Wednesday, March 1, 2017

गुरमेहर को समझिये

बात सही है कि सबकी समझ और संवेदना एक जैसी नहीं होती। ऐसे दौर मेें जब ज्ञान के केंद्र-हमारे विश्वविद्यालयों पर हमले हो रहे हैं और स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर बंदिशें लग रही हैं, युवाओं और उनके जरिये समाज के अन्य हिस्सों की समझ और संवेदना का विस्तार-परिष्कार कैसे होगा? कुछ बंद-दिमाग लोग अब गुरमेहर कौर के एक पुराने बयान पर सवाल उठा रहे हैं, जिसमें उसने कहा था कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा। करगिल में शहीद हुए कैप्टेन की बेटी सही तो कह रही है। सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है उसके बयान को। अगर आप समाज की चिंता नहीं करते, सिर्फ़ अपने कारोबार और निजी स्वार्थ की करते हैं, अगर आप विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों पर हमला कराने वालों के साथ हैं, अभिव्यक्ति की आजादी छीनने वालों के साथ हैं और आपका दिमाग अफवाह-बाजों की शाखाओं से संचालित है तो गुरमेहर की इतनी सहज, सुंदर और सारगर्भित बात को कैसे समझेंगे? आप उसके बयान में सपाट अभिधा खोज रहे हैं, जबकि वह एक विराट सच उजागर कर रही है। युद्ध में दोनों तरफ के लोग मारे जाते हैं। युद्ध के बाद दोनों तरफ से मारे गये सैनिकों या नागरिकों की मौतों और तमाम तरह की बर्बादी के लिये एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहाराय़ा जाता है। भारत-पाकिस्तान जैसे मुल्कों के बीच यह सिलसिला आजादी के बाद से ही जारी है। हर युद्ध के बाद दोनों देशों के बड़े हुक्मरान अगला युद्ध होने तक शांति और तनाव का कर्मकांडी-अभियान शुरू करते हैं। कभी एक-दूसरे की राजधानियों में जाकर अच्छी-अच्छी बातें करते हैं, कभी देश में मिलते हैं, कभी परदेस में। एक-दूसरे से दोस्ती का हाथ मिलाते हैं। उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। फिर एक दिन अचानक सरहदी तनाव शुरू हो जाता है यानी युद्ध की तैयारी! इसके पीछे ढेर सारे कारण और कारक हो सकते हैं या होते हैं। पर ऐसा कोई कारण या कारक नहीं होता, जिसे ऐसे मुल्कों के शीर्ष नेता संवाद से नहीं सुलझा सकते। फिर भी अगर युद्ध होते हैं तो निस्संदेह यह उन मुल्कों के नेतृत्व की विफलता है या इसके पीछे शासक-समूहों या कुछ वैश्विक शक्तियों के अपने-अपने निहित स्वार्थ हो सकते हैं। विफलताओं या स्वार्थों की पृष्ठभूमि में ही शुरू होते हैं युद्ध। और युद्धों में दोनों तरफ से गुरमेहर जैसी न जाने कितनी मासूमों के पिता शहीद होते हैं। युद्ध अपने आप नहीं होता, नागरिकों पर थोपा जाता है। उकसावेबाजी एक तरफ से हो या दोनों तरफ से। दुनिया में ऐसे अनेक मौके आये। विभिन्न देशों के बीच ताकतवर मुल्कों ने या उनके हथियारों के बड़े सौदागरों ने युद्ध कराए। मामला भारत-पाक का हो या दुनिया के किसी भी देश का, युद्ध समस्याओं का हल नहीं है, समस्याओं की शुरूआत है, बेहद संगीन शुरूआत। इसीलिये गुरमेहर 'युद्ध' को निशाना बना रही है, किसी एक मुल्क या सरहद को नहीं! अगर वह अपने देश के अनेक 'बंद-दिमाग लोगों' की तरह कहती कि उसके पापा को पाकिस्तान ने मारा तो उसकी ही तर्ज पर पाकिस्तान की अनेक बच्चियां कह सकती हैं (और बंद-दिमागों की वहां कोई कमी तो है नहीं) कि उनके पापा को भारत ने मारा! और इस तरह दोनों मुल्कों की नई पीढियों के बीच 'अपने-अपने शहीदों' के नाम पर एक-दूसरे से नफरत और 'युद्ध से प्रेम'(युद्धोेन्माद) का सिलसिला भला कैसे खत्म हो सकता है! इसलिये गुरमेहर को समझिये, उसकी भाषा, उसके बोध और उसके विचार की विराटता-गहराई को समझिये। आइये, गुरमेहर के साथ हमं सब कहें: युद्धों का नाश हो! No to War! -उर्मिलेश उर्मिल, सीनियर जर्नलिस्ट, राज्यसभा टीवी।

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