Friday, December 23, 2016

एक तनख्वाह से कितनी बार टेक्स दूं और क्यों

एक तनख्वाह से कितनी बार टेक्स दूं और क्यों...जबाब है??? मैनें तीस दिन काम किया, तनख्वाह ली - टैक्स दिया मोबाइल खरीदा - टैक्स दिया रिचार्ज किया - टैक्स दिया डेटा लिया - टैक्स दिया बिजली ली - टैक्स दिया घर लिया - टैक्स दिया TV फ्रीज़ आदि लिये - टैक्स दिया कार ली - टैक्स दिया पेट्रोल लिया - टैक्स दिया सर्विस करवाई - टैक्स दिया रोड पर चला - टैक्स दिया टोल पर फिर - टैक्स दिया लाइसेंस बनाया - टैक्स दिया गलती की तो - टैक्स दिया रेस्तरां मे खाया - टैक्स दिया पार्किंग का - टैक्स दिया पानी लिया - टैक्स दिया राशन खरीदा - टैक्स दिया कपड़े खरीदे - टैक्स दिया जूते खरीदे - टैक्स दिया कितबें ली - टैक्स दिया टॉयलेट गया - टैक्स दिया दवाई ली तो - टैक्स दिया गैस ली - टैक्स दिया सैकड़ों और चीजें ली ओर - टैक्स दिया, कहीं फ़ीस दी, कहीं बिल, कहीं ब्याज दिया, कहीं जुर्माने के नाम पर तो कहीं रिश्वत के नाम पर पैसा देने पड़े, ये सब ड्रामे के बाद गलती से सेविंग मे बचा तो फिर टैक्स दिया---- सारी उम्र काम करने के बाद कोई सोशल सेक्युरिटी नहीं, कोई पेंशन नही (5 साल के MP, MLA रहे तोऔर बात है), कोई मेडिकल सुविधा नहीं, बच्चों के लिये अच्छे स्कूल नहीं, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट नहीं, सड़कें खराब, स्ट्रीट लाईट खराब, हवा खराब, पानी खराब, फल सब्जी जहरीली, हॉस्पिटल महंगे, हर साल महंगाई की मार, आकस्मिक खर्चे व् आपदाएं , उसके बाद हर जगह लाइनें।।।। सारा पैसा गया कहाँ???? करप्शन में , इलेक्शन में , अमीरों की सब्सिड़ी में , माल्या जैसो के भागने में अमीरों के फर्जी दिवालिया होने में , स्विस बैंकों में , नेताओं के बंगले और कारों मे, और हमें झण्डू बाम बनाने मे। अब किस को बोलूं कौन चोर है??? आखिर कब तक हमारे देशवासी यूंही घिसटती जिन्दगी जीते रहेंगे????? मै जितना देश और इस पर चिपके परजीवियों के बारे मे सोचता हूँ, व्यथित हो जाता हूँ। समय आ गया है कि किसी की भक्ति से बढ़ कर देश व देशवासियों के बारे मे सोचें । (कमलेश उपाध्याय के फेसबुक पेज से)

Thursday, December 22, 2016

नोटबंदी के पीछे का सच, पेटीएम के शिकंजे में भारत

एक बात तो आप सभी मानेंगे कि नोटबंदी से सबसे अधिक फायदा पेटीएम को ही पुहंचा है.पेटीएम से रोजाना 70 लाख सौदे होने लगे हैं जिनका मूल्य करीब 120 करोड़ रपये तक पहुंच गया है,पेटीएम हर ट्रांसिक्शन मे मोटा कमीशन वसूल रही हैं.सौदों में आई भारी तेजी से कंपनी को अपने पांच अरब डॉलर मूल्य की सकल उत्पाद बिक्री (जीएमवी) लक्ष्य को तय समय से चार महीने पहले ही प्राप्त कर लिया है. पेटीएम कंपनी है क्या? एक वक्त था जब पेटीएम एक भारतीय स्टार्ट अप कंपनी हुआ करती थी पर आज यह कंपनी चीन के उद्योगपति जैक मा के हाथों का खिलौना बन चुकी है .........पर यह तो सभी जानते है कि अलीबाबा की पेटीएम मे हिस्सेदारी है पर यह आधा सच है.पूरी कहानी समझने के लिए थोड़ा फ्लैश बैक मे जाना होगा जब जैक मा ने 1998 में अलीबाबा नामक ई कामर्स कंपनी की स्थापना की तो उनको बहुत सी बाधाओं का सामना करना पड़ा। पहले तीन सालों तक इस ब्रैंड से उनको कोई लाभ नहीं हुआ। कंपनी की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इसके पास भुगतान के रास्ते नहीं थे और बैंक इसके साथ काम करने को तैयार नहीं थे. मा ने अलीपे के नाम से खुद का पेमेंट प्रोग्राम शुरू करने का निर्णय किया। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय खरीदारों और विक्रेताओं के बीच अलग-अलग करंसीज के पेमेंट्स को ट्रांसफर किया जाता है. पूरा सच यह है कि अलीबाबा का अलीपे ही पेटीएम का सबसे बड़ा हिस्सेदार है दरअसल चीन या चीन के उद्योगपति भारत के व्यवसाय की "सेवा उन्मुख व्यवसाय आपूर्ति श्रंखला"(सप्लाई चेन)को तोड़ना चाहते है, ताकि वह आसानी से अपना माल भारत के बड़े बाजार मे खपा सके.इसके लिए उन्हें अपने नियंत्रण वाली खुद की एक सुरक्षित रसद श्रृंखला (लॉजिस्टिक्स चेन) शुरू करना है और चीन के विक्रेता चीन के ही किसी पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल कर भारत मे माल बेचने मे अपने आपको सहज महसूस करेंगे . जो पेटीएम उन्हें उपलब्ध करा रहा है. पेटीएम का मूल उद्देश्य अलीबाबा और चीनी उद्योगपतियों के लिए रास्ता साफ करना है,अलीबाबा के ग्लोबल मैनेजिंग डायरेक्टर के गुरु गौरप्पन को पिछले महीने पेटीएम के बोर्ड में एडिशनल डायरेक्टर के तौर पर शामिल किया गया है और नोट बंदी के ठीक 4 दिन पहले अलीबाबा के सारे टॉप मैनेजर पेटीएम के नोएडा ऑफिस मे कमान सँभाल चुके थे. अलीबाबा को चीन का पहला प्राइवेट बैंक खोलने की अनुमति मिल गयी है और भारत मे अलीबाबा के पेटीएम को भी पेमेंट बैंक खोलने की अनुमति रिजर्व बैंक ने दे दी है........ यानी एक ही कंपनी अलीबाबा ने दोनों देशों मे खुद का बैंक और खुद का पेमेंट गेटवे खोल लिया है. नोट बंदी के बाद 1 महीने मे छोटे और मध्यम उद्योग धंधो की जो बर्बादी हो रही है उस पुरे वैक्यूम को चीनी सामानों ला लाकर भारतीय बाजार मे पाट दिया जायेगा......... और देश देखते देखते नयी गुलामी की तरफ बढ़ता चला जायेगा. जो व्यापार से जुड़े लोग है वह तुरंत समझ जाएंगे क़ि यह खेल क्या है. आप को अब भी शायद लग रहा है कि पेटीएम इतनी बड़ी कंपनी नहीं है चलिये ये भ्रम भी आपका दूर कर देते है. पेटीएम ने दुनिया की सबसे बड़ी कैब टैक्सी कंपनी उबर से हाथ मिला लिया है दिल्ली और मुंबई मेट्रो के टिकट पेटीएम के मार्फ़त ख़रीदे बेचे जा रहे है Irctc यानि रेलवे के टिकट पेटीएम से ख़रीदे बेचे जा रहे हैआईआरसीटीसी ने पेमेंट गेटवे के लिए पेटीएम के साथ साझेदारी की है और पेटीएम देश की सबसे बड़ी ट्रैवल बुकिंग प्लैटफॉर्म बनने के लिए पूरी तरह से तैयार है. पेटीएम ने बीसीसीआई से भारत में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय एवं घरेलू मैचों के 2015 से 2019 तक के लिए क़रीब 84 अंतरराष्ट्रीय मैचों का क़रार किया गया है।...अब रणजी ट्राफी भी पेटीएम के नाम से खेली जायेगी. इतना ही नहीं मीडिया को भी अपने शिकंजे मे लेने की पूरी तैयारी की गयी है एनडीटीवी के गैजेट्स 360° के लिए पेटीएम की मालिक कंपनी, वन97 कम्युनिकेशंस ने पूरा निवेश किया है. सुबह शाम न्यूज़ चैनलों को मन भर के विज्ञापन दिए जा रहे है और तो और सरकारी न्यूज चैनल डी डी न्यूज़ भी पेटीएम का प्रचार कर रहा है. खुदरा क्षेत्र के फ्यूचर समूह ने पेटीएम के साथ समझौता किया है। इसके तहत फ्यूचर समूह पेटीएम के मंच का प्रयोग बिग बाजार के सामान को ऑनलाइन बेचने के लिए करेगा। इस समझौते में पेटीएम के मार्केटप्लेस पर बिग बाजार एक प्रमुख स्टोर बन जाएगा. सरकार खुद बड़े करेंसी नोट के डीमॉनेटाइजेशन के बाद जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिए फंड ट्रांसफर के लिए पेटीएम से हाथ मिलाने को तैयार बैठी है. सरकार किस हद तक पेटीएम का समर्थन कर रही है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है पेटीएम से की गई मात्र सवा छः लाख की धोखाधड़ी की जांच सीधी सीबीआई से करायी जा रही है. ऐसा भी नहीं है कि इस और किसी का ध्यान नहीं है आरएसएस की आर्थिक शाखा भी पेटीएम के चीनी संबंध पर बारीक नजर रखे हुए है। आरएसएस से जुड़ा स्वेदशी जागरण मंच (एसजेएम) चीनी उत्पाद और निवेश के खिलाफ लंबे समय से आंदोलन चला रहा है लेकिन इस बार सरकार खुद आगे बढ़कर देश को कैशलेस बनाकर चीनी उद्योगपतियों के खतरनाक मंसूबो को कामयाब बना रही है ............. बाड़ ही खेत हड़प रही है भारत की कैशलेस व्यवस्था को जब चीनी कंपनियां नियंत्रित करेंगी, तब आप खुद सोचिये अंजाम क्या होगा. याद रखिए पार्टी के प्रति निष्ठा या किसी नेता की भक्ति से कही अधिक बड़ा देश का हित होता है. (Girish Malviya ji ke facebook page se)

Wednesday, December 14, 2016

कैसे सोवियत संघ ने वेश्यावृत्त और अन्य सामाजिक बुराइयों पर काबू पाया

क्या वेश्यावृत्ति, देह-व्यापार, गुप्तरोग, गर्भपात, व्यभिचार, तलाक, शराबखोरी जैसी सामाजिक बुराइयों का कोई मुकम्मिल समाधान मुमकिन है? आम तौर पर लोग इन सामाजिक बुराइयों को पाप कहते हैं और इनके लिए धार्मिक एवं आध्यात्मिक समाधानों पर ज़ोर देते हैं। कुछ लोग तो यहाँ तक दावा करते हैं कि ये समस्याएँ सनातन काल से चली आ रही हैं और आगे भी जारी रहेंगी। लेकिन बहुत कम लोग इस सच्चाई से वाकिफ़ हैं कि 1917 की महान रूसी क्रान्ति के बाद स्थापित मज़दूरों के राज्य सोवियत संघ ने न सिर्फ़ शोषणकारी उत्पादन सम्बन्धों में आमूलचूल परिवर्तन लाया था बल्कि तमाम सामाजिक-नैतिक बुराइयों की जड़ पर क्रान्तिकारी प्रहार करके इनको वैज्ञानिक तरीके से हल करते हुए मानव सभ्यता के इतिहास में एक शानदार नज़ीर पेश की थी। दुनिया के पहले मज़दूर राज्य की इस ऐतिहासिक उपलब्धि को आज साम्राज्यवादी कुत्सा-प्रचार की धूल और राख की मोटी परत के तले दबा दिया गया है। ऐसे में इन शानदार उपलब्धियों का तथ्यपरक ब्यौरा आमजन तक पहुँचाना आज क्रान्तिकारी आन्दोलन का एक अहम कार्यभार है। इस सन्दर्भ में कनाडा के वैज्ञानिक, लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता डाइसन कार्टर की किताब पाप और विज्ञान, जो ‘सिन एण्ड साइंस’ नाम से मूलतः अंग्रेज़ी में लिखी गयी थी, आज बेहद प्रासंगिक है। 1940 के दशक में लिखी गयी किताब ‘पाप और विज्ञान’ में डाइसन कार्टर ने सामाजिक नैतिकता से जुड़े प्रश्नों के हल की दिशा में पूँजीवादी अमेरिका और समाजवादी सोवियत संघ द्वारा अपनाये गये तरीकों एवं उनके परिणामों का शानदार ढंग से तुलनात्मक तथा तथ्यपरक ब्योरा प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना में महान गणितज्ञ और मार्क्सवादी इतिहासकार प्रो.डी.डी. कोसाम्बी लिखते हैं: “अभी हाल में, मौजूदा जमाने की दो एकदम अलग-अलग सभ्यताओं ने- जो अपने-अपने ढंग की आदर्श सभ्यताएँ हैं- इन बुराइयों को उखाड़ फेंकने के लिए कुछ तरीके अपनाये हैं। डाइसन कार्टर ने उनकी सच्ची और निष्पक्ष रिपोर्ट पेश की है। कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि अमेरिका में विज्ञान का महत्वपपूर्ण विकास हुआ है। पर कोई इस बात से भी इन्कार नहीं कर सकता कि वहीं पुलिसशक्ति का उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण विकास हुआ है। अमेरिका के सभी धार्मिक दल ऐसे मसलों पर अपनी पूरी ताक़त जुटा देते हैं। फिर भी, वहाँ तलाकों की संख्या दुनिया भर में क़रीब-क़रीब सबसे ऊँची है। सुधार के राजनीतिक आन्दोलनों, पुलिस की विशेष कार्रवाइयों और गिरजाघरों में लगातार धर्मापदेश के बावजूद अमेरिका में गुप्त रोग, वेश्यावृत्ति और शराबखोरी अपनी-अपनी जगह पर ज्यों-की-त्यों बरकरार है। सोवियत रूस एक नयी समाज-व्यवस्था का पहला और सबसे बड़ा प्रतिनिधि है। वहाँ इस बात की पूरी गुंजाइश थी कि वर्तमान समाज की ये खौफ़नाक वसीयतें पूरे ज़ोर-शोर से भड़क उठें। क्रान्ति ने संगठित धर्म-व्यवस्था को ख़त्म कर दिया था। पहले के अधिकांश प्रतिबन्ध हटा दिये गये थे। वेश्या को अपराधी मानकर दण्ड नहीं दिया जाता था। तलाक़ बहुत आसान हो गया था। सरकार की ओर से सस्ती शराब का प्रबन्ध कर दिया गया था। इनके साथ-साथ क्रान्ति के बाद विदेशियों के आक्रमणों और उत्पादन की बढ़ती हुई दर से उत्पन्न कठिनाइयों के बारे में भी सोचिये। पूँजीवादी तर्क-पद्धति आपको इसी नतीजे पर पहुँचायेगी की अब वहाँ व्यभिचारों का खूब बोलबाला होगा। पर, हम देखते यह हैं कि सोवियत रूस में वेश्यावृत्ति एकदम ख़त्म हो गयी है। तलाक़ों की दर को घटाकर न्यूनतम स्तर पर ला दिया गया है। जो देश कभी किसानों और मजदूरों की नशेबाजी से बदनाम था, वहाँ अब शराबखोरी का क़रीब-क़रीब लोप हो चुका है।” ये परिणाम, जो बड़े विचित्र और असंगत प्रतीत होते हैं, सोवियत रूस में वैज्ञानिक अनुसन्धान के द्वारा इन समस्याओं की जड़ों का पता लगाकर ही प्राप्त किये गये थे। पूँजीवादी देशों में पुलिस वाला जिस सवाल को उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता, पादरी जिस सवाल को उठा नहीं सकता, वैज्ञानिक जिस सवाल को उठाता ही नहीं, वह यह है – आखि़र इन बुराइयों की जड़ क्या है? सोवियत रूस का उत्तर है कि कुछ वर्ग इन बुराइयों से बेशुमार मुनाफ़े कमाते हैं, इसलिए ये मौजूद हैं। इस तरह सामाजिक बुराइयों से मुनाफ़ा कमाना, सामाजिक बुराइयों से लाभ उठाना, जनता के बहुसंख्यक भाग के आम शोषण का ही नतीजा है। इससे जनता का बहुत बड़ा भाग इनकी तरफ झुकता है। इसीलिए, ये फैलती हैं। जनता के आम शोषण का अन्त होने से ही, सोवियत रूस में इनके मूल कारणों का भी अन्त हुआ है। जो इनसे मुनाफ़ा कमाते थे उनको कड़ा दण्ड दिया गया, उन लोगों को नहीं जो इनके शिकार हुए थे; अर्थात् चकले चलाने वालों को, वेश्याओं को नहीं; गैर-क़ानूनी शराब बनाने वालों को, शराब पीने वालों को नहीं। साथ ही, सोवियत रूस में काम पाने का अधिकार हर नागरिक का अधिकार बना दिया गया। हरेक के लिए अच्छा रहन-सहन मुमकिन बना दिया गया। नयी आज़ादी का असर आसानी से दिखायी देने लगा। क़ानून, पार्टी के प्रचार और जनता की वैज्ञानिक शिक्षा का सहारा लेना सरल बन गया। जनता को पूरी तरह शिक्षित बनाने का प्रबन्ध किया गया। सस्ती व अच्छी पठन सामग्री का प्रबन्ध किया गया। सभी के लिए सुन्दर संगीत, अच्छे से अच्छे सिनेमा, संस्कृति-पार्कों और खेलकूद के मैदानों द्वारा मनोरंजन और थकान मिटाने के भिन्न-भिन्न साधनों की व्यवस्था कर दी गयी। पहले की सभी बुराइयाँ छू-मन्तर हो गयीं क्योंकि अब उनके टिकने की कोई वजह नहीं रह गयी थी। मनुष्य का जीवन पहली बार रहने लायक सुखमय जीवन बना। जीवन से कतराने और भागने की अब कोई ज़रूरत नहीं रह गयी। पुस्तक के पहले अध्याय ‘विक्ट्री गर्ल और समाजीकृत महिलाएँ’ में कार्टर अमेरिका के एक अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त डॉक्टर थॉमस पैरन द्वारा 1936 में लिखे एक प्रसिद्ध लेख का हवाला देते हैं जिसमें उन्होंने अमेरिकी समाज में तेज़ी से फैल रहे गुप्त रोगों के प्रति आगाह किया था। इस लेख के बाद अमेरिका में गुप्त रोगों एवं व्यभिचार को ख़त्म करने की एक मुहिम छेड़ी गई थी जिसमें सरकार, फौजी अफसरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं धर्मगुरुओं ने अपने-अपने तरीके से इन समस्याओं का समाधान करने का दावा किया था। परन्तु् ये समस्याएँ कम होने की बजाय बढ़ती ही गईं। इसी अध्याय में कार्टर लॉर्ड तथा लेडी पैस्फील्ड (बियेट्रिस एवं सिडनी वैब) तथा क्वण्टिन रेनोल्ड्स और दर्जनों दूसरे चिकित्सा विशेषज्ञों और अन्य निष्पक्ष प्रेक्षकों का हवाला देते हुए बताते हैं कि सोवियत रूस – जहाँ क्रान्ति के पहले व्यभिचार और अनैतिकता का बोलबाला था – में सामाजिक अनैतिकता की सभी गम्भीर समस्याएँ क्रान्ति के बाद बीस वर्षों के भीतर ही आश्चर्यजनक सफलता के साथ हल कर ली गई थीं। इन बीस वर्षों में कितने ही ऐसे औद्योगिक नगर और विशाल बन्दरगाह बनाये गये जहाँ अनैतिकता को बड़ी तो क्या एक छोटी समस्या के रूप में भी पनपने का मौका नहीं मिला। लाल सेना दुनिया की पहली ऐसी बड़ी सेना थी जो वेश्यावृत्ति से मुक्त थी। एक दिलचस्प प्रसंग का ज़िक्र करते हुए कार्टर बताते हैं कि एक बार उन्हें सोवियत संघ के चन्द युवाओं से बातें करने का मौका मिला तो उन्हों ने पूछा कि वेश्यावृत्ति, व्यभिचार, गुप्त रोग, नौजवानों में दुराचारी प्रवृत्तियों और शराबखोरी आदि को सोवियत सरकार ने कैसे दूर किया था। इस पर उन युवाओं ने कहा कि इन समस्याओं को सोवियत रूस में बहुत पहले हल कर लिया गया था, कम से कम दस बरस पहले। तब हम लोग बच्चे थे। हमें इतना तो याद आता है कि हमारे चाचा-ताऊ इस सम्बन्ध में बनाये गये नियमों पर बड़ी गरमागरम बातें किया करते थे। पर उनका विवरण हमें याद नहीं। हम लोगों के लिए तो यह एक गुज़रे जमाने की बात बन चुकी है। ‘बुराई के लिए पीले टिकट की व्यवस्था’ नामक अध्याय में क्रान्ति से पहले ज़ारशाही के शासन में रूस में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए कार्टर बताते हैं कि उस दौर में रूस में हर नागरिक को रजिस्ट्रेशन और शिनाख़्त सम्बन्धी एक प्रमाणपत्र रखना होता था जिसे आमतौर पर पासपोर्ट कहते थे जिससे ज़ारशाही पुलिस को नागरिकों पर निगरानी करने में आसानी होती थी। वेश्या का पेशा करने वाली औरतों को एक विशेष किस्म का पीले रंग का कार्ड अपने पास रखना होता था जिसकी वजह से इसे ‘पीले टिकट की व्यवस्था’ कहा जाता था। इस अपमानजनक व्यवस्था का सबसे भयानक पहलू यह था कि एक बार पीला टिकट ले लेने वाली महिला जीवन भर के लिए इस बुराई के भँवरजाल में फँस जाती थी। ज़ारशाही के अफ़सर किसी भी महिला का नागरिक टिकट लेकर उसे पीला टिकट दे देने की तैयारी में रहते थे। अधिकांश मुहल्लों में पीले टिकट वाली औरतों को किन्हीं ख़ास घरों में रहना पड़ता था। इन घरों को सरकारी तौर पर ‘व्यभिचार के अड्डे’ कहा जाता था। वेश्यावृत्ति के पेशे में लगी महिलाओं को अपने नाम के आगे ‘वेश्या’ लगाना होता था। इस प्रकार कोई औरत यदि कुछ दिनों के लिए ग़रीबी की वजह से मजबूर होकर अनैतिकता के गढ्ढे में लुढ़क पड़ती थी तो पुलिस और बदनाम ‘पीले टिकट की व्यवस्था’ यह सुनिश्चित करती थी कि वह उससे कभी भी बाहर न निकल पाये। आधिकारिक तौर पर इस अपमानजनक व्यवस्था का उद्देश्य यह बताया जाता था कि इससे अनैतिकता पर रोक लगेगी। परन्तु इस सरकारी ढकोसले की असलियत किसी से छिपी न थी। वास्तव में इसकी वजह से रूसी समाज में व्यभिचार बढ़ता ही जा रहा था। तोल्सतोय के उपन्यास ‘रिसरेक्शन’ (पुनरुत्थान) में भी एक ऐसी ही नारी का हृदय विदारक चित्रण किया है जो व्यभिचार के जाल में फँस जाती है। ‘बन्धनरहित प्रेम और वैज्ञानिक नैतिकता’ नामक अध्याय में डाइसन कार्टर क्रान्ति के बाद रूसी समाज में प्रेम के प्रश्न पर चली बहस का रोचक ब्यौरा देते हैं। ज़ारकालीन रूस में महिलाओं के उत्पीड़न का प्रतीक ‘पीले कार्ड की व्यवस्था’ को क्रान्ति के तुरन्त बाद ख़त्म कर दिया गया। सभी महिलाओं को नागरिकता का हक़ मिला। परन्तु क्रान्ति ने जिस स्वतंत्रता को जन्म दिया था उसके मायने अनेक रूसियों ने निरपेक्ष रूप से ‘बन्धनरहित’ प्रेम के रूप में निकाले। उनका कहना था कि व्यभिचार को समाप्त करने का एकमात्र उपाय है यौन-सम्बन्धी तमाम प्रतिबन्धों को ख़त्म कर निरपेक्षतः मुक्त यौन सम्बन्धों की छूट देना। परन्तु लेनिन के नेतृत्व वाली क्रान्तिकारी सोवियत सत्ता ने ऐसे बन्धनरहित प्रेम की सोच का पुरज़ोर विरोध किया और स्वस्थ शारीरिक और मानसिक विकास के लिए युवाओं को वैज्ञानिक नैतिकता से लैस विचारों को आत्मसात करने, खेलकूद, बहुमुखी बौद्धिक क्रियाओं, अध्ययन, खोजबीन इत्यादि पर ज़ोर दिया। सोवियत सरकार का लक्ष्य न सिर्फ़ मनुष्य के दिन-प्रतिदिन के जीवन को बदलना था, बल्कि मनुष्य के स्वभाव को भी बदलना था। यह लक्ष्य मॉस्को स्पोर्ट्स क्लब के इस नारे में प्रकट होता हैः ‘हम मानव समाज का पुनर्संगठन न सिर्फ़ आर्थिक आधार पर कर रहे हैं बल्कि मनुष्य जाति को ही वैज्ञानिक सिद्धान्तों के सहारे सत्पथ पर ला रहे हैं।’ ‘पूँजीवाद ने प्रेम को सम्मानपूर्ण स्थान दिया’ नामक अध्याय में कार्टर मानव सभ्यता के विकास के दौरान स्त्री और पुरुष के बीच सम्बन्धों में आये बदलावों पर सोवियत वैज्ञानिकों के ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण का विस्तारपूर्वक बयान करते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार सामाजिक नैतिकता कोई स्थिर चीज नहीं है, बल्कि उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन के साथ ही साथ नैतिक मूल्यों और मान्यताओं में भी परवर्तन होता है। मिसाल के लिए सामन्ती युग में यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि प्रेम के आधार पर विवाह करना नैतिक रूप से सही है। पूँजीवाद ने पहली बार स्त्रियों को प्रेम करने की आज़ादी दी और प्रेम पर आधारित विवाह को सामाजिक नैतिकता का आधार बनाया। लेकिन यह भी सच है कि स्त्री प्रेम करने के लिए पुरुषों के समान ही स्वतंत्र हो इसके लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से उसे पुरुषों के समान स्वतंत्र होना ज़रूरी है। परन्तु यह समानता पूँजीवाद के दायरे में मुमकिन ही नहीं है। आज के पूँजीवादी युग में स्त्री आर्थिक बेड़ियों से जकड़ी हुई है। इन बेड़ियों से छुटकारा पाये बग़ैर वह वास्तविक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकती और प्रेम करने का वास्तविक अधिकार उसे नहीं हासिल हो सकता है। ‘अनूठा प्रश्न-पत्र’ नामक अध्याय में कार्टर बताते हैं कि किस प्रकार रूसी जनता के जीवन के पुनर्निर्माण का कार्य लेनिन और उनके अनुयाइयों ने रूसी पुरुष से नहीं, रूसी स्त्री के जीवन से शुरू किया। सोवियत वैज्ञानिकों ने यह मत पेश किया कि मानव जाति को सुधार सकना तब तक असम्भव है जब तक पुरुष और स्त्री के बीच असमानता मौजूद है। सोवियत सरकार ने इस असमानता को दूर करने के लिए क्रान्ति के फौरन बाद बीसियों ऐसे कानून एवं नियम बनाये जिनसे स्त्रियों की आर्थिक एवं राजनीतिक स्वाधीनता की गारण्टी हुई। औरतों को वोट देने के अधिकार जिन देशों में सबसे पहले दिया गया उनमें सोवियत रूस एक था। यही नहीं ‘समान काम के लिए समान वेतन’ और मज़दूर स्त्रियों के लिए शिशुशाला बनाने जैसे अधिकारों को गारण्टी की गयी। परन्तु रूसी क्रान्ति के तुरन्त बाद विदेशी आक्रमणकारियों के खि़लाफ़ लम्बी लड़ाई के फलस्वरूप पैदा हुए देश के आन्तरिक संकट से पनपी अव्यवस्था, बेरोज़गारी आदि की वजह से व्यभिचार की समस्या ने विकराल रूप ले लिया था। इसके मद्देनज़र 1923 में सोवियत वैज्ञानिकों ने दुराचार के खि़लाफ़ हमला बोलते हुए एक प्रश्न-पत्र छपवाया जिसे गुप्त तरीके से हज़ारों औरतों एवं लड़कियों के बीच घुमाया गया। इस प्रश्न-पत्र का उद्देश्य यह पता लगाना था कि किन परिस्थितियों में स्त्री अपना शरीर बेचने के लिए तैयार हो जाती है। औसत आदमी को सबसे ज़्यादा चौंका देने वाली बात यह थी कि आम तौर से पेशेवर अनैतिक महिलाओं की संख्या और दूसरी तमाम महिलाओं की संख्या में कोई ख़ास अन्तर नहीं था। विवाहित और अविवाहित दोनों ही तरह की बेशुमार महिलाओं ने बताया कि किन्हीं ख़ास परिस्थितियों में सभी ने एक न एक मौके पर प्रेम-भावना से परे, दूसरे स्वार्थों के कारण, अनुचित इन्द्रिय-भोग किया था। कुछ ने अपने उत्तरों में बताया कि उन्होंने कई बार व्यभिचार को ही अपनी रोटी का ज़रिया बनाया था हालाँकि उनपर ‘वेश्या’ का दाग़ न लगने पाया था। जिन महिलाओं ने माना कि व्यभिचार को ही उन्हों ने अपने जीवन का आधार बनाया था उनमें से अधिकांश ने यही कहा कि ईमानदारी से कमाया पैसा उनके और उन पर निर्भर लोगों के लिए बहुत कम था, इसलिए उन्हें व्यभिचार को अपना सम्बल बनाना पड़ा। अनूठे प्रश्न-पत्र की बात को आगे बढ़ाते हुए औरतों के क्रय-विक्रय के खि़लाफ़ संघर्ष नामक अध्याय में इस प्रश्न पर चर्चा करते हुए कि औरतें व्यभिचार को अपनी जीविका का आधार क्यों बनाती हैं, कार्टर बताते हैं कि इसका कारण दरिद्रता और आर्थिक कठिनाइयाँ तो थी हीं, लेकिन सोवियत प्रश्न-पत्र में दिये गये उत्तरों में रूसी महिलाओं ने ज़ोरदार शब्दों में यह भी कहा कि व्यभिचार के व्यापार का शिकार केवल वे ही महिलाएँ बनीं जिन्हें लम्बे-चौड़े मुनाफ़े कमा रहे व्यभिचार के ठेकेदारों ने जानबूझ कर फुसलाया था। इस मुनाफ़े का बेहद छोटा हिस्सा ही औरतों तक पहुँचता था। प्रश्न-पत्र के उत्तर में ज़्यादातर महिलाओं ने यह भी कहा कि यदि अच्छे काम मिलने की उन्हें ज़रा-सी भी उम्मीद हुई तो अपना नैतिक सुधार कर सकने की उन्हें आशा बँध जायेगी। बहुतों ने कहा कि वे अपने बच्चों के बड़े होने से पहले ही इस पेशे को छोड़ना चाहती हैं ताकि उन्हें यह सुनकर शर्मिन्दा न होना पड़े कि ‘तू फलाँ बदचलन औरत का बेटा है।’ इस प्रश्न-पत्र के उत्तरों में यह बात भी सामने आयी कि बहुत थोड़ी ही लड़कियाँ ऐसी होती हैं जो अपनी ज़रूरत से ज़्यादा तीव्र कामेच्छा को बुझाने के लिए व्यभिचार का सहारा लेती हैं। रूसी महिलाओं ने स्वीकार किया कि इस तरह के जीवन से इन्द्रिय-भोग के प्रति घृणा ही पैदा होती है। इसमें मानसिक संतोष नहीं मिलता। प्रश्न-पत्र के उत्तरों के आधार पर सोवियत वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे कि अधिकांश वेश्याएँ सामान्य स्वभाव की होती हैं। रूस की औरतों ने ज़ोर देते हुए कहाः ‘हमें अच्छा काम दो, हम अपने को सुधार लेंगे।’ अनूठे प्रश्न-पत्र के उत्तरों से निष्कर्ष निकालते हुए सोवियत राज्य ने व्यभिचार के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ने का फैसला किया। परन्तु सोवियत अधिकारियों ने यह भी तय किया कि इस संघर्ष को वेश्या-विरोधी आन्दोलन का रूप न दिया जाय। संगठित-व्यभिचार को सोवियत रूस में एक सामाजिक दोष माना गया और इसका कारण औरतों की ग़रीबी और इसके व्यापार से आने वाली रक़म को माना गया। व्यभिचार के खि़लाफ़ संघर्ष के तहत इससे मुनाफ़ा कमाने वालों के ख़ात्मे के लिए सख़्ती बरतने के लिए आदेश दिये गये और साथ ही अनैतिक महिलाओं के खि़लाफ़ कार्रवाई करने के ज़ारशाही क़ानून द्वारा अदालतों और पुलिस को दिये गये अधिकार रद्द कर दिये गये। रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास किये गए और किसी भी परिस्थिति में उनकी छँटनी करने वालों के खि़लाफ़ सख़्ती बरतने का फैसला किया गया। साथ ही इन्द्रिय-रोगों और वेश्यावृत्ति के ख़तरे के खि़लाफ़ आम जनता को जागरूक करके उनमें यह भावना पैदा की गयी कि अपने नये जनतंत्र में हम इन ख़राबियों को निकाल फेकेंगे। व्यभिचार से मुनाफ़ा कमाने वालों पर नकेल कसने के लिए एक नागरिक सेना (मिलीशिया) का भी गठन किया गया जिसका काम व्यभिचार के अड्डों का पता लगाना था। साथ ही इस सेना और जनता को यह भी चेतावनी दी गयी कि वे खुद अनैतिकता में लिप्त महिलाओं के खि़लाफ़ कोई सख़्ती न बरतें। उन्हें ऐसी किसी महिला का नाम और पता लेने का अधिकार नहीं था। सोवियत सरकार द्वारा व्यभिचार के अड्डों को ध्वस्त करने की मुहिम छेड़े जाने से घबराये ठेकेदारों और वेश्यागृहों के मालिकों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाना शुरू कर दिया। वे सोवियत अख़बारों में पत्र भेजकर यह कहने लगे कि सोवियत सरकार वेश्याओं को पनाह देकर और भोले-भाले मालिकों को दण्ड देकर घोर पाप कर रही है। किन्तु सोवियत अधिकारियों ने उनकी चीख-पुकार का उत्तर सेना की ओर से और भी कड़ी कार्रवाई से दिया। ठेकेदारों ने यह दलील देनी शुरू की कि वेश्याओं को अपना पेशा ज़ारी रखने का हक़ है। अधिकारियों ने प्रश्न-पत्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि औरतों ने व्यभिचार को मजबूरी की हालत में अपनाया है और समाज का यह कर्तव्य है कि वह उन्हें अच्छे काम देकर व्यभिचार से मुक्त करे। व्यभिचार के अड्डे चलाने वालों पर हमले के बाद सोवियत सरकार ने अगला हमला वेश्याओं के ‘ग्राहकों’ पर किया। इस हमले का सूत्रवाक्य थाः ‘अगर किसी व्यक्ति के लिए औरतों के ठेके चलाना अपराध है तो औरतों के शरीर को कुछ समय के लिए ख़रीदना और उनके आत्म-सम्मान को भंग करना भी उतना ही बड़ा अपराध है।’ इस हमले के तहत एक आश्चर्यजनक कानून पास किया गया जिसमें यह प्रावधान था कि व्यभिचार के अड्डे पर छापा मारते समय अधिकारी वहाँ उपस्थित सभी लोगों के नाम, पते और नौकरी करने के स्थान दर्ज़ कर लें। ‘ग्राहकों’ को गिरफ्ऱतार करने की बजाय अगले दिन बाजार में एक नियत स्थान पर एक लम्बे तख्ते पर इन लोगों के नाम और पते टाँग दिये जाते थे। इस तख़्ते पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता थाः ‘औरतों के शरीर खरीदने वाले’। इसके अलावा अनैतिकता के अपराधी पर मुक़दमे का एक नाटक भी तैयार किया गया जो जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ। ‘पाप और विज्ञान’ के अन्त के अध्यायों में डाइसन कार्टर व्यभिचार के अलावा अन्य समस्याओं मसलन शराबखोरी एवं बच्चों से जुड़ी समस्याओं को हल करने की दिशा में सोवियत संघ में उठाये गये क़दमों का ब्योरा देते हुए बताते हैं कि इन क़दमों से उस समाज में शराबखोरी के साथ ही साथ अपराधों की संख्या में ज़बर्दस्त कमी देखने को मिली। आज जब सोवियत संघ के महान समाजवादी प्रयोग की तमाम उपलब्धियों पर कीचड़ फेंकने के लिए साम्राज्यवादियों के टुकड़खोर बुद्धिजीवी कलमें घसीट रहे हैं, ऐसे में डाइसन कार्टर की यह किताब उन सभी लोगों को अवश्य पढ़नी चाहिए जो मानव सभ्यता के इतिहास की इस शानदार प्रेरणादायी प्रयोग का वस्तुगत मूल्यांकन करने की इच्छा रखते हैं। (Gaurav Kumar ke facebook page se)

Saturday, December 10, 2016

यदि नरेंद्र मोदी ने 55 करोड़ की रिश्वत नहीं ली तो दस्तावेजों की और भी सख्त जांच होनी चाहिए

आठ नवंबर, 2016 को शाम आठ बजे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 500 और 1000 रुपये के नोटों को बंद करने की घोषणा दूरदर्शन पर कर रहे थे, उस समय नई दिल्ली में कम से कम पांच संस्थाओं के पास ऐसे दस्तावेज थे जिनमें यह दर्ज है कि नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर 55 करोड़ रुपये की रिश्वत ली है. उन दस्तावेजों से यह साफ नहीं है कि 13 अलग-अलग लेन-देन में मोदी को कथित तौर पर 55.2 करोड़ रुपये मिले या फिर नौ लेन-देन में 40.1 करोड़ रुपये. ऐसा लगता है कि इन दस्तावेजों में 30 अक्टूबर, 2013 से 29 नवंबर, 2013 के बीच के चार लेन-देन दो बार दर्ज हैं. ये दस्तावेज पिछले कुछ महीनों से दिल्ली में घूम रहे थे. इन दस्तावेजों में यह दर्ज है कि सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय से जुड़े लोगों ने कथित तौर पर नरेंद्र मोदी को तब रिश्वत दी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे. रिश्वत लेने वालों में सिर्फ मोदी का ही नाम नहीं है बल्कि कथित तौर पर इस सूची में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र इकाई की कोषाध्यक्ष शायना एनसी और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नाम भी शामिल हैं. 17 नवंबर को इकनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली ने इन दस्तावेजों पर जवाब जानने के लिए इन सभी को पत्र लिखे. लेकिन इस खबर के लिखे जाने तक ईपीडब्ल्यू को किसी का जवाब नहीं मिला. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सहारा समूह के विभिन्न कार्यालयों पर छापेमारी के दौरान आयकर विभाग ने इन दस्तावेजों को जब्त किया था. यह बात है 22 नवंबर, 2014 की. आयकर विभाग में डिप्टी डायरेक्टर (इन्वेस्टिगेशन) अंकिता पांडे ने इन जब्त दस्तावेजों पर अपनी मोहर के साथ दस्तखत किए हैं. उनके अलावा विभाग के कुछ अन्य अधिकारियों और सहारा इंडिया समूह के एक प्रतिनिधि के दस्तखत भी इन दस्तावेजों पर हैं. जब मैंने इस बारे में तीन नवंबर को अंकिता पांडे से बात की तो उन्होंने बताया कि वे लंबी छुट्टी पर हैं. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस बारे में मीडिया से बातचीत करने के लिए अधिकृत नहीं हैं इसलिए इन दस्तावेजों की सत्यता को न तो खारिज और न ही स्वीकार कर सकती हैं. इन दस्तावेजों की फोटो कॉपी कम से कम दर्जन भर पत्रकारों और करीब इतने ही सरकारी अधिकारियों के पास है. इन दस्तावेजों को उस याचिका से जुड़े एक अंतरिम प्रार्थना पत्र में भी शामिल किया गया है जो मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर केवी चौधरी की नियुक्ति को चुनौती देते हुए कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में दर्ज कराई थी. कॉमन कॉज ने इस एप्लीकेशन को 15 नवंबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट में फाइल किया है. इस एनजीओ के वकील प्रशांत भूषण हैं. भूषण ने इससे पहले नौ लोगों को इस बारे में पत्र लिखा था और ये सारे दस्तावेज उन्हें भी भेजे थे. यह बात बीते अक्टूबर के आखिरी हफ्ते की है. भूषण ने जिन लोगों को ये दस्तावेज भेजे उनमें सर्वोच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त जज - जस्टिस एमबी शाह और अरिजीत पसायत - भी शामिल हैं. ये दोनों सेवानिवृत्त जज उच्चतम न्यायालय द्वारा काले धन पर गठित एसआईटी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं. ये दस्तावेज भूषण ने सीबीआई के निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के निदेशक और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भी भेजे. इनके अलावा उन्होंने सतर्कता आयुक्त तेजेंदर मोहन भसीन और श्री राजीव को भी ये दस्तावेज भेजे थे. यह एक संयोग है कि मौजूदा सीवीसी केवी चौधरी उस वक्त केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और राजस्व विभाग में अहम पदों पर थे जब आदित्य बिड़ला समूह के कार्यालयों पर अक्टूबर, 2013 और सहारा समूह के कार्यालयों पर नवंबर, 2014 में छापामारी की जा रही थी. सीवीसी के पद पर पहुंचने वाले वे भारतीय राजस्व सेवा के पहले अधिकारी हैं. आम तौर पर इस पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की ही नियुक्ति होती आई है. भूषण ने इन जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को जो पत्र लिखे उनमें पूछा गया है कि सरकार अपनी विभिन्न एजेंसियों के द्वारा जब्त दस्तावेजों से उभर रहे आरोपों की जांच क्यों नहीं करा रही है? उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर क्यों सरकार के विभिन्न विभाग इन दस्तावेजों पर चुप्पी मारकर बैठे हुए हैं? जैन हवाला डायरी की यादें ताजा ये दस्तावेज तकरीबन दो दशक पहले आए जैन हवाला कांड की डायरी की याद दिलाते हैं. ये डायरी 1996 में सीबीआई के हाथ लगी थी. इसमें यह दर्ज था कि कारोबारी सुरेंद्र कुमार जैन से जुड़े लोगों ने कई नेताओं के पास पैसे पहुंचाए हैं. इनमें भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, कांग्रेस नेता माधवराव सिंधिया, बलराम जाखड़, विद्याचरण शुक्ल, मदन लाल खुराना, पी शिव शंकर और आरिफ मोहम्मद खान के अलावा और भी कई लोगों के नाम दर्ज थे. निचली अदालत ने सीबीआई को इन नेताओं पर आरोप तय करने को कहा. लेकिन उच्च न्यायालय ने यह माना कि डायरी में दर्ज इन जानकारियों को सबूत नहीं माना जा सकता. इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा. इस मामले में तब देश की सबसे बड़ी अदालत का कहना था कि अगर कोई ऐसे दस्तावेज किसी सरकारी एजेंसी से मिलते हैं जिनमें किसी गैरकानूनी लेन-देन का जिक्र है तो उसकी पूरी और निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए. कानूनी तौर पर देखा जाए तो आदित्य बिड़ला समूह और सहारा समूह के दफ्तरों से मिले दस्तावेजों पर जांच न करवाकर सीबीआई और आयकर विभाग ने सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों की अवहेलना की है. हालांकि, कॉमन कॉज की शिकायत पर होने वाली जांच का भी हवाला डायरी की जांच वाला ही हश्र हो सकता है लेकिन, दोनों मामलों में कुछ अहम अंतर भी हैं. इस बार जो दस्तावेज मिले हैं, उनमें सिर्फ नाम दर्ज नहीं हैं बल्कि हर नाम के सामने हिंदी और अंग्रेजी में यह स्पष्ट तौर पर लिखा है कि किसे कितने पैसे दिए गए. इसके अलावा इन दस्तावेजों में बाकायदा तारीख भी दर्ज है और यह भी कि पैसे किसके जरिए भेजे गए. 'हंगामाखेज दस्तावेज' मुझे इन दस्तावेजों के बारे में सबसे पहले 28 जुलाई 2016 को पता चला. उस दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक कार्यक्रम के बाद हुई अनौपचारिक बातचीत में मशहूर वकील राम जेठमलानी ने इन दस्तावेजों का जिक्र किया था. भाजपा के एक राज्यसभा सांसद समेत लगभग आधा दर्जन लोग वहां मौजूद थे. राम जेठमलानी ने मुझसे कहा कि जो दस्तावेज आयकर विभाग के अधिकारियों ने सहारा इंडिया ग्रुप के दफ्तरों से जब्त किये हैं, वे हंगामा मचा सकते हैं क्योंकि उनमें यह जिक्र है कि नरेंद्र मोदी ने सहारा से मोटी रकम नकद ली है. इसके बाद मैंने कई बार राम जेठमलानी से पूछा कि क्या वे मुझे ये दस्तावेज दिखा सकते हैं, लेकिन वे मुझे टालते रहे. इस मुलाकात के बाद मैंने कई हफ़्तों तक राम जेठमलानी को फोन भी किये लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. इस घटना के लगभग दो महीने बाद एक राजनेता से जुड़े व्यक्ति ने मुझे एक लिफाफा दिया. इसमें इन तमाम दस्तावेजों की प्रतियां मौजूद थीं. मैंने तुरंत ही सरकार में अपने सूत्रों और कुछ पत्रकार मित्रों से इस बारे में बात की तो मालूम हुआ कि मेरी पहचान वाले कम-से-कम 20 अन्य लोगों के पास ये दस्तावेज पहले से ही थे. इनमें से कुछ ने मुझसे कहा कि वे मुझे कुछ और ऐसे दस्तावेज भी दे सकते हैं जो तब तक मेरे पास नहीं पहुंचे थे.मैंने उन लोगों से पूछा कि इन दस्तावेजों से जुड़ी ख़बरें उन्होंने अब तक क्यों नहीं छापीं? उनमें से कुछ ने जवाब दिया कि वे इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता को लेकर संशय में थे. फिर जब मैंने पूछा कि दस्तावेजों की सच्चाई जानने के लिए क्या उन्होंने उन लोगों से संपर्क किया जिनका नाम दस्तावेजों में था, उन्होंने जवाब दिया कि वे ऐसा करने वाले हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार का आरोप है कि सरकार ने एक ‘कवर-अप’ योजना भी तैयार कर ली है. इस योजना के अनुसार सरकार यह दावा करेगी कि ये दस्तावेज सहारा इंडिया ग्रुप के एक असंतुष्ट कर्मचारी ने अपने मालिक सुब्रत राय को ब्लैकमेल करने के लिए तैयार किये थे. सुब्रत राय को एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद दो साल तिहाड़ जेल में गुजारने पड़े थे. इधर, इस बीच मेरे पास मौजूद इन दस्तावेजों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. इसी दौरान मुझे मालूम हुआ कि 28 जून को राम जेठमलानी ने दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को एक पत्र लिखा था. पत्र के साथ ही जेठमलानी ने आयकर विभाग द्वारा रेड में जब्त किये गए ये तमाम दस्तावेज और एक ऐसे आधिकारिक पत्र की कॉपी भेजी थी जिसपर आयकर अधिकारी अंकिता पांडेय के हस्ताक्षर थे. उन्होंने सत्येंद्र जैन से इस बात की जांच करवाने का निवेदन किया था कि क्या सहारा इंडिया समूह से कथित तौर पर जब्त किये गये दस्तावेज और आधिकारिक पत्र पर किये गये हस्ताक्षर एक ही व्यक्ति के हैं. एक जुलाई को दिल्ली सरकार की ‘क्षेत्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला’ के सहायक निदेशक अनुराग शर्मा ने सत्येंद्र जैन के सचिव जी सुधाकर को पत्र लिखकर बताया कि दोनों दस्तावेजों के हस्ताक्षर एक ही व्यक्ति द्वारा किये गए प्रतीत होते हैं. जब भी आयकर विभाग के अधिकारी छापे के दौरान कोई दस्तावेज जब्त करते हैं तो उन दस्तावेजों की जांच और मूल्यांकन किसी अन्य अधिकारी द्वारा किया जाता है. यह अधिकारी फिर एक विस्तृत ‘असेसमेंट रिपोर्ट’ तैयार करता है जिसमें आगे की कार्रवाई की रूपरेखा होती है. 16 नवंबर को द इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, सहारा से संबंधित कागजात पर हजारों पन्नों की एक भारी-भरकम रिपोर्ट तैयार की गई है जिसे इन दिनों एक असेसमेंट ऑफिसर देख रहे हैं. दस्तावेजों के मुताबिक किसको कितना दिया गया? अभी 15 नवंबर को ही ‘द हिंदू’ में जोसी जोसफ की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था कि ‘प्रशांत भूषण ने राजनेताओं को रिश्वत देने की जांच की मांग की’. यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री मोदी और अन्य बड़े नेताओं के नाम का जिक्र किए बिना ही छापी गई थी. इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में कुछ जानकारियां सार्वजनिक करके तहलका मचा दिया. उन्होंने उस दस्तावेज का खुलासा किया जो आयकर विभाग ने 15 अक्टूबर 2013 को आदित्य बिरला ग्रुप की कंपनी के परिसर से रेड के दौरान जब्त किया था. इस दस्तावेज में एक जगह लिखा था - ‘गुजरात सीएम - 25 करोड़ (12 डन - रेस्ट?)‘ हालांकि भाजपा प्रवक्ताओं ने तुरंत ही इस दस्तावेज में लिखी बातों को सिरे से नकार दिया लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक भी इस पर कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है. ‘कॉमन कॉज’ ने अपनी जनहित याचिका के साथ जो दस्तावेज कोर्ट में जमा किये हैं उनमें एवी बिरला समूह के एग्जीक्यूटिव शुभेंदु अमिताभ से हुई पूछताछ का लिखित ब्यौरा भी शामिल है. इस पूछताछ में उन्होंने बताया था कि दस्तावेजों में लिखा गया ‘गुजरात सीएम’ उन्होंने ‘व्यक्तिगत नोट’ के तौर पर लिखा था. ये तीन एक्सेल शीट्स - जो जब्त किये गए दस्तावेजों का बेहद छोटा सा हिस्सा हो सकती हैं - कथित तौर पर क्या संकेत देती हैं? ये लॉग शीट्स दस महीनों में कुल 115 करोड़ रूपये के भुगतान दर्शाती हैं. ये दस महीने थे मई 2013 से मार्च 2014 तक. यानी 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले तक. शाइना एनसी को कथित तौर पर कुल पांच करोड़ का भुगतान हुआ. यह भुगतान 10 सितंबर 2013 से 28 जनवरी 2014 के बीच किसी ‘उदय जी’ द्वारा किया गया. एक अन्य कागज़ पर एक गुप्त सी प्रविष्टि भी दर्ज है जिसके अनुसार शाइना एनसी से ‘मदद’ मांगी जा रही थी कि वे ‘ए जनरल को बॉम्बे केस वापस लेने (समाप्त करने) के लिए’ कहें. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कथित तौर पर एक करोड़ रुपये लिए जो किसी ‘जायसवाल’ ने 23 सितंबर 2013 को उन्हें दिए. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कथित तौर पर 29 सितंबर 2013 और एक अक्टूबर 2013 के बीच कुल दस करोड़ रुपये लिए. ये रुपये उन्हें दो किस्तों में किसी ‘नीरज वशिष्ठ’ द्वारा पहुंचाए गए. जबकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कथित तौर पर चार करोड़ रुपये लिए जो उन्हें किसी ‘नंद जी’ ने एक अक्टूबर को दिए थे. ‘सीएम गुजरात’ को 15.1 करोड़ रुपये का कथित भुगतान 30 अक्टूबर 2013 और 29 नवंबर 2013 के बीच कुल चार किस्तों में किसी ‘जायसवाल जी’ द्वारा किया गया. इसके अलावा 30 अक्टूबर 2013 और 22 फरवरी 2014 के बीच आठ भुगतान अहमदाबाद में हुए. ये भुगतान ‘अहमदाबाद मोदी जी’ को ‘जायसवाल जी’ द्वारा ही किये गए और इनकी कुल रकम 35.1 करोड़ रुपये थी. साथ ही 28 जनवरी 2014 को भी ‘अहमदाबाद मोदी’ को पांच करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. यानी ‘सीएम गुजरात’, ‘अहमदाबाद मोदी जी’ और ‘अहमदाबाद मोदी’ को कथित तौर पर कुल 55.2 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ. क्या आयकर विभाग द्वारा जब्त किए गए इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने और इनमें जिन भुगतानों का जिक्र है, उनकी हकीकत का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जांच बैठाई जाएगी? यह इस कहानी का अंत नहीं है. देंख्‍ाें सहारा समूह से जब्त दस्तावेज-1, सहारा समूह से जब्त दस्तावेज - 2, सहारा समूह से जब्त दस्तावेज - 3 सभ्‍ाी दस्‍तवेज http://satyagrah.scroll.in/article/103382/if-modi-didn-t-receive-rs-55-crore-bribe-as-gujarat-cm-then-these-documents-should-be-investigated-more-rigourously?utm_source=rss&utm_medium=public पर प्रका‌शित साभ्‍ाारः सत्याग्रहडॉटस्क्रोलडॉटइन, writer- परंजॉय गुहा ठाकुरता

Friday, December 9, 2016

अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी है

कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए, बनवास भेजे गए, लौट कर आए तो वहां राज भी किया, उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया, जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है, जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं. जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है. जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है. जहां भरत रहे वहां मंदिर है. हनुमान मंदिर है. कोप भवन है. सुमित्रा मंदिर है. दशरथ भवन है. ऐसे बीसीयों मंदिर हैं. और इन सबकी उम्र 400-500 साल है. यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा. अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है. उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया! कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे. शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी. दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी. निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी, सच तो बस बाबर है और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद! अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे. लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई. तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को. बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे मांग के खाइबो मसीत में सोइबो. और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली. राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा! कहीं लिखा क्यों नहीं! अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके हैं. मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं. उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर.. राम पर चढ़ते रहे. मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं. ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे. सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा. 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे. जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या? अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है. उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता. सब आते हैं. एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया. क्या बस छह दिसंबर 1992 ही सच है! जाने कौन. छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया. वहां ताले पड़ गए. आरती बंद हो गई. लोगों का आना जाना बंद हो गया. बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते होंगे कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया? अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहजीब के मर जाने की कहानी है. (Rajiv Tyagi with Wasim Akram Tyagi on facebook)

Thursday, December 8, 2016

Foreign Funding: ADR writes to MHA and ECI, urges them to implement Delhi High Court’s ruling against Congress and BJP on FCRA violation.

New Delhi: Association for Democratic Reforms (ADR) has written letters (attached) to the Ministry of Home Affairs (MHA) and Election Commission (ECI) urging them to implement and comply with the directions of the Delhi High Court and take action against two national parties BJP and Congress as ‘contemplated by law’ within a specified period of six months. ADR, in its letters has specifically highlighted Para 73 of the Delhi High Court’s order, which states; “73. For the reasons extensively highlighted in the preceding paragraphs, we have no hesitation in arriving at the view that prima-facie the acts of the respondents inter-se, as highlighted in the present petition, clearly fall foul of the ban imposed under the Foreign Contribution (Regulation) Act, 1976 as the donations accepted by the political parties from Sterlite and Sesa accrue from ‘Foreign Sources’ within the meaning of law.” The Delhi High Court in its judgment dated 28th March, 2014 had found both Congress and BJP prima facie guilty of accepting foreign funds and violating the provisions of Foreign Contribution (Regulation) Act, 1976. (Click here) Against the High Court’s order, Congress and BJP had separately filed Special Leave Petitions (SLPs) in the Supreme Court on 26 June, 2014, and 26 August, 2014 respectively, and consequently the matter became sub judice. The SLPs in the Supreme Court were “dismissed as withdrawn” on November 29, 2016. (Click here). In view of the fact that now the Delhi HC order of March 28, 2014 has attained finality and it has been re-affirmed in a way, it is imperative that ECI, as a constitutional body and MHA as an administering authority under FCRA should act and take action against these two national parties for violating the FCRA within a specified time as directed by the High Court. Section 23(1) of the Foreign Contribution (Regulation) Act, 1976 calls for a penal action for the contravention of any provision of the act. The relevant Section reads as follows; “whoever accepts, or assists any person, political party or organisation in accepting any foreign contribution or any currency from a foreign source, in contravention of any provision of this Act or any rule made thereunder, shall be punished with imprisonment for a term which may extend to five years, or with fine, or with both.” ECI being the Constitutional authority to conduct free and fair elections in the country, it has the powers to either suspend or withdraw the recognition of a political party under Section 16 (A)(b) of the Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968. The relevant Section reads as follows; “to follow or carry out the lawful directions and instructions of the Commission given from time to time with a view to furthering the conduct of free, fair and peaceful elections or safeguarding the interests of the general public and the electorate in particular, the Commission may, after taking into account all the available facts and circumstances of the case and after giving the party reasonable opportunity of showing cause in relation to the action proposed to be taken against it, either suspend, subject to such terms as the Commission may deem appropriate, or withdraw the recognition of such party as the National Party or, as the case may be, the State Party.” ADR in its letter, addressed to MHA, has also stated that if “action as contemplated by law” is not taken within a reasonable time, the inescapable conclusion will be that the verdict of the Hon’ble Delhi HC is not being complied with wilfully, and there will be no option but to initiate proceedings for contempt of court against the MHA.