हैं, दूसरों का खयाल रखते हैं और हंसते व रोते हैं, जैसे हम। वह गरीब मुल्कों की जनता के दुखों से परेशान होती थी।
फिलिस्तीनी जनता ने स्वतंत्रता, न्याय और शांति के लिए अनगिनत कुर्बानियां दी हैं। वे मानवता के बेहतर भविष्य के लिए शहीद हुए। यह सिलसिला आज भी रुका नहीं है। हम अपने बाटनिकल गार्डेन में शहीदों के नाम पर प्रतिदन एक पौधे को रोपते हैं। आज हमले प्यारी राचेल के नाम पर एक पौधा लगाया है।
राचेल को इसलिए भी आज याद करना जरूरी है क्योंकि उसने अमेरिका की नागरिक होकर भी फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष को न सिर्फ पूरा समर्थन दिया, वरन वह उसके लिए शहीद हो गई। उसने हमेशा अमेरिका की विदेश नीति का विरोध गया। उसने अमेरिकी दादागीरी और तीसरी दुनिया के देशों की जनता की लूट का विरोध किया। इसलिए भी राचेल को याद किया जाना जरूरी है। वह अभी युवा थी, उसके पास पूरी जिंदगी थी, लेकिन उसने न्याय के लिए शहादत ही। इसलिए वह न सिर्फ अमेरिका और फिलिस्तीन वरन तीसरी दुनिया के युवाओं को भी उसे अपना रोल मॉडल बनाना चाहिए। राचेल के पिता क्रैग कहते हैं, मैं उसका पिता हूं, लेकिन उसके न रहने पर भी जिस तरह लोग उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करते हैं, यह देखकर मैं भावुक हो जाता हूं। मुझे अपनी बेटी पर नाज है। राचेल की मां सिंडी कूरी कहती हैं वह आज हमारे बीच नहीं है। हम उसे रोज याद करते हैं। उसका सपना अब हम दोनों का सपना बन गया है।
(यह लेख फिलिस्तीन के मशहूर लेखकर मजीन कमसिएह का है। वे फिलिस्तीन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निदेशक, सामाजिक कार्यकर्ता, और इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष पर कई किताबों के लेखक हैं। अनुवादः देवेंद्र प्रताप)
गुरुवार, 16 मार्च 2017
घाटी में फिर से पत्रकारों पर टूटा पुलिस का कहर
पत्रकारों के लिए घाटी में काम कर पाना दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा है। वे आतंकवाद और सुरक्षाबलों के बीच पिसते रहते हैं। वीरवार को श्रीनगर के हैदरपोरा स्थित हुर्रियत नेता सैयद अली के घर के बाहर पुलिस ने जिस तरह से पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा वह अब घाटी में आम बात हो गई है। श्रीनगर के हैदरपोरा में हुर्रियत नेता सैयद अली शाल गिलानी के आवास पर अन्य हुर्रियत नेताओं मीरवाइज उमर फारूक और मोहम्मद यासीन मलिक की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस को कवर कर रहे प्रेस फोटो ग्राफरों पर वीरवार को फिर से पुलिस का कहर टूटा। पुलिस ने पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। पुलिस की इस दमनात्मक कार्रवाई के बाद कश्मीर प्रेस फोटोग्राफर्स एसोसिएशन (केपीपीए) ने एक आपात मीटिंग बुलाकर कड़ी निंदा की है। पुलिस की इस कार्रवाई में एएफपी के फोटो जर्नलिस्ट तौसीफ मुस्तफा, ग्रेटर कश्मीर अखबार के मुबस्सिर खान समेत कई पत्रकार घायल हुए हैं। केपीपीए के जनरल सेक्रेटरी के मुताबिक पुलिस ने एएफपी के फोटोजर्नलिस्ट का गला दबाया,जिससे उनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी।
उन्होंने बताया कि उनके पास सबूत के तौर पर पुलिस की इस कार्रवाई का वीडियो और फोटो भी है। उन्होंने बताया कि इतना ही नहीं पुलिस के रक्षक वाहन के ड्राइवर ने जहां फोटो जर्नलिस्ट खड़े थे उनकी तरफ वाहन को दौड़ा दिया। वाहन के नीचे आने से बचने के लिए फोटो जर्नलिस्ट इधर-उधर भागने लगे। वाहन से कुचलकर ग्रेटर कश्मीर के फोटो जर्नलिस्ट खान का पैर कुचल गया। डीएनए के इमरान निसार के साथ भी पुलिस ने गालीगलौज और धक्कामुक्की की। यूरोपियन फोटो एजेंसी के फोटो जर्ललिस्ट फारूक जावेद खान, इंडियन एक्सप्रेस के एस मसूदी और टाइम्स नाऊ के फोटो जर्नलिस्ट उमर शेख पुलिस की पिटाई में बुरी तरह घायल हुए हैं। केपीपीए के बयान में कहा गया है कि डीओ ने फोटो जर्नलिस्टों को धमकी देते हुए कहा कि वे एसओजी से हैं और उनकी हत्या से भी नहीं हिचकेंगे। पुलिस की पिटाई में डीएनए के इमरान निसार भी बुरी तरह जख्मी हुए हैं। इसके खिलाफ केपीपीए ने श्रीनगर के प्रेस्ा क्लब में प्रदर्शन किया और डीओ हुमहामा और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने इस घटना के खिलाफ देश के पूरी पत्रकार बिरादरी से शनिवार को होने वाले विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। कश्मीर एडिटर्स गिल्ड (केएडी) ने भी फोटो जर्नलिस्टों के साथ की गई पुलिसिया बर्बरता का विरोध किया है। केएडी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि सैयद अली शाह गिलानी के आवास से जब तीनों नेता बाहर आए तो बाहर पत्रकार इंतजार कर रहे थे। जैसे ही वे बाहर आए तो पुलिस उनको गिरफ्तार करने लगी। फोटो जर्नलिस्टों ने तुरंत फोटो खींचना शुरू कर दिया। इसके बाद वहां मौजूद पुलिस ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। केएडी की तरफ से इसकी घोर निंदा करते हुए कहा गया है कि यह देश का दुर्भाग्य है कि प्रेस वालों के साथ घाटी में इस तरह का व्यवहार आम बात हो गई है। इसके पहले बिजबिहाड़ा में एक सुरक्षाकर्मी की तरह से गोली चलाने से एक प्रेसकर्मी कई हफ्तों तक टूटे हाथ के साथ अस्पताल में भर्ती रहा। हुर्रियत एम ने भी इसे प्रेस और लोकतंत्र पर हमला करार दिया है।
गुरुवार, 9 मार्च 2017
मारुति मजदूरों पर कोर्ट का फैसला आज
मारुति सुजुकी मानेसर कंपनी में हुई घटना को साढ़े चार साल बीत चुके हैं और अभी तक भी 11 मजदूर जेल में बंद दिवारों से न्याय की उम्मीद लगाये बैठे हैं। लगभग साठे तीन या चार साल बाद उच्च न्यायालय से 139 मजदूरों को ही जमानत मिल सकी है। अब कानूनी प्रक्रिया तेज हुई है और 10 मार्च को अन्तिम पफैसला आना है। बेगुनाही के पर्याप्त सबूत तो हैं, लेकिन जब शुरू से ही मज़दूरों को दोषी ठहराने की कवायद कम्पनी प्रबंधन से लेकर सरकारें करती रही हैं, जमानत तक देने में नीचे से ऊपर तक अदालत का एक रुख रहा है, तब मज़दूर विरोध्ी किसी फैसले से इंकार नहीं किया जा सकता!
जरा पूरी कवायद पर गौर करें। आम जनसाधरण की सोच को प्रभावित करते हुए कम्पनी ने सरकार के साथ मिलकर बडी आसानी से एक साथ 2300 मजदूरों को काम से निकाल दिया और 148 निर्दोष मजदूरों को अपराध बनाकर जेल में डाल दिया। आज साढ़े चार साल का समय बीत जाने पर भी दोषी और निर्दोष का खेल जारी है।
इसी खेल के ऊपर ही इन निर्दोष मजदूरों की जिन्दगी का फैसला होना है। जिन सवालों को हम मजदूरों ने अपने सतत प्रदर्शन के द्वारा लोगो के सामने रखा वही सच्चाई आज कोर्ट में हाजिर है। विदेशी पूँजीनिवेश के चलते और मारुति कंपनी के मुनाफे की सोच में ही हरियाणा सरकार ने 148 मजदूरों की बलि चढा दी। और हर मुकाम पर न्याय की लड़ाई को कुचला जाता रहा।
कानूनी कार्रवाई में आज ये बातें सपष्ट रूप में आ चुकी हैं कि कम्पनी ने अपने पूर्व नियोजित षडयंत्रा को 18 जुलाई 2012 को कार्यान्वित किया। न्यायालय की कार्रवाई में ये बातें आ चुकी हैं कि कम्पनी ने 11 बजे ही पुलिस को झगडा होने की कथित आशंका पर बुला लिया था लेकिन विवाद के वक्त पुलिस को कम्पनी के अन्दर आने से रोका। कम्पनी के जिस जनरल मैनेजर दीपक आनन्द ने 55 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई वो सुनवाई के दौरान एक भी मजदूर को पहचान न सका। यह संभव है कि यदि भीड इक्ट्ठा हो और झगडा हो रहा हो तो हमें किसी का चेहरा ध्यान में रहे लेकिन इस मामले में दीपक आनन्द 2000 लोगों में से 55 लोगों को उनके नाम से जानता था लेकिन चेहरा किसी का भी याद नहीं था? झगडे के समय कम्पनी के चार ठेकेदारों ने 89 मजदूरों को तोड़फोड़ करते हुए देखा। पहला गवाह कहता है कि उसने 'अ* से व 'ग' से शुरू होने वाले नाम के 16 लडकों को एक जगह वारदात करते हुए देखा। ऐसे ही दूसरे ने 'ग' व 'प' नाम के, तीसरे नें 'प' से लेकर 'स' तक व चैथे गवाह ने 'स' से 'य' तक के नाम वाले मजदूरों को देखा। मतलब यह है कि पहले मजदूरांे ने अपने आप को नाम के पहले अक्षर के हिसाब से जुटाया फिर मारपीट की? सभी चार गवाहों ने एक भी ऐसे मजदूर को नहीं पहचाना जिनका नाम लिया था? दीपक आनन्द के एफआईआर में दर्ज है कि 400-500 मजदूरों ने हाथों में सरिया, राड, बेलचा, डंडा लेकर मैनेजमेंट को पीटा लेकिन गवाही में बताया कि मजदूरों के हाथों में डोर बीम व शाॅकर थे?
लगभग सभी गवाह कोर्ट में अपने ऊपर हमला करने वाले व्यक्ति को पहचान न पाये जबकि सभी ने नाम व पते के साथ उनकी शिकायत की थी। यही नहीं कंपनी के गवाह शलिल बिहारी ने, जिस जीया लाल को घटना के दिन बुलाकर उसकी जाँच की थी, कोर्ट में उसकी जगह किसी दूसरे को पहचाना। जिन गवाहों द्वारा आग लगाते हुए देखने की बात थी वे भी किसी को भी पहचान नहीं पाये। अवनीश देव की लाश कमरे के अन्दर मिली लेकिन गवाहों ने कहा कि आग कमरे के बाहर लगाई गई और बताया कि दो लागों ने अवनीश देव को दोनो हाथों से पकडा व अन्य ने उसको पांव पर मारा, मतलब कि किसी का इरादा जान से मारने का नहीं बना। अपने ऊपर हुए हमले में गवाहों ने कहा कि गुस्साए मजदूरों के सिर पर खून सवार था और हाथों में हथियार लेकर एक आदमी के ऊपर कई लोग वार कर रहे थे, लेकिन साथ ही कहा कि उनको किसी ने नहीं छुड़ाया बल्कि मजदूरों ने अपने आप ही छोड़ दिया। चार पांच लोगों द्वारा इकट्ठा होकर किसी को मारना और उसको थोडा सा पीटकर छोडना कत्ल का इरादा कैसे हो सकता है जब उनको बचाने वाला कोई ना हो?
अवनीश देव की मेेडिकल रिपोर्ट में साफ लिखा है कि उसकी मौत दम घुटने से हुई और यह बात अभी तक भी सिद्ध नहीं हुई कि आग किसने और कैसे लगाई? जिस कमरे मेें आग लगी जहाँ पर सबकुछ जलकर राख हो गया लेकिन वहाँ पर माचिस की डिब्बी न तो जली और ना उस पर जरा सा भी जलने का कोई निशान मिला। पुलिस ने बतौर सबूत प्रत्येक मज़दूर के घर से हथियार के रूप में डोर बीम और शाॅकर की बरामदगी दिखायी। यानी मारकर उस हथियार को वह अपने घर ले गया?
इसी तरह के सैंकडों सवाल मौजूद हैं जो यह दिखाते हैं कि कम्पनी ने कैसे मजदूरों के संगठन को तोडने के लिये योजनाबद्ध तरीके से अपने एक मैनेजर को कुर्बान कर मजदूरों को जेल में पहुंचा दिया। सरकार व कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल कर इतने लम्बे समय तक मजदूरों को जेल में रखकर अन्य उद्योगों के मजदूरों के सामने ऐसे पेश करना कि अगर वे संगठित होने का प्रयास करेंगे तो उनके साथ भी मारुति मजदूरों जैसा बर्ताव होगा। यह सबक पूंजीपति अपने इस कारनामें को अंजाम देकर उदाहरण के रूप में हम मजदूरों को देना चाहता है।जहाँ अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए ही पाँच साल से भी ज्यादा समय लग जाता हो वहाँ न्याय कैसा होगा इसकी हम कल्पना कर सकते हैं? हम आज अपनी आलोचना कर सकते हैं कि जहाँ पूंजीपति वर्ग अपने काम को अंजाम देने के लिए एकजुट है वहीं हम देश की 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी होने पर भी अपने हकों को बचा नहीं पा रहे हैं। आज भी हम अपने निजी स्वार्थों के चलते सिर्फ वर्गहित को अनदेखा कर व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता देते हैं।
मारुति मजदूरों की लड़ाई आज भी जारी है और यह लड़ाई अपने संगठन की लड़ाई से बदलकर एक वर्ग की लड़ाई बन गयी है। जहाँ पूँजीपतिवर्ग तो खुलेआम इसे वर्गसंघर्ष कहता है लेकिन मजदूर वर्ग के लिए ये सिर्फ मारुति मजदूरों की लड़ाई बनकर रह गयी है। भले ही इस संघर्ष को हम मारुति मजदूर एक व्यापक संघर्ष में तब्दील ना कर पाये हों लेकिन इस संघर्ष में अन्य मजदूर वर्ग व उसके प्रतिनिधियों की क्या भूमिका रही ये सवाल भी इतिहास में हमेशा जीवित रहेगा!
('संघर्षरत मेहनतकश' जनवरी-मार्च,2017 में प्रकाशित राम निवास का लेख्ा)
मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017
Narendra Modi is as Manmohan singh for workers
There was about 250 small units of silver work in Jaunpur city of uttar pradesh before 1990. After new economic policy implemented in india by Manmohan singh, now in 2017 only 10 units are running. More than 5000 poor labour unemloyed, but no party come in favour of small scale industries and laboures of small cities, towns and villages. PM Narendra Modi is best fallower of Manmohan singh. He is implementing his Big corporate favouring policy very strictly. After 5 years we will find that thousands of small scale industries destroyed. Then People will find Modi same as Manmohan had done very cleaverly in past.
In beginning of this year i was in Jaunpur. I go to understand nature of silver work job. After hole day street by street i find that silver work is finished. Remaining units are in very bad condition. In these units After whole day 12-14 hours working, a labour can hardly earn 50-60 rs against their wage. Demonetisation impact is very deep in this sector. Unit owner is not giving worker's wage in time, because he is also facing payment related problems from his customers.
शनिवार, 10 दिसंबर 2016
यदि नरेंद्र मोदी ने 55 करोड़ की रिश्वत नहीं ली तो दस्तावेजों की और भी सख्त जांच होनी चाहिए
आठ नवंबर, 2016 को शाम आठ बजे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने की घोषणा दूरदर्शन पर कर रहे थे, उस समय नई दिल्ली में कम से कम पांच संस्थाओं के पास ऐसे दस्तावेज थे जिनमें यह दर्ज है कि नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर 55 करोड़ रुपये की रिश्वत ली है. उन दस्तावेजों से यह साफ नहीं है कि 13 अलग-अलग लेन-देन में मोदी को कथित तौर पर 55.2 करोड़ रुपये मिले या फिर नौ लेन-देन में 40.1 करोड़ रुपये. ऐसा लगता है कि इन दस्तावेजों में 30 अक्टूबर, 2013 से 29 नवंबर, 2013 के बीच के चार लेन-देन दो बार दर्ज हैं.
ये दस्तावेज पिछले कुछ महीनों से दिल्ली में घूम रहे थे. इन दस्तावेजों में यह दर्ज है कि सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय से जुड़े लोगों ने कथित तौर पर नरेंद्र मोदी को तब रिश्वत दी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे. रिश्वत लेने वालों में सिर्फ मोदी का ही नाम नहीं है बल्कि कथित तौर पर इस सूची में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र इकाई की कोषाध्यक्ष शायना एनसी और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नाम भी शामिल हैं.
17 नवंबर को इकनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली ने इन दस्तावेजों पर जवाब जानने के लिए इन सभी को पत्र लिखे. लेकिन इस खबर के लिखे जाने तक ईपीडब्ल्यू को किसी का जवाब नहीं मिला. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सहारा समूह के विभिन्न कार्यालयों पर छापेमारी के दौरान आयकर विभाग ने इन दस्तावेजों को जब्त किया था. यह बात है 22 नवंबर, 2014 की.
आयकर विभाग में डिप्टी डायरेक्टर (इन्वेस्टिगेशन) अंकिता पांडे ने इन जब्त दस्तावेजों पर अपनी मोहर के साथ दस्तखत किए हैं. उनके अलावा विभाग के कुछ अन्य अधिकारियों और सहारा इंडिया समूह के एक प्रतिनिधि के दस्तखत भी इन दस्तावेजों पर हैं. जब मैंने इस बारे में तीन नवंबर को अंकिता पांडे से बात की तो उन्होंने बताया कि वे लंबी छुट्टी पर हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस बारे में मीडिया से बातचीत करने के लिए अधिकृत नहीं हैं इसलिए इन दस्तावेजों की सत्यता को न तो खारिज और न ही स्वीकार कर सकती हैं. इन दस्तावेजों की फोटो कॉपी कम से कम दर्जन भर पत्रकारों और करीब इतने ही सरकारी अधिकारियों के पास है.
इन दस्तावेजों को उस याचिका से जुड़े एक अंतरिम प्रार्थना पत्र में भी शामिल किया गया है जो मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर केवी चौधरी की नियुक्ति को चुनौती देते हुए कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में दर्ज कराई थी. कॉमन कॉज ने इस एप्लीकेशन को 15 नवंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट में फाइल किया है. इस एनजीओ के वकील प्रशांत भूषण हैं. भूषण ने इससे पहले नौ लोगों को इस बारे में पत्र लिखा था और ये सारे दस्तावेज उन्हें भी भेजे थे. यह बात बीते अक्टूबर के आखिरी हफ्ते की है.
भूषण ने जिन लोगों को ये दस्तावेज भेजे उनमें सर्वोच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त जज - जस्टिस एमबी शाह और अरिजीत पसायत - भी शामिल हैं. ये दोनों सेवानिवृत्त जज उच्चतम न्यायालय द्वारा काले धन पर गठित एसआईटी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं. ये दस्तावेज भूषण ने सीबीआई के निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के निदेशक और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भी भेजे. इनके अलावा उन्होंने सतर्कता आयुक्त तेजेंदर मोहन भसीन और श्री राजीव को भी ये दस्तावेज भेजे थे.
यह एक संयोग है कि मौजूदा सीवीसी केवी चौधरी उस वक्त केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और राजस्व विभाग में अहम पदों पर थे जब आदित्य बिड़ला समूह के कार्यालयों पर अक्टूबर, 2013 और सहारा समूह के कार्यालयों पर नवंबर, 2014 में छापामारी की जा रही थी. सीवीसी के पद पर पहुंचने वाले वे भारतीय राजस्व सेवा के पहले अधिकारी हैं. आम तौर पर इस पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की ही नियुक्ति होती आई है.
भूषण ने इन जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को जो पत्र लिखे उनमें पूछा गया है कि सरकार अपनी विभिन्न एजेंसियों के द्वारा जब्त दस्तावेजों से उभर रहे आरोपों की जांच क्यों नहीं करा रही है? उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर क्यों सरकार के विभिन्न विभाग इन दस्तावेजों पर चुप्पी मारकर बैठे हुए हैं?
जैन हवाला डायरी की यादें ताजा
ये दस्तावेज तकरीबन दो दशक पहले आए जैन हवाला कांड की डायरी की याद दिलाते हैं. ये डायरी 1996 में सीबीआई के हाथ लगी थी. इसमें यह दर्ज था कि कारोबारी सुरेंद्र कुमार जैन से जुड़े लोगों ने कई नेताओं के पास पैसे पहुंचाए हैं. इनमें भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया, बलराम जाखड़, विद्याचरण शुक्ल, मदन लाल खुराना, पी शिव शंकर और आरिफ मोहम्मद खान के अलावा और भी कई लोगों के नाम दर्ज थे. निचली अदालत ने सीबीआई को इन नेताओं पर आरोप तय करने को कहा. लेकिन उच्च न्यायालय ने यह माना कि डायरी में दर्ज इन जानकारियों को सबूत नहीं माना जा सकता. इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा. इस मामले में तब देश की सबसे बड़ी अदालत का कहना था कि अगर कोई ऐसे दस्तावेज किसी सरकारी एजेंसी से मिलते हैं जिनमें किसी गैरकानूनी लेन-देन का जिक्र है तो उसकी पूरी और निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए.
कानूनी तौर पर देखा जाए तो आदित्य बिड़ला समूह और सहारा समूह के दफ्तरों से मिले दस्तावेजों पर जांच न करवाकर सीबीआई और आयकर विभाग ने सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों की अवहेलना की है. हालांकि, कॉमन कॉज की शिकायत पर होने वाली जांच का भी हवाला डायरी की जांच वाला ही हश्र हो सकता है लेकिन, दोनों मामलों में कुछ अहम अंतर भी हैं. इस बार जो दस्तावेज मिले हैं, उनमें सिर्फ नाम दर्ज नहीं हैं बल्कि हर नाम के सामने हिंदी और अंग्रेजी में यह स्पष्ट तौर पर लिखा है कि किसे कितने पैसे दिए गए. इसके अलावा इन दस्तावेजों में बाकायदा तारीख भी दर्ज है और यह भी कि पैसे किसके जरिए भेजे गए.
'हंगामाखेज दस्तावेज'
मुझे इन दस्तावेजों के बारे में सबसे पहले 28 जुलाई 2016 को पता चला. उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक कार्यक्रम के बाद हुई अनौपचारिक बातचीत में मशहूर वकील राम जेठमलानी ने इन दस्तावेजों का जिक्र किया था. भाजपा के एक राज्यसभा सांसद समेत लगभग आधा दर्जन लोग वहां मौजूद थे. राम जेठमलानी ने मुझसे कहा कि जो दस्तावेज आयकर विभाग के अधिकारियों ने सहारा इंडिया ग्रुप के दफ्तरों से जब्त किये हैं, वे हंगामा मचा सकते हैं क्योंकि उनमें यह जिक्र है कि नरेंद्र मोदी ने सहारा से मोटी रकम नकद ली है. इसके बाद मैंने कई बार राम जेठमलानी से पूछा कि क्या वे मुझे ये दस्तावेज दिखा सकते हैं, लेकिन वे मुझे टालते रहे. इस मुलाकात के बाद मैंने कई हफ़्तों तक राम जेठमलानी को फोन भी किये लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
इस घटना के लगभग दो महीने बाद एक राजनेता से जुड़े व्यक्ति ने मुझे एक लिफाफा दिया. इसमें इन तमाम दस्तावेजों की प्रतियां मौजूद थीं. मैंने तुरंत ही सरकार में अपने सूत्रों और कुछ पत्रकार मित्रों से इस बारे में बात की तो मालूम हुआ कि मेरी पहचान वाले कम-से-कम 20 अन्य लोगों के पास ये दस्तावेज पहले से ही थे. इनमें से कुछ ने मुझसे कहा कि वे मुझे कुछ और ऐसे दस्तावेज भी दे सकते हैं जो तब तक मेरे पास नहीं पहुंचे थे.मैंने उन लोगों से पूछा कि इन दस्तावेजों से जुड़ी ख़बरें उन्होंने अब तक क्यों नहीं छापीं? उनमें से कुछ ने जवाब दिया कि वे इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता को लेकर संशय में थे. फिर जब मैंने पूछा कि दस्तावेजों की सच्चाई जानने के लिए क्या उन्होंने उन लोगों से संपर्क किया जिनका नाम दस्तावेजों में था, उन्होंने जवाब दिया कि वे ऐसा करने वाले हैं.
एक वरिष्ठ पत्रकार का आरोप है कि सरकार ने एक ‘कवर-अप’ योजना भी तैयार कर ली है. इस योजना के अनुसार सरकार यह दावा करेगी कि ये दस्तावेज सहारा इंडिया ग्रुप के एक असंतुष्ट कर्मचारी ने अपने मालिक सुब्रत राय को ब्लैकमेल करने के लिए तैयार किये थे. सुब्रत राय को एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद दो साल तिहाड़ जेल में गुजारने पड़े थे. इधर, इस बीच मेरे पास मौजूद इन दस्तावेजों की संख्या लगातार बढ़ रही थी.
इसी दौरान मुझे मालूम हुआ कि 28 जून को राम जेठमलानी ने दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को एक पत्र लिखा था. पत्र के साथ ही जेठमलानी ने आयकर विभाग द्वारा रेड में जब्त किये गए ये तमाम दस्तावेज और एक ऐसे आधिकारिक पत्र की कॉपी भेजी थी जिसपर आयकर अधिकारी अंकिता पांडेय के हस्ताक्षर थे. उन्होंने सत्येंद्र जैन से इस बात की जांच करवाने का निवेदन किया था कि क्या सहारा इंडिया समूह से कथित तौर पर जब्त किये गये दस्तावेज और आधिकारिक पत्र पर किये गये हस्ताक्षर एक ही व्यक्ति के हैं.
एक जुलाई को दिल्ली सरकार की ‘क्षेत्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला’ के सहायक निदेशक अनुराग शर्मा ने सत्येंद्र जैन के सचिव जी सुधाकर को पत्र लिखकर बताया कि दोनों दस्तावेजों के हस्ताक्षर एक ही व्यक्ति द्वारा किये गए प्रतीत होते हैं.
जब भी आयकर विभाग के अधिकारी छापे के दौरान कोई दस्तावेज जब्त करते हैं तो उन दस्तावेजों की जांच और मूल्यांकन किसी अन्य अधिकारी द्वारा किया जाता है. यह अधिकारी फिर एक विस्तृत ‘असेसमेंट रिपोर्ट’ तैयार करता है जिसमें आगे की कार्रवाई की रूपरेखा होती है. 16 नवंबर को द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, सहारा से संबंधित कागजात पर हजारों पन्नों की एक भारी-भरकम रिपोर्ट तैयार की गई है जिसे इन दिनों एक असेसमेंट ऑफिसर देख रहे हैं.
दस्तावेजों के मुताबिक किसको कितना दिया गया?
अभी 15 नवंबर को ही ‘द हिंदू’ में जोसी जोसफ की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था कि ‘प्रशांत भूषण ने राजनेताओं को रिश्वत देने की जांच की मांग की’. यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री मोदी और अन्य बड़े नेताओं के नाम का जिक्र किए बिना ही छापी गई थी. इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में कुछ जानकारियां सार्वजनिक करके तहलका मचा दिया. उन्होंने उस दस्तावेज का खुलासा किया जो आयकर विभाग ने 15 अक्टूबर 2013 को आदित्य बिरला ग्रुप की कंपनी के परिसर से रेड के दौरान जब्त किया था. इस दस्तावेज में एक जगह लिखा था - ‘गुजरात सीएम - 25 करोड़ (12 डन - रेस्ट?)‘
हालांकि भाजपा प्रवक्ताओं ने तुरंत ही इस दस्तावेज में लिखी बातों को सिरे से नकार दिया लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक भी इस पर कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है. ‘कॉमन कॉज’ ने अपनी जनहित याचिका के साथ जो दस्तावेज कोर्ट में जमा किये हैं उनमें एवी बिरला समूह के एग्जीक्यूटिव शुभेंदु अमिताभ से हुई पूछताछ का लिखित ब्यौरा भी शामिल है. इस पूछताछ में उन्होंने बताया था कि दस्तावेजों में लिखा गया ‘गुजरात सीएम’ उन्होंने ‘व्यक्तिगत नोट’ के तौर पर लिखा था.
ये तीन एक्सेल शीट्स - जो जब्त किये गए दस्तावेजों का बेहद छोटा सा हिस्सा हो सकती हैं - कथित तौर पर क्या संकेत देती हैं? ये लॉग शीट्स दस महीनों में कुल 115 करोड़ रूपये के भुगतान दर्शाती हैं. ये दस महीने थे मई 2013 से मार्च 2014 तक. यानी 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले तक.
शाइना एनसी को कथित तौर पर कुल पांच करोड़ का भुगतान हुआ. यह भुगतान 10 सितंबर 2013 से 28 जनवरी 2014 के बीच किसी ‘उदय जी’ द्वारा किया गया. एक अन्य कागज़ पर एक गुप्त सी प्रविष्टि भी दर्ज है जिसके अनुसार शाइना एनसी से ‘मदद’ मांगी जा रही थी कि वे ‘ए जनरल को बॉम्बे केस वापस लेने (समाप्त करने) के लिए’ कहें.
दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कथित तौर पर एक करोड़ रुपये लिए जो किसी ‘जायसवाल’ ने 23 सितंबर 2013 को उन्हें दिए.
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कथित तौर पर 29 सितंबर 2013 और एक अक्टूबर 2013 के बीच कुल दस करोड़ रुपये लिए. ये रुपये उन्हें दो किस्तों में किसी ‘नीरज वशिष्ठ’ द्वारा पहुंचाए गए. जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कथित तौर पर चार करोड़ रुपये लिए जो उन्हें किसी ‘नंद जी’ ने एक अक्टूबर को दिए थे.
‘सीएम गुजरात’ को 15.1 करोड़ रुपये का कथित भुगतान 30 अक्टूबर 2013 और 29 नवंबर 2013 के बीच कुल चार किस्तों में किसी ‘जायसवाल जी’ द्वारा किया गया. इसके अलावा 30 अक्टूबर 2013 और 22 फरवरी 2014 के बीच आठ भुगतान अहमदाबाद में हुए. ये भुगतान ‘अहमदाबाद मोदी जी’ को ‘जायसवाल जी’ द्वारा ही किये गए और इनकी कुल रकम 35.1 करोड़ रुपये थी. साथ ही 28 जनवरी 2014 को भी ‘अहमदाबाद मोदी’ को पांच करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. यानी ‘सीएम गुजरात’, ‘अहमदाबाद मोदी जी’ और ‘अहमदाबाद मोदी’ को कथित तौर पर कुल 55.2 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ.
क्या आयकर विभाग द्वारा जब्त किए गए इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने और इनमें जिन भुगतानों का जिक्र है, उनकी हकीकत का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जांच बैठाई जाएगी?
यह इस कहानी का अंत नहीं है.
देंख्ाें सहारा समूह से जब्त दस्तावेज-1, सहारा समूह से जब्त दस्तावेज - 2, सहारा समूह से जब्त दस्तावेज - 3
सभ्ाी दस्तवेज http://satyagrah.scroll.in/article/103382/if-modi-didn-t-receive-rs-55-crore-bribe-as-gujarat-cm-then-these-documents-should-be-investigated-more-rigourously?utm_source=rss&utm_medium=public पर प्रकाशित
साभ्ाारः सत्याग्रहडॉटस्क्रोलडॉटइन, writer- परंजॉय गुहा ठाकुरता
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी है
कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए, बनवास भेजे गए, लौट कर आए तो वहां राज भी किया, उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया, जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है, जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं. जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है. जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है. जहां भरत रहे वहां मंदिर है. हनुमान मंदिर है. कोप भवन है. सुमित्रा मंदिर है. दशरथ भवन है. ऐसे बीसीयों मंदिर हैं. और इन सबकी उम्र 400-500 साल है. यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा.
अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है. उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया! कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे. शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी. दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी. निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी, सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद! अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे. लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई. तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को. बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे मांग के खाइबो मसीत में सोइबो. और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली. राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा! कहीं लिखा क्यों नहीं!
अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं. मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं. उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर.. राम पर चढ़ते रहे. मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं. ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे. सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा. 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे. जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?
अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है. उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता. सब आते हैं. एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया. क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है! जाने कौन.
छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया. वहां ताले पड़ गए. आरती बंद हो गई. लोगों का आना जाना बंद हो गया. बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते होंगे कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया?
अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहजीब के मर जाने की कहानी है.
(Rajiv Tyagi with Wasim Akram Tyagi on facebook)
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