Saturday, July 27, 2013

भगवान राम का वह पहला इस्तेमाल!

                                                                                                       कृष्ण प्रताप सिंह
बीती शताब्दी के आखिरी डेढ़ दशकों में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को उग्रता की चरम परिणति तक ले जाकर भारतीय जनता पार्टी ने कांगे्रस को शिकस्त देने में उसका भरपूर इस्तेमाल किया, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि स्वतंत्र भारत में चुनावी जीत के लिए भगवान राम के राजनीतिक इस्तेमाल की शुरुआत सबसे पहले कांगे्रस ने ही की थी। सो भी आजादी के थोड़े ही दिनों बाद,1948 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के फैजाबाद में हुए पहले उपचुनाव में अपनी तरह के अनूठे समाजवादी नेता आचार्य नरेन्द्रदेव के विरुद्ध। तब, जब उसके रचनात्मक विपक्ष के निर्माण की कोशिश में आचार्य जी उससे अलग होने और विधानसभा से इस्तीफा देने के बाद फिर से मतदाताओं का सामना कर रहे थे।
नरेन्द्र देव ने छोड़ी कांग्रेस
उस उपचुनाव में आचार्य जी की हार की दास्तान बड़ी ही मार्मिक और दुखदायी है। स्वतंत्रता संघर्ष की धूप और धूल खाते हुए वे उन दिनों के पांच नगरपालिकाओं (जिसमें फैजाबाद और अयोध्या भी शामिल थीं) के क्षेत्र से 1946 में उत्तर प्रदेश (जिसे तब संयुक्त प्रांत कहते थे) विधानसभा के निर्विरोध सदस्य निर्वाचित हुए थे। इससे पहले 1937 में भी वे विधानसभा का चुनाव जीते थे और प्रदेश के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) पद के लिए हर किसी की पहली पसंद माने जाते थे। उनके द्वारा यह पद संभालने की उत्सुकता न जताए जाने के बाद ही पंडित गोविन्द वल्लभ पंत को उस पर आसीन किया गया था। इतिहास गवाह है कि आजादी के बाद कांग्रेस द्वारा अपनाई जा रही रीति-नीति से तालमेल न बैठा पाने के कारण आचार्य जी ने 31 मार्च, 1948 को 11 अन्य विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी और राजनीतिक नैतिकता का उच्च मानदंड स्थापित करते हुए विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर  अलग पार्टी बना ली थी। इस्तीफे के वक्त सदन को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था: जनतंत्र की सफलता के लिए एक विरोधी दल का होना आवश्यक है। एक ऐसा विरोधी दल जो जनतंत्र के सिद्धान्त में विश्वास रखता हो, जो राज्य को किसी धर्म विशेष से संबद्ध न करना चाहता हो, जो गवर्नमेंट की आलोचना केवल आलोचना की दृष्टि से न करे और जिसकी आलोचना रचना व निर्माण के हित में हो न कि ध्वंस के लिए। उन्होंने अंदेशा जताया था कि देश में सांप्रदायिकता का जैसा प्राधान्य है और देशवासी जिस तरह अभी जनतंत्र के अभ्यस्त नहीं हैं, उससे खतरा है कि रचनात्मक विरोध के अभाव में सत्तादल में अधिनायकत्ववादी मनोवृत्तियां पनप जाएं। वे ऐसा नहीं होने देना चाहते इसलिए अपना पक्ष बदल रहे हैं। उन्होंने यह भी साफ किया था कि ऐसे अवसरों पर प्राय: नेता त्याग-पत्र नहीं देते। ‘हम चाहते तो इधर से उठकर किसी दूसरी तरफ बैठ जाते। किन्तु हमने ऐसा करना उचित नहीं समझा। ऐसा हो सकता है कि आपके आशीर्वाद से निकट भविष्य में हम इस विशाल भवन के किसी कोने में अपनी कुटी का निर्माण कर सकें, किन्तु चाहे यह संकल्प पूरा हो या नहीं, हम अपने सिद्धान्तों से विचलित नहीं होंगे।’ अपने संबोधन के अन्त में आचार्य जी ने सदन के अध्यक्ष के साथ सदन के नेता गोविन्दवल्लभ पंत के प्रति भी कृतज्ञता जताई थी। लेकिन पंत जी इस कृतज्ञता का कोई भी प्रतिफल देने के मूड में नहीं थे। उनको लग रहा था कि आचार्य जी के रूप में उनका सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से बाहर हो गया और वे चाहते थे कि किसी भी कीमत पर वह दोबारा चुनकर न आए।
आचार्य के खिलाफ चक्रव्यूह
फैजाबाद में आचार्य जी की रिक्त सीट पर उपचुनाव हुआ तो कांग्रेस के पास उनको वैचारिक टक्कर देने वाला कोई प्रत्याशी नहीं था। पार्टी के भीतर एक विचार यह भी था कि कांग्रेस अपना उम्मीदवार उतारे ही नहीं और 1946 की ही तरह आचार्य जी के निर्विरोध विधानसभा प्रवेश का रास्ता साफ कर दे। लेकिन पंत जी ने इसका प्रबल विरोध किया और संभवत: उन्हीं के प्रभाव में बाबा राघवदास को कांग्रेस प्रत्याशी बनाया गया। राघवदास किसी भी तरह आचार्य जी के मुकाबले में ठहरते नहीं थे। न ज्ञान व गुण के मामले में और न गौरव व गरिमा के मद्देनजर। उनकी सिर्फ एक विशेषता थी कि वे देश के विभाजन के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराते हुए हिन्दू कट्टरपंथियों के घृणा अभियानों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। परस्पर अविश्वास के उस माहौल में विवादित बाबरी मस्जिद पर जबरन कब्जे की जो साजिशें चल रहीं थीं, बाबा राघवदास की उनसे भी संबद्धता बताई जाती थी। इसके बावजूद उन्हें विश्वास न था कि वे आचार्य जी से मैदान मार लेंगे। मुकाबले के दौरान हालत पतली होने लगी, तो उन्होंने यह बात किसी तरह पंत जी तक पहुंचाई। तब तक की स्थापित परंपरा थी कि प्रीमियर पद पर आसीन व्यक्ति उपचुनावों में प्रचार के लिए नहीं जाता था। लेकिन, कहते हैं कि कांग्रेस की आसन्न हार से डरे गोविन्दवल्लभ पंत ने इस परंम्परा को तोड़ने में ही भलाई समझी।
व्यूह रचनाकार की भूमिका में गोविन्द बल्लभ पंत
प्रसिद्ध पत्रकार एम. चेलपति राव ने लिखा है कि उस उपचुनाव में कांग्रेस के टहलुओं ने पहले आचार्य जी पर खूब कीचड़ उछाला, फिर गोविन्दवल्लभ पंत बाबा राघवदास का प्रचार करने फैजाबाद आए। शहर के चौक में हुई सभा में वे बोलने खड़े हुए तो बाबा राघवदास का नाम लेने के बजाए आचार्य जी की तारीफों के पुल बांधने लगे। उन्होंने कहा- आचार्य जी हिन्दी-उर्दू पर असाधारण रखते हैं। कई अन्य भाषाओं के भी ज्ञाता हैं। धाराप्रवाह व प्रभावी व्याख्यान देने की उनमें नैसर्गिक क्षमता है। विचारशक्ति के तो वे धनी हैं ही, उनकी वाक्पटुता बुद्धिजीवियों और सुधीजनों को आकर्षित करने वाली है। वे अतिउत्साही शिक्षक हैं और थोड़े से वाक्यों व चुनिंदा शब्दों में संक्षिप्तता और संश्लेषण की प्रतिभा दिखाते हुए किसी मुद्दे की स्पष्ट व विशद व्याख्या कर सकते हैं। वे दुर्लभगुण संपन्न ऐसे श्रेष्ठ पुरुष हैं, जिसके पास दुर्लभ बुद्धि, दुर्लभ प्रतिभा और दुर्लभ सत्यनिष्ठा है। पंत जी की बातें सुनकर बाबा राघवदास बेचैन हो उठे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पंत जी उनका प्रचार करने आए हैं या रहा-सहा भट्ठा बैठाने। यह बात उनकी मुख मुद्रा से भी छिपी नहीं। वे खीझते हुए से बैठे रहे तो उनकी मन:स्थिति भांपकर पंत जी ने एक शातिर करवट ली। बोले- इतने गुणों के बावजूद आचार्य जी में एक ऐब है और यह इतना बड़ा ऐब है कि इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। वे मार्क्सवादी हैं और साथ ही नास्तिक भी। ईश्वर को नहीं मानते, धर्म को नहीं मानते और राम को उनके मानने का तो सवाल ही नहीं। वे अयोध्या से जीतकर गए तो निश्चित ही वह धर्मध्वजा नीची हो जाएगी, जो अभी खूब ऊंची फहराती है। इसलिए मैं आप सारे लोगों से निवेदन करता हूं कि आप बाबा राघवदास को जिताइए और धर्म की ध्वजा को नीची होने से बचाइए।
...और हार गए आचार्य
उस माहौल में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इतना ही काफी था। आचार्य जी ने दिखावे के लिए आस्तिक होना स्वीकार नहीं किया और वे उपचुनाव हार गए। बाबा राघवदास जीते और उन्होंने अपनी कारगुजारियों से कांग्रेस या अपने क्षेत्र की जनता का कितना और कैसा भला किया, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 22, 23 दिसंबर, 1949 की रात बाबरी मस्जिद में गुपचुप मूर्तियां रखी गईं तो इस ‘अभियान’ की सफलता से गदगद होकर उन्होंने वहां जाकर लोगों को संबोधित करते हुए कहा था-‘मैं देखता हूं कि यहां के लोग मस्जिद पसंद नहीं करते, अत: कोई उसे लौटा नहीं सकता। यदि सरकार ने इसमें कोई हस्तक्षेप किया तो मैं त्यागपत्र दे दूंगा। मैं सरकार की ओर से आया हूं और उत्तरदायित्व के साथ यह कह रहा हूं।’

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