Thursday, December 25, 2014

किसका धर्मांतरण?

                                      सुनील कुमार
आगरा में हुए धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद से सड़क तक चर्चा हो रही है। राज्यसभा में विपक्ष प्रधानमंत्री के वक्तव्य की मांग पर अड़ा हुआ है। वहीं सत्तारूढ़ पार्टी धार्मांतरण के मुद्दे पर कानून बनाने की बात कह रही है। इसके कारण संसद में देश के ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पा रही है और आम जनता को यह पता नहीं चल पा रहा है कि सरकार क्या कर रही है। भारत का संविधान हर नागरिक को इच्छानुसार धर्म मानने, उनका प्रचार करने व धर्मांतरण की सुविधा देता है, लेकिन जब यह काम जबरिया या लालच के साथ करवाया जाता है तो वह गैर कानूनी होता है।
आगरा में बंगाल के मुस्लिम परिवार लम्बे समय से रहकर कूड़ा बिन कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। इन्हीं में से 57 परिवारों को विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू जागरण समिति ने हवन करा कर मुसलमान से हिन्दू बना दिया। हिन्दुवादी संगठन इसे घर वापसी या पर्रावर्तन बता रही हैं, वहीं अन्य समूह इसे जबरिया धर्म परिवर्तन बता रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद का कहना है कि इनके पूर्वज हिन्दू थे इसलिए अब यह अपने धर्म में वापस लौट आये हैं, यह धर्मांतरण का मुद्दा है ही नहीं। वहीं दूसरे लोगों का कहना है कि इनको राशन कार्ड, आधार कार्ड, पहचान पत्र देने का लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया, जो कि कानूनन जुर्म है। जबरिया व लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने की पुष्टि रामजन व मुनीरा के बयान से भी होता है, जो बताते हैं कि उनको बीपीएल राशन कार्ड व आधार कार्ड  बनवाने के लिए कहा गया और इसके लिए जो उनको कहा गया वह सब कुछ उन्होंने किया। इससे पहले ईसाई मिशनरियों पर भी यह आरोप लगता रहा है कि वो लालच देकर धर्मांतरण कराते रहे हैं। धर्मांतरण हमेशा ही हाशिये पर पड़े लोगों का ही किया जाता है।
सवाल यह है कि क्या हवन में घी डालने से और माथे पर तिलक लगाने से हिन्दू जैसी वर्ण व्यवस्था में परिवर्तन हो जाता है? यह पहले भी कबाड़ बिनने का काम करते थे और अब भी वही काम कर रहे हैं। अगर यह बात किसी व्यक्ति से पूछा जाये कि वह कौन है तो जवाब मिलेगा कि वह कबाड़ी वाला है, कबाड़ बिनता है, गंदा रहता है, गरीब है इत्यदि, इत्यादि। इस तरह आगरा में कबाड़ बिनने वालों का कोई परिवर्तन हुआ ही नहीं। वह मुसलमान था तब या हिन्दूबनाने के बाद भी वह कबाड़ीवाला ही है। वह जिस गंदी बस्ती में पहले था आज भी उसी गंदी बस्ती में रहता है, उसी तरह के गंदे कपड़े पहनता है जिस तरह पहले पहनता था। बिमारी होने पर वही दो-चार रुपये का मेडिकल स्टोर से दवा लाकर खा लिया करता है और अपने मन को संत्वाना देता हैं कि कोई बिमारी नहीं है। उसे मुसलमान या हिन्दू कहने वाले यह नहीं जानना चहते हैं कि वह भर पेट खाना खाया कि नहीं खाया। स्वच्छता अभियान से उसकी जिन्दगी में क्या बदलाव आया है? कहीं उसकी जिन्दगी पहले से तो कठिन नहीं हो गई? कूड़ा प्राइवेट हाथों में देकर इनकी रोजी-रोटी तो नहीं छीन ली गयी? जिन महिलाओं के पास बुरका पहनने तक को नहीं है ऐसे इन्सानों को कोई हिन्दू या मुसलमान कैसे बना पायेगा?
इस तरह के कबाड़ीवालों की संख्या दिल्ली में तीन लाख है जो सुबह की लालिमा से पहले और रात के अंधेरे में इस गली से उस गली, इस बस्ती से उस बस्ती, नदी-नाले व औद्योगिक क्षेत्रों में (बच्चे पीठ पर बोरी लिये, महिलायंे हाथ में चुम्बक लिये, पुरुष रिक्शा लिये) इधर से उधर, इस घर से उस घर घूमते हुए दिख जायेंगे। इसमें से 95 प्रतिशत पश्चिम बंगाल व असाम के मुसलमान हैं जो निरक्षर हैं। वे पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन इनको पढ़ने का कभी मौका नहीं मिला।
मेरी मुलाकात मुहम्मद अली (22) से हुई। मुहम्मद असम के बरपेटा जिले के रहने वाले हैं। वे आठ साल पहले 14 साल की उम्र में पिता के साथ दिल्ली आ गये। दिल्ली के टिकरी बॉर्डर में 8ग्10 की झोपड़ी में 1300 रुपये किराया देकर रहते हैं। हैंडपम्प का पानी पीते हैं। सरकार करोड़ों रु. खर्च कर विज्ञापन करवाती है कि यह पानी पीने योग्य नहीं है लेकिन पीने के पानी का व्यवस्था नहीं करती है। मुहम्मद आठ साल पहले जब अपना गांव छोड़कर दिल्ली आये उसके बाद वह अपने गांव नहीं गये। पिता की उम्र ज्यादा होने के कारण वह वापस गांव चले गये हैं। मां और तीन बहनें पहले से ही गांव में रहती हैं। मुहम्मद उनको याद करता हैं और वे लोग मुहम्मद को याद करते हैं, लेकिन 8 साल से किसी को कोई देखा नहीं है, फोन पर बात हो जाती है। जब कोई गांव जाता है तो मुहम्मद अपना फोटो उनको देता है कि उनके घर तक पहुंचा दें। इसी तरह उधर से परिवार वाले अपना फोटो भेज देते हैं। मुहम्मद अभी भी पढ़ना चाहता है, वह गांव जाकर अपने मां-बहन से मिलना चाहता है लेकिन जा नहीं पा रहा है। मुहम्मद घर का अकेला कमाऊ सदस्य है, उसको चिंता है कि ठंड में कूड़े कम मिलते हैं घर का खर्च कैसे चलेगा।
जहांगीरपुरी के केब्लाक में बंगाल के लालगढ़ से आये बबलू (बबलू मुसलमान हैं लेकिन नाम से हिन्दू लगते हैं संघ परिवार इनको भी हिन्दू बताकर घर वापसी करा सकता है) रहते हैं। बबलू 7-8 साल की उम्र में मां-पिता के साथ दिल्ली के भलस्वा इलाके में आ गये। पिता और मां एक गोदाम में काम करते थे जहां पर बात-बात में इनको गाली सुनने को मिलती थी। एक दिन वह काम छोड़कर नरेला चले गये जहां पर दो रात उनको भूखे पेट रहकर गुजारनी पड़ी। भूख मिटाने के लिए बबलू ने कूड़ा बिनना शुरू कर दिया। तब से लेकर आज तक वह कूड़ा बिनने का काम ही करते हैं। वह पत्नी और दो बच्चों के साथ केब्लॉक में झोपड़ी डालकर रहते हैं जिसके लिए उनको करीब 2000 रुपये चुकाने पड़ते हैं। इस बस्ती में करीब 300 परिवार रहते हैं। वे सभी लोग मुस्लिम हैं और बंगाल के लालगढ़ इलाके के रहने वाले हैं। इस बस्ती के लोग कूड़ा बिनने के लिए राजपुरा रोड, मल्कागंज, तिमारपुर व माल रोड जाते हैं। बबलू से यह पूछने पर कि रोहणी नजदीक है यहां क्यों नहीं  जाते, तो बबलू बताते हैं कि रोहणी में कूड़ा नहीं मिलता है क्योंकि यहां प्राइवेट कम्पनियां कूड़ा उठाती हैं। इसी बस्ती में रहमान, सोनू व सलामन से मुलकात हुई जो कि 12-14 वर्ष के उम्र के हैं और पढ़ना चाहते हैं लेकिन इनके पास समय नहीं होता। वे सुबह 5 बजे ही कूड़ा बिनने के लिए मल्कागंज जाते हैं दोपहर 3-4  बजे वापस लौटते है तो खाते हैं और सो जाते हैं। शाम को फिर किसी इलाके में कुड़े की तलाश में निकल जाते हैं।
दक्षिणी दिल्ली के तेहखण्ड व तुगलकाबाद में असम व बंगाल के हजारों मुस्लिम परिवार रहते हैं जो कूड़ा चुनकर अपना तथा बच्चों का पेट पालते हैं। तेहखण्ड में सरकारी जमीन पर रेलवे लाईन के किनारे झुग्गियां ंहैं जहां पर अधिकांश परिवार बंगाल के है और कुछ असम के हैं। ये लोग 15-25 साल से यहां रह रहे हैं। इन सरकारी जमीन पर झुग्गियों का किराया भी गांव वाले इनसे वसुलते हैं। तुगलाकबाद किले के अंदर जंगल में झुग्गियां हैं जहां पर असम से आये 300-350 परिवार रहते हैं। इन झुग्गियों का किराया तुगलकाबाद गांव के लोग लेते हैं। यह लोग कूड़े से लोहे के टुकड़े बिनने का काम करते हैं। वे सुबह 4-5 बजे परिवार के साथ हाथ में चुम्बक लिये हुए औद्योगिक क्षेत्र तथा तुगलकाबाद लैंड फिल एरिया में कूड़ा बिनने के लिए जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा लोहा पाने के लिए डम्फर गाड़ियों के पास में पहुंच जाते हैं जिससे कभी-कभी इनको दुर्घटना का शिकार होना पड़ता है। इनके हाथ-पैर टूट जाते हैं और कभी कभी तो जान भी चली जाती है। बच्चे घर पर रहते हैं। कभी कभी कोई स्वयंसेवी संस्था पढ़ाने आ जाती है तो बच्चे इकट्ठे हो जाते हैं, तो कभी कोई दलिया या खिचड़ी बांट जाता है जिसे बच्चे चाव से खाते हैं। वे पढ़ना चाहते हैं लेकिन स्कूल नहीं है।
क्या कभी कोई मोदी, विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण समिति व बजरंग दल जैसी संस्था मुहम्मद, रहमान, सोनू व सलमान को पढ़ाने का बीड़ा उठा पायेगी? बबलू के मां-बाप जैसे मजदूरों को इज्जत की रोटी दिला पायेगी? क्या कभी इनके अधिकारों को लेकर संसद में हंगामा होगा? एक तरफ धर्मांतरण के मुद्दे पर संसद ठप पड़ी है तो वहीं इसी संसद से मजदूर विरोधी, किसान विरोधी, जन विरोधी बिल पास होते जा रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कटौती हो रही है और संसद मौन रहता है। आदानी जैसे उद्योगपतियों को सरकारी बैंक से 62 हजार करोड़ रू. देने पर सहमति हो जाती है, न तो इसके खिलाफ संसद में और न ही सड़क पर आवाज सुनाई देती हैं। सबका साथ सबका विकास का नारा देकर सत्ता में आयी मोदी सरकार क्या धर्मांतरण और पर्रावर्तन जैसे मुद्दे को उठाकर जन विरोधी कानून से जनता का ध्यान भटकाना चाहती है? क्या विपक्षी पार्टियांे का काम एक मुद्दे को लेकर झूठी शोर-शराबा करना है या श्रम कानून, भू-अधिग्रहण कानून में हो रहे बदलाव, शिक्षा-स्वास्थ्य में हो रही कटौती को भी जनता के सामने लाना है? भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ माला के साथ भालाका मंत्र दे रहे हैं, क्या यह लोगों को भड़काने वाला वक्तव्य नहीं है? इसके लिए आदित्यनाथ पर कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी अपने मंत्रियों और सांसदों पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं। वे आर.एस.एस. को कहते हैं कि वह मंत्रियों, सांसदों को काबू में रखे। इससे साफ जाहिर होता है कि देश को आर.एस.एस. ही चला रहा है। क्या भारत सरकार लोकतंत्रधर्मनिरपेक्षके सिद्धांत को छोड़कर फासीवादी, साम्प्रदायिक राह पर चल पड़ी है?

Thursday, December 18, 2014

लालकुंआ में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने वालों का विरोध करो


लालकुआँ (नैनीताल), उत्तराखण्डः  10 दिसंबर को एक लड़का और लड़की के घर से चले जाने के की घटना को हिंदुत्ववादी संगठनों के सांप्रदायिक रंग देने की पूरी कोशिश की क्योंकि लड़का मुस्लिम था और लड़की हिंदु। लड़की के घर वालों ने लड़के पर अपहरण का केस दर्ज कराया जिसको पुलिस ने दर्ज कर लिया लेकिन लड़के के परिजनों द्वारा अपने लड़के की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने पर पुलिस ने गुमशुदगी भी दर्ज नहीं की। इसी बीच ऐसे मुद्दों की ताक में बैठे रहने वाले सांप्रदायिक संगठन (आर.एस.एस, बजरंग दल, भाजपा और एबीवीपी) अपने पूरे दम खम से इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने और मुस्लिमों के खिलाफ जहर उगलने में मशगूल हो गए। उन्होंने जुलूस निकालकर, कोतवाली का घेराव कर डीएम से मिलकर अपनी सक्रियता का प्रदर्शन किया।  इससे पूर्व लालकुंआ में ही 7 वर्षीय बालिका चंचल के गुम होने पर हमारे द्वारा किए गए आंदोलन के दौरान निमंत्रण देने के बाद भी एक भी दिन संगठनों के नेताओं/कार्यकर्ताओं ने अपनी शक्ल तक भी नहीं दिखाई। असल में यही पाखंड ही इन का चरित्र है।
14 दिसंबर में इन संगठनों ने सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर महिला सुरक्षा के नाम पर एक महापंचायत का आयोजन किया जिसका प्रचार पूरे इलाके भर में माईक से किया गया। यह जानते हुए कि इस मुद्दे को लेकर शहर में पहले ही काफी तनाव हैए पुलिस प्रशासन ने इन महापंचायत को नहीं रोका। महापंचायत में परिवर्तनकामी छात्र संगठन व प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के कार्यकर्ता भी पहुंचे। महापंचायत में मुस्लिमों के खिलाफ जमकर जहर उगला गया। आर.एस.एस और भाजपा के नेताओं से आगे बढ़कर सपा के जिलाध्यक्ष संजय सिंह अपनी कट्टरपंथी और सांप्रदायिक सोच का मुजाहिरा कर रहे थे। वे अपने को आर.एस.एस और भाजपा से भी बड़ा सांप्रदायिक राजनीति का चैंपियन घोषित करना चाह रहे थे। संजय सिंह ने कहा कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होने पर हमें दंगा मंजूर है जिससे हमारे हिंदु समाज का सर गर्व से ऊंचा उठा रहे। आर.एस.एस के नेता राधेश्याम यादव ने कहा कि हिंदू समाज का सर शर्म से ना झुके इसके लिए जरूरी है कि  उस लड़के को लालकुंआ में कदम न रखने दिया जाए। बजरंग दल के नेता ने कहा कि हिंदू लड़कों द्वारा मुस्लिम लड़कियों से शादी करने पर उनको कोई नहीं पूछता सब मुस्लिमों को पूछते हैं। इसलिए हमें एक ऐसा हिंदू कोष बनाना चाहिए ताकि ऐसे लड़कों पर उससे खर्च किया जा सके। ये बातें तो खुलेआम 400 लोगों के बीच कही जा रही थी। सुनने मे ये भी आ रहा है कि कई गुप्त बैठकें शहर में की गईँ। उनमें कितना जहर उगला गया होगा इसकी कल्पना की जा सकती है।
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र व पछास के कार्यकर्ता को अपनी बात रखने नहीं दी गई। जब पछास कार्यकर्ता बात रख रही थी, जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक विचारों का विरोध किया थाए तो उनका माइक छीनकर उनके व अन्य महिला कार्यकर्ताओं के साथ धक्कामुक्की की गई। पछास कार्यकर्ता के साथ संघी मंडली ने मारपीट की। ये बात गौरतलब है महिला सुरक्षा के नाम पर बुलाई गई इस महापंचायत में महिलाओं को नहीं बुलाया गया था और जो महिलाएं अपनी पहलकदमी पर पहुंची उनके साथ संघियों द्वारा अभद्र व्यवहार किया गया। ये है संघियों की महिला सुरक्षा। दरअसल महिला सुरक्षा की आड़ लेकर वह सांप्रदायिकता व दंगा फैलाने के फिराक में थे।
प्रगतिशील महिला एकता केंद्र व परिवर्तनकामी छात्र संगठन कार्यकर्ताओं ने जब मारपीट की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो पुलिस ने एफ.आई.आर दर्ज करने के बजाए समझौता कराने वाली समझौताकार की भूमिका में उतर आई। कई घंटों बाद जाकर ही उन्होंने तहरीर ली। पुलिस प्रशासन यह जानती है कि मुजफ्फरनगर में ऐसी ही एक महापंचायत के बाद दंगे हुए थे लेकिन फिर भी उसमें न सिर्फ महापंचायत को नहीं रोका बल्कि महापंचायत के समय वहां एक भी पुलिस कर्मी नहीं था न ही उसने भाषणों की रिकॉर्डिंग की। जबकि थाना 50 मीटर दूर था।

Monday, October 27, 2014

किसानों ने इ.सी.एल. को आईना दिखाया

                                                      डॉ. मिथिलेश दाँगी
इस्टर्न कोल लिमिटेड (इ.सी.एल.) का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक खदान है राजमहल खनन परियोजना ललमटिया। यह परियोजना झारखण्ड प्रदेश के गोडा जिला के बोआरीजोर प्रखण्ड में स्थित है। कुछ लोग बताते हैं कि यह परियोजना एशिया की सबसे बड़ी परियोजना है। इस परियोजना का कोयला एन.टी.पी.सी. के फरक्का तथा कहलगांव बिजली उत्पादन केन्द्रों को दी जाती है।
जैसा कि सभी जानते हैं इस तरह की खनन परियोजनाओं की जब शुरुआत की जाती है तब विकास की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। लोग उसी विकास के झांसे तथा मालिक से नौकर बनकर अपने आने वाली संतानों के उज्ज्वल भविष्य का दिया स्वप्न देखकर अपनी पूर्वजों की थाती को बेरहम परियोजनाओं के हवाले कर देते हैं। ज्यों-ज्यों समय गुजरता जाता है त्यों-त्यों इन जमीन मालिकों को अपने इस कुकृत्य पर रोना आता है। कहते हैं न ‘‘अब पछताए होत क्या जब चिडि़या चुग गई खेत।’’ ऐसे लालची लोग अपने तथा कथित उदार कृत्यों के कारण देश के करोड़ों विस्थापितों में शामिल होकर गुमनामी के अंधेरे में गुम हो चुके हैं तो कुछ लोग आज भी लालच के चश्मे के कारण आंखों से देखकर भी मक्खी निगल रहे हैं।
राजमहल परियोजना में भी प्रारम्भिक दौर के बड़े-बड़े वायदों के साथ लोगों की जमीने ली गई। लोग ने बड़े सपनों के कारण अपनी स्थायी संपत्ति से हाथ धो बैठे। हांलाकि प्रारम्भ में इस परियोजना ने कुछ लोगों को पुनर्वासित भी किया तथा कुछ मुट्ठीभर चालाक एवं पहुंच वालों को नौकर भी बनाया परन्तु 1990 के बाद विश्व के कॉरपोरेट जगत में कुछ घिनौने परिवर्तन हुए वह था ‘‘सामाजिक सरोकारों के स्थान पर सिर्फ लाभ की ललक’’। इस परिवर्तन ने उत्पादन को बेतहाशा बढ़ाने
की सोची और अधिक लाभ के वशीभूत होकर सारे कार्यों को निजी कम्पनियों के हवाले कर दिया, नतीजतन नयी बहालियाँ
रूक गईं। सामाजिक कार्यों के नाम पर लीपापोती शुरू हो गई। जमीन दाताओं को नौकरी के नाम पर किसान से ठेका
मजदूर बना दिया गया और फिर 5-8 साल के भीतर उन्हें नगरों में दैनिक मजदूरी करने पर विवश कर दिया। कम्पनी द्वारा
नौकरी, घर, पानी, बिजली, स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपलब्ध कराने का वादा हमारे राजनेताओं के वायदों की तरह हवा हो गए। ललमटिया परियोजना के खनन पीट 100-200 मीटर की दूरी पर बसा है लोहण्डिया बाजार। यहाँ अधिकांश लोग व्यापारी वर्ग के हैं। अतः वे चल सम्पत्ति के प्रति ज्यादा आसक्ति रखते हैं। इन्हें अपने पुरखों द्वारा प्रदत्त अचल सम्पत्ति में ‘अ’ उपसर्ग इनके व्यवसाय की वृद्धि में नकारात्मक दिखाई दिया अतः उसे विकास हेतु नष्ट करने की ठानी और ललमटिया परियोजना में जाकर अंचल को ‘चल’ में बदल दिया। इस परिवर्तन ने कम्पनी के अधिकारियों को गाँवों में विरोध एवं लोगों के संघर्ष के कारण भीगी बिल्ली बने थे आज बब्बर शेर बना दिया। अब कम्पनी ने इस गाँव के कुछ लालची युवकों को ग्राम विकास समिति की सलाह दी और यह लालच दिया कि सी.एस.आर. (सामाजिक दायित्व निर्वहन) का कार्य उनके माध्यम से ही कराया जाएगा। लड़के लालच के दलदल में फंस गए। कम्पनी ने गाँव के बीच से जाने वाली सड़क को बन्द कर दिया
तथा गाँव के बाहर से उसे तीनों ओर से घेरते हुए कच्ची सड़क बना दिया जिस पर चौबीसों घण्टे यातायात के वाहनों का आवागमन जारी रहता है। इधर इस गाँव की महिलाओं को शौच के लिए परेशानी होनी शुरू हो गई क्योंकि ना तो कम्पनी ने इतने करीब गाँव में लोगों के लिए न्यूनतम आवश्यक शौचालय की व्यवस्था की और ना ही कम्पनियों के माध्यम से विकास का ढिंढोरा पीटने वाली सरकारों ने इस सम्बन्ध में सोचा। इस तत्कालिक कारण के अलावे कम्पनी ने जमीन लेने के समय जितने भी वायदे किए थे उनमें से एक भी पूरा नहीं किया गया। कम्पनी के इस वादा खिलाफी के खिलाफ गाँवों के कुछ युवक तथा महिलाओं ने कम्पनी के कार्यों का खिलाफत करने का मन बना लिया। संघर्ष के नए पौधों को सींचने का कार्य आजादी बचाओ आन्दोलन के संघर्ष वीरो ने किया। अब वे संघर्ष में परिपक्व हो गए हैं। इन लोगों ने इ.सी.एल. एवं उनकी
अनुषंगी कम्पनियों के कार्यों को पहली बार जून माह में 15 दिनों के लिए रोक दिया। कम्पनी के लोग आन्दोलनकारियों से वार्ता करने को तैयार हुए। जिला प्रशासन की मध्यस्थता में कम्पनी के अधिकारियों एवं ग्रामीणों के बीच वार्ता हुई। ग्रामीणों ने कम्पनी को पूर्व में किए गए सभी वायदों को याद दिलाया और पुनः लिखित माँग पत्र सौंपा। कम्पनी ने उन सभी कार्यों को पूरा करने के लिए 15 दिन का समय लिया। परन्तु जैसा आज तक होता आया है। जिला प्रशासन ने कम्पनी के साथ मिलकर अपने वायदे के अनुसार काम करने के स्थान पर नेतृत्व कर रहे लोगों को झूठे मुकदमें में फंसा दिया। 
काम बंदी के दौरान हुए हानि का ठिकरा इन युवकों के सिर डाल दिया तथा करोड़ों के हर्जाने का भय इन युवकों को दिखाया। एक बार भी प्रशासन एवं कम्पनी के लोगों ने यह विचार नहीं किया कि आज जो स्थिति उत्पन्न हुई है उसके असली जिम्मेदार वे ही लोग हैं। हर्जाना तो इन्हें ही भरना चाहिए आन्दोलनकारियों को नहीं। यहाँ युवकांे ने साहस का परिचय दिया और अभयता के साथ आन्दोलन को जारी रखा। आज कम्पनी द्वारा किए जा रहे गैर कानूनी कार्यों के विरुद्ध लोगों में जबरदस्त संघर्ष का उबाल आ गया है।
अब कम्पनी के वादा ‌िखलाफी पर एक नजर -
1. कम्पनी ने वादा किया था कि स्थानीय युवकों को कम्पनी में स्थायी नौकरी देंगे। इसके विपरीत कम्पनी ने अपने आउटसोर्सिंग का कार्य करने वाली कम्पनियों में युवकों को अस्थायी तौर पर ठेका मजदूर बनाया फिर 2-3 वर्षों में 90ः की छंटनी कर उन्हें पलायन करने को मजबूर कर दिया।
2. घनी आबादी के अंतिम मकान से 100 मीटर की दूरी से कम में ब्लास्टिंग करना मना है परन्तु कम्पनी ने 10-20 मीटर की दूरी पर हैवी ब्लास्टिंग शुरू कर दीया। इससे आसपास के सभी घर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। घर की क्षतिपूर्ति का मुआवजा मांगने गए 15 युवकों पर रंगदारी का मुकदमा कम्पनी ने ठोक दिया। इस प्रकार कम्पनी ने चोरी और सीना जोरी की कहावत को चरितार्थ किया है।
3. ब्लास्टिंग एक निश्चित अवधि दिन के 12-1 बजे के बीच करना निर्धारित किया गया था। हैवी ब्लास्टिंग तो रात के 8 बजे भी करना शुरू किया। कई बार शाम के समय कई घण्टों में चूल्हे पर बन रहा भोजन ब्लास्टिंग के कंपन से जमीन पर गिर गया। इस हैवी ब्लास्टिंग का विरोध करने पर इसका असर एक दिन तक पड़ता है दूसरे दिन वही प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस ब्लास्टिंग का कंपन खदान से 3-4 किमी. तक अनुभव किया जा सकता है।
4. कम्पनी ने सभी घरों में शौचालय निर्माण के लिए लोहंडिया बाजार के गृहस्वामियों के खातों में नगद रुपए 25 जुलाई से 10 अगस्त 2014 तक जमा करने का लिखित आश्वासन दिया था परन्तु सितम्बर बीत जाने तक भी ऐसा नहीं किया गया।
5. खदान का पानी बरसात में लोगों के खेतों में नहीं छोड़कर नाले में छोड़ना था परन्तु कम्पनी लोगों की फसलों को बर्बाद करने की नीयत से उनके खेतों में छोड़ देती है जिससे कई किसानों की फसल नष्ट हो गयी।
6. पेयजल, शिक्षा, बिजली एवं स्वास्थ्य सुविधा देने का वचन आज तक अपने पूर्ण होने का बाट जोह रहा है।
7. कम्पनी ने वार्त्ता के समय लोगों को आश्वस्त किया था कि वे सभी मुकदमें बिना शर्त वापस लेगी लेकिन वक्त आने पर वह गिरगिट की तरह रंग बदलती है और भ्रष्ट झारखण्डी पुलिस को अपने वश में करके नेतृत्वकारी युवकों को गिरफ्तार करने आधी रात में उनके घरों पर जाती है और घर के सदस्यों के साथ गाली गलौज करती है। ऐसे कुकृत्यों एवं दमन ने लोगों को भयभीत करने के स्थान पर एकजुट कर शोषण के खिलाफ दृढ़ संकल्पित कर दिया है जिसका नतीजा है कि सितम्बर के प्रथम सप्ताह में पुनः खदान का खनन कार्य लोगों ने दूसरी बार पूरी तरह ठप कर दिया। अब लोगों ने 8 जुलाई 2013 में आए सर्वोच्च न्यायालय के एक अहम फैसले जिसमें कहा गया है कि ‘‘खनिज का मालिक जमीन मालिक ही है सरकार नहीं’’ के अनुरूप आगे होने वाले विस्तार को रोकने के लिए पूरी तरह कमर कस के तैयार हैं। 
साभ्‍ाारः पीपुल न्यूज नेटवर्क (पीएनएन)

Sunday, October 26, 2014

छत्तीसगढ़ में कोयला खदान आवण्टन में महाघोटाला

                                                                     एस.के. राय
आजादी बचाओ आन्दोलन के अथक प्रयास से देश की कोयला खदान घोटाले पर कैग (मुख्य लेखाधिकारी) के साथ देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी इसे संज्ञान में लेने को बाध्य होना पड़ा, कैग ने तो सम्पूर्ण देश में 1.86 लाख करोड़ का नुकसान बताया जबकि यह लगभग 50 लाख करोड़ का होता है। आन्दोलन ने देश के कोने-कोने में जब इस विषय पर जनजागरण का बीड़ा उठाया तो एक नया विकल्प भी सामने रखा कि प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? जब संसाधनों की मालकियत के बारे में सवाल उठाया जाने लगा तो न्यायालय को भी यह कहना पड़ा कि प्राकृतिक संसाधनों की मालिक जनता है, इसी आधार पर जब जाँच शुरू हुई तो देश के 218 कोयला खदान आवण्टन को ही अवध्ै ा पाया गया, इन अवैध खदानो ं में 62 कोयला खदानों का केवल छत्तीसगढ़ राज्य में पाया जाना और अधिकांश खदान भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमन्त्री श्री रमनसिंह के शासन में आवण्टन करना सीधा श्री रमणसिंह पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने के लिए पर्याप्त है।
कोयला मन्त्रालय की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ में कोयले का कुल भण्डार 49280.25 मिलियन टन है, इनमें से 11170.6 मिलियन टन कोयला अवैध खदानों में बाटा गया है जिसका न्यूनतम अनुमानित मूल्य 33,51,180 करोड़ रुपये है। शासन के साथ मिलकर उद्योगपतियों ने जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट को अंजाम दिया उसका तार मध्यप्रदेश के एसएमएस इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की एक कम्पनी जिसके ज्वाइण्ट एमडी अजय संचेती बीजेपी के राज्यसभा सांसद हैं और बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी वर्तमान में केन्द्रीय मन्त्री के करीबी माने जाते हैं। भटगाँव कोयला खदान के साथ-साथ नवीन जिंदल स्टील एण्ड पावर जो रायगढ़ जिले में स्थित हैं।
आजादी बचाओ आन्दोलन के साथी यहाँ स्थानीय संगठनों के साथ मिलकर तमनार क्षेत्र में गैर कानूनी रूप से आवंटित गारे की कोयला ब्लाक को निरस्त करने में सफलता के साथ यहाँ पर प्राकृतिक संसाधनों में जन भागीदारी और मालकियत स्थापित हेतु उत्पादक कम्पनी का गठन किया गया जो कम्पनी कानून के अनुसार पंजीकृत भी हो चुकी है, शीघ्र ही यहाँ कोयला उत्पादन शुरू होने की सम्भावना है।
जब तमनार क्षेत्र में आन्दोलन के साथी अवैधानिक कार्य में लिप्त नवीन जिन्दल जो सांसद भी हैं के विरोध में सक्रिय थे तब यह जानकर हैरानी हुई कि आदिवासियों के नाम पर बेनामी जमीन खरीद कर कम्पनी ने किस तरह कानून को मजाक बना दिया। छत्तीसगढ में आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासी नहीं खरीद सकते उसके लिए 170 ख कानून बनाया गया है, इस कानून को धोखा देने के लिए किसी भी आदमी को आदिवासी बनाकर पंजीयन कार्यालय में खड़ा कर दिया जाता है और बनामी पंजीयन भी हो जाता है, यह कार्य शासन-प्रशासन की मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता, डरा धमका कर जन सुनवाई करना,  विरोध करने पर पुलिस द्वारा लाठियाँ चलाने की बात तो आम हो चुकी है, तमनार में भी जन सुनवाई के दौरान नवीन जिन्दल के साथ मिलकर पुलिस ने लाठी चार्ज किया इसमें कई पुरुष महिलाएँ घायल हुए। नवीन जिंदल पर एफ.आई.आर. दर्ज हो चुका है निकट भविष्य में इसकी गिरफ्तारी को कोई टाल नहीं सकता।
वनाच्छादित जैविक संसाधनों से पूर्ण, वन्यजीवों से भरपूर, छत्तीसगढ में आदिवासियों की जीविका का एक मात्र साधन इस प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने के लिए उद्योगपतियों के साथ शासन भी जिस तरह से जनता पर अत्याचार का पर्याय बनता जा रहा है उससे न केवल जनसमुदाय त्रस्त है बल्कि वन्यजीवों के लिए भी अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है, खदान के नाम पर बीहड़ जंगल की बलि दी जा रही है वहाँ के वन्यजीव गाँव की ओर चले आते हैं अब तो शहर पर भी उन्होंने हमला करना शुरू कर दिया है, खदान के कारण मनुष्य और हाथियों के भी संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि हुई है।
सम्पूर्ण क्षति का आंकलन करना किसी भी स्थिति में सम्भव नहीं, पर्यावरण का जो नुकसान होगा उसकी तो भरपाई सैकड़ों वर्षो तक सम्भव नहीं, छत्तीसगढ ही नहीं देश-दुनियाँ में जहाँ भी प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन हुआ है वहाँ प्रकृति का रौद्ररूप देखने को मिला जिसने सम्पूर्ण प्राणिजगत के लिए अस्तित्व का सवाल खड़ा कर दिया है, अब समय आ चुका है कि हम ठहरें और विचार करें कि विकास मनुष्य के लिए या मनुष्य विकास के लिए हैं, उत्तराखण्ड और अभी हाल कश्मीर का महाजलप्लावन, जल सैलाब प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही दुष्परिणाम है। छत्तीसगढ का कोरबा, भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है पिछले 3 वर्ष पूर्व की रिपोर्ट के अनुसार चौथे स्थान पर था आज यदि जाँच हो तो यह दूसरे स्थान पर अवश्य होगा, इसका मुख्य कारण कोयला खदान और ताप विद्युत कम्पनियाँ ही हैं। विकास के नाम पर विनाश की ओर बढ़ते हुए छत्तीसगढ को इन गम्भीर समस्याओं पर विचार करना होगा।
साभारः पीएनएन

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के नाम जापानी की बेटी का खुला पत्र

                                                नाभिकीय ऊर्जा भारत को बर्बाद कर देगी
                                                                 युकिको ताकाहाशी
सेवा में,
श्री नरेंद्र मोदी 
प्रधानमंत्री, भारत
 
प्रिय प्रधानमंत्री जी,
मेरा घर फुकुशिमा में है। मैं भारत-जापान नाभिकीय संधि पर दस्तखत करने और आपके देश में नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों की संख्या बढ़ाने की आपकी योजना को लेकर अपनी गंभीर चिंता जाहिर करना चाहूंगी।
क्या आपको पता है कि फुकुशिमा दाइ-ची की मौजूदा स्थिति क्या है? कृपया फुकुशिमा आकर खुद देख लीजिए कि यहां क्या हो रहा है। तीन साल से ज्यादा हो गए यहां नाभिकीय हादसा हुए, लेकिन यह अब तक जारी है। वास्तव में, यह तो बस समस्याओं की शुरुआत भर है। रेडियोधर्मी पानी अब भी समुद्र में बह कर जा रहा है और इसे रोकने के तरीकों पर शोध हाल ही में शुरू हुआ है।
विकिरण का स्तर इतना ज्यादा है कि प्लाण्ट के विशेषज्ञ एक्सपोजर के तय स्तरों से पार जा चुके हैं लिहाजा इस तबाही को नियंत्रित करने के लिए यहां पर्याप्त कर्मचारी भी नहीं हैं। हमें बताया गया है कि फुकुशिमा दाइ-ची को बंद करने में 30 साल लग जाएंगे, लेकिन मौजूदा हालात में यह बता पाना असंभव है कि इस हादसे को कब तक नियंत्रित किया जा सकेगा। फुकुशिमा के मछुआरों की रोजी-रोटी छिन चुकी है। सुनामी से नावों को बचाने के लिए जिन लोगों ने अपनी जान जोखिम में डाली थी वे अब मछली नहीं पकड़ सकते क्योंकि समुद्र के पानी में रेडियोधर्मी तत्व मौजूद हैं। कोई नहीं जानता कि समुद्र साफ कब हो पाएगा, दोबारा यह जीवनदायी कैसे बन पाएगा। फुकुशिमा के किसान भी विकिरण के स्तर से पीडि़त हैं जो कम नहीं हो रहा। किसी इलाके को अगर एक बार साफ कर भी दिया जाता है, अस्थायी तौर पर भी विकिरण का स्तर कम हो जाता है, तो दोबारा यह बढ़ने लगता है। क्या वह दिन कभी आ पाएगा जब हमारी इतनी ज्यादा प्रदूषित हो चुकी धरती एक बार फिर से उर्वर बन सके?
जरा सोच कर देखिए एक बार, कि जो काम आपके लिए इतना मायने रखता है उसे खो देने पर आपको कैसा महसूस होगा। इतने अस्पष्ट भविष्य के साथ जीना कितना मुश्किल होगा। ऐसे करीब एक लाख से ज्यादा लोग थे जिन्हें अपने घर खाली करने पड़े जहाँ वे पीढि़यों से रह रहे थे, क्योंकि अब उनका घर संक्रमित क्षेत्र में आ चुका है। इनमें ऐसे लोग भी थे जिन्होंने स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के लिए स्वेच्छा से अपने घर
छोड़ दिए। परिवार के परिवार बिखर गए और तमाम लोग आज छोटी-छोटी आवासीय इकाइयों में सिमट गये हैं। इस नाभिकीय हादसे में हमने अपनी जिंदगी, आजीविका, घर, सब कुछ खो दिया। वे सारी चीजें गंवा दीं जिनके लिए इंसान जीता है।
मैं शर्त लगा सकती हूं कि आप यही सोचते होंगे कि इस नाभिकीय हादसे में तो कोई नहीं मरा। यदि यह सिर्फ भूकम्प और सुनामी होता, तो फंसे हुए लोगों को बचाया जा सकता था। चूंकि यहाँ नाभिकीय हादसा भी हुआ था, इसलिए बचावकर्मी उच्च विकिरण वाले क्षेत्रों में जा ही नहीं सके। उन्हें फंसे हुए लोगों की चीख-पुकार सुनाई देती रही, इसके बावजूद वे उनका कोई जवाब नहीं दे पाए। जापान में हमें 40 साल से बताया जाता रहा है कि नाभिकीय प्लाण्ट पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसके बावजूद यह हादसा हुआ। इतना ही नहीं, इस हादसे का कारण अब भी पूरी तरह पता नहीं चल सका है और तबाही जारी है। कोई नहीं जानता कि यह सिलसिला कब थमेगा। हमने पाया है कि नाभिकीय ऊर्जा का स्वच्छ ऊर्जा होना भी एक झूठ है। नाभिकीय ऊर्जा संयन्त्र को लगातार ठण्डा किया जाना होता है। इसमें समुद्र का पानी काम आता है जो ठण्डा करने के बाद उच्च तापमान पर वापस समुद्र में पम्प कर दिया जाता है। नाभिकीय ऊर्जा प्लाण्ट के कारण समुद्र का तापमान बढ़ता है। यह एक तथ्य है कि जब से फुकुई प्रिफेक्चर में नाभिकीय ऊर्जा संयन्त्र को बंद किया गया है, समुद्र के आसपास की कुदरती पारिस्थितिकी नए सिरे से बहाल हुई है।
नाभिकीय ऊर्जा बहुत खर्चीली भी होती है। ईंधन और रखरखाव का तो जो खर्च है वो आता ही है लेकिन अगर कहीं कोई हादसा हो गया तो मुआवजे के तौर पर दी जाने वाली रकम बहुत बड़ी होती है। और आखिरी बात ये कि फ्रांस जैसे विकसित देश भी अब तक नाभिकीय कचरे के निस्तारण का कोई रास्ता नहीं खोज पाए हैं। जापान में तो हम उस कचरे को आओमोरी प्रिफेक्चर स्थित रोक्काशो-मुरा सुविधा केंद्र पर इकट्ठा करते आए हैं- इसके अलावा और कोई तरीका भी नहीं है। नाभिकीय हादसे में जो भारी कचरा पैदा होता है..... रेडियोधर्मी तत्वों से प्रदूषित धरती और अन्य चीजों को तो फिर भी जलाया जा सकता है, लेकिन आप बचे हुए उच्च रेडियोधर्मी ऐश (राख) का क्या करेंगे? फिलहाल तो स्थिति यही है कि इसे सड़क के किनारे छोड़ दिया गया है या फिर फुकुशिमा के पुराने भव्य मकानों के परिसर में रख छोड़ा गया है। रेडियोधर्मी तत्वों पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं होता। इंसान को चेर्नोबिल और फुकुशिमा के हादसों से यह सबक अब सीख लेना चाहिए।
पेड़ों पर चढ़ना, नदी किनारे आराम करना, समुद्र तट पर खेलना, ऐसी सामान्य चीजें भी अब मेरे शहर में मुमकिन नहीं रह गई हैं। मेरे बच्चे तो खैर ये काम अब नहीं ही कर पाएंगे क्योंकि वे रेडियोधर्मिता से चौतरफा घिरे हुए हैं। कोई नहीं जानता कि भविष्य में इसका उन पर क्या असर होगा।
मांओं को डर है कि कहीं उनके दूध में रेडियोधर्मी पदार्थ न घुल गए हों। विकिरण के प्रभाव में आई लड़कियों को शंका है कि वे कभी बच्चे जन पायेंगी या नहीं। हो सकता है कि यह सब किसी विज्ञान के गल्प जैसा जान पड़ता हो, लेकिन फुकुशिमा में जिंदगी फिलहाल ऐसी ही है। और अकेले फुकुशिमा ही संक्रमित नहीं है। रेडियोधर्मी पदार्थों के महीन कण तकरीबन समूचे पूर्वी जापान में बिखरे पड़े हैं। हवा में सांस लेते हुए, खाना खाते हुए या घास पर लेटे हुए सुरक्षित महसूस करने जैसी रोजमर्रा की सामान्य चीजें भी अब हम नहीं कर पाते, जो कि हमारे वजूद का सहज हिस्सा हैं। क्या आप भारत में यही करना चाह रहे हैं?
मैं आपके देश कभी नहीं गयी लेकिन मुझे भारतीय चीजें पसंद हैं, खासकर भारत का खाना। इसमें दिलचस्पी के चलते ही मैंने कुछ सूचनाएं जुटाई हैं और भारत के बारे में मेरी एक धारणा विकसित हुई है। मुझे लगता है कि भारत एक बेहद संस्कृति -संपन्न देश रहा है। नाभिकीय ऊर्जा इस संस्कृति को तबाह कर देगी।
क्यों? क्योंकि यह लोगों की जिंदगियों को बरबाद कर देती है, जिसका संस्कृति के साथ चोली-दामन का साथ होता है। फुकुशिमा में बिल्कुल यही तो हुआ है और मैं उसकी गवाह हूं। यह बात मैं आपसे पूरी ईमानदारी से कह रही हूं। भारत के चमकदार भविष्य के लिए नाभिकीय ऊर्जा जरूरी नहीं है। यदि आपको वाकई लगता है कि वह जरूरी है, तो आप फुकुशिमा आएं और यहां की हकीकत को अपनी नंगी आंखों से खुद देख लें।
साभारः पीपुल न्यूज नेटवर्क (पीएनएन)

Sunday, October 12, 2014

आईसीएचआर के अध्यक्ष का ‘इतिहास बोध’

नयी सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रीत हमला इतिहास पर हुआ है क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है। मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे गये एक लेख- ‘इण्डियन
कास्ट सिस्टमः अ रीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस लेख में उन्होंने लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिये सत्ताधारी वर्ग ने आर्थिक-सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’  इतिहास लेखन की वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972 में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जो इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत होती है। इस लेख में आउटलुक को दिये साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास
किया गया है-

‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-

वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में
होना चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात् विद्वानों द्वारा
किया गया है। जोकि भ्रामक है। वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है।
इतिहास को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास एक विषय के रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर
जैसी संस्था का उदय हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान  सके। इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था बनायी है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर
एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप से स्थापित किये उन तथ्यों पर संदेह  करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।
इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नयी नहीं है। पूर्व मानव संसाधन मंत्री रहे डा0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’ में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमें जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह स्थापित हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और ‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं। ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’ की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।

इतिहास का पुर्नलेखन-
इतिहास के पुर्नलेखन पर पूछे गये एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि ‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया जायेगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दूत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने आयेगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 ‘भारत विजय रैलियों’ मेें राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ती भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के लिए अफीम जैसा है। वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है। जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंश का काल था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है
कि यह धारणा यह स्थापित करती है कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पूर्नलेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और खलनायको को परिभाषित किया जायेगा।

ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’-

प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी जायेगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जायेगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं, वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक
उपकरणों व प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वही दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं। वस्तुतः ‘कलेक्टिव मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद
‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली का अंतिम ‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ वह भी प्रमाणित कर देगी कि मु0 गोरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया। यह सत्य कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह हिन्दूत्व की महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की
संतुष्टी’ के नाम फांसी की सजा सुनाया जा रहा है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर इतिहास को दफन करने की कोशिश की जायेगी।

प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’-
सुदर्शन राव जी ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नाम एक शोध कार्य किया है और उनका मानना है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है- पहला इनकी महाकाव्यों की पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं। प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः इतिहास बदलावो का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्य समाज को समझने का एक स्रोत हो सकता है। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था। ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना चाहता है ताकि धर्म के
आधारपर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए मुसलमानो और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दूओं के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।

राम की अयोध्या-

अयोध्या पर पूछे गये एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव जी ने कहा कि यदि राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जायेगें ओर भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।

प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी-

प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी ‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए
लिखा है कि प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी। यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाये तो कई सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे- यदि महाभारत अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं खाया? तपस्वी रहते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से निर्लज्जतापूर्वक अंगूठा कैसे और क्यों मांगा गया। गौरतलब है कि अपनी अतीतग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को
नजर अंदाज कर दिये होगें। अतीतग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मतुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की। दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है, जब वही ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिये यह दिखाना चाहते हैं कि दलित कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमांस खाने के प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करेगें?

इतिहास बनाम धर्म
इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वही धर्म आस्था का विषय है। परन्तु सुदर्शन राव साहब ने सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी है। तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब यहाँ तक दावा कर दिया है कि सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरो को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के
मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरो का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक कारण था न कि धार्मिक कारण। खैर 1972 मंें स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शमा्र के साथ इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य का ‘इतिहासबोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल समाज और सरकारों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलायेगें तो आने वाला भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।

संपर्कः अनिल यादव
मो0 09454292339

Sunday, April 6, 2014

देश कंगाल और नेता मालामाल

 एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
देश कि जनता भूखी है ये आजादी झूठी है। यह नारा आज से 50 साल पहले महाराष्ट्र के मशहूर चित्रनाट्यकार अन्ना भाऊ साठे ने लगाया था। उन्होंने अनेक सफल फिल्मों का चित्रनाट्य लिखा, परंतु विडंबना देखिये वे खुद गरिबी की मौत दिवंगत हुए।लेकिन मौजूदा लोकसभा चुनावों के लिए मनोनयन दाखिल करने वाले उम्मीदवारों की संपत्ति का ब्यौरा देखिये तो समझ में आ जाये कि जनता कैसे कंगाल है और नेता किस कदर मालामाल है। लोकसभा चुनावों के साथ ओडीशा में विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं और दांतों में उंगलियां दबाने लायक बात यह है कि कालाहाडी की भुखमरी के लिए मशहूर ओडीशा के विधानसभा चुनावों में दस बीस नहीं,बल्कि 103 करोड़पति उम्मीदवार हैं।सारे मूर्धन्य राजनेताओं की संपत्ति में बिना कहीं पूंजी लगाये दुगुणी चौगुणी बढ़ोतरी हो गयी है पिछले पांच साल के दौरान। अब वे मतदाता हिसाब लगायें जो उन्हें वोट डालकर अपना भाग्य विधाता बनाते हैं कि इन नेताओं की बेहिसाब संपत्ति और आय के मुकाबले पिछले पांच साल के दौरान उन्हें क्या मिला और क्या नहीं मिला।
जाहिर है कि लोकसभा चुनावों में जनादेश बनाने के लिए चुनाव प्रचार  अभियान जितना तेज हो रहा है,हर ओवर के अंतराल में जो मधुर जिंगल से हम मोर्चाहबंद होते हैं, फिर ऐन चुनावमध्ये जो आईपीएल कैसिनों के दरवाजे खुलने हैं,जो हवाई यात्राएं तेज हो रही है,जो पेड न्यूज का घटाटोप दिलोदिमाग को व्याप रहा है,उतनी ही तेजी से विदेशी पूंजी के अबाध प्रवाह और निवेशकों की अटूट आस्था बजरिये शेयरों में सांढ़ों की धमाचौकड़ी की तरह चुनाव खर्चों में बेहिसाब कालाधन की बेइंतहा खपत हो रही है और यह धन किसी स्विस बैंक खाते से भी नहीं आ रहा है,जिसे रोका जा सकें। वह कालाधन अगर वोट कारोबार में खप जाता तो बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के कालाधन वापसी अभियान के रुक जाने का खतरा था।जो कालाधन चुनाव में लगा है ,वह इसी देश की बेलगाम अर्थव्यवस्था की रग रग से निकल रही है और जिसे नियंत्रित करने में स्वायत्त चुनाव आयोग भी सिरे से नाकाम है।भ्रष्टाचार को बाकी बेसिक अनिवार्य मुद्दों के मुकाबले मुखय मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही राजनीति का यह असली चेहरा है जो कोयला घोटाले की तरह काला ही काला है।
गौरतलब है कि सोमवार से से शुरु हो रहे लोकसभा चुनावों में तीस हजार करोड़ रुपये खर्च होने का फिलहाल अंदाजा है।आवक और मांग की सुरसाई प्रवृत्ति के मुताबिक यह रकम आखिरकार कितनी होगी कहना मुश्किल है।मौजूदा हालात में सीएमएस के सर्वे के मुताबिक चुनावों पर खर्च होने वाले इन तीस हजार करोड़ रुपये का दो तिहाई ही कालाधन है।लोकतंत्र को अर्ततंत्र में बदलकर नेता जो मालामाल हो रहे हैं और जनता जो कंगाल हो रही है,उसका ताजातरीन सबूत यह है।
अबकी दफा विज्ञापनी तमाम चमकदार चेहरे चुनाव मैदानों में हैं।कालाधन से चलने वाले कारोबार से जुड़े तमाम ग्लेमरस लोग खास उनम्मीदवार है जिनके पास अकूत संपत्ति है और कोई नहीं जानता कि जीत की बाजी जीतने के लिए आखिर अपने अपने हिस्से का कालाधन देश विदेश से  खोदकर कहां कितना वे लगा देंगे। फिलहाल सीएमएस के आकलन को ही सही मान लिया जाय तो अबकी दफा चुनाव कार्निवाल में होने वाला खर्च सारे रिकार्ड ध्वस्त करने जा रहा है।इस खर्च में सरकारों की ओर से वोट बैंक समीकरण साधने के लिए मतदान प्रक्रिया शुरु होने से पहले आचार संहिता के अनुपालन के साथ जो रंग बिरंगी खैरात बांटी गयी,उसे सफेद धन मान लिया  जाये,तो यह खर्च तीस हजार करोड़ से कईगुणा ज्यादा हो जायेगी। अपने अपने हित साधन के लिए कंपनियां मुफ्त में अपने जो साधन संसादन लगा रही हैं,वह भी हिसाब से बाहर है।पार्टियों की सांगठनिक कवायद का भी कोई हिसाब नहीं है।हार निश्चित हर क्षेत्र के उन उम्मीदवारों,जिनकी अमूमनजमानत जब्त हो जाती है या ऐन तेण प्रकारेण जो वोट काटने के लिए मैदान में होते हैं, उनकी कमाई और बचत का भी कोई लेखा जोखा नहीं होता।
सीएमसी के मुताबिक राजनीति दलों की ओर से आठ दस हजार करोड़ रुपये खर्च होने हैं तो निजी तौर पर खर्च की जाने वाली रकम भी दस से लेकर तेरह हजार करोड़ रुपये हैं।
शेयर बाजार की उछाल, सोने की तस्करी से लेकर हजार तौर तरीके के मार्फत देश विदेश से इतनी बड़ी रकम बाजार में खपने जा रही है।समझा जाता है कि अकेले शेयर बाजार मार्फत पांच हजार करोड़ रुपये चुनावों में कपने वाले हैं।अब चर्बीदार नेताओं की सेहत का राज समझ लीजिये।

ओरिएंट क्राफ्ट, गुडगाँव में हुई एक मज़दूर की मौत एवं उसके बाद पुलिस दमन पर फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट

(इस फैक्ट फाइंडिंग टीम में संहति दिल्ली, पर्सपेक्टिव, pudr , वर्कर्स यूनिटी, IMK , मज़दूर पत्रिका, KNS  के साथी मौज़ूद थे )

गुडगाँव सेक्टर 18 स्थित ओरिएंट क्राफ्ट फैक्ट्री में शुक्रवार 28 मार्च को फैक्ट्री के अंदर करंट लगने से एक मज़दूर सुनील कि मौत हो गयी. गौरतलब है कि गुडगाँव कि अधिकाँश फॅक्टरियों में सुरक्षा नीतियों में लापरवाही और अत्यंत तनाव भरे माहौल में काम के दौरान दुर्घटना एक सामान्य घटना बनती जा रही है. मार्च 2012  में भी ओरिएंट क्राफ्ट के ही गुडगाँव सेक्टर 37  स्थित यूनिट में भी सुपरवाइजर द्वारा कैची से एक मज़दूर पर हमले के दौरान भी ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया था.
ओरिएंट क्राफ्ट देश कि सबसे बड़ी गारमेंट निर्यातक कंपनी है, जो कई महंगे विदेशी गारमेंट ब्रांड जैसे कि DKNY मार्क एंड स्पेंसर, फिच, और टॉमी हिलफिगर जैसे ब्रांड्स बनाती है. इस कंपनी के एनसीआर, दिल्ली और गुडगाँव में ही कई यूनिट हैं. सेक्टर 18  स्थित यूनिट में तकरीबन ६०००-७००० मज़दूर काम करते हैं. घटनाक्रम कि शुरुआत शुक्रवार 28 मार्च को हुई, जब किसी हायर मैनेजमेंट या मालिक के सम्भावित दौरे के मद्देनज़र एक दिन पहले साफ़ सफाई के दौरान किसी इलेक्ट्रिक तार के लूज  रह जाने कि वजह से एक मशीन में करंट आ रहा था. कानपूर के इटागा के रहने वाले सुनील, जिसकी उम्र तकरीबन 35  वर्ष थी, जो कि फैक्ट्री में टेलरिंग का काम करता था, सुबह कि शिफ्ट के शुरू होने पर वह जब मशीन पर बैठा, तो करंट लगने से बुरी तरह घायल हो गया. तभी साथ काम करने वाले करमचारियों ने दौड़ कर बिजली सप्लाई को बंद किया और सुनील को कंपनी स्थित डिस्पेंसरी में ही प्राथमिक चिकित्सा के लिए ले गए. हम लोगों से बातचीत के दौरान कंपनी में काम कर रहे अन्य मज़दूरों ने बताया कि डिस्पेंसरी में कभी भी कोई सुविधा या डॉक्टर नहीं होते हैं और डिस्पेंसरी बस एक औपचारिकता के तहत चलाया जाता है , जिसमें एक अनट्रेंड कम्पाउण्डर हर बीमारी के लिए एक ही दवा देते रहते हैं. मज़दूरों ने हमें बातचीत में बताया कि आधे घंटे तक कोई भी कार्यवाही नहीं कि गयी और करंट लगने से हुई नाजुक हालत में भी कंपनी प्रबंधन का रवैया बहुत ही गैरजिम्मेदाराना बना रहा. आधे घंटे के बाद जब एम्बुलेन्स से सुनील को हॉस्पिटल भेजा गया, और कुछ देर बाद मज़दूरों को प्रबंधन ने सुनील कि मौत कि जानकारी उसके ह्रदय गति के रुकने कि वजह से बतायी गयी तब तक कि प्रबंधन कि की गयी लापरवाही एवं इस सफ़ेद झूट पर मज़दूरों का गुस्सा उबाल पड़ा और मज़दूर फैक्ट्री गेट पर आ कर नारे और प्रदर्शन पर अड़ गए.
जैसे कि मज़दूरों का अलग अलग फैक्टरियों का अनुभव है कि फैक्ट्री में लापरवाही से होने वाली मौत कि ज्यादातर घटनाओं में कंपनी प्रबंधन लाश को गायब करने, झूठी रिपोर्ट बनाने, मुआवज़े से मुकरने, आवुं किसी भी तरह कि ज़िम्मेदारी लेने से बचती रहती है. इस बार भी अपने साथी के साथ ऐसा न हो, इसके लिए मज़दूर पहले से ही मुस्तैद थे. इसीलिए सारे मज़दूर फैक्ट्री गेट के सामने आ कर रोड को जाम कर दिए और मुआवज़े एवं उचित न्याय के लिए प्रबंधन के सामने अपनी बात पर दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन करने लगे. इन सब के बावजूद भी जब कंपनी प्रबंधन का रवैय्या टाल मटोल का रहा, और पीछे से प्रबंधन ने पुलिस को भी बुला लिया. तब मज़दूरों ने उत्तेजित हो कर पुलिस के खिलाफ नारे लगाने शुरू कर दिए. पुलिस ने तब बर्बर तरीके से लाठी चार्ज किया और आंसू गैस के गोले भी छोड़े. मज़दूरों ने भी जवाबी कारवाई में पुलिस के ऊपर पथराव किया. पुलिस ने मज़दूरों को गली में एवं घर में घुस कर और दौड़ा दौड़ा कर पीटा. पुलिस के इस बर्बर करवाई में कई मज़दूरों को बहुत ज़यादा चोटें आयी और एक मज़दूर आंसू गैस के सिलिंडर फटने से गम्भीर रूप से घायल हुआ. पुलिस ने हवाई फायरिंग भी कि और इस सब भगदड़ में मज़दूरों को बहुत ज़यादा चोटें आयीं. पर ज़्यादातर घायल मरीज छुप छुप कर गाँव में ही या अपने घर पर जा के इलाज करा रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि गुडगाँव में इलाज कराने से पुलिस उनके खिलाफ भी केस कर देगी.
अगले दिन शनिवार को जब मज़दूर फैक्ट्री पर जा रहे थे, तब पहले पहुचे मज़दूरों ने कंपनी गेट पर कंपनी के सोमवार तक बंद होने कि नोटिस पायी. कुछ मज़दूर वापिस लौट रहे थे और काफी मज़दूर कंपनी गेट पर धीरे धीरे जमा हो गए. कंपनी गेट पे शुक्रवार से ही काफी पुलिस फाॅर्स इकठ्ठा हो रखी थी, और एक बार फिर से पुलिस और मज़दूरों के बीच झड़प शुरू हो गयी. पुलिस ने दोबारा लाठी चार्ज कि और मज़दूरों ने भी पुलिस पर जम कर पथराव किया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मज़दूर कि मौत का कारण करंट बताया गया था. मज़दूरों का गुस्सा मैनेजमेंट कि लापरवाही कि वजह से मौत, उस पर हार्ट अटैक से मौत जैसी झूठी बात, डिस्पेंसरी में बुनियादी सुविधाओं कि कमी, सुनील को अस्पताल में भर्ती करने में देरी, एवं मृत्युपरांत मुआवजे में टाल मटोल पर था.
इन सब के आलावा रोज़ रोज़ काम के दौरान छोटी मोटी बहसें अत्यंत तनावपूर्ण एवं निचोड़ने कि हद तक थकाऊ कार्य व्यवस्था से मज़दूर पहले से ही परेशान रहते हैं. एक मज़दूर को एक मिनट से भी कम समय में एक पीेछे कि सिलाई करनी पड़ती है. औसतन ८० पीेछे प्रति घंटे का टारगेट होता है. आज कल इस समय को ट्रैक करने के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक बार टाइमर कि मदद ली जाती है, जो प्रति घंटे फिनिश होने वाले पीसों के समय कि निगरानी करता है. इस टारगेट को भी समय समय पर बढ़ाया जाता रहता है, जिसमें सेकंड दर सेकंड का हिसाब किया जाता है.
"अगर शर्ट की डिजाइन सरल है , तो उत्पादन लक्ष्य प्रति घंटे 150-200 शर्ट तक कि होती हैं . 3-4 साल पहले , सुपरवाइजर  स्वयं स्टॉप घड़ियों के साथ  प्रत्येक पीस पर लगने वाले समय कि निगरानी करते थे , पिछले साल से मैग्नेटिक कार्ड रीडर के द्वारा समय कि नागरानी राखी जाती है, हरेक सिलाई मशीन प् कार्ड रीडर लगा है, और कपडे के हर बण्डल के साथ एक मैग्नेटिक कार्ड भी आता है, जिससे हरेक पीस पर लगने वाले समय और हरेक घण्टे में फिनिश होने वाले पीसो का सेकंड दर सेकंड  के हिसाब से समय रखा जाता है \ मृतक मज़दूर के भतीजे से बातचीत में पता चला कि फैक्ट्री के अंदर जिस तरह से समय का हिसाब रखा जाता है, वह पर किसी को बात करने, इधर उधर देखने कि फुर्सत ही नहीं है, यही कारन है कि कि बड़ी दुर्घटना हो जाने पर भी लोग एक दूसरे को देख या उसका संज्ञान नहीं ले सकते है |
अत्यंत तनाव भरे माहौल में काम करने से मज़दूर अक्सर बीमार, चिड़चिड़े, और अवसादग्रस्त रहते हैं.
परमानेंट मज़दूरों को इस फैक्ट्री में 5900  रुपये (800  पी ऍफ़ काटने के बाद 5100 ) और कॉन्ट्रैक्ट वर्कर को तक़रीबन 5700  रुपये मिलते हैं. ३ घंटे रोज़ एवं औसतन  40 -60 घंटे महीने में ओवरटाइम आम बात है.
पुलिस ने मज़दूरों के खिलाफ सेक्टर १८ में एस एच ओ बिजेंदर सिंह के कम्प्लेन के आधार पर ऍफ़ आई आर दर्ज कि है, जिसमें कंपनी के मज़दूर रामानंद, संजीव, कैलाश, गीता, घनश्याम, केसरदेवी, पुष्पादेवी को नामजद किया है और १०० अनाम प्रदर्शनकारियों पर भी ऍफ़ आई आर दर्ज कि है. मज़दूरों से बात चीत में उन्होंने बताया कि ज्यादातर कम्पनियां किसी भी विवाद के समय केस दर्ज को परमानेंट मज़दूरों को निकाल कर ठेके मज़दूरों की बहाली के मौके के रूप में इस्तेमाल करती हैं
-संतोष