Monday, February 27, 2017

कैशलेस की व्याकुलता!

बचपन में एक किस्सा सुना था। एक मायावी बादशाह था। उसे जब भी अपने और अपने कारोबारियों के हित में कोई भी काम करना होता था तो वह जनता को अपने लच्छेदार शब्दजाल में पफंसाता और उनका सबकुछ लेकर अपना उल्लू सीधा कर लेता। जब तक सच पता चलता, तब तक एक और झूठ को दमदार तरीके से परोस देता था। खासियत यह थी कि लुटी-पिटी जनता को यही भ्रम रहता कि राजा उसके लिए ही सब कुछ अपने त्याग के साथ कर रहा है। देश के वर्तमान प्रधनमंत्री जनाब मोदी के करिश्मों को देखकर पुराना किस्सा ही याद आ गया। नोटबंदी के करिश्मे को ही देखें। जनाब मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबन्दी के ऐलान के साथ ‘कालेधन’ पर ‘बमबारी’ की। लेकिन 10 दिन बीतते-बीतते उनके भाषणों से कालेधन का मुद्दा पीछे छूटता गया और ‘कैशलेश’ और डिजिटल लेन-देन का शोर बढ़ता गया। ठीक वैसे ही, जैसे प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेशों से कालाधन वापस लाने और सबके खाते में 15-15 लाख डालने की बात थी, अच्छे दिन लाने की बात थी। हालांकि अब झूठ के धूल-राख-गर्द के बीच भी यह सच्चाई आ ही गयी कि भारी मात्रा में कॉरपोरेट कर्जों को माफ करने से बैंकें नगदी के भारी संकट (लिक्यूडिटी क्राइसिस) से गुजर रही थीं। ऐसे में विशाल मात्रा में आम जनता की बचत के पैसे पूँजी के नये स्रोत बन गये। यानी पूँजीपतियों के लिए नगदी के नये स्रोत बनें। दूसरा, ई बैंकिंग व ऑनलाइन कारोबारियों को भारी मुनाफा का रास्ता खुला। तीसरे, देश की जनता के सामने झूठे वायदों, बेतहाशा महँगाई, अभूतपूर्व बेरोजगारी और किसान-मजदूर आबादी की भयंकर लूट, दमन, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमले आदि के कारण मोदी सरकार की लगतार गिरती साख को पाँच राज्यों के आसन्न चुनाव में बचाने का ब्रह्मास्‍त्र बने! बहरहाल, भ्रम के कोहरे में आइए, कालाधन और कैशलेस की हक़ीक़त को जानें। कालाधन वह नहीं होता जिसे बक्सों, तकिये के कवर में या जमीन में दबाकर रखते हैं। कालाधन भी सफेद-धन की तरह बाजार में घूमता रहता है और इसका मालिक उसे लगातार बढ़ाने की फिराक में रहता है। पैसे के रूप में जो कालाधन था वह कुल कालेधन का बेहद छोटा हिस्सा है जो घरों में नहीं बल्कि बाजार में लगा हुआ है- रियल स्टेट, विदेशों में जमा धन और सोने की खरीद आदि में। असल में देश के कालेधन का अधिकांश हिस्सा पनामा, स्विस और सिंगापुर के बैंकों में पहुँच जाता है। जहां तक कैशलेस की बात है पूँजीवादी व्यवस्था में कोई भी उत्पाद या सेवा खैरात या आवश्यकतापूर्ति के लिए नहीं होती अपितु मुनाफा कमाने के लिए बेची जाती है। कैशलेस का मतलब है, लेन-देन में एक तीसरे दलाल (कैशलेस डिजिटल सेवा देने वाले) का प्रवेश जो इसके लिए शुल्क लेगा। इससे अर्थव्यवस्था में लागत बढ़ेगी, लेन-देन की गति कम होगी तथा तीसरे पक्ष पर निर्भरता होगी। यह तीसरा पक्ष बैंक है। डिजिटल बटुए वाले पेटीएम, एयरटेल मनी, जिओ मनी, आदि भी सब बैंक बनने की प्रक्रिया में हैं। यानी अर्थव्यवस्था पर बैंकों की वित्तीय पूँजी का नियन्त्रण बढ़ेगा जो पाई-पाई अपना हिस्सा वसूल करेगा। इससे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के छोटे काम-धंधे करने वालों को नुकसान होगा, उनकी लागत बढ़ेगी और आमदनी कम, उसमें से भी एक हिस्सा वित्तीय पूँजी के हवाले। जबरदस्ती, डंडे के बल पर सबको हाँक कर कैशलेस करने की मोदी की व्यग्रता की हक़ीक़त पहचानने की जरूरत है। (यह लेख संघर्षरत मेहनतकश के जनवरी-मार्च अंक का संपादकीय है। पत्रिका मंगाने के लिए लिखें, संपादक मुकुल, अमित चक्रवर्ती द्वारा 2141, चितरंजन पार्क नई दिल्ली-19, फोनः 9412969989, 9873057637)

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