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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

मैं अन्ना नहीं होना चाहूँगी


अरुंधती राय
जो कुछ भी हम टी. वी. पर देख रहे हैं अगर वह सचमुच क्रान्ति है तो हाल फिलहाल यह सबसे शर्मनाक और समझ में न आने वाली क्रान्ति होगी. इस समय जन लोकपाल बिल के बारे में आपके जो भी सवाल हों उम्मीद है कि आपको ये जवाब मिलेंगे : किसी एक पर निशान लगा लीजिए - (अ) वन्दे मातरम, (ब) भारत माता की जय, (स) इंडिया इज अन्ना, अन्ना इज इंडिया, (द) जय हिंद. आप यह कह सकते हैं कि, बिलकुल अलग वजहों से और बिलकुल अलग तरीके से, माओवादियों और जन लोकपाल बिल में एक बात सामान्य है. वे दोनों ही भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. एक नीचे से ऊपर की ओर काम करते हुए, मुख्यतया सबसे गरीब लोगों से गठित आदिवासी सेना द्वारा छेड़े गए सशस्त्र संघर्ष के जरिए, तो दूसरा ऊपर से नीचे की तरफ काम करते हुए ताजा-ताजा गढ़े गए एक संत के नेतृत्व में, अहिंसक गांधीवादी तरीके से जिसकी सेना में मुख्यतया शहरी और निश्चित रूप से बेहतर ज़िंदगी जी रहे लोग शामिल हैं. (इस दूसरे वाले में सरकार भी खुद को उखाड़ फेंके जाने के लिए हर संभव सहयोग करती है.) अप्रैल 2011 में, अन्ना हजारे के पहले "आमरण अनशन" के कुछ दिनों बाद भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों से, जिसने सरकार की साख को चूर-चूर कर दिया था, जनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने टीम अन्ना को ("सिविल सोसायटी" ग्रुप ने यही ब्रांड नाम चुना है) नए भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का न्योता दिया. कुछ महीनों बाद ही इस कोशिश को धता बताते हुए उसने अपना खुद का विधेयक संसद में पेश कर दिया जिसमें इतनी कमियाँ थीं कि उसे गंभीरता से लिया ही नहीं जा सकता था. फिर अपने दूसरे "आमरण अनशन" के लिए तय तारीख 16 अगस्त की सुबह, अनशन शुरू करने या किसी भी तरह का अपराध करने के पहले ही अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. जन लोकपाल बिल के लिए किया जाने वाला संघर्ष अब विरोध करने के अधिकार के लिए संघर्ष और खुद लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जुड़ गया. इस 'आजादी की दूसरी लड़ाई' के कुछ ही घंटों के भीतर अन्ना को रिहा कर दिया गया. उन्होंने होशियारी से जेल छोड़ने से इन्कार कर दिया, बतौर एक सम्मानित मेहमान तिहाड़ जेल में बने रहे और किसी सार्वजनिक स्थान पर अनशन करने के अधिकार की मांग करते हुए वहीं पर अपना अनशन शुरू कर दिया. तीन दिनों तक जबकि तमाम लोग और टी.वी. चैनलों की वैन बाहर जमी हुई थीं, टीम अन्ना के सदस्य उच्च सुरक्षा वाली इस जेल में अन्दर-बाहर डोलते रहे और देश भर के टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने के लिए उनके वीडियो सन्देश लेकर आते रहे. (यह सुविधा क्या किसी और को मिल सकती है?) इस बीच दिल्ली नगर निगम के 250 कर्मचारी, 15 ट्रक और 6 जे सी बी मशीनें कीचड़ युक्त रामलीला मैदान को सप्ताहांत के बड़े तमाशे के लिए तैयार करने में दिन रात लगे रहे. अब कीर्तन करती भीड़ और क्रेन पर लगे कैमरों के सामने, भारत के सबसे महंगे डाक्टरों की देख रेख में, बहुप्रतीक्षित अन्ना के आमरण अनशन का तीसरा दौर शुरू हो चुका है. टी.वी. उद्घोषकों ने हमें बताया कि "कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है." उनके तौर-तरीके गांधीवादी हो सकते हैं मगर अन्ना हजारे की मांगें कतई गांधीवादी नहीं हैं. सत्ता के विकेंद्रीकरण के गांधी जी के विचारों के विपरीत जन लोकपाल बिल एक कठोर भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून है जिसमें सावधानीपूर्वक चुने गए लोगों का एक दल हजारों कर्मचारियों वाली एक बहुत बड़ी नौकरशाही के माध्यम प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, संसद सदस्य, और सबसे निचले सरकारी अधिकारी तक यानी पूरी नौकरशाही पर नियंत्रण रखेगा. लोकपाल को जांच करने, निगरानी करने और अभियोजन की शक्तियां प्राप्त होंगी. इस तथ्य के अतिरिक्त कि उसके पास खुद की जेलें नहीं होंगी यह एक स्वतंत्र निजाम की तरह कार्य करेगा, उस मुटाए,
गैरजिम्मेदार और भ्रष्ट निजाम के जवाब में जो हमारे पास पहले से ही है. एक की बजाए, बहुत थोड़े से लोगों द्वारा शासित दो व्यवस्थाएं. यह काम करेगी या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक कानूनी सवाल, वित्तीय अनियमितता या घूसखोरी का मामला है या एक बेहद असमान समाज में सामाजिक लेन-देन की व्यापकता है जिसमें सत्ता थोड़े से लोगों के हाथों में संकेंद्रित रहती है? मसलन शापिंग मालों के एक शहर की कल्पना करिए जिसकी सड़कों पर फेरी लगाकर सामान बेचना प्रतिबंधित हो. एक फेरी वाली, हल्के के गश्ती सिपाही और नगर पालिका वाले को एक छोटी सी रकम घूस में देती है ताकि वह क़ानून के खिलाफ उन लोगों को अपने सामान बेंच सके जिनकी हैसियत शापिंग मालों में खरीददारी करने की नहीं है. क्या यह बहुत बड़ी बात होगी? क्या भविष्य में उसे लोकपाल के प्रतिनिधियों को भी कुछ देना पड़ेगा? आम लोगों की समस्याओं के समाधान का रास्ता ढांचागत असमानता को दूर करने में है या एक और सत्ता केंद्र खड़ा कर देने में जिसके सामने लोगों को झुकना पड़े. अन्ना की क्रान्ति का मंच और नाच, आक्रामक राष्ट्रवाद और झंडे लहराना सबकुछ आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों, विश्व कप जीत के जुलूसों और परमाणु परीक्षण के जश्नों से उधार लिया हुआ है. वे हमें इशारा करते हैं कि अगर हमने अनशन का समर्थन नहीं किया तो हम 'सच्चे भारतीय' नहीं हैं. चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों ने तय कर लिया है कि देश भर में और कोई खबर दिखाए जाने लायक नहीं है. यहाँ अनशन का मतलब मणिपुर की सेना को केवल शक की बिना पर हत्या करने का अधिकार देने वाले क़ानून AFSPA के खिलाफ इरोम शर्मिला के अनशन से नहीं है जो दस साल तक चलता रहा (उन्हें अब जबरन भोजन दिया जा रहा है). अनशन का मतलब कोडनकुलम के दस हजार ग्रामीणों द्वारा परमाणु बिजली घर के खिलाफ किए जा रहे क्रमिक अनशन से भी नहीं है जो इस समय भी जारी है. 'जनता' का मतलब मणिपुर की जनता से नहीं है जो इरोम के अनशन का समर्थन करती है. वे हजारों लोग भी इसमें शामिल नहीं हैं जो जगतसिंहपुर या कलिंगनगर या नियमगिरि या बस्तर या जैतपुर में हथियारबंद पुलिसवालों और खनन माफियाओं से मुकाबला कर रहे हैं. 'जनता' से हमारा मतलब भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और नर्मदा घाटी के बांधों के विस्थापितों से भी नहीं होता. अपनी जमीन के अधिग्रहण का प्रतिरोध कर रहे नोयडा या पुणे या हरियाणा या देश में कहीं के भी किसान 'जनता' नहीं हैं. 'जनता' का मतलब सिर्फ उन दर्शकों से है जो 74 साल के उस बुजुर्गवार का तमाशा देखने जुटी हुई है जो धमकी दे रहे हैं कि वे भूखे मर जाएंगे यदि उनका जन लोकपाल बिल संसद में पेश करके पास नहीं किया जाता. वे दसियों हजार लोग 'जनता' हैं जिन्हें हमारे टी.वी. चैनलों ने करिश्माई ढंग से लाखों में गुणित कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे ईसा मसीह ने भूखों को भोजन कराने के लिए मछलियों और रोटी को कई गुना कर दिया था. "एक अरब लोगों की आवाज़" हमें बताया गया. "इंडिया इज अन्ना." वह सचमुच कौन हैं, यह नए संत, जनता की यह आवाज़? आश्चर्यजनक रूप से हमने उन्हें जरूरी मुद्दों पर कुछ भी बोलते हुए नहीं सुना है. अपने पड़ोस में किसानों की आत्महत्याओं के मामले पर या थोड़ा दूर आपरेशन ग्रीन हंट पर, सिंगूर, नंदीग्राम, लालगढ़ पर, पास्को, किसानों के आन्दोलन या सेज के अभिशाप पर, इनमें से किसी भी मुद्दे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा है. शायद मध्य भारत के वनों में सेना उतारने की सरकार की योजना पर भी वे कोई राय नहीं रखते. हालांकि वे राज ठाकरे के मराठी माणूस गैर-प्रान्तवासी द्वेष का समर्थन करते है और वे गुजरात के मुख्यमंत्री के विकास माडल की तारीफ़ भी कर चुके हैं जिन्होनें 2002 में मुस्लिमों की सामूहिक हत्याओं का इंतजाम किया था. (अन्ना ने लोगों के कड़े विरोध के बाद अपना वह बयान वापस ले लिया था मगर संभवतः अपनी वह सराहना नहीं.) इतने हंगामे के बावजूद गंभीर पत्रकारों ने वह काम किया है जो पत्रकार किया करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अन्ना के पुराने रिश्तों की स्याह कहानी के बारे में अब हम जानते हैं. अन्ना के ग्राम समाज रालेगान सिद्धि का अध्ययन करने वाले मुकुल शर्मा से हमने सुना है कि पिछले 25 सालों से वहां ग्राम पंचायत या सहकारी समिति के चुनाव नहीं हुए हैं. 'हरिजनों' के प्रति अन्ना के रुख को हम जानते हैं : "महात्मा गांधी का विचार था कि हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा. रालेगान सिद्धि में हम यही तरीका आजमा रहे हैं." क्या यह आश्चर्यजनक है कि टीम अन्ना के सदस्य आरक्षण विरोधी (और योग्यता समर्थक) आन्दोलन यूथ फार इक्वेलिटी से भी जुड़े रहे हैं? इस अभियान की बागडोर उनलोगों के हाथ में है जो ऐसे भारी आर्थिक अनुदान पाने वाले गैर सरकारी संगठनों को चलाते हैं जिनके दानदाताओं में कोका कोला और लेहमन
ब्रदर्स भी शामिल हैं. टीम अन्ना के मुख्य सदस्यों में से अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया द्वारा चलाए जाने वाले कबीर को पिछले तीन सालों में फोर्ड फाउंडेशन से 400000 डालर मिल चुके हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान के अंशदाताओं में ऎसी भारतीय कम्पनियां और संस्थान शामिल हैं जिनके पास अल्युमिनियम कारखाने हैं, जो बंदरगाह और सेज बनाते हैं, जिनके पास भू-संपदा के कारोबार हैं और जो करोड़ों करोड़ रूपए के वित्तीय साम्राज्य वाले राजनीतिकों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं. उनमें से कुछ के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं अन्य अपराधों की जांच भी चल रही है. आखिर वे इतने उत्साह में क्यों हैं ? याद रखिए कि विकीलीक्स द्वारा किए गए शर्मनाक खुलासों और एक के बाद दूसरे घोटालों के उजागर होने के समय ही जन लोकपाल बिल के अभियान ने भी जोर पकड़ा. इन घोटालों में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी था जिसमें बड़े कारपोरेशनों, वरिष्ठ पत्रकारों, सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने तमाम तरीके से साठ-गाँठ करके सरकारी खजाने का हजारों करोड़ रूपया चूस लिया. सालों में पहली बार पत्रकार और लाबीइंग करने वाले कलंकित हुए और ऐसा लगा कि कारपोरेट इंडिया के कुछ प्रमुख नायक जेल के सींखचों के पीछे होंगे. जनता के भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन के लिए बिल्कुल सटीक समय. मगर क्या सचमुच? ऐसे समय में जब राज्य अपने परम्परागत कर्तव्यों से पीछे हटता जा रहा है और निगम और गैर सरकारी संगठन सरकार के क्रिया कलापों को अपने हाथ में ले रहे हैं (जल एवं विद्युत् आपूर्ति, परिवहन, दूरसंचार, खनन, स्वास्थ्य, शिक्षा); ऐसे समय में जब कारपोरेट के स्वामित्व वाली मीडिया की डरावनी ताकत और पहुँच लोगों की कल्पना शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश में लगी है; किसी को सोचना चाहिए कि ये संस्थान भी -- निगम, मीडिया और गैर सरकारी संगठन -- लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में शामिल किए जाने चाहिए. इसकी बजाए प्रस्तावित विधेयक उन्हें पूरी तरह से छोड़ देता है. अब औरों से ज्यादा तेज चिल्लाने से, ऐसे अभियान को चलाने से जिसके निशाने पर सिर्फ दुष्ट नेता और सरकारी भ्रष्टाचार ही हो, बड़ी चालाकी से उन्होंने खुद को फंदे से निकाल लिया है. इससे भी बदतर यह कि केवल सरकार को राक्षस बताकर उन्होंने अपने लिए एक सिंहासन का निर्माण कर लिया है, जिसपर बैठकर वे सार्वजनिक क्षेत्र से राज्य के और पीछे हटने और दूसरे दौर के सुधारों को लागू करने की मांग कर सकते हैं और अधिक निजीकरण, आधारभूत संरचना और भारत के प्राकृतिक संसाधनों तक और अधिक पहुँच. ज्यादा समय नहीं लगेगा जब कारपोरेट भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा देकर उसका नाम लाबीइंग शुल्क कर दिया जाएगा. क्या ऎसी नीतियों को मजबूत करने से जो उन्हें गरीब बनाती जा रही है और इस देश को गृह युद्ध की तरफ धकेल रही है, 20 रूपए प्रतिदिन पर गुजर कर रहे तिरासी करोड़ लोगों का वाकई कोई भला होगा? यह डरावना संकट भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र के पूरी तरह से असफल होने की वजह से पैदा हुआ है. इसमें विधायिका का गठन अपराधियों और धनाढ्य राजनीतिकों से हो रहा है जो जनता की नुमाइन्द्गी करना बंद कर चुके हैं. इसमें एक भी ऐसा लोकतांत्रिक संस्थान नहीं है जो आम जनता के लिए सुगम हो. झंडे लहराए जाने से बेवकूफ मत बनिए. हम भारत को आधिपत्य के लिए एक ऐसे युद्ध में बंटते देख रहे हैं जो उतना ही घातक है जितना अफगानिस्तान के युद्ध नेताओं में छिड़ने वाली कोई जंग. बस यहाँ दांव पर बहुत कुछ है, बहुत कुछ.

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

मिलिए 1857 के क्रांतिकारियों से

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम मेरठ से ही शुरु हुआ। यह उस वक्त की बात है जब यह कहावत चलती थी कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी नहीं अस्त होगा’। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि जब मेरठ से बागी सैनिकों ने हिन्डन पार कर दिल्ली पर धावा बोला तो उसकी धमक लंदन तक सुनाई पड़ी। मुजफ्फर नगर, अलीगढ़, आगरा, मथुरा, सोनीपत, करनाल, पेशावर, लखनऊ, आदि शहरों में जैसे ही दिल्ली पर मेरठ के सैनिकों द्वारा धावा बोलने की खबर पहुंची, वे भी इसके साथ हो लिए। दिल्ली पर एकबारगी तो उन्होंने कब्जा भी कर लिया। लेकिन जब अंग्रेजी सेना ने चारों ओर से क्रांतिकारियों पर हमला बोला तो इस समूचे इलाके की मिट्टी लाल हो गयी। आजादी की जंग छेड़ने के एवज में मेरठ शहर को भी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। देश की आजादी की जंग में इस इलाके में जिताना खून बहा वह एक मिशाल है। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दुओं और मुसलमानों की एक एकता का मूकगवाह रहा है यह शहर।
आज भी इस शहर की पुरानी जर्जर इमारतों की दीवारों पर कान लगाएगें तो 1857 के क्रांतिकारियों का गीत ‘हम हैं इसके मालिक हिन्दुस्तान हमारा..’ आपको सुनाई देगा। इन क्रांतिकारियों की ऐसी अनगिनत यादें शहर में आज भी मौजूद हैं। इन्हीं शहीदों की याद में मेरठ शहर के बीचों-बीच बना है 1857 का संग्रहालय। जैसे ही आप मुख्य गेट से प्रवेश करेंगे तो सामने बने पत्थर के स्तम्भ पर आपकी निगाह पड़ेगी। इस पर खुदे नामों को जरा गौर से देखिएगा तो आप खुद-ब-खुद समझ जाएंगे कि यह कितना बेशकीमती है। इनसे विदा लेकर ज्योंही आप मुख्य द्वार से प्रवेश करते हैं तो 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिकारी मंगल पाण्डे को अपने सामने खड़ा हुआ पाएंगे। आप चाहें तो उन्हें छू भी सकते हैं। यह अलग बात है कि न जाने क्यों वे एकदम से मौन खड़े रहते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने साथियों का इन्तजार कर रहे हैं। उनके बार्इं ओर बड़े से हाल में अंग्रेजी सेना के तोप के मुकाबले खड़ी है लाठी, डंडों और तलवारों या फिर लगभग निहत्थी जनता। जी हां सब कुछ अभी भी मौजूद है इस शहर में। क्रांतिकारी सेना के नायक नाना साहब और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भी हैं तो दूसरी ओर अजीमुल्ला, बेगम हजरत महल और अवन्तीबाई लोधी भी।
Devendra Pratap
9719867313

रविवार, 3 अप्रैल 2011

तारीख के हवाले से मिस्र की गवाही

मिस्र में 18 दिनों के जनांदोलन ने 30 साल सत्ता पर काबिज रहे होस्नी मुबारक की रवानगी की इबारत लिखी. तारीख दर तारीख कैसे घटी ए घटनाएं, डालते हैं एक नजर.
25 जनवरी 2011: (पहला दिन) मिस्र की पुलिस के राष्ट्रिय अवकाश का दिन. हजारों की संख्या में लोग तहरीर चौक में जमा, आंसू गैस छोड़ कर प्रदर्शनकारियों पर काबू करने की कोशिश की गई.
26 जनवरी 2011: (दूसरा दिन) सरकार ने प्रदर्शनों पर रोक लगाई. सोशल नेटवर्किंग साइट्स और फेसबुक भी प्रतिबंधित लेकिन नहीं रुके प्रदर्शन.
27 जनवरी 2011: (तीसरा दिन) नोबल शांति पुरस्कार विजेता और मिस्र के प्रमुख विपक्षी नेता अलबारादाई मिस्र वापस लौटे.
28 जनवरी 2011: (चौथा दिन) इंटरनेट और मोबाइल सुविधाओं पर रोक. सेना के टैंक सड़कों पर उतरे.
29 जनवरी 2011: (पांचवा दिन) प्रदर्शन तेज हुए, कई लोगों की मौत. मुबारक ने जनता के गुस्से को काबू करने की कोशिशें कीं.
30 जनवरी 2011: (छठा दिन) भारी संख्या में विदेशियों और पर्यटकों ने मिस्र को छोड़ा.
31 जनवरी 2011: (सातवां दिन) सेना ने कहा प्रदर्शनकारियों पर बल का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वादा किया.
1 फरवरी 2011: (आठवां दिन) सेना के विश्वास पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे. मुबारक ने विपक्ष से बातचीत की पेशकश की.
2 फरवरी 2011: (नवां दिन) मुबारक के समर्थक भी सड़कों पर उतरे. जगह-जगह झड़पें और हिंसा. अर्थव्यवस्था चरमराई.
3 फरवरी 2011: (दसवां दिन) तहरीर चौक पहुंची विदेशी मीडिया पर हमले. सरकार पर सुनियोजित हमले कराने के आरोप लगे.
4 फरवरी 2011: (ग्यारहवां दिन) अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने पुराने मित्र मुबारक को सत्ता छोड़ने के कड़े संदेश दिए.
5 फरवरी 2011: (बारहवां दिन) मुबारक ने अपने बेटे सहित पार्टी के शीर्ष नेताओं को पद से हटाया, लेकिन सत्ता छोड़ने से इंकार किया.
6 फरवरी 2011: (तेहरवां दिन) प्रतिबंधित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड सहित प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से सरकार ने बातचीत की.
7 फरवरी 2011: (चौदहवां दिन) इंटरनेट के जरिए प्रदर्शनकारियों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाने वाले गूगल के अधिकारी वेल घोनिन को रिहा किया गया.
8 फरवरी 2011: (पंद्रहवां दिन) विदेशी और यूरोपीय देशों के साथ मुबारक के रिश्तों पर चर्चा गर्म हुई. अमरीका पर भी निशाना साधा गया.
9 फरवरी 2011: (सोलहवां दिन) मिस्र में तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़Þीं. अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़Þी लेकिन प्रदर्शनकारी तहरीर चौक पर डटे रहे.
10 फरवरी 2011: (सत्रहवां दिन) मिस्र के घटनाक्रम को देखते हुए सेना और नेताओं ने कयास लगाए कि मुबारक जल्द इस्तीफा देंगे, लेकिन मुबारक की घोषणा कि वो बनें रहेंगे.
12 फरवरी 2011: (अट्ठारवां दिन) घोषणा के बाद उमड़े जन सैलाब के आगे मुबारक झुके और सेना ने देश की कमान संभाली.