Thursday, December 25, 2014

किसका धर्मांतरण?

                                      सुनील कुमार
आगरा में हुए धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद से सड़क तक चर्चा हो रही है। राज्यसभा में विपक्ष प्रधानमंत्री के वक्तव्य की मांग पर अड़ा हुआ है। वहीं सत्तारूढ़ पार्टी धार्मांतरण के मुद्दे पर कानून बनाने की बात कह रही है। इसके कारण संसद में देश के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पा रही है और आम जनता को यह पता नहीं चल पा रहा है कि सरकार क्या कर रही है। भारत का संविधान हर नागरिक को इच्छानुसार धर्म मानने, उनका प्रचार करने व धर्मांतरण की सुविधा देता है, लेकिन जब यह काम जबरिया या लालच के साथ करवाया जाता है तो वह गैर कानूनी होता है।
आगरा में बंगाल के मुस्लिम परिवार लम्बे समय से रहकर कूड़ा बिन कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। इन्हीं में से 57 परिवारों को विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू जागरण समिति ने हवन करा कर मुसलमान से हिन्दू बना दिया। हिन्दुवादी संगठन इसे घर वापसी या पर्रावर्तन बता रही हैं, वहीं अन्य समूह इसे जबरिया धर्म परिवर्तन बता रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद का कहना है कि इनके पूर्वज हिन्दू थे इसलिए अब यह अपने धर्म में वापस लौट आये हैं, यह धर्मांतरण का मुद्दा है ही नहीं। वहीं दूसरे लोगों का कहना है कि इनको राशन कार्ड, आधार कार्ड, पहचान पत्र देने का लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया, जो कि कानूनन जुर्म है। जबरिया व लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने की पुष्टि रामजन व मुनीरा के बयान से भी होता है, जो बताते हैं कि उनको बीपीएल राशन कार्ड व आधार कार्ड  बनवाने के लिए कहा गया और इसके लिए जो उनको कहा गया वह सब कुछ उन्होंने किया। इससे पहले ईसाई मिशनरियों पर भी यह आरोप लगता रहा है कि वो लालच देकर धर्मांतरण कराते रहे हैं। धर्मांतरण हमेशा ही हाशिये पर पड़े लोगों का ही किया जाता है।
सवाल यह है कि क्या हवन में घी डालने से और माथे पर तिलक लगाने से हिन्दू जैसी वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन हो जाता है? यह पहले भी कबाड़ बिनने का काम करते थे और अब भी वही काम कर रहे हैं। अगर यह बात किसी व्यक्ति से पूछा जाये कि वह कौन है तो जवाब मिलेगा कि वह कबाड़ी वाला है, कबाड़ बिनता है, गंदा रहता है, गरीब है इत्यदि, इत्यादि। इस तरह आगरा में कबाड़ बिनने वालों का कोई परिवर्तन हुआ ही नहीं। वह मुसलमान था तब या हिन्दूबनाने के बाद भी वह कबाड़ीवाला ही है। वह जिस गंदी बस्ती में पहले था आज भी उसी गंदी बस्ती में रहता है, उसी तरह के गंदे कपड़े पहनता है जिस तरह पहले पहनता था। बिमारी होने पर वही दो-चार रुपये का मेडिकल स्टोर से दवा लाकर खा लिया करता है और अपने मन को संत्वाना देता हैं कि कोई बिमारी नहीं है। उसे मुसलमान या हिन्दू कहने वाले यह नहीं जानना चहते हैं कि वह भर पेट खाना खाया कि नहीं खाया। स्वच्छता अभियान से उसकी जिन्दगी में क्या बदलाव आया है? कहीं उसकी जिन्दगी पहले से तो कठिन नहीं हो गई? कूड़ा प्राइवेट हाथों में देकर इनकी रोजी-रोटी तो नहीं छीन ली गयी? जिन महिलाओं के पास बुरका पहनने तक को नहीं है ऐसे इन्सानों को कोई हिन्दू या मुसलमान कैसे बना पायेगा?
इस तरह के कबाड़ीवालों की संख्या दिल्ली में तीन लाख है जो सुबह की लालिमा से पहले और रात के अंधेरे में इस गली से उस गली, इस बस्ती से उस बस्ती, नदी-नाले व औद्योगिक क्षेत्रों में (बच्चे पीठ पर बोरी लिये, महिलायंे हाथ में चुम्बक लिये, पुरुष रिक्शा लिये) इधर से उधर, इस घर से उस घर घूमते हुए दिख जायेंगे। इसमें से 95 प्रतिशत पश्चिम बंगाल व असाम के मुसलमान हैं जो निरक्षर हैं। वे पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन इनको पढ़ने का कभी मौका नहीं मिला।
मेरी मुलाकात मुहम्मद अली (22) से हुई। मुहम्मद असम के बरपेटा जिले के रहने वाले हैं। वे आठ साल पहले 14 साल की उम्र में पिता के साथ दिल्ली आ गये। दिल्ली के टिकरी बॉर्डर में 8ग्10 की झोपड़ी में 1300 रुपये किराया देकर रहते हैं। हैंडपम्प का पानी पीते हैं। सरकार करोड़ों रु. खर्च कर विज्ञापन करवाती है कि यह पानी पीने योग्य नहीं है लेकिन पीने के पानी का व्यवस्था नहीं करती है। मुहम्मद आठ साल पहले जब अपना गांव छोड़कर दिल्ली आये उसके बाद वह अपने गांव नहीं गये। पिता की उम्र ज्यादा होने के कारण वह वापस गांव चले गये हैं। मां और तीन बहनें पहले से ही गांव में रहती हैं। मुहम्मद उनको याद करता हैं और वे लोग मुहम्मद को याद करते हैं, लेकिन 8 साल से किसी को कोई देखा नहीं है, फोन पर बात हो जाती है। जब कोई गांव जाता है तो मुहम्मद अपना फोटो उनको देता है कि उनके घर तक पहुंचा दें। इसी तरह उधर से परिवार वाले अपना फोटो भेज देते हैं। मुहम्मद अभी भी पढ़ना चाहता है, वह गांव जाकर अपने मां-बहन से मिलना चाहता है लेकिन जा नहीं पा रहा है। मुहम्मद घर का अकेला कमाऊ सदस्य है, उसको चिंता है कि ठंड में कूड़े कम मिलते हैं घर का खर्च कैसे चलेगा।
जहांगीरपुरी के केब्लाक में बंगाल के लालगढ़ से आये बबलू (बबलू मुसलमान हैं लेकिन नाम से हिन्दू लगते हैं संघ परिवार इनको भी हिन्दू बताकर घर वापसी करा सकता है) रहते हैं। बबलू 7-8 साल की उम्र में मां-पिता के साथ दिल्ली के भलस्वा इलाके में आ गये। पिता और मां एक गोदाम में काम करते थे जहां पर बात-बात में इनको गाली सुनने को मिलती थी। एक दिन वह काम छोड़कर नरेला चले गये जहां पर दो रात उनको भूखे पेट रहकर गुजारनी पड़ी। भूख मिटाने के लिए बबलू ने कूड़ा बिनना शुरू कर दिया। तब से लेकर आज तक वह कूड़ा बिनने का काम ही करते हैं। वह पत्नी और दो बच्चों के साथ केब्लॉक में झोपड़ी डालकर रहते हैं जिसके लिए उनको करीब 2000 रुपये चुकाने पड़ते हैं। इस बस्ती में करीब 300 परिवार रहते हैं। वे सभी लोग मुस्लिम हैं और बंगाल के लालगढ़ इलाके के रहने वाले हैं। इस बस्ती के लोग कूड़ा बिनने के लिए राजपुरा रोड, मल्कागंज, तिमारपुर व माल रोड जाते हैं। बबलू से यह पूछने पर कि रोहणी नजदीक है यहां क्यों नहीं  जाते, तो बबलू बताते हैं कि रोहणी में कूड़ा नहीं मिलता है क्योंकि यहां प्राइवेट कम्पनियां कूड़ा उठाती हैं। इसी बस्ती में रहमान, सोनू व सलामन से मुलकात हुई जो कि 12-14 वर्ष के उम्र के हैं और पढ़ना चाहते हैं लेकिन इनके पास समय नहीं होता। वे सुबह 5 बजे ही कूड़ा बिनने के लिए मल्कागंज जाते हैं दोपहर 3-4  बजे वापस लौटते है तो खाते हैं और सो जाते हैं। शाम को फिर किसी इलाके में कुड़े की तलाश में निकल जाते हैं।
दक्षिणी दिल्ली के तेहखण्ड व तुगलकाबाद में असम व बंगाल के हजारों मुस्लिम परिवार रहते हैं जो कूड़ा चुनकर अपना तथा बच्चों का पेट पालते हैं। तेहखण्ड में सरकारी जमीन पर रेलवे लाईन के किनारे झुग्गियां ंहैं जहां पर अधिकांश परिवार बंगाल के है और कुछ असम के हैं। ये लोग 15-25 साल से यहां रह रहे हैं। इन सरकारी जमीन पर झुग्गियों का किराया भी गांव वाले इनसे वसुलते हैं। तुगलाकबाद किले के अंदर जंगल में झुग्गियां हैं जहां पर असम से आये 300-350 परिवार रहते हैं। इन झुग्गियों का किराया तुगलकाबाद गांव के लोग लेते हैं। यह लोग कूड़े से लोहे के टुकड़े बिनने का काम करते हैं। वे सुबह 4-5 बजे परिवार के साथ हाथ में चुम्बक लिये हुए औद्योगिक क्षेत्र तथा तुगलकाबाद लैंड फिल एरिया में कूड़ा बिनने के लिए जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोहा पाने के लिए डम्फर गाड़ियों के पास में पहुंच जाते हैं जिससे कभी-कभी इनको दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है। इनके हाथ-पैर टूट जाते हैं और कभी कभी तो जान भी चली जाती है। बच्चे घर पर रहते हैं। कभी कभी कोई स्वयंसेवी संस्था पढ़ाने आ जाती है तो बच्चे इकट्ठे हो जाते हैं, तो कभी कोई दलिया या खिचड़ी बांट जाता है जिसे बच्चे चाव से खाते हैं। वे पढ़ना चाहते हैं लेकिन स्कूल नहीं है।
क्या कभी कोई मोदी, विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण समिति व बजरंग दल जैसी संस्था मुहम्मद, रहमान, सोनू व सलमान को पढ़ाने का बीड़ा उठा पायेगी? बबलू के मां-बाप जैसे मजदूरों को इज्जत की रोटी दिला पायेगी? क्या कभी इनके अधिकारों को लेकर संसद में हंगामा होगा? एक तरफ धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद ठप पड़ी है तो वहीं इसी संसद से मजदूर विरोधी, किसान विरोधी, जन विरोधी बिल पास होते जा रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कटौती हो रही है और संसद मौन रहता है। आदानी जैसे उद्योगपतियों को सरकारी बैंक से 62 हजार करोड़ रू. देने पर सहमति हो जाती है, न तो इसके खिलाफ संसद में और न ही सड़क पर आवाज सुनाई देती हैं। सबका साथ सबका विकास का नारा देकर सत्ता में आयी मोदी सरकार क्या धर्मांतरण और पर्रावर्तन जैसे मुद्दे को उठाकर जन विरोधी कानून से जनता का ध्यान भटकाना चाहती है? क्या विपक्षी पार्टियांे का काम एक मुद्दे को लेकर झूठी शोर-शराबा करना है या श्रम कानून, भू-अधिग्रहण कानून में हो रहे बदलाव, शिक्षा-स्वास्थ्य में हो रही कटौती को भी जनता के सामने लाना है? भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ माला के साथ भालाका मंत्र दे रहे हैं, क्या यह लोगों को भड़काने वाला वक्तव्य नहीं है? इसके लिए आदित्यनाथ पर कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी अपने मंत्रियों और सांसदों पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। वे आर.एस.एस. को कहते हैं कि वह मंत्रियों, सांसदों को काबू में रखे। इससे साफ जाहिर होता है कि देश को आर.एस.एस. ही चला रहा है। क्या भारत सरकार लोकतंत्रधर्मनिरपेक्षके सिद्धांत को छोड़कर फासीवादी, साम्प्रदायिक राह पर चल पड़ी है?

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