Tuesday, September 13, 2011

जीत अन्ना की नहीं, कारपोरेटों की हुई

डा. बनवारी लाल शर्मा
भ्रष्टाचार के खिलाफ असली लड़ाई को मजबूत करने की जरूरत है। चतुर कारपोरेट और उससे नियंत्रित मीडिया ने लड़ाई की दिशा बदल दी है। एक कानून बन जाय तो भ्रष्टाचार मिट जाएगा, ऐसी अवधारणा लोगों के दिमाग में बिठाई जा रही है। यह खतरनाक चाल है कारपोरेटों की, इससे सावधान रहने और असली मोर्चो पर संघर्ष करने की जरूरत है।

इस समय देश में ऐसा माहौल बन गया है मानो भ्रष्टाचार राजनेताओं, नौकरशाहों और न्यायाधीशों में समाया हुआ है। सभी मानते हैं कि इनमें ज्यादातर लोग भ्रष्टाचार में फंसे हैं। पर एक सवाल उठता है ये लोग तो 1991 से पहले भी थे। पहले भी भ्रष्टाचार करते होंगे। हां, करते थे, पर कितना ? 1991 से पहले बड़े-बड़े घोटालों में बोफोर्स का नाम आता है, सेना के लिए जीप खरीद का घोटाला हुआ, मुंदड़ा कांड हुआ, इन सबमें कोई 500 करोड़ रुपयो से ज्यादा गोलमाल नहीं था। इन घोटालों पर खूब हल्ला हुआ था, बोफोर्स घोटाला तो सरकार को ही ले डूबा। 1991 के बाद कितने घोटाले हुए और अभी भी हो रहे हैं और कितनी धनराशि की हेराफेरी उनमें हुई? हर्षद मेहता शेयर घोटाला कांड में 5000 करोड़ रुपयों से लेकर अब तक दर्जनों घोटाले हुए हैं जिनमें सबसे ताजे 2जी स्पैकट्रम घोटाले में 1,72,000 करोड़ की राशि की सरकार को हानि हुई। राष्ट्रकुल खेल घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला तो अभी-अभी हुए हैं। पिछले 20 साल में बड़े बड़े घोटालों की बाढ़ सी आ गयी है। क्या हो गया 1991 के बाद कि राजनेता, नौकरशाह और न्यायाधीश इतने बड़े घोटालों में फंसते गये? जो असली कारण है उसे लगातार छिपाया जाता रहा है और वर्तमान भ्रष्टाचार विरोधी अभियान इण्डिया अगेंस्ट करप्शन में भी छिपाया गया है। असली कारण यह है कि 1991 में डा. मनमोहन सिंह द्वारा विश्व बैंक, मुद्राकोष और गैट के दबाव में बनाई गई नई आर्थिक नीति ने भारत की अर्थव्यवस्था, वित्तीय व्यवस्था, सेवा क्षेत्र और कृषि को बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिया। हर्षद मेहता घोटाले में छह विदेशी बैंकों का हाथ था। डा. मनमोहन सिंह से पूछा गया क्या राय है आपकी इन विदेशी बैंकों के बारे में ? उत्तर मिला- बैंकों में मुझे अभी भी भरोसा है।
यह विश्व स्तर पर सिद्ध हो चुका है कि कारपोरेट और करप्शन (भ्रष्टाचार) समभावी शब्द हैं।
बड़े-बड़े कारपोरेट अर्थव्यवस्था और अन्तत: राजनीति पर (ए राजा को हमने ही संचार मंत्री बनवाया था- रतन टाटा) हावी हो गये है और व्यापक रूप से बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार देश में फैल गया है। यह सारा भ्रष्टाचार कानून सम्मत तरीके से हो रहा है। कारपोरेटी भ्रष्टाचार देश के संसाधनों की भरी लूट के रूप में हो रहा है। सबसे बड़ा भ्रष्टाचार का अड्डा है कारपोरेटों द्वारा भूमि अधिग्रहण में। देश के किसानों की लाखों एकड़ उर्वरा भूमि सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र), परमाणु ऊर्जा प्लांट, थर्मल प्लांट, छह या आठ लेन वाले राजमार्ग, और रिहायशी कालोनियों के लिए जबरदस्ती ली जा रही है। किसान, आदिवासी उसे रोक रहे हैं और पुलिस की लाठी-गोली खा रहे हैं। दूसरा बड़ा अड्डा है भ्रष्टाचार का खानों में। लोहा, एल्यूमिनियम, कोयला आदि की खानों पर बड़ी कम्पनियों ने लाइसेंस ले लिये हैं। इनमें कितना बड़ा भ्रष्टाचार है, इसका एक उदाहरण कोयला का खनन है। देश में 54 लाख करोड़ रुपये का कोयला जो छह लाख करोड़ रपये की रॉयल्टी लेकर कम्पनियां सरकार से ले रही है। यानी 48 लाख करोड़ रुपये का कोयला कारपोरेट घराने ले जाने की जुगत में हैं। लौह अयस्क, बॉक्साइट, लाइमस्टोन (सीमेंट) में यही कहानी है। उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में दक्षिण कोरिया (असल में अमेरिका) की कम्पनी पोस्को को लोहे का कारखाना और निजी बंदरगाह लगाने का लाइसेंस मिल गया है। 12 अरब डालर की पूंजी यह कम्पनी लगाना चाहती है। 30 साल का इसके साथ ठेका है। हर साल 1.5 अरब डॉलर के मूल्य का कोयला इसे मिलेगा, यानी 8 साल में कम्पनी अपनी पूंजी वापस ले लेगी और अगले 22 साल में 33 अरब डॉलर का लोहा ले जाएगी। इससे बड़ा भ्रष्टाचार क्या हो सकता है। नदियों पर बांध या सुरंग बनाकर बिजली बनाने में भी कंपनियां बड़ा घोटाला कर रही हैं।
भ्रष्टाचार की असली लड़ाई इन अड्डों पर चल रही है। इन लड़ाइयों को मजबूत करने की जरूरत है। पर चतुर कारपोरेट और उससे नियंत्रित मीडिया ने लड़ाई की दिशा बदल दी है। एक कानून बन जाय तो भ्रष्टाचार मिट जायेगा, ऐसी अवधारणा लोगों के दिमाग में बिठायी जा रही है। यह खतरनाक चाल है कारपोरेटों की, इससे सावधान रहने और असली मोर्चो पर संघर्ष करने की जरूरत है। 28 सितम्बर को पूरे देश में अन्ना की जीत की लहर फैल गई। पिछले दिन संसद में अन्ना हजारे की तीन मांगों पर बहस हुई और ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित हो गया। प्रधानमंत्री ने अन्ना को पत्र भेजकर इस बात की सूचना कर दी। इस सूचना को मिलते ही रामलीला मैदान में जुटी जनता खुशी से नाच उठी। टीवी चैनलों ने बढ़-चढ़कर इस जीत की घोषणा की। अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने इस जीत के शीर्षकों से रंग गए। देश के अनेक शहरों-कस्बों में जीत का जश्न मनाया गया मिठाइयां बांटी गई। कहा गया कि आजादी के बाद जीत का इतना विशाल नजारा नहीं देखा गया। वंदे मातरम् के नारों से देशभक्ति का देश में समा बंध गया। इसे जनता की जीत कहा गया। कुछ ऐसा ही जीत का जश्न और देशभक्ति का समां कुछ महीनों पहले बंधा था, जब शहरों के नौजवान रात भर खुशी से नाचते रहे थे। वह मौका था जब भारत की क्रिकेट टीम ने विश्व कप में पहले पाकिस्तान को हराया था, फिर श्रीलंका को हराकर विश्व कप जीता था। अन्ना हजारे ने जिन्हें अब देश के मसीहा के रूप में मीडिया ने पेश किया है, अनशन तोड़ने के बाद आगे के कई कार्यक्रमों की घोषणा की, जिनमें चुनाव सुधार, चुने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने, पर्यावरण को सुधारने, गरीब-अमीर की खाई कम करने, किसानों के मुद्दों को हल करने की बातें शामिल हैं।
देश के हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार है, कहीं भी नियमानुसार, कानूनों के अनुसार काम नही होता। नीचे से ऊपर तक पैसे का चलन है। इससे लोगों के मन में गुस्सा है। इस गुस्से को मँहगाई ने और बढ़ा दिया है। नतीजन, अन्ना के अनशन से लोगों को आशा की किरण दिखी, शायद भ्रष्टाचार दूर हो जाय, इसी आशा में बहुत से लोग सड़क पर निकल आये। भाजपा और उसके सहयोगी संघ परिवार के लोगों ने इस अवसर का राजनैतिक लाभ उठाने के स्पष्ट उद्देश्य से अपनी ताकत भी झोंक दी और जहाँ-तहाँ रैली, जलूस, धरने प्रायोजित कर डाले। किस बात की जीत हुई ? पहली बात तो यह कि यदि गांधीवादी विचार का अनशन था तो इस विचार में हार-जीत नहीं होती। अपनी बात को सामने वाला माने, उसके चित्त में सत्य का दर्शन हो, यही गांधीवादी अनशन, सत्याग्रह का उद्देश्य होता है। सरकार का विचार बदला हो, अन्ना जिस बात का आग्रह कर रहे थे, क्या सरकार और संसद ने उसे माना? अन्ना की मांग थी कि 30 अगस्त तक संसद जनलोकपाल के उनकी टीम द्वारा बनाये गये मसविदे को पारित करे। सरकार उसे स्थायी समिति में भेजना चाहती थी। जिसे अन्ना टीम ने नामंजूर कर दिया और यह भी कह डाला नाम लेकर कि स्थायी समिति में भ्रष्ट लोग बैठे हैं। सरकार के प्रतिनिधियों और अन्ना टीम में बातचीत चलती रही, हर बातचीत के बाद घटिया तरीके से एक पक्ष ने दूसरे पक्ष पर प्रहार किये। अन्त में मराठी अन्ना ने एक मराठी मंत्री के माध्यम से मामला सुलटवाया। जनलोकपाल बिल की तीन मुद्दों पर संसद ने मौखिक प्रस्ताव पास कर दिया और उसे स्थायी समिति के पास भेजने का तय कर दिया। 30 अगस्त की समय सीमा खंडित हुई। स्थायी समिति में जनलोकपाल बिल को ले जाने की बात नहीं बनी फिर किस बात की जीत हुई? वे सार दावे कहां गये कि जब तक जनलोकपाल बिल पास नहीं होगा, यह अनशन नहीं टूटेगा, चाहे जान भले ही चली जाय?
सरकार अपनी बात पर कायम है, कई मसविदे स्थायी समिति के सामने हैं, उन सब पर विचार करके तब कोई अन्तिम प्रारूप संसद में रखा जायेगा। उसमें राहुल गांधी के लोकपाल आयोग का भी मसला आ गया है। जैसे अपने पड़ोसी देश, जो हमारे साथ इतिहास में रहे हैं, उन्हें खेल में हराकर विजय की खुशी मनाना बचकानी हरकत लगी, कुछ वैसा ही दृश्य इस ऐतिहासिक जीत पर भी दिखायी दिया। अन्ना ने घोषणा की थी कि मेरा अनशन तो टूट रहा है, लेकिन धरना चालू रहेगा। कहां चल रहा है धरना ? देश के लोग अपेक्षा कर रहे थे कि इस अभियान में कहीं से तो कारपोरेटों की बात उठेगी। अनशन के दौरान नहीं, तो आगे के कार्यक्रम जो घोषित किये हैं, उसमें भ्रष्टाचार के जनक कारपोरेटों को घेरने का आवाहन किया जायेगा, ऐसी अपेक्षा थी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। दरअसल अन्ना ने देश का ध्यान कारपोरेटों के खिलाफ, उनकी लूट और भयंकर भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा देश के हर प्रदेश में जो जमीनी आन्दोलन चल रहे हैं, उधर से लोगों का ध्यान हटाकर मात्र एक कानून बनाने तक सिमटा दिया। कारपोरेट और उनके कब्जे के मीडिया और छल पूरे अन्ना के अभियान को समर्थन देते रहे और वे लोगों के गुस्से से साफ बच गये। वस्तुत: जीत अन्ना की नहीं, कारपोरेटों की हुई।

3 comments:

  1. आपने वाकई पूरा सच उजागर कर दिया है, इस साहस के लिए आपका धन्यवाद, असल में अन्ना के आंदोलन की सफलता ही मीडिया की देन है, जिसने जहां दस आदमी थे, वहां दस हजार आदमी बताए, पूरा मीडिया एकतरफा रिर्पोंटिंग कर रहा था

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  2. शहीदों का सन्देश........
    क्रांतिकारियों का लेख पढ़े
    (अन्ना हजारे आन्दोलन पर क्रांतिकारियों के विचार)


    वर्ग रूचि का आंदोलनों पर असर

    http://krantikarisandesh.blogspot.com/p/blog-page_9588.html

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  3. शुक्रिया. लेकिन आपने जो लिंक दिया है उस पर लाला हरदयाल के विचार हैं. यह रचना १९२८ की है न की २०११ की. वैसे अतीत से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, लेकिन हर बात के लिए अतीतोंमुखी होना भी खतरनाक है. अन्ना आन्दोलन पर क्रांतिकारियों के विचार वहां नहीं हैं. आशा है जल्दी ही अन्ना आन्दोलन पर आपके विचार जानने को मिलेंगे.

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