Tuesday, August 6, 2013

दुनिया की सबसे बड़ी जन गोलबन्दी का भविष्य

विगत एक माह के मिस्र के घटनाक्रम ने दुनिया के प्रेक्षकों को हैरान कर दिया है। वह देश, ऐसा प्रतीत होता है, कि एक गृहयुद्ध की ओर अग्रसर है। एक ऐसे देश में, जिसने सिर्फ दो वर्ष पहले एक अभूतपूर्व जनउभार के


माध्यम से तीस वर्षों से सत्ता पर काबिज तानाशाह होस्नी मुबारक को हटाया गया था और इस मामले में वह दुनिया भर में मिसाल बन गया था, घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ ले लिया है कि किसी के लिए भी पक्ष चुनना आसान नहीं है। पिछले माह के शुरू के जिस घटनाक्रम ने राष्ट्रपति मुर्सी को अपदस्थ किया उसके पीछे जिस जन गोलबन्दी का हाथ था उसे मिस्र के इतिहास का नहीं बल्कि दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी जन गोलबन्दी माना जा रहा है। 
  लेकिन इस घटनाक्रम की विडम्बना देखिये, एक चुने हुये राष्ट्रपति को हटा कर, अस्थायी तौर पर ही सही, जो शासन व्यवस्था कायम की गयी वह सैन्य व्यवस्था ही है। मुबारक और उसके बाद मुर्सी के खिलाफ जनता के आक्रोश और व्यापक गोलबन्दी के बावजूद, वस्तुतः दोनों राष्ट्रपतियों को सेना ने ही पदच्युत किया और ढाई वर्षों की प्रक्रिया के बावजूद जो सैन्य ढाँचा मुबारक शासन की रीढ़ था, वह न केवल अपनी जगह मौजूद है बल्कि हाल के घटनाक्रम से और मजबूत ही हुआ है। यह वही सेना है जिसे अमेरिका ने खड़ा किया है और दशकों से वित्त, अस्त्र-शास्त्रों और अन्य संसाधनों द्वारा पाला-पोसा है। इस विरोधाभास का क्या मतलब निकला जाय? क्या जनता के विद्रोहों का निष्फल होना तय है या फिर कोई और बात है? वह कौन सी चीज है जिसकी अनुपस्थिति में जनता के स्वतःस्फूर्त विद्रोहों, आन्दोलनों और कुर्बानियों का निष्फल होना निश्चित सा हो गया है। यह बात सिर्फ मिस्र के घटनाक्रम से नहीं पूरी दुनिया के अनेकों जगहों पर स्वतःस्फूर्त ढंग से फूट पड़ रहे जनता के आक्रोश से सामने आ रही है। 
  वस्तुत 2011 में जनता के विद्रोहों का जो नया सिलसिला आरम्भ हुआ था वह अभी थमा नहीं है। एक ओर तो पश्चिमी एशिया के उन देशों में जहाँ इस प्रक्रिया का आरम्भ हुआ था, यह अमेरिकी साम्राज्यवादी आकाओं और इलाके के भांति-भांति के प्रतिक्रियावादी शासकों की दखलंदाजी से विकृत से विकृततम रूप ग्रहण कर रहा है वहीँ दूसरी ओर दुनिया के पैमाने पर इसका फैलाव जारी है। खास कर संघर्ष के जिन रूपों को 2011 ने जन्म दिया था उन्हें दुनिया के हर नये देश में फूट पड़ रहे आन्दोलन ने अपनाया है। स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों की नवीनतम कड़ी में ब्राजील और तुर्की का नाम शामिल हो गया है। जून 2013 में आरम्भ हुए ब्राजील के जनान्दोलन ने उस देश में इस पीढ़ी के विशालतम और सबसे महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को अंजाम दिया है और देश की राजनीतिक व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। इसके विस्फोटक फैलाव, आकार और पहुँच ने सरकार सहित पूरे राजनीतिक हलके को आश्चर्यचकित कर दिया। यह आन्दोलन किसी तानाशाह या निरंकुश सरकार के खिलाफ नहीं हुआ बल्कि ऐसे सरकार के खिलाफ हुआ है जो संविधानसम्मत तरीके से चुनी गयी है और एक सुधारवादी पार्टी ‘वर्कर्स पार्टी’ के नेतृत्व में 2003 से कायम है।
   इसी तरह जून के महीने में ही हुआ तुर्की के गेज़ी पार्क का आन्दोलन भी एक चुनी हुई सरकार के के खिलाफ था और अपने तौर-तरीकों और रूप के चुनाव में 2011 के पूर्ववर्ती आन्दोलनों से सादृश्य रखता था। लेकिन इन सभी आन्दोलनों की, यहाँ हमारा अभिप्राय 2011 से शुरू हुए स्वतःस्फूर्त आन्दोलनों की प्रक्रिया से है, एक और समानता उनके अन्तर्निहित कारणों की है। तुर्की, यूनान, ब्राजील, मिस्र और यूरोप के अन्य देशों में जिन आर्थिक कारणों ने व्यापक असंतोष को जन्म दिया और आन्दोलनों की जमीन तैयार की है उनका सीधा सम्बन्ध नव-उदारवादी नीतियों से है। एक तरह के ही जन असंतोष और स्वतःस्फूर्त आंदोलनों के रूप में उनके विस्फोट की विश्वव्यापी फैलाव का कारण समरूप आर्थिक नीतियों की विश्वव्यापी परिघटना में निहित है।
  निश्चित तौर पर जनता के ये विद्रोह सफलता और असफलताओं के थपेड़ों से शिक्षा ग्रहण करेंगे और कालान्तर में और परिपक्व होने की दिशा में बढ़ेंगे। हमें ऐसी ही उम्मीद करनी चाहिए। लेकिन हमें इस कड़वी हकीकत से भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए कि इन आन्दोलनों को अपने नेतृत्व के रूपों का विकास करना होगा। इसके लिए इन आन्दोलन के मौजूदा तदर्थ (या इण्टरनेट की भाषा में आभासी’) नेतृत्व को खुद को ‘‘सड़क की लड़ाई से सब कुछ तय होने’’ के मुगालते से बाहर निकालना होगा, आन्दोलन के दूरगामी लक्ष्यों के बारे में स्पष्टता हासिल करनी होगी और दूर दृष्टिसम्पन्न वास्तविक नेतृत्व के रूप में खुद को संगठित करना होगा। इसके लिए उन्हें विगत शताब्दी के क्रान्तियों के तौर तरीकों और नेतृत्व के रूपों से सकारात्मक-नकारात्मक शिक्षा ग्रहण करनी होगी।    
  सामाजिक माध्यम अच्छा है। उसकी आभासी दुनिया रमणीक है। यह भी सत्य है कि प्रचार और जन-गोलबन्दी में इसके इस्तेमाल में सावधानी की जरूरत तो है पर परहेज की गुञ्जाइश नहीं। लेकिन यह वास्तविक गोलबन्दी का और उसके वास्तविक नेतृत्व का विकल्प नहीं हो सकता है। जैसे राज्य और उसके अंग-उपांग—सेना, पुलिस, अदालत वगैरह आभासी नहीं है, उसी तरह उससे टकराने वाली संरचनाओं को भी वास्तविक होना होगा, और आने वाले समय के प्रतिनिधि के रूप में कहें तो, पतनोन्मुखी मौजूदा संरचनाओं से अधिक वास्तविक होना होगा।
 जनता की पहलकदमी का प्रस्फोट निश्चित तौर पर और हर स्थिति में स्वागतयोग्य है और नयी शताब्दी ने एक दशक बीतते न बीतते उसका शंखनाद कर दिया है। लेकिन जनता की पहलकदमी को यदि जनता के एक बेहतर भविष्य की विचारधारा और उस अनुरूप नेतृत्व की संरचनाओं के साथ नहीं मिलाया जाय तो वही परिणाम सामने आयेगा जो मिस्र और पश्चिम एशिया के अन्य देशों में सामने आ रहा है। एक ऐसी दुनिया जो सभी किस्म के प्रतिक्रियावादियों के आपसी मेलमिलाप व सामंजस्य और उनपर एक महाशक्ति के सर्वस्वीकृत प्रभुत्व के आधार पर चल रही है, यदि जनता की पहलकदमी को सही विचारधारा और सांगठनिक रूपों से मिलान नहीं किया जाय, तो अन्तिम योगफल में उनका फायदा उसी महाशक्ति को मिलेगा।
 (note: yah lekh 'red tulip' se sabhar prakashit hai. Devbrat sen ka nam galti se prakashi ho gaya hai.)

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