Friday, April 3, 2015

आका की यह शान!

श्रीमती सुमन शर्मा
कहानी किस्सों में सुना करते थे राजा महाराजाओं के शान शौकत और राजसी ठाट-बाट के किस्से-वह सोने चाँदी के बरतनों में भोजन करते थे, सोने के सिंहासन पर विराजते थे जिसमें मोती, माणिक, हीरा पन्ने जड़े होते थे, मखमल और रेशम के वस्त्रों पर भी तरह-तरह के नगीने जड़े रहते थे। इसके अतिरिक्त कोमलता का भी बखान होता था। अतः समझ में नहीं आता था कि इतना कोमल शरीर इन भारी भरकम व सोने के तारों से कढ़े हुए वस्त्रों को किस प्रकार सम्भालता होगा? इन सब को पहनकर कोई सहज कैसे रह पाता होगा। सारा ध्यान तो वस्त्रों पर ही रहता होगा। खैर छोडि़ए, वह सब तो राजा महाराजाओं व मुगल शासकों के समय की बात थी किन्तु यह नज़ारे अब भी देखने को मिल जाते हैं वह भी 2015 में तथा एक लोकतान्त्रिक देश में वहाँ का प्रधानमन्त्री 10 लाख का सोने के तारों द्वारा स्वनामांकित सूट पहनकर देश के राष्ट्रीय पर्व पर अरबों गरीब जनता के समक्ष उनको उद्बोधित करता हुआ दिखायी पड़ा, मानों अपनी गरीब प्रजा का मजाक बनाता हुआ उनके मुँह पर थप्पड़ मारता हुआ सा प्रतीत हुआ कि हम तो शान शौकत से रहेंगे भले ही तुम भूखे प्यासे नंगे कुचले रहो।
इस देश में ऐसी-ऐसी महान विभूतियाँ हुईं हैं जो शान शौकत के बीच रहकर भी इन सब से निर्लिप्त रही हैं। महान चाणक्य जो इतने बड़े सम्राट के मन्त्री व गुरु होते हुए भी राजमहल में न रहकर एक छोटी सी कुटिया में रहते थे, बहुत ही साधारण तरीके से। राजा जनक को तो राजर्षि की उपाधि मिली थी जो राजा होते हुए भी ऋषि के समान थे। बहुत प्राचीन काल की बात न करें आधुनिक व स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के कुछ नेता भी सादगी की मिसाल के साथ-साथ बहुत सम्माननीय थे। सबसे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी बहुत ही सादगी व स्वच्छता से रहते थे, साधारण खद्दर का धोती कुर्ता, जिसका कॉलर घिसा रहता था उसकी भी परवाह नहीं करते थे, उन्होंने किसी भी राष्ट्रीय पर्व पर बहुत कीमती वस्त्र नहीं पहने, प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री जी उनके पास तो अपना कोट भी नहीं होता था। प्रधानमन्त्री के निवास स्थान में रहते समय भी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री अपने हाथों से उनके लिए बहुत साधारण भोजन बनाती थीं। प्रधानमन्त्री भवन में बहुत ही सादगी से रहते थे। कर्पूरी ठाकुर जी स्वयं अपने लिए कपड़े ही नहीं बनवाते थे उनको दूसरे लोग कपड़े बनवाकर देते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने देशवासियों के दुख दर्द को समझा, माँ बहनों की कठिनाइयों का अनुभवकर वस्त्रों का परित्याग कर दिया तभी उन्होंने अपने देशवासियों के दिलों में जगह बनायी महात्मा कहलाये, अनोखा कार्य किया अहिंसा के बल से अंग्रेजों को देश छोड़ने पर बाध्य किया।
एक ‘‘ईस्ट इण्डिया’’ कम्पनी के बहाने आये अंग्रेजों को भगाने में कितने लोगों ने अपनी बलि, दी कितने घर उजड़े, कितने प्रयास के बाद अंग्रेज (अंग्रेजी और अंग्रेजियत नहीं) यहाँ से गए और अब सैकड़ों कम्पनियों को न्यौता दिया जा रहा है, ‘‘मेक इन इण्डिया’’ के बहाने उनको पनाह दी जा रही है। चीन के माओ-त्से-तुंग ने मोटा सादा वस्त्र स्वयं भी पहना और जनता को भी प्रेरित किया साइकिल पर चलकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा दिखायी।
‘‘तेल बचाओ’’, ‘‘बिजली बचाओ’’, ‘‘जल ही जीवन है’’, ‘‘वन हमारी सम्पदा है इसकी रक्षा करें’’ जैसे नारे दिए जाते हैं जबकि सबसे अधिक इन सबकी बरबादी यह सरकारी तन्त्र ही करते हैं। एक मन्त्री के पीछे कितनी गाडि़याँ तेल बरबाद करती हुई जाती हैं खेतों के लिए पानी नहीं है किन्तु गाडि़यों की धुलाई में पानी कितना नष्ट होता है। सड़कों पर बिजली दिन में भी जलती रहती हैं। लोगों से 20रु. में एक दिन का खर्च चलाने की आशा की जाती है जबकि सांसदों का नाश्ता ही लाखों का हो जाता है। पार्टी में एक प्लेट हज़ारों की हो जाती है। पहले स्वयं उदाहरण पेश करें तब दूसरों से अपेक्षा करें।
परिवार हो या देश विकास करने के लिए मुखिया को त्याग करना पड़ता है कष्ट सहना पड़ता है तभी अन्य सदस्य व जनता साथ देगी। ऐसे में जब आप एक कदम चलेंगे वह चार कदम चलेगी।
यहाँ तो कम्पटीशन हो रहा है। एक ने 10 लाख का सूट एक बार पहना और नीलामी की आज्ञा देकर अपने को निर्मोही साबित कर दिया और दूसरे ने 4,31,31,000रु. में खरीद कर लोगों को अपने पैसे की चमक दिखा दी। पैसा पार्टी के खाते में डलवाकर वाह-वाही लूट ली। अधिक पैसा क्या वास्तव में अच्छे कर्मठ कार्यकर्ता देता है या उनको लालची, आराम तलब बनाता है।
देश आकण्ठ कर्ज में डूबा हुआ है। हर पैदा होने वाले बालक पर हजारों का कर्जा है। ऐसे में प्रयत्न होना चाहिए कि यहाँ के लोगों को काम पर लगाएँ देशी उद्योग-धन्धों को बढ़ावा दें, डूबती हुई फैक्ट्रियों को सक्षम बनाने का कार्य होना चाहिए। अपनी फैक्ट्रियों में अपने लोगों द्वारा वस्तुओं के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जाये किन्तु कर्ज में डूबा हुआ देश आर्थिक गुलाम होता है और वह तो कॉरपोरेट्स के हाथों बिक चुका है। ऐसे में हमारे आका किस तरह से यह शान दिखा सकते हैं ?

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