Thursday, March 23, 2017

मारुति मजदूरों को मिले हजारों साथी

आज भगत सिंह और साथियों के शहादत दिवस पर मारूति मजदूरों के समर्थन में कई हज़ारों मज़दूरों ने अपने अपने प्लांटों से रैली निकालते हुए IMT मानेसर में सामूहिक जुलुस करते हुए ताऊ देवीलाल पार्क में विशाल जन सभा में हिस्सा लिया। 13 साथियो को अदालत द्वारा उम्रकैद दिए जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ नीमराणा से लेकर गुड़गांव तक के मज़दूर अपनी यूनियनों के साथ जिस जोश और ऊर्जा के साथ इस रैली और सभा में शामिल हुए वो इस औद्योगिक क्षेत्र में सामूहिक पहल की नयी इबारत लिखता है। इस जुलूस की रोकने के लिए मानेसर पुलिस ने इलाके में 26 तारीख़ तक धारा 144 लगा दी थी जिसे तोड़ते हुए मजदूरों ने ये रैली की। प्रशासन ने इलाक़े में भारी पुलिस बल तैनात कर रखा था। गौर तलब है कि 2012 के घटनाक्रम के बाद मज़दूर इस बेल्ट में कोई रैली, जुलुस या सभा करने से पीछे हटते दिखते थे। मगर आज मारुति सुजुकी मज़दूर संघ की अगुवाई में जिस प्रकार की सामूहिक पहल इस प्रतिवाद जुलुस की शक्ल में दिखी वो वाक़ई मजदूरों को संघर्ष के लिए नयी राह दिखाता है। मजदूरों ने दिखा दिया वो कोर्ट के फ़ैसले से नहीं डरते और प्रशासनिक दमन का जवाब देने में सक्षम है। मज़दूरों ने यहां तक कहा कि अगर प्लांट बंद करना हो तो कर देंगे लेकिन झुकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं। जुलुस से लेकर सभा तक करीब 40 से ज्यादा यूनियने शामिल हुई। आगामी 4 अप्रैल को अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा हुई। इसके अलावा जेल में बंद साथियों और उनके परिवार की आर्थिक मदद की भी पहल ली गयी।

भगत सिंह का सपना आज भी अधूरा

रुद्रपुर। भगत सिंह कि विरासत को आगे बढाकर ही मारुती के बेगुनाह सजा झेल रहे मजदूरों की रिहाई सम्भव है भगत सिंह ने जिस सच्ची आजादी के लिये कुरबानी दी थी वह आज भी अधूरी है तथा मारुती से लेकर प्रीकोल तक के मजदूर दमन झेल रहे है और संघर्ष कर रहे है। मजदूर सहयोग केन्द्र और क्रांतिकारी नौजवान सभा द्वारा भगतसिंह चैक पर आयोजित जनसभा में उक्त बाते उभर कर आई, आज विभिन्न सगठनों व यूनियनो ने शहीदे आजम भगत सिंह,राजगुरु व सुखदेव का बलिदान दिवस मनाया जिसमे मारुती मजदूरो का बिना शर्त रिहा करने और प्रीकोल मजदूरों के कार्य बहाली की मांग उठाई गई। मजदूर सहयोग केन्द्र के मुकुल ने कहा की 18 जुलाई 2012 को मारुति के मानेसर प्लांट में साजिश के तहत मजदूरों का दमन हुआ। 148 मजदूर गिरफ्तार हुए लगभग 2500 मजदूरों को बर्खास्त किया गया, तीन-चार साल तक जेल में बंद रखने के बाद 117 मजदूरों बेगुनहा बरी हुए। 13 मजदूरो को उम्रकैद सहित 31 मजदूरों को सजा दे दी गई जिसके खिलाफ देशभर के मजदूर लममंद है। क्रान्तिकारी नौजवान सभा के संजय ने कहा कि गोरे अंग्रेज चले गए लेकिन भूरे अंग्रेज आज देश के मेहनतकश जनता को लूट रहे है,आज भगत सिंह के शहादत दिवस को बदलने की खतरनाक साजिश बढते जुनूनी हमले का उदाहरण है यह भगत सिंह के सपनों का अपमान है। इंकलाबी मजदूर केन्द्र के दिनेश भट्ट ने कहा कि हक और न्याय के इस संघर्ष के इस मुकाम पर भगत सिंह को याद करना बहुत ही प्रसागिक हो गया है। सभा को प्रभुनाथ वर्मा, राजदीप बठला,संजय कुमार, नवीन चिलाना, भीम ,दिनेश,अविनाश गुप्ता, दिनेश आर्य ,उर्मिला ,राकेश शर्मा, महेन्द्र राना चंद्रमोहन लखेड़ा, प्रकाश भट्ट, सुरजीत, अयोध्या प्रसाद भारती एमएन मंडल, ललित (एक्टू), अमित सक्सेना, मुकेश चन्द, उमेश चंदोला आदि ने संबोधित किया। शहीद दिवस पर मजदूर सहयोग केंद्र और क्रान्तिकारी नौजवान सभा द्वारा सभा में नेस्ले, टाटा, महिंद्रा, वोल्टास, महिंद्रा सीआईई पंतनगर, महिंद्रा सीआईई टाटा ऑटो कॉम, रिद्धि सिद्धि, मंत्री मेटेलिक्स यूनियनों व इंकलाबी मजदूर केंद्र, एक्टू, सीटू, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकार संगठन से जुड़े लोग व जनपक्षधर व पत्रकार बंधु आदि शामिल थे। सभा में मारुति मज़दूरों की रिहाई, मुक़दमों की वापसी और मज़दूरों की कार्य बहाली की मांग करते हुए इस देशव्यापी संघर्ष को एकताबद्ध रूप से तेज करने का आह्वान किया गया।

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज:भगतसिंह

भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है। यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है। दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो। अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’ जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है। यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है। बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए। लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी। जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी। इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है। यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं। 1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे। इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं। यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें। हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे। (1919 के जालियँवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिष सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरु किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये। इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है।) आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है। Date Written: June 1928 Author: Bhagat Singh Title: Communal Riots and their Cure ( Sampradayik dangen aur unka illaj) First Published: in Punjabi monthly Kirti in June 1928. * Courtesy: This file has been taken from original file of Aarohi Books' publication Inquilab Zindadad – A Collection of Essays by Bhagat Singh and his friends, edited by Rajesh Upadhyaya and Mukesh Manas.

Wednesday, March 22, 2017

कौम के नाम सन्देश: भगतसिंह

‘कौम के नाम सन्देश’ के रूप में प्रसिद्द और ‘नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र ‘ शीर्षक के साथ मिले इस दस्तावेज के कई प्रारूप और हिन्दी अनुवाद उपलब्ध
हैं, यह एक संक्षिप्त रूप है। लाहौर के पीपुल्ज़ में 29 जुलाई, 1931 और इलाहाबाद के अभ्युदय में 8 मई, 1931 के अंक में इसके कुछ अंश प्रकाशित हुए थे। यह दस्तावेज अंग्रेज सरकार की एक गुप्त पुस्तक ‘बंगाल में संयुक्त मोर्चा आंदोलन की प्रगति पर नोट’ से प्राप्त हुआ, जिसका लेखक सी आई डी अधिकारी सी ई एस फेयरवेदर था और जो उसने 1936 में लिखी थी, । उसके अनुसार यह लेख भगतसिंह ने लिखा था और 3 अक्तूबर, 1931को श्रीमती विमला प्रभादेवी के घर से तलाशी में हासिल हुआ था। सम्भवत: 2 फरवरी, 1931 को यह दस्तावेज लिखा गया। नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र प्रिय साथियो इस समय हमारा आन्दोलन अत्यन्त महत्वपूर्ण परिस्थितियों में से गुज़र रहा है। एक साल के कठोर संग्राम के बाद गोलमेज़ कान्फ्रेन्स ने हमारे सामने शासन-विधान में परिवर्तन के सम्बन्ध में कुछ निश्चित बातें पेश की हैं और कांग्रेस के नेताओं को निमन्त्रण दिया है कि वे आकर शासन-विधान तैयार करने के कामों में मदद दें। कांग्रेस के नेता इस हालत में आन्दोलन को स्थगित कर देने के लिए तैयार दिखायी देते हैं। वे लोग आन्दोलन स्थगित करने के हक़ में फैसला करेंगे या खि़लाफ़, यह बात हमारे लिये बहुत महत्व नहीं रखती। यह बात निश्चित है कि वर्तमान आन्दोलन का अन्त किसी न किसी प्रकार के समझौते के रूप में होना लाज़िमी है। यह दूसरी बात है कि समझौता ज़ल्दी हो जाये या देरी हो। वस्तुतः समझौता कोई हेय और निन्दा-योग्य वस्तु नहीं, जैसा कि साधारणतः हम लोग समझते हैं, बल्कि समझौता राजनैतिक संग्रामों का एक अत्यावश्यक अंग है। कोई भी कौम, जो किसी अत्याचारी शासन के विरुद्ध खड़ी होती है, ज़रूरी है कि वह प्रारम्भ में असफल हो और अपनी लम्बी ज़द्दोज़हद के मध्यकाल में इस प्रकार के समझौते के ज़रिये कुछ राजनैतिक सुधार हासिल करती जाये, परन्तु वह अपनी लड़ाई की आख़िरी मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते अपनी ताक़तों को इतना दृढ़ और संगठित कर लेती है और उसका दुश्मन पर आख़िरी हमला ऐसा ज़ोरदार होता है कि शासक लोगों की ताक़तें उस वक्त तक भी यह चाहती हैं कि उसे दुश्मन के साथ कोई समझौता कर लेना पड़े। यह बात रूस के उदाहरण से भली-भाँति स्पष्ट की जा सकती है। 1905 में रूस में क्रान्ति की लहर उठी। क्रान्तिकारी नेताओं को बड़ी भारी आशाएँ थीं, लेनिन उसी समय विदेश से लौट कर आये थे, जहाँ वह पहले चले गये थे। वे सारे आन्दोलन को चला रहे थे। लोगों ने कोई दर्ज़न भर भूस्वामियों को मार डाला और कुछ मकानों को जला डाला, परन्तु वह क्रान्ति सफल न हुई। उसका इतना परिणाम अवश्य हुआ कि सरकार कुछ सुधार करने के लिये बाध्य हुई और द्यूमा (पार्लियामेन्ट) की रचना की गयी। उस समय लेनिन ने द्यूमा में जाने का समर्थन किया, मगर 1906 में उसी का उन्होंने विरोध शुरू कर दिया और 1907 में उन्होंने दूसरी द्यूमा में जाने का समर्थन किया, जिसके अधिकार बहुत कम कर दिये गये थे। इसका कारण था कि वह द्यूमा को अपने आन्दोलन का एक मंच (प्लेटफ़ार्म) बनाना चाहते थे। इसी प्रकार 1917 के बाद जब जर्मनी के साथ रूस की सन्धि का प्रश्न चला, तो लेनिन के सिवाय बाकी सभी लोग उस सन्धि के ख़िलाफ़ थे। परन्तु लेनिन ने कहा, ‘'शान्ति, शान्ति और फिर शान्ति – किसी भी कीमत पर हो, शान्ति। यहाँ तक कि यदि हमें रूस के कुछ प्रान्त भी जर्मनी के ‘वारलार्ड’ को सौंप देने पड़ें, तो भी शान्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए।'’ जब कुछ बोल्शेविक नेताओं ने भी उनकी इस नीति का विरोध किया, तो उन्होंने साफ़ कहा कि ‘'इस समय बोल्शेविक सरकार को मज़बूत करना है।'’ जिस बात को मैं बताना चाहता हूँ वह यह है कि समझौता भी एक ऐसा हथियार है, जिसे राजनैतिक ज़द्दोज़हद के बीच में पग-पग पर इस्तेमाल करना आवश्यक हो जाता है, जिससे एक कठिन लड़ाई से थकी हुई कौम को थोड़ी देर के लिये आराम मिल सके और वह आगे युद्ध के लिये अधिक ताक़त के साथ तैयार हो सके। परन्तु इन सारे समझौतों के बावज़ूद जिस चीज़ को हमें भूलना नहीं चाहिए, वह हमारा आदर्श है जो हमेशा हमारे सामने रहना चाहिए। जिस लक्ष्य के लिये हम लड़ रहे हैं, उसके सम्बन्ध में हमारे विचार बिलकुल स्पष्ट और दृढ़ होने चाहिए। यदि आप सोलह आने के लिये लड़ रहे हैं और एक आना मिल जाता है, तो वह एक आना ज़ेब में डाल कर बाकी पन्द्रह आने के लिये फिर जंग छेड़ दीजिए। हिन्दुस्तान के माडरेटों की जिस बात से हमें नफ़रत है वह यही है कि उनका आदर्श कुछ नहीं है। वे एक आने के लिये ही लड़ते हैं और उन्हें मिलता कुछ भी नहीं। भारत की वर्तमान लड़ाई ज़्यादातर मध्य वर्ग के लोगों के बलबूते पर लड़ी जा रही है, जिसका लक्ष्य बहुत सीमित है। कांग्रेस दूकानदारों और पूँजीपतियों के ज़रिये इंग्लैण्ड पर आर्थिक दबाव डाल कर कुछ अधिकार ले लेना चाहती है। परन्तु जहाँ तक देश की करोड़ों मज़दूर और किसान जनता का ताल्लुक है, उनका उद्धार इतने से नहीं हो सकता। यदि देश की लड़ाई लड़नी हो, तो मज़दूरों, किसानों और सामान्य जनता को आगे लाना होगा, उन्हें लड़ाई के लिये संगठित करना होगा। नेता उन्हें आगे लाने के लिये अभी तक कुछ नहीं करते, न कर ही सकते हैं। इन किसानों को विदेशी हुकूमत के साथ-साथ भूमिपतियों और पूँजीपतियों के जुए से भी उद्धार पाना है, परन्तु कांग्रेस का उद्देश्य यह नहीं है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कांग्रेस के लोग सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं चाहते। सरकार पर आर्थिक दबाव डाल कर वे कुछ सुधार और लेना चाहते हैं। भारत के धनी वर्ग के लिये कुछ रियायतें और चाहते हैं और इसलिये मैं यह भी कहता हूँ कि कांग्रेस का आन्दोलन किसी न किसी समझौते या असफलता में ख़त्म हो जायेगा। इस हालत में नौजवानों को समझ लेना चाहिए कि उनके लिये वक्त और भी सख़्त आ रहा है। उन्हें सतर्क हो जाना चाहिए कि कहीं उनकी बुद्धि चकरा न जाये या वे हताश न हो बैठें। महात्मा गाँधी की दो लड़ाइयों का अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद वर्तमान परिस्थितियों और अपने भविष्य के प्रोग्राम के सम्बन्ध में साफ़-साफ़ नीति निर्धारित करना हमारे लिये अब ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। इतना विचार कर चुकने के बाद मैं अपनी बात अत्यन्त सादे शब्दों में कहना चाहता हूँ। आप लोग इंकलाब-ज़िन्दाबाद (long live revolution) का नारा लगाते हैं। यह नारा हमारे लिये बहुत पवित्र है और इसका इस्तेमाल हमें बहुत ही सोच-समझ कर करना चाहिए। जब आप नारे लगाते हैं, तो मैं समझता हूँ कि आप लोग वस्तुतः जो पुकारते हैं वही करना भी चाहते हैं। असेम्बली बम केस के समय हमने क्रान्ति शब्द की यह व्याख्या की थी – क्रान्ति से हमारा अभिप्राय समाज की वर्तमान प्रणाली और वर्तमान संगठन को पूरी तरह उखाड़ फेंकना है। इस उद्देश्य के लिये हम पहले सरकार की ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। इस समय शासन की मशीन अमीरों के हाथ में है। सामान्य जनता के हितों की रक्षा के लिये तथा अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप देने के लिये – अर्थात् समाज का नये सिरे से संगठन कार्ल माक्र्स के सिद्धान्तों के अनुसार करने के लिये – हम सरकार की मशीन को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। हम इस उद्देश्य के लिये लड़ रहे हैं। परन्तु इसके लिये साधारण जनता को शिक्षित करना चाहिए। जिन लोगों के सामने इस महान क्रान्ति का लक्ष्य है, उनके लिये नये शासन-सुधारों की कसौटी क्या होनी चाहिए? हमारे लिये निम्नलिखित तीन बातों पर ध्यान रखना किसी भी शासन-विधान की परख के लिये ज़रूरी है - शासन की ज़िम्मेदारी कहाँ तक भारतीयों को सौंपी जाती है? शासन-विधान को चलाने के लिये किस प्रकार की सरकार बनायी जाती है और उसमें हिस्सा लेने का आम जनता को कहाँ तक मौका मिलता है? भविष्य में उससे क्या आशाएँ की जा सकती हैं? उस पर कहाँ तक प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं? सर्व-साधारण को वोट देने का हक़ दिया जाता है या नहीं? भारत की पार्लियामेन्ट का क्या स्वरूप हो, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। भारत सरकार की कौंसिल आफ़ स्टेट सिर्फ अमीरों का जमघट है और लोगों को फाँसने का एक पिंजरा है, इसलिये उसे हटा कर एक ही सभा, जिसमें जनता के प्रतिनिधि हों, रखनी चाहिए। प्रान्तीय स्वराज्य का जो निश्चय गोलमेज़ कान्फ्रेन्स में हुआ, उसके सम्बन्ध में मेरी राय है कि जिस प्रकार के लोगों को सारी ताकतें दी जा रही हैं, उससे तो यह ‘प्रान्तीय स्वराज्य’ न होकर ‘प्रान्तीय जु़ल्म’ हो जायेगा। इन सब अवस्थाओं पर विचार करके हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि सबसे पहले हमें सारी अवस्थाओं का चित्र साफ़ तौर पर अपने सामने अंकित कर लेना चाहिए। यद्यपि हम यह मानते हैं कि समझौते का अर्थ कभी भी आत्मसमर्पण या पराजय स्वीकार करना नहीं, किन्तु एक कदम आगे और फिर कुछ आराम है, परन्तु हमें साथ ही यह भी समझ लेना कि समझौता इससे अधिक भी और कुछ नहीं। वह अन्तिम लक्ष्य और हमारे लिये अन्तिम विश्राम का स्थान नहीं। हमारे दल का अन्तिम लक्ष्य क्या है और उसके साधन क्या हैं – यह भी विचारणीय है। दल का नाम ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी’ है और इसलिए इसका लक्ष्य एक सोशलिस्ट समाज की स्थापना है। कांग्रेस और इस दल के लक्ष्य में यही भेद है कि राजनैतिक क्रान्ति से शासन-शक्ति अंग्रेज़ों के हाथ से निकल हिन्दुस्तानियों के हाथों में आ जायेगी। हमारा लक्ष्य शासन-शक्ति को उन हाथों के सुपुर्द करना है, जिनका लक्ष्य समाजवाद हो। इसके लिये मज़दूरों और किसानों केा संगठित करना आवश्यक होगा, क्योंकि उन लोगों के लिये लार्ड रीडिंग या इरविन की जगह तेजबहादुर या पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास के आ जाने से कोई भारी फ़र्क न पड़ सकेगा। पूर्ण स्वाधीनता से भी इस दल का यही अभिप्राय है। जब लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास किया, तो हम लोग पूरे दिल से इसे चाहते थे, परन्तु कांग्रेस के उसी अधिवेशन में महात्मा जी ने कहा कि ‘'समझौते का दरवाज़ा अभी खुला है।'’ इसका अर्थ यह था कि वह पहले ही जानते थे कि उनकी लड़ाई का अन्त इसी प्रकार के किसी समझौते में होगा और वे पूरे दिल से स्वाधीनता की घोषणा न कर रहे थे। हम लोग इस बेदिली से घृणा करते हैं। इस उद्देश्य के लिये नौजवानों को कार्यकर्ता बन कर मैदान में निकलना चाहिए, नेता बनने वाले तो पहले ही बहुत हैं। हमारे दल को नेताओं की आवश्यकता नहीं। अगर आप दुनियादार हैं, बाल-बच्चों और गृहस्थी में फँसे हैं, तो हमारे मार्ग पर मत आइए। आप हमारे उद्देश्य से सहानुभूति रखते हैं, तो और तरीकों से हमें सहायता दीजिए। सख़्त नियन्त्रण में रह सकने वाले कार्यकर्ता ही इस आन्दोलन को आगे ले जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि दल इस उद्देश्य के लिये छिप कर ही काम करे। हमें युवकों के लिये स्वाध्याय-मण्डल (study circle) खोलने चाहिए। पैम्फ़लेटों और लीफ़लेटों, छोटी पुस्तकों, छोटे-छोटे पुस्तकालयों और लेक्चरों, बातचीत आदि से हमें अपने विचारों का सर्वत्र प्रचार करना चाहिए। हमारे दल का सैनिक विभाग भी संगठित होना चाहिए। कभी-कभी उसकी बड़ी ज़रूरत पड़ जाती है। इस सम्बन्ध में मैं अपनी स्थिति बिलकुल साफ़ कर देना चाहता हूँ। मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसमें गलतफ़हमी की सम्भावना है, पर आप लोग मेरे शब्दों और वाक्यों का कोई गूढ़ अभिप्राय न गढ़ें। यह बात प्रसिद्ध ही है कि मैं आतंकवादी (terrorist) रहा हूँ, परन्तु मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं एक क्रान्तिकारी हूँ, जिसके कुछ निश्चित विचार और निश्चित आदर्श हैं और जिसके सामने एक लम्बा कार्यक्रम है। मुझे यह दोष दिया जायेगा, जैसा कि लोग राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को भी देते थे कि फाँसी की काल-कोठरी में पड़े रहने से मेरे विचारों में भी कोई परिवर्तन आ गया है। परन्तु ऐसी बात नहीं है। मेरे विचार अब भी वही हैं। मेरे हृदय में अब भी उतना ही और वैसा ही उत्साह है और वही लक्ष्य है जो जेल के बाहर था। पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हम बम से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। यह बात हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास से बहुत आसानी से मालूम हो जाती है। केवल बम फेंकना न सिर्फ़ व्यर्थ है, अपितु बहुत बार हानिकारक भी है। उसकी आवश्यकता किन्हीं ख़ास अवस्थाओं में ही पड़ा करती है। हमारा मुख्य लक्ष्य मज़दूरों और किसानों का संगठन होना चाहिए। सैनिक विभाग युद्ध-सामग्री को किसी ख़ास मौके के लिये केवल संग्रह करता रहे। यदि हमारे नौजवान इसी प्रकार प्रयत्न करते जायेंगे, तब जाकर एक साल में स्वराज्य तो नहीं, किन्तु भारी कुर्बानी और त्याग की कठिन परीक्षा में से गुज़रने के बाद वे अवश्य ही विजयी होंगे। इंकलाब-ज़िन्दाबाद! (2 फरवरी,1931) Date Written: February 1931 Author: Bhagat Singh Title: Message to Nation (Kaum ke nam sandesh) Source: Found in various forms, this article appeared, in shortened forms in Peoples, Lahore on July 29, 1931 and Abyday, Allahabad May 8, 1931. Found attached with the secret note of a CID offices of 1936. Original title was ‘Letter to the young political workers. This is an abridged version.

Tuesday, March 21, 2017

अछूत समस्या: भगतसिंह

काकीनाडा में 1923 मे कांग्रेस-अधिवेशन हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण मे आजकल की अनुसूचित जातियों को, जिन्हें उन दिनों ‘अछूत’ कहा
जाता था, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बाँट देने का सुझाव दिया। हिन्दू और मुस्लिम अमीर लोग इस वर्गभेद को पक्का करने के लिए धन देने को तैयार थे। इस प्रकार अछूतों के यह ‘दोस्त’ उन्हें धर्म के नाम पर बाँटने की कोशिशें करते थे। उसी समय जब इस मसले पर बहस का वातावरण था, भगतसिंह ने ‘अछूत का सवाल’ नामक लेख लिखा। इस लेख में श्रमिक वर्ग की शक्ति व सीमाओं का अनुमान लगाकर उसकी प्रगति के लिए ठोस सुझाव दिये गये हैं। भगतसिंह का यह लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में विद्रोही नाम से प्रकाशित हुआ था।- सं. हमारे देश- जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए। यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है। समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे! कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा! ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है। हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलानेवाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज उठा रहा है। उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी। आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटा कर क्रांति के लिए कमर कसी हुई है। हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को लेकर चिन्तित होने तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं? हम उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता। अंग्रेजी शासन हमें अंग्रजों के समान नहीं समझता। लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का अधिकार है? सिन्ध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने, जो बम्बई कौंसिल के सदस्य हैं, इस विषय पर 1926 में खूब कहा- “If the Hundu society refuses to allow other human beings, fellow creatures so that to attend public school, and if।। the president of local board representing so many lakhs of people in this house refuses to allow his fellows and brothers the elementary human right of having water to drink, what right have they to ask for more rights from the bureaucracy? Before we accuse people coming from other lands, we should see how we ourselves behave toward our own people।। How can we ask for greater political rights when we ourselves deny elementary rights of human beings.” वे कहते हैं कि जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इनकार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की माँग करो? जब तुम एक इन्सान को समान अधिकार देने से भी इनकार करते हो तो तुम अधिक राजनीतिक अधिकार माँगने के अधिकारी कैसे बन गए? बात बिल्कुल खरी है। लेकिन यह क्योंकि एक मुस्लिम ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो, वह उन अछूतों को मुसलमान बना कर अपने में शामिल करना चाहते हैं। जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहाँ उनसे इन्सानों-जैसा व्यवहार किया जाएगा। फिर यह कहना कि देखो जी, ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुँचा रहे हैं, व्यर्थ होगा। कितना स्पष्ट कथन है, लेकिन यह सुन कर सभी तिलमिला उठते हैं। ठीक इसी तरह की चिन्ता हिन्दुओं को भी हुई। सनातनी पण्डित भी कुछ-न-कुछ इस मसले पर सोचने लगे। बीच-बीच में बड़े ‘युगांतरकारी’ कहे जानेवाले भी शामिल हुए। पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय- जोकि अछूतों के बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं- की अध्यक्षता में हुआ, तो जोरदार बहस छिड़ी। अच्छी नोंक-झोंक हुई। समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवीत धारण करने का हक है अथवा नहीं? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने का अधिकार है? बड़े-बड़े समाज-सुधारक तमतमा गये, लेकिन लालाजी ने सबको सहमत कर दिया तथा यह दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रख ली। वरना जरा सोचो, कितनी शर्म की बात होती। कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है। हमारी रसोई में निःसंग फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है। इस समय मालवीय जी जैसे बड़े समाज-सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किये बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं! क्या खूब यह चाल है! सबको प्यार करनेवाले भगवान की पूजा करने के लिए मन्दिर बना है लेकिन वहाँ अछूत जा घुसे तो वह मन्दिर अपवित्र हो जाता है! भगवान रुष्ट हो जाता है! घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते हैं? तब हमारे इस रवैये में कृतघ्नता की भी हद पाई जाती है। जो निम्नतम काम करके हमारे लिए सुविधाओं को उपलब्ध कराते हैं उन्हें ही हम दुरदुराते हैं। पशुओं की हम पूजा कर सकते हैं, लेकिन इन्सान को पास नहीं बिठा सकते! आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है। उन विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है। देश में मुक्ति कामना जिस तरह बढ़ रही है, उसमें साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ पहुँचाया हो अथवा नहीं लेकिन एक लाभ जरूर पहुँचाया है। अधिक अधिकारों की माँग के लिए अपनी-अपनी कौमों की संख्या बढ़ाने की चिन्ता सबको हुई। मुस्लिमों ने जरा ज्यादा जोर दिया। उन्होंने अछूतों को मुसलमान बना कर अपने बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए। इससे हिन्दुओं के अहम को चोट पहुँची। स्पर्धा बढ़ी। फसाद भी हुए। धीरे-धीरे सिखों ने भी सोचा कि हम पीछे न रह जायें। उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया। हिंदू-सिखों के बीच अछूतों के जनेऊ उतारने या केश कटवाने के सवालों पर झगड़े हुए। अब तीनों कौमें अछूतों को अपनी-अपनी ओर खींच रही है। इसका बहुत शोर-शराबा है। उधर ईसाई चुपचाप उनका रुतबा बढ़ा रहे हैं। चलो, इस सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत दूर हो रही है। इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं तथा उन्हें हर कोई अपनी-अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग ही क्यों न संगठित हो जाएं? इस विचार के अमल में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा न हो लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार में सरकारी मशीनरी का काफी हाथ था। ‘आदि धर्म मण्डल` जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम हैं। अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या का सही निदान क्या हो? इसका जबाब बड़ा अहम है। सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इन्सान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य-विभाजन से। अर्थात् क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं। इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे। साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है। अब क्या हो सकता है?चुपचाप दिन गुजारो! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए। लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया। आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है। इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी हो गयी। लोगों के मनों में आवश्यक कार्यों के प्रति घृणा पैदा हो गई। हमने जुलाहे को भी दुत्कारा। आज कपड़ा बुननेवाले भी अछूत समझे जाते हैं। यू. पी. की तरफ कहार को भी अछूत समझा जाता है। इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई। ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा हो रही हैं। इन तबकों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहें और न समझें। बस, समस्या हल हो जाती है। नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है वह काफी अच्छा है। जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा उनसे अपने इन पापों के लिए क्षमायाचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा इन्सान समझना, बिना अमृत छकाए, बिना कलमा पढ़ाए या शुद्धि किए उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना,यही उचित ढंग है। और आपस में खींचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक न देना, कोई ठीक बात नहीं है। जब गाँवों में मजदूर-प्रचार शुरू हुआ उस समय किसानों को सरकारी आदमी यह बात समझा कर भड़काते थे कि देखो, यह भंगी-चमारों को सिर पर चढ़ा रहे हैं और तुम्हारा काम बंद करवाएंगे। बस किसान इतने में ही भड़क गए। उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नहीं सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबों को नीच और कमीन कह कर अपनी जूती के नीचे दबाए रखना चाहते हैं। अक्सर कहा जाता है कि वह साफ नहीं रहते। इसका उत्तर साफ है- वे गरीब हैं। गरीबी का इलाज करो। ऊँचे-ऊँचे कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं रहते। गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएँ बच्चों का मैला साफ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं। लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक कि अछूत कौमें अपने आपको संगठित न कर लें। हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की माँग करना बहुत आशाजनक संकेत हैं। या तो साम्प्रदायिक भेद को झंझट ही खत्म करो, नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो। कौंसिलों और असेम्बलियों का कर्तव्य है कि वे स्कूल-कालेज, कुएँ तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दिलाएं। जबानी तौर पर ही नहीं, वरन साथ ले जाकर उन्हें कुओं पर चढ़ाएं। उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाएं। लेकिन जिस लेजिस्लेटिव में बालविवाह के विरुद्ध पेश किए बिल तथा मजहब के बहाने हाय-तौबा मचाई जाती है, वहाँ वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकते हैं? इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार माँगें। हम तो साफ कहते हैं कि उठो,अछूत कहलानेवाले असली जनसेवको तथा भाइयो! उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोविन्दसिंह की फौज की असली शक्ति तुम्हीं थे! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके, जिस कारण उनका नाम आज भी जिन्दा है। तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं। तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके और जिन्दगी संभव बना कर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो, उसे हम लोग नहीं समझते। लैण्ड-एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी जमीन नहीं खरीद सकते। तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती हैं- उठो, अपनी शक्ति पहचानो। संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा। (Those who would be free must themselves strike the blow.) स्वतन्त्रता के लिए स्वाधीनता चाहनेवालों को यत्न करना चाहिए। इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है। कहावत है- ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते'। अर्थात् संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो। Date Written: 1923 Author: Bhagat Singh Title: Problems of Untouchablity (Achoot Samasya) First Published: in Kirti, a Punjabi Magazine published from Amritsar in June 1928.

धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम: भगतसिंह

मई, 1928 के ‘किरती’ में यह लेख छपा। जिसमें भगत सिंह ने धर्म की समस्या पर प्रकाश डाला है। अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कान्फ्रेंस हुई और साथ ही युवकों की भी कान्फ्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कान्फ्रेंस की विषय समिति में भी मौलाना जफर अली साहब के पाँच-सात बार खुदा-खुदा करने पर अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा-खुदा न कहें। आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं। सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमरसिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति में कोई विघ्न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की जरूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मंत्रा पढ़े जाने लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी। जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतंत्राता प्रेमी लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं। बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्राता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतंत्राता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गु़लामी का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना किµईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला हैµबच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताव़$त और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो हमें नज़र आता है कि धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को जनेऊ तक देने की इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की कसम ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिये, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत खूब! अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है? धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को तलवार के घाट उतार देना चाहिये और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मंत्रा पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतंत्राता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय कोई मुहम्मद गौरी की तरहµजैसी कि कहावत बतायी जाती हैµआज भी हमारे सामने गायें, सूअर, वेद-वु़$रान आदि चीज़ें खड़ी कर दे, तो हम क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हजार पण्डों की तरह ठाकुरों के आगे लोटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहंुचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन यदि धर्म के पक्षवालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में अँधेरा हो जायेगा, पाप पढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें। रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये किये हैं — 1. Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वगै़रा। 2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्जी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न करता है। 3. Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वगै़रा। मतलब यह कि पहले हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने चाहिये। दूसरा फिलासफी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि Philosophy is the out come of Human weakness, यानी फिलासफी आदमी की कमजोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं। जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया और ख़ास-ख़ास निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फिलासफी बड़ी जरूरी चीज़ है, क्योंकि इसके बगै़र उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है। आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन ‘मसला-ए-तनासुक’ पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग को, बुद्धि को, सोचने-समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान शरीप़$ में खु़दा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति, (Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फिलासफी हर व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फिलासफी मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है। अब आती है तीसरी बात – रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजावाले दिन, सरस्वती की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिये? नागरिक आज़ादी का हक (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाज़ा बजाते हुए भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही फिलासफी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर (National Religion) बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे सामने है। सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिये। यदि पहली और दूसरी बात में स्वतंत्रा विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म मुबारक है। लेकिन अगल-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है। छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली छोड़कर एक न होंगे, तब तक हमें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आजादी की ओर बढ़ सकते हैं। हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्राता का नाम हैµजब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे। आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है। Date Written: May 1928 Author: Bhagat Singh Title: Religion and our freedom struggle (Dharm aur hamara swatantrata sangram) First Published: in Punjabi monthly Kirti in May 1928 * Courtesy: This file has been taken from original file of Aarohi Books' publication Inquilab Zidadad–A Collection of Essays by Bhagat Singh and his friends, edited by Rajesh Upadhyaya and Mukesh Manas

Monday, March 20, 2017

क्या मज़दूरों को व्यवस्था से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए?

(दो जून 2015 को तहलका में प्रकाशित हुई विकास कुमार की ये रिपोर्ट 2012 को मानेसर के मारुति प्लांट में हुई घटना के बाद जेल में बंद 148 मज़दूरों की कहानी का एक पक्ष उजागर करती है. अब जबकि 31 मज़दूरों को दोषी क़रार दे दिया गया है औ उनमें से 13 को आजीवन कारावास दे दिया गया है और बाकियो ंको चार से दस साल की सज़ा सुनाई गई है, ये लेख फिर से प्रासंगिक हो गया है. सं.) सात मई की दोपहर दिल्ली के विवेक विहार में रहने वाले 55 वर्षीय शिव प्रसाद गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय में आए हैं. मई की इस तपती दोपहरी में शिव प्रसाद पिछलेदो घंटे से चहलकदमी कर रहे हैं. वो समय रहते अपने बेटे का ‘बेल बॉन्ड’ भर लेना चाहते हैं ताकि उसे जेल से निकालकर घर ले जा सकें. शिव प्रसाद का 25
वर्षीय बेटा प्रदीप कुमार पिछले ढाई साल से जेल में बंद है. एक दिन पहले ही उसे जमानत मिली है. आज सुबह जब शिव प्रसाद घर से अदालत के लिए निकल रहे थे तो उनकी पत्नी ने उनसे कहा कि आज बेटे को घर लेकर ही आना. शिव प्रसाद कहते हैं, ‘क्या कहें ये ढाई साल कैसे बीते हैं. जवान बेटा जेल में था. आज-कल करते-करते ये ढाई साल निकल गए. जब कभी भी राकेश की मां को मिलने-मिलवाने के लिए लाया वो केवल रोई. घर पर भी उसके दिन और रात रोते-रोते ही बीते हैं. अगर आज लड़का घर जाएगा तो सबको सालों बाद थोड़ी खुशी मिलेगी.’
प्रदीप उन 148 मजदूरों में से एक हैं जो जुलाई 2012 में मारुति के हरियाणा स्थित मानेसर इकाई में मजदूरों और प्रबंधन के बीच हुई झड़प के बाद गिरफ्तार किए गए थे. इस घटना में कंपनी के महाप्रबंधक (एचआर) अवनीश कुमार देव की जलने से मौत हो गई थी. मामले में पुलिस ने मारुति के मानेसर इकाई से जुड़े 148 मजदूरों पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या करने का प्रयास करना), 147 (दंगा करना), 353 (सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), 436 (आग लगाना) और 120बी (साजिश करना) के तहत मामला दर्ज किया और सभी आरोपित मजदूरों को अगले कुछ दिनों में गिरफ्तार भी कर लिया. ‘तहलका’ ने मार्च 2014 में इस मामले पर ‘मजबूर मजदूर’ नाम से रिपोर्ट प्रकाशित की थी. तब मजदूरों की तरफ से गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय में मामले की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील रघुवीर सिंह हुड्डा ने पुलिस के चार्जशीट पर सवाल खड़े किए थे. उन्होंने चार्जशीट के जिस हिस्से पर सवाल खड़े किए थे उसमें चार चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज हैं. गवाह नंबर 9 ने अपने बयान में कुल 25 मजदूरों के नाम लिए हैं जिनके नाम अंग्रेजी के अक्षर ‘ए’ से ‘जी’ तक हैं. गवाह नं.10 ने भी अपने बयान में गिनकर 25 मजदूरों को ही देखने की बात स्वीकारी है. इनके नाम क्रम से अंग्रेजी के अक्षर ‘जी’ से ‘पी’ तक हैं. गवाह नंबर 11 ने जिन 25 मजदूरों के नाम लिए हैं वे अंग्रेजी के ‘पी’ से ‘एस’ तक हैं. गवाह नंबर 12 ने अपने बयान में 14 मजदूरों के नाम लिए हैं और ये नाम अंग्रेजी के ‘एस’ से ‘वाई’ तक हैं. इसके अलावा इन सभी चार गवाहों के बयान बिल्कुल एक जैसे ही हैं. जैसे कि इन सभी गवाहों ने अपने बयान के अंत में कहा है कि इनके अलावा और तीन-चार सौ मजदूर थे जो अपने हाथ में डोरबीम लिए हुए कंपनी के बाहर चले गए थे और मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई. पुलिस द्वारा अदालत में दाखिल की गई इस चार्जशीट को दिखाते हुए रघुवीर सिंह ने कहा था कि पहली ही नजर में यह साफ जान पड़ता है कि ये सारे बयान किसी एक ही आदमी ने लिखे हैं और इनमें जो नाम लिखे गए हैं वो कंपनी के किसी रजिस्टर से देखकर लिखे गए हैं. आज, जुलाई 2012 की उस घटना को तीन साल होने वाले हैं. मामला अदालत में है और फिलहाल 114 आरोपित मजदूर जमानत पर रिहा हो चुके हैं, 34 मजदूर अब भी जेल में हैं. हालांकि जिन्हें जमानत मिली उन्हें भी इसके लिए कम से कम दो साल तीन महीने का इंतजार करना ही पड़ा. इस मामले में पहली दफा फरवरी 2015 में दो मजदूरों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी और उसके बाद ही बाकी 112 को जमानत मिलना संभव हो पाया. इस साल फरवरी में जिन दो मजदूरों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली उनकी याचिका गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायलय से तीन बार खारिज हो चुकी थी और चंडीगढ़ हाईकोर्ट से दो बार. चंडीगढ़ हाईकोर्ट के जज केसी पुरी ने मई 2013 में इन दो मजदूरों की जमानत याचिका को पहली बार खारिज करते हुए कहा था, ‘इस घटना की वजह से भारत की छवि दुनिया भर में खराब हुई है. विदेशी निवेशकों में गलत संदेश गया है. संभव है कि विदेशी निवेशक, मजदूर वर्ग में व्याप्त रोष की वजह से भारत में पूंजी निवेश न करें.’ चंडीगढ़ हाईकोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज होने के बाद इन दो मजदूरों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2014 को यह कहते हुए इनकी याचिका खारिज कर दी कि पहले मामले के चश्मदीद गवाहों के बयान निचली अदालत में दर्ज हो जाएं, इसके बाद जमानत पर विचार किया जाएगा. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायालय गुड़गांव को निर्देश दिया कि 30 अप्रैल 2014 तक इस केस के चश्मदीद गवाहों के बयान अदालत में दर्ज करा लिए जाएं लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई समयसीमा के बाद चश्मदीद गवाहों के बयान अदालत में दर्ज हुए. गवाहों ने अदालत में इन दो मजदूरों की गलत पहचान की. इस आधार पर इन लोगों ने एक बार फिर जमानत के लिए चंडीगढ़ हाईकोर्ट से गुहार लगाई लेकिन 23 दिसंबर 2014 को हाईकोर्ट ने एक बार फिर इन्हें जमानत देने से मना कर दिया. जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने यह तो माना कि इन्हें जमानत दी जानी चाहिए लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि इन लोगों को इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगानी चाहिए. चंडीगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मजदूरों ने दोबारा से सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की और आखिरकार यहां से इन्हें 20 फरवरी 2015 को राहत मिली. इन दो मजदूरों को इनकी गिरफ्तारी के लगभग 31 महीने बाद जमानत मिली और ये जेल से बाहर आ पाए. इसके बाद मार्च 2015 में 77 और आरोपित मजदूरों को गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायालय से जमानत मिली. कुल मिलाकर अब 114 आरोपित मजदूर जमानत पर बाहर हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इन्हें जमानत मिलने में ही इतना वक्त क्यों और कैसे लग गया? जबकि कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट खुद ही यह मान चुका है कि देश की अदालतों को ‘जेल नहीं बेल’ की थ्योरी के तहत काम करना चाहिए. हम ये सवाल देश की जानी-मानी वकील वृंदा ग्रोवर के सामने रखते हैं. वृंदा इस मामले में मजदूरों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही हैं. सवालों के जवाब में वृंदा कहती हैं, ‘मैं खुद नहीं समझ पा रही हूं कि जमानत मिलने में इतना समय कैसे लग गया. जबकि कानूनी तौर पर ये केस बहुत कमजोर है. जुलाई में इस मामले की अंतिम सुनवाई होनी है और अब तक 34 मजदूर जेल में हैं.’ वहीं गुड़गांव जिला एवं सत्र न्यायालय में मजदूरों की तरफ से पैरवी कर रहे वकील मोनू कुहाड़ का मानना है कि यह मामला कभी कानूनी था ही नहीं. मोनू कहते हैं, ‘जब हम इस मामले को कानून के दायरे से बाहर जाकर समझते हैं तो काफी कुछ साफ होता है. गुड़गांव में करीब-करीब 12 लाख मजदूर और कर्मचारी हैं जो कई अलग-अलग निजी कंपनियों में काम कर रहे हैं और समय-समय पर अपनी मांगों के लिए प्रबंधन पर दबाव बनाते रहते हैं. इस केस के हवाले से इन लाखों कर्मचारियों को एक संदेश देने की कोशिश की गई है कि अगर तुमने अपनी यूनियन बनानी चाही तो तुम्हें भी मारुति के मजदूरों की तरह बिना किसी खास सबूत और गवाह के दो-ढाई साल तक जेल में सड़ा दिया जाएगा. तुम्हारी नौकरी चली जाएगी और परिवार बिखर जाएगा.’ मोनू आगे बताते हैं, ‘इस केस में 148 मजदूर पिछले दो-ढाई साल से जेल में थे लेकिन जब हम इस केस को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि केवल 10-15 मजदूर ऐसे हैं जिनके खिलाफ कुछ सबूत हैं वो भी इतने पुख्ता नहीं हैं कि उन पर हत्या का मामला साबित हो सके. इस केस में 102 गवाह थे और सबकी गवाही अदालत में हो चुकी है. 148 आरोपित मजदूरों में से 16 ऐसे हैं जिनके खिलाफ एक भी गवाह अदालत में नहीं आया. 98 ऐसे आरोपित मजदूर हैं जिनके खिलाफ गवाह तो आए लेकिन किसी भी गवाह ने इनकी पहचान नहीं की. ये लोग जिन्हें अभी जमानत मिली है वो पहली फुर्सत में बरी किए जाने चाहिए थे. क्योंकि इनके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं है, कोई गवाह ही नहीं है.’ मोनू बात करते हुए कुछ सवाल उठाते हैं और इन सवालों के जवाब भी वो खुद ही देते हैं. वो कहते हैं, ‘जिनके खिलाफ कोई सबूत या गवाह नहीं है उस पर मुकदमा कैसे चल सकता है? इन्हें जेल में कैसे रखा जा सकता है? लेकिन सच्चाई ये है कि ये सालों तक जेल में रहे हैं और अब जमानत पर बाहर आए हैं. अब इससे तो यही समझ आता है कि सरकार और व्यवस्था इन मजदूरों के बहाने बाकी लाखों मजदूरों को एक सबक देना चाहती थी. जिसमें वो कामयाब रही.’ इस बारे में बात करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण से संपर्क करते हैं तो वह साफ शब्दों में न्यायपालिका और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, ‘जमानत की पूरी प्रक्रिया ही मनमानी है. अदालतें जिसे चाहें जमानत दें और जिसे चाहें, न दें. हमारी अदालतों में वर्ग भेद भी बहुत है, यही कारण है कि पढ़े-लिखे और पैसे वाले व्यक्ति को तुरंत जमानत मिल जाती है लेकिन निचले तबके को जमानत के लिए सालों चक्कर लगाने पड़ते हैं. सरकारों की मंशा भी अदालतों को प्रभावित करती है. सरकार जिसे दबाना चाहती है, अदालत उसे जमानत नहीं देती है.’ इस पूरे प्रकरण से जुड़ा एक और तथ्य है जिसे नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ा जा सकता. जिस वक्त यह घटना हुई थी उस वक्त हरियाणा में कांग्रेस का शासन था और भूपेंद्र सिंह हुड्डा राज्य के मुख्यमंत्री थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त किया. आरटीआई से मिली एक जानकारी के मुताबिक तत्कालीन हरियाणा सरकार ने केटीएस तुलसी को हर पेशी के लिए 11 लाख रुपये फीस दी. तुलसी के तीन सहायकों को एक पेशी के लिए 66,000 रुपये मिलते थे. दो साल में मारुति केस में भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने केटीएस तुलसी को 5 करोड़ रुपये बतौर फीस दिए थे. पिछले साल राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ. भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी और मनोहर लाल खट्टर राज्य में मुख्यमंत्री बने. भाजपा सरकार ने पिछले साल दिसंबर में केटीएस तुलसी को इस केस से अलग कर दिया. इस मामले में हरियाणा की मौजूदा सरकार का पक्ष जानने के लिए हमने खट्टर सरकार के श्रम और रोजगार मंत्री कैप्टन अभिमन्यु से संपर्क किया लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी. इस कानूनी लड़ाई में एक पक्ष उन परिवारों का भी है जिनके लड़के इस मामले में सालों से जेल में बंद हैं या सालों बाद जमानत पर रिहा हुए हैं. जिन परिवारों के लड़के अभी तक जेल में बंद हैं वो जल्दी ही उनके जेल से छूटने की उम्मीद लगाए हुए हैं और इसी सहारे अपना जीवन जी रहे हैं. वहीं जिन परिवारों के बच्चे जमानत पर बाहर आ चुके हैं वो ठगा-सा महसूस करते हैं. उन्हें इस बात की खुशी तो है कि उनका लड़का जेल से बाहर आ गया लेकिन इनके मन में यह सवाल भी है कि इतने समय बाद क्यों? जब ‘तहलका’ ने ऐसे प्रभावित परिवारों से संपर्क किया तो कईयों ने बात करने से साफ मना कर दिया. कुछ लोगों का कहना था कि वो अब पिछली जिंदगी को याद नहीं करना चाहते और जो हुआ उसे भुलाकर भविष्य की तरफ देखने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं कुछेक परिवारों ने मीडिया के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार करते हुए बात करने से ही मना कर दिया.

मारुति मजदूरों को रिहा करो

हमारे 13 साथियों जिसमें यूनियन बॉडी के 12 सदस्य शामिल है को ह्त्या के झूठे आरोप में 18 मार्च की शाम गुड़गांव कोर्ट द्वारा उम्र कैद की सजा सुनायी गयी| 4 मजदूरों को 5 साल की सजा सुनाई गयी| 14 मजदूरों को 3 साल की सजा हई मगर वो पहले ही जेल में 4 चार साल काट चुके थे इसलिए उन्हें रिहा करा दिया गया| इससे पहले 117 मजदूरों को बरी किया गया था जो तकीरबन 4 साल जेल में बिता चुके थे, हम नहीं जानते उन सालो का हिसाब कौन देगा| 148 मज़दूर करीब 2012 से बिना जमानत के जेल में चार साल तक रहे और 2500 मजदूरों को गैर कानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया और लगातार राज्यसत्ता के दमन का सामना करना पड़ा | हम इस झूठ को अस्वीकार करते हैं कि यहाँ एक उद्देश्यपरक फ़ैसला है| अभियोजन पक्ष का केस और अदालत का फ़ैसला दोनों बिना किसी सबूत के, झूठी गवाही और सिर्फ वर्ग द्वेष पर आधारित है| मज़दूर हितैषी प्रबंधक जिन्होंने यूनियन पंजीकृत कराने में मदद की थी, की अफ़सोसजनक मौत में मजदूरों की कोई भूमिका नहीं है – इस बात को बचाव पक्ष द्वारा अंतिम रूप से साबित किया जा चुका है| एक सुपरवाइजर द्वारा एक दलित मज़दूर जियालाल (जिसे बाद में इस केस का मुख्य आरोपी बना दिया गया ) के साथ जातिसूचक गाली गलौज और उसके निलंबन के बाद 18 जुलाई की घटना की शुरूआत हुई| यह पूरा मामला, यूनियन को खत्म करने के लिए प्रबंधन के षडयंत्र का हिस्सा है, यूनियन बनाने के अधिकार और उन मागों पर खासकर ठेका प्रथा के खात्मे का जिसके लिए यूनियन आवाज उठा रही थी और मजदूर वर्ग के संघर्ष का प्रतीक बन चुकी थी पर हमला है| कानूनी कार्यवाही को ऊपर से देखने से पता चलता है कि 18 जुलाई के बाद प्रबंधन और सरकार के गठजोड़ द्वारा पुलिस, प्रशासन और श्रम विभाग की मदद से किस प्रकार क्रूर दमनात्मक तरीके से हजारों मजदूरों को लगातार प्रताड़ित किया गया| यह फ़ैसला जिसको देते वक्त गुडगाँव और मानेसर को पुलिस छावनी में बदल दिया गया था, पूरी तरह से मजदूर विरोधी है और कंपनी प्रबंधन के हित में पूरे देश के खासकर हरियाणा और राजस्थान में गुड़गांव से नीमराना तक के मजदूरों में डर बैठाने के लिए दिया गया है| अपनी अंतिम दलील में अभियोजन ने मजदूरों को मौत की सजा मांगते हुए मई 2013 में चंडीगढ़ हाईकोर्ट द्वारा मजदूरों की जमानत खारिज के आदेश के पीछे दिए गए तर्क के सामान, पूंजी का भरोसा पुन स्थापित करने और वैश्विक निवेशकों को आमंत्रित करने के प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की दलील दी| इन विदेशी और देशी पूंजीपतियों का भरोसा सिर्फ एक चीज पर निर्भर करता है वो है सस्ता और आज्ञाकारी श्रम बल, इसलिए ना यूनियन हो ना किसी अधिकार की मांग उठे | पूरी यूनियन बॉडी को को निशाना बनाकर कम्पनी राज हमें बताना चाहता है कि इस देश में मज़दूर आन्दोलन, यूनियन बनाने के अधिकार और दूसरे ट्रेड यूनियन अधिकारों सहित मजदूरों के मानव अधिकारों को पूंजीपतियों और राज्य सत्ता द्वारा कुचल दिया जाएगा| हमारे यूनियन पदाधिकारियों पर सिर्फ इसलिए हमला किया गया क्योकि वे प्लांट के अन्दर प्रबंधन द्वारा मजदूरों के शोषण के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे और 2011 से ठेका प्रथा की खात्मे की मांग करते हुए, कार्यस्थल पर सम्मान और प्रबंधन के शोषणकारी अभ्यास के खात्मे की मांग करते हुए स्थायी और ठेका मजदूरों की एकजुटता के साथ ट्रैड यूनियन अधिकारों और सम्मान के लिए लंबा निर्णायक संघर्ष छेड़ दिया था | अंतत 1 मार्च 2012 को हमारी यूनियन पंजीकृत हुई| मजदूरों की यह जीत प्रबंधन को स्वीकार नहीं थी और वे हमारी यूनियन को कुचलना चाहते थे, खासकर अप्रेल 2012 में मांगपत्र देने के बाद जिसमें ठेका प्रथा समाप्त करने की मांग थी | इसलिए उन्होंने षडयंत्र रचा और 18 जुलाई की घटना को जन्म दिया| ऊर्जा और उम्मीद से लबरेज यह संघर्ष इस औद्योगिक क्षेत्र और होंडा, रीको, अस्ति, श्रीराम पिस्टन, डाईकिन से लेकर बेलसोनिका के मजदूरों को इस तरह के शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा देता है| मजदूरों की इस सामूहिकता की भावना को कुचलना और कंपनी के हित में सबका सीखाना जरूरी था| इस तरह के संघर्ष और मज़दूर आंदोलनों के दमन के मामले ग्रैज़ियानो ट्रांसमिशन नोयडा, रीजेंट सेरेमिक्स पुदुचेरी, चेन्नई में प्रिकौल में भी हुए है| यह फ़ैसला इसी दमनचक्र की कड़ी है जो इसके तीखेपन को बढ़ाता है| इसलिए औद्योगिक क्षेत्रों को पुलिस छावनी में बदला जा रहा है| और सरकार प्रबंधन के साथ श्रमिकों के विवादों को लॉ एंड आर्डर की समस्या में बदलने के लिए, यूनियन बनाने के अपने अधिकारों तथा ठेका प्रथा के खिलाफ संघर्षरत मजदूरों को अपराधी बता रही है| हम मजदूरों के अपराधी घोषित करने की तीखी भर्त्सना करते हैं| हम भयभीत नहीं हैं ना ही इस लगातार तीखे दमन से थकने वाले है| स्थायी और ठेका के विभाजन से परे मजदूरों की एकता को और वर्तमान कंपनी राज्य सत्ता के शोषण दमन के लगातार प्रहारों के खिलाफ स्वतन्त्र वर्ग पहलकदमी को मज़बूत करते हुए हम संघर्ष को आगे ले जा सकते हैं| औद्योगिक क्षेत्र के लाखों मज़दूर 9 मार्च से लगातार समर्थन में कार्यक्रम कर रहे है और 16 मार्च को हरियाणा, राजस्थान, यू,पी, तमिलनाडु के करीब लाखों मजदूरों ने भूख़ हड़ताल की| 18 तारीख़ को फ़ैसले के तुरंत बाद मारुति सुजुकी के 5 प्लांटों के करीब 30000 मजदूरों ने प्रबंधन द्वारा काम का दबाव बढ़ाने और 8 दिन के वेतन कटौती का नोटिस देकर इसे रोकने का प्रयास करने के बावजूद एकजुटता दिखाते हुए 1 घंटे की टूल डाउन हड़ताल की | 23 मार्च भगत सिंह के शहादत दिवस पर मारुति सुजुकी मज़दूर संघ जो 6 मारुति प्लांटो का सामूहिक संगठन है, ने हजारों मजदूरों को इकट्ठा होकर मानेसर में विरोध रैली करने के लिए मानेसर चलो का आह्वान किया है| हम सभी मज़दूर हितैषी संगठनो का आह्वान करते है कि इस विरोध प्रदर्शन में भाग ले| हम संभवत 4 अप्रैल को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की उम्मीद कर रहे हैं| इस निर्णायक और महत्वपूर्ण समय में हम सभी मजदूरों और मज़दूर हितैषी ताकतों से सजाप्राप्त मजदूरों को रिहा करने और न्याय तथा श्रमिक अधिकार को हासिल करने के लिए संगठित संघर्ष छेड़ने और सभी संभावित तरीके से समर्थन करने की अपील करते हैं| 23 मार्च को चलो मानेसर ! मारुति मजदूरों को रिहा करो ! औद्योगिक क्षेत्रों में दमन शोषण का राज खत्म करो! प्रोविजनल वर्किंग कमिटी मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन 18 मार्च 2017 संपर्क: 7011865350 (रामनिवास), 9911258717 (खुशीराम) PWC, MSWU की तरफ़ से. ई-मेल: marutiworkerstruggle@gmail.com जानकारी के लिए देखें: marutisuzukiworkersunion.wordpress.com

'अदालत, मीडिया किसी ने हमारा साथ नहीं दिया....'

(यह रिपोर्ट 2 जून 2015 में तहलका पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. तबतक मज़दूरों को जेल में कैद रहते तीन साल हो चुके थे. उस समय एक मज़दूर की आपबीती को पत्रकार विकास कुमार ने बात की थी. सं.) 20 वर्षीय रमन विश्नोई हरियाणा के फतेहाबाद जिले के रहने वाले हैं. नवंबर 2011 में रमन ने मारुति के मानेसर प्लांट में बतौर प्रशिक्षु काम करना शुरू किया था. जुलाई 2012 की घटना के बाद पुलिस ने उन्हें भी उनके कमरे से गिरफ्तार किया और जेल में डाल दिया. अपनी गिरफ्तारी के पौने तीन साल बाद रमन इसी साल मई में जमानत पर रिहा हुए हैं. रमन से हमारी मुलाकात गुड़गांव के जिला एवं सत्र न्यायलय में हुई. वो यहां पेशी के लिए आए हैं. कंधे पर बैग लटकाए रमन एक पल के लिए किसी कॉलेज के छात्र जान पड़ते हैं लेकिन ऐसा है नहीं. रमन पिछले कई सालों से जेल में थे और उनके मुताबिक वो बिना किसी गलती के जेल की सजा काटकर आए हैं. रमन अपनी आपबीती बताते हुए कहते हैं, ‘क्या कहें… हमारा जीवन तो बर्बाद ही हो गया समझिए… हम तो पक्की नौकरी पर भी नहीं थे… ट्रेनी थे… कल को अगर बेगुनाह साबित भी हो गए तो भी कुछ नहीं मिलेगा… जो पक्की नौकरी पर थे वो तो केस-मुकदमा भी कर सकते हैं. हम क्या करेंगे… हमें तो कल को कोई नौकरी पर भी नहीं रखेगा… क्योंकि हम जेल में थे.’ रमन के परिवार में उनके पिता हैं जो खेती-किसानी करते हैं, मां हैं और एक बहन है. उनका छोटा-सा परिवार अपने गांव में ही रहता है. जितने दिन रमन जेल में रहे उतने दिन उनके पिता फतेहाबाद और गुड़गांव कोर्ट के बीच चक्कर लगाते रहे. हर तारीख पर आना. हर कुछ दिन पर अपने बेटे से जेल में जाकर मिलना. कपड़े और दूसरे जरूरी सामान देना उनकी नियमित दिनचर्या थी. रमन के अनुसार आज उनके पिता जी के माथे पर करीब-करीब पांच से सात लाख का कर्ज है. बहन की शादी के लिए जो थोड़े-बहुत पैसे थे वो भी उन्हें बाहर लाने में चले गए. फिलहाल रमन को इस बात का डर है कि आगे उन्हें कोई काम नहीं देगा क्योंकि उन पर जेल काटकर आने का ठप्पा लग चुका है. रमन इस सबके लिए पूरे सिस्टम और मीडिया को दोषी मानते हैं. रमन के मुताबिक उनके साथ वही हुआ जो अब तक वो केवल टीवी या सिनेमा में देखते रहे हैं. वो कहते हैं, ‘मेरे साथ जो हुआ है वैसा होते हुए मैंने आज तक केवल फिल्मों में ही देखा है. फिल्म की शुरुआत में पूरा सिस्टम एक साथ मिलकर हीरो और उसके परिवार को परेशान करता है. फिल्म के आखिर में हीरो पूरे सिस्टम को सबक सिखाता है. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. मैं फिल्म का हीरो नहीं हूं और यहां सब कुछ असली है. वास्तव में पूरा सिस्टम भ्रष्ट है. पुलिस ने हमे बिना एफआईआर में नाम के जेल में डाल दिया और अदालतों ने दो-ढाई साल तक जमानत नहीं दी… मीडिया ने भी हमारा साथ नहीं दिया… और मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं केवल अपनी जिंदगी को शुरू होने से पहले ही बर्बाद होते हुए देख सकता हूं.’ मई की दोपहर में एक पेड़ के नीचे रमन विश्नोई हमसे ये सारी बातें एक सांस में कह गए. ऐसा महसूस होता है कि रमन ने जो कहा उसकी वजह से दिन का पारा सौ डिग्री के आसपास पहुंच गया है और इस आंच में सबकुछ धू-धूकर जल रहा है. तहलका से साभार

Sunday, March 19, 2017

10 दिन बाद इजरायल ने सौंपा फिलिस्तीन के सोशल एक्टिविस्ट का शव

10 दिन पहले इजरायली सेना ने वेस्ट बैंक में फिलिस्तीन के युवा एक्टिविस्ट बासिल अल अराज को गोलियों से छलनी कर दिया गया था। इतना ही नहीं उन्होंने 10 दिनों तक उसके शव को अराज के परिवार वालों को नहीं दिया। इसके खिलाफ पूरे फिलिस्तीन में जबरदस्त प्रदर्शन हुए। आखिरकार 19 मार्च को इजरायल ने उसके शव को सौंप दिया। जिस समय
अराज की शवयात्रा निकली ऐसा लगा जनता का सैलाब उमड़ पड़ा हो। मुक्ति संघर्ष के इस सेनानी को अंतिम विदाई देने के लिए मैं भी वहां था। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि मैं उसके पार्थिव शरीर को बड़ी जद्दोजहद के बाद देख पाया। फिलिस्तीन के स्वास्‍थ्य मंत्रालय के मुताबिक अराज को 10 गोलियां मारी गई थीं, जबकि वह अहिंसावादी था और अहिंसात्मक ढंग से ही इजरायल की कब्जा करने की नीति का विरोध करता था। दो गोलियां तो उसके सिर में और दो सीने में मारी गई थीं। जाहिर है इसके बाद वह जिंदा नहीं रहा होगा। आप समझ सकते हैं, उसको मारने के बाद भी मारा गया। ओह इतनी क्रूरता कोई इंसान कैसे कर सकता है...इस समय मुझे मेल गिब्सन की प्रसिद्ध फिल्म ब्रेव हर्ट याद आ रही थी...बासिल ऐसा ही जांबाज था... शव यात्रा में मैंने देखा अराज के पिता अपने बेटे के शव को सॉल्यूट कर रहे थे। वहां मौजूद पत्रकारों के एक समूह से उन्होंने कहा कि वे खुद को बड़ा भाग्यशाली मान रहे हैं कि वे अराज को अंतिम विदाई दे पाए। एक युवा लड़की, जो कि संभवतः अराज की करीबी दोस्त थी ‌कब्रिस्तान के गेट के कोने में खड़ी फूट-फूट कर रो रही थी। वेस्ट बैंक के ‌कब्रिस्तान में अराज के शव का अंतिम संस्कार किया गया। अराज की शवयात्रा उसके पै‌तृक घर बेथलहेम के गांव अल वजाला से शुरू हुई। अभी अराज महज 31 साल का था। 6 मार्च को रमल्ला में इजरायली सेना के हमले में उसकी मौत हो गई थी। अराज फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष का एक जांबाज योद्धा था। उसने इसके लिए फिलिस्तीन के युवाओं को संगठित करने का काम किया। उसके न रहने पर भी फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष का कारवां नहीं रुकने वाला....‌बासिल अल अराज के करीबी साथी हमजा अकरावी कहते हैं बासिल के न रहने से फिलिस्तीन के इजरायल विरोधी शांतिपूर्ण युवा आंदोलन को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है। लेकिन इसे खत्म नहीं किया जा सकता। जल्दी ही हम इस दुख से उबर जाएंगे। हालात हमें ठंडा होकर बैठने नहीं देते। इसलिए बासिल हमेशा हमें प्रेरणा देता रहेगा। (यह लेख फिलिस्तीन के मशहूर लेखकर मजीन कमसिएह का है। वे फिलिस्तीन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निदेशक, सामाजिक कार्यकर्ता, और इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष पर कई किताबों के लेखक हैं। अनुवादः देवेंद्र प्रताप)

Saturday, March 18, 2017

13 साथियों को उम्रकैद की सजा पर मजदूरों में गुस्सा

कार बनाने वाली कंपनी मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में 18 जुलाई 2012 को हुई आगजनी और हिंसा मामले में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरपी गोयल की अदालत ने शनिवार को 13 मजदूरों को उम्रकैद व चार को पांच-पांच वर्ष सजा की सजा सुनाई। 14 लोगों को अब तक जेल में काटी गई सजा को ही पर्याप्त मानते हुए रिहा करने के आदेश दिए गए हैं। 10 मार्च को जिला अदालत ने 148 में से 31 मजदूरों को दोषी करार दिया था जबकि 117 को बरी कर दिया था। दोषियों की सजा पर फैसला शुक्रवार को होना था, लेकिन सजा को लेकर दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की ओर से दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। धारा 302, 307, 436, 427, 325, 323, 452, 201, 120 बी और 34 के तहत राम मेहर, संदीप ढिल्लों, रामबिलास, सर्वजीत सिंह, पवन कुमार, सोहन कुमार, प्रदीप गुर्जर, अजमेर सिंह, जियालाल, सुरेश कुमार, अमरजीत, धनराज भांबी, योगेश कुमार। इनमें से 12 लोग यूनियन पदाधिकारी थे जबकि जियालाल यूनियन से बाहर था। धारा 323,325,452,147,148,149 के तहत रामशबद, इकबाल सिंह, जोगिंद्र सिंह, प्रदीप को पांच वर्ष की कैद। धारा 323,325,427,148,149 के तहत दोषी विजयपाल, आनंद, विशाल भारत, सुनील कुमार, प्रवीन कुमार, कृष्ण लंगड़ा, विरेंद्र सिंह, हरमिंदर सिंह सैनी, कृष्ण कुमार, शिवाजी, नवीन, सुरेंद्र पाल, प्रदीप कुमार, नवीन को अब तक काटी गई सजा के आधार पर रिहा करने के आदेश। गौरतलब है कि 18 जुलाई 2012 को श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान हुई आगजनी और हिंसा में मारुति सुजुकी के जनरल मैनेजर (एचआर) अवनीश देव की आग में जलने से मौत हो गई थी। हिंसा में करीब 100 लोग घायल भी हुए थे। 18 जुलाई को हड़ताल के दौरान हिंसा के आरोप में 148 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया था। गुरुग्राम अदालत द्वारा 18 जुलाई, 2012 की हिंसा मामले में कंपनी के 13 कर्मचारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने विरोध में कर्मचारियों ने टूल डाउन का निर्णय लिया। मारुति के सभी छह प्लांटों में शनिवार रात 9 से रात 10 बजे तक टूल डाउन (काम बिल्कुल ठप) रहा। अदालत द्वारा सजा की घोषण के बाद श्रमिकों ने लघु सचिवालय परिसर स्थित पार्क में एक बैठक की। इसमें गुरुग्राम, मानेसर, बावल, धारूहेड़ा व नीमराणा तक के श्रमिक यूनियन के लोगों ने सर्वसम्मति से टूल डाउन का निर्णय लिया। कर्मचारी यूनियनों द्वारा बैठक के दौरान अदालत के निर्णय के विरोध में रोष जताया गया। मारुति उद्योग कामगार यूनियन के महासचिव कुलदीप जांघू ने कहा कि टूल डाउन का निर्णय बैठक में शामिल लोगों ने एकमत होकर लिया है। सभी शांतिपूर्ण ढंग से काम को एक घंटे तक पूरी तरह से बंद रखा। सीटू के प्रदेश अध्यक्ष सतबीर सिंह ने कहा कि श्रमिकों के साथ बड़ा अन्याय हुआ है। ठोस सबूत नहीं होने के बाद भी आजीवन कारावास जैसी सजा काफी हैरान करने वाली है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक की लड़ाई लड़ी जाएगी। एटक के जिला महामंत्री ने कहा कि श्रमिक अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक ढंग से लड़ेंगे। मारुति के मानेसर और उद्योग विहार प्लांट में एक घंटे के टूल डाउन से करीब 400 कारों का उत्पादन प्रभावित हुआ। मारुति के जिन प्लांटों में एक घंटा टूल डाउन रहे, उसमें मारुति का मानेसर प्लांट, उद्योग विहार प्लांट, मारुति पावर ट्रेन, सुजुकी मोटरसाइकिल, वेलसोनिका व एमएमआई ऑटोकंपोनेंट के नाम शामिल हैं।

Friday, March 17, 2017

फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष में शहीद हुई अमेरिकी युवती राचेल की याद में

16 मार्च 2003 के ‌दिन इजरायली सेनाओं ने राफाह में 23 साल की एक बेहद नेकदिल अमेरिकी सोशल एक्टिविस्ट राचेल कूरी की बुलडोजर से कुचलकर बेरहमी से हत्या कर दी थी। हर आज हम उसे याद करते हैं कि किस तरह उसने अपनी जिंदगी को जिया और किस तरह वह न्याय के लिए शहीद हो गई। बिना दुखी हुए, उसकी यादों, उसके सपनों को दिल में जिंदा रखते हुए। हमें उस पर गर्व है। हम उसे प्यार करते हैं, उसके न रहने के बाद भी। उसका सपना जो लाखों लोगों की जिंदगी की बेहतरी से जुड़ा था, उसे अपनी आंखों में जिंदा रखते हुए। जब राचेल पांचवीं में थी तो उसने अपनी कक्षा के साथियों के बीच भाषण दिया था। उसे सुनिए, तो खुद ही समझ जाएंगे कि वह बचपन से ही दूसरों की कितनी फिक्र किया करती थी। वीडियो देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें- https://youtu.be/iz0Vef4Fu8U) पांचवी कक्षा की महज 10 साल की राचेल वीडियो में दुनिया में भुखमरी पर अपनी‌ चिंता जताती है। वह कहती है तीसरी दुनिया के लोग उसी तरह सोचते हैं, दूसरों का खयाल रखते हैं और हंसते व रोते हैं, जैसे हम। वह गरीब मुल्कों की जनता के दुखों से परेशान होती थी।
फिलिस्तीनी जनता ने स्वतंत्रता, न्याय और शांति के लिए अनगिनत कुर्बानियां दी हैं। वे मानवता के बेहतर भविष्य के लिए शहीद हुए। यह सिलसिला ‌आज भी रुका नहीं है। हम अपने बाटनिकल गार्डेन में शहीदों के नाम पर प्रतिदन एक पौधे को रोपते हैं। आज हमले प्यारी राचेल के नाम पर एक पौधा लगाया है। राचेल को इसलिए भी आज याद करना जरूरी है क्योंकि उसने अमेरिका की नागरिक होकर भी फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष को न सिर्फ पूरा समर्थन दिया, वरन वह उसके लिए शहीद हो गई। उसने हमेशा अमेरिका की विदेश नीति का विरोध गया। उसने अमेरिकी दादागीरी और तीसरी दुनिया के देशों की जनता की लूट का विरोध किया। इसलिए भी राचेल को याद किया जाना जरूरी है। वह अभी युवा थी, उसके पास पूरी जिंदगी थी, लेकिन उसने न्याय के लिए शहादत ही। इसलिए वह न सिर्फ अमेरिका और फिलिस्तीन वरन तीसरी दुनिया के युवाओं को भी उसे अपना रोल मॉडल बनाना चाहिए। राचेल के पिता क्रैग कहते हैं, मैं उसका पिता हूं, लेकिन उसके न रहने पर भी जिस तरह लोग उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करते हैं, यह देखकर मैं भावुक हो जाता हूं। मुझे अपनी बेटी पर नाज है। राचेल की मां सिंडी कूरी कहती हैं वह आज हमारे बीच नहीं है। हम उसे रोज याद करते हैं। उसका सपना अब हम दोनों का सपना बन गया है। (यह लेख फिलिस्तीन के मशहूर लेखकर मजीन कमसिएह का है। वे फिलिस्तीन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के निदेशक, सामाजिक कार्यकर्ता, और इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीनी जनता के संघर्ष पर कई किताबों के लेखक हैं। अनुवादः देवेंद्र प्रताप)

Thursday, March 16, 2017

घाटी में फिर से पत्रकारों पर टूटा पुलिस का कहर

पत्रकारों के लिए घाटी में काम कर पाना दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा है। वे आतंकवाद और सुरक्षाबलों के बीच पिसते रहते हैं। वीरवार को श्रीनगर के हैदरपोरा स्थित हुर्रियत नेता सैयद अली के घर के बाहर पुलिस ने जिस तरह से पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा वह अब घाटी में आम बात हो गई है। श्रीनगर के हैदरपोरा में हुर्रियत नेता सैयद अली शाल गिलानी के आवास पर अन्य हुर्रियत नेताओं मीरवाइज उमर फारूक और मोहम्मद यासीन मलिक की संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस को कवर कर रहे प्रेस फोटो ग्राफरों पर वीरवार को फिर से पुलिस का कहर टूटा। पुलिस ने पत्रकारों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। पुलिस की इस दमनात्मक कार्रवाई के बाद कश्मीर प्रेस फोटोग्राफर्स एसोसिएशन (केपीपीए) ने एक आपात मीटिंग बुलाकर कड़ी निंदा की है। पुलिस की इस कार्रवाई में एएफपी के फोटो जर्नलिस्ट तौसीफ मुस्तफा, ग्रेटर कश्मीर अखबार के मुबस्सिर खान समेत कई पत्रकार घायल हुए हैं। केपीपीए के जनरल सेक्रेटरी के मुताबिक पुलिस ने एएफपी के फोटोजर्नलिस्ट का गला दबाया,जिससे उनको सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। उन्होंने बताया कि उनके पास सबूत के तौर पर पुलिस की इस कार्रवाई का वीडियो और फोटो भी है। उन्होंने बताया कि इतना ही नहीं पुलिस के रक्षक वाहन के ड्राइवर ने जहां फोटो जर्नलिस्ट खड़े थे उनकी तरफ वाहन को दौड़ा दिया। वाहन के नीचे आने से बचने के लिए फोटो जर्नलिस्ट इधर-उधर भागने लगे। वाहन से कुचलकर ग्रेटर कश्मीर के फोटो जर्नलिस्ट खान का पैर कुचल गया। डीएनए के इमरान निसार के साथ भी पुलिस ने गालीगलौज और धक्कामुक्की की। यूरोपियन फोटो एजेंसी के फोटो जर्ललिस्ट फारूक जावेद खान, इंडियन एक्सप्रेस के एस मसूदी और टाइम्स नाऊ के फोटो जर्नलिस्ट उमर शेख पुलिस की पिटाई में बुरी तरह घायल हुए हैं। केपीपीए के बयान में कहा गया है कि डीओ ने फोटो जर्नलिस्टों को धमकी देते हुए कहा कि वे एसओजी से हैं और उनकी हत्या से भी नहीं हिचकेंगे। पुलिस की पिटाई में डीएनए के इमरान निसार भी बुरी तरह जख्मी हुए हैं। इसके खिलाफ केपीपीए ने श्रीनगर के प्रेस्‍ा क्लब में प्रदर्शन किया और डीओ हुमहामा और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने इस घटना के खिलाफ देश के पूरी पत्रकार बिरादरी से शनिवार को होने वाले विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। कश्मीर एडिटर्स गिल्ड (केएडी) ने भी फोटो जर्नलिस्टों के साथ की गई पुलिसिया बर्बरता का विरोध किया है। केएडी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि सैयद अली शाह गिलानी के आवास से जब तीनों नेता बाहर आए तो बाहर पत्रकार इंतजार कर रहे थे। जैसे ही वे बाहर आए तो पुलिस उनको गिरफ्तार करने लगी। फोटो जर्नलिस्टों ने तुरंत फोटो खींचना शुरू कर दिया। इसके बाद वहां मौजूद पुलिस ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। केएडी की तरफ से इसकी घोर निंदा करते हुए कहा गया है कि यह देश का दुर्भाग्य है कि प्रेस वालों के साथ घाटी में इस तरह का व्यवहार आम बात हो गई है। इसके पहले बिजबिहाड़ा में एक सुरक्षाकर्मी की तरह से गोली चलाने से एक प्रेसकर्मी कई हफ्तों तक टूटे हाथ के साथ अस्पताल में भर्ती रहा। हुर्रियत एम ने भी इसे प्रेस और लोकतंत्र पर हमला करार दिया है।

Friday, March 10, 2017

मारुती: तो ठहरा दिया 31 मज़दूरों को दोषी

(सुमित) ⁠⁠⁠
मारूति मामले में आज कोर्ट का फैसला आ गया। 148 लोग जो जेल में थे , उनमें से 31 को दोषी करार दिया गया और 117 लोग जो जेल में चार साल की सजा भुगत चुके थे आरोपमुक्त कर दिया गया। 31 में से 13 लोगों पर ह्त्या, ह्त्या के प्रयास, आगजनी, षडयंत्र का आरोप तय हुआ। बाकि 18 पर मारपीट, चोट पहुंचाने और अनाधिकृत प्रवेश, जमघट लगाने का आरोप तय हुआ है। 31 दोषी मजदूरों में से 13 मज़दूरों राममेहर, संदीप ढिलों, राम विलास, सरबजीत, पवन कुमार, सोहन कुमार, अजमेर सिंह, सुरेश कुमार, अमरजीत, धनराज, योगेश, प्रदीप गुर्जर, जियालाल को 302, 307, 427,436, 323, 325, 341, 452, 201,120B जैसी धाराओं के अंतर्गत दोषी ठहराया गया है। इसमें मारूति यूनियन बॉडी मेम्बर सहित जियालाल शामिल हैं। दूसरी कैटेगरी में शामिल 14 लोगों को धारा 323,325,148,149,341,427 के तहत आरोपी ठहराया गया है। तीसरी कैटेगरी में शामिल 4 लोगों को धारा 323,425,452, के तहत आरोपी ठहराया गया है। सभी आरोपियों को 17 मार्च को सजा सुनाई जायेगी। ये एक राजनीतिक फ़ैसला था जिसमें तथ्यों के परे जाकर सजा सुनाई गयी है। ये फ़ैसला पूंजीपतियों के पक्ष में ना सिर्फ 148 मारूति मजदूरों, 2500 परिवारों के ख़िलाफ़ है बल्कि पूरे मज़दूर वर्ग खासकर गुड़गांव से नीमराणा तक के औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों के ख़िलाफ़ है। इस फ़ैसले से राज्य सत्ता न्याय वयवस्था का रूख स्पष्ट हो जाता है और सवाल उठता है कि मज़दूर आख़िर किस से न्याय की उम्मीद करें। क्या 13 यूनियन सदस्यों को इसलिए फंसाया गया, सजा दी गयी कि वे मज़दूरों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और मारूति मैनेजमैन्ट की आँख में खटक रहे थे।बचाव पक्ष की अधिवक्ता ने कहा कि माना मानेसर प्लांट के घटनाक्रम में एक व्यक्ति की जान गयी मगर इन 13 लोगों के ख़िलाफ़ बहुत कमज़ोर साक्ष्य है। जिन 117 मजदूरों को आज आरोपमुक्त घोषित किया गया, उन्होनें ने जो चार साल जेल में गुजारे उसका हिसाब कौन देगा, इसके लिए किसी को दोषी ठहराया जाएगा, क्या उनके चार साल कोई वापस लौटा सकता है। इनका दोष मुक्त साबित होना यह दिखाता है कि इनके नाम पूरे घटनाक्रम को दूसरा रूप देने के लिए, मज़दूरों के ख़िलाफ़ झूठा माहौल बनाने के लिए डाला गया था। अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने ये फैसला हाईकोर्ट में कहीं भी टिकने वाला नहीं है हम आगे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में जाएंगे। कल जिस प्रकार से गुड़गांव से लेकर मानेसर तक जिस प्रकार से मजदूरों ने अपने साथियों के समर्थन में खाने का बहिष्कार कर अपनी एकजुटता और ताकत दिखायी वो प्रशासन और प्रबंधन के लिए आगे उठने वाले आंदोलन की एक झलक भर है। आज जिस प्रकार से गुड़गांव कोर्ट से लेकर मानेसर प्लांट तक कदम कदम पर पुलिस तैनात थी वो प्रशासन और प्रबंधन के मज़दूर विरोधी रूख को दर्शाता है। ये लोग मजदूरों के संगठन, उनकी एकजुटता से डरते हैं। आज मानेसर प्लांट के मजदूरों को काफी देर तक प्लांट के अंदर रोककर रखा गया। आज इस फ़ैसले के बाद कमला नेहरू पार्क, गुड़गांव में पुलिस की भारी मौजूदगी में ट्रेड यूनियन की बैठक हुई। जिसमें सभी ने इस अन्यायपूर्ण फ़ैसले की एक स्वर से भर्त्सना की और इसके विरोध में बावल से लेकर गुड़गांव तक की सभी यूनियनों ने आगामी 16 मार्च को लंच बहिष्कार का फ़ैसला किया। साथ ही सब ने होली ना मनाने का फ़ैसला किया। आंदोलन की आगे की रणनीति तय करने के लिए आगामी 15 मार्च को देवीलाल पार्क में ट्रेड यूनियनों की बैठक है। पूरी प्रक्रिया में जिस प्रकार से आरोप गठित हुए, सुनवाई चली वो न्याय व्यवस्था की जटिलता जिससे मजदूरों के फ़ैसले प्रभावित होते हैं को स्पष्ट तरीके से सामने लाती है। सवाल यह है कि गुड़गांव से लेकर बावल तक का मज़दूर आंदोलन इस फ़ैसले से कितना प्रभावित होगा, आंदोलन आगे की रणनीति किस प्रकार तय करेगा.

Thursday, March 9, 2017

मारुति मजदूरों पर कोर्ट का फैसला आज

मारुति सुजुकी मानेसर कंपनी में हुई घटना को साढ़े चार साल बीत चुके हैं और अभी तक भी 11 मजदूर जेल में बंद दिवारों से न्याय की उम्मीद लगाये बैठे हैं। लगभग साठे तीन या चार साल बाद उच्च न्यायालय से 139 मजदूरों को ही जमानत मिल सकी है। अब कानूनी प्रक्रिया तेज हुई है और 10 मार्च को अन्तिम पफैसला आना है। बेगुनाही के पर्याप्त सबूत तो हैं, लेकिन जब शुरू से ही मज़दूरों को दोषी ठहराने की कवायद कम्पनी प्रबंधन से लेकर सरकारें करती रही हैं, जमानत तक देने में नीचे से ऊपर तक अदालत का एक रुख रहा है, तब मज़दूर विरोध्ी किसी फैसले से इंकार नहीं किया जा सकता!
जरा पूरी कवायद पर गौर करें। आम जनसाधरण की सोच को प्रभावित करते हुए कम्पनी ने सरकार के साथ मिलकर बडी आसानी से एक साथ 2300 मजदूरों को काम से निकाल दिया और 148 निर्दोष मजदूरों को अपराध बनाकर जेल में डाल दिया। आज साढ़े चार साल का समय बीत जाने पर भी दोषी और निर्दोष का खेल जारी है। इसी खेल के ऊपर ही इन निर्दोष मजदूरों की जिन्दगी का फैसला होना है। जिन सवालों को हम मजदूरों ने अपने सतत प्रदर्शन के द्वारा लोगो के सामने रखा वही सच्चाई आज कोर्ट में हाजिर है। विदेशी पूँजीनिवेश के चलते और मारुति कंपनी के मुनाफे की सोच में ही हरियाणा सरकार ने 148 मजदूरों की बलि चढा दी। और हर मुकाम पर न्याय की लड़ाई को कुचला जाता रहा। कानूनी कार्रवाई में आज ये बातें सपष्ट रूप में आ चुकी हैं कि कम्पनी ने अपने पूर्व नियोजित षडयंत्रा को 18 जुलाई 2012 को कार्यान्वित किया। न्यायालय की कार्रवाई में ये बातें आ चुकी हैं कि कम्पनी ने 11 बजे ही पुलिस को झगडा होने की कथित आशंका पर बुला लिया था लेकिन विवाद के वक्त पुलिस को कम्पनी के अन्दर आने से रोका। कम्पनी के जिस जनरल मैनेजर दीपक आनन्द ने 55 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई वो सुनवाई के दौरान एक भी मजदूर को पहचान न सका। यह संभव है कि यदि भीड इक्ट्ठा हो और झगडा हो रहा हो तो हमें किसी का चेहरा ध्यान में रहे लेकिन इस मामले में दीपक आनन्द 2000 लोगों में से 55 लोगों को उनके नाम से जानता था लेकिन चेहरा किसी का भी याद नहीं था? झगडे के समय कम्पनी के चार ठेकेदारों ने 89 मजदूरों को तोड़फोड़ करते हुए देखा। पहला गवाह कहता है कि उसने 'अ* से व 'ग' से शुरू होने वाले नाम के 16 लडकों को एक जगह वारदात करते हुए देखा। ऐसे ही दूसरे ने 'ग' व 'प' नाम के, तीसरे नें 'प' से लेकर 'स' तक व चैथे गवाह ने 'स' से 'य' तक के नाम वाले मजदूरों को देखा। मतलब यह है कि पहले मजदूरांे ने अपने आप को नाम के पहले अक्षर के हिसाब से जुटाया फिर मारपीट की? सभी चार गवाहों ने एक भी ऐसे मजदूर को नहीं पहचाना जिनका नाम लिया था? दीपक आनन्द के एफआईआर में दर्ज है कि 400-500 मजदूरों ने हाथों में सरिया, राड, बेलचा, डंडा लेकर मैनेजमेंट को पीटा लेकिन गवाही में बताया कि मजदूरों के हाथों में डोर बीम व शाॅकर थे? लगभग सभी गवाह कोर्ट में अपने ऊपर हमला करने वाले व्यक्ति को पहचान न पाये जबकि सभी ने नाम व पते के साथ उनकी शिकायत की थी। यही नहीं कंपनी के गवाह शलिल बिहारी ने, जिस जीया लाल को घटना के दिन बुलाकर उसकी जाँच की थी, कोर्ट में उसकी जगह किसी दूसरे को पहचाना। जिन गवाहों द्वारा आग लगाते हुए देखने की बात थी वे भी किसी को भी पहचान नहीं पाये। अवनीश देव की लाश कमरे के अन्दर मिली लेकिन गवाहों ने कहा कि आग कमरे के बाहर लगाई गई और बताया कि दो लागों ने अवनीश देव को दोनो हाथों से पकडा व अन्य ने उसको पांव पर मारा, मतलब कि किसी का इरादा जान से मारने का नहीं बना। अपने ऊपर हुए हमले में गवाहों ने कहा कि गुस्साए मजदूरों के सिर पर खून सवार था और हाथों में हथियार लेकर एक आदमी के ऊपर कई लोग वार कर रहे थे, लेकिन साथ ही कहा कि उनको किसी ने नहीं छुड़ाया बल्कि मजदूरों ने अपने आप ही छोड़ दिया। चार पांच लोगों द्वारा इकट्ठा होकर किसी को मारना और उसको थोडा सा पीटकर छोडना कत्ल का इरादा कैसे हो सकता है जब उनको बचाने वाला कोई ना हो? अवनीश देव की मेेडिकल रिपोर्ट में साफ लिखा है कि उसकी मौत दम घुटने से हुई और यह बात अभी तक भी सिद्ध नहीं हुई कि आग किसने और कैसे लगाई? जिस कमरे मेें आग लगी जहाँ पर सबकुछ जलकर राख हो गया लेकिन वहाँ पर माचिस की डिब्बी न तो जली और ना उस पर जरा सा भी जलने का कोई निशान मिला। पुलिस ने बतौर सबूत प्रत्येक मज़दूर के घर से हथियार के रूप में डोर बीम और शाॅकर की बरामदगी दिखायी। यानी मारकर उस हथियार को वह अपने घर ले गया? इसी तरह के सैंकडों सवाल मौजूद हैं जो यह दिखाते हैं कि कम्पनी ने कैसे मजदूरों के संगठन को तोडने के लिये योजनाबद्ध तरीके से अपने एक मैनेजर को कुर्बान कर मजदूरों को जेल में पहुंचा दिया। सरकार व कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल कर इतने लम्बे समय तक मजदूरों को जेल में रखकर अन्य उद्योगों के मजदूरों के सामने ऐसे पेश करना कि अगर वे संगठित होने का प्रयास करेंगे तो उनके साथ भी मारुति मजदूरों जैसा बर्ताव होगा। यह सबक पूंजीपति अपने इस कारनामें को अंजाम देकर उदाहरण के रूप में हम मजदूरों को देना चाहता है।जहाँ अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए ही पाँच साल से भी ज्यादा समय लग जाता हो वहाँ न्याय कैसा होगा इसकी हम कल्पना कर सकते हैं? हम आज अपनी आलोचना कर सकते हैं कि जहाँ पूंजीपति वर्ग अपने काम को अंजाम देने के लिए एकजुट है वहीं हम देश की 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी होने पर भी अपने हकों को बचा नहीं पा रहे हैं। आज भी हम अपने निजी स्वार्थों के चलते सिर्फ वर्गहित को अनदेखा कर व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता देते हैं। मारुति मजदूरों की लड़ाई आज भी जारी है और यह लड़ाई अपने संगठन की लड़ाई से बदलकर एक वर्ग की लड़ाई बन गयी है। जहाँ पूँजीपतिवर्ग तो खुलेआम इसे वर्गसंघर्ष कहता है लेकिन मजदूर वर्ग के लिए ये सिर्फ मारुति मजदूरों की लड़ाई बनकर रह गयी है। भले ही इस संघर्ष को हम मारुति मजदूर एक व्यापक संघर्ष में तब्दील ना कर पाये हों लेकिन इस संघर्ष में अन्य मजदूर वर्ग व उसके प्रतिनिधियों की क्या भूमिका रही ये सवाल भी इतिहास में हमेशा जीवित रहेगा! ('संघर्षरत मेहनतकश' जनवरी-मार्च,2017 में प्रकाशित राम निवास का लेख्‍ा)

Monday, March 6, 2017

आइए, प्रधानमंत्री मोदी की भाषा समझते हैं

‘मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा, मैं तो फक़ीर हूं’, ‘वे मुझे मार डालेंगे, मुझे थप्पड़ मार देना’, ‘मुझे लात मार कर सत्ता से हटा देना’, ‘मुझे फांसी पर चढ़ा देना’, ‘मुझे उलटा लटका देना’, ‘मुझे चौराहे पर जूते मारना’…. ये सब मोदी क्यों बोलते हैं? बात 1962 के चीनी हमले के बाद की है. चीन ने भारत पर हमला कर एक बडे भू-भाग पर कब्ज़ा कर लिया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन की तरफ से मिले इस धोखे से बुरी तरह आहत थे. संसद में चीनी हमले को लेकर बहस हो रही थी. नेफा पर चीन के कब्जे को लेकर नेहरू ने कह दिया कि वह तो बंजर इलाका है, वहां घास का एक तिनका तक नहीं उगता. उनके इस कथन पर उन्हें टोकते हुए विपक्ष के दिग्गज सांसद महावीर त्यागी ने जवाबी सवाल दागा, ‘पंडित जी, आपके सिर पर भी एक बाल नहीं उगता तो क्या उसे भी चीन को भेंट कर देंगे?’ शायद नेहरू को भी तत्काल अहसास हो गया था कि उन्होंने कमज़ोर और ग़लत दलील पेश कर दी है, लिहाज़ा उन्होंने अपने मूल स्वभाव के मुताबिक कुतर्क के उस सिलसिले को आगे बढ़ाए बगैर अपना भाषण पूरा किया. सदन में न तो नेहरू के कथन पर और न ही महावीर त्यागी के जवाबी कथन पर कोई हंगामा या नारेबाज़ी हुई. उपरोक्त वाकये को सामने रखते हुए क्या हम हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री से वैसी ही राजनीतिक शराफत या संसदीय शालीनता की उम्मीद कर सकते हैं, जैसी नेहरू ने दिखाई थी? सिर्फ नेहरू ही क्यों, उनके बाद लालबहादुर शास्त्री से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक किसी भी प्रधानमंत्री के बाकी कामकाज का रिकॉर्ड चाहे जैसा रहा हो लेकिन किसी ने भी संसद में अपने विरोधियों के खिलाफ कभी कोई छिछला कटाक्ष नहीं किया. इंदिरा गांधी ने तो उस समय भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी जब उनके पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर संसद में डॉ. राममनोहर लोहिया ने उन पर कटाक्ष करते हुए उन्हें ‘गूंगी गुड़िया’ की उपमा से नवाजा था. यही नहीं, लोहिया ने तो उन पर यह कह कर भी करारा व्यंग्य किया था कि ‘चलो, अब देश के लोगों को रोजाना सुबह अख़बारों में कम से कम एक सुंदर चेहरा तो देखने का मिलेगा.’ इस सिलसिले में मनमोहन सिंह का तो ज़िक्र करने का तो कोई मतलब ही नहीं, क्योंकि उनकी तो ख्याति ही न बोलने वाले प्रधानमंत्री की रही है. उनके सारे भाषण बेहद छोटे,सीधे-सपाट और कामकाजी ही होते थे लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अंदाज़ इन सबसे अलग है. संसद में हो या संसद के बाहर किसी सरकारी कार्यक्रम में या किसी चुनावी रैली में या विदेशी धरती पर, सब जगह उनके भाषण की भाषा एक जैसी होती है जिसमें वे अपने विरोधियों पर कटाक्ष करने से नहीं चूकते हैं. कभी-कभी तो वे ऐसा करते हुए राजनीतिक शालीनता और प्रधानमंत्री पद की मर्यादा को लांघने से भी परहेज नहीं करते. ताज़ा संदर्भ है संसद के बजट सत्र में प्रधानमंत्री का भाषण. धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस के जवाब में मोदी के दोनों सदनों में दिए गए भाषणों को तथ्यपरक जानकारियों के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष पर की गई छिछली टिप्पणियों के लिए याद किया जा रहा है. माना कि मोदी के अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर रेनकोट वाले कटाक्ष में ऐसा कुछ नहीं था कि जिस पर कांग्रेस बिफर कर सदन से वॉकआउट कर जाए लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि प्रधानमंत्री के पद से एक पूर्व प्रधानमंत्री पर यह बेहद निम्न स्तरीय कटाक्ष था. ऐसा इसलिए भी कि उन्होंने संकेत या मुहावरे के जरिये पूर्व प्रधानमंत्री पर बगैर किसी प्रमाण या हवाले के घोटालों में लिप्त होने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा तथा संरक्षण देने का आरोप मढ़ा था. वैसे संसद हो या संसद के बाहर, भारतीय राजनीति में भाषा का पतन कोई नई परिघटना नहीं है. इसलिए इसका ‘श्रेय’ अकेले मोदी को नहीं दिया जा सकता. उनसे भी पहले कई नेता हो चुके हैं जो राजनीतिक विमर्श या संवाद का स्तर गिराने में अपना ‘योगदान’ दे चुके हैं. मोदी तो उस सिलसिले को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. ऐसा नहीं कि यह काम उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू किया हो, गुजरात में अपने मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान भी कॉरपोरेटी क्रूरता और सांप्रदायिक कट्टरता के नायाब रसायन से तैयार अपने राजनीतिक शब्दकोष का इस्तेमाल वे अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए बड़े मुग्ध भाव से करते रहे. 2007 के विधानसभा चुनाव में तो उन्होंने ‘पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद’ पर अपने भाषणों में अपनी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्टपति परवेज़ मुशर्रफ़ को तराज़ू के एक ही पलड़े पर रखते हुए ऐसा माहौल बना दिया था मानो विधानसभा का चुनाव नहीं बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच युध्द हो रहा हो. उसी दौरान उन्होंने 2002 की भीषणतम सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के राहत शिविरों को ‘बच्चे पैदा करने के कारखाने’ और मुस्लिम महिलाओं को उस कारखाने की मशीन बताने जैसे बेहद घृणित बयानों से भी परहेज नहीं किया. अपने ऐसे ही नफ़रत भरे ज़हरीले बयानों के दम पर मोदी तो गुजरात में हिंदू ह्रदय सम्राट बनने में कामयाब हो गए मगर गांधी और सरदार पटेल के गुजरात का भाईचारा और गौरवमयी चेहरा तहस-नहस हो गया. अपनी इसी नफ़रतपरस्त राजनीति और बड़े पूंजी घरानों के सहारे वे 2013 आते-आते भाजपा के पोस्टर ब्वॉय और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी बन गए, लेकिन उनकी भाषा और लहज़े में गिरावट का सिलसिला तब भी नहीं थमा. शिमला की एक सभा में कांग्रेस नेता शशि थरुर की पत्नी के लिए उनके मुंह से निकली ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’ जैसी भद्दी उक्ति को कौन भूल सकता है! उनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद कई लोगों को उम्मीद थी कि अब शायद उनकी राजनीतिक विमर्श की भाषा में कुछ संयम और संतुलन आ जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. शायद भीषण आत्ममुग्धता से ग्रस्त मोदी अपनी कर्कश भाषा और भाषण शैली को ही अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी और अपनी सफलता का सूत्र मानते हैं. यही वजह है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके भाषिक विचलन में और तेजी आ गई. दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उन्होंने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को नक्सलियों की जमात, केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट, एके 47 और उपद्रवी गोत्र का बताया. बिहार के चुनाव में तो उन्होंने नीतीश कुमार के डीएनए में भी गड़बड़ी ढूंढ़ ली. मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कभी देखने-सुनने और पढ़ने में नहीं आया कि किसी प्रधानमंत्री ने किसी चुनाव में अपनी जाति का उल्लेख करते हुए किसी जाति विशेष से वोट मांगे हो, लेकिन मोदी ने बिहार के चुनाव में यह ‘महान’ काम भी बिना संकोच किया. किसी सभा में उन्होंने अपने को पिछड़ी जाति का तो किसी सभा में अति पिछड़ी जाति का बताया. यहां तक कि एक दलित बहुल चुनाव क्षेत्र में वे दलित मां की कोख़ से पैदा हुए बेटे भी बन गए. इस समय उत्तर प्रदेश की चुनावी सभाओं में तो वे मथुरा (उत्तर प्रदेश) से द्वारका (गुजरात) का रिश्ता बताते हुए एक जाति विशेष को आकर्षित करने के लिए खुद को कृष्ण का कलियुगी अवतार बताने से भी नहीं चूक रहे हैं. दरअसल, उत्तर प्रदेश के चुनाव में मोदी का हर भाषण राजनीतिक विमर्श के पतन का नया कीर्तिमान रच रहा है. मसलन एक रैली में उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के हर गांव में कब्रिस्तान तो है मगर श्मशान नहीं है, जो कि होना चाहिए. चुनाव को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की भौंडी कोशिश के तहत वे यहीं नहीं रुके. उन्होंने कहा कि सूबे के लोगों को अगर रमज़ान और ईद के मौके पर बिना रुकावट के बिजली मिलती है तो दीपावली और होली पर भी मिलनी चाहिए। मोदी अपने इन विभाजनकारी सस्ते संवादों पर आई हुई और लाई गई भीड़ के बीच बैठे अपने समर्थकों की तालियां भले ही बटोर लेते हो, लेकिन आमतौर पर इससे संदेश यही जाता है कि चुनावी बाज़ी जीतने के लिए व्याकुल प्रधानमंत्री का यह एक हताशा भरा बयान है. इतिहास, विज्ञान और देश-दुनिया के बारे में प्रधानमंत्री के सामान्य ज्ञान का तो कहना ही क्या! बिहार के ही चुनाव में उन्होंने इतिहास की अतल गहराई में जाकर सिकंदर के बिहार पहुंचने की गाथा सुनाई थी और तक्षशिला को भी बिहार में ढूंढ़ निकाला था. भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सम्मेलन में इंसान की गर्दन पर हाथी का सिर बिठाने का विज्ञान भी वे समझा चुके हैं और यह भी बता चुके हैं कि पुष्पक विमान के रूप में हवाई जहाज का आविष्कार भी भारत भूमि पर हमारे पौराणिक कथा नायक बहुत पहले ही कर चुके हैं. चुनावी रैलियों से अलग देश-विदेश में अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी मोदी की भाषाई दरिद्रता के दिग्दर्शन होते रहते हैं. याद नहीं आता कि विदेशी धरती पर जाकर अपने राजनीतिक विरोधियों को कोसने या उनकी खिल्ली उड़ाने का काम मोदी से पहले किसी और प्रधानमंत्री ने किया हो. कोई प्रधानमंत्री अपने कामकाज को लेकर आलोचना से परे नहीं रहा है, मोदी भी नहीं हो सकते. लेकिन विमुद्रीकरण यानी नोटबंदी के फैसले से देशभर में फैली आर्थिक अफरा-तफरी और आम आदमी को हुई तकलीफों को लेकर जब उनकी चौतरफा आलोचना हुई तो जरा देखिए कि उन्होंने अलग-अलग मौकों पर किस अंदाज में और किस भाषा में उन आलोचनाओं का जवाब दिया… उन्होंने कहा- ‘मुझ पर ज़ुल्म हो रहे हैं’, ‘मेरे विरोधी मुझे बर्बाद करने पर तुले हैं’, ‘मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा, मैं तो फक़ीर हूं’, ‘वे मुझे मार डालेंगे, मुझे थप्पड़ मार देना’, ‘मुझे लात मार कर सत्ता से हटा देना’, ‘मुझे फांसी पर चढ़ा देना’, ‘मुझे उलटा लटका देना’, ‘मुझे चौराहे पर जूते मारना’ आदि-आदि. गौ रक्षा के नाम पर जब देशभर में कई जगह दलितों के उत्पीड़न की घटनाएं हुई तो उन्होंने राज्य सरकारों को ऐसी घटनाओं पर सख्ती बरतने का निर्देश देने के बजाय बेहद भौंडे नाटकीय अंदाज में कहा- ‘मेरे दलित भाइयों को मत मारो, भले ही मुझे गोली मार दो.’ चापलूस मंत्रियों, पार्टी नेताओं, भांड मीडिया और फेसबुकिया भक्तों के समूह के अलावा कोई नहीं कह सकता कि यह देश के प्रधानमंत्री की भाषा है. कितना अच्छा होता अगर मोदी भाषा और संवाद के मामले भी उतने ही नफासत पसंद या सुरुचिपूर्ण होते, जितने वे पहनने-ओढ़ने के मामले में हैं. एक देश अपने प्रधानमंत्री से इतनी सामान्य और जायज़ अपेक्षा तो रख ही सकता है. उनका बाकी अंदाज़-ए-हुक़ूमत तो एक अलग बहस की दरकार रखता ही है. BY ANIL JAIN

यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना है: मुनव्वर राना

इस मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इनको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. जब पंडित नेहरू ने मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद से यह कहा था कि हम आपको रामपुर से खड़ा कर रहे हैं. मौलाना ने पूछा कि रामपुर से क्यों? नेहरू कहने लगे क्योंकि वो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. इस पर मौलाना ने कहा कि मैं वहां से खड़ा होना पसंद नहीं करूंगा. मैं हिंदुस्तान का लीडर हूं, मुसलमानों का लीडर नहीं हूं. फिर वे गुरुदासपुर, पंजाब से लड़े और जीतकर लोकसभा में आए थे. अब हम ये नहीं कहते कि भाजपा ने लोकसभा या विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट क्यों नहीं दिया? उन्होंने नहीं दिया या हो सकता है मांगने वाले गए ही न हों. अब अगर वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे का ख़्वाब सही में देखना चाहते थे तो ये होना चाहिए था कि पांच ऐसी सीटों से जो अल्पसंख्यकों की न हों, वहां से पांच मुसलमानों को जितवा कर सदन में पहुंचाते तो उत्तर प्रदेश में ही नहीं, पूरे मुल्क़ में उनकी इज़्ज़त बढ़ती. यह संदेश जाता कि पार्टी वाकई सबका विकास चाहती है. पार्टी की ग़लती ये नहीं है कि उसने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया. पार्टी की ग़लती ये है कि उसे कुछ ऐसे उम्मीदवार जितवाने चाहिए थे जो मुसलमान होते लेकिन मुस्लिम बहुल सीट से न लड़कर ऐसी सीट से लड़ते जहां हिंदू या दूसरी क़ौमें रहती हैं. एक तरफ़ तो भाजपा भी कहती है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है, दूसरी तरफ़ वह मुसलमानों से दूरी बनाकर रखती है. जब मुसलमानों को आप साथ लेंगे ही नहीं तो कैसे मुसलमान आपके साथ आएंगे? मैंने साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाया तो बार-बार ये कहा था कि मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इसको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. ‘मैं दुश्मन ही सही आवाज़ दे मुझको मुहब्बत से, सलीक़े से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है.’ तो बात यह है कि भाजपा मुसलमानों का कुछ सीटों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके यह संदेश दे सकती थी कि उसके प्रति जैसा सोचा जाता है, वह वैसी नहीं है. इससे अच्छा संदेश जाता. एक पार्टी जो सत्ता में है, उसके लिए ये मुश्किल काम नहीं था. लेकिन वे योगी, साक्षी और इस तरह के लोगों को ज़ंजीर के बग़ैर खुला छोड़ देते हैं. हमने तो ये देखा है कि समाज में, घर में, आंगन में कोई भी आदमी ऐसी वैसी बात करता है तो उसे फ़ौरन डांट दिया दिया जाता है. मुहल्ले का कोई आदमी ऐसी बदतमीज़ी करता है तो सभी नाराज़ होते हैं. बजाय इसके कि ऐसे लोगों को डांट-फटकार कर बैठा दिया जाए, अचानक दो पागल क़िस्म के लीडर खड़े हो जाते हैं, बेवकूफ़ी भरे बयान देते हैं और आपकी राय ये होती है कि ये उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है. तो ऐसा व्यक्ति आपके पास क्यों है जो आपके ख़िलाफ़ राय दे रहा हो. इसका मतलब ये है कि आप ये चाहते ही हैं कि इस मुल्क़ में इत्तेहाद होने ही न पाए. इतनी बड़ी जीत लेकर भारतीय जनता पार्टी आई थी, अगर वो चाहती तो सूरत बदल सकती थी. जब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाया तो मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाया था तो मैंने कहा कि मैं अकेले नहीं आऊंगा, और भी बड़े लोगों ने लौटाया है, उनको भी बुलाइए. मुझसे मीडिया ने पूछा कि अगर आप जाएंगे तो प्रधानमंत्री से क्या कहेंगे? हमने कहा, हम कोई बात नहीं करेंगे. हम प्रधानमंत्री का हाथ पकड़ेंगे और उनको दादरी ले जाएंगे. अख़लाक़ के घर के पास ले जाकर उनसे कहेंगे कि ‘काले कपड़े नहीं पहने है तो इतना कर ले, इक ज़रा देर को कमरे में अंधेरा कर ले.’ क्योंकि एक इंसान की मौत एक क़ौम की मौत है, एक क़ौम की मौत एक मुल्क़ की मौत है, एक मुल्क़ की मौत पूरी दुनिया की मौत है. मैं एक शायर और एक हिंदुस्तानी की हैसियत से यही कहना चाहता हूं कि अगर ये चाहें तो सबको मुहब्बत करें और सब इनको मुहब्बत करें. लेकिन ये पूरे मुल्क़ पर हुक़ूमत करना ही नहीं चाहते. ये सिर्फ़ हिंदू पर हुक़ूमत करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हम अपने 65 बरस के तजुर्बे से कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी हुक़ूमत इतिहास के पन्नों में नक़लीपन के साथ भले रह जाए, असल में वो ज़िंदा रहती नहीं है. जैसी राजनीति भाजपा करती है उसका अंजाम ये हो सकता है कि हिंदुस्तान उतना ही रह जाएगा जितने को काउ बेल्ट कहते हैं. ये जो पांच छह सूबे हैं, यही हिंदुस्तान कहलाएगा. जो बंगाली है उसका बंगाल हो जाएगा. जो मद्रासी है उसका मद्रास हो जाएगा. जो असमिया है उसका असम हो जाएगा, जो गुजराती है उसका गुजरात हो जाएगा. बाक़ी हिंदुस्तान उतने ही नक़्शे में रह जाएगा जितने में काउ बेल्ट है. क्योंकि अगर आप एक क़ानून पूरे मुल्क़ में नहीं चला सकते तो ये तय है कि फिर आप पूरे मुल्क़ को एक नहीं रख सकते. आप गोवा में बीफ़ खाने की पूरी इजाज़त देते हैं, लेकिन वही बीफ़ खाता हुआ आदमी मुंबई एयरपोर्ट पर उतर जाए तो उसको 5 साल की सज़ा हो जाती है. इसका मतलब गोवा अलग मुल्क़ है और मुंबई अलग मुल्क़ है! ये तय करना पड़ेगा कि यह पूरा एक मुल्क़ है या जो जहां जैसा चाहे वैसा मुल्क़ है! हमने तो जो नक़्शा देखा है वह तो यही है कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है लेकिन ये नारे लिखवाने से काम नहीं चलता. इस देश में फिलहाल ऐसी कोई सियासी पार्टी नहीं है जो मुसलमानों को यह भरोसा दिला सके कि यह आपका मुल्क है और आप यहां सुरक्षित हैं. हालांकि, वोट के लिए सब ऐसा कहते हैं. लेकिन अगर ऐसा है तो पूरे मुल्क़ में एक बार इस पर भी वोटिंग करा ली जाए कि मुसलमानों को यहां रखना चाहिए या नहीं. तब उन लोगों को अफ़सोस होगा जो ऐसा चाहते हैं क्योंकि 80 प्रतिशत हिंदू कहेंगे कि नहीं, ये हमारे भाई हैं, हमारे जैसे हैं, यहीं पैदा हुए हैं, यहीं रहना है, यहीं जीना-मरना है. ये यहां का चांद देखकर नमाज़ पढ़ते हैं, यहां की ज़मीन पर सज़दा करते हैं, तो ये हमारे साथ यहीं रहेंगे. लेकिन ये जो सियासी लोग हैं ये अपने फ़ायदे के लिए कभी कह देते हैं कि ठीक है, कभी कह देते हैं कि नहीं ठीक है. चुनाव आता है तो दुकानें खुल जाती हैं, वोट बिकते हैं. क्या दाढ़ी वाला, क्या टोपी वाला, चोटी वाला, सबकी ख़रीद-फ़रोख़्त होती है. यह बहुत मौजूं सवाल है कि आज मुसलमानों में मज़बूत लीडरशिप क्यों नहीं है. मेरे ख़्याल से लीडर मांएं नहीं जनतीं, लीडर क़ौमें ख़ुद पैदा कर लेती हैं. हालात लीडर पैदा करते हैं. लीडर बनने के लिए ऐतबार ज़रूरी है, लीडर वह हो सकता है जिसपर लोग ऐतबार करें. मुसलमानों के यहां सूरत-ए-हाल ये हो गई है कि ख़रीद-फ़रोख़्त ने लीडर नहीं बनने दिया. हम आपसे चाहे जैसी बात करें लेकिन मुझे कहीं का मेंबर बना दिया जाए, मुझे लाल बत्ती दे दी जाए तो हम बिक जाते हैं. हम इतने कम दाम में बिकने लगे कि उतने कम दाम में आला ज़ात की तवायफ़ भी नहीं मिलती है. इसलिए हमारे यहां लीडर नहीं पैदा हो पाए. हमने जब साहित्य अकादमी अवार्ड वापस किया था तब हमारी आंखों में वो इंक़लाब था, मेरे लहज़े में वो शफ़्फ़ाकी थी, मेरी आवाज़ में वो अंगारे थे कि 24 घंटे के अंदर मुझे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने मिलने को बुला लिया. लेकिन हमने मना कर दिया. हमने कहा कि अवॉर्ड लौटाने वाले और भी लोग हैं जो ज्ञान में हमसे बड़े हैं, उम्र में हमसे बड़े हैं, उन्हें भी बुलाया जाए. अगर यही लोग कुछ दिन के लिए हमारे साथ खड़े हो जाते तो इस मुल्क़ में कोई भी फ़ैसला हो सकता था. हम चीख़ते रहते हैं कि मुल्क़ में फ़िरक़ापरस्ती का क़ानून होना चाहिए कि जो पकड़ा जाए उसे उसके शहर से एक हज़ार किलोमीटर के फ़ासले पर जेल में रखा जाए. रातों-रात ये जो सोम और बालियान जैसे लीडर पैदा हो जाते हैं, वो इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि वे जेल जाते हैं तो उन्हें छुड़ाने के लिए पचास हज़ार लोग पहुंचते हैं तो वे रातों-रात हीरो हो जाते हैं. इसी तरह कोई मुसलमान ग़ैर-मुसलमान को मार देता है तो उसके साथ दस हज़ार मुसलमान खड़े हो जाते हैं. फिर वो मुसलमानों का लीडर बन जाता है. भगवान एक बच्चा पैदा करने के लिए एक औरत की कोख़ उधार लेता है, नौ महीने इंतज़ार करता है तब एक बच्चा पैदा होता है. हमारे मुल्क़ में एक मुसलमान रात में एक हिंदू को मार दे तो सुबह वह मुसलमानों का लीडर बन जाता है. इसी तरह हिंदू रात में मुसलमान का क़त्ल कर दे तो सुबह हिंदुओं का लीडर हो जाता है. यह इस मुल्क़ के लिए मुफ़ीद नहीं है. मैं तो समझता हूं, जैसा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि इस देश में 25 साल के लिए सैन्य शासन लागू कर देना चाहिए. अभी जो है पूरे मुल्क़ में ख़ौफ़ का आलम रहता है. ज़रा-ज़रा सी बात पर हिंदू-मुस्लिम, जाति, धर्म और दुनिया भर के झगड़े, भ्रष्टाचार, बेईमानियां दूर करने के लिए सेना का शासन ज़रूरी है. देश को सेना के हाथ में दे देना चाहिए और ये जो हर पांच साल में चुनाव होता है, इसे भी बंद कर देना चाहिए. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि चुनाव का कोई मतलब नहीं है. चुनाव में अगर कोई रिक्शेवाला खड़ा न हो सके, कुछ रुपये महीने पाने वाला पत्रकार न खड़ा हो सके, एक जूते गांठने वाला मोची न खड़ा हो सके तो चुनाव का कोई मतलब नहीं. यह तय होना चाहिए कि जिस आदमी की संपत्ति 25 लाख से ज़्यादा हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकता. ये जो 15-20 करोड़ की संपत्ति वाले लोग चुनाव लड़ते हैं, ये उनकी वो रक़म है जो वे काग़ज़ पर दिखाते हैं. आयकर विभाग छापा मारता है तो कहता है कि हमने नौ करोड़ पकड़े, इसका मतलब है कि वह नब्बे करोड़ का आदमी होगा. ये चुनाव और जम्हूरियत बस पैसे वालों का खेल बनकर रह गया है. हमारे ज़माने में मंत्री तक एक टूटी-फूटी जीप में चलते थे. आज तो सभासद भी करोड़ों की गाड़ी में चलता है. बंद एसी गाड़ी में चलने वाले मंत्री को मालूम ही नहीं है कि नंगे पांव चलने वालों की परेशानी क्या होती है. मैं यह लिखना चाहता हूं कि इस मुल्क़ की आबादी 130 करोड़ है. सौ करोड़ यहां पर जानवर रहते हैं. तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा आदि की व्यवस्था है. सौ करोड़ लोग ऐसे है जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा, आवास आदि का कुछ ठीक नहीं है. ये जानवरों की तरह जी रहे हैं. आप जानवरों को भी वोटरों में शामिल कर लेते हैं. इसका मतलब आपको गिनती नहीं आती. आप जानवरों को इंसानों में शामिल कर रहे हैं या फिर इंसानों को जानवरों में शामिल कर रहे हैं. हम तो यही चाहेंगे कि शासन कोई करे, लेकिन हमारा मुल्क़ बचा रहे. उसे नेता चलाए, सेना चलाए, औरत चलाए, मर्द चलाए, लेकिन मुल्क़ सुरक्षित होना चाहिए. हर आदमी सुरक्षित होना चाहिए. इस देश का मुसलमान कभी नहीं कहता कि हमको कोई दाढ़ी वाला प्रधानमंत्री लाकर दे दीजिए. आज़ादी के बाद जिन्ना की वजह से मुसलमान इस बात से अलर्ट हो गया कि उसका लीडर हिंदू ही है. ये जो झोलाछाप ओवैसी वगैरह हैं, ये तो वोटकटवा हैं, बकौल लालू प्रसाद यादव. ये सिर्फ़ मुसलमान का वोट काटकर किसी को जितवा देते हैं. इनको इसी बात का पैसा मिलता है. कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहता कि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए. वह तो सिर्फ़ यह चाहता है कि दंगे न हों. बिहार में मुसलमानों ने नीतीश की सरकार बनाई तो उसे विश्वास है कि वे दंगा नहीं होने देंगे. यूपी में आज मुसलमान मायावती की तरफ़ देख रहे हैं क्योंकि उनको यह पता है कि मायावती के शासन में दंगा नहीं होता. ऐसी ही इंदिरा गांधी की हुक़ूमत थी. अगर इंदिरा गांधी को बाबरी मस्ज़िद गिरानी होती तो वे ख़ुद जहाज़ में बैठतीं और बम फिंकवा देतीं. अगर नहीं गिरानी होती तो चाहे दस हज़ार लोगों को मारना पड़ता, वे वहां किसी को दाख़िल नहीं होने देतीं. हुक़ूमतें ऐसी ही चलती हैं. आप औरंगज़ेब को गाली देते हैं लेकिन इतिहास पढ़िए तो सबसे बड़ा हिंदुस्तान तो उसी की हुक़ूमत में था. म्यांमार से नेपाल, गोवा, काबुल, कंधार, ये सब उसी की हुक़ूमत में थे. ज़ाहिर-सी बात है कि मुग़लों ने इतनी बड़ी-बड़ी हुक़ूमतें बना दी थीं तो क्यों बना दी थीं? क्योंकि उनको इस मुल्क़ से मुहब्बत हो गई थी. वरना ऐसा भी हो सकता था कि वे हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा रखते लेकिन अपना हेडक्वार्टर क़ाबुल में बना लेते. लेकिन वे हिंदुस्तान आए और इसी मिट्टी में दफ़्न हो गए. हम कहते हैं कि हिंदुस्तान का जो आदमी यह दावा करता है कि हम बहुत बड़े राष्ट्रवादी हैं वह जहां जी चाहे हमसे बैठकर बात कर ले. इंशाअल्लाह, वह राष्ट्रद्रोही निकलेगा, राष्ट्रवादी हमीं निकलेंगे. आप कहते हैं कि भारत माता की जय, अरे साहब हम तो दिन में 94 बार नमाज़ पढ़कर इस मिट्टी पर सज़दा करते हैं और इस मिट्टी को चूमते हैं. क्या इतनी बार इस मिट्टी को आप भी चूमते हैं? जिस दिन आप सौ बार चूमने लगें तब कहिएगा कि आप हमसे बड़े हिंदुस्तानी हैं. जब बंटवारा हुआ, हमारे पुरखों ने कहा कि हम पाकिस्तान नहीं जाएंगे. यह हमारी सरज़मीं है, हम अपने पुरखों की क़ब्र के पास बैठे रहेंगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएंगे. अब आज हालत यह है कि कोई झूठा मसला होता है बस अख़बार में छप जाता है कि फलां आदमी आतंकवादी है, इसके तार वहां से हैं, इसको इतना पैसा आया है. उसे पकड़ कर बंद कर देते हैं. सब मान लेते हैं कि वह आतंकवादी है. इस देश की दशा इतनी ख़राब है कि अगर आज पुलिस मुझे पकड़ ले कि यह आतंकवादी है तो लोग मान लेंगे कि हां यह आतंकवादी होगा. जब 12 बरस बाद हमको छोड़ा जाएगा तब तक हम अपने पांव पर चलने लायक नहीं बचेंगे. ऐसा सैकड़ों नौजवानों के साथ हो चुका है. क़ानून यह होना चाहिए कि जब आप किसी को 12 बरस या 20 बरस बाद बेक़सूर कहकर छोड़ रहे हैं तो उसे 50 करोड़ का हर्ज़ाना भी देना चाहिए. पुलिस एक 18 बरस के लड़के को पकड़ती है, फिर उसे 20 साल बाद बूढ़ा करके छोड़ देती है कि यह निर्दोष है. तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है. जब यहां ऐसा क़ानून चलता है तो यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना हो गया. अगर इस तहख़ाने को हम ठीक नहीं करेंगे तो यह सबके लिए नुकसान करेगा. यहां पर किसी भी मुसलमान को कह देते हैं कि पाकिस्तानी है. अरे आप अरबी कह दीजिए तो हम मान भी लें कि हां, अरब से आए थे. पैदल चल के आए थे. पाकिस्तान से हमारा क्या लेना देना? पाकिस्तान तो जितना हमारा है, उतना ही आपका है. वह तो हिंदुस्तान का हिस्सा था. हमें आप पाकिस्तानी क्यों कहेंगे? अगर हम पाकिस्तानी हैं तो आप पहले पाकिस्तानी हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है. हम तो इस मुल्क़ को मादरे-वतन कहते ही हैं. हमारा मुल्क़ तो ये है ही, हमारी मां भी यही है. यह मां का वतन है और मुसलमान इस मुल्क़ से बेपनाह मोहब्बत करते हैं.