Monday, March 6, 2017

यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना है: मुनव्वर राना

इस मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इनको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. जब पंडित नेहरू ने मौलाना अबुल क़लाम आज़ाद से यह कहा था कि हम आपको रामपुर से खड़ा कर रहे हैं. मौलाना ने पूछा कि रामपुर से क्यों? नेहरू कहने लगे क्योंकि वो मुस्लिम बहुल क्षेत्र है. इस पर मौलाना ने कहा कि मैं वहां से खड़ा होना पसंद नहीं करूंगा. मैं हिंदुस्तान का लीडर हूं, मुसलमानों का लीडर नहीं हूं. फिर वे गुरुदासपुर, पंजाब से लड़े और जीतकर लोकसभा में आए थे. अब हम ये नहीं कहते कि भाजपा ने लोकसभा या विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को टिकट क्यों नहीं दिया? उन्होंने नहीं दिया या हो सकता है मांगने वाले गए ही न हों. अब अगर वे ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे का ख़्वाब सही में देखना चाहते थे तो ये होना चाहिए था कि पांच ऐसी सीटों से जो अल्पसंख्यकों की न हों, वहां से पांच मुसलमानों को जितवा कर सदन में पहुंचाते तो उत्तर प्रदेश में ही नहीं, पूरे मुल्क़ में उनकी इज़्ज़त बढ़ती. यह संदेश जाता कि पार्टी वाकई सबका विकास चाहती है. पार्टी की ग़लती ये नहीं है कि उसने मुसलमानों को टिकट नहीं दिया. पार्टी की ग़लती ये है कि उसे कुछ ऐसे उम्मीदवार जितवाने चाहिए थे जो मुसलमान होते लेकिन मुस्लिम बहुल सीट से न लड़कर ऐसी सीट से लड़ते जहां हिंदू या दूसरी क़ौमें रहती हैं. एक तरफ़ तो भाजपा भी कहती है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है, दूसरी तरफ़ वह मुसलमानों से दूरी बनाकर रखती है. जब मुसलमानों को आप साथ लेंगे ही नहीं तो कैसे मुसलमान आपके साथ आएंगे? मैंने साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाया तो बार-बार ये कहा था कि मुल्क़ में 25 करोड़ मुसलमान हैं, इसको आप कहां फेंकेंगे? समंदर में फेंकेंगे तो समंदर सूख जाएगा. ज़मीन में बोएंगे तो ज़मीन छोटी पड़ जाएगी. इसलिए इसका हल यही है कि इनको अपने सीने से लगाइए. ‘मैं दुश्मन ही सही आवाज़ दे मुझको मुहब्बत से, सलीक़े से बिठाकर देख हड्डी बैठ जाती है.’ तो बात यह है कि भाजपा मुसलमानों का कुछ सीटों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके यह संदेश दे सकती थी कि उसके प्रति जैसा सोचा जाता है, वह वैसी नहीं है. इससे अच्छा संदेश जाता. एक पार्टी जो सत्ता में है, उसके लिए ये मुश्किल काम नहीं था. लेकिन वे योगी, साक्षी और इस तरह के लोगों को ज़ंजीर के बग़ैर खुला छोड़ देते हैं. हमने तो ये देखा है कि समाज में, घर में, आंगन में कोई भी आदमी ऐसी वैसी बात करता है तो उसे फ़ौरन डांट दिया दिया जाता है. मुहल्ले का कोई आदमी ऐसी बदतमीज़ी करता है तो सभी नाराज़ होते हैं. बजाय इसके कि ऐसे लोगों को डांट-फटकार कर बैठा दिया जाए, अचानक दो पागल क़िस्म के लीडर खड़े हो जाते हैं, बेवकूफ़ी भरे बयान देते हैं और आपकी राय ये होती है कि ये उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है. तो ऐसा व्यक्ति आपके पास क्यों है जो आपके ख़िलाफ़ राय दे रहा हो. इसका मतलब ये है कि आप ये चाहते ही हैं कि इस मुल्क़ में इत्तेहाद होने ही न पाए. इतनी बड़ी जीत लेकर भारतीय जनता पार्टी आई थी, अगर वो चाहती तो सूरत बदल सकती थी. जब मैंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाया तो मुझे प्रधानमंत्री ने बुलाया था तो मैंने कहा कि मैं अकेले नहीं आऊंगा, और भी बड़े लोगों ने लौटाया है, उनको भी बुलाइए. मुझसे मीडिया ने पूछा कि अगर आप जाएंगे तो प्रधानमंत्री से क्या कहेंगे? हमने कहा, हम कोई बात नहीं करेंगे. हम प्रधानमंत्री का हाथ पकड़ेंगे और उनको दादरी ले जाएंगे. अख़लाक़ के घर के पास ले जाकर उनसे कहेंगे कि ‘काले कपड़े नहीं पहने है तो इतना कर ले, इक ज़रा देर को कमरे में अंधेरा कर ले.’ क्योंकि एक इंसान की मौत एक क़ौम की मौत है, एक क़ौम की मौत एक मुल्क़ की मौत है, एक मुल्क़ की मौत पूरी दुनिया की मौत है. मैं एक शायर और एक हिंदुस्तानी की हैसियत से यही कहना चाहता हूं कि अगर ये चाहें तो सबको मुहब्बत करें और सब इनको मुहब्बत करें. लेकिन ये पूरे मुल्क़ पर हुक़ूमत करना ही नहीं चाहते. ये सिर्फ़ हिंदू पर हुक़ूमत करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हम अपने 65 बरस के तजुर्बे से कह सकते हैं कि ऐसी कोई भी हुक़ूमत इतिहास के पन्नों में नक़लीपन के साथ भले रह जाए, असल में वो ज़िंदा रहती नहीं है. जैसी राजनीति भाजपा करती है उसका अंजाम ये हो सकता है कि हिंदुस्तान उतना ही रह जाएगा जितने को काउ बेल्ट कहते हैं. ये जो पांच छह सूबे हैं, यही हिंदुस्तान कहलाएगा. जो बंगाली है उसका बंगाल हो जाएगा. जो मद्रासी है उसका मद्रास हो जाएगा. जो असमिया है उसका असम हो जाएगा, जो गुजराती है उसका गुजरात हो जाएगा. बाक़ी हिंदुस्तान उतने ही नक़्शे में रह जाएगा जितने में काउ बेल्ट है. क्योंकि अगर आप एक क़ानून पूरे मुल्क़ में नहीं चला सकते तो ये तय है कि फिर आप पूरे मुल्क़ को एक नहीं रख सकते. आप गोवा में बीफ़ खाने की पूरी इजाज़त देते हैं, लेकिन वही बीफ़ खाता हुआ आदमी मुंबई एयरपोर्ट पर उतर जाए तो उसको 5 साल की सज़ा हो जाती है. इसका मतलब गोवा अलग मुल्क़ है और मुंबई अलग मुल्क़ है! ये तय करना पड़ेगा कि यह पूरा एक मुल्क़ है या जो जहां जैसा चाहे वैसा मुल्क़ है! हमने तो जो नक़्शा देखा है वह तो यही है कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत एक है लेकिन ये नारे लिखवाने से काम नहीं चलता. इस देश में फिलहाल ऐसी कोई सियासी पार्टी नहीं है जो मुसलमानों को यह भरोसा दिला सके कि यह आपका मुल्क है और आप यहां सुरक्षित हैं. हालांकि, वोट के लिए सब ऐसा कहते हैं. लेकिन अगर ऐसा है तो पूरे मुल्क़ में एक बार इस पर भी वोटिंग करा ली जाए कि मुसलमानों को यहां रखना चाहिए या नहीं. तब उन लोगों को अफ़सोस होगा जो ऐसा चाहते हैं क्योंकि 80 प्रतिशत हिंदू कहेंगे कि नहीं, ये हमारे भाई हैं, हमारे जैसे हैं, यहीं पैदा हुए हैं, यहीं रहना है, यहीं जीना-मरना है. ये यहां का चांद देखकर नमाज़ पढ़ते हैं, यहां की ज़मीन पर सज़दा करते हैं, तो ये हमारे साथ यहीं रहेंगे. लेकिन ये जो सियासी लोग हैं ये अपने फ़ायदे के लिए कभी कह देते हैं कि ठीक है, कभी कह देते हैं कि नहीं ठीक है. चुनाव आता है तो दुकानें खुल जाती हैं, वोट बिकते हैं. क्या दाढ़ी वाला, क्या टोपी वाला, चोटी वाला, सबकी ख़रीद-फ़रोख़्त होती है. यह बहुत मौजूं सवाल है कि आज मुसलमानों में मज़बूत लीडरशिप क्यों नहीं है. मेरे ख़्याल से लीडर मांएं नहीं जनतीं, लीडर क़ौमें ख़ुद पैदा कर लेती हैं. हालात लीडर पैदा करते हैं. लीडर बनने के लिए ऐतबार ज़रूरी है, लीडर वह हो सकता है जिसपर लोग ऐतबार करें. मुसलमानों के यहां सूरत-ए-हाल ये हो गई है कि ख़रीद-फ़रोख़्त ने लीडर नहीं बनने दिया. हम आपसे चाहे जैसी बात करें लेकिन मुझे कहीं का मेंबर बना दिया जाए, मुझे लाल बत्ती दे दी जाए तो हम बिक जाते हैं. हम इतने कम दाम में बिकने लगे कि उतने कम दाम में आला ज़ात की तवायफ़ भी नहीं मिलती है. इसलिए हमारे यहां लीडर नहीं पैदा हो पाए. हमने जब साहित्य अकादमी अवार्ड वापस किया था तब हमारी आंखों में वो इंक़लाब था, मेरे लहज़े में वो शफ़्फ़ाकी थी, मेरी आवाज़ में वो अंगारे थे कि 24 घंटे के अंदर मुझे हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने मिलने को बुला लिया. लेकिन हमने मना कर दिया. हमने कहा कि अवॉर्ड लौटाने वाले और भी लोग हैं जो ज्ञान में हमसे बड़े हैं, उम्र में हमसे बड़े हैं, उन्हें भी बुलाया जाए. अगर यही लोग कुछ दिन के लिए हमारे साथ खड़े हो जाते तो इस मुल्क़ में कोई भी फ़ैसला हो सकता था. हम चीख़ते रहते हैं कि मुल्क़ में फ़िरक़ापरस्ती का क़ानून होना चाहिए कि जो पकड़ा जाए उसे उसके शहर से एक हज़ार किलोमीटर के फ़ासले पर जेल में रखा जाए. रातों-रात ये जो सोम और बालियान जैसे लीडर पैदा हो जाते हैं, वो इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि वे जेल जाते हैं तो उन्हें छुड़ाने के लिए पचास हज़ार लोग पहुंचते हैं तो वे रातों-रात हीरो हो जाते हैं. इसी तरह कोई मुसलमान ग़ैर-मुसलमान को मार देता है तो उसके साथ दस हज़ार मुसलमान खड़े हो जाते हैं. फिर वो मुसलमानों का लीडर बन जाता है. भगवान एक बच्चा पैदा करने के लिए एक औरत की कोख़ उधार लेता है, नौ महीने इंतज़ार करता है तब एक बच्चा पैदा होता है. हमारे मुल्क़ में एक मुसलमान रात में एक हिंदू को मार दे तो सुबह वह मुसलमानों का लीडर बन जाता है. इसी तरह हिंदू रात में मुसलमान का क़त्ल कर दे तो सुबह हिंदुओं का लीडर हो जाता है. यह इस मुल्क़ के लिए मुफ़ीद नहीं है. मैं तो समझता हूं, जैसा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि इस देश में 25 साल के लिए सैन्य शासन लागू कर देना चाहिए. अभी जो है पूरे मुल्क़ में ख़ौफ़ का आलम रहता है. ज़रा-ज़रा सी बात पर हिंदू-मुस्लिम, जाति, धर्म और दुनिया भर के झगड़े, भ्रष्टाचार, बेईमानियां दूर करने के लिए सेना का शासन ज़रूरी है. देश को सेना के हाथ में दे देना चाहिए और ये जो हर पांच साल में चुनाव होता है, इसे भी बंद कर देना चाहिए. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि चुनाव का कोई मतलब नहीं है. चुनाव में अगर कोई रिक्शेवाला खड़ा न हो सके, कुछ रुपये महीने पाने वाला पत्रकार न खड़ा हो सके, एक जूते गांठने वाला मोची न खड़ा हो सके तो चुनाव का कोई मतलब नहीं. यह तय होना चाहिए कि जिस आदमी की संपत्ति 25 लाख से ज़्यादा हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकता. ये जो 15-20 करोड़ की संपत्ति वाले लोग चुनाव लड़ते हैं, ये उनकी वो रक़म है जो वे काग़ज़ पर दिखाते हैं. आयकर विभाग छापा मारता है तो कहता है कि हमने नौ करोड़ पकड़े, इसका मतलब है कि वह नब्बे करोड़ का आदमी होगा. ये चुनाव और जम्हूरियत बस पैसे वालों का खेल बनकर रह गया है. हमारे ज़माने में मंत्री तक एक टूटी-फूटी जीप में चलते थे. आज तो सभासद भी करोड़ों की गाड़ी में चलता है. बंद एसी गाड़ी में चलने वाले मंत्री को मालूम ही नहीं है कि नंगे पांव चलने वालों की परेशानी क्या होती है. मैं यह लिखना चाहता हूं कि इस मुल्क़ की आबादी 130 करोड़ है. सौ करोड़ यहां पर जानवर रहते हैं. तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा आदि की व्यवस्था है. सौ करोड़ लोग ऐसे है जिनके खाने-पीने, दवा, शिक्षा, आवास आदि का कुछ ठीक नहीं है. ये जानवरों की तरह जी रहे हैं. आप जानवरों को भी वोटरों में शामिल कर लेते हैं. इसका मतलब आपको गिनती नहीं आती. आप जानवरों को इंसानों में शामिल कर रहे हैं या फिर इंसानों को जानवरों में शामिल कर रहे हैं. हम तो यही चाहेंगे कि शासन कोई करे, लेकिन हमारा मुल्क़ बचा रहे. उसे नेता चलाए, सेना चलाए, औरत चलाए, मर्द चलाए, लेकिन मुल्क़ सुरक्षित होना चाहिए. हर आदमी सुरक्षित होना चाहिए. इस देश का मुसलमान कभी नहीं कहता कि हमको कोई दाढ़ी वाला प्रधानमंत्री लाकर दे दीजिए. आज़ादी के बाद जिन्ना की वजह से मुसलमान इस बात से अलर्ट हो गया कि उसका लीडर हिंदू ही है. ये जो झोलाछाप ओवैसी वगैरह हैं, ये तो वोटकटवा हैं, बकौल लालू प्रसाद यादव. ये सिर्फ़ मुसलमान का वोट काटकर किसी को जितवा देते हैं. इनको इसी बात का पैसा मिलता है. कोई जाहिल मुसलमान भी नहीं कहता कि उसे मुसलमान प्रधानमंत्री चाहिए. वह तो सिर्फ़ यह चाहता है कि दंगे न हों. बिहार में मुसलमानों ने नीतीश की सरकार बनाई तो उसे विश्वास है कि वे दंगा नहीं होने देंगे. यूपी में आज मुसलमान मायावती की तरफ़ देख रहे हैं क्योंकि उनको यह पता है कि मायावती के शासन में दंगा नहीं होता. ऐसी ही इंदिरा गांधी की हुक़ूमत थी. अगर इंदिरा गांधी को बाबरी मस्ज़िद गिरानी होती तो वे ख़ुद जहाज़ में बैठतीं और बम फिंकवा देतीं. अगर नहीं गिरानी होती तो चाहे दस हज़ार लोगों को मारना पड़ता, वे वहां किसी को दाख़िल नहीं होने देतीं. हुक़ूमतें ऐसी ही चलती हैं. आप औरंगज़ेब को गाली देते हैं लेकिन इतिहास पढ़िए तो सबसे बड़ा हिंदुस्तान तो उसी की हुक़ूमत में था. म्यांमार से नेपाल, गोवा, काबुल, कंधार, ये सब उसी की हुक़ूमत में थे. ज़ाहिर-सी बात है कि मुग़लों ने इतनी बड़ी-बड़ी हुक़ूमतें बना दी थीं तो क्यों बना दी थीं? क्योंकि उनको इस मुल्क़ से मुहब्बत हो गई थी. वरना ऐसा भी हो सकता था कि वे हिंदुस्तान पर क़ब्ज़ा रखते लेकिन अपना हेडक्वार्टर क़ाबुल में बना लेते. लेकिन वे हिंदुस्तान आए और इसी मिट्टी में दफ़्न हो गए. हम कहते हैं कि हिंदुस्तान का जो आदमी यह दावा करता है कि हम बहुत बड़े राष्ट्रवादी हैं वह जहां जी चाहे हमसे बैठकर बात कर ले. इंशाअल्लाह, वह राष्ट्रद्रोही निकलेगा, राष्ट्रवादी हमीं निकलेंगे. आप कहते हैं कि भारत माता की जय, अरे साहब हम तो दिन में 94 बार नमाज़ पढ़कर इस मिट्टी पर सज़दा करते हैं और इस मिट्टी को चूमते हैं. क्या इतनी बार इस मिट्टी को आप भी चूमते हैं? जिस दिन आप सौ बार चूमने लगें तब कहिएगा कि आप हमसे बड़े हिंदुस्तानी हैं. जब बंटवारा हुआ, हमारे पुरखों ने कहा कि हम पाकिस्तान नहीं जाएंगे. यह हमारी सरज़मीं है, हम अपने पुरखों की क़ब्र के पास बैठे रहेंगे लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएंगे. अब आज हालत यह है कि कोई झूठा मसला होता है बस अख़बार में छप जाता है कि फलां आदमी आतंकवादी है, इसके तार वहां से हैं, इसको इतना पैसा आया है. उसे पकड़ कर बंद कर देते हैं. सब मान लेते हैं कि वह आतंकवादी है. इस देश की दशा इतनी ख़राब है कि अगर आज पुलिस मुझे पकड़ ले कि यह आतंकवादी है तो लोग मान लेंगे कि हां यह आतंकवादी होगा. जब 12 बरस बाद हमको छोड़ा जाएगा तब तक हम अपने पांव पर चलने लायक नहीं बचेंगे. ऐसा सैकड़ों नौजवानों के साथ हो चुका है. क़ानून यह होना चाहिए कि जब आप किसी को 12 बरस या 20 बरस बाद बेक़सूर कहकर छोड़ रहे हैं तो उसे 50 करोड़ का हर्ज़ाना भी देना चाहिए. पुलिस एक 18 बरस के लड़के को पकड़ती है, फिर उसे 20 साल बाद बूढ़ा करके छोड़ देती है कि यह निर्दोष है. तब तक उसका परिवार बर्बाद हो चुका होता है. जब यहां ऐसा क़ानून चलता है तो यह मुल्क़ तो नहीं हुआ, यह तो तहख़ाना हो गया. अगर इस तहख़ाने को हम ठीक नहीं करेंगे तो यह सबके लिए नुकसान करेगा. यहां पर किसी भी मुसलमान को कह देते हैं कि पाकिस्तानी है. अरे आप अरबी कह दीजिए तो हम मान भी लें कि हां, अरब से आए थे. पैदल चल के आए थे. पाकिस्तान से हमारा क्या लेना देना? पाकिस्तान तो जितना हमारा है, उतना ही आपका है. वह तो हिंदुस्तान का हिस्सा था. हमें आप पाकिस्तानी क्यों कहेंगे? अगर हम पाकिस्तानी हैं तो आप पहले पाकिस्तानी हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है. हम तो इस मुल्क़ को मादरे-वतन कहते ही हैं. हमारा मुल्क़ तो ये है ही, हमारी मां भी यही है. यह मां का वतन है और मुसलमान इस मुल्क़ से बेपनाह मोहब्बत करते हैं.

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