Tuesday, August 6, 2013

अयोध्या के गम

                     
          कृष्ण प्रताप सिंह
पिछले दिनों भाजपा के नए उत्तर प्रदेश प्रभारी अमित शाह का अयोध्या आकर वहां भव्य राममंदिर के निर्माण का एलान करना इतनी बड़ी खबर बना कि उस पर हफ्तों चर्चाएं हुईं। उसी अयोध्या के कड़ी सुरक्षा वाले येलोजोन में बीते हफ्ते संतों-महंतों के खुद को सेकुलर व समाजवादी कहने वाले गुटों के बीच दिनदहाड़े हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की जान चली गई और कई अन्य घायल हो गए, लेकिन किसी ने इतना भी नोटिस नहीं लिया कि उसको लेकर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता। सो भी जब इनमें एक गुट के नेता समाजवादी संत सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबा भवनाथदास और दूसरे के हिन्द केशरी हरिशंकरदास हंै। दोनों का ताल्लुक अयोध्या के सौहार्द की सबसे बड़ी प्रतीक हनुमान गढ़ी से है। अलबत्ता, हरद्वारी व सागरिया नाम की अलग-अलग पट्टियों से। 
पार्टियों में बंटे संत
यदि इस घटना की चर्चा होती तो आप जानते कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद अयोध्या का इकलौता या सबसे बड़ा गम नहीं है। धर्म की राजनीति ने उसके साधु-संतों व महंतों तक को न सिर्फ सपाई, भाजपाई, कांगे्रसी व बसपाई संतों के रूप में ही नहीं, बल्कि जातियों के आधार पर भी बांट रखा है। हाईकोर्ट ने प्रदेश के राजनीतिक दलों को जातियों की रैलियां करने से रोक रखा है, लेकिन अयोध्या में प्राय: हर जाति के अलग-अलग मंदिर हैं। यों, कहा जाता है कि अयोध्या का हर घर एक मंदिर है, जिसका पूरा सच यह है कि हर मंदिर एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान है, जिनकी परिसम्पत्तियों के विवाद संतों-महंतों को प्राय: अदालतों में खड़ा रखते हैं। न्यायिक सूत्र कहते हैं कि स्थानीय अदालतों को संतों के विवादों से मुक्त कर दिया जाए, तो उनका काम काफी हल्का हो जाए।
संपत्ति विवाद में गिरती हैं लाशें
सरकारी व निजी सुरक्षा अमले से घिरे रहने और प्राय: लग्जरी कारों में नजर आने वाले संत-महंत यजमानों को भले ही लोभ-मोह व माया से परे रहने का उपदेश देते हैं, मंदिरों की परिसंपत्तियों के विवादों में प्राय: लाशें गिराते या गिरवाते रहते हंै। क्योंकि, अदालती फैसले की लंबी प्रतीक्षा उनसे की नहीं जाती और बमों व गोलियों से तुरत-फुरत फैसला बहुत लुभाता है। घातक आग्नेयास्त्र उन्हें इतने पसंद हैं कि लाइसेंस पाने के लिए उनके सैकड़ों आवेदन फैजाबाद के जिलाधिकारी के कार्यालय में धूल फांक रहे हैं। कई साल पहले हुई रामजन्मभूमि के मुख्य पुजारी लालदास की नृशंस हत्या के बाद से संतों की चरण दाबकर चेला बनने और गला दबाकर महंत बन बैठने की परंपरा का बोझ ढोते-ढोते अयोध्या अपनी ऐसी छवि की बंदिनी हो गई है कि याद नहीं कर पाती कि कितने समय पहले यथार्थ की जमीन पर सहज होकर चली थी।
मैली हो गई राम की सरयू
वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने अपने ‘आखिरी कलाम’ में अयोध्या को धर्म की मंडी के अतिरिक्त शहर का उच्छिष्ट और गांवों का वमन कहा था। इस उच्छिष्ट और वमन के चलते अयोध्या को छूकर बहने वाली सरयू नदी का वह पानी बुरी तरह प्रदूषित है, जिससे भगवान के भोग के सारे व्यंजन बनते हैं। फिर भी शराब फैक्टरियों व उद्योगों के सरयू में आने वाले प्रदूषण के ट्रीटमेंट के लिए कुछ नहीं किया जा रहा।
नशा, गंदगी और अश्लीलता
अयोध्या की गलियों के बारे में कहा जाता है कि वे दुनिया की सबसे सुंदर पर सबसे गंदी गलियां हैं। इस नगरी के सुंदरीकरण व पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर लाने के कई प्रयास पिछले दशकों में दम तोड़ चुके हैं। एक समय अयोध्या पैकेज की बड़ी चर्चा थी, लेकिन यह ठंडे बस्ते में चले गई। इसके प्राचीन वैभव, संस्कृति व वास्तुकला का गौरवगान तो बहुत होता है, लेकिन समझा नहीं जाता कि पर्यटक किसी भी शहर की आत्मा से साक्षात्कार करने आते हैं और इस दृष्टि से उसका वर्तमान भी समृद्ध होना चाहिए। अयोध्या में सुरक्षा व्यवस्था को छोड़ दीजिए तो कुछ भी ठीक नहीं है। राम की पैड़ी, रामकथा पार्क और चौधरी चरणसिंह घाट जैसे पर्यटकों के आकर्षण के गिनती के स्थल हैं भी, तो उपयुक्त देखरेख के अभाव में गन्धाते रहते हंै। दूसरी ओर जनरुचियां इतनी बिगाड़ दी गई हैं कि धार्मिक फिल्मों के आवरण में अश्लील सीडियां तक बिकती पाई जाती हैं। धर्म की यह नगरी नशे की गिरफ्त से भी नहीं बच पा रही।
न दिखे कोई गरीब...
जिस फैजाबाद जिले में अयोध्या है, पिछली जनगणना के अनुसार उसकी कुल जनसंख्या 20,88,929 है। इनमें 2,81,273 लोग नगरों या कस्बों में रहते हैं और शेष गांवों में। सिर्फ अयोध्या नगर की बात करें तो उसकी जनसंख्या 50 हजार से थोड़ी ही ज्यादा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों की तरह गरीबी यहां भी राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। लेकिन गरीबों की कितनी फिक्र की जाती है, इसे समझना हो तो जानना चाहिए कि अभी गरीबों की पहचान का काम भी पूरा नहीं हो पाया है। लेखपालों को अलिखित निर्देंश हैं कि वे किसी की आय भी इतनी कम होने का प्रमाणपत्र जारी न कराएं जिससे वह अपने को गरीब प्रमाणित कर सके।
सरयू में सक्रिय खनन माफिया
पूरे फैजाबाद जिले में हाथ कागज, दफ्ती बनाने, दस्तकारी हैंडलूूम और जूते बनाने के छिटपुट उद्योगों के अलावा उद्योग के नाम पर कुछ भी नहीं है। शायद इसका कारण क्षेत्र में किसी भी तरह के कच्चे माल की अनुपलब्धता है। बस सरयू में बालू पाई जाती है, माफिया जिसका अवैध खनन करके कमाई करते हैं। एक बार बालू से शीशा बनाने के उद्योग की स्थापना की बात चली थी, लेकिन वह भी आई गई हो गई। 
राम भरोसे श्रीराम अस्पताल
यहां अनेक लोग खडाऊं, मूर्तियों, कंठियों, फूलमालाओं व सौंदर्य प्रसाधनों आदि की बिक्री से जीविका अर्जित करते हैं, लेकिन चिकित्सा और स्वास्थ्य की सुविधाओं की दृष्टि से किसी का कोई पुरसाहाल नहीं है। भगवान श्रीराम के नाम पर जो अस्पताल है, वह भी भगवान भरोसे ही है।
कहने भर को विश्वविद्यालय
यहां गरीबी के मुख्य दो कारण बताए जाते हैं। पहला यह कि भूमि उपजाऊ होने के बावजूद खेती किसानी पिछड़ी हुई है। दूसरा यह कि नवयुवकों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल पा रहे। खेती किसानी की हालत सुधारने और उससे संबंधित शोधों को बढ़ावा देने के लिए आचार्य नरेंद्रदेव के नाम पर जो कृषि विश्वविद्यालय खोला गया, भ्रष्टाचार, राजनीति व काहिली ने उसकी जड़ें खोखली कर दी हंै। डॉ. राममनोहर लोहिया के नाम पर जो अवध विश्वविद्यालय है, उसमें अभी तक भाषाओं का विभाग ही नहीं है। इस विश्वविद्यालय में ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे, उसके नाम की थोड़ी बहुत भी प्रासंगिकता सिद्ध हो। कहने को उसमें एक श्रीराम शोधपीठ भी है, लेकिन उसका पिछले बीस-पचीस वर्ष में अयोध्या को लेकर हुए महत्व के शोधों में कोई हिस्सा नहीं है। यही हाल महत्त्वाकांक्षी अयोध्या शोधसंस्थान का भी है। फिलहाल, कोई नहीं जानता कि अयोध्या को इन गमों से निजात कब मिलेगी।

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