Tuesday, February 28, 2017

नोटबंदीः न खुदा ही मिला, न विसाले सनम

शिवशान्त। 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गए नोटबंदी के फैसले की तस्वीर सामने आने लगी है। पीएम ने राष्ट्र संबोधन में कहा था कि इस फैसले से 50 दिन की परेशानी होगी, ये एक कड़वी दवा है जो भारत के आर्थिक सेहत के लिए जरूरी है। नोटबंदी कर देने पर कालाधन पकड़ा जायेगा। लेकिन हुआ क्या देश की पूरी जानता बैंक की लाइन में लगी रही चारो तरफ अफरा-तफरी मच गई। समय पर पैसा न होने से इलाज के अभाव में लोगो की जानें गईं। बैंक की लाइन में बूढ़े और बीमार बुजुर्गों ने दम तोड़ा और सत्ताधरी नेताओ ने इसे कालाधन पर हमला कहा और अच्छे दिन आने की हवा फिर बनाई, लेकिन अब 50 दिन बीत जाने पर देश की क्या दशा है? क्या कालाधन खत्म हो गया, क्या कालाधन के काले चोरों को सजा हुई, क्या देश का सारा कालाधन लाइन में लगे उन लोगो के पास ही था जो 50 दिन के बाद देश में अच्छे दिन का इन्तजार कर रहे थे? सवाल है की नोटबंदी का फैसला जनता के हित में था या उसके खिलाफ? नोटबंदी के बाद आरबीआइ द्वारा जारी किये कुल 1000 और 500 के 97 प्रतिशत नोट बैंक में कैसे जमा हुए? अगर 3 प्रतिशत ही कालाधन था तो नोटबंदी का इतना बड़ा ढ़ोंग किसलिये? नोटबंदी की घोषणा के बाद 50 दिनों में 60 बार नियमों में बदलाव किया गया। जिस सरकार ने वादा किया था कि 31 मार्च तक रिजर्व बैंक के काउण्टर से नोट बदले जा सकेंगे वह अब पूरी बेशर्मी से अपनी बात से पलट गयी है। बड़े ही चतुराई से कालाधन के सवाल को भी पीछे कर भारत को कैशलेस या नक़दी विहीन डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने की बात पर ही मुख्य जोर दिया जाने लगा। नोटबंदी को लेकर सरकार की जो तैयारी थी उससे सापफ पता चलता है कि जनता की राहत से ज्यादा बैंक में पैसा जमा करने पर ध्यान दिया गया है। और इन 50 दिनों के अन्तराल में जो नियम बने वो जनता से ज्यादा काले चोरो के लिये फायेदमंद साबित हुए। यह सापफ है की कालाधन बड़े-बड़े पूँजीपति, नेता और अध्किारियों के पास हैं। उनका काला कैसे जमा हो जिसके लिये सरकार ने खुद ही रास्ते निकाले। सरकार ने ऐलान किया 82 प्रतिशत तक टैक्स जमा करके सफेद कर लें, फिर टैक्स की दर गिराकर 51 प्रतिशत और अंत में 30 प्रतिशत तक कर दी गई। फिर सरकार ने राजनीतिक पार्टियों के चंदे पर 100 प्रतिशत टैक्स की छूट दी और गरीब अपने ही पैसों के लिए लाईन में लगा रहा। खबरें आती रही हैं कि नोटबन्दी के ऐलान के ठीक पहले ही बीजेपी और उसके क़रीबियों ने भारी संख्या में देश के विभिन्न शहरों में जमीनें व मकान आदि खरीदे थे और निर्माण कार्य शुरू किया था। खबर यह भी रही कि बीजेपी नेताओं द्वारा संचालित सहकारी बैंकों में भी नोटबन्दी के बाद के 3-4 दिन में ही बड़ी मात्रा में कैश जमा हुआ। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक, जिसके निदेशक अमित शाह है, में ही 3 दिन में 600 करोड़ रुपया जमा हुआ। कालाधन, भ्रष्टाचार पर हमले की हकीकत के लिए 11 जनवरी के हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर पर्याप्त है, जिसने उजागर किया कि रिजर्व बैंक की नोट छापने की प्रेस से ही बड़ी मात्रा में नये नोट कुछ लोगों के यहाँ घर पर पहुँचाने का धन्धा भी जोरों से चालू था। नोटबंदी की घोषणा के बाद 10 नवंबर से 10 दिसंबर के बीच 4.61 लाख करोड़ रुपये की कीमत के 21.8 अरब नोट बैंकों और एटीएम से जारी किए गए। लेकिन यह रुपये आम जनता तक दो दो हजार करके पहुचें। इन सभी घटनाओ को देखते हुये लगता है आम जनता के अच्छे दिन तो आने से रहे पर बैंकों के, पूँजीपतियों के अच्छे दिन आ गये। चाहे वह बीजेपी हो या कांग्रेस, सबने इन पूँजीपतियों के हित-लाभ में ही काम किया है। नोटबन्दी के हमले का असली निशाना कालाधन नहीं बल्कि मुल्क के गरीब, मेहनतकश लोगों की थोडी बहुत कमाई धनसम्पत्ति था, जिसका एक हिस्सा जबरिया हथिया कर मालिक तबके को हस्तान्तरित करने का अभियान इसके द्वारा छेड़ दिया गया है। नोट बन्दी से किसे हुआ नुकसान असल में नुकसान तो मेहनतकशों का -दिहाड़ी, खेतिहर, असंगठित क्षेत्रा के मजदूरों का, सीमान्त-छोटे किसानों का, छोटे काम धन्ध्े करने वाले दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों का, निम्न मध्यम तबके का हुआ। नोटों के दलालों द्वारा, 500 के नोट 300-400 और एक हजार के नोट 700-800 में बेचकर ग़रीबों को अपने हाड़तोड़ श्रम की कमाई कोलुटवाने के लिए मजबूर होना पड़ा। स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के एक सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा नुक़सान अनौपचारिक बाजार अर्थात सड़क किनारे के रेहड़ी-पटरी वालों पर हुआ। तमाम कम्पनियों ने इससे पैदा मंदी के बहाने भारी छंटनी शुरू कर दी। (शिवशान्त का यह लेख संघर्षरत मेहनतकश के जनवरी-मार्च अंक में प्रकाशित है। पत्रिका मंगाने के लिए लिखें, संपादक मुकुल, अमित चक्रवर्ती द्वारा 2141, चितरंजन पार्क नई दिल्ली-19, फोनः 9412969989, 9873057637)

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