Saturday, July 27, 2013

शब्द शिल्पियों, तय करो किस ओर हो तुम

छायावादी युग के बाद हिंदी साहित्य में प्रसाद, पंत, निराला, प्रेमचंद जैसी महान विभूतियां नहीं पैदा हुर्इं। बाद की पीढ़ी में वह वैज्ञानिक प्रखरता, गहन चिंतन, दृष्टि की व्यापकता, संवेदना की गहराई, अनुभूति की तीव्रता, भावों-विचारों की ऊंचाई, जीवन-दृष्टि की उदारता और स्वप्नदर्शिता नहीं दिखाई देती। वर्तमान साहित्य ने कुछ नए प्रतिमान जरूर गढ़े हैं, लेकिन फिर भी बड़े फलक पर वह वर्तमान से मुंह चुराता नजर आता है। प्रस्तुत आलेख कुछ ऐसे ही सवालों को बड़ी शिद्दत से उठाता है।
                 डॉ. देवेन्द्र चौधरी
                 (पहली किस्त)
यह कटु सत्य है कि छायावादी युग के बाद से हिंदी साहित्य निरंतर उतार पर आता हुआ नजर आता है। 1936 के बाद हिंदी साहित्य में प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा, पे्रमचंद, रामचंद्र शुक्ल जैसी महान प्रतिभाएं और साधक-तपस्वी व्यक्तित्व नहीं उत्पन्न हुए। बाद की पीढ़ी में वह वैज्ञानिक प्रखरता, गहन चिंतन, दृष्टि की व्यापकता, संवेदना की गहराई, अनुभूति की तीव्रता, भावों-विचारों की ऊंचाई, जीवन-दृष्टि की उदारता और स्वप्नदर्शिता नहीं दिखाई देती। ऐसा कहने का तात्पर्य, इस युग के बाद के समूचे साहित्य के महत्व, कथ्य, शिल्प, भाषा-शैली के स्तरों पर उसकी विविधता, प्रयोगों और नवीनताओं को नकारना कदापि नहीं है, केवल उनकी तुलनात्मक स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करना भर है। छायावादी युग के बाद लेखकों की एक लंबी कतार है, जिनका कृतित्व, निस्संदेह उनके अथक सृजनात्मक संघर्ष, सुदीर्घ रचना-यात्रा, मूल्यवान चिंताओं, वेदनाओं और निष्ठाओं का परिचायक है। इसके बावजूद यह तथ्य है कि 1930 के बाद से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में, व्यापक पैमाने पर व्यक्तिवाद, भोगवाद, निराशावाद, पराजयवाद, रुग्ण रोमांस, कुंठा, आत्मपीड़न, अंतर्मुखता, अनास्था, नियतिवाद, हालावाद मौजूद रहा। प्रगतिशील आंदोलन अवश्य आया, लेकिन वह स्वयं व्यक्तिवाद, अहंवाद, फिलिस्तीनिज्म, संकीर्णतावाद, यांत्रिकता, कठमुल्लावाद, उग्रतावाद, उदारवाद जैसी अनेकों बीमारियों से ग्रस्त था। इनके कारण, अपनी अपार संभावनाओं और दीर्घकालिक प्रयत्नों के बावजूद उसको अधिक सफलता नहीं मिल सकी। इन पतनशील प्रवृतियों को काटकर, उस समय जो एक नया विकल्प, एक नया आदर्श, एक नयी आस्था, एक नयी सोच-नयी संस्कृ ति को निर्मित करने का कार्य अपेक्षित था, उसमें यह सफल नहीं हो सका। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय काव्य-धारा, हालावाद, रोमांटिक गीत-कविता, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, मनोविश्लेषणवाद, नयी कविता, नयी कहानी की धाराओं के अंतर्गत जो साहित्य रचा गया, उसकी बृहत्तर सामाजिक यथार्थ पर से पकड़ ढीली पड़ती गयी। वह अधिकांश में मध्यवर्गीय मानसिकता और उसके अनुभव संसार के दायरे में परिमित होता गया। इसमें दृष्टि की व्यापकता, हदय की रागात्मकता और चिंता की गंभीरता का प्रचुर ह्रास हुआ।
काल से नहीं हुई मुठभेड़
1930-36 के बाद रचा जाने वाला हिंदी साहित्य उस चुनौती का कभी भी ठीक तरह से मुकाबला नहीं कर पाया,  जो उसके सामने उस समय मौजूद थीं। वह नया मनुष्य, नया साहित्य, नये युग, नयी चेतना के नारों के बावजूद एक ऐसी वास्तविक नींव और प्रगतिशील चेतना को जन्म नहीं दे पाया, जो कुंठा, अनास्था, रुग्ण्ता, निराशा, दिग्भ्रम और भटकाव का शिकार होते हुए तत्कालीन जन-जीवन और साहित्य को संबल और प्रेरणा देती और उन शक्तियों से टकराती, जिनके चलते जन आंदोलन गतिरोध को शिकार हो रहा था।
'47 की महान त्रासदी पर मूक शब्द शिल्पी
1947 में जब राष्ट्रीय मुक्ति का स्वप्न, सत्ता के हस्तांतरण के साथ ही छिन्न-भिन्न हो गया और प्रेमचंद व निराला की आशंका और चेतावनी आश्चर्यजनक रूप से सत्य साबित हुई, तब भी इसके भारी महत्व को नहीं समझा जा सका। सन् 47 के बाद के साहित्य में इस महान् त्रासदी की समझदारी और वेदना तथा इसके विरुद्ध गहरा विक्षोभ, टकराहट और विद्रोह नहीं मिलता। झूठा सच (यशपाल), बलचनमा (नागार्जुन) ‘यह पथ बंधु था’ (नरेश मेहता), केदार और नागार्जुन की कविताओं आदि कुछ रचनाओं में इसकी झलक अवश्य मिलती है, लेकिन ऐसी रचनाएं परिणाम में कम हैं तथा उनकी समझदारी बहुत साफ नहीं है। सन् 47 के बाद, जो सरकार, देश की जनता के हितों-सपनों की पीठ में छुरा मारकर सत्तासीन हुई, साहित्यकारों के दल, उससे संघर्ष करने के भावों-विचारों को विसर्जित करते हुए, सुविधा भोग के लिये सरकारी प्रतिष्ठानों में नौकरियों और पूंजीपतियों के संस्थानों की ओर उन्मुख होने लगे। राज्य-सत्ता और साहित्यकारों के बीच द्वंद्व, विरोध और टक राहट क्षीण पड़ने लगी। विरोध का स्वर अपनी तीक्ष्ण धार, कठोर आक्रामकता और प्रहारता से रिक्त और औपचारिक सा होने लगा।
सामाजिक मूल्यों में क्षरण का रचनाकर्म पर असर
'47 के बाद के कुछ वर्षों का समय हिंदी साहित्य के इतिहास का एक ऐसा बिंदु है, जहां से साहित्य के क्षेत्र में व्यक्तिवाद, अहंवाद, अनास्थावाद, सुविधावाद, समझौतावाद, अवसरवाद आदि प्रवृतियां तीव्र गति पकड़ती हैं। इसी के साथ हमें मध्यवर्गीय समाज के कांतिकारी चरित्र में होने वाला क्षय तेज रफ्तार पकड़ता हुआ नजर देता है। इस परिघटना ने लेखकों की चेतना को बहुत व्यापक स्तर पर प्रभावित किया। इसके परिणाम स्वरूप लेखकों में जुझारूपन, अनम्य प्रतिरोध, त्याग, साधना, आदर्शनिष्ठा, जोश, विद्रोह, साहस, गहन अनूभूति-प्रवणता, आत्मा की महाप्राणता और उदारता के उक्च कोटि के गुणों का ह्रास हुआ। इससे साहित्य-सृजन के स्तर में निरंतर गिरावट की प्रवृति पैदा हुई।
लेखक बढ़े, सृजनशीलता में कमी आई
चार-पांच दशकों के बाद स्थिति यह है कि एक ओर यदि लेखकों और पुस्तकों की संख्या बहुत बढ़ी है, तो दूसरी ओर लेखकों की सृजनशीलता की आयु असंदिग्ध रूप से बहुत घटी है। पाठकों का दायरा निरंतर छोटा हुआ है, पठनीयता कम हुई है, समाज में साहित्य का महत्व, उसकी हैसियत, उसकी अपील, उसका प्रभाव कमतर हुआ है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रंगमंच की तो बहुत ही बुरी दशा है। स्थिति की इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है और वह भी दुखद ओर चिंतनीय है। आज जिस प्रकार साहित्य, कला और सांस्कृतिक कर्म के क्षेत्र में राज्याश्रय , यश-लिप्सा, सम्मान, पुरस्कार, खेमाबंदी, गुटबंदी, मठाधीशी, प्रतिष्ठा की महत्वाकांक्षा, मंडी में क्रय-विक्रय का आकर्षण आदि का रुझान प्रबल से प्रबलतर होता जा रहा है, उसने निर्भीक व स्वाधीन चिंतन, संवेदना की व्यापकता और गइराई को भारी क्षति पहंचाई है, जो कि सृजनशीलता के अबोध विकास के लिए मूलभूत और अनिवार्य महत्व की चीजें हैं।       
                                                                                                            अगले अंक में जारी...

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