Saturday, March 23, 2013

भगत सिंह: 20वीं सदी के महान विचारक

                         देवेन्द्र प्रताप
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा नामक गांव में हुआ। इनके दादा अर्जुन सिंह पक्के आर्य समाजी थे। अर्जुन सिंह के तीन पुत्र-किशन सिंह, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह-भारत के स्वतंत्रता संग्राम से विभिन्न स्तरों पर जुड़े रहे। उनके चाचा अजीत सिंह पंजाब के सम्मानित किसान नेता थे तथा पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के लिए विख्यात थे। इसी तरह भगत सिंह के दूसरे चाचा स्वर्ण सिंह भी अंग्रेजों की हुकूमत के कट्टर विरोधी थे। इसके चलते अंग्रेज सरकार ने इन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था। भगत सिंह के क्रांतिकारी व्यक्तिव के निर्माण में उस समय की क्रांतिकारी परिस्थितियों के साथ ही उनके परिवार की क्रांतिकारी पृष्ठभूमि ने भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव राजगुरु को फांसी दे दी थी।

क्रांतिकारी आंदोलन में भगत सिंह का प्रवेश ऐसे समय हुआ, जब आंदोलन के कुछ नेता अराजकतावाद से मुक्त होने की दिशा में सोचने लगे थे। साथ ही उनमें से कुछ क्रांतिकारी ऐसे भी थे, जो 1917 में रूस में हुई समाजवादी क्रांति से बेहद प्रभावित थे। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के शीर्ष नेता शचीन्द्र नाथ सान्याल भी ऐसे ही नेताओं में थे। अध्यात्मवादी होने के बावजूद (1922 तक) उन पर समाजवादी विचारधारा का भी अच्छा खास प्रभाव था। इसे समझने के लिए उनकी दो पुस्तकें 'विचार विनिमय' और 'बंदी जीवन' विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं। हालांकि बाद के दिनों तक वे अध्यात्मवाद से अपना संबंध नहीं तोड़ पाए। इसी तरह दो सच्चे क्रांतिकारी मित्रों असफाक उल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल (जिनमें से यदि एक सच्चा मुसलमान था, तो दूसरा पक्का आर्य समाजी) के ऊपर भी समाजवादी विचारधारा का अच्छा खासा असर था। असफाक और बिस्मिल की शहादत हिंदू-मुस्लिम एकता और दो क्रांतिकारियों की दोस्ती की एक शानदार मिशाल है। असफाक और बिस्मिल की ओर से जेल से लिखे गए पत्रों और खासकर ‘बिस्मिल की आत्मकथा’ पढ़कर से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी सशस्त्र एवं गुप्त गतिविधियों पर एकतरफा जोर के भटकाव को समझने लगे थे। 1925 में काकोरी की ट्रेन डकैती के बाद जब एचआरए के अधिकांश शीर्ष नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तब पंजाब के क्रांतिकारियों ने असफाक और बिस्मिल के चिंतन के उसी सूत्र को पकड़ा और क्रांतिकारी कार्यों में जन संगठनात्मक कार्यों के महत्व को समझते हुए 1926 में नौजवान भारत सभा का गठन किया। संगठन की ओर से भगत सिंह को सचिव और भगवती चरण बोहरा को प्रचार सचिव चुना गया। संगठन के निर्माण और विकास में डॉ. सैफुद्दीन किचल, डॉ. सत्यपाल, केदारनाथ सहगल, लाला ंिपंडी दास और लाला लालचंद फलक जैसे वामपंथी नेताओं ने भी सहयोगी भूमिका निभाई। नौजवान भारत सभा देश में मौजूद जातीय और धार्मिक भेदभाव को जनता के संगठित होने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा मानता था। इसलिए संगठन से जुड़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक फार्म भरवाया जाता था। इस फार्म में स्पष्ट तौर पर यह लिखा था कि ‘संबंधित सदस्य अपने समुदाय के बजाए देशहित को महत्व देगा।’ संगठन ने अपने राजनीतिक कार्यक्रम में घोषणा की कि उसका मकसद ‘देश में मजदूरों-किसानों के समाजवादी गणतंत्र की स्थापना करना है और इसके लिए वह बिना किसी जातीय और धार्मिक विभेद के मजदूरों और किसानों के बीच समाजवादी विचारों का प्रचार करेगा तथा उसकी आर्थिक और सामाजिक मांगों के आधार पर उनको संगठित करने का प्रयास करेगा।’ भगत सिंह इस बात को बखूबी जानते थे कि जब तक जनता जातिगत और धार्मिक संकीर्णता की गिरफ्त में रहेगी, तब तक उसकी सच्ची एकता संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने ‘दो मोर्चों पर एक साथ काम करने की जरूरत’ पर बल दिया। यही वजह थी कि एक तरफ जहां उन्होंने विदेशी सरकार के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की वकालत की, तो दूसरी ओर भारतीय समाज में मौजूद जातिगत और धार्मिक भेदभाव को पैदा करने वाले आर्थिक कारकों और उसके दर्शन पर तगड़ा हमला बोला।
जून 1928 में भगत सिंह ने ‘अछूत समस्या’ नामक लेख में अध्यात्मवादियों पर व्यंग्य कसते हुए लिखा, 'हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है। लेकिन, यही लोग दलितों को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं तथा उन्हें पशुओं से भी गया बीता समझते हैं। ऐसे में वे (दलित) जरूर ही दूसरे धर्मो में शामिल होंगे, जहां उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे तथा उनसे इंसानों  जैसा व्यवहार किया जाएगा। फिर यह कहना कि देखो जी इसाई और मुसलमान हिंदू कौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं, व्यर्थ होगा।' दलितों के प्रति वर्णाश्रम व्यवस्था के दार्शनिकों ने जिस तरह का जहर समाज में डाला है, उसका असर भगत सिंह के समय बहुत ज्यादा था। ऐसे में यह जरूरी था कि उस जहर के असर को कम किया जाए और धीरे-धीरे उसे समाप्त किया जाए। दलितों के बारे में मनु मार्गियों ने यह प्रचार किया है कि वे गंदे रहते है, वे म्लेच्छ हैं आदि-आदि। भगत सिंह ने इसका तीखा प्रतिवाद करते हुए लिखा कि 'ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे गरीब हैं। गरीबी का इलाज करो। ऊंचे-ऊंचे कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गंदे नहीं रहते। गंदे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि  मां बच्चों का मैला साफ करने से अछूत तो नहीं हो जाती।'
भगत सिंह को इस बात का भी गहरा एहसास था कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए लौह अनुशासन में ढली एक गुप्त क्रांतिकारी पार्टी होनी चाहिए। वे चाहते थे कि यह पार्टी आम जनता को सशस्त्र क्रांति के लिए न सिर्फ तैयार करे, बल्कि उसे नेतृत्व भी दे। उनकी दृढ़ मान्यता थी कि इस पार्टी का मकसद देश में समाजवाद की स्थापना होना चाहिए। इसीलिए काकोरी कांड के बाद जब एचआरए से जुड़े अधिकांश क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए तो 8-9 सितंबर 1928 को संगठन को पुनर्गठित करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के क्रांतिकारियों ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक बैठक की। इस बैठक में पार्टी के नाम में 'समाजवाद' शब्द जोड़ा गया और इस तरह नए संगठन का  नाम ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ पड़ा। एचएसआरए के गठन के बाद नौजवान भारत सभा पूरी तरह उसके यूथ विंग के तौर पर काम करने लगा। नौजवान भारत सभा की ओर से करतार सिंह सराभा, राम प्रसाद बिस्मिल, असफाक उल्ला खां और काकोरी के अन्य शहीदों के जीवन और उनके राजनीतिक उद्देश्य के बारे में मैजिक लैंटर्न के माध्यम से प्रचार किया जाता था। जल्दी ही प्रचार का यह माध्यम जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो गया। सभा हर साल काकोरी दिवस, करतार सिंह सराभा दिवस, मई दिवस, जलियांवाला बाग दिवस जैसे आयोजन करती थी। इन कार्रवाइयों से बड़ी संख्या में लोग क्रांतिकारी पार्टी (एचएसआरए) से जुड़ने लगे।
भगत सिंह के सिद्धांतों के पेरियार भी समर्थक थे। जब 23 मार्च को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया, तो वे बहुत दुखी हुए। 29 मार्च 1931 को भगत सिंह को याद करते हुए पेरियार ने लिखा, 'भगत सिंह को पक्का यकीन था कि उनके सिद्धांत सही थे। उन्होंने जिन तरीकों का इस्तेमाल किया, वे न्याय संगत थे, और उन्हें यही करना चाहिए था। उन्होंने ऐसा न किया होता, तो हम उन्हें ईमानदार नहीं कह सकते थे। इसलिए हम आज कह सकते हैं कि वह एक सच्चे इंसान थे। हमारा पक्का यकीन है कि भारत को केवल भगत सिंह के सिद्धांतों की जरूरत है'।
विचार करने पर हम पाते हैं कि पेरियार की बात बिल्कुल सही है। हमारे देश के नेता ‘पगड़ी’ पहनाने में माहिर हैं। जनता की बात कौन करे, वे शहीदे आजम को भी ‘पगड़ी’ पहनाने से बाज नहीं आए। जबकि, भगत सिंह ने समाजवादी विचारधारा को स्वीकार करने के बाद खुद ही अपनी पगड़ी और लंबे बाल त्याग दिए थे। वे मूर्तिपूजा के भी कट्टर विरोधी थे। इस बात की गवाही उनकी ‘जेल नोटबुक’ भी देती है। जेल नोटबुक में उन्होंने नोट्स लेते हुए लिखा, ‘मैं अपने दोस्तों से कहना चाहंूगा कि वे मेरे बारे में कम से कम चर्चा करेंगे या बिल्कुल ही नहीं चर्चा करेंगे, क्योंकि जब आदमी की ज्यादा तारीफ होने लगती है, तो उसे इंसान के बजाय देव प्रतिमा सा बना दिया जाता है। यह मानव जाति के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात है। सिर्फ कर्मों पर ही गौर करना चाहिए, चाहे वे किसी के द्वारा किए गए हों। अगर लोगों को इनसे सार्वजनिक हित के लिए प्रेरणा मिलती दिखाई दे, तो वे इनकी तारीफ कर सकते हैं, ताकि इनका अनुसरण किया जा सके, लेकिन अगर वे सामान्य हित के लिए हानिकर लगें, तो इनकी निंदा कर सकते हैं, ताकि फिर इसकी पुनरावृत्ति न हो सके।' यह किसी और लेखक का बयान है, लेकिन भगत सिंह को यह अच्छा लगा, इसलिए इसे उन्होंने अपनी जेल नोटबुक में दर्ज कर लिया था। इसलिए सवाल उठता है कि हमारे देश के राजनेता उनके कर्माें और उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के बजाय, उनकी मूर्ति लगाकर और उसे पगड़ी पहनाकर आखिर उन्हें देव प्रतिमा क्यों बनाने पर तुले हैं? क्या जिन सवालों से भगत सिंह ने टकराने की कोशिश की थी, वे सवाल ही अब नहीं रहे? क्या उनका सपना पूरा हो गया? या फिर वे भगत सिंह को पगड़ी पहनाकर उनके सिद्धांतों पर ही धूल-राख डालने का काम कर रहे हैं?

उत्तरांचल में प्राकृतिक संसाधनों की लूट

                                                      राजीव लोचन साह
देशभर में देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की जो लूट चल रही है, वह उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं के रूप में दिखायी दे रही है। राज्य बनने के तत्काल बाद ऐसी 558 परियोजनाएं या तो बन चुकी हैं या निमार्णाधीन हैं। इन परियोजनाओं में मुनाफा इतना अधिक है कि कृष्णा निटवियर जैसी कच्छा-बनियान बनाने वाली कम्पनियां भी अपना मुख्य काम छोड़कर बिजली बनाने के लिए उतर गई हैं। राजनीतिक दलों के लिए अपना पार्टी फंड भरने के लिए यह परियोजनाएं बेहद मुफीद साबित हुई हैं और इसीलिए पिछले 12 साल में प्रदेश में भाजपा या कांग्रेस, जिसकी भी सरकार रही हो, इन परियोजनाओं की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।

देवभूमि में कई नदियों के किनारे जल विद्युत परियोजनाओं को हरी झंडी दे दी गई है। जहां जल विद्युत परियोजनाएं बन रही होती हैं, वहां के निवासियों को इनके बनने की सूचना तब मिलती है, जब कंपनियां अपनी मशीनें और मजदूर लेकर परियोजना स्थल पर पहुंच जाती हैं। नियमत: पर्यावरण आकलन रिपोर्ट या जन सुनवाई की औपचारिकताएं होनी चाहिए, लेकिन वे पीठ पीछे कागजों पर कर ली जाती हैं। जब जनता प्रतिरोध करती है, तब उन पर प्रशासन की ओर से भीषण दमन होता है। टिहरी जनपद में फलेंडा में भिलंगना तथा रुद्रप्रयाग जनपद में मंदाकिनी नदियों पर बनने वाली परियोजनाओं में महिलाओं और बच्चों तक को जेल में डाले जाने की घटनाएं हुई हैं। कंपनियों से मिलने वाले विज्ञापनों के दबाव में मीडिया इन घटनाओं की पूरी तरह अनदेखी करता है।
          पिछले विधानसभा चुनाव के बाद मार्च 2012 में विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद एक नई बात देखने में आयी। मीडिया ने तो यह बात छिपाने की कोशिश की, मगर अनौपचारिक रूप से यह खुल कर कहा जा रहा है कि बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के लिये ‘इंडिया बुल्स’ नामक कंपनी ने जम कर पैसा खर्च किया। बहुगुणा के कुलदीपक साकेत बहुगुणा इस कंपनी में एसोशिएट डायरेक्टर हैं। ‘इंडिया बुल्स’ का विचार उत्तराखंड के जल संसाधनों पर कब्जा कर बड़े पैमाने पर बिजली बनाने का है। सत्ता में आते ही विजय बहुगुणा ने जल विद्युत परियोजनाओं के पक्ष में बहुत बेशर्मी से चिल्लाना शुरू कर दिया। कुछ समय से साधु-संतों द्वारा आस्था के नाम पर गंगा को अविरल बहने देने का अभियान शुरू किया गया है, जिसकी अगुआई सेवानिवृत्त इंजीनियर जीडी अग्रवाल द्वारा की जा रही है। बहुत ज्यादा शोरगुल होने पर केन्द्र सरकार ने कुछ ऐसी परियोजनाओं पर रोक लगा दी है, जिनमें पर्यावरणीय मानकों की जबर्दस्त ढंग से अनदेखी की गयी थी। केन्द्र सरकार ने यह निर्णय उत्तराखंड के हित में नहीं, बल्कि हिन्दुत्व लॉबी को खुश करने के लिये किया, जबकि पर्यावरण का सत्यानाश लगभग हर बड़ी परियोजना में किया गया है। अब बहुगुणा ‘इंडिया बुल्स’ का कर्ज चुकाने की हड़बड़ी में सारे कामधाम छोड़ कर इन बंद पड़ी परियोजनाओं को खुलवाने की कोशिश में लग गये हैं, ताकि राज्य में नई परियोजनाओं के पक्ष में सकारात्मक वातावरण बन सके। इस काम के लिए बहुगुणा ने कुछ प्रमुख बुद्धिजीवियों को भी झोंक दिया है। एक प्रख्यात कवि और एक एनजीओ प्रमुख ने बंद पड़ी परियोजनाएं न खुलने की स्थिति में अपने ‘पद्श्री’ सम्मान तक वापस करने की धमकी तक दे डाली।
आपातकाल जैसी स्थिति
एक वरिष्ठ पत्रकार ‘जनमंच’ नामक संगठन बना कर इतने उग्र क्षेत्रीय रूप में सामने आए हैं कि उन्होंने डॉ. भरत झुनझुनवाला, जो प्रख्यात स्तंभकार हैं, का ठेकेदार लॉबी के गुंडों द्वारा न सिर्फ मुंह काला करवाया, बल्कि यह अपराध करने वाले गुंडों का उन्होंने सार्वजनिक अभिनंदन कर उन्हें ‘उत्तराखंड वीर’ घोषित किया। झुनझुनवाला का पहला अपराध यह है कि वे पहाड़ी मूल के न होने के बावजूद श्रीनगर के पास रहते हैं और दूसरा अपराध यह है कि उन्होंने श्रीनगर में अलकनंदा पर तमाम पयावरणीय मानकों का उल्लंघन कर बनने वाली जल विद्युत परियोजना के खिलाफ न्यायालय से ‘स्टे आॅर्डर’ ले लिया है। हालांकि न्यायालय के आदेश के बावजूद आंध्र प्रदेश की जीवीके कम्पनी जिला प्रशासन के संरक्षण में लुक-छिप कर निर्माण कार्य  जारी रखे हुए है, लेकिन अपने इस कृत्य के कारण झुनझुनवाला कम्पनी और उसके गुर्गों की हिट लिस्ट में आ गये। 9 महीने बीत जाने पर भी जिला प्रशासन ने झुनझुनवाला पर हमला करने वालों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाही नहीं की है। इस मामले में भी सीएम का हाथ होने की बात हवा में है। इस तरह की घटनाओं से प्रदेश में अघोषित आपातकाल की सी स्थिति है।
फूट डालने की कोशिश
इस स्थिति से जूझने के लिए तीन प्रमुख आंदोलनकारी संगठनों, उत्तराखंड लोक वाहिनी, उत्तराखंड महिला मंच और चेतना आंदोलन ने 8 मई 2012 को देहरादून में एक संगोष्ठी की। अंदर संगोष्ठी चल रही थी और बाहर ‘जनमंच’ के लोग ‘बोल पहाड़ी हल्ला बोल’ और ‘जीडी अग्रवाल के समर्थकों वापस जाओ’ के उग्र नारे लगा रहे थे। इस गोष्ठी अच्छी चली और इसमें सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया गया कि अब बाहर से कंपनियों को उत्तराखंड की जल संपदा का दोहन करने नहीं आने दिया जाएगा।
अपमानित किए गए डॉ. भरत झुनझुनवाला
डॉ. भरत झुनझुनवाला, जो प्रख्यात स्तंभकार हैं, का गुंडों ने न सिर्फ मुंह काला किया, बल्कि कुछ लोगों ने इन गुंडों का सार्वजनिक अभिनंदन कर उन्हें ‘उत्तराखंड वीर’ घोषित किया। झुनझुनवाला का पहला अपराध यह है कि वे पहाड़ी मूल के न होने के बावजूद श्रीनगर के पास रहते हैं और दूसरा अपराध यह है कि उन्होंने श्रीनगर में अलकनंदा पर तमाम पयावरणीय मानकों का उल्लंघन कर बनने वाली जल विद्युत परियोजना के खिलाफ न्यायालय से ‘स्टे आॅर्डर’ ले लिया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर 9 महीने बीत जाने पर भी जिला प्रशासन ने झुनझुनवाला पर हमला करने वालों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाही नहीं की है। इस तरह की घटनाओं से प्रदेश में अघोषित आपातकाल की सी स्थिति है।
फूट डालो और राज करो
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के पक्ष में लॉबीइंग करने और उनके समर्थन में ‘जनमंच’ संस्था द्वारा उग्र क्षेत्रीय भावनाएं भड़काने का अभियान जारी है। युवाओं को गुमराह करने वाला ‘जनमंच’ यह नहीं बताता कि यदि झुनझुनवाला जैसे लोग गैर उत्तराखंडी हैं, तो लहलहाते खेतों को मरुस्थल बनाने के एकमात्र उद्देश्य से प्रदेश में आई आंध्र प्रदेश की जीवीके कंपनी कैसे ठेठ पहाड़ी हो गई? आतंक और दुराव-छिपाव का माहौल इतना है कि पिछली बरसात में उत्तरकाशी में बाढ़ ने भीषण तबाही मचाई। 29 लोग काल कवलित हुए, दस हजार की जनसंख्या प्रभावित हुई और एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस बाढ़ का कारण बादल फटना था, लेकिन इसके पीछे असी गंगा पर बनने वाली दो जल विद्युत परियोजनाओं का भी कम हाथ नहीं था।
जनता अपने हाथ में लेगी बिजली उत्पादन
आंदोलनकारियों ने निर्णय लिया है कि जहां-जहां संभावनाए हैं, पर्यावरणीय परिस्थितियां उपयुक्त हैं और क्षेत्रीय ग्रामीण सहमत हैं, वहां पर ‘प्रोड्यूसर्स कंपनी’ बनाकर बिजली बनाई जाएगी। इन कंपनियों में बाहर का व्यक्ति नहीं आ सकता, सिर्फ एक क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोग लोग ही इनमें शेयर होल्डर हो सकते हैं। इस तरह से बिजली बनाने पर पर्यावरण भी बचेगा और लोगों को अपनी जल संपदा से कुछ कमाई करने का मौका भी मिलेगा। इस विचार का स्वागत हुआ है और अल्मोड़ा जनपद में सरयू और टिहरी जनपद में भिलंगना नदियों पर बिजली बनाने के लिये प्रोड्यूसर्स कंपनियां रजिस्टर्ड हो गई हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो निस्संदेह उत्तराखंड में हजारों की तादाद में छोटी-छोटी परियोजनायें बनने का काम शुरू हो जाएगा।
मार्च में बड़े आंदोलन की तैयारी
आतंक के इस माहौल को तोड़ने तथा जनता को सही बात बताने के लिए अखिल भारतीय किसान महासभा उत्तराखंड, क्रियेटिव उत्तराखंड, उत्तराखंड लोक वाहिनी, उत्तराखंड महिला मंच, पहाड़ और चेतना आंदोलन आदि संगठनों द्वारा जुलाई में दिल्ली, जोशीमठ और टिहरी तथा अगस्त में श्रीनगर में गोष्ठियां आयोजित की गईं। 22 अगस्त को श्रीनगर (गढ़वाल) में आयोजित गोष्ठी जनकवि गिरदा की स्मृति को समर्पित थी। दो वर्ष पूर्व 22 अगस्त को ही दिवंगत हुए गिरदा जनांदोलनों में आजीवन सक्रिय रहे और अपने अंतिम वर्षों में भी उन्होंने बेहद खराब स्वास्थ्य के रहते ‘नदी बचाओ आंदोलन’ में सहभाग करते हुए ‘बोल व्यौपारी तब क्या होगा, विश्व बैंक के टोकनधारी तब क्या होगा’ जैसी कविताएं लिखीं। उत्तराखंड में मार्च-अप्रैल 2013 में बड़ा आन्दोलन छेड़ने की तैयारी चल रही है। इस क्रम में उत्तराखंड लोक वाहिनी, उत्तराखंड महिला मंच और चेतना आन्दोलन ‘आजादी बचाओ आन्दोलन’ के साथ मिल कर मार्च के दूसरे पखवाड़े में पूरे प्रदेश में यात्रा कर जन जागरण करेंगे और 23 अप्रैल को जागेश्वर में एक बृहद् सम्मेलन कर नदियों के पानी पर जनता के स्वामित्व की घोषणा की जाएगी।
(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और नैनीताल समाचार के संपादक हैं।)

बोतल में कैद जल देवता

                                                            देवेन्द्र प्रताप
आज जल देवता इंद्रदेव को बोतल में बंद करके कंपनियां करोड़ों-अरबों का वारा-न्यारा कर रही हैं। इसके लिए उन्हें कुछ खास व्यय भी नहीं करना पड़ता, उस पर मुनाफे की सौ प्रतिशत गारंटी भी है। डेन्यूब, वोल्गा या फिर हमारी गंगा और यमुना जैसी नदियों का पानी आज पीने लायक नहीं रह गया है। उद्योगों से निकली गंदगी ने भूमिगत जल को भी अब पीने लायक नहीं छोड़ा है। लेकिन इससे बोतल बंद पानी का व्यवसाय करने वाली कंपनियों का कोई सरोकार नहीं, अलबत्ता उनका तो इससे फायदा ही हो रहा है। कल 22 मार्च को दुनियां ने जल दिवस मनाया, आज 23 मार्च को विश्व मौसम विज्ञान दिवस है। हर साल ये आयोजन होते हैं, लेकिन पर्यावरण संकट बढ़ता जा रहा है। आज जरूरत इस बात की है की जनता इन मुददों को अपने हाथ में ले।  

अमेरिका और यूरोप में 19 वीं सदी में ही बोतलबंद पानी का बाजार पैदा हो गया था। इसकी एक वजह वहां दुनिया में सबसे पहले औद्योगिकीकरण का होना भी था। बोतलबंद पानी की पहली कंपनी 1845 में पोलैंड के मैनी शहर में लगी। इस कंपनी का नाम था ‘पोलैंड स्प्रिंग बाटल्ड वाटर’ था। 1845 से आज दुनिया में दसियों हजार कंपनियां इस धंधे में लगी हुई हैं। औद्योगिक विकास के साथ ही इन कंपनियों की संख्या में भी जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। यही वजह है कि आज बोतलबंद पानी का कारोबार 100 अरब डालर को भी पार कर गया है। भारत में बोतलबंद पानी की शुरुआत 1965 में इटलीवासी सिग्नोर फेलिस की कंपनी बिसलरी ने मुंबई महानगर से की। शुरुआत में मिनिरल वाटर की बोतल सीसे की बनी होती थी। इस समय भारत में इस कंपनी के 8 प्लांट और 11 फ्रेंचाइजी कंपनियां हैं। बिसलरी का भारत के कुल बोतलबंद पानी के व्यापार के 60 प्रतिशत पर कब्जा है। पारले ग्रुप का बेली ब्रांड इस समय देश में पांच लाख खुदरा बिक्री केंदों पर उपलब्ध है। इस समय अकेले इस ब्रांड के लिए देश में 40 बॉटलिंग प्लांट काम कर रहे हैं।
 वर्ल्ड हेल्थ आॅर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में उद्योगों से निकलने वाला 35 प्रतिशत पानी ही वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से परिशोधित हो पाता है। जबकि, दक्षिण अमेरिका में यह 14 प्रतिशत और अफ्रीका में तो नाममात्र का ही है। अगर भारत जैसे विकासशील देशों ने अपने जल प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया, तो भविष्य अंधकारमय हो जाएगा और इसका सबसे ज्यादा शिकार बनेंगे गरीब और मध्यमवर्गीय लोग।
अमेरिका बना सबसे बड़ा बाजार
अमेरिका बोतलबंद का सबसे बड़ा बाजार है। मेक्सिको, चीन और ब्राजील का स्थान इसके बाद है। 2008 में अमेरिका में बोतलबंद पानी की बिक्री 8.6 बिलियन थी। यह यहां बिकने वाले कुल बोतलबंद लिक्विड का 28.9 प्रतिशत है। कार्बोर्नटेड साफ्ट ड्रिंक, फलों के जूस और खिलाड़ियों के पेय पदार्थों का स्थान इसके बाद आता है। एक सर्वे के अनुसार एक अमेरिकी आदमी साल भर में औसतन 21 गैलन पानी पी जाता है। अमेरिका में पानी के निजीकरण के खिलाफ आवाज समय-समय पर आवाजें भी उठती रहीं। यूनाइटेड चर्च आॅफ क्रिश्चियंस, यूनाइटेड चर्च आॅफ कनाडा जैसे धार्मिक संगठनों तक ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। हालांकि पानी का निजीकरण आज भी न सिर्फ बदस्तूर जारी है, वरन 50 के दशक से सैकड़ों गुना और तेजी के साथ।
 ‘ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक’ (जीयो-3) की रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत में पानी का संकट गंभीर होता है, तो यहां रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा डायरिया, हैजा और टायफाइड जैसी बीमारियों की चपेट में आ सकता है। दुनिया के पैमाने पर बात करें तो इस समय जबकि पानी का संकट इतना गंभीर नहीं है, तब हालत यह है कि दुनिया में प्रति आठ सेकंड पर एक बच्चा जल जनित बीमारियों के कारण मर रहा है। अनुमान है कि 2032 तक संसार की आधी से अधिक आबादी भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएगी।
अरबों का पानी पी जाते हैं भारतीय
वर्तमान समय में हमारे देश में बोतलबंद पानी का व्यापार करने वाली करीब 200 कंपनियां  और 1200 बाटलिंग प्लांट हैं। इसमें पानी का पाउच बेचने वाली और दूसरी छोटी कंपनियों का आंकड़ा शामिल नहीं है। इस समय भारत में बोतलबंद पानी का कुल व्यापार 14 अरब 85 करोड़ रुपये का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबंद पेय का 15 प्रतिशत है। कोकाकोला की एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया की ज्यादातर बड़ी कंपनियां भारत के बाजार में अपने पेय पदार्थों को बेच रही हैं। भारत में बोतलबंद पानी के व्यापार में लगी 80 प्रतिशत कंपनियां देशी हैं। बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत 10 वें स्थान पर है। भारत में 1999 में बोतलबंद पानी की खपत एक अरब 50 करोड़ लीटर थी, 2004 में यह आंकड़ा 500 करोड़ लीटर पर पहुंच गया। इसके बावजदू यहां महानगरों में सैकड़ों ऐसी कंपनियां हैं, जिनके लिए पानी के लिए तय मानकों के कोई मायने नहीं हैं।  संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से 122 देशों में पानी के स्टैंडर्ड के ऊपर किए गये एक अध्ययन में भारत को 120 वें स्थान पर रखा गया है। यहां एक दिन में प्रति व्यक्ति बोतलबंद का औसत उपयोग 5 लीटर है, जबकि यूरोप में यही 111 लीटर, अमेरिका में 45 लीटर और वैश्विक औसत 24 लीटर बैठता है। समझा जा सकता है कि भारत की गरीबी के चलते यहां प्रति व्यक्ति बोतल बंद पानी की खपत बेहद कम है। यूरोप और अमेरिका में भोजन बनाने में भी एक बड़ी आबादी इस पानी का ही उपयोग करती है। यह भी वहां ज्यादा खपत की एक बड़ी वजह है।
contact no 9719867313, devhills@gmail.com 

मेरा यह लेख रांची एक्सप्रेस ने भी प्रकाशित किया है, लेकिन लगता है भूलवश मेरा नाम नहीं लिखा है। देखें-

बोतलबंद पानी का फैलता बाजार

http://ranchiexpress.com/227051 
कल्पतरु एक्सप्रेस में 29 मार्च को यह लेख -बोतल में कैद पानी- शीर्षक से प्रकाशित 
बोतल में कैद पानी
http://kalptaruexpress.com/

फैज अहमद फैज : इंकलाब से प्रेम

                                                     कौशल किशोर
फैज कहते हैं-‘अब मैं दिल बेचता हूं और जान खरीदता हूं।’ फैज की शायरी में आया यह बदलाव ‘नक्शे फरियादी’ के दूसरे भाग में साफ दिखता है। साथ ही यह विश्वास भी झलकता है - ये स्थितियां बदलेंगी, ये हालात बदलेंगे। शायर कहता है: चन्द रोज और मेरी जान! फकत चंद ही रोज/जुल्म की छांव में दम लेने पे मजबूर हैं हम /...लेकिन अब जुल्म की याद के दिन थोड़े हैं/इक जरा सब्र, कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।

फैज अहमद फैज (13 फरवरी-20 नवम्बर 1984) की जन्मशती पिछले साल मनायी गई। फैज इस महाद्वीप के ऐसे कवि रहे हैं, जो भाषा व देश की दीवारों को तोड़ते हैं। वे ऐसे शायर हैं, जिन्होंने अपनी शायरी से लोगों के दिलों में जगह बनाई। हमारे अंदर इंकलाब का अहसास पैदा किया, तो वहीं मुहब्बत के चिराग भी रोशन किए। दुनिया फैज को इंकलाब के शायर के रूप में जानती है, लेकिन वे अपने को मुहब्बत का शायर कहते थे। इंकलाब और मुहब्बत का ऐसा मेल विरले ही कवियों में मिलता है। यही कारण है कि फैज जैसा शायर मर कर भी नहीं मरता। वह हमारे दिलों में धड़कता है। वह उठे हुए हाथों और बढ़ते कदमों के साथ चलता है। वह हजार हजार चेहरों पर नई उम्मीद व नए विश्वास के साथ खिलता है और लोगों के खून में नए जोश की तरह जोर मारता है।
आवामी शायरी की परंपरा से नाता
फैज उर्दू कविता की उस परंपरा के कवि हैं, जो मीर, गालिब, इकबाल, नजीर, चकबस्त, जोश, फिराक, मखदूम से होती हुई आगे बढ़ी है। यह परंपरा है, आवामी  शायरी की परंपरा। उर्दू की वह शायरी जो माशूकों के लब व रुखसार ;चेहरा, हिज्र व विसाल ;जुदाई-मिलन, दरबार नवाजी, खुशामद और केवल कलात्मक कलाबाजियों तक सीमित रही है, इनसे अलग यह परंपरा आदमी और उसकी हालत, अवाम और उसकी जिन्दगी से रूबरू होकर आगे बढ़ी है। फैज इस परंपरा से यकायक नहीं जुड़ गये। उन्होंने अपनी शुरुआत रूमानी अंदाज में की थी तथा ‘मुहब्बत के शायर’ के रूप में  अपनी इमेज बनाई थी। 1930 के बाद वाले दशक के दौरान फैली भुखमरी, किसानों-मजदूरों के आंदोलन, गुलामी के विरुद्ध आजादी की तीव्र इच्छा आदि चीजों ने हिंदुस्तान को झकझोर रखा था। इनका नौजवान फैज पर गहरा असर पड़ा। इन चीजों ने उनकी रुमानी सोच को नए नजरिए से लैस कर दिया। नजरिए में आया हुआ बदलाव शायरी में कुछ यूं ढलता है-
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से /लौट आती है इधर को भी नजर क्या कीजे /अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे /और भी गम है जमाने में मुहब्बत के सिवा /मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग।
चन्द रोज और मेरी जान...

इस दौर में फैज यह भी कहते हैं-‘अब मैं दिल बेचता हूं और जान खरीदता हूं।’ फैज की शायरी में आया यह बदलाव ‘नक्शे फरियादी’ के दूसरे भाग में साफ दिखता है। साथ ही यह विश्वास भी झलकता है - ये स्थितियां बदलेंगी, ये हालात बदलेंगे। शायर कहता है -
चन्द रोज और मेरी जान! फकत चंद ही रोज/जुल्म की छांव में दम लेने पे मजबूर हैं हम /...लेकिन अब जुल्म की याद के दिन थोड़े हैं/इक जरा सब्र, कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।
फैज का यह विश्वास समय के साथ और मजबूत होता गया। कविता का आयाम व्यापक होता गया। कविता आगे बढ़ती रही। यह जनजीवन और उसके संघर्ष के और करीब आती गई। इस दौरान न सिर्फ फैज की कविता के कथ्य में बदलाव आया, बल्कि उनकी भाषा भी बदलती गयी है। जहां पहले उनकी कविता पर अरबी और फारसी का प्रभाव नजर आता था, वहीं बाद में उनकी कविता जन मानस की भाषा, अपनी जमीन की भाषा के करीब पहुंचती गई है। ऐसे बहुत कम रचनाकार हुए हैं, जिनमें कथ्य और उसकी कलात्मकता के बीच ऐसा सुन्दर संतुलन दिखाई पड़ता है। फैज की यह चीज तमाम कवियों-लेखकों के लिए अनुकरणीय है, क्योंकि इस चीज की कमी जहां एक तरफ नारेबाजी का कारण बनती है, वहीं कलावाद का खतरा भी उत्पन्न करती हैं।
फैज की निर्भीकता
फैज की खासियत उनकी निर्भीकता, जागरुकता और राजनीतिक सजगता है। फैज ने बताया कि एक कवि-लेखक को राजनीतिक रूप से सजग होना चाहिए तथा हरेक स्थिति का सामना करने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। अपनी निर्भीकता की वजह ही उन्हें पाकिस्तान के फौजी शासकों का निशाना बनना पड़ा। दो बार उन्हें गिरफ्तार किया गया। जेलों में रखा गया। रावलपिंडी षड्यंत्र केस में फंसाया गया। 1950 के बाद चार बरस उन्होंने जेल में गुजारे। शासकों का यह उत्पीड़न उन्हें तोड़ नहीं सका, बल्कि इस उत्पीड़न ने उनकी चेतना, उनके अहसास तथा उनके अनुभव को और गहरा किया। फैज की कविताओं पर बात करते समय उनके उस पक्ष पर भी, जिसमें उदासी व धीमापन है, विचार करना प्रासंगिक होगा। यह उदासी व धीमापन फैज की उन रचनाओं में उभरता है जो उन्होंने जेल की चहारदीवारी के अंदर लिखी थीं। एक कवि जो घुटन भरे माहौल में जेल की सींकचों के भीतर कैद है, उदास हो सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या कवि उदास होकर निष्क्रिय हो जाता है? धीमा होकर समझौता परस्त हो जाता है? फैज जैसा कवि हमेशा जन शक्ति के जागरण के विश्वास के साथ अपनी उदासी से आत्म संघर्ष करता है और यह आत्म संघर्ष फैज की कविताओं में भी दिखाई देता है। फैज उन चीजों से, जो मानव को कमजोर करती हैं, संघर्ष करते हुए जिस तरह सामने आते है, वह उनकी महानता का परिचायक है। वे कहते हैं:
मता-ए-लौह-औ कलम छिन गई तो क्या गम है/कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने/जबां पे मुहर लगी है तो क्या रख दी हैं/हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबां मैंने।
वैसे फैज ने मुहब्बत के शायर के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। इस नजरिये से हम उनकी पूरी कविता यात्रा पर गौर करें तो पायेंगे कि फैज का यह रूप अर्थात मुहब्बत के एक शायर का रूप समय के साथ निखरता गया है तथा उनके इस रूप में और व्यापकता व गहराई आती गई है। शुरुआती दौर में जहां उनका अंदाज रूमानी था, बाद में समय के साथ उनका नजरिया वैज्ञानिक होता गया है। जहां पहले शायर हुस्न-ओ-इश्क की मदहोशियों में डूबता है, वहीं बाद में सामाजिक राजनीतिक बदलाव की आकांक्षा से भरी उस दरिया में डूबता है, जिस दरिया के झूम उठने से बदलाव का सैलाब फूट पड़ता है। जहां पहले माशूक के लिए चाहत है, समय के साथ यह चाहत शोषित पीड़ित इंसान के असीम प्यार में बदल जाती है।
(संपर्क : एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ, मो. 0840020803)

बांग्लादेशी मजदूरों के तल्ख तेवर

                                                                                 आरडी त्यागी
(लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं, मो 09568187718 )
इस समय पूरा विश्व मंदी की गिरफ्त में फंसा हुआ है। सबसे बुरी बात यह है कि पूंजीपतियों की लाभ कमाने की अंधी हवस के चलते आई इस मंदी का सारा बोझ मजदूरों के कंधों पर डाला जा रहा है। वह भी खासकर पिछडेÞ देशों के मजदूरों पर। बाजार में गलाकाटू प्रतियोगिता के चलते और विश्व बाजार पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियां मजदूरों को ज्यादा से ज्यादा निचोड़ने में लगी हैं। दुनिया के कई देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लूट के खुले चारागाह में तब्दील होते जा रहे हैं। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे मुल्कों में इस सबका असर वहां के वस्त्र उद्योग पर पड़ रहा है। बांग्लादेश में यह दृश्य बहुत साफ तौर पर दिखाई देता है। बांग्लादेश का रेडीमेड गारमेंट उद्योग वहां की बड़ी आबादी को न केवल रोजगार मुहैया कराता है, बल्कि देश के कुल निर्यात में 80 प्रतिशत का योगदान भी करता है। बहुराष्टीय कंपनियां सस्ते श्रम की उपलब्धता के चलते इन देशों से अपने प्रोडक्ट तैयार करवाती हैं। यही वजह है कि आज अन्य मुल्कों की तुलना में बांग्लादेश का गारमेंट उद्योग वहां की मेहनतकश आबादी के शोषण का मुख्य ठिकाना बन गया है।
           बांग्लादेश को जून 2012 में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में कुल 24.3 अरब डॉलर के निर्यात में करीब 20 अरब डॉलर केवल वस्त्रों के निर्यात से प्राप्त हुआ था। विश्व में रेडीमेड कपड़ों का कुल बाजार 450 अरब डॉलर का है, जिसका बड़ा हिस्सा गरीब देशों के मजदूरों को कम से कम सुविधाएं देकर पैदा किया जाता है। बांग्लादेश में रेडीमेड गारमेंट की करीब 4000 इकाइयां हैं, जिनमें लगभग 40 लाख लोग काम करते हैं। वैसे तो तमाम विकासशील मुल्कों में महिलाओं और बच्चों को बहुत ही कम वेतन मिलता है। इस मामले बांग्लादेश का जिक्र विशेष तौर पर उल्लेखनीय है कि वहां गारमेंट मजूदरों की कुल संख्या की 80 प्रतिशत महिला मजदूर हैं, जो कम वेतन पर काम करने को मजबूर होती हैं। यही वजह है वहां जितने भी आंदोलन होते हैं, उसमें बड़ी संख्या में महिला मजदूर भी शिरकत करती हैं।
दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियां जहां इन वस्त्रों को अपने ट्रेड मार्क लगाकर ऊंचे दामों पर बेचती हैं, वहीं इस उद्योग में लगे मजदूरों के हालात दिन प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे हैं। दुनिया की इन कंपनियों के लिए सिले-सिलाए कपड़े तैयार करने वाले कारखानों में मजदूरों की सुरक्षा के कम से कम इंतिजामात तक नहीं हैं। साफ-सफाई तो दूर की बात दुर्घटना के वक्त सुरक्षित निकल पाने के उपाय तक नहीं हैं। बड़े-बड़े हॉल में मजदूरों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता हैं और 12-12 घंटे काम लिया जाता है। इसी का नतीजा है कि जब कोई दुर्घटना घटती है, तो उसका सबसे ज्यादा खामियाजा इन्हीं मजदूरों को उठाना पड़ता है। इन दुर्घटनाओं में कई सौ लोगों की जान जा चुकी हैं। ऐसी ही एक दुर्घटना इसी 26 जनवरी 2013 को घटी, जब ढाका की एक रेडीमेड वस्त्र बनाने वाली कंपनी में आग लग जाने से कम से कम 7 मजदूरों की मौत हो गई थी। खास बात यह थी कि मरने वालों में सभी महिलाएं थीं। इस घटना के बाद मजदूरों ने भारी गुस्से के साथ विरोध प्रदर्शन किया था। लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए और सुरक्षा के साथ अच्छी सुविधाओं के अलावा वेतन बढ़ोत्तरी मांग को लेकर कई दिनों तक प्रदर्शन जारी रहे।
24 नवंबर 2012 को ढाका में ही रेडीमेड कपड़ा कंपनी में, देश की अब तक की सबसे बड़ी आग लगने की घटना हुई थी। इस दुर्घटना में 123 मजदूरों की मौत हुई थी। यह कंपनी भी यूरोप की सी एंड ए के अलावा एडिनबर्ग वुलेन मिल के साथ अमेरिका की वॉलमार्ट जैसे बड़े लेबल वाली फर्मों को कपडेÞ निर्यात करती थी। उस घटना के बाद मजदूरों का आक्रोश चरम पर जा पहुंचा था।
     दिसंबर 2010 में भी ढाका के एक दस मंजिला कपड़ा कारखाने में आग लगने से एक दर्जन से ज्यादा की मौत हो गई थी। इस कारखाने में भी आपातकालीन द्वारा तक बंद था और मजदूर छतों से कूदने को मजबूर हुए थे। इस घटना के बाद भी मजदूरों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किए थे।
गैरकानूनी ढंग से बने कारखाने अक्सर उद्योग नियमों के तहत रजिस्टर्ड भी नहीं होते। कम मजदूरी और बिना सुविधाओं वाले कारखानों में आग के फौरन बाद हुई एक जांच में लेटीस, स्कॉट फोक्स, बेरिश्का और सोल्स जैसी बड़ी कंपनियों के लेबल पाए गए। ये वे कंपनियां हैं, जो अपने ब्रांडेड वस्त्र यूरोप और अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में बड़ी कीमत पर बेचकर भारी मुनाफा कमाती हैं। वकर्स एंड ह्यूमन राइट ग्रुप ने एक जांच में पाया है कि रेडिमेड कारखानों में 10 से 15 साल के बच्चों से अवैध रूप से काम कराया जाता है। बांग्लादेश के गांवों में रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं, जिससे महिलाओं को आमदनी का जरिया तलाशने शहरों की ओर रुख करना पड़ रहा है। भारी संख्या में गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन का ही नतीजा है कि रेडीमेड कारखानों में कम मजदूरी पर लोग, खासकर महिलाएं काम करने के लिए मजबूर हो रहीं हैं।
      मजदूरों में व्याप्त भारी असंतोष के कई कारण हैं। एक सर्वे के दौरान पाया गया कि कुछ कारखाने मजदूरों को समय पर वेतन का भुगतान नहीं करते, वहीं कुछ में ओवर टाइम का पूरा भुगतान नहीं किया जाता। कितने ही कारखानों में तय वेतन से कम वेतन दिया जाता है। इन सभी मांगों के लिए मजदूर समय-समय पर अपना पक्ष प्रबंधन के सामने रखते रहते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। बांग्लादेश में न्यूनतम मजदूरी की दर, 300 टका यानि 37 अमरीकी डॉलर प्रति माह है, जो सरकारी मानकों द्वारा तय जीने लायक वेतन, 500 टका प्रति माह से भी बहुत कम है। खराब हालातों और इतने कम वेतन पर मजदूरी करना मजदूरों की नियति बन गई है। आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसी घटनाओं का जिक्र बांग्लादेश के बड़े अखबारों में भी कम ही होता है, क्योंकि मीडिया के मालिकान खुद इस उद्योग से जुड़े हैं और मुनाफाखोरी के हिस्से में शामिल रहते हैं। देश के अग्नि शमन विभाग के अनुसार ही 2006 से अब 2009 तक आग की घटनाओं से 414 कपडा मजदूरों की मौत हो चुकी थी। इससे साफ है कि बढ़ते मुनाफे के बीच सुरक्षा पर खर्च नहीं बढ रहा है। कारखानों में हड़ताल की मुख्य वजह कम वेतन, समय पर न मिलना और काम के दौरान प्रबंधन के लोगों का बुरा व्यवहार रहता है। जाहिर है, यह अकेले बांग्लादेश की कहानी नहीं है। भारत, पाकिस्तान आदि देश भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के शिकार हैं। कहा जा सकता है कि मजदूरों का शोषण हर जगह है। समस्या यह है कि अधिकतर देशों में मजदूर विरोधी कानून लागू कर दिए गए हैं। ट्रेड यूनियनों को तोड़ दिया गया है। बांग्लादेश आर्थिक समृद्धि की ओर कपड़ा मजदूरों के बल पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन उनकी हालत खराब है।

...फिर कैसे बाजे प्रेमधुन

कई बार ऐसा लगता है कि आजकल दुनिया में प्रेम के मायने बदल गए हैं। प्रेम के चर्चे तो खूब सुनाई देते हैं, लेकिन ऐसे प्रेम में आकर्षण ज्यादा और वास्तविक प्रेम बहुत कम होता है। आधुनिक संस्कृति में रमे दो युवा दिलों में बड़ी जल्दी-जल्दी दोस्ती होती है और उतनी ही तेजी से वह ‘प्रेम’ की डगर पर सरपट भागने लगती है। इस बेलगाम और सरपट भागती गाड़ी को उनके ही शब्दों में ब्रेक ‘धोखे’ से लगता है। यही वजह है कि प्रेम के बाद शादी के बंधन में बंधे लोगों में भी एक दूसरे को लेकर मन में गहरा अविश्वास दबा रहता है। यही अविश्वास इंतहा की सीमा पर कई बार प्रेमियों के लिए जानलेवा भी साबित होता है। जाहिर है ऐसे में प्रेमधुन बजे भी तो कैसे? इन्हीं सवालों से रु-ब-रु सुधीर कुमार का आलेख...  

कई बार ऐसा लगता है कि आजकल दुनिया में प्रेम के मायने बदल गए हैं। प्रेम के चर्चे तो खूब सुनाई देते हैं, लेकिन ऐसे प्रेम में आकर्षण ज्यादा और वास्तविक प्रेम बहुत कम होता है। आधुनिक संस्कृति में रमे दो युवा दिलों में बड़ी जल्दी-जल्दी   दोस्ती होती है और उतनी ही तेजी से वह ‘प्रेम’ की डगर पर सरपट भागने लगती है। इस बेलगाम सरपट भागती गाड़ी को ब्रेक धोखे से लगता है। यही वजह है कि प्रेम के बाद शादी के बंधन में बंधे लोगों में भी एक दूसरे को लेकर मन में गहरा अविश्वास दबा होता है। यही अविश्वास इंतहा की सीमा पर कई बार प्रेमियों के लिए जानलेवा साबित हो जाता है। अक्सर ही ऐसी घटनाएं खबरों में सुनाई देती हैं कि पति ने पत्नी की या फिर पत्नी ने पति के चरित्र पर शक के चलते एक दूसरे की जान ले ली।
          ऐसे में मानव मन के सबसे खूबसूरत तत्व प्रेम पर सवाल खड़ा हो जाता है। लोग यह कहने लगते हैं जो लोग प्रेम करके शादी करते हैं, उनके बीच तलाक जल्दी होते हैं। इस संबंध में हुए सर्वे इसे झुठलाते हैं। हकीकत यह है कि जिनमें महज आकर्षण वाला प्रेम होता है, उनके बीच ही सबसे ज्यादा दरार आती है। अमृता प्रीतम ने इमरोज से शादी की। उनके बीच न जाति, समाज और धर्म का बंधन था और न ही मन का। आज अमृता के न रहने के बावजूद इमरोज खुद को अकेले नहीं पाते। वे कहते हैं अमृता का शरीर मुझसे दूर चला गया, उसका प्यार, उसकी यादें और उसकी आत्मा आज भी मेरे साथ जिंदा है। प्रेम की यह भावना, यह एहसास सिर्फ सच्चे प्रेमी ही कर सकते हैं। इमरोज तो महज उदाहरण हैं। ऐसे लोगों की संख्या हमारे देश में कम नहीं है, जिन्होंने सच्चा प्यार किया और वह के साथ और भी गहरा होता गया।
इंसानी मूल्यों पर भारी बाजार
तलाक या फिर जीवन के ही अंत कर देने की सोच की एक अन्य और मुख्य वजह बाजारीकरण और उसकी संस्कृति है। इस दौर में एकल परिवारों की संख्या में इजाफा हुआ है। पहले के समाज की समरसता और सामूहिकता को खत्म कर बाजार ने इंसान को बिल्कुल अकेला कर दिया। अब वह पूरी तौर पर बाजार जरूरतों के हिसाब से चलता है। बाजार ने उसे अपने हाथ की कठपुतली बना लिया है। यही वजह है कि कामकाजी पति-पत्नी के लिए परिवार से अधिक महत्व बाहरी चीजों का हो गया है। नौकरी जरूरी है, लेकिन परिवार को भी तो समय देने की जरूरत होती है। रिश्तों के जिन्दा रहने के लिए उनको समय भी देना चाहिए। लेकिन आज लोगों के पास इस बेहद महत्वपूर्ण इंसानी मूल्य के लिए वक्त नहीं है। आदमी रोबोट में तब्दील होता जा रहा है। स्थिति यह है कि प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण और क्रिएटिव कार्य-अपनी संतान का पालन-पोषण- करने के लिए भी लोग क्रेच या फिर दूसरों का सहारा ले रहे हैं। ये स्थितियां इंसानी मूल्यों पर भारी पड़ रही हैं। इंसानी मूल्यों पर बाजार इस तरह हावी हो गया है कि उसने आज दुनिया भर में प्रेम को ‘सेक्स के बाजार’ के रूप में भी तेजी से तब्दील करना शुरू कर दिया है। इसने प्यार के सितार को बेतार कर दिया है, जबकि प्रेम का बाजार ‘आॅनलाइन’ हो गया है। इस बाजार में न तो प्रेम की मासूमियत है और न ही इसको लेकर  संवेदनशीलता।
लव, सेक्स और धोखा
आप भले ही इस तथ्य से आंखें चुराएं, लेकिन यह सच्चाई है कि जब भी स्त्री-पुरुष के बीच में लगाव बढ़ेगा, तो वहां सेक्स जैसा तत्व हमेशा मौजूद रहेगा। लेकिन जब इस तत्व की मात्रा ज्यादा हो जाती है और यह प्रेम की भावना पर कब भारी पड़ने लगता है, तो वहीं से प्रेम की गाड़ी भी पटरी से उतरना शुरू हो जाती है। प्रेम दुनिया का सबसे खूबसूरत मानवीय सत्य है। तकलीफ तब शुरू होती है जब लोग मोहब्बत को मस्ती मान लेते हैं। शुरुआत में तो यह बेपनाह आनंद देती है। इस मस्ती का खुमार तब उतरता है, जब जिम्मेदारी और गहरे कमिटमेंट की बात आती है। बस, यहीं से दो रास्ते हो जाते हैं। एक धोखे का और दूसरा जवाबदेही का।
दुष्कर्म का प्रेम से नहीं कोई नाता
नई दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म घटना ने इस बुराई को समूची दुनिया के सामने बेपर्दा कर दिया। इस घटना के बाद भी इन घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है। कहीं शादी का झांसा देकर दुष्कर्म, नाबालिग से दुष्कर्म, स्कूल, छात्रावास, राहत शिविर, थाना, अस्पताल और यहां तक कि अपने ही घर में दुराचार का शिकार बनने की घटनाओं की बाढ़ सी है। सवाल यह है कि आखिर हम किस समाज में जी रहे हैं। क्या मनुष्य की संवेदना बिल्कुल शून्य पड़ गई है? देश के किसी भी हिस्से में मौजूद परामर्श केंद्र पर चले जाइए, वहां आपको ऐसे मामलों की भरमार मिलेगी। इस मामले के जानकारों के अनुसार ऐसी घटनाओं का प्रेम से कोई वास्ता नहीं होता।
दुधारी तलवार है प्रेम
ऐसा नहीं है कि प्यार परवान नहीं चढ़ता। वह परवान तो चढ़ता है, लेकिन अगर संभल कर नहीं चले तो यह बहुत ही तेजी से सीधी ढलान पर फिसलता भी है। वजह यह है कि यह सिर्फ भावनाओं का खेल है। यह खेल है मजबूत स्नेह और निजी लगाव का। जहां आकर्षण की अपनी एक निश्चित सीमा होती है, वहीं सच्चा प्रेम निस्सीम होता है। इसमें जितना उतरते जाइए, उसकी गहराई बढ़ती ही जाती है। महान नाटककार शेक्सपियर को लेकर आप किसी भी तरह का दृष्टिकोण बना सकते हैं। लेकिन यह बात तो आप मानेंगे ही कि इंसानी प्रेम पर शेक्सपियर ने बहुत ही शानदार लिखा है। एक जगह वे लिखते हैं, ‘प्रेम करना, समय बिताने का एक अच्छा साधन है।’ वह आगे यह भी लिखते हैं, ‘साधन यानी खेल। इस खेल में भी व्यक्ति को उस सीमा तक नहीं जाना चाहिए, जहां से सम्मानपूर्वक वापस लौटा नहीं जा सके।’ वाकई प्यार सिर्फ और सिर्फ भरोसे की भावना पर टिका होता है। प्रेम में अगर धोखा मिले तो जिंदगी नरक बन जाती है। दुर्भाग्य की बात है कि आजकल लोग शेक्सपियर के इस वाक्य के महज एक अधूरे हिस्से ‘वक्त काटने का बेहतर जरिया’ को ही अपनी जिंदगी में अपना रहे हैं। ऐसे में वे प्रेम के वास्तविक मूल्यों की तिलांजलि देकर प्रेम की परिभाषा को ही बदलने की कोशिश की जा रही है। प्रेम के नाम पर दोस्ती, प्यार, मोहब्बत, लव आदि नामों की लिस्ट तो लंबी हो गई है, लेकिन सच्चा प्रेम उसमें से गायब है। यही वजह है अब प्रेम में वह बांसुरी नहीं बजती, जिसे सुनकर राधा खिंची चली आती थी। या फिर जिस मीरा ने कन्हैया को कभी नहीं पाया वह जिंदगी भर उसकी माला जपती रही।
दुष्कर्म के मामले महानगर आगे
वर्ष                  2011        2010        2009
दिल्ली               453        414           404
मुंबई                 221        194           182
बंगलुरू               97          65            65
चेन्नई               76           47           39
हैदराबाद            59           45           47
कोलकाता           46           32          42

 भारत में लाक फिर भी कम
स्वीडन          54.9
अमेरिका        54.8
रूस               43.3
यू.किंगडम     42.6
जर्मनी          39.4
इजराइल       14.8
सिंगापुर        17.2
जापान          1.9
श्रीलंका         1.5
भारत           1.1
(दर प्रतिशत में)

तलाक से बच्चों पर पड़ता है असर
न्यूक्लियर फैमिली की धुंध ने सामाजिक तानेबानों से लगभग पूरी तरह दूर कर दिया है। ‘रिश्ते जोड़ने’ की दुकानें खुलने के साथ ही अविश्वास की खाई जो बढ़ी है, उसने दुनियाभर में तलाक के मामलों में इजाफा किया है। वर्तमान में हालत यहां तक है कि छोटी-छोटी बातों को लेकर भी तलाक की रट लगा दी जाती है। विवाह नामक परंपरा की वजह से भारत में दुनिया में फिर भी इससे काफी दूर है। विश्वास की कमी तलाक की बड़ी वजहों में से एक हैं। जरूरी है हर छोटी बात पर नोंकझोंक करने के बजाए, मुद्दे पर बात कर समाधाना खोजा जाए। आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए जरूरी नहीं होता कि  किसी बाहरी सदस्य से मदद ली जाए। तलाक सीधा मनोवैज्ञानिक असर बच्चों की जिंंदगी पर पड़ता है।
बढ़ रहे हैं दुष्कर्म के मामले
  1. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 में देशभर में दुष्कर्म के 24,206 मामले दर्ज, 5,724  दोषी ठहराए गए.
  2. 2010 में 22,172 मामले दर्ज हुए, 5,632 दोषी सबित हुए.
  3. 2009 में 21,397 मामले दर्ज, 5316 को दोषी ठहराया गया.
  4. 2009-11 में उत्तर प्रदेश में इस अवधि के दौरान दुष्कर्म के 5,364 मामले दर्ज। 3,816 लोगों का दोष साबित हो पाया। इस अवधि में प्रदेश में छेड़खानी के कुल 9,030 मामले दर्ज हुए और 7,958 लोगों का दोष साबित हुआ।

Friday, March 22, 2013

सेहत पर भारी मुफलिसी

                                                                देवेन्द्र प्रताप
सेव द चिल्ड्रेन और वर्ल्ड विजन नामक संस्था की ओर से प्रस्तुत द न्यूट्रीशन बैरोमीटर: गॉजिंग नेशनल रेस्पांसेज टू अंडरन्यूट्रीशन (2012) नामक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का वजन सामान्य से बहुत कम है। पोषक तत्वों की कमी के चलते उनकी लंबाई भी कम हो गई है। इतना ही नहीं महिलाओं के लिए दर्जनों योजनाओं के अस्तित्व में होने के बावजूद अभी भी देश में 70 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। यह रिपोर्ट किसी भी संवेदनशील मन को झकझोर देने के लिए काफी है। इस रिपोर्ट के प्रस्तोता कुपोषण के लिए देश की गरीबी को सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराते हैं।
         सेव द चिल्ड्रेन की ही एक अन्य रिपोर्ट ‘ए लाइफ फ्री फ्राम हंगर-टैकलिंग चाइल्ड मालन्यूट्रिशन (2012)’ के अनुसार, ‘देश के गरीब घरों में जन्मे इन बच्चों को अगर कुपोषण से बचाया जाए, तो वयस्क होने पर वे ज्यादा कार्यक्षमता के साथ उत्पादक कामों को अंजाम दे सकते हैं।’ यानी समाज में फैली इस तरह की मान्यता कि -गरीबों के बच्चे ‘बुद्धि’ के कामों को उतनी अच्छी तरह नहीं कर सकते, जैसे प्रोफेसर साहब का बच्चा- सरासर गलत है। इतना ही नहीं अगर सरकार देश के हर बच्चे का स्वास्थ्य सुधारने पर ध्यान दे, उनकी आय अर्जन की क्षमता को 46-50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। सरकार भले ही गरीब बच्चों की सेहत सुधारने के नाम पर पैसे का रोना रोती हो या फिर अन्य बहाने करती हो या फिर जो पैसा इस काम में लग भी रहा है, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता हो, लेकिन इसका एक और नुकसान यह है कि इससे देश को हर साल अरबों रुपये का नुकसान होता है।  
90 प्रतिशत महिलाओं में एनीमिया की शिकायत पाई जाती है। ऐसी महिलाओं को पौष्टिक आहार लेना चाहिए। हालांकि यह देश का दुर्भाग्य ही है कि आज भी इतनी तरक्की के बावजूद लोग अपने लिए पौष्टिक आहार का बंदोबश्त नहीं कर पाते। इसके चलते नौनिहालों में विकलांगता, रीड़ की हड्डी का खुलापन, वजन कम होना, फोड़ा होना आदि समस्याएं होती हैं। कई मामलों में तो उनकी असामयिक मौत भी हो जाती है। देश से गरीबी मिटे, तो कई रोग खुद मिट जाएंगे।
-डॉ. किरन गुगलानी, प्रसूति रोग विशेषज्ञ
     वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में रोगों के उपचार के लिए सरकारें जितना धन व्यय करती हैं, अगर वे वास्तव में कुपोषण को देश से मिटाने के लिए ईमानदारी पूर्ण प्रयास करें, तो सेहत के ऊपर खर्च किए जाने वाले कुल व्यय में 20 प्रतिशत से ज्यादा की कमी आ सकती है। भोजन में पोषक तत्वों की कमी का असर बच्चों के दिमागी और शारीरिक विकास पर भी पड़ता है। यही वजह है कि कुपोषित बच्चे शिक्षा ग्रहण करने में पीछे रह जाते हैं। विश्व बैंक की ‘इंडियाज अंडरनोरिश्ड चिल्ड्रेन : ए कॉल फॉर रिफॉर्म एंड एक्शन’ रिपोर्ट के मुताबिक कुपोषण से भारत की अर्थ व्यवस्था को सालाना ढाई अरब अमेरिकी डॉलर का घाटा होता है। दूसरी ओर सरकार की ओर से शुरू की गई मनरेगा योजना के कारण गरीबों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।    
हमारा भोजन पौष्टिक होना चाहिए। शरीर में पोषक तत्वों की कमी से कई तरह के रोग हो सकते हैं। जैसे- विटामिन सी की कमी से स्कर्वी रोग, डी से रिकेट्स, आयरन की कमी से एनीमिया, कैल्शियम से हड्डियों की कमजोरी आदि रोग हो जाते हैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय संतुलित आहार है। भोजन में पोषक तत्वों की कमी के चलते आजकल हड्डियों में दर्द, कम उम्र में आर्थराइटिस जैसी दिक्कतें सामने आ रहीं हैं। 
                                                                                       -डॉ. भावना गांधी, डायटीशियन, मेरठ 

      न्यूट्रिशन इनटेक इन इंडिया  की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत की जनता अपने कुल व्यय का करीब 55 प्रतिशत, जबकि शहरी जनता 42.5 प्रतिशत भोजन पर खर्च करती है। देश के शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति कैलोरी की खपत ज्यादा होती है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में आय की तुलना में महंगाई में हुई बेतहाशा बढ़ोत्तरी के चलते प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन कैलोरी के उपयोग में कमी देखी गई है। न्यूट्रिशन इनटेक इन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण इलाकों में रहने वाली जनता के दैनिक उपभोग में लगभग 105 किलो कैलोरी और शहर की जनता के उपभोग में औसतन 40 किलो कैलोरी की कमी आई है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो कुपोषण की सबसे बड़ी वजह गरीबी है। दूसरी और सरकार यदि इसे नहीं रोक पा रही है तो इससे एक तरफ जहां देश का नुकशान हो रहा है, वहीं दावा कम्पनियां और एन जी ओ इससे अपना धंधा चमका रहे हैं। 
कम वजन के सबसे ज्यादा बच्चे भारत में
  1. -कुपोषण के संबंध में विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘इंडियाज अंडरनोरिश्ड चिल्ड्रेन : ए कॉल फॉर रिफॉर्म एंड एक्शन’ के अनुसार भारत में औसत से भी कम वजन के बच्चों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। देश में कुपोषित बच्चों की यह संख्या अफ्रीका के सबसे गरीब मुल्कों की तुलना में भी दोगुनी से ज्यादा है।
  2. देश में पांच वर्ष से कम के 75 प्रतिशत बच्चों में आयरन और करीब 57 प्रतिशत बच्चों में विटामिन ए की कमी है। करीब 85 प्रतिशत जिलों में रहने वाले लोगों के आहार में आयोडीन की बेहद कमी है।
  3. वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत में बाल-मृत्यु की 50 प्रतिशत घटनाओं की सबसे बड़ी वजह कुपोषण है। मलेरिया, डायरिया और न्यूमोनिया से होने वाली बाल-मृत्यु की घटनाओं के लिए कुपोषण की स्थिति 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है।
  4. भारत में कुपोषण खत्म करने के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं के बारे में वर्ल्ड बैंक का मानना है, ‘देश में जो योजनाएं चलाई जा रही हैं उनका मुख्य जोर बच्चों का पेट भरने पर ही ज्यादा होता है, न कि पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने पर।’
  5. औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद शहरों में 38 प्रतिशत, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 50 प्रतिशत है। देश के 45.4 प्रतिशत लड़कों की तुलना में 53.2 प्रतिशत लड़कियों में औसत से कम वजन होने की समस्या ज्यादा है।

Monday, March 18, 2013

जब कार धोना भी होगा अपराध

                                                         नूर उल हक
सन् 1860 के दमनकारी कानून के बदले जम्मू कश्मीर सरकार ने जो नया अधिनियम प्रस्तावित किया है, वह मध्यकाल की मनोवृत्ति को ही दर्शाता है। इसके कुछ प्रावधान बेहद हास्यास्पद हैं। सार्वजनिक स्थलों पर शांति बनाए रखने हेतु धारा 136 एवं 137 के अंतर्गत दंड के प्रावधान के तहत एक महीने की सजा जुर्माने के साथ, या जुमार्ने के साथ 6 माह की सजा। ये निम्न वजहों से दी जा सकती है-
(अ) ऐसा व्यक्ति जो सार्वजनिक स्थानों पर फर्नीचर, वस्तु, वाहन या किसी पशु की साफ-सफाई कर रहा हो।
(ब) सूर्यास्त के आधा घंटे पहले और सूर्योदय के एक घंटे पहले वाहन चलाना, किसी गैर मशीनीकृत वाहन से टकरा जाना।
(स) सार्वजनिक स्थान पर मल-मूत्र का त्याग करना।
(द) 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे से जेवरात, घड़ी, सायकल, बर्तन या कोई मूल्यवान वस्तु खरीदना।
(ई) सार्वजनिक स्थानों पर पंक्ति को तोड़ना, जोकि निजी या सार्वजनिक किसी भी प्रवृत्ति की हो सकती है।


जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित नए पुलिस कानून के कुछ प्रावधान मध्ययुगीन राजसत्ता की विरासत सी जान पड़ते हैं। जम्मू एवं कश्मीर पुलिस अधिनियम 2013, यदि वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो यह भ्रष्टाचार का पिटारा ही खोल देगा। ‘विशेष सशस्त्र बल क्षेत्र अधिनियम’ का विरोध करने से पहले उमर अब्दुल्ला को अपने प्रस्तावित पुलिस कानून पर भी गौर करना चाहिए।
पिछले इतवार मैं अपने ग्यारह वर्षीय बेटे के साथ शहर के बाहर कार से घूम रहा था। सड़क किनारे कार धोने की बात तब तक मेरे दिमाग में नहीं थी, लेकिन वहां कार धोते लोगों को देख मैं भी अपनी कार से बाहर निकल आया। मेरा बेटा भी उत्साह में आकर मग्गे से कार पर पानी फेंकने लगा। एकाएक मुझे अपना बचपन याद आया, जब मैं भी इसी उत्साह से अपनी खिलौना कार को धोता था। इसी दौरान एक पुलिस जिप्सी वहां से गुजरी। जैसा कि कश्मीर में सामान्य प्रवृत्ति बन गई है, मेरे बेटे ने भी पुलिस जिप्सी की ओर अपनी ऊंगलियां बढ़ाते हुए गोली चलाने का अभिनय शुरू कर दिया। एकाएक पुलिस की गाड़ी रुक गई और मेरे बेटे ने खुश होते हुए सोचा होगा कि शायद उसने सबको मार दिया है।
तभी पुलिस गाड़ी पीछे की ओर चली और मेरी कार के पास आकर रुक गई। उसमें से एक ठिगना अफसर अपने तीन अंगरक्षकों के साथ नीचे उतरा। गालियां निकालते मुंह से उसने कहा, ‘तुम अपने इस कबाड़ को घर पर नहीं धो सकते? सड़क किनारे पानी क्यों डाल रहे हो? क्या तुम्हें हमारे नए निर्देश पता नहीं हैं? जो भी सार्वजनिक स्थानों पर अपना फर्नीचर, वस्तु या कार या किसी पशु की साफ-सफाई करेगा उस पर जुर्माने के अलावा 6 महीने की सजा भी हो सकती है। तुम तो सा.. पढ़े लिखे दिखते हो, तो ऐसा क्यों कर रहे हो? क्या यह तुम्हारे बाप की जागीर है? तुम्हें किसने आदेश दिया कि अपनी (फिर एक गाली) यहां धोओ? नाराज पुलिस अफसर ने कार से बजाए गाड़ी के कागजात के मेरी नोटबुक उठा ली और पुलिस गाड़ी की ओर इशारा करते हुए वाहन में बैठने का इशारा किया।
अचानक मेरे बेटे ने कहा, ‘थानेदार अंकल, देखो कुत्ता पेशाब कर रहा है। उसको भी थाने ले चलो ना। इसने भी रास्ता खराब किया।’ इस चुटकले ने कमोवेश पुलिस वाले का गुस्सा कुछ कम किया। वह बोला सुनो यह मेरा काम है, मैं तो अच्छी भावना से काम कर रहा हूं। वह धीमे-धीमे मेरी कॉपी के पन्ने पलट रहा था। एकाएक उसकी आंख एक पन्ने पर अटक गई और वह बोल पड़ा, ओह तो तुम एक राष्ट्र विरोधी भी हो। तुम आतंकवादियों के समर्थक और उनसे सहानुभूति रखने वाले भी हो? तुम सत्ता के खिलाफ कार्य करते हो। मैंने जवाब दिया, नहीं श्रीमान, मैं तो एक पत्रकार हूं। जवाब मिला, अच्छा तभी तुम गलतियां कर रहे हो और कानून भी तोड़ रहे हो। और तुम्हें यह अधिकार किसने दिया कि तुम राष्ट्रीय हित और कश्मीर में पुलिस द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ लिखो? तुरंत गाड़ी में बैठो, मैं तुमसे थाने में ही बात करूंगा और तुम्हें कुछ तमीज भी सिखाऊंगा। तुम पत्रकार लोग दुनिया के सबसे बद्तमीज लोग होते हो।
ये देखकर मेरा बेटा रोने लगा। पुलिस अफसर ने कहा पत्रकार साहब अब क्या सोच रहे हो। थाने जाना चाहते हो और बरसों जेल में रहना चाहते हो या समझौता? मैंने कहा श्रीमान मैं क्या कर सकता हूं? गाली देते हुए वह गुर्राया। इसी बीच ड्राइवर ने गाड़ी चालू कर दी। अफसर फिर चीखा इसे थाने ले जाओ और अच्छा सबक सिखाओ। घबड़ाकर मैंने अपनी जेबें टटोली। उसमें 500 रुपये का एक नोट मिला, जिसे मैंने उस अफसर की ओर बढ़ा दिया। मुस्कराते हुए उसने कहा किसी से इस बात का जिक्र मत करना, वरना! मैं उदास होकर अपनी कार में बैठ गया। इस घटना को मैं अपनी डायरी में लिखना चाहता था। मैंने अपने बेटे से पेन मांगा। उसने मेरी ओर पेन बढ़ाया ही था कि मैंने अपने हाथ पीछे खींच लिए। प्रस्तावित पुलिस कानून में आदेशित था कि यदि तुमने 14 वर्ष से कम के किसी बच्चे से किसी भी तरह के जेवरात, घड़ी, पेन, सायकल, बर्तन या कुछ भी मूल्यवान खरीदा तो तुमको छ: महीने के लिए जेल भेजा जा सकता है।
घर लौटते समय मेरे नटखट बेटे ने वातावरण को हल्का बनाते हुए कहा, ‘पापा क्या ये सेना के लोग उनको जो कि अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब आदि करते दिखाई देते हैं, उन्हें भी अंदर करेंगे?’ मेरे पास इसका एकमात्र उत्तर यही था कि सारे नियम सिर्फ आम कश्मीरियों के लिए ही हैं। घर लौटते में सेना के शिविर के नजदीक से गुजरते ही रोकते हुए कहा गया। ‘बाहर निकलो और लाइन में चलो। मेरा बेटा नाचते हुए चल रहा था। मैं डरा क्योंकि लाइन तोड़ना भी अब एक जुर्म है। वैसे मैं सूर्यास्त के पहले अपने घर लौट जाना चाहता था, क्योंकि नए पुलिस कानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो गाड़ी चला रहा है यदि सूर्यास्त के आधे घंटे बाद एवं सूर्यास्त के एक घंटे पहले बिना मोटरचलित वाहन से भिड़ जाता है, तो उसे एक महीने की सजा और जुमार्ना या 6 महीने की सजा और जुमार्ना हो सकता है।
फर्नीचर पर धूल की परतें चढ़ जाने दो लेकिन मैं उसे धोऊंगा नहीं। मेरे घर अब कोई पालतू जानवर नहीं होगा, क्योंकि कब किसी अफसर की आंख मुझ पर चढ़ जाए? पुलिस राज चलने दो, जिससे कि अफसरों को आम आदमी से अतिरिक्त कमाई हो सके। आम आदमी मरे तो मरे, अधिकारियों की स्थिति बेहतर होनी चाहिए। चूंकि नई दिल्ली कश्मीर में शांति चाहती है, तो इस नए पुलिस कानून को पारित हो ही जाना चाहिए।
इसके अलावा ग्रामीण रक्षा समितियों एवं विशेष पुलिस अफसरों की वापसी एवं मुखबिरों को इनाम का प्रावधान भी इस कानून में किया गया है। यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम वाले मामले में दिए गए उस निर्णय के विपरीत है, जिसमें साफ कहा गया है कि राज्य आम नागरिकों को हथियारबंद नहीं कर सकता और उन्हें मारने की अनुमति भी नहीं दे सकता। प्रस्तावित मसौदे के अनुसार पुलिस स्वयं के विशिष्ट सुरक्षा क्षेत्र घोषित कर सकती है और लोगों को विभिन्न अधिकारों से बेदखल कर सकती है। इस बात की पूरी संभावना है कि भ्रष्टाचार की जबर्दस्त गिरफ्त में फंसे कश्मीर में इस कानून के लागू हो जाने के बाद भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। 
-स्वतंत्र पत्रकार, श्रीनगर 

इरोम के बहाने उत्तरपूर्व

                                                                चिन्मय मिश्र
इरोम शर्मिला पर आत्महत्या का मुकदमा चलाने की प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि यह देश संवेदना की भाषा भूल चुका है। बहुत से लोग शायद इस तर्क से सहमत नहीं होंगे कि इंफाल ओर साबरमती आश्रम में कोई समानता भी है। गांधी ने दिल्ली को अपने संघर्ष का केंद्र कभी नहीं बनाया। वे स्वयं को साबरमती आश्रम ले आए और जिस दिन भारत आजाद हुआ, उस दिन भी वे दिल्ली में नहीं, बल्कि नोआखली में थे। 4 मार्च को इरोम दिल्ली की अदालत में थीं और उसी के समानांतर चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार चैनलों की सुर्खियों में भी। 5 मार्च को वे देशभर के अखबारों के पहले पन्ने पर थीं और 6 मार्च को एक बार पुन: सब चर्चाओं से दूर मणिपुर के अस्पताल के अपने जेल वार्ड में पहुंच गईं।
मीडिया के सामने नए मुद्दे आ गए। अंग्रेजी कहावत भी है, ‘जैसे ही आप नजरों से दूर होगे वैसे ही दिमाग से भी विस्मृत हो जाओगे।’ मीडिया ने भी अपने वार्षिक कैलेंडर में 2 नवंबर के दिन पर लाल गोला बना दिया होगा, जिस दिन इरोम का अनशन 12वें से 13वें वर्ष में प्रवेश करेगा और सारा देश एक बार पुन: उस दिन इरोम के साथ होगा और अगले दिन अपने-अपने रोजमर्रा के काम में जुट जाएगा। इधर सैन्य बल विशेषाधिकार अधिनियम के खिलाफ चल रही सुगबुगाहट को थोड़ी आवाज उमर अब्दुल्ला ने दी। हाल ही में बारामुला में एक युवक सेना की गोली से मारा गया है। परन्तु उमर अब्दुल्ला का यह विरोध कमोवेश घड़ियाली आंसू जैसा है, क्योंकि वे प्रस्तावित जम्मू-कश्मीर पुलिस अधिनियम के अंतर्गत ऐसे अधिकार राज्य पुलिस को देना चाहते हैं, जिसके अंतर्गत पुलिस अपने विशेष सुरक्षा क्षेत्र घोषित कर सकती है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सन 2010 में घाटी में फैला युवा असंतोष से कश्मीर में जो 100 से अधिक नवयुवक राज्य पुलिस बल की गोलियों से ही मारे गए थे।
लेकिन मणिपुर की कहानी कुछ अलग है। वहां यह कानून पिछले 50 वर्ष से लागू है। इतना ही नहीं शाम होते न होते वहां कर्फ्यू जैसी स्थितियां निर्मित हो जाती हैं। पिछले दिनों भोपाल में मणिपुर व देश के प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक रतन थियाम के नाटकों पर केंद्रित एक अनूठा समारोह  ‘रंग सोपान’ आयोजित हुआ। इसमें उनके सात नाटकों का मंचन हुआ। वे अपने नाटकों के जरिए एक ऐसा अलौकिक संसार रचते हैं, जिसमें बहुत कुछ रंगों और पार्श्व ध्वनियों से संप्रेषित होता है। उनके अनेक नाटकों में सामूहिक क्रंदन एवं रुदन मानोंं कलेजा चीरता सा प्रतीत होता है। उन अंधेरे पलों में हमारे सामने वहां की कारुणिक परिस्थिति और उन सबके बीच बैठी इरोम साफ नजर आती हैं। मंच पर भी अंधेरा है, हमारे अंदर भी अंधेरा उतरता है और धर्मवीर भारती का नाटक ‘अंधायुग’ युद्ध की विभीषिका को अभिव्यक्त करते हुए समझाता है कि गांधारी का विलाप और श्रम अकारण नहीं है, कृष्ण चाहते तो महाभारत रोक सकते थे। आज दिल्ली में बैठा सत्ता वर्ग बजाए किसी हल पर पहुंचने के हठधर्मिता का प्रयास कर रहा है। वह स्वयं नियुक्त न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी आयोग की सिफारिशें मानने से भी इंकार कर रहा है।
हम चीन से सीमा विवाद पर बात करने को तैयार हैं, पाकिस्तान से संबंध ठीक करने में दिन रात एक कर रहे हैं, लेकिन अपने आंतरिक विवादों के निराकरण को लेकर ठंडापन बनाए हुए हैं। रतन थियाम कहते हैं, ‘मणिपुर में बहुत सारे युद्ध हुए हैं। बहुत से आक्रांता बाहर से आए हैं। हम भी गए हैं। समकालीन युद्ध का क्या स्वरूप है? किसी को मार देना या किसी पर बम फेंक देना भर युद्ध नहीं है। कई विराट शक्तियां हैं जो समूची सभ्यताओं, परंपराओं संस्कृतियों और आचार संहिताओं पर आक्रमण करती हैं।’ मणिपुर और कमोवेश पूरे उत्तरपूर्व में ऐसा ही युद्ध चल रहा है। वह विस्तारित होकर पूरे हिमालय, जिसमें जम्मू-कश्मीर शामिल है, में फैलता जा रहा है। मध्यभारत का वन क्षेत्र नक्सलवाद की चपेट में है। 130 से अधिक जिले विस्थापन के खिलाफ  संघर्ष कर रहे हैं। हर जगह अपनी-अपनी शर्मिला संघर्ष कर रही है। रतन थियाम अपनी सज्जनता में समकालीन युद्ध के सर्वाधिक घातक स्वरूप आर्थिक युद्ध को सीधे-सीधे इसमें नहीं जोड़ते। लेकिन वे सच्चाई से मुंह छुपाने की आधुनिक रणनीति को बहुत कोमलता से अभिव्यक्त करते हुए याद दिलाते हैं,
धूल से ढके होने के बाद भी
संध्या के सूर्य की लालिमा
सुंदर बनी रहती है
आंख बचाने की सोचकर
उन्हें बंद करने से वह कैसे दिखाई देगी?
परंतु चुभन से डर कर नीति निमार्ताओं ने उत्तर पूर्व से आंख फेर ली हैं। वहां के आधे युवा नशीली दवाओं के आदी होते जा रहे हैं। उत्तरपूर्व की लड़कियां पलायन स्थलों पर यौन हिंसा का सर्वाधिक शिकार होती हैं। अपनी जिद को पूरा करने के दंभ में राष्ट्रहित की ओट में गलत को भी सही ठहराने का प्रयास कागजों में तो सफल दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक धरातल पर उसकी प्रतिक्रिया दिन-ब-दिन खतरनाक रूप लेती जा रही है।

Saturday, March 16, 2013

सरमाएदारों के नुमाइंदे मोदी

                                                  देवेन्द्र प्रताप
किसी भी सरकार की अच्छी या बुरी छवि उसमें शामिल विधायकों या सांसदों की छवि से सीधे तौर पर जुड़ी होती है। इस मानक को गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी की हेट्रिक बनाने वाली सरकार पर लागू करने पर बड़े चौंकाने वाले नतीजे सामने आते हैं। मोदी सरकार में शामिल नवनिर्वाचित विधायकों का लेखा-जोखा इस बात की गवाही देता है कि उनकी सरकार में शामिल विधायक किसी भी तरह बमुश्किल रोजी-रोटी कमाने वाली आम आवाम की किसी भी तरह नुमाइंदगी नहीं करते। बावजूद इसके तथ्य यही है कि वह उन्हीं के द्वारा निर्वाचित सरकार है। पहले ही साफ कर दें कि कांग्रेस और अन्य पार्टियों के जीते हुए प्रतिनिधि भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। बहरहाल, गुजरात विधानसभा चुनाव में शामिल प्रतिनिधियों की ओर से चुनाव आयोग के सामने दिए गए हलफनामे के अनुसार वहां के 182 में से 57 अर्थात लगभग 31 प्रतिशत विधायकों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले लंबित होने की घोषणा की है। यानी मोदी सरकार में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं, जिन पर कई तरह के आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। 2007 के चुनाव में ऐसे लोगों की संख्या 25 प्रतिशत थी। इस बार चुने गए 57 में से 24 विधायकों यानी 13 प्रतिशत पर गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं।
निर्वाचन क्षेत्र नारनपूरा से भाजपा विधायक अमित अनिल चन्द्र शाह (2 मामले हत्या / 2 मामले अपहरण), निर्वाचन क्षेत्र वाव से भाजपा विधायक चौधरी शंकरभाई लगधीरभाई (हत्या के प्रयास के 3 मामले), निर्वाचन क्षेत्र शेहरा से भाजपा विधायक जेठाभाई जी अहीर (1 मामला बलात्कार / 1 मामला अपहरण) आदि लोगों की सूची लंबी है, जो आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। तुर्रा यह कि इस चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है।  
     इस चुनाव में भले ही मोदी की पार्टी ने हेट्रिक लगाई हो, लेकिन निर्वाचित विधायकों में सबसे ज्यादा संपत्ति वृद्धि मानवदार निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेसी विधायक छावडा जवाहरभाई पेथालालभाई के पास है। 2007 में इनके पास घोषित संपत्ति 18.32 करोड़ थी, जो 2012 में बढ़कर 82.90 करोड़ हो गई। जहांं तक भाजपा विधायकों की संपत्ति में वृद्धि की बात है, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि वे तो लगातार तीन बार से सत्ता सुख भोग रहे हैं। भाजपा के लोगों में सबसे ज्यादा संपत्ति वृद्धि (5525 प्रतिशत)धरनगडर निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा विधायक कावडिया जयंतीभाई रामजीभाई की हुई। 2007 में इनके द्वारा घोषित संपत्ति 10.50 लाख रुपये थी, जो 2012 में बढ़कर 5.91 करोड़ हो गई। पाडरा निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के विधायक पटेल दिनेशभाई बालूभाई की संपत्ति में 34.89 करोड़ की वृद्धि हुई है। इनके द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार 2007 में इनके पास 4.51 करोड़ रुपये की संपत्ति थी, जो 2012 में बढ़कर 39.41 करोड़ हो गई। इसी तरह निर्वाचन क्षेत्र भूज से भाजपा के विधायक आचार्य डॉ. नीमाबेन भावेशभाई की संपत्ति में भी 32.30 करोड़ रुपये का इजाफा देखा गया। इनके पास 2007 में 2.34 करोड़ की संपत्ति थी, जो 2012 में बढ़कर 34.64 करोड़ हो गई।
    2012 के विधानसभा चुनाव में उतरे भाजपा के 65 विधायकों द्वारा चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत हलफनामों के अध्ययन से साफ पता चलता है कि इनमें से लगभग हर प्रत्याशी की औसत संपत्ति में 2007 की तुलना में 4.66 करोड़ की वृद्धि हुई है। वहीं कांग्रेस के 33 नवनिर्वाचित विधायकों की संपत्ति में भी औसतन 5.94 करोड़ की वृद्धि हुई है। यानी चाहे वर्तमान भाजपा सरकार हो या फिर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस-दोनों की सरमाएदारों की पार्टियां हैं।

2013 से दरपेश कुछ जिंदा सवाल

13 का अंक ज्योतिष में शुभ नहीं माना जाता। समाज में भी किसी की मृत्यु के बाद तेरहवीं की जाती है।  2013 के बारे में कई ज्योतिषियों की राय है कि इसे सामाजिक मुद्दे परेशान करेंगे। देश के मौजूदा हालात भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। 2012 विदा ले रहा है, लेकिन समूची दुनिया अभी भी आर्थिक मंदी से आतंकित है, अरब में अभी भी क्रांति का दावानल सतह के नीचे सुलग रहा है, वहीं हमारा मुल्क भी ऐसी कई समस्याओं से परेशान है। एफडीआई पर रार अभी भी बरकरार है, भ्रष्टाचार पर फिलहाल अन्ना मौन हैं, लेकिन अब समूचा देश बोल रहा है।  2012 को ऐसे ही कई सवालों से उलझना पड़ा। नए साल (2013) के स्वागत के साथ यह उम्मीद की जानी चाहिए कि यह जनता के जीवन में नई खुशियां लेकर आएगा।
                                             देवेन्द्र प्रताप
अगर किसी देश की सरकार पर ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हों, तो मसला संगीन हो जाता है। भारत के मामले में यह नई बात नहीं है। बोफोर्स घोटाला (64 करोड़), यूरिया घोटाला (133 करोड़ रुपये), चारा घोटाला (950 करोड़ रुपये), शेयर बाजार घोटाला (4000 करोड़ रुपये), सत्यम घोटाला (7000 करोड़ रुपये) स्टैंप पेपर घोटाला (43 हजार करोड़ रुपये), कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला (70 हजार करोड़ रुपये), 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (1 लाख 67 हजार करोड़ रुपये), अनाज घोटाला (करीब 2 लाख करोड़ रुपये) जैसे कई ऐसे घोटाले हैं, जिन्होंने देश का नाम दुनिया में बदनाम किया है। 2012 ऐसे ही घोटालों का ही वर्ष रहा। हमारे देश के घोटाले बाज जिस स्विस बैंक में अपना धन जमा करते हैं, उसके डायरेक्टर ने कहा है,‘भारतीय गरीब हैं, लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा’ उनके अनुसार स्विस बैंक में हमारे मुल्क का 280 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा धन जमा है। यह रकम इतनी बड़ी है कि अगर यह देश में आ जाए तो 2013 के बाद अगले 30 सालों जनता को सरकार को कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। अगर सरकार ऐसा होने दे तो। इस रकम से 60 करोड़ से ज्यादा रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं अगर यह रकम देश में आ जाए तो भारत के हर गांव से राजधानी तक फोर लेन सड़क बनाई जा सकती है। इस रकम से हर नागरिक को 60 सालों तक 2000 रुपये हर माह मदद दी जा सकती है। भ्रष्टाचार को रोकने में वर्ष 2012 तो विफल साबित हुआ, अब इसे रोकने की जिम्मेदारी 2013 के कंधों पर है।
        इस साल अक्टूबर माह की 13 तारीख को ब्लूमबर्ड टीवी के सहयोग से एक चर्चा का आयोजन किया गया। इसमें मणिशंकर अय्यर, अरुणा राय, प्रो. दीपांकर गुप्ता और जय पांडा जैसे नामी लोग मौजूद थे।इस चर्चा के दौरान अय्यर और अरुणा राय का निश्चित मत था कि भारत क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहा है, जबकि अन्य दो वक्ताओं की राय थी कि तमाम समस्याओं के बावजूद मुद्दों को अभी भी देश के संविधान के ढांचे के तहत हल किया जा सकता है। इस असहमति के बावजूद सभी इस बात से सहमत थे कि भ्रष्टाचार, कुशासन, प्रशासन की संवेदनहीनता आदि के कारण पैदा असहायता से आम जनता में गुस्सा और क्षोभ लगातार बढ़ता जा रहा है। इस चर्चा में मौजूद 58 प्रतिशत लोगों ने विषय के पक्ष में वोट दिया। अगर यह बात सही है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है हमारा देश भी मिस्र और ट्यूनिशिया का रास्ता अख्तियार कर सकता है।
        सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में पिछड़ों को आरक्षण देने के मुद्दे ने भी सरकार को काफी परेशान किया। हालांकि 2012 के जाते-जाते संविधान संशोधन से संबंधित विधेयक का प्रस्ताव पारित हो गया, लेकिन रार अभी बरकरार है। अलग-अलग पार्टियां नौकरियों में आरक्षण देने के मसले पर एक राय नहीं हैं। उधर इस मुद्दे को बहस के केंद्र में लाने वाली सर्वजन हिताय संरक्षण समिति इस मसले पर ‘करो या मरो’ के मूड में है। अब देखना यह है कि नए साल (2013) में यह मुद्दा क्या गुल खिलाता है।
         2012 में जमीन अधिग्रहण के विरोध में समूचे देश में तीखा विरोध हुआ। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, महाराष्ट्र, प. बंगाल आदि राज्यों में पुलिस ने भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों के ऊपर लाठियां भांजी। देश में 5.37 करोड़ परिवार भूमिहीन हैं और 6.1 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास जमीन का इतना टुकड़ा भी नहीं है। वहीं दूसरी ओर 20 साल पहले जिस डीएलफ को कोई नहीं जानता था, आज वही कंपनी तीन लाख करोड़ की मालिक है। सरकार की ओर से पिछले 20 वर्षों में 81 लाख हेक्टेयर जमीन औद्योगिकीकरण के नाम पर देश  के 200 घरानों को दी गई। ये ऐसे घराने हैं, जिनमें देश की सत्ता को नियंत्रित करने की ताकत है और वे करते भी हैं। वर्ष 2012 में ऐसे कई घरानों के उद्योगों के लिए किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया। अकेले सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र) के लिए ही देश में एक लाख 50 हजार हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। यह क्षेत्रफल देश की राजधानी के बराबर बैठता है।
     एक अनुमान के मुताबिक इतने बड़े क्षेत्रफल में करीब 10 लाख टन अनाज की पैदावार की जा सकती है। सेज का विरोध ज्यादा बड़े पैमाने पर है। इसका विरोध किसान तो कर ही रहे हैं, क्योंकि उनकी जमीनें जाएंगी। दूसरी ओर देश के कई बड़े सामाजिक संगठन सेज को एक नई गुलामी लादने का प्रयास करार दे रहे हैं, क्योंकि सेज के अंदर किसी तरह के श्रम कानूनों का पालन अनिवार्य नहीं होगा। यानि वहां काम करने वाले मजदूर और कर्मचारी सिर्फ मालिकों के रहमोकरम पर रहेंगे। उन्हें संवैधानिक अधिकारों हड़ताल करने और संगठित होने के लिए यूनियन बनाने से भी वंचित होना पड़ेगा। वर्ष 2012 में आदिवासी इलाकों में उद्योंगों के लिए किए जाने वाले जमीन अधिग्रहण के चलते हजारों आदिवासी विस्थापित होकर बंधुआ मजदूर बनने को मजबूर हुए। अकेले उड़ीसा में ही दिसंबर 2012 तक पास्को परियोजना का विरोध कर रहे 600 से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता जेल में ठूंस दिए गए।
      2012 में समूची दुनिया वैश्विक आर्थिक मंदी से पीड़ित रही। यूरोप और अमेरिका को इस मंदी ने सबसे ज्यादा निशाना बनाया। इस समय ग्रीस, स्पेन आदि देशों की हालत बहुत बुरी है। स्पेन में आम जनता की बदहाली का आलम यह है कि परिवार में किसी की मृत्यु के बाद क्रियाकर्म के लिए भी उनके पास पैसे नहीं हैं। ऐसे में लोगों ने परिवार में किसी की मृत्यु होने पर शव को मनुष्यों पर शोध करने वाली वैज्ञानिक संस्थाओं को दान देना शुरू कर दिया है। 2012 में इस तरह के आवेदन करने वाले लोगों में रिकार्ड बढ़ोत्तरी देखी गई।
खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को केंद्र सरकार ने 14 सितंबर 2012 को मंजूरी दे दी। सरकार की ओर से ऐसा दावा किया जा रहा है कि इसके लागू होने से देश के उपभोक्ताओं को फायदा होगा, वहीं अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा। दूरसंचार, वाहन और बीमा क्षेत्र में पहले ही एफडीआई को स्वीकृति मिल चुकी है। केंद्र ने मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को मंजूरी दी है, जबकि एकल ब्रांड में सौ प्रतिशत। सारा काम करने के बाद अब केंद्र ने गेंद को राज्यों के पाले में डाल दिया है।
    केंद्र सरकार के अनुसार राज्यों में एफडीआई लागू करने का निर्णय राज्य सरकारों का होगा। देसी एयरलाइंस कंपनियों में 49 फीसद की एफडीआई, चार सरकारी कंपनियों -एमएमटीसी और आॅयल इंडिया में दस प्रतिशत, हिंदुस्तान कॉपर में 9.59 प्रतिशत और नाल्को में 12.5 प्रतिशत विदेशी निवेश को भी इसी साल मंजूरी मिली। इतना ही नहीं इसी वर्ष ब्रॉडकास्ट मीडिया क्षेत्र में भी सरकार ने एफडीआई को 74 प्रतिशत कर दिया। सरकार के इन कदमों का समूचे देश में विरोध हुआ। अगर देश के खुदरा व्यापार की बात करें तो इस समय देश में खुदरा व्यवसाय 29.50 लाख करोड़ रुपये का है। यह जीडीपी के 33 प्रतिशत के आसपास बैठता है। जाहिर है यदि इस क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश होता है, तो इसका फायदा भी उन्हें ही मिलेगा। इस समय देश में खुदरा व्यापार करने वाली करीब 1 करोड़ 20 लाख छोटी दुकाने हैं। इन दुकानों से करीब 4 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी चलती है। इसलिए सरकार के इस कदम से देश के खुदरा व्यापारियों पर विदेशी गाज गिरना तय है। सरकार और छोटे-मंझोले व्यापारियों के बीच रार अभी थमी नहीं है। देखना यह है 2013 इस मामले में क्या फैसला सुनाता है।
2012 में मेरठ, दिल्ली, मुंबई, बंगलरू, देहरादून समेत 57 बड़े शहरों में हर 25 मिनट पर एक महिला के छेड़छाड़ हुई, जबकि हर एक घंटे में दुष्कर्म और अपहरण की वारदातें अंजाम दी गर्इं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2012 में हुए कुल अपराध का 60-70 प्रतिशत महिलाओं से जुड़ा हुआ रहा। इस साल देश की राजधानी में 500 से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। यह 2011 की अपेक्षा 18 प्रतिशत ज्यादा है। ऐसी घटनाओं को लेकर यह धारणा बनने लगी थी कि ‘होना जाना कुछ नहीं’। दिल्ली में 23 साल की युवती के साथ हुए बहशियाना दुष्कर्म के बाद समूचे देश में हुए विरोध प्रदर्शनों में जनता का यही गुस्सा मौजूद था। इस हिंसक प्रदर्शन में 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारी घायल हुए। युवती के लिए न्याय मांगने वालों पर लाठियां फटकारी गर्इं, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कड़ाके की ठंड में उनके ऊपर पानी की बौछार डाली गई। दुष्कर्म की तरह दिल्ली सरकार के इस कारनामे को भी अमानवीयता कहा गया। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगे।

...तो आजाद हो जाता मुल्क

काकोरी कांड के बाद ज्यादातर क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए थे। बिस्मिल, असफाक उल्ला, राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी,रोशन सिंह आदि साथियों को फांसी की सजा सुना दी गई, लेकिन आजाद टूटे नहीं। किसी ने उनके आंसू नहीं देखे। उन्होंने आजादी की जंग के लिए दूसरी यात्रा शुरू की। इस बार उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, शिववर्मा आदि साथियों के साथ ऐसा क्रांतिकारी नेटवर्क खड़ा किया कि ब्रिटिश साम्राज्य थरथर कांपने लगा।

                                                       देवेन्द्र प्रताप
     देश के आजाद होने के बाद जिंदा रहे भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के साथी शिव वर्मा ने आजाद के साथ बिताए वक्त को अपनी पुस्तक ‘संस्मृतियां’ में दर्ज किया है। उनकी इस पुस्तक को सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिल चुका है। वे लिखते हैं: ‘एक दिन जब सुरेन्द्र पांडे ने धीरे से मेरे कान में आकर बताया कि नं.2 आए हैं और आज रात तुम्हें उनसे मिलना है, तो मेरे सारे शरीर में बिजली सी दौड़ गई। दूसरों से आजाद के बारे में जो कुछ सुना था, उसके सहारे कल्पना में मैंने आजाद की एक तस्वीर बना ली थी। सुरेन्द्र की बात से यह तस्वीर चलने-फिरने लगी।’ आजाद उस समय प्रख्यात बुद्धिजीवी राधामोहन गोकुल जी के यहां रुके थे। आमतौर पर लोग आजाद को बम-पिस्तौल वाला क्रांतिकारी समझते हैं, लेकिन उनकी अपने समय के कई बुद्धिजीवियों से बहुत ही गाढ़ी दोस्ती थी।
        राम विलास शर्मा अपने लेख ‘मेरे साक्षात्कार’ में बताते हैं कि चंद्रशेखर आजाद की उस समय के क्रांतिकारी साहित्यकार राधामोहन गोकुल जी से बहुत ही करीबी दोस्ती थी। वे उनके यहां आकर अक्सर रुकते थे। महाकवि निराला राधामोहन गोकुल जी को अपना गुरु मानते थे, इस तरह उनका भी चंद्रशेखर आजाद से परिचय हुआ। इसी तरह प्रख्यात बुद्धिजीवी वैशंपायन और रामचंद्र शुक्ल से भी आजाद की गाढ़ी दोस्ती थी। इसका प्रमाण राधामोहन गोकुल जी के यहां चंद्रशेखर आजाद जिस अधिकार से रहते थे, उससे चल जाता है। जब शिववर्मा राधामोहन गोकुल जी के यहां पहुंचे तो उन्हें देखते ही राधामोहन गोकुल जी ने ऊपर जाने का इशारा कर दिया।
     शिववर्मा ने देखा कि चांद के रुपहले प्रकाश एक व्यक्ति उधारे बदन बैठा हुआ है। सांवला रंग, गठा हुआ जिस्म, औसत लंबाई से कुछ नाटा कद, तेज चुभती हुई आंखें और चेहरे पर चेचक के दाग और घुटने के पास रखा उनका रिवाल्वर-पहली मुलाकात में आजाद कुछ ऐसे ही नजर आए थे, शिववर्मा को। शिववर्मा के लिए यह आश्चर्य का विषय था कि जिस व्यक्ति का नाम ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए आतंक का पर्याय बन चुका था, वह राधामोहन गोकुल जी के यहां इतने इत्मिनान से बैठा उनका हाल-चाल पूछ रहा था। शिववर्मा लिखते हैं, ‘मैंने आजाद की जो तस्वीर बनाई थी, वह बेहद सुंदर और दुर्लभ थी। उसकी आराधना हो सकती थी। लेकिन, मैंने देखा मेरे साथ जो व्यक्ति बैठा हुआ है, वह मेरी तरह ही एक सामान्य नौजवान है-बेहद कोमल, मिलनसार, विनोद प्रिय किंतु दृढ़ और अटल।’ अन्य क्रांतिकारी साथियों की तहत ही शिववर्मा पर भी आजाद का गहरा रंग चढ़ा था। उन्होंने आजाद को एक ऐसे सिपाही के रूप में पाया जो ‘मौत को सामने देखकर भी मुस्कुरा सकता है, उसे ललकार सकता है और सबसे बड़ी बात यह कि वह एक ऐसे मनुष्य हैं, जिनकी इतनी बड़ी शख्सियत होने के बावजूद अहंकार उन्हें छू तक नहीं पाया है।’ये वही आजाद थे, जिन पर 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान पिकेटिंग के आरोप में मुकदमा चला था। ये वही आजाद थे, जिन्होंने अदालत में अपना नाम आजाद और घर जेलखाना बताया था। हालांकि यह उनकी पहली और अंतिम गिरफ्तारी थी। वे अपने इस घर (जेलखाना) दोबारा कभी नहीं गए और सदा आजाद ही रहे।
       23 जुलाई 1906 में जन्मे आजाद बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों को पसंद करते थे। सबसे पहले वे गांधी जी से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। लेकिन काकोरी कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया। उनके इस निर्णय की समूचे देश में आलोचना हुई। इस घटना के बाद आजाद ने भी ‘अहिंसा’ का दामन छोड़कर ‘हिंसा’ के रास्ते अंग्रेजों को देश से बाहर करने का फैसला किया। लेकिन, इसका मतलब कदापि नहीं था कि क्रांतिकारी हिंसा के ही पुजारी थे। गांधी जी ने जहां अहिंसा को ही अपना मूल हथियार बनाया, वहीं क्रांतिकारियों ने हिंसा और अहिंसा दोनों को ही अपना हथियार बनाया।  सशस्त्र क्रांति के लिए जहां उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) का गठन किया, वहीं अहिंसात्मक आंदोलन के लिए नौजवान भारत सभा का गठन किया।
      ध्यान देने की बात यह है कि जहां कांग्रेस पार्टी क्रांतिकारियों से दूरी बनाकर चलती थी, वहीं नौजवान भारत सभा उसके आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करती थी। जगमोहन सिंह और चमनलाल द्वारा लिखी गई किताब ‘भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ में इसका जिक्र किया गया है। साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए जब लाल लाजपत राय ने आंदोलन किया, तो ‘नौजवान भारत सभा ने न सिर्फ आंदोलन को संगठित करने के लिए पूरा जोर लगाया वरन इसमें नेतृत्वकारी भूमिका भी निभाई।’ वहीं दूसरी ओर जब लाला जी पुलिस लाठीचार्ज में शहीद हो गए, तो कांग्रेस तो अहिंसक आंदोलन ही करती रही, जबकि क्रांतिकारियों ने उनकी मौत का बदला लिया। मिलिटैंट नेशनलिज्म इन पंजाब में कमलेश मोहन लिखते हैं कि यह निर्णय आजाद की सलाह पर लिया गया। 18 दिसंबर को एचएसआरए के कमांडर इन चीफ बलराज (चंद्रशेखर) के हस्ताक्षर के साथ पर्चे चिपकाए गए। पर्चे में कहा गया था :‘हमें एक आदमी की हत्या का खेद है। परंतु, यह आदमी उस निर्दयी, नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था, जिसे समाप्त कर देना आवश्यक था। इस आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के एक कारिंदे के रूप में की गई है। यह सरकार दुनिया की सबसे अत्याचारी सरकार है।’
     नेहरू जी ने अपनी पुस्तक ‘मेरी कहानी’ में खुद यह लिखा है: ‘उस समय लोगों ने ऐसा महसूस किया कि क्रांतिकारियों ने लाला जी और लाला जी के रूप में कौम की इज्जत रख ली।’ इसलिए ऐसा नहीं कह सकते कि जनता क्रांतिकारियों की कार्रवाइयों को सही नहीं मानती थी। हकीकत यह थी कि वह धीरे-धीरे उनके साथ खड़ी हो रही थी। जबकि गांधी जी लार्ड इरविन की बग्घी पर क्रांतिकारियों की ओर से फेंके गए बम के बाद इस घटना के बिल्कुल उल्टी बात कह रहे थे: ‘उस विशाल आवाम को हिंसा की भावना छू तक नहीं पाई है।...जरा सोचिए अगर वायसराय इस घटना में गंभीर रूप से जख्मी हो गए होते तो...।’ इसी तरह उन्होंने असेंबली बम कांड के बाद भी क्रांतिकारियों की यह कहकर आलोचना की कि जो लोग विवेक से परे नहीं हैं, उन्हें इस ताजातरीन बम कांड की छिपे या खुले तौर पर समर्थन देना बंद कर देना चाहिए। हालांकि हुआ इसके उल्टा। इसके बाद क्रांतिकारी कार्रवाइयों में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में जबरदस्त उठान देखने को मिलता है।
      एचएसआरए में भी दो तरह की जिम्मेदारियां थीं। संगठन की स्थापना बैठक में ही सदस्यों की जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया था। कमलेश मोहन अपनी किताब में इस बारे में भी रोशनी डालते हैं: ‘फिरोजशाह कोटला के मैदान में हुई एचएसआरए की स्थापना बैठक में सुखदेव को पंजाब, फणीन्द्र नाथ घोष को बिहार और उड़ीसा, शिववर्मा को उत्तर प्रदेश, जयदेव कपूर उर्फ प्रताप को झांसी में खुलने वाले केंद्रीय आॅफिस के लिए तथा भगत सिंह और विजय कुमार सिन्हा को पार्टी संयोजक की जिम्मेदारी सौंपी गई।’ पार्टी के अंदर ही एक सैन्य विभाग ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ खोला गया। ‘चंद्रशेखर आजाद को इसी सैन्य विभाग का कमांडर इन चीफ चुना गया।’ दिल्ली कांस्पिरेशी केश के एक मुख्य सरकारी गवाह (जो कि पहले क्रांतिकारियों का साथी था) का बयान अभी भी होम डिपार्टमेंट की फाइल संख्या ‘11/15 प्रोसीडिंग्स 1931’ में सुरक्षित है। इसके अनुसार, ‘एचएचआरए के क्रांतिकारियों ने क्रांतिकारी कामों को अंजाम देने, अपनी गुप्त मीटिंगों और बड़े पैमाने पर बम के निर्माण के लिए दिल्ली, लाहौर, अमृतसर, गुजरांवाला, रावलपिंडी, लालपुर, शेखूपुरा, रोहतक, फिरोजपुर, कानपुर, कलकत्ता, सहारनपुर, आगरा, ग्वालियर, अजमेर, झांसी, बेतिया (बिहार) और श्रीनगर में किराए पर कमरे/घर लिए थे।’ यह समूचा नेटवर्क आजाद के ही नेतृत्व में खड़ा किया गया।
       दिल्ली में सिरकी बाजार, पराठा वाली गली, न्यू हिन्दू हॉस्टल, कश्मीरी गेट और झंडेवालान में कमरे लिए गए थे। नया बाजार वाले ठिकाने पर भगवती चरण बोहरा एक बीमा एजेंट के रूप में रहते थे। हिन्दू हॉस्टल में हुई बैठक में चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ने के ऊपर विस्तार से बात की। इस बारे में भी कैलाशपति की गवाही एक महत्वपूर्ण सबूत है : ‘चंद्रशेखर आजाद ने इस मीटिंग में कहा था कि हिमालयन ट्वायलेट नाम से बनी फैक्ट्री में तैयार किए गए पिक्रिक एसिड और दिल्ली में अन्य जगहों तथा कानपुर में तैयार किए गए बम के खोलों की मदद से हम बड़े पैमाने पर बम तैयार कर सकेंगे। उसके बाद हम पूरे देश में इनका वितरण करके पूरे देश में सरकार के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ देंगे।’ बाद में कुछ क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने इस फैक्ट्री पर छापा मारा। हालांकि आजाद का सूचना तंत्र इतना मजबूत था कि वे वहां से काफी सामान दूसरे ठिकाने पर पहुंचाने में सफल रहे। इसके बावजूद पुलिस को जितनी सामग्री मिली उससे छह हजार बम बनाए जा सकते थे। आजाद पुलिस की गतिविध को ताड़ने में माहिर थे। इसी वजह से वे विस्फोटकों की एक बड़ी मात्रा को बचाने में सफल रहे।
       झंडेवालान वाले घर के बाहर हिमालयन ट्वायलेट का बोर्ड टंगा हुआ था। इस बोर्ड को देखकर कोई भी इसे साबुन फैक्ट्री समझता। आजाद के निर्देश पर इसे पार्टी के कवर के रूप में प्रयोग करने का निर्णय लिया गया था। कैलाशपति के ही बयान के अनुसार, ‘नंद किशोर निगम (हिन्दू हॉस्टल) के यहां 9 जून 1930 को हुई बैठक में चंद्रशेखर आजाद ने साथियों के साथ साबुन फैक्ट्री की योजना पर विस्तार से बात की थी। इसी बैठक में तय निर्णय के आधार पर विमल प्रसाद जैन को साबुन फैक्ट्री का मैनेजर बनाया गया।’
     दिल्ली के बाद पुलिस को ऐसी एक फैक्ट्री लाहौर में भी मिली। पुलिस पीछे पड़े रही और आजाद नई जगह पर बम फैक्ट्रियां लगाते रहे। लाहौर में पुलिस ने छापा मारा तो आजाद ने ऐसी ही एक बम फैक्ट्री ग्वालियर में खड़ी कर दी। उन्होंने यहां टिन बमों को बनाने की भी एक फैक्ट्री लगाई थी, जिसके सिर्फ वही विशेषज्ञ थे। ग्वालियर में भी पुलिस ने छापा मारा। लेकिन एक बार फिर आजाद पुलिस को चकमा देने में सफल रहे। यहां से भागकर उन्होंने पूना में बम फैक्ट्री खड़ी कर दी। यहां भी पुलिस ने छापा मारा और बड़ी मात्रा में विस्फोटक जब्त किया। भगत सिंह के अनन्य मित्र राजगुरु को यहीं से गिरफ्तार किया गया। यहां से भी आजाद ने विस्फोटक सामग्री को बचाने की भरसक कोशिश की। इसके बाद आजाद को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने पूरी ताकत लगा दी। अंतत: 27 फरवरी 1931 को एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया। यहीं पर पुलिस से लड़ते हुए आजाद शहीद हो गए। जिस समय पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेरा हुआ था, उस वक्त भी एक शहीद की मां को पैसा भेजवाना नहीं भूले। आजाद की इसी खूबी के चलते उनके साथी उन्हें जान से ज्यादा प्यार करते थे।

Sunday, March 10, 2013

जिंदा है बेहतर दुनिया का ख्वाब

     इस समय समूचा विश्व जबरदस्त वैचारिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। लोगों के सवाल बेहद साफ हैं-क्या वर्तमान दुनिया ऐसे ही चलेगी? क्या इसमें अभी कुछ सुधार की गुंजाइश है?...आदि, आदि। दुनिया के किसी भी देश में चले जाइए, आपको इन सवालों की गंूज सुनाई देगी। इसकी वजह भी बेहद साफ है। पहले लोगों को बताया गया कि पुरानी दुनिया (सामंती) बुरी है, इसलिए नई दुनिया (पूंजीवादी) बनाओ। जनता को भी इसमें अपना बेहतर भविष्य नजर आया। फायदा भी हुआ। उद्योगधंधे खुले, बेकारी मिटी, जनता को लोकतंत्र के रूप में एक नई व्यवस्था मिली। लेकिन इतिहास ठहरता नहीं है। वह हमेशा आगे ही बढ़ता है।आज यही व्यवस्था लोगों के विकास में रोड़ा बन गई है। लोकतंत्र होते हुए भी समूची दुनिया अपने को बेसहारा समझने लगी है। वहीं, विश्व स्तर पर पूंजीवाद के मॉडल रहे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, इटली, जर्मनी आदि देशों की अर्थव्यवस्था अपने ही पाप के बोझ तले दबी कराह रही है। स्पेन, यूनान, पुर्तगाल, हालैंड जैसे कई देशों का पूंजीवादी मॉडल धूल-धूसरित हो रहा है। स्पेन में जहां बेरोजगारी की दर जहां 56 प्रतिशत तक पहुंच गई है, वहीं एक समय दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले यूनान में यह दर 50 प्रतिशत को पार कर गई है। स्पेन की हालत इतनी खस्ता है कि वहां के लोग अपने परिवार में किसी की मौत होने पर उसका दाह संस्कार का खर्च तक उठाने की स्थिति में नहीं हैं। यही वजह है कि इससे बचने के लिए लोग परिवार में किसी मौत होने पर मृतक के शव को मेडिकल कालेज में दान दे रहे हैं। हालत यह है कि वहां के मेडिकल कालेज मोर्चरी में तब्दील हो गए हैं। 900 अरब यूरो की संपत्ति होने के बावजूद इटली भी इस मंदी से खुद को नहीं बचा पाया। मंदी की इन अंधेरी रातों में अब उसे भी जर्मनी में पैदा हुए मार्क्स का भूत दिखाई देने लगा है।
पंूजीवाद अपनी पैदाइश के साथ ही मंदी को भी लेकर पैदा हुआ। 200 सालों से ज्यादा का इसका इतिहास बताता है कि मंदी ने कभी भी इसका साथ नहीं छोड़ा। वजह यह है कि इसका अस्तित्व ही लगातार मुनाफे के बढ़ने पर टिका हुआ है। जाहिर है मुनाफा तभी बढ़ेगा, जब लोगों को उनकी श्रमशक्ति का उचित मूल्य नहीं दिया जाएगा। मानव के श्रम का यही शोषण पूंजीवादी व्यवस्था का बुनियादी चरित्र है। मानव श्रम की इसी लूट से मुनाफा पैदा होता है। ऐसे में कोई कैसे कह सकता है कि इस तरह की अमानवीय व्यवस्था के रहते कैसे सभी को रोटी, कपड़ा और मकान दिया जा सकता है।
      अमेरिका में भी यही हुआ। जब वह लोगों को रोजी-रोटी देने में असफल साबित हुआ तो उसने सभी को आशियाने का लालच दिया। उसने सोचा कि संतृप्ता अवस्था में पड़ी अपनी अर्थव्यवस्था को वह अपनी इस योजना से गति दे सकेगा। इसके लिए वहां के बैंकों ने लोगों को बहुत ही कम व्याज पर आशियाना खरीदने का लालच दिया। अब चूंकि लोगों के पास पैसे ही नहीं थे, तो वे भला व्याज कैसे चुका पाते। 2008 का सबप्राइम संकट इसी का नतीजा था। एक बार फिर से इस आधुनिक तानाशाह ने साबित कर दिया कि वह न सिर्फ मानव मन को समझने के मामले में निरा मूर्ख है, वरन वह बेहद अमानवीय भी है।
अमेरिका में मीडिया पर कड़ा पहरा है। बेहतर दुनिया के रूप में बहुप्रचारित इस मुल्क के बदन से जैसे-जैसे कपड़े उतरते गए, वैसे-वैसे उसने लोकलाज के भय से अपने बदन को और ढकने का प्रयास किया। अब चूंकि मीडिया को किसी के नंगे बदन को दिखाने में कुछ ज्यादा ही मजा आता है, इसलिए उसने इस दृश्य को अपने दर्शकों को दिखाना शुरू कर दिया। बस यहीं से इस आधुनिक तानाशाह ने मीडिया पर पहरा बिठा दिया।
हकीकत यह है कि वहां के सबप्राइम संकट के बाद से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव रहे कई बैंक दिवालिया हो गए। नतीजतन लेहमन ब्रदर्श, फ्रैडी, फैनी, सीटी बैंक, मोर्गन स्टेनले, बीयर स्टर्न और बीमा कंपनी एआईजी बर्बादी की कगार पर आ गए। संकट से बचने के लिए इन बैंकों ने दसियों हजार लोगों की नौकरियों से बाहर कर दिया। यही हाल दूसरे संस्थानों में भी हुआ। अमेरिकी सरकार ने पूंजीपतियों को मंदी से बचाने के लिए राहत पैकेज दिया, उधर जनता से उसके मुंह का निवाला छिना। यानी कुल मिलाकर निजी उद्यमों को लाभ पहुंचाने और उन्हें मंदी के बोझ से बचाने के लिए जनता को दंड मिला। सब्सिडी खत्म कर दी गई, लाखों लोगों की नौकरियां छीनी गर्इं। यह सब कुछ उस जनता के साथ किया गया, जिसका मंदी लाने में कोई रोल नहीं था। आखिर यह कहां का न्याय है? जाहिर है ऐसा कदम जनता की सरकार नहीं उठा सकती। इसीलिए हमने अमेरिका को आधुनिक तानाशाह की संज्ञा दी है। आज अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश बन चुका है। यह अलग बात है कि हमें चूंकि चकाचौंध भरी दुनिया देखने की आदत पड़ चुकी है या फिर हमें ऐसी ही दुनिया देखने की आदत डाल दी गई है, इसलिए इस चकाचौंध से भरी दुनिया के नीचे भयंकर अंधेरे में जीने वाली विशाल मेहनतकश जनता हमें दिखाई नहीं देती। हकीकत यह है कि अमेरिका में तलछट की जिंदगी जीने वालों की एक बड़ी फौज जमा है। यह फौज लगातार बढ़ती जा रही है।
       अमेरिका में दिसंबर 2012 में बेरोजगारी की दर 7.8 प्रतिशत थी, जो 2013 के जनवरी माह में (सिर्फ एक माह बाद ही, एक साल बाद नहीं) 7.9 प्रतिशत हो गर्र्र्ई। दिसंबर 2012 में वहां बेरोजगारों की संख्या करीब 1.22 करोड़ थी, जो जनवरी 2013 में वह 1.23 करोड़ हो गई। इसलिए भले ही अमेरिका मंदी से उबरने के लाख दावे कर ले, या हो सकता है कि वह कुछ समय के लिए इससे उबर भी जाए, लेकिन वह पंूजीवादी व्यवस्था के रहते अपने पापों से कभी कभी मुक्ति नहीं पा सकता।
     दूसरी ओर इस महामंदी के अंधेरे में समूची दुनिया के आवाम ने एक बेहतर दुनिया का ख्वाब भी देखना शुरू कर दिया है। इस ख्वाब में भविष्य का अक्श अभी बहुत साफ तो नहीं है, लेकिन इसे हकीकत में उतारने के लिए समूची दुनिया में जद्दोजहद शुरू हो गई है। अमेरिका के वॉल स्ट्रीट से उठी यह आवाज आज समूचे यूरोप और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सुनाई पड़ रही है। भूलना नहीं चाहिए कि सामाजिक जड़ता किसी भी समाज की मृत्यु का दूसरा नाम है, वहीं सामाजिक तब्दीली किसी भी कौम के जिंदा होने का सबूत है। रूस के महान साहित्यकार और विचारक प्लेखानोव ने कहा है कि ‘जिंदा आदमी जिंदा सवालों पर सोचता है।’ यह भी सत्य है कि ‘कुछ नहीं सोचने, कुछ नहीं बोलने से आदमी मर जाता है।’ आज की दुनिया पर ये दोनों बातें लागू होती हैं। आज लोग जिंदा सवालों पर सोच भी रहे हैं और बोल भी रहे हैं। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य कुछ बेहतर तो होगा ही।
contact : devhills@gmail.com, mb: 09719867313

नहीं रुक रहा पलायन

                                                           देवेन्द्र प्रताप
भारत में विकास के लाख दावों के बावजूद आज भी पलायन बड़ी समस्या बना हुआ है। पलायन की जब भी बात होती है, आमतौर पर लोगों की निगाह में सबसे पहले यूपी और बिहार राज्यों की तस्वीर उभरती है। इस समय किसी एक प्रांत से उसी प्रांत में या एक प्रांत से दूसरे किसी प्रांत में रोजी रोटी के लिए पलायन कर गए लोगों की संख्या पिछले एक दशक में 9 करोड़ 80 लाख हो गई है। इसमें 6 करोड़ 10 लाख लोगों ने एक गांव से उसी प्रांत के किसी अन्य गांव में पलायन किया, जबकि 3 करोड़ 60 लाख लोग रोजगार की तलाश में अपने गांव को छोड़कर शहर में चले गए।
रोजगार देने में महाराष्ट्र सबसे आगे
इस समय भले ही गुजरात और नरेन्द्र मोदी का खूब गुणगान किया जा रहा हो, लेकिन रोजगार देने में महाराष्ट्र सबसे आगे है। महाराष्ट्र में आने वालों की तादाद यहां से जाने वालों की तादाद से कहीं ज्यादा है। अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन की रिपोर्ट, ‘मैनेजिंग द एक्जोड्स-ग्राउंडिंग माइग्रेशन इन इंडिया’ के अनुसार पिछले एक दशक में कांग्रेस शासित राज्य महाराष्ट्र में आने वालों की तादाद यहां से जाने वालों की तादाद से 20 लाख 30 हजार रही। वहीं, देश की राजधानी और कांग्रेस शासित राज्य दिल्ली आने वालों की संख्या के आधार पर यह राज्य लोगों को रोजगार के लिए आकर्षित करने में दूसरे स्थान पर है। यहां पिछले एक दशक में करीब 10 लाख 70 हजार लोग रोजगार की तलाश में आए। गुजरात रोजगार देने में तीसरे स्थान (0.68लाख) पर है, जबकि हरियाणा रोजगार देने (0.67 लाख) में चौथे स्थान पर है।
पलायन में यूपी, बिहार अव्वल
देश के सबसे पिछड़े राज्यों में यूपी और बिहार की गिनती होती है। भारत सरकार की 11 वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार रोजी-रोटी की तलाश में यूपी से बाहर जाने वालों की तादाद यहां आने वालों की तादाद से 20 लाख 60 हजार ज्यादा रही। जबकि, बिहार से बाहर जाने वालों की संख्या यहां आने वालों की संख्या से 10 लाख 70 हजार ज्यादा रही।
1991 के बाद बढ़ा पलायन
जब हमारे देश में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे, तो उन्होंने नई आर्थिक नीति को यह कहकर लागू किया था कि इससे रोजगार में बढ़ोत्तरी होगी और पलायन पर लगाम लगेगी। जबकि आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि पलायन रुकने के बजाय और बढ़ता गया। 1991 से 2001 के बीच 7 करोड़ 30 लाख लोगों ने अपनी खेतीबाड़ी और अपने ग्रामीण परिवेश को इसलिए अलविदा कह दिया, क्योंकि उनके पास रोजगार के पारंपरिक साधन या तो खत्म हो गए या फिर वे उनकी जरूरतों के लिए नाकाफी साबित हुए। इस आंकड़े में 5 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे रहे, जिन्होंने उसी प्रांत के एक गांव को छोड़कर दूसरे गांव चले गए, जबकि करीब 2 करोड़ लोग गांव से शहरी इलाकों में चले गए। इस समयांतराल में करीब 30 करोड़ 90 हजार लोग अपना मूल स्थान छोड़ने को विवश हुए। यह संख्या हमारी जनसंख्या की 30 प्रतिशत के आसपास बैठती है। आज मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हैं तथा अपने पहले की ही नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। 1971 में पलायन की दर 13.6 प्रतिशत थी, यह 2001 में बढ़कर 14.7 प्रतिशत हो गई।
contact: devhills@gmail.com, mb:  09719867313