Monday, March 18, 2013

जब कार धोना भी होगा अपराध

                                                         नूर उल हक
सन् 1860 के दमनकारी कानून के बदले जम्मू कश्मीर सरकार ने जो नया अधिनियम प्रस्तावित किया है, वह मध्यकाल की मनोवृत्ति को ही दर्शाता है। इसके कुछ प्रावधान बेहद हास्यास्पद हैं। सार्वजनिक स्थलों पर शांति बनाए रखने हेतु धारा 136 एवं 137 के अंतर्गत दंड के प्रावधान के तहत एक महीने की सजा जुर्माने के साथ, या जुमार्ने के साथ 6 माह की सजा। ये निम्न वजहों से दी जा सकती है-
(अ) ऐसा व्यक्ति जो सार्वजनिक स्थानों पर फर्नीचर, वस्तु, वाहन या किसी पशु की साफ-सफाई कर रहा हो।
(ब) सूर्यास्त के आधा घंटे पहले और सूर्योदय के एक घंटे पहले वाहन चलाना, किसी गैर मशीनीकृत वाहन से टकरा जाना।
(स) सार्वजनिक स्थान पर मल-मूत्र का त्याग करना।
(द) 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे से जेवरात, घड़ी, सायकल, बर्तन या कोई मूल्यवान वस्तु खरीदना।
(ई) सार्वजनिक स्थानों पर पंक्ति को तोड़ना, जोकि निजी या सार्वजनिक किसी भी प्रवृत्ति की हो सकती है।


जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित नए पुलिस कानून के कुछ प्रावधान मध्ययुगीन राजसत्ता की विरासत सी जान पड़ते हैं। जम्मू एवं कश्मीर पुलिस अधिनियम 2013, यदि वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो यह भ्रष्टाचार का पिटारा ही खोल देगा। ‘विशेष सशस्त्र बल क्षेत्र अधिनियम’ का विरोध करने से पहले उमर अब्दुल्ला को अपने प्रस्तावित पुलिस कानून पर भी गौर करना चाहिए।
पिछले इतवार मैं अपने ग्यारह वर्षीय बेटे के साथ शहर के बाहर कार से घूम रहा था। सड़क किनारे कार धोने की बात तब तक मेरे दिमाग में नहीं थी, लेकिन वहां कार धोते लोगों को देख मैं भी अपनी कार से बाहर निकल आया। मेरा बेटा भी उत्साह में आकर मग्गे से कार पर पानी फेंकने लगा। एकाएक मुझे अपना बचपन याद आया, जब मैं भी इसी उत्साह से अपनी खिलौना कार को धोता था। इसी दौरान एक पुलिस जिप्सी वहां से गुजरी। जैसा कि कश्मीर में सामान्य प्रवृत्ति बन गई है, मेरे बेटे ने भी पुलिस जिप्सी की ओर अपनी ऊंगलियां बढ़ाते हुए गोली चलाने का अभिनय शुरू कर दिया। एकाएक पुलिस की गाड़ी रुक गई और मेरे बेटे ने खुश होते हुए सोचा होगा कि शायद उसने सबको मार दिया है।
तभी पुलिस गाड़ी पीछे की ओर चली और मेरी कार के पास आकर रुक गई। उसमें से एक ठिगना अफसर अपने तीन अंगरक्षकों के साथ नीचे उतरा। गालियां निकालते मुंह से उसने कहा, ‘तुम अपने इस कबाड़ को घर पर नहीं धो सकते? सड़क किनारे पानी क्यों डाल रहे हो? क्या तुम्हें हमारे नए निर्देश पता नहीं हैं? जो भी सार्वजनिक स्थानों पर अपना फर्नीचर, वस्तु या कार या किसी पशु की साफ-सफाई करेगा उस पर जुर्माने के अलावा 6 महीने की सजा भी हो सकती है। तुम तो सा.. पढ़े लिखे दिखते हो, तो ऐसा क्यों कर रहे हो? क्या यह तुम्हारे बाप की जागीर है? तुम्हें किसने आदेश दिया कि अपनी (फिर एक गाली) यहां धोओ? नाराज पुलिस अफसर ने कार से बजाए गाड़ी के कागजात के मेरी नोटबुक उठा ली और पुलिस गाड़ी की ओर इशारा करते हुए वाहन में बैठने का इशारा किया।
अचानक मेरे बेटे ने कहा, ‘थानेदार अंकल, देखो कुत्ता पेशाब कर रहा है। उसको भी थाने ले चलो ना। इसने भी रास्ता खराब किया।’ इस चुटकले ने कमोवेश पुलिस वाले का गुस्सा कुछ कम किया। वह बोला सुनो यह मेरा काम है, मैं तो अच्छी भावना से काम कर रहा हूं। वह धीमे-धीमे मेरी कॉपी के पन्ने पलट रहा था। एकाएक उसकी आंख एक पन्ने पर अटक गई और वह बोल पड़ा, ओह तो तुम एक राष्ट्र विरोधी भी हो। तुम आतंकवादियों के समर्थक और उनसे सहानुभूति रखने वाले भी हो? तुम सत्ता के खिलाफ कार्य करते हो। मैंने जवाब दिया, नहीं श्रीमान, मैं तो एक पत्रकार हूं। जवाब मिला, अच्छा तभी तुम गलतियां कर रहे हो और कानून भी तोड़ रहे हो। और तुम्हें यह अधिकार किसने दिया कि तुम राष्ट्रीय हित और कश्मीर में पुलिस द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ लिखो? तुरंत गाड़ी में बैठो, मैं तुमसे थाने में ही बात करूंगा और तुम्हें कुछ तमीज भी सिखाऊंगा। तुम पत्रकार लोग दुनिया के सबसे बद्तमीज लोग होते हो।
ये देखकर मेरा बेटा रोने लगा। पुलिस अफसर ने कहा पत्रकार साहब अब क्या सोच रहे हो। थाने जाना चाहते हो और बरसों जेल में रहना चाहते हो या समझौता? मैंने कहा श्रीमान मैं क्या कर सकता हूं? गाली देते हुए वह गुर्राया। इसी बीच ड्राइवर ने गाड़ी चालू कर दी। अफसर फिर चीखा इसे थाने ले जाओ और अच्छा सबक सिखाओ। घबड़ाकर मैंने अपनी जेबें टटोली। उसमें 500 रुपये का एक नोट मिला, जिसे मैंने उस अफसर की ओर बढ़ा दिया। मुस्कराते हुए उसने कहा किसी से इस बात का जिक्र मत करना, वरना! मैं उदास होकर अपनी कार में बैठ गया। इस घटना को मैं अपनी डायरी में लिखना चाहता था। मैंने अपने बेटे से पेन मांगा। उसने मेरी ओर पेन बढ़ाया ही था कि मैंने अपने हाथ पीछे खींच लिए। प्रस्तावित पुलिस कानून में आदेशित था कि यदि तुमने 14 वर्ष से कम के किसी बच्चे से किसी भी तरह के जेवरात, घड़ी, पेन, सायकल, बर्तन या कुछ भी मूल्यवान खरीदा तो तुमको छ: महीने के लिए जेल भेजा जा सकता है।
घर लौटते समय मेरे नटखट बेटे ने वातावरण को हल्का बनाते हुए कहा, ‘पापा क्या ये सेना के लोग उनको जो कि अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर पेशाब आदि करते दिखाई देते हैं, उन्हें भी अंदर करेंगे?’ मेरे पास इसका एकमात्र उत्तर यही था कि सारे नियम सिर्फ आम कश्मीरियों के लिए ही हैं। घर लौटते में सेना के शिविर के नजदीक से गुजरते ही रोकते हुए कहा गया। ‘बाहर निकलो और लाइन में चलो। मेरा बेटा नाचते हुए चल रहा था। मैं डरा क्योंकि लाइन तोड़ना भी अब एक जुर्म है। वैसे मैं सूर्यास्त के पहले अपने घर लौट जाना चाहता था, क्योंकि नए पुलिस कानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो गाड़ी चला रहा है यदि सूर्यास्त के आधे घंटे बाद एवं सूर्यास्त के एक घंटे पहले बिना मोटरचलित वाहन से भिड़ जाता है, तो उसे एक महीने की सजा और जुमार्ना या 6 महीने की सजा और जुमार्ना हो सकता है।
फर्नीचर पर धूल की परतें चढ़ जाने दो लेकिन मैं उसे धोऊंगा नहीं। मेरे घर अब कोई पालतू जानवर नहीं होगा, क्योंकि कब किसी अफसर की आंख मुझ पर चढ़ जाए? पुलिस राज चलने दो, जिससे कि अफसरों को आम आदमी से अतिरिक्त कमाई हो सके। आम आदमी मरे तो मरे, अधिकारियों की स्थिति बेहतर होनी चाहिए। चूंकि नई दिल्ली कश्मीर में शांति चाहती है, तो इस नए पुलिस कानून को पारित हो ही जाना चाहिए।
इसके अलावा ग्रामीण रक्षा समितियों एवं विशेष पुलिस अफसरों की वापसी एवं मुखबिरों को इनाम का प्रावधान भी इस कानून में किया गया है। यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम वाले मामले में दिए गए उस निर्णय के विपरीत है, जिसमें साफ कहा गया है कि राज्य आम नागरिकों को हथियारबंद नहीं कर सकता और उन्हें मारने की अनुमति भी नहीं दे सकता। प्रस्तावित मसौदे के अनुसार पुलिस स्वयं के विशिष्ट सुरक्षा क्षेत्र घोषित कर सकती है और लोगों को विभिन्न अधिकारों से बेदखल कर सकती है। इस बात की पूरी संभावना है कि भ्रष्टाचार की जबर्दस्त गिरफ्त में फंसे कश्मीर में इस कानून के लागू हो जाने के बाद भ्रष्टाचार और बढ़ेगा। 
-स्वतंत्र पत्रकार, श्रीनगर 

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