Tuesday, February 28, 2017

नोटबंदीः न खुदा ही मिला, न विसाले सनम

शिवशान्त। 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गए नोटबंदी के फैसले की तस्वीर सामने आने लगी है। पीएम ने राष्ट्र संबोधन में कहा था कि इस फैसले से 50 दिन की परेशानी होगी, ये एक कड़वी दवा है जो भारत के आर्थिक सेहत के लिए जरूरी है। नोटबंदी कर देने पर कालाधन पकड़ा जायेगा। लेकिन हुआ क्या देश की पूरी जानता बैंक की लाइन में लगी रही चारो तरफ अफरा-तफरी मच गई। समय पर पैसा न होने से इलाज के अभाव में लोगो की जानें गईं। बैंक की लाइन में बूढ़े और बीमार बुजुर्गों ने दम तोड़ा और सत्ताधरी नेताओ ने इसे कालाधन पर हमला कहा और अच्छे दिन आने की हवा फिर बनाई, लेकिन अब 50 दिन बीत जाने पर देश की क्या दशा है? क्या कालाधन खत्म हो गया, क्या कालाधन के काले चोरों को सजा हुई, क्या देश का सारा कालाधन लाइन में लगे उन लोगो के पास ही था जो 50 दिन के बाद देश में अच्छे दिन का इन्तजार कर रहे थे? सवाल है की नोटबंदी का फैसला जनता के हित में था या उसके खिलाफ? नोटबंदी के बाद आरबीआइ द्वारा जारी किये कुल 1000 और 500 के 97 प्रतिशत नोट बैंक में कैसे जमा हुए? अगर 3 प्रतिशत ही कालाधन था तो नोटबंदी का इतना बड़ा ढ़ोंग किसलिये? नोटबंदी की घोषणा के बाद 50 दिनों में 60 बार नियमों में बदलाव किया गया। जिस सरकार ने वादा किया था कि 31 मार्च तक रिजर्व बैंक के काउण्टर से नोट बदले जा सकेंगे वह अब पूरी बेशर्मी से अपनी बात से पलट गयी है। बड़े ही चतुराई से कालाधन के सवाल को भी पीछे कर भारत को कैशलेस या नक़दी विहीन डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने की बात पर ही मुख्य जोर दिया जाने लगा। नोटबंदी को लेकर सरकार की जो तैयारी थी उससे सापफ पता चलता है कि जनता की राहत से ज्यादा बैंक में पैसा जमा करने पर ध्यान दिया गया है। और इन 50 दिनों के अन्तराल में जो नियम बने वो जनता से ज्यादा काले चोरो के लिये फायेदमंद साबित हुए। यह सापफ है की कालाधन बड़े-बड़े पूँजीपति, नेता और अध्किारियों के पास हैं। उनका काला कैसे जमा हो जिसके लिये सरकार ने खुद ही रास्ते निकाले। सरकार ने ऐलान किया 82 प्रतिशत तक टैक्स जमा करके सफेद कर लें, फिर टैक्स की दर गिराकर 51 प्रतिशत और अंत में 30 प्रतिशत तक कर दी गई। फिर सरकार ने राजनीतिक पार्टियों के चंदे पर 100 प्रतिशत टैक्स की छूट दी और गरीब अपने ही पैसों के लिए लाईन में लगा रहा। खबरें आती रही हैं कि नोटबन्दी के ऐलान के ठीक पहले ही बीजेपी और उसके क़रीबियों ने भारी संख्या में देश के विभिन्न शहरों में जमीनें व मकान आदि खरीदे थे और निर्माण कार्य शुरू किया था। खबर यह भी रही कि बीजेपी नेताओं द्वारा संचालित सहकारी बैंकों में भी नोटबन्दी के बाद के 3-4 दिन में ही बड़ी मात्रा में कैश जमा हुआ। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक, जिसके निदेशक अमित शाह है, में ही 3 दिन में 600 करोड़ रुपया जमा हुआ। कालाधन, भ्रष्टाचार पर हमले की हकीकत के लिए 11 जनवरी के हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर पर्याप्त है, जिसने उजागर किया कि रिजर्व बैंक की नोट छापने की प्रेस से ही बड़ी मात्रा में नये नोट कुछ लोगों के यहाँ घर पर पहुँचाने का धन्धा भी जोरों से चालू था। नोटबंदी की घोषणा के बाद 10 नवंबर से 10 दिसंबर के बीच 4.61 लाख करोड़ रुपये की कीमत के 21.8 अरब नोट बैंकों और एटीएम से जारी किए गए। लेकिन यह रुपये आम जनता तक दो दो हजार करके पहुचें। इन सभी घटनाओ को देखते हुये लगता है आम जनता के अच्छे दिन तो आने से रहे पर बैंकों के, पूँजीपतियों के अच्छे दिन आ गये। चाहे वह बीजेपी हो या कांग्रेस, सबने इन पूँजीपतियों के हित-लाभ में ही काम किया है। नोटबन्दी के हमले का असली निशाना कालाधन नहीं बल्कि मुल्क के गरीब, मेहनतकश लोगों की थोडी बहुत कमाई धनसम्पत्ति था, जिसका एक हिस्सा जबरिया हथिया कर मालिक तबके को हस्तान्तरित करने का अभियान इसके द्वारा छेड़ दिया गया है। नोट बन्दी से किसे हुआ नुकसान असल में नुकसान तो मेहनतकशों का -दिहाड़ी, खेतिहर, असंगठित क्षेत्रा के मजदूरों का, सीमान्त-छोटे किसानों का, छोटे काम धन्ध्े करने वाले दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों का, निम्न मध्यम तबके का हुआ। नोटों के दलालों द्वारा, 500 के नोट 300-400 और एक हजार के नोट 700-800 में बेचकर ग़रीबों को अपने हाड़तोड़ श्रम की कमाई कोलुटवाने के लिए मजबूर होना पड़ा। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के एक सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा नुक़सान अनौपचारिक बाजार अर्थात सड़क किनारे के रेहड़ी-पटरी वालों पर हुआ। तमाम कम्पनियों ने इससे पैदा मंदी के बहाने भारी छंटनी शुरू कर दी। (शिवशान्त का यह लेख संघर्षरत मेहनतकश के जनवरी-मार्च अंक में प्रकाशित है। पत्रिका मंगाने के लिए लिखें, संपादक मुकुल, अमित चक्रवर्ती द्वारा 2141, चितरंजन पार्क नई दिल्ली-19, फोनः 9412969989, 9873057637)

Monday, February 27, 2017

हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगीः आजाद

असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् बिना किसे से पूछे गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में "विजयसिंह" का छद्म नाम दिया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। "एच० आर० ए०" के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं - बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था। इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया। जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओँ - पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया। सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी। ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन" का नाम बदलकर "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन" रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।" आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था। इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे। झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था। एचएसआरए द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फ़रवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने तकियाकलाम 'स्साला' के साथ भुनभुनाते हुए ड्राइँग रूम से बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फ़रवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये। आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी।। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पडा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फ़रवरी १९२७ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे। (विकीपीडिया से साभार)

कैशलेस की व्याकुलता!

बचपन में एक किस्सा सुना था। एक मायावी बादशाह था। उसे जब भी अपने और अपने कारोबारियों के हित में कोई भी काम करना होता था तो वह जनता को अपने लच्छेदार शब्दजाल में पफंसाता और उनका सबकुछ लेकर अपना उल्लू सीधा कर लेता। जब तक सच पता चलता, तब तक एक और झूठ को दमदार तरीके से परोस देता था। खासियत यह थी कि लुटी-पिटी जनता को यही भ्रम रहता कि राजा उसके लिए ही सब कुछ अपने त्याग के साथ कर रहा है। देश के वर्तमान प्रधनमंत्री जनाब मोदी के करिश्मों को देखकर पुराना किस्सा ही याद आ गया। नोटबंदी के करिश्मे को ही देखें। जनाब मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबन्दी के ऐलान के साथ ‘कालेधन’ पर ‘बमबारी’ की। लेकिन 10 दिन बीतते-बीतते उनके भाषणों से कालेधन का मुद्दा पीछे छूटता गया और ‘कैशलेश’ और डिजिटल लेन-देन का शोर बढ़ता गया। ठीक वैसे ही, जैसे प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेशों से कालाधन वापस लाने और सबके खाते में 15-15 लाख डालने की बात थी, अच्छे दिन लाने की बात थी। हालांकि अब झूठ के धूल-राख-गर्द के बीच भी यह सच्चाई आ ही गयी कि भारी मात्रा में कॉरपोरेट कर्जों को माफ करने से बैंकें नगदी के भारी संकट (लिक्यूडिटी क्राइसिस) से गुजर रही थीं। ऐसे में विशाल मात्रा में आम जनता की बचत के पैसे पूँजी के नये स्रोत बन गये। यानी पूँजीपतियों के लिए नगदी के नये स्रोत बनें। दूसरा, ई बैंकिंग व ऑनलाइन कारोबारियों को भारी मुनाफा का रास्ता खुला। तीसरे, देश की जनता के सामने झूठे वायदों, बेतहाशा महँगाई, अभूतपूर्व बेरोजगारी और किसान-मजदूर आबादी की भयंकर लूट, दमन, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमले आदि के कारण मोदी सरकार की लगतार गिरती साख को पाँच राज्यों के आसन्न चुनाव में बचाने का ब्रह्मास्‍त्र बने! बहरहाल, भ्रम के कोहरे में आइए, कालाधन और कैशलेस की हक़ीक़त को जानें। कालाधन वह नहीं होता जिसे बक्सों, तकिये के कवर में या जमीन में दबाकर रखते हैं। कालाधन भी सफेद-धन की तरह बाजार में घूमता रहता है और इसका मालिक उसे लगातार बढ़ाने की फिराक में रहता है। पैसे के रूप में जो कालाधन था वह कुल कालेधन का बेहद छोटा हिस्सा है जो घरों में नहीं बल्कि बाजार में लगा हुआ है- रियल स्टेट, विदेशों में जमा धन और सोने की खरीद आदि में। असल में देश के कालेधन का अधिकांश हिस्सा पनामा, स्विस और सिंगापुर के बैंकों में पहुँच जाता है। जहां तक कैशलेस की बात है पूँजीवादी व्यवस्था में कोई भी उत्पाद या सेवा खैरात या आवश्यकतापूर्ति के लिए नहीं होती अपितु मुनाफा कमाने के लिए बेची जाती है। कैशलेस का मतलब है, लेन-देन में एक तीसरे दलाल (कैशलेस डिजिटल सेवा देने वाले) का प्रवेश जो इसके लिए शुल्क लेगा। इससे अर्थव्यवस्था में लागत बढ़ेगी, लेन-देन की गति कम होगी तथा तीसरे पक्ष पर निर्भरता होगी। यह तीसरा पक्ष बैंक है। डिजिटल बटुए वाले पेटीएम, एयरटेल मनी, जिओ मनी, आदि भी सब बैंक बनने की प्रक्रिया में हैं। यानी अर्थव्यवस्था पर बैंकों की वित्तीय पूँजी का नियन्त्रण बढ़ेगा जो पाई-पाई अपना हिस्सा वसूल करेगा। इससे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के छोटे काम-धंधे करने वालों को नुकसान होगा, उनकी लागत बढ़ेगी और आमदनी कम, उसमें से भी एक हिस्सा वित्तीय पूँजी के हवाले। जबरदस्ती, डंडे के बल पर सबको हाँक कर कैशलेस करने की मोदी की व्यग्रता की हक़ीक़त पहचानने की जरूरत है। (यह लेख संघर्षरत मेहनतकश के जनवरी-मार्च अंक का संपादकीय है। पत्रिका मंगाने के लिए लिखें, संपादक मुकुल, अमित चक्रवर्ती द्वारा 2141, चितरंजन पार्क नई दिल्ली-19, फोनः 9412969989, 9873057637)

Thursday, February 23, 2017

207 फुटे झण्डे के पीछे का Logic ..


मित्रों आओ आपको व्यापार सिखाते हैं। आजकल 70 फीट से लेकर 207 फीट तक की ऊंचाई के तिरंगे फैशन में हैं। क़ीमत पचास लाख से लेकर डेढ़ करोड़ रुपये तक। इतनी ऊंचाई पर कपड़े का झंडा नहीं रुक सकता सो ढाई से पांच लाख रुपये का पैराशूट मैटेरियल का झंडा। इतने पर भी एक झंडे की उम्र तीन से लेकर पंद्रह दिन। अब चूंकी फ्लैग कोड कहता है कि ख़राब झंडा फहराना जुर्म है सो झंडे को औसतन पंद्रह दिन में बदला जाना ज़रूरी। यहां तक सब ठीक है। मगर मुद्दा ये है कि इतने सारे झंडे किसने लगाए और इनको मेंटेन कौन कर रहा है। दिल्ली का एक गुमनाम सा वैंडर है फास्ट ट्रैक इंजीनियरिंग। एक जैन साहब इसके सर्वेसर्वा हैं। देश भर में ये फर्म क़रीब डेढ़ सौ झंडे लगा चुकी है। पहला झंडा कनॉट प्लेस में नवीन जिंदल की फ्लैग फाउंडेशन ने लगवाया। इसके बाद देश के लगभग सारे नगर निगम, राज्य सरकारें और निजी व्यवसाई इसे लगवा चुके हैं। ताज़ा फरमान विश्वविद्यालयों में लगवाने के लिए केंद्रीय शिक्षामंत्री का है। इस से पहले बीजेपी सांसदों को बुलाकर फरमान सुनाया गया था कि वो सांसद निधि से ये झंडे लगवाएं। कई प्राईवेट कॉलेजों पर भी ये झंडा लगवाने का दबाव है। सरकारी धन से लग रहे झंडों पर तो लोग कुछ नहीं कहते मगर प्राईवेट वालों के लिए परेशानी है। इस तो सबको एक ही वैंडर से लगवाना है जो केंद्र सरकार का ख़ास है... उसके लिए मुंह मांगी क़ीमत भी दो और सालाना मेटिनेंस का क़रार भी करो। अगर हर पंद्रह दिन में झंडा ख़राब हो रहा है तो साल भर में सिर्फ झंडा बदलवाई ही साठ लाख रुपये है ऊपर से दो आदमियों की तनख़्वाह अलग। लगवाते वक्त एकमुश्त भुगतान तो वाजिब है ही। नगर निगमों के पास अपने कर्मियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं हैं मगर सालना का एक करोड़ का ख़र्च सरकार ने फिक्स करा दिया है। अब ये मत पूछना कि इसने कितना राष्ट्रवाद है और कितना व्याापार। बस पता कीजीए सज्जन जिंदल का सरकार से क्या रिश्ता है और उनकी पाईप बनाने की फैक्ट्री का इन झंडों से क्या लेना देना है। बाक़ी सांसद निधि, नगर निकायों के धन से आपका हो न हो छदम राष्ट्रीयता और पूंजीवाद का विकास तो हो ही रहा है। सरकारें ऐसे ही चलती हैं... बाक़ी मेक्यावेली चचा काफी कुछ समझा गए हैं। तो ज़ोर से मेरे साथ नारा लगाईए... जय हिंद, जय राष्ट्रवाद... वंदे मातरम... वंदे पूंजीवादी पितरमं... Sunil Gopal की वाल से साभार

Tuesday, February 21, 2017

Narendra Modi is as Manmohan singh for workers

There was about 250 small units of silver work in Jaunpur city of uttar pradesh before 1990. After new economic policy implemented in india by Manmohan singh, now in 2017 only 10 units are running. More than 5000 poor labour unemloyed, but no party come in favour of small scale industries and laboures of small cities, towns and villages. PM Narendra Modi is best fallower of Manmohan singh. He is implementing his Big corporate favouring policy very strictly. After 5 years we will find that thousands of small scale industries destroyed. Then People will find Modi same as Manmohan had done very cleaverly in past. In beginning of this year i was in Jaunpur. I go to understand nature of silver work job. After hole day street by street i find that silver work is finished. Remaining units are in very bad condition. In these units After whole day 12-14 hours working, a labour can hardly earn 50-60 rs against their wage. Demonetisation impact is very deep in this sector. Unit owner is not giving worker's wage in time, because he is also facing payment related problems from his customers.

Sunday, February 12, 2017

आईएस की कथित ‘किल लिस्ट’ कैसे हुई मीडिया में लीक, जवाब दे एनआईए- रिहाई मंच

लखनऊ। रिहाई मंच ने एनआईए द्वारा आतंकी संगठन आईएस के कथित ‘किल लिस्ट’ के मीडिया में आने पर सवाल उठाया है। मंच ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के साथ काम करने वाले हैकरों की कथित हत्या वाली लिस्ट का मीडिया में आना साबित करता है कि एजेंसियां आतंकवाद से लड़ने से ज्यादा उसका प्रोपागंडा करने में दिलचस्पी रखती हैं। रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि आईएस की कथित ‘किल लिस्ट’ का मीडिया में आने पर एनआईए खुद कटघरे में खड़ी हो जाती है। क्योंकि ऐसी लिस्ट में जिन लोगों के नाम शामिल बताए जा रहे हैं उनकी सुरक्षा प्राथमिकता में होनी चाहिए थी न कि उस लिस्ट से जुड़ी अपुष्ट खबर को चुनिंदा अखबार के माध्यम से प्रसारित कर एक पूरे समुदाय को बदनाम करना होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि खबर को जिस तरह कथित सूत्रों के हवाले से प्रसारित करवाया गया उससे यह संदेह मजबूत होता है कि एजेंसी ने आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करने के राजनीतिक उद्देश्य से खबर चलवाई है जिसके कारण खबर की विश्वसनियता पर भी गंभीर सवाल उठ जाते हैं। शाहनवाज आलम ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यपद्धति रही है कि वो आतंकवाद के नाम पर पहले एक जनमत मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया की अपुष्ट खबरों द्वारा बनाती हैं। मडिया में आई इस कथित ‘किल लिस्ट’ से यह साबित होता है कि एनआईए को लेकर जो एक आम धारणा बन चुकी है कि वह आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह पढ़े लिखे खास तौर पर तकनीकी तौर पर दक्ष मुस्लिम नौजवानों को फंसाती है, को बदलने की रणनीति के तहत तकनीकी तौर पर दक्ष बहुसंख्यक समुदाय के युवकों को आईएस की हिट लिस्ट में दिखाना चाहती है। ताकि वह समाज में इस भ्रम को फैला सके कि आईएस के नाम मुस्लिम समुदाय हिंदू समाज पर हमलावर है। रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने सुनील जोशी हत्या कांड के आरोप से बरी की गईं साध्वी प्रज्ञा के मामले में फैसले के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा अपील करने से पीछे हटने को कानून का मजाक कहा है। उन्होंने कहा कि जब खुद फैसले में इस बात को कहा गया है कि जांच एजेंसियों ने जानबूझकर कमजोर और अन्र्तविरोधी सुबूत रखे ताकि मुकदमा कमजोर हो जाए तब कानून का तकाजा यही था कि इस पूरे मामले की दोबारा जांच कराई जाती। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करते हैं बल्कि जांच एजेंसियों के सांप्रदायिक चरित्र को उजागर करते हैं जिसके खिलाफ खुद सुप्रिम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक तरफ एनआईए आतंक के आरोपों में मुस्लिम बेगुनाहों को फंसाने के लिए काल्पनिक तथ्य गढ़कर उनका जीवन नष्ट कर देती है जो अंत में अदालतों द्वारा बरी किए जाते हैं। लेकिन संघ परिवार से जुड़े हिन्दुत्वादी आतंकियों के मामले में एनआईए अधिकारी कभी लोक अभियोजक रोहनी सैलियन पर खुद केस कमजोर करने का दबाव डालते हैं तो कभी सारे गवाहों को खुद होस्टाइल करवा देते हैं और खुद इतनी कमजोर पैरवी करती हैं कि जज को भी अपने फैसले में इस पर टिप्पड़ी करना पड़ जाता है। राजीव यादव ने आरोप लगाया कि एक तरफ तो अशफाक मजीद जैसे मुस्लिम युवक को रेडिकलाइज करने के आरोप में तीन मुस्लिम युवकों रिजवान खान, मोहम्मद हनीफ और अरशी कुरैशी पर मुकदमा इस आधार पर लाद दिया है कि वो लोग उसे आईएस से जुड़ी वीडियो दिखाते थे। तो दूसरी तरफ साध्वी प्रज्ञा से जुड़ा मामला है जिनकी तस्वीर खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के साथ है लेकिन एनआईए ने इन दोनों नेताओं से आज तक कोई पूछ-ताछ तक नहीं की है उन्हें आरोपी बनाना तो दूर। द्वारा जारी शाहनवाज आलम प्रवक्ता रिहाई मंच 9415254919

Sunday, February 5, 2017

वेलेंटाइन डे और भगतसिंह को फाँसी की सजा का संघी कुत्साप्रचार

पिछले कुछ वर्षों से वेलेंटाइन डे के दिन संघ अपने परम्परागत तरीके मार पिटाई के अलावा विरोध का एक ओर तरीका प्रयोग में ला रहा है। उसने इस दिन को किसी ओर दिन के रूप में पेश करने की भी कोशिश शुरू कर दी है। संघ के कुछ लोग इस दिन मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने की वकालत करते हैं तो कुछ ये प्रचार कर रहे हैं कि इस दिन 1930 में शहीद भगतसिंह और उनके साथियों को फाँसी की सजा सुनाई गई थी। शुरूआती कुछ सालों में तो ये बेशर्मी से इसी दिन को भगतसिंह को फाँसी की सजा देने की तारीख बताते थे पर बाद में इनका ये झूठ जब चला नहीं तो इन्होने ये प्रचार चालु किया कि इस दिन उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी। इतिहासबोध से रिक्त मध्यम वर्ग के बीच इस प्रचार का अच्छा खासा प्रभाव भी हो चुका है। यहां तक कि एक अख़बार राजस्थान पत्रिका ने तो बाकायदा इसको एक बड़ी सी तस्वीर के साथ शेयर किया है। जैसी की आशा थी, उस पोस्ट को लाखों लाइक और शेयर भी मिल गये। हकीकत ये है कि भगतसिंह के केस का ट्रायल ही 5 मई 1930 में शुरू हुआ था। 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें फांसी की सजा का ऐलान हुआ व 23 मार्च 1931 को फाँसी दे दी गई। अब सवाल ये उठता है कि संघ ने भगतसिंह की शहादत को ही इस अफवाह के लिए क्यों चुना? शहीद भगतसिंह ने अपने जीते जी साम्प्रदायिकता की राजनीति का जमकर विरोध किया, देश के गरीबों, मेहनतकशों को क्रान्ति के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। नौजवानों को क्रान्ति का सही रास्ता दिखाया। ऐसे में शहीद भगतसिंह की विचारधारा से संघ आज भी खौफ खाता है। उनकी किताबों के दर्शन मात्र से संघी कार्यकर्ताओं की हालत खराब हो जाती है। लेकिन शहीद भगतसिंह आज भी देश के युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं, संघ के लिए ये सम्भव नहीं है कि उनके विरूद्ध कोई कुत्साप्रचार कर सके। इसलिए संघ ने बीच का रास्ता निकाला है कि शहीद भगतसिंह की जिन्दगी से जुड़े तथ्यों से छेड़छाड़ की जाये। इससे वो एक तीर से दो निशाने लगा सकते हैं, एक तो अपने आप को इन शहीदों से जोड़ लेते हैं, दूसरी ओर इसी बहाने अपने वेलेंटाइन डे के विरोध को भी जायज ठहरा देते हैं। हालिया कुछ वर्षों में मध्यम वर्ग के नौजवानों के बीच अपना आधार बढ़ाने के लिए भी संघ सीधे तौर पर मार-पिटाई (खासकर महानगरों में) के तरीकों की जगह ऐसे कुत्साप्रचार के हथकण्डे आजमा रहा है। एक झूठ को सौ बार बोलकर सच साबित करने की नीति पर काम करते हुए पिछले कुछ वर्षों में इन्होने इस तथ्य को आम नौजवानों के बीच पैठा भी दिया है। इसलिए गोएबल्स शैली के इस झूठ का पर्दाफाश जरूरी है। ना सिर्फ शहीदे-आज़म भगतसिंह की विचारधारा की रक्षा के लिए बल्कि इतिहासबोध की रक्षा के लिए भी। (व्‍हाट्स एेप पर फ्रं‌टियर की वाल से)

Friday, February 3, 2017

अपहरण-हत्या को अखिलेश मानते हैं जनहित और न्यायहित- रिहाई मंच

लखनऊ। रिहाई मंच ने अखिलेश सरकार पर अपराधी व माफिया नेताओं को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए कहा कि कहां तो सरकार ने बेगुनाहों को रिहा करने का वादा किया था वहीं उसने पांच साल के कार्यकाल में 19 अपराधी और माफिया नेताओं पर से ‘जनहित और न्याय हित’ में मुकदमा वापस ले लिया है। मंच ने कहा कि एक तरफ हाशिमपुरा के इंसाफ, भोपाल फर्जी मुठभेड़ का सवाल उठाने पर रिहाई मंच के नेताओं पर मुकदमा कायम किया जाता है तो वहीं दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर के दंगाई संगीत सोम और सुरेश राणा पर से रासुका हटाई जाती है। रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि हत्या, डकैती, अपहरण जैसे संगीन आरोपों में निरुद्ध नेताओं पर से मुकदमा हटाना किस तरह का जनहित और न्याय हित है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार ने अपने पांच साल के शासन में न्याय हित और जन हित की पूरी परिभाषा ही बदल दी। एक तरफ जहां आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को रिहा करने के वादे से सरकार मुकर गई तो वहीं जो अदालतों द्वारा बरी भी किए गए उन्हें भी दुबारा जेल भेजने के लिए अपील कर दिया। इसी तरह सोनभद्र के कनहर और कानपुर देहात के नेवली थर्मल पावर प्रोजेक्ट में अपनी जमीन के मुआवजे के लिए लड़ रहे किसानों पर मुकदमा कर दिया। अखिलेश यादव और उनसे नाराज बताए जा रहे उनके पिता मुलायम सिंह को बताना चाहिए कि लोहिया ने अपने किस भाषड़ में गुण्डा और माफिया तत्वों पर से मुकदमा हटाने और किसानों पर मुकदमा कायम करने की बात कही थी। जिसके तहत उन्होंने रघुरात प्रताप सिंह, राम शंकर कठेरिया, कलराज मिश्रा, अभय सिंह, भगवान शरण उर्फ गुड्डू पंडित, विजमा यादव, विजय मिश्रा, हरिओम यादव, मनबोध प्रसाद, कैलाश चैरसिया, विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह, राममूर्ति वर्मा, सुरेन्द्र सिंह पटेल, ब्रम्हा शंकर त्रिपाठी, राकेश प्रताप सिंह, मित्रसेन यादव, इरफान सोलंकी, सतीश निगम, रविदास मेहरोत्रा पर से मुकदमा हटा लिया। मंच अध्यक्ष ने कहा कि अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि उनका समाजवाद हाशिमपुरा जनसंहार और भोपाल फर्जी मुठभेड़ का सवाल उठाने वाले रिहाई मंच को क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाता और उन पर पुलिसिया दमन करते हुए मुकदमा दर्ज कर लेता है। लेकिन उसे मुजफ्फरनगर के दंगाईयों संगीत सोम और सुरेश राणा पर मुकदमा बर्दाश्त नहीं होता और वो उन पर से रासुका तक हटा लेती है। मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अखिलेश यादव का पूरा पांच साल का कार्यकाल अपने पिता मुलायम सिंह की ही लाईन पर चला। उन्होंने भी बाबरी मस्जिद को तोड़ने का षडयंत्र करने वाले आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा को रायबरेली कोर्ट में क्लीन चिट दिलवाया तो वहीं अखिलेश यादव ने मुसलमानों की गर्दन काटने का खुलेआम ऐलान करने वाले वरुण गांधी को क्लीन चिट दिलवाया। द्वारा जारी शाहनवाज आलम प्रवक्ता रिहाई मंच 9415254919