Monday, May 20, 2013

राष्ट्रपिता का वह जुझारू संपादक

के रामाराव
                         कृष्ण प्रताप सिंह
 नौ नवम्बर, 1896 को आंध्र प्रदेश के चीराला में जन्मे और नौ मार्च, 1961 को बिहार के पटना में अंतिम सांस लेने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उस ‘जुझारू संपादक’ की अब किसी को भी याद नहीं आती! उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भी नहीं! इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा लब्धप्रतिष्ठ दैनिक और साढ़े चार दशकों में फैले अपने लंबे पत्रकारीय जीवन में जैसे उच्च नैतिक मानदंडों की स्थापना की, उनकी स्मृतियां साख के गंभीर संकट के सामने खड़ी भारतीय पत्रकारिता को दिशा दे सकती हैं।
हर समय रहता था जेब में इस्तीफा
पत्रकारीय आग्रहों, सिद्धांतों व नैतिकताओं को बचाए रखने के लिए इस्तीफा जेब में लिए घूमने वाले इस मनीषी संपादक का नाम था-के रामाराव। इन्होंने 1919 में मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवक्ता की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता का वरण किया और कराची के दैनिक ‘सिंध आब्जर्वर’ में सह-संपादक बनते ही उसकी कीमत चुकानी शुरू कर दी, जबकि उनके बड़े भाई के. पुन्नैया उसके संपादक थे। मालिकों ने शिकायत की कि प्रिंस आॅफ वेल्स के भारत दौरे का जो वृत्तांत रामाराव ने लिखा है, वह बेहद शुष्क है। रामाराव का उत्तर था, ‘है क्योंकि शाही रक्त देखकर मैं प्रफुल्लित होकर काव्य रचना नहीं कर सकता!’ इस उत्तर के बाद तो उन्हें नौकरी से जाना ही था।
संपादक-दर-संपादक
प्रख्यात संपादक सी. वाई. चिंतामणि के निमंत्रण पर रामाराव इलाहाबाद के दैनिक ‘लीडर’ में आए तो भी चिंतामणि का ‘बौद्धिक-आधिपत्य’ स्वीकार नहीं कर सके। तब ‘पायनियर’ में यूरोपीय संपादक एफ डब्ल्यू विल्सन से ही कैसे निभा पाते?    मुंबई के ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ में गए, तो उसकी रीति-नीति से भी तालमेल नहीं बैठा पाए। अंगे्रज संपादक को  इस्तीफा देते समय उसने कारण पूछा तो उत्तर प्रश्न में दिया-‘क्या कोई भारतीय कभी ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ का संपादक हो सकता है?’ फिर तो बारी-बारी से ‘एडवोकेट आॅफ इंडिया’, ‘बॉम्बे क्रानिकल’ और ‘इंडियन डेली मेल’ दैनिकों में काम करने और कहीं भी टिक न पाने के बाद वे मुंम्बई में ही ‘फ्री प्रेस जर्नल’ के संपादक नियुक्त हुए। आगे चलकर उन्होंने कुछ दिनों तक कोलकाता से निकलने वाले दैनिक ‘फ्री इंडिया’ का संपादन किया। वहीं के ‘ईस्टर्न एक्सप्रेस’ में कुछ और दिन गुजारने के बाद वे दिल्ली लौट आए और 1937 में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में समाचार संपादक बने।
जब एक संपादक के समर्थन में उमड़ पड़ी जनता
मद्रास, कराची, मुंबई और दिल्ली की इस भागमभाग में मुंबई के ‘डॉन’ और मद्रास के ‘स्वराज्य’ से भी उनका जुड़ाव हुआ। लेकिन, उनके संपादकीय जीवन में सबसे बड़ा मोड़ 1938 में आया, जब वे पंडित जवाहरलाल नेहरू के कहने पर उत्तर प्रदेश आए और लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रवादियों के प्रमुख पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के संस्थापक-संपादक का पदभार संभाला। यही वह पत्र था, जिसमें वे सबसे लंबी अवधि तक, कुल मिलाकर आठ वर्ष रहे। इस दौरान उन्होंने ‘नेशनल हेराल्ड’ को न सिर्फ अंगे्रज गवर्नर सर मारिस हैलेट, बल्कि समूची ब्रिटिश सत्ता का सिरदर्द बनाए रखा। लखनऊ में बंद व्यक्तिगत सत्याग्रहियों पर अत्याचारों के विरुद्ध ऐतिहासिक संपादकीय ‘जेल या जंगल’ लिखा तो अंगे्रज जेलर सी.एम. लेडली की कथित मानहानि करने के आरोप में अगस्त, 1942 में उन्हें छ: महीने की सजा हुई। 15 अगस्त, 1942 को ‘वंदेमातरम’ शीर्षक से उन्होंने हेराल्ड का अपना आखिरी संपादकीय लिखा तो अंगे्रजों को वह भी सहन नहीं हुआ। गवर्नर हैलेट ने हेराल्ड पर छ: हजार रुपयों का जुर्माना ठोंक कर रामाराव को जेल में डाल दिया। महात्मा गांधी ने इस कार्रवाई को ‘ट्रेजेडी फॉर नेशनल मूवमेंट’ कहा और उत्तर प्रदेश की जनता अपने प्यारे संपादक के समर्थन में उमड़ पड़ी। वह उसको जेल जाने से तो नहीं रोक पाई, लेकिन हेराल्ड के लिए इतना धन इकट्ठा कर दिया कि उसके जुर्माने को आठ बार चुकाया जा सके।
‘मैं एक सैनिक हूं...’
हेराल्ड बंद होने के बाद ‘पायनियर’ के अंगे्रज संपादक ने उनसे पूछा कि अब उनकी पत्नी और आठ बच्चों का गुजर-बसर कैसे होगा? खासकर इसलिए कि उनके पास न कोई बड़ी जायदाद है, न बैंक बैलेंस? अंदाज सहानुभूति जताने से ज्यादा खिल्ली उड़ाने वाला था। रामाराव ने उत्तर दिया-‘मैं सैनिक हूं और संघर्ष करना जानता हूं। आपको मेरी चिंता में दुबले होने की जरूरत नहीं है।’ जेल से छूटकर रामाराव गांधी जी के पास चले गए और सेवाग्राम में रहकर कुछ दैनिकों के लिए स्पेशल रिपोर्टिंग करते रहे। 1945 में हेराल्ड फिर शुरू हुआ, तो उसके पहले पृष्ठ पर बाक्स था-‘गुडमार्निंग सर मारिस हैलेट’। इसका अर्थ था- ‘हम फिर आपको चुनौती देने आ पहुंचे हैं, गवर्नर साहब!’
नेहरू से मतभेद के चलते दिया इस्तीफा
सर स्ट्रेफोर्ड क्रिप्स के भारत आने और ‘बातें बनाने’ के मुद्दे पर एक आक्रामक संपादकीय को लेकर हेराल्ड प्रकाशन समूह के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनके मतभेद इतने गहरे हो गए कि उन्होंने अपने शिष्य एम. चेलपतिराव को पदभार सौंपकर त्यागपत्र दे दिया! दरअसल पंडित नेहरू क्रिप्स मिशन के प्रति नरम रुख के पक्षधर थे और चाहते थे कि रामाराव भी उनका अनुकरण करें, लेकिन रामाराव के लिए ऐसा करना संभव नहीं था। उनका स्पष्ट मत था कि पत्रकारों को हमेशा सरकार के विरोध में रहना साहिए। हां, सरकार विदेशी है तो विरोध शत्रुवत और स्वदेशी है तो मित्रवत होना चाहिए। मद्रास का ‘इंडियन रिपब्लिक’ हो या पटना का ‘सर्चलाइट’, उनकी संपादकीय नीति इसी सिद्धांत की अनुगामिनी रही। नेपाल के 1949 के जनवादी आंदोलन के समर्थन के सवाल पर ‘सर्चलाइट’ के राणाओं के समर्थक मालिकों से भी उनका टकराव हुआ। रामनाथ गोयनका, विश्वबंधु गुप्त और आचार्य जेबी. कृपलानी के आमंत्रण पर वे दिल्ली जाकर ‘इंडियन न्यूज क्रानिकल’ के संपादक बने, पर राजनीतिक मतभेदों ने उनको वहां भी टिकने नहीं दिया। श्रमजीवी पत्रकारों के हितों की सुरक्षा के लिए उन्होंने ‘इंडियन फेडरेशन आॅफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स’ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो 1954 के विश्व पत्रकार सम्मेलन में भाग लेने ब्राजील गए।
 संपर्क : 5/18/35, बछड़ा सुल्तानपुर, फैजाबाद, मो. 09838950948

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