Saturday, August 6, 2016

तबाही-बर्बादी के 25 साल

1990 में देश के तत्कालीन प्रधनमंत्राी चंद्रशेखर ने देश का सोना गिरवी रख था। तब उन्होंने पफरमाया था कि ‘देश के विकास के लिए जनता को पेट पर पट्ट्टी बांध्नी होगी।’ यह वह संकेत था, जिस सिलसिले की शुरुआत 1991 में नर्सिंहाराव-मनमोहन सिंह की सरकार ने की, जो आज एक भयावह रूप ले चुका है। आइए इस विकास यात्रा को देखें। जमीन 1980 से तैयैयार हुई निजीकरण, छंटनी, बेरोजगारी, महंगाई व लम्बे संघर्षों के दौरान मिले श्रम कानूनी अधिकारों को किश्तों में छीनने का सिलसिला तो 1980 के दशक से ही शुरू हो गया था, जबसे देश में विदेशी पूँजी की घुसपैठ बढ़नी शुरू हुई है। सार्वजनिक कम्पनियों को खत्म करने के लिए 1981-82 में वित्तीय एवं औद्योगिक पुनर्गठन बोर्ड ;बीएपफआईआरद्ध का गठन और सार्वजनिक क्षेत्रा के 58 उद्योगों ;लगभग साढ़े तीन सौ कारखानोंद्ध को फ्बीमारय् घोषित करने का काम शुरू हुआ। इसी के साथ उद्योगों में 49 फीसदी तक विदेशी पूँजी लगाने का सिलसिला शुरू हुआ। मारुति सुजुकी, हीरोहोण्डा, कावासाकी बजाज, इण्ड सुजुकी, श्री राम होण्डा जनरेटर, बिरला यामहा आदि देशी-विदेशी उद्यम संयुक्त भागेदारी के साथ लगने शुरू हुए। और यहाँ से शुरू हुआ सार्वजनिक कम्पनियों को बेचने, छंटनी-तालाबन्दी, श्रम अध्किारों में कटौती का सिलसिला। हलांकि तब मज़दूर आन्दोलन का दबाव होने के कारण यह गति धीमी थी। 25 साल पहले, 1991 में नर्सिंहा राव व मनमोहन सिंह की जोड़ी ने देश की मेहनतकश जनता के ऊपर एक नया हमला बोला था। उदारीकरण, वैश्वीकरण, निजीकरण का जो सिलसिला शुरू किया उससे ऊपर के 10 पफीसदी अमीरजादों के लिए खुशहाली बढ़ती गयी। अरबपति खरबपति होते गये और मेहनतकश जनताकी बदहाली और बढ़ती गयी। 1991 में नर्सिंहा राव-मनमहोन सिंह की सरकार ने देश को वैश्विक बाजार की शक्तियों के हवाले करते हुए जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक उपक्रम को बेचने के साथ मज़दूर अध्किारों को छीनने का काम तेज किया। गैट समझौते के बाद 1995 में विश्व व्यापार संगठन ;डब्लूटीओ का हिस्सा बनकर देश की आम जनता की गुलामी का एक नया दौर शुरू हुआ। 25 साल पूर्व नयी नीतियों पर भाजपा का विरोध् सबसे तेज था। स्वदेशी और मंदिर-मस्जिद की राजनीति ने भाजपा को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। गांव गांव में यह संदेश दिया जाने लगा कि राव सरकार देश को दूसरी गुलामी की ओर ले जा रहे हैं। परिणाम ये हुआ कि 1995 के चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और गुजराल व देवेगौड़ा की वामपंथियों से युक्त संयुक्त मोर्चे की सरकारें बनी। ‌बाजपेयी के नेतृत्व में कई दलों को मिलाकर एनडीए की सरकार बनी, लेकिन विरोध् की राजनीति पर चुनाव जीती भाजपा सरकार ने आते ही पिछली सरकार की नीतियों को ही आगे बढ़ाया। करीब 7 साल तक भाजपा नीत एनडीए की सरकार रही और बीमा क्षेत्रा में निजीकरण के साथ उदारीकरण ने गति पकड़ी। बाजपेयी की भाजपा नीत सरकार के दौर में सबसे खतरनाक मज़दूर विरोध्‍ाी द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट आई। ‘हायर एण्ड फायर’ उसी की देन है। जहाँ कोई श्रम कानून लागू न हो, ऐसे ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रा’ ;सेज परियोजनाओं ने गति पकड़ी। 2005 में मनमोहनी सरकार ने मालिकों के हित में श्रम कानूनों को बदलने की कोशिश की लेकिन व्यापक विरोध में तब वह पारित नहीं हो सका था। लेकिन बैक डोर से मालिकों को खुली छूट दी जाती रही। निजीकरण, छंटनी, बन्दी का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। खाद्य पदार्थों को भी वायदा करोबार के नाम पर सट्टा बाजार के हवाले करना शुरू हुआ। मोदेदी और ‘सुधार’ का दूसरा दौर 2014 के चुनाव में मोदी की रणनीति के सामने कांग्रेस धराशायी हो गई। मोदी के सत्तासीन होने के बाद उदारीकरण के दूसरे दौर की शुरुआत हो गयी। मनमोहन सिंह की नीति उनके लिए आज मील का पत्थर है। ‘मेक इन इण्डिया’, डिजिटल इण्डिया’, ‘स्किल इण्डिया’, ‘स्टार्टअप इण्डिया’ जैसे नारों के बीच देशी-विदेशी लूट का सिलसिला गति पकड़ रहा है। कुल मिलाकर मालिक पक्षीय श्रमसुधारों की आंधी पूँजीपतियों की आक्रामकता की पटकथा लिख रही है। यूनियन बनाने में बाधा खड़ा करने, गैरकानूनी ठेकेदारी में सारे कामों को झोंकने, मज़दूरों की मनमानी छंटनी, सुविधाओं में कटौती और बगैर सुरक्षा खतारनाक परिस्थितियों में खटाने का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। निजीकरण ने तेज रफ्रतार पकड़ी। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की घुसपैठ और तेज हुई। पेट्रोल, डीजल खुले बाजार के हवाले हो गया। खुदरा बाजार में विदेशी घुसपैठ के लिए एपफडीआई पारित हो गया। दनादन पफैसलों की कड़ी में सार्वजनिक क्षेत्रा की कम्पनियों में विनिवेश ;निजी हाथों में बेंचनेद्ध की मंजूरी शामिल है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर विदेशी पूँजी की घुसपैठ और लूट तेज होती गयी। ठेकाकरण, अनौपचारीकरण, सामाजिक-आर्थिक-रोजगार में कटौती का दौर पिछले ढ़ाई दशक से लगातार जारी है और तेज होता जा रहा है। मज़दूरों पर पूँजीपतियों तथा केन्द्र व राज्य सरकारों और उसके सभी अंगों का दमन लगातार बढ़ता जा रहा है। विरोध के हर स्वर को कुचलने के लिए श्‍ाासन-प्रशासन -श्रम विभाग-पुलिस-न्यायपालिका एक टांग पर मालिकों के हित में खड़ी हैं। 25 साल पहले तत्कालीन वित्तमंत्राी मनमोहन सिंह ने कहा था कि सुधरों का यह सिलसिला एक ऐसी धारा है, जिसके प्रवाह को मोड़ा नहीं जा सकता। तबसे अब तक लगभग सभी पार्टियाँ मनमोहन सिंह की इस बात को ही सही साबित करने में जुटी रही हैं। नरेन्द्र मोदी इस सिलसिले के सबसे नये अवतार हैं। मुकुल, संपादक मेहनतकश्‍ा

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