‘मेरा भारत महान’ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
‘मेरा भारत महान’ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ टीम अन्ना का आन्दोलन : एक विश्लेषण


दूसरी और अंतिम किस्त 
दिगंबर

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के अनुयायी कौन और क्यों?
अन्ना टीम की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शहरी मध्यम वर्ग ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. इस आन्दोलन का समर्थक और जनाधार यही वर्ग था. समाज का मुखर तबका होने के कारण यह किसी मुद्दे पर राय बनाने में आम तौर पर सबसे प्रभावी भूमिका निभाता है. मीडियाकर्मी जब भी किसी विचार पर मत संग्रह करते हैं या पैनल डिसकशन आयोजित करते हैं तो वेसिविल सोसाइटीयानी मध्यम वर्ग की ही राय लेते हैं, जैसे- एनजीओ चलाने वाले, पत्रकार, खिलाड़ी, अभिनेता, विभिन्न पेशों से जुड़े लोग, प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और अन्य लोग. मध्यम वर्ग के अधिकांश लोग सक्रिय राजनीति से दूर रहना ही पसंद करते हैं. ‘नो पोलिटिक्स प्लीज’, ‘विचार और जूते दरवाजे पर उतार कर आयेंऔरपोलिटिक्स इज लास्ट रिफ्यूज ऑफ स्काउनड्रेल्सउनके प्रिय नारे हैं. इसीलिए अन्ना के मीडिया प्रेरित आन्दोलन में मध्यम वर्ग की भारी पैमाने पर हिस्सेदारी ने बहुतेरे लोगों को चकित, भ्रमित और भाव विह्वल किया. इसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व की घटना बताया गया जो काफी हद तक सही भी है. इस मुहिम में मध्यम वर्ग की अति सक्रियता को पिछले बीस वर्षों के दौरान उसके आकार, सामाजिक, आर्थिक स्थिति और चारित्रिक बदलाव से अलग करके नहीं समझा जा सकता है. 1991 में नवउदारवादी आर्थिक नीति लागू होने के बाद से ही आर्थिक विमर्श में मध्यम वर्ग को काफी महत्व दिया जाने लगा था. विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए सरकार और मीडिया ने मध्यम वर्ग की संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर बताना शुरू किया था. सही संख्या का पता लगाने के लिए कई देशी-विदेशी संस्थाओं ने सर्वेक्षण किये और एक ही साथ 5 करोड़ से लेकर 30 करोड़ तक के आँकडे सामने आये. इन प्रयासों के पीछे क्रय-शक्ति और उपभोग-क्षमता का पता लगाना था ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल और सेवाओं के उपभोक्ताओं का सही-सही अंदाजा लगा सकें. यह काफी कठिन काम था क्योंकि उस दौरान सीमित आमदनी के चलते मध्यम वर्ग के जीवन स्तर और उपभोग पैटर्न में काफी भिन्नता थी.I 25 साल पहले वास्तविक जीवन में और फिल्मों में भी ठेठ मध्यम वर्गीय चरित्र (अमोल पालेकर या संजीव कुमार) का जीवनस्तर आज की तुलना में भला क्या था? कितने मध्यम वर्गीय परिवार वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव ओवन, कार और होली डे पैकेज का उपभोग करते थे? लेकिन आज स्थिति भिन्न है. मध्यम वर्ग की संख्या में वृद्धि और उनकी खुशहाली के लिए शासक वर्ग अपनी पीठ थपथपाते हैं और इसे अपनी नीतियों की सफलता का प्रमाण बताते हैं तो यह ठीक ही है. विजय सुपर स्कूटर से लेकर नए मॉडल की गाड़ियों तक, पलस्तर झड़ते किराये के मकान से आलीशान अपार्टमेंट के मालिकाने तक तथा सरकारी स्कूलों-अस्पतालों से संपन्न पांच सितारा स्कूलों-अस्पतालों तक की यात्रा जितनी तेजी से पूरी हुई, उसके बारे में 1990 से पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. बाजार अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने के लिए थोड़ी संख्या वाले पहले से मौजूद मध्यम वर्ग की तादाद और आमदनी बढ़ाना जरूरी था. साथ ही अगर शासकों ने अपनी नीतियों के समर्थक और सहयोगी तथा अपने जनाधार का विस्तार नहीं किया होता तो समाज का मुखर तबका होने के नाते मध्यम वर्ग इन नीतियों के खिलाफ निरंतर जारी जनांदोलनों को तेज करने में भूमिका निभाता रहता. मध्यम वर्ग के विभिन्न हिस्सों ने ‘90 के दशक के पूर्वार्ध में नयी आर्थिक नीतियों का प्रबल विरोध किया था, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी विभागों के कर्मचारी, व्यापारी, शिक्षक, छात्र तथा पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और पेशेवरों का एक हिस्सा शामिल था. आज मध्यम वर्ग में विरोध का वह स्वर कहीं दूर-दूर तक सुनाई नहीं पड़ता है. उसकी जगह अब वहाँ से शाइनिंग इंडिया, अतुल्य भारत, मेरा भारत महान, ‘आई लव माई इंडिया, जय होकी अनुगूँज रही है. पिछले बीस वर्षों के दौरान देश कि कुल आय का बंटवारा इस तरह पुनर्गठित किया गया कि शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच, वास्तविक उत्पादन और उस पर निर्भर सेवा क्षेत्र के बीच की तथा गाँव और शहर के बीच खाई लगातार चौड़ी होती गयी. पांचवें और छठे वेतन आयोग ने केंद्र, राज्य और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों के वेतन भत्तों में भारी वृद्धि की तथा न्यूनतम तथा अधिकतम वेतनमान में भारी अंतर पैदा किया. निजी क्षेत्र के प्रबंधकों और मानसिक श्रम करने वालों के वेतन में तो काफी तेजी से वृद्धि हुई, लेकिन वहाँ प्रत्यक्ष उत्पादन और शारीरिक श्रम करने वालों की न्यूनतम मजदूरी भी तय नहीं है. इन सभी उपायों से ऊँची आय और क्रय-शक्ति वाला माध्यम वर्ग का एक छोटा तबका पैदा हुआ जबकि बड़ी संख्या में लोगों को बाजार से बहिष्कृत कर दिया गया. यह यात्रा उतनी ही विकृतिपूर्ण और असंगत रही है जितनी वास्तविक उत्पादन वाले कृषि और उद्योग की कीमत पर सेवा क्षेत्र का असमान्य और गैर अनुपातिक विस्तार. निश्चय ही यह सहज स्वाभाविक प्रक्रिया में नहीं बल्कि सरकार के सचेत प्रयास और उदारीकरण-निजीकरण की उन्हीं नीतियों के चलते घटित हुआ है जिनके कारण देश की बहुसंख्य मेहनतकश जनता आज तबाही की चपेट में आकर कराह रही है. उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के चलते सेवा क्षेत्र- आईटी, कम्युनिकेशन, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, रियल इस्टेट, फाइनांस, शेयर बाजार, बीपीओ, केपीओ तथा निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए जिससे आबादी के एक छोटे से हिस्से की आय में काफी वृद्धि हुई. देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ से भी शहरों में खास तरह के रोजगार और मध्यम वर्ग कि एक नयी जमात तैयार हुई. इस तरह निजीकरण, बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग की आमदनी और तादाद में इजाफा हुआ. इसका ऊपरी हिस्सा आम तौर पर इन नीतियों का प्रबल समर्थक है और आर्थिक नवउपनिवेशवादी मौजूदा ढांचे का सामाजिक अवलंब है. भारत में नवउदारवादी नीतियों के प्रस्तोता और प्रवर्तक पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक नुमाइंदे थे लेकिन उच्च मध्यम वर्ग भी शुरू से ही इसका प्रबल समर्थक था. इस वर्ग का सपना था कि वैश्वीकरण-उदारीकरण भारत को विकसित देशों कि क़तार में ला खड़ा करेगा, भारत को महाशक्ति बना देगा, यहाँ की हर चीज विश्वस्तरीय हो जायेगी और भारत स्वर्ग बन जायेगा. भारत को महाशक्ति बनाने में यह वर्ग कैसे अपना योगदान कर सकता है, इसकी झलक स्वदेश और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों में दिखाई गयी है. लेकिन उच्च मध्यम वर्ग जब वर्तमान यथार्थ पर निगाह डालता है तो उसे नवउदारवादी सपना साकार होते नहीं दीखता. उन नीतियों का अन्धभक्त होने के कारण वह उनमें कोई कमी नहीं देखता. उसे लगता है कि सारी बुराई भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों, यानी सरकार में है जो अपना काम ठीक से नहीं करती. मुस्लिम तुष्टिकरण’, आरक्षण, गरीबों के लिए सस्ता अनाज, रोजगार गारंटी जैसी नीतियों को वह नेताओं की वोट बैंक की राजनीति और नवउदारवादी/बाजारवादी नीतियों के रास्ते का रोड़ा मानकर आलोचना करता है. भ्रष्टाचार को भी वह ऐसी ही बाधा मानता है जो कुछ भ्रष्ट और स्वार्थी नेताओं द्वारा खड़ी की गयी है. उसका मानना है कि भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं की जड़ है जिसे दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है. इसका एक ही सरल उपाय है कि कठोर कानून बनाओ. उधर सरकार की मज़बूरी यह है कि उसे वोट लेने के लिए कुछ लोक-लुभावन कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं व्यवस्था को चलाने और चुनाव जीतने के लिए भ्रष्टाचार को बनाए रखना होता है जबकि भद्रलोक के सामने ऐसी कोई मज़बूरी नहीं. अन्ना टीम के आन्दोलन का आधार यही उच्च मध्यम वर्ग है. ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाकर यह उसी थाली में छेद कर रहा है जिसमें खाता है. लेकिन वास्तव में यह मुहिम शासक वर्गों के विरुद्ध नहीं बल्कि भ्रष्टाचार मिटा कर नवउदारवादी बाजार अर्थव्यवस्था को दीर्घायु बनाने के लिए है. अन्ना आन्दोलन ने यह साबित कर दिया है कि सरकार और भद्रलोक के बीच का टकराव मित्रवत है. यह आन्दोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं, मूल ढांचे के खिलाफ नहीं. भद्रलोक इस भ्रष्टतंत्र को समाप्त करने की बातें नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त करके उसे और बेहतर बनाने में मदद करना चाहता है. वह इस सड़ते, बदबू फैलाते लोकतंत्र की सफाई करना चाहता है ताकि देशी-विदेशी पूंजीपति कारगर तरीके अपना कर लूटतंत्र जारी रखें और भद्रलोक के स्वर्ग का वैभव बढ़ाते रहें.
अन्ना आंदोलन और मुख्यधारा की मीडिया
अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन में मीडिया की भूमिका को लेकर भी काफी सवाल उठे. इसमें संदेह नहीं कि दिन-रात सीधा प्रसारण के लिए अपने क्रेन और क्रू के साथ अगर टीवी चैनल सक्रिय नहीं होते, तो इस आन्दोलन में स्वतःस्फूर्त तरीके से इतने लोग शामिल नहीं होते. जन आंदोलनों के प्रति मीडिया के परंपरागत रवैये को देखते हुए यह सक्रियता भले ही अचम्भे में डालने वाली लगती हो लेकिन आन्दोलन के चरित्र और मीडिया की प्राथमिकता पर गौर करें तो उसकी भूमिका अस्वाभाविक नहीं लगेगी. अपने एक अध्ययन में पत्रकार विपुल मुदगल (सीएसडीएस) ने सर्वाधिक प्रसार वाले अंग्रेजी और हिंदी के तीन-तीन अख़बारों के 48 अंकों का विश्लेषण किया. इन अख़बारों ने अपने सम्पादकीय पन्ने का केवल 2 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में रहने वाली दो तिहाई जनता की समस्यों पर खर्च किया. इन अख़बारों में छपने वाली 100 से 200 सामग्री में से औसतन तीन सामग्री ग्रामीण मुद्दों पर थी. इनमें भी अधिकांश सामग्री अपराध, हिंसा और दुर्घटनाओं से सम्बंधित थी. समाचारों के चुनाव के मामलों में हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों के चरित्र में कोई खास फर्क नहीं पाया था, जबकि हिंदी अख़बारों के अधिकांश पाठक ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते हैं. इन अख़बारों का झुकाव उपभोक्ता केंद्रित होता है और उनकी निगाह ऊपर उठते पढ़े-लिखे शहरी उपभोक्ताओं पर होती है जिनकी दुनिया में गरीबी और पिछड़ेपन के लिए कोई जगह नहीं होती. इस मामले में टीवी चैनलों का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वहाँ तो सब कुछ नवधनाड्य उपभोक्ता वर्ग के लोगों के मनोरंजन के लिए है. मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. नवउदारवादी दौर में लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की तरह मीडिया भी बुरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त है. नीरा राडिया प्रकरण ने पूंजीपति, नेता और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को उजागर किया. इसके पहले नोट के बदले समाचार लिखने का मामला देश भर में चर्चा का विषय बना था. पहले भी सरकार और पूंजीपतियों से प्राप्त होने वाले विज्ञापन और सुविधाओं से मीडिया का चरित्र प्रभावित होता था. लेकिन मौजूदा दौर में देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा भारी पूंजी निवेश ने मीडिया को विराट पूंजी प्रतिष्ठानों में बदल दिया. इसकी प्राथमिकता पूंजीवाद की हिफाजत करना और साथ ही अपनी पूंजी का विस्तार करना रह गया है. स्वतंत्रऔरनिष्पक्षहोने का मुखौटा भी अब नहीं रहा. उसने अपने आप को जनता से पूरी तरह काट लिया है. ख्यातिलब्ध पत्रकार पी. साईनाथ ने इग्नू में एक व्याख्यान देते हुए मीडिया के इस बदले चरित्र को सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया‘‘“आज अख़बारों में कोई श्रमिक संवाददाता नहीं है, आवास और प्राथमिक शिक्षा का कोई संवाददाता नहीं है. इस देश की 70 प्रतिशत आबादी से हम साफ़ कह रहे हैं कि हमें उनसे कोई लेना-देना नहीं है.’’ उनका कहना था कि ““ निजी सुलहनामों के खंडहर पर जरखरीद खबरें उठ खड़ी हुई हैं. निजी सुलहनामों ने मीडिया कंपनियों को अपनी कंपनियों में शेयर दिए थे जो 2008-09 के शेयर बाजार के डूबने के साथ ही रद्दी में बदल गए. जरखरीद ख़बरों ने इन भ्रष्ट कंपनियों और राजनेताओं को विधानसभा और आम चुनावों के दौरान इस लायक बनाया कि वे मीडिया के साथ बेनामी लेन-देन कर सकें.’’ मीडिया के चरित्र पर इस संक्षिप्त चर्चा की पृष्ठभूमि में यह समझना कठिन नहीं कि अन्ना के जन लोकपाल आन्दोलन के दौरान मीडिया ने इतनी सक्रियता क्यों दिखाई और क्यों सातों दिन चौबीस घंटे हर छोटी-छोटी बातों का भी ग्राफिक चित्रण करती रही. यह अकारण नहीं कि प्रधानमंत्री को जन लोकपाल बिल के दायरे में लाने के लिए बजिद टीम अन्ना मीडिया को उससे अछूता रखने का हामी है. मीडिया के मालिकों, पत्रकारों, विज्ञापन दाताओं और लक्षित दर्शकों-पाठकों तथा अन्ना आंदोलन के नेताओं-समर्थकों के बीच अद्भुत वैचारिक और वर्गीय एकरूपता है. दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुस्लिम संगठनों का यह आरोप बिलकुल सही है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण हिंदू मानसिकता के लोग हावी हैं. मीडिया पर भी इसी तबके का वर्चस्व है जो काफी हद तक मीडिया की प्राथमिकता और पक्षधरता तय करता है. अन्ना आन्दोलन के समानांतर उसी समय दिल्ली में दलित, पिछडों, अल्पसंख्यकों की एक रैली हुई थी जिसे मीडिया ने तरजीह नहीं दी. इससे पहले आरक्षण विरोधी आन्दोलन के समर्थन में भी मीडिया ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. दिल्ली में मजदूरों-किसानों और अन्य मेहनतकश तबकों की रैलियों और प्रदर्शनों के प्रति मीडिया का रुख या तो अनदेखी करने का या उसे बदनाम करने का ही रहा है. इसी वर्ष फरवरी में देश की 9 प्रमुख ट्रेड यूनियनों की रैली के प्रति मीडिया ने ऐसा ही रवैया अपनाया. उसने आन्दोलन को अपेक्षित स्थान नहीं दिया और कहीं चर्चा भी की तो इस रूप में कि इसके चलते दिल्ली में यातायात को कितना व्यवधान पहुंचा और दिल्लीवासियों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ी. मीडिया का मुख्य उद्देश्य अब भव्य आयोजनों की दिलचस्प और ब्योरेवार रिपोर्टिंग करके लोगों को रिझाना और अपनी टीआरपी बढ़ाना ही रह गया है. अन्ना आन्दोलन की रिपोर्टिंग के साथ भी ऐसा ही हुआ. मीडिया ने रोचक और चटपटे ब्योरे, उत्सुकता और सनसनी जगाने वाले तथ्यों तथा उत्सव, उमंग और छिछली भावुकता वाले दृश्यों को खूब बढ़-चढ़ कर प्रस्तुत किया. लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे को गंभीरता से सामने लाने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, लोकपाल बिल के अलग-अलग मसौदों की तुलनात्मक रूप से व्याख्या करने, लोकपाल के लाभ-हानि पर विभिन्न पक्षों की राय बताने, कुल मिलाकर दर्शकों-पाठकों को शिक्षित करने की जहमत मोल नहीं ली. इसके बजाय किसने अपने नवजात बच्चे का नाम अन्ना रखा, कौन नंगे पैर चलकर अन्ना के चरण छूने पहुंचा, किसने कितने आकर्षक गोदने-टैटू रचाए, लोगों में कितना उमंग था, जैसी बातों पर ही ध्यान केंद्रित किया, बीच-बीच में उच्च मध्यवर्गीय वस्तुओं और सेवाओं का विज्ञापन भी चलता रहा. आन्दोलन को तेज करने और उसका टेम्पो ऊँचा रखने और अन्ना को शोहरत दिलाने में मीडिया की भूमिका असंधिग्ध है. अप्रैल में आन्दोलन की घोषणा करने से पहले अन्ना के नाम के साथ गूगल सर्च में अन्ना कोर्निकोवा का सन्दर्भ आता था और अन्ना हजारे के नाम पर केवल चार या पांच परिणाम दिखते थे, जबकि प्रधानमंत्री द्वारा ड्राफ्टिंग कमिटी में उन्हें शामिल किये जाने के बाद उनके हजारों संदर्भ आने लगे. 28 अगस्त को एनडीटीवी ने घोषणा की कि यह संख्या 2 करोड़ 90 लाख से भी ज्यादा हो गयी है और भारत के वेब जगत में उनकी लोकप्रियता लेडी गागा से तो कम, लेकिन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अधिक है. अन्ना हजारे और उनकी लोकपाल मुहिम की छवि बनाने के अलावा मीडिया ने 13 दिनों के इस आन्दोलन के दौरान यह प्रयोग भी सफलतापूर्वक आजमाया कि शासक वर्गों द्वारा किस हद तक मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. नोम चोम्श्की ने तो मीडिया द्वारा सहमति गढ़े जाने का ही विश्लेषण किया था. आज मीडिया उससे आगे बढ़करअसहमति गढ़नेमें भी सफल रहा है. यानि वह मन चाहे मुद्दे गढ़ सकता है और उन्हें लोगों के मष्तिस्क में रोप कर उन्हें उद्वेलित कर सकता है तथा उस उद्वेलित समूह को मनचाहे तरीके से नियंत्रित और संचालित कर सकता है. इस घटना चक्र के दौरान इसे आजमाया जा चुका है. निश्चय ही यह अन्य सभी बातों से कहीं अधिक गम्भीर और विचारणीय मामला है.