Thursday, February 16, 2012

भारतीय राज्य द्वारा जनता पर चलाए जा रहे युद्ध का प्रतिरोध करो

यान मिर्डल
दोस्तो, मैं भारतीय जनता के पक्ष में खड़े आंदोलन की अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के बारे में कुछ कहना चाहता हूं।
हम यहां एक कारण से इकट्ठा हुए हैं। वह कारण है भारत की जनता पर खुद भारत के राज्य द्वारा या कुछ छूट देकर इस बात को कहें तो भारतीय राज्य मशीनरी पर काबिज हिस्सों द्वारा चलाया जा रहा युद्ध। आप सभी एक भारतीय नागरिक के बतौर इस युद्ध को रोक देना चाहते हैं। हम और दूसरे भारत के बाहर के मित्र इस युद्ध की भयावहता के खिलाफ खड़ी भारत की जनता के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
    ऐसा प्रयास भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं है। हम आपसे यहां भारत में यह नहीं कह रहे हैं कि आप अपने मामलों से कैसे निपटेंगे । इसका निर्णय करना आप पर है। कोई भी विदेशी इसका सुझाव नहीं दे सकता है। हालांकि साम्राज्यवादी घेरे से बहुत सारे- सरकार, मीडिया, एनजीओ, इस तरह का प्रयास कर रहे हैं। यह मामला उसूल का है। आप लोग - हम नहीं, अपनी कार्यवाहियों में भारत की जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। जैसा कि हमने अमेरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया की जनता के संघर्षों के दौरान की एकजुटता आंदोलन के दौरान कहा था: ‘‘कंबोडिया, लाओस और वियेतनाम की जनता को अपने तरीकों से समर्थन दो‘‘।
    पर एक बात तो सच् है जिसे 1624 में जान डन ने सूत्रबद्ध किया था और जिसे विभिन्न देशों के हम लोग दमन और सामाजिक क्रूरताओं के खिलाफ, -स्पेन की जनता के खिलाफ छेड़े गये फ्रैंको के युद्ध के दौरान, उद्धृत और प्रयोग करते रहे हैं। यह उद्धहरण हमारी अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का आधार है:  ‘‘कोई भी आदमी अपने आप में एक द्वीप नहीं है; हरेक आदमी महाद्वीप एक हिस्सा है, मूल का हिस्सा है ........ किसी भी इंसान की मौत मुझे भी कम कर देता है, कारण कि मैं इस मनुष्यता का हिस्सा हूं। और इसीलिए यह जानने के लिए मत जाओ कि मौत का घड़ियाल किसके लिए बजा है; यह तुम्हारे लिए है।’’
इस समय भारत की जनता के खिलाफ चलाए जा रहे क्रूर युद्ध के बारे में कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। 1980 में जब मैं आंध्र प्रदेश में था (देखें: इडिया वेऽट्स, संगम बुक्स, हैदराबाद) उस समय मैंने खुद दलित व आदिवासीयों के खिलाफ युद्ध को देखा और सुना और यही अब अब 2010 में छत्तीसगढ़ में हो रहा है (देखें: रेड स्टार ओवर इडिया, सेतू प्रकाशनीय, कोलकाता)।
    इस युद्ध में जमीन कब्जाने वाले और शासक वर्ग के हथियारबंद गैंग और गिरोह आम जन के जल, जंगल जमीन पर कब्जा जमाने की कोशिश में लगे हुए हैं। गांवों को जलाया जा रहा है। महिलाओं का बलात्कार किया गया। और, यह कोई पुरूष की कामुकता का परिणाम नहीं है बल्कि यह आम जन के आत्मसम्मान व गरीमा को जलील कर देने का सोचा समझा हुआ तरीका है। जो लोग खुद की रक्षा में खड़े हो रहे हैं उन्हें आतंकवादी बता दिया जा रहा है।
यह युद्ध सिर्फ इन अपनाये गये पारंपरिक तौरतरीकों के चलते ही क्रूरतापूर्ण नहीं है बल्कि खुद भारतीय राज्य के नियम व कानून का भी सरकार एक राज्य के बतौर भी खुला उलघंन कर रही हैं। भारत में एनकाउटंर एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ सामान्य शब्दकोष में पाये जाने वाले अर्थ से भिन्न है। भारत में इस विशिष्ट शब्दावली का अर्थ सरकार के कारिन्दों द्वारा कपटपूर्ण तरीके से महत्वपूर्ण अवांछनीय राजनीतिक हस्ती की हत्या है। आजाद की हत्या सरकार द्वारा युद्ध विराम के लिए वार्ता करने के राजनीतिक आश्वासन के झांसे में की गई। हाल ही में  किशन जी का भी ‘‘एनकाउटंर’’ किया गया।
    हालांकि इन सारी बातों के साथ इस घिनौने युद्ध में भी कोई अनोखी बात नहीं है। जनता के खिलाफ इस युद्ध के पीछे आम आर्थिक कारण ही हैं। लालच और मुनाफा। यह एक ऐसा सच् है जो भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में भी दर्ज है। आप इसे यहां देख सकते हैं: ‘‘कमेटी आॅन स्टेट एग्रेरियन रिलेशंस एण्ड अनफिनिश्ड टास्क आॅफ लैंड रिफार्म’’, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, भाग1 (ड्राफ्ट रिपोर्ट, मार्च 2009), निष्कर्ष -‘‘कोलबंस के बाद आदिवासी जमीनों की सबसे बड़ी लूट’’।
     जैसा कि मैंने कहा कि भारत में इस युद्ध को लोग अच्छी तरह जान रहे हैं। लेकिन विदेशों में, हमारे देश में, जिसे भारत में जाना जा रहा है और रिपोर्ट किया जा रहा है, को गैरजानकारी में रखा जा रहा है; या कुछ दबे-दबाये और चंद बातों से ही वे कुछ जान पा रहे हैं। इसका एक बहुत सामान्य सा कारण है। आधिकारिक मीडिया या तो बड़ी नीजी आर्थिक हितों के हाथों में हैं जो भारत के संसाधनों के लूट के लोभ-लालच में जुटी हुई हैं या वे सरकार के हाथों में हैं जिसका अपना साम्राज्यवादी हित है और जो भारत की वास्तविकता को आम बहस में लाने की खिलाफत में है।
यह अपने समय की एक आम बात है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के किसी भी अध्ययन में गुजरी शताब्दी में यह दिखता ही है कि मीडिया छोटे से छोटे सवाल पर भी बमुश्किल ही आजाद रही है। और जब यह युद्ध, दूसरे देशों पर कब्जा या साम्राज्यवाद जैसे बड़े और निर्णायक सवालों का हो तब तो मीडिया ताकतवरों का मुंह और मंच बन जाता है जहां युद्ध को भड़काया जाता है और लूट-शोषण का पक्ष लिया जाता है।
     कुछ पत्रकार और लेखक तो रहे ही हैं और आज भी इस दिशा में प्रयास करते हुए काम करने वाले हैं ही जो सही सूचनाओं को हासिल कर बड़ी मीडिया के माध्यम से फैलाने में सफलता हासिल कर रहे हैं। हम इससे परिचित हैं। लेकिन मालिकों का हित साधने वाले संपादकीय दरबान सतर्क हैं। ईमानदार रिपोर्टर चंद लोग रहे हैं और आज भी कम ही हैं और जब भी हालात कठिन बनते हैं उनका मुंह बंद कर दिया जाता है। आप एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय अमेरीकी लेखक एडगर स्नो को याद करिये। उन्हें शीत युद्ध के समय काॅमिक्स का अनुवाद कर के जीविका चलानी पड़ी। उन्हें अमेरीका की बड़ी मीडिया ने चिन्हित कर किनारे फेंक दिया था क्योंकि वे अच्छी तरह बातों से वाकिफ और विद्वान थे।
     भारत में युद्ध के बारे में जानकारी है। शासक वर्ग का जनता के खिलाफ चलाए जा रहे इस युद्ध पर आ रहे कुछ विमर्श और रिपोर्ट में अपना हित है। लेकिन भारत से बाहर एक आम सन्नाटा है। इसका कारण भारत सरकार द्वारा भारत के चारों ओर खड़ा किया गया प्रतिबंधन घेरा नहीं है। इसकी तो तब तक जरूरत नहीं है जब तक कि साम्राज्यवादी देशों की आधिकारिक मीडिया के दरबान यह काम कर रहे हैं।
    मैं उन लोगों को नहीं जानता जो भारत से रिपोर्टिग कर रहे हैं। जब वे लोग धरोहरों और लोक कला और भारत के आर्थिक व वैज्ञानिक विस्तार के बारे में बताते हैं, बहुधा दिलचस्प होता है। मैं जितना जानता हूं उनके रिपोर्ट का यह सबसे अच्छा हिस्सा है। मेरा भरोसा है कि वे सभी सम्मानित लोग हैं। हां, वे सम्मानित लोग हैं। लेकिन हम देख सकते हैं कि वे रिपोर्टर ही अपने देश -साम्राज्यवादी देशों, के लोगों को भारत की जनता मसलन, आदिवासी और दलितों के वास्तविक हालात के बारे में रिपोर्ट नहीं करते हैं। हो सकता है कि इसमें रिपोर्टरों की दिलचस्पी न बनती हो। लेकिन मेरा मानना है कि इसके पीछे गृहदेश में बैठे संपादकों द्वारा इसकी अनुमति न देना है।
    इन्हीं कारणों से भारत की जनता के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन इंटरनेट और स्वतंत्र पत्रिकाओं और अखबारों -जो सरकारों द्वारा या एकाधिकारी पूंजी द्वारा समर्थित न हो, के माध्यम से सूचनाओं को विस्तारित करना मुख्य मुद्दा मानता है। अमेरीका और दूसरी सरकारें इंटरनेट की सापेक्षिक आजादी को छीनने का प्रयास कर रही हैं। फिर भी हम अपने लोगों के बीच सूचना विस्तारित करने के माध्यम की तरह इसका प्रयोग कर सकते हैं।
    इसमें आप सभी का सहयोग चाहिए। हमें और आपको भी आधिकारिक रिपोर्टरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इस सबके बावजूद भी कि वे कुछ अलग करना चाहते हैं और ईमानदारी से रिपोर्ट करते है, वे वैसा ही गाने के लिए नौकरी पर रखे गए है जिन गानों के लिए उन्हें तनख्वाह दी जाती है। यदि वे ईमानदार हैं और इतने मजबूत हैं कि दरबानों पर पार पा जाते हैं: यह अच्छा है! यदि नहीं, तो जरूरी है कि हम दूसरे रास्तों का प्रयोग करें।
     मेरी एक राजनीतिक धारणा है। स्वीडिश सरकार को यदि मुझे लताड़ने के लिए कोई बहुत कड़ा शब्द नहीं मिलता है तो मुझे पुर्वाग्रही कह सकती है। मैं एकजुटता आंदोलन का हिस्सा भी हूं। हालांकि भारतीय जनता के समर्थन में बना अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन एक ही जैसे लोगों का नहीं है। यह एकहद तक  बहुविध और विस्तारित आंदोलन है। यही इसकी ताकत है। यह कोई पार्टी नहीं है। इसके भागीदार धार्मिक या सामाजिक सवालों पर एकमत नहीं हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि सभी लोगों की वैसी ही साम्राज्यवाद पर या भारतीय राज्य के चरित्र की एक ही व्याख्या हो जैसा कि मेरी समझ है। लेकिन वे सभी भारत की जनता के समर्थन की जरूरत के विशिष्ट मुद्दे पर एकराय हैं।
इस बात को याद रखना महत्वपूर्ण है। भारत की जनता के साथ खड़े एकजुटता आंदोलन का आधार बहुत  व्यापक होना चाहिए। आप कह सकते हैं कि पिछली शताब्दी में युद्ध, साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक दमन के खिलाफ राजनीतिक काम में गतिविधियों  के दौरान हमने गलतियां की और खुद को कमजोर साबित किया। इराक की जनता के खिलाफ अमेरीकी युद्ध के खिलाफत में हुए प्रदर्शनों -स्टाकहोम व इस्तानबुल, में मैंने हिस्सेदारी की। ये विरोध प्रदर्शन मेरे जीवन में देखे गये सबसे बड़े प्रदर्शन थे। लेकिन तब भी हमारी सरकार -और वो पार्टियां भी जो खुद को ‘‘वामपंथी’’ कहती हैं, इराक को तबाह करने को समर्थन करती रहीं।
हां, हम इतने मजबूत नहीं थे कि उन्हें ऐसा करने में बाधा बन सकें। इसके लिए हमारी आलोचना हो सकती है। लेकिन इन्हीं दशकों में हम सफल भी हुए हैं। हमने ‘‘स्टाॅकहोम अपील’’ को लेकर 1952 में सोवियत यूनियन के खिलाफ अमेरीका के नाभिकीय युद्ध करने की संभावना को रोकने का विश्व स्तरीय अभियान चलाया। अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया के सशस्त्र संघर्ष कर रही जनता के पक्ष में हमने अपने देशों में जनसमर्थन निर्माण का महत्वपूर्ण काम किया। स्वीडन में सरकार ने हम लोगों के खिलाफ 20 दिसंबर 1967 को घुड़सवार पुलिस को भेजा। लेकिन हम लोगों को इतना विशाल जनसमर्थन मिला कि दो हफ्तों बाद ही ठीक वही सरकार जो हम लोगों के खिलाफ पुलिस को पीटने के लिए भेजा था, ओल्फ पा मे अमेरीकी युद्ध के खिलाफ जन प्रदर्शनों में आगे आगे चला। स्वीडन सरकार की यह नई अवस्थिति (‘‘जिसे तुम हरा नहीं सकते - उनके साथ हो जाओ!’’) एकजुटता आंदोलन का ही परिणाम था। और इससे दक्षिण पूर्व एशिया की लड़ रही जनता को काफी सहयोग मिला।
     स्वीडन भारत से काफी दूर का एक देश है। फिर भी वहां भारत की जनता के पक्ष में एकजुटता आंदोलन की लोकप्रियता बढ़ रही है। प्रदर्शन, अध्ययन समूहों, मीटीगों, पर्चा और साहित्य द्वारा उभर रहा एकजुटता आंदोलन ‘‘दूसरों’’ के लिए भाव के साथ होने वाली गतिविधियां नहीं हैं। मैंने जान डन को उद्धृत किया क्योंकि उन्होंने सचाई को व्यक्त किया है। एकजुटता आंदोलन उस समय मजबूत बनता है जब इसके भागीदार मनुष्य की इस सचाई से चेतन हो कि कोई भी इंसान खुद में द्वीप नहीं होता। भारत की जनता के अधिकारों की रक्षा करना स्वीडन की जनता की रक्षा करना है!
(यह विश्वप्रसिद्ध लेखक यान मिर्डल द्वारा दुनियाभर के जनांदोलनों के समर्थन में लिखा गया भाषण है. इसे साथी अंजनी ने उपलब्ध करवाया है.)


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