Friday, May 6, 2011

बोतल बंद पानी का वैश्विक बाजार



देवेन्द्र प्रताप
अमेरिका और यूरोप में 19 वीं सदी में ही बोतलबंद पानी का बाजार पैदा हो गया था। इसकी एक वजह वहां दुनिया में सबसे पहले औद्योगिकीकरण का होना भी था। बोतलबंद पानी की पहली कंपनी 1845 में पोलैण्ड के मैनी शहर में लगी। इस कंपनी का नाम था ‘पोलैण्ड स्प्रिंग बाटल्ड वाटर कंपनी’ था। 1845 से आज दुनिया में दसियों हजार कंपनियां इस धंधे में लगी हुई हैं। बोतलबंद पानी का यह कारोबार आज 100 अरब डालर पर पहुंच गया है।
भारत में बोतलबंद पानी की शुरुआत 1965 में इटलीवासी सिग्नोर फेलिस की कंपनी बिसलरी ने मुंबई महानगर से की। शुरुआत में मिनिरल वाटर की बोतल सीसे की बनी होती थी। इस समय भारत में इस कंपनी के 8 प्लांट और 11 फ्रेंचाइजी कंपनियां हैं। बिसलरी का भारत के कुल बोतलबंद पानी के व्यापार के 60 प्रतिशत पर कब्जा है। पारले ग्रुप का बेली ब्रांड इस समय देश में पांच लाख खुदरा बिक्री केंदों पर उपलब्ध है। इस समय अकेले इस ब्रांड के लिए देश में 40 बॉटलिंग प्लांट काम कर रहे हैं।

     पानी के ऊपर शोध करने वाली अमेरिकी संस्था ‘नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल’ के अनुसार ‘चलती कार में बोतलबंद पानी नहीं पीना चाहिए, क्योंकि कार में बोतल खोलने पर रासायनिक प्रतिक्रियाएं काफी तेजी से होती हैं और पानी अधिक खतरनाक हो जाता है। बोतल बनाने में एंटीमनी नाम के रसायन का भी इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बोतलबंद पानी जितना पुराना होता जाता है, उसमें एंटीमनी की मात्रा उतनी ही बढ़Þती जाती है।’ अगर यह रसायन किसी व्यक्ति के शरीर में जाता है, तो उसे जी मिचलाने, उल्टी और डायरिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इससे साफ है कि बोतलबंद पानी शुद्धता और स्वच्छता का दावा चाहे जितना करें लेकिन वह सेहत की दृष्टि से सही नहीं है।
      कैलीफोर्निया के ‘पैसिफिक इंस्टीटयूट’ ने भी इसी तरह के एक शोध में दावा किया है कि अमेरिका में ‘बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली कंपनियां इस संबंध में निर्धारित मानकों की अनदेखी कर रही हैं, लेकिन इसका पता तभी चलता है, जब कोई हादसा हो जाता है। 1990 से लेकर 2007 के बीच कम से कम सैकड़ों बार ऐसा देखने में आया कि बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली कंपनियों ने ही अपने उत्पाद को बाजार से हटा लिया। और यह सब हुआ भी बहुत गुपचुप तरीके से। उपभोक्ताओं को इसकी खबर तक नहीं लगी। कंपनियों के इस कदम के पीछे उनका प्रदूषित बोतलबंद पानी था।’ बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली कंपनियों के पानी से लाभ कमाने की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ रही है। आज समूची दुनिया में जहां भी इन कंपनियों ने अपने बाटलिंग प्लांट लगाए हैं, वहां भूजल स्तर बहुत तेजी से नीचे चला गया और इसका खामियाजा उस इलाके में रहने वाले लोगों को उठाना पड़ा। ऊपर से एक बोतल पानी तैयार करने में करीब दो लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। इसके बावजूद बाजार में आने वाला बोतलबंद पानी स्वास्थ्य की दृष्टि से पीने योग्य ही है, इस बात की कोई गारंटी नहीं है।
बोतल बंद पानी का बाजार
वर्तमान समय में हमारे देश में बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली करीब 100 कंपनियां हैं, और 1200 बाटलिंग प्लांट हैं। इसमें पानी का पाउच बेचने वाली और दूसरी छोटी कंपनियों का आंकड़ा शामिल नहीं है। अमेरिका और यूरोप में 1950 के आसपास पाया गया कि प्राकृतिक पानी में फ्लोराइड की कमी के चलते दांत खराब हो जाते हैं। इसलिए बोतल बंद पानी के व्यापार में लगी फ्लोराइड युक्त पानी बेचना शुरू कर दिया। इसी के साथ कुछ ऐसे तत्वों को भी पानी में मिलाया गया, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होते हैं। कोका कोला और पेप्सिको कंपनी ने इसी बात को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य की दृष्टि से फायदेमंद कोल्ड ड्रिंग्स बाजार में उतारे। 1999 में अमेरिका में एक बोतल पानी की कीमत 0.25 से दो डालर के बीच थी, जबकि लोगों के घरों पर पहुंचने वाले पानी की कीमत एक पैसे से भी कम बैठती थी। एनआरडीसी के अध्ययन के अनुसार अमेरिका में नलों के जरिए घर पहुंचने वाले पानी से बोतलबंद पानी 240 से 10 हजार गुना ज्यादा मंहगा पड़ता था। इसमें से एक बोतल के लिए किए जाने वाले भुगतान का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा बोतल और पैकिंग आदि पर होने वाले खर्च के लिए भुगतान करना होता था। हालांकि बाद में पानी का बाजार बढ़ा लेकिन पानी की गुणवत्ता पर भरोसा करना आज जुआ खेलने जैसा हो गया है। इस समय दुनिया में बोतलबंद पानी का व्यापार खरबों में पहुंच गया है। शुद्धता और स्वच्छता के नाम पर बोतलों में भरकर बेचा जा रहा पानी भी सेहत के लिए खतरनाक है।
वेल्स
दक्षिणी वेल्स में बुंडानून दुनिया का एकमात्र ऐसा शहर है, जहां नागरिकों ने खुद पहलकदमी लेकर अपने यहां बिकने वाले बोतल बंद पानी प्रति प्रतिबंध लगवाया। इस आंदोलन की अगुआई वहां के एक व्यापारी किंग्सटन ने की। आंदोलन के बाद सरकार पर दबाव बना और उसने शहर की सीमा के भीतर बोतलबंद पानी की बिक्री पर रोक लगा दी। बुंडानून के इस कदम के बाद दुनिया के कई और मुल्कों में भी बोतल बंद पानी पर बिक्री के खिलाफ आवाज उठी।
यूरोपीय संघ
यूरोपीय संघ में मिनिरल वाटर और स्प्रिंग वाटर को ही बोतलबंद पानी के रुप में मान्यता मिली हुई है। वहां भूगर्भ जल को ही मिनिरल वाटर या खनिज जल माना जाता है। बोतलबंद कंपनियों के लिए यह जरुरी है कि पानी के परिशोधन की प्रक्रिया में, पानी में मौजूद स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक तत्व नष्ट न होने पायें।
की बिक्री को ही मान्यता मिली है। वहां पर संक्रमित पानी की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है।
अमेरिका
अमेरिका बोतलबंद का सबसे बड़ा बाजार है। मेक्सिको, चीन और ब्राजील का स्थान इसके बाद है। 2008 में अमेरिका में बोतलबंद पानी की बिक्री 8.6 बिलियन थी। यह यहां बिकने वाले कुल बोतलबंद लिक्विड का 28.9 प्रतिशत है। कार्बोनेटेड साफ्ट ड्रिंक, फलों के जूस और खिलाड़ियों के पेय पदार्थों का स्थान इसके बाद आता है। एक सर्वे के अनुसार एक अमेरिकी आदमी साल भर में औसतन 21 गैलन पानी पी जाता है। अमेरिका में पानी के निजीकरण के खिलाफ आवाज समय-समय पर आवाज भी उठती रही। यूनाइटेड चर्च आॅफ क्रिश्चियन्स, यूनाइटेड चर्च आॅफ कनाडा जैसे धार्मिक संगठनों तक ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। हालांकि पानी का निजीकरण आज भी न सिर्फ बदस्तूर जारी है, वरन 50 के दशक से सैकड़ों गुना और तेजी के साथ।
पाकिस्तान
1990 के बाद कमोवेश दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में दूषित पानी की समस्या ने गंभीर रुप लेना शुरु कर दिया। इसी के साथ ऐसी कंपनियां भी सामने आयीं, जिन्होंने बोतलबंद पानी को साफ पानी का पर्याय बनाना शुरु कर दिया। ऐसा करना उनके व्यापार के लिए जरुरी था। पाकिस्तान में भी इन्होंने अपने पांव पसारे। वहां सबसे पहले नेस्ले ने बोतलबंद पानी बेचना शुरु किया। धीरे-धीरे पेप्सी, कोका कोला, फ्रांसीसी कंपनी एवियन और कई स्थानीय कंपनियां भी इस क्षेत्र में उतरीं।
भारत
इस समय भारत में बोतलबंद पानी का कुल व्यापार 14 अरब 85 करोड़ रुपये का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबंद पेय का 15 प्रतिशत है। कोका कोला के एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया की ज्यादातर बड़ी कंपनियां भारत के बाजार में अपने पेय पदार्थों को बेच रही हैं। कुछ साल पहले बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोतल बंद पेय पदार्थ सिर्फ यहां के धनी तबके की पसंद हुआ करती थे, लेकिन आज औसत आदमी भी इन कंपनियों का बोतलबंद पानी और दूसरे पेय पदार्थों खरीद रहा है। हांलाकि यहां इनके माल का स्टैंडर्ड यूरोप, अमेरिका और एशिया के दूसरे मुल्कों की अपेक्षा पिछड़ा हुआ है। इस समय हमारे देश में कुल 200 बोतलबंद कंपनियां अपना माल बेच रही हैं। भारत में बोतलबंद पानी के व्यापार में लगी 80 प्रतिशत कंपनियां देशी हैं। दुनिया में बोतलबंद पानी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत 10 वें स्थान पर है। भारत में 1999 में बोतलबंद पानी की खपत एक अरब 50 करोड़ लीटर थी, 2004 में यह आंकड़ा 500 करोड़ लीटर पर पहुंच गया। इसके बावजदू यहां महानगरों में सैकड़ों ऐसी कंपनियां हैं, जिनके लिए पानी के लिए तय मानकों के कोई मायने नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से 122 देशों में पानी के स्टैंडर्ड के ऊपर किए गये एक अध्ययन में भारत को 120 वें स्थान पर रखा गया है। यहां एक दिन में प्रति व्यक्ति बोतलबंद का औसत उपयोग 5 लीटर है, जबकि यूरोप में यही 111 लीटर, अमेरिका में 45 लीटर और वैश्विक औसत 24 लीटर बैठता है। समझा जा सकता है कि भारत की गरीबी के चलते यहां प्रति व्यक्ति बोतल बंद पानी की खपत बेहद कम है। यूरोप और अमेरिका में भोजन बनाने में भी एक बड़ी आबादी इस पानी का ही उपयोग करती है। यह भी एक वजह है कि वहां इसकी खपत ज्यादा है। 1999 से 2004 के बीच भारत में बोतलबंद पानी उद्योग की विकास दर 25 प्रतिशत थी। बोतल बंद उद्योग के तरक्की की कीमत यहां के आम आवाम को चुकानी पड़ रही है। उसे साफ पानी तो मिलता नहीं बोतलबंद पानी की बात ही क्या है। कई अध्ययनों से यह साबित हो चुकी है कि जिन क्षेत्रों में शीतल पेय बनाने के संयंत्र लगे हैं, वहां धरती के गर्भ में मौजूद पानी के स्तर में बहुत तेजी से गिरावट आयी है।

ऐज रिपोर्ट सेज
‘ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक’ (जीयो-3) की रिपोर्ट के अनुसार 2032 तक यह इलाका दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों में है। अगर यहां पानी का संकट गंभीर होता है, तो यहां रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा डायरिया, हैजा और टायफाइड जैसी बीमारियों की चपेट में आ सकता है। इस समय जबकि पानी का संकट इतना गंभीर नहीं है, तब हालत यह है कि दुनिया में प्रति आठ सेकंड पर एक बच्चा जल जनित बीमारियों के कारण मर रहा है। अनुमान है कि 2032 तक संसार की आधी से अधिक आबादी भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएगी।
वर्ल्ड हेल्थ आॅर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया एक बड़ी आबादी के लिए पीने के लिए साफ पानी और भोजन का ही बड़ी मुश्किल से इंतजाम कर पाती है। ऐसे लोगों के लिए भविष्य में जीने का संकट उत्पन्न हो जाएगा। संसार के उद्योग बचे-खुचे साफ पानी को भी दूषित करने का काम कर रहे हैं। एशिया में उद्योगों से निकलने वाला 35 प्रतिशत पानी ही वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से परिशोधित हो पाता है। जबकि दक्षिण अमेरिका में यह 14 प्रतिशत और अफ्रीका में तो नाममात्र का ही है। विकासशील देशों में पानी सप्लाई के दौरान भी इसका बड़ा हिस्सा लीक होकर बह जाता है। ऐसी स्थिति में भी अगर भारत जैसे विकासशील देशों ने अपने जल प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया तो भविष्य अंधकारमय हो जाएगा और इसका सबसे ज्यादा शिकार बनेंगे गरीब और मध्यमवर्गीय लोग जिनकी संख्या इस देश में 70 करोड़ के आसपास है।
अमेरिका की संस्था ‘नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल’ द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, ‘बोतलबंद पानी और साधारण पानी में कोई खास फर्क नहीं है। मिनरल वाटर के नाम पर बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी के बोतलों को बनाने के दौरान एक खास रसायन पैथलेट्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसका इस्तेमाल बोतलों को मुलायम बनाने के लिए किया जाता है। इस रसायन का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधनों, इत्र, खिलौनों आदि के निर्माण में किया जाता है। इसकी वजह से व्यक्ति की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। बोतलबंद पानी के जरिए यह रसायन लोगों के शरीर के अंदर पहुंच रहा है। यह रसायन उस वक्त बोतल के पानी में घुलने लगता है जब बोतल सामान्य से थोड़ा अधिक तापमान पर रखा जाता है। ऐसी स्थिति में बोतल में से खतरनाक रसायन पानी में मिलते हैं और उसे खतरनाक बनाने का काम करते हैं।’

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