Friday, February 17, 2012

जलता एथेंस : एक फोटो फीचर

यूरोपीय संघ, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की खूंखार तिकड़ी और उनके द्वारा यूनान की वित्तीय समस्याओं के इलाज के तौर पर थोपे जा रहे नव उदारवादी नुस्खों ने यूनानी जनता के सामने संघर्ष में कूद पड़ने के आलावा कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। यूनान को 170 अरब अमेरिकी डॉलर (यानी 130 अरब यूरो) के बेलआउट कोष के बदले 15,000 सरकारी नौकरियों में कटौती करने, न्यूनतम मजदूरी को 22 प्रतिशत घटाने, निजीकरण के द्वारा सार्वजनिक सम्पदा को बेचने और जनकल्याणकारी योजनाओं और खर्चों में भरी कटौती करने के प्रस्तावों पर अपने संसद की मुहर लगनी पड़ी है।
 इसके अंदेशे पर ही पूरा यूनान सडकों पर था। इसकी प्रतिक्रिया में एथेन्स में जो कुछ हुआ या हो रहा है इन तस्वीरों के माध्यम उसकी एक झलक पेश की जा रही है। रविवार12 फ़रवरी 2012 को एथेन्स के सडकों पर 80,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने मार्च किया, जिनमें मजदूर-कर्मचारी और छात्र-युवा सभी शामिल थे और उन्होंने पुलिस के घोर दमनकारी रवैये का बहादुरी के साथ मुकाबला किया। पुलिस के उकसावे के बीच भीड़ के एक छोटे से हिस्से ने दुकानों को लूटा, जम कर तबाही मचायी और 40 से भी अधिक इमारतों को आग के हवाले किया। यूनानी जनता के मिजाज को देखते हुए, मितव्ययिता के इन नए उपायों को लागू करने में भी सरकार को भरी विरोध का सामना करना पड़ेगा ।
प्रस्तुत है उस दिन के प्रदर्शन और उसके बाद की घटनों के कुछ चित्र। 40 चित्रों के पूरे फोटो फीचर को देखने के लिए निम्न लिंक को क्लिक करें। इन चित्रों को अलग स्रोतों से लिया गया है और हम उन सभी के आभारी हैं :



साभार -

Thursday, February 16, 2012

भारतीय राज्य द्वारा जनता पर चलाए जा रहे युद्ध का प्रतिरोध करो

यान मिर्डल
दोस्तो, मैं भारतीय जनता के पक्ष में खड़े आंदोलन की अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के बारे में कुछ कहना चाहता हूं।
हम यहां एक कारण से इकट्ठा हुए हैं। वह कारण है भारत की जनता पर खुद भारत के राज्य द्वारा या कुछ छूट देकर इस बात को कहें तो भारतीय राज्य मशीनरी पर काबिज हिस्सों द्वारा चलाया जा रहा युद्ध। आप सभी एक भारतीय नागरिक के बतौर इस युद्ध को रोक देना चाहते हैं। हम और दूसरे भारत के बाहर के मित्र इस युद्ध की भयावहता के खिलाफ खड़ी भारत की जनता के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
    ऐसा प्रयास भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं है। हम आपसे यहां भारत में यह नहीं कह रहे हैं कि आप अपने मामलों से कैसे निपटेंगे । इसका निर्णय करना आप पर है। कोई भी विदेशी इसका सुझाव नहीं दे सकता है। हालांकि साम्राज्यवादी घेरे से बहुत सारे- सरकार, मीडिया, एनजीओ, इस तरह का प्रयास कर रहे हैं। यह मामला उसूल का है। आप लोग - हम नहीं, अपनी कार्यवाहियों में भारत की जनता के प्रति उत्तरदायी हैं। जैसा कि हमने अमेरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया की जनता के संघर्षों के दौरान की एकजुटता आंदोलन के दौरान कहा था: ‘‘कंबोडिया, लाओस और वियेतनाम की जनता को अपने तरीकों से समर्थन दो‘‘।
    पर एक बात तो सच् है जिसे 1624 में जान डन ने सूत्रबद्ध किया था और जिसे विभिन्न देशों के हम लोग दमन और सामाजिक क्रूरताओं के खिलाफ, -स्पेन की जनता के खिलाफ छेड़े गये फ्रैंको के युद्ध के दौरान, उद्धृत और प्रयोग करते रहे हैं। यह उद्धहरण हमारी अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का आधार है:  ‘‘कोई भी आदमी अपने आप में एक द्वीप नहीं है; हरेक आदमी महाद्वीप एक हिस्सा है, मूल का हिस्सा है ........ किसी भी इंसान की मौत मुझे भी कम कर देता है, कारण कि मैं इस मनुष्यता का हिस्सा हूं। और इसीलिए यह जानने के लिए मत जाओ कि मौत का घड़ियाल किसके लिए बजा है; यह तुम्हारे लिए है।’’
इस समय भारत की जनता के खिलाफ चलाए जा रहे क्रूर युद्ध के बारे में कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। 1980 में जब मैं आंध्र प्रदेश में था (देखें: इडिया वेऽट्स, संगम बुक्स, हैदराबाद) उस समय मैंने खुद दलित व आदिवासीयों के खिलाफ युद्ध को देखा और सुना और यही अब अब 2010 में छत्तीसगढ़ में हो रहा है (देखें: रेड स्टार ओवर इडिया, सेतू प्रकाशनीय, कोलकाता)।
    इस युद्ध में जमीन कब्जाने वाले और शासक वर्ग के हथियारबंद गैंग और गिरोह आम जन के जल, जंगल जमीन पर कब्जा जमाने की कोशिश में लगे हुए हैं। गांवों को जलाया जा रहा है। महिलाओं का बलात्कार किया गया। और, यह कोई पुरूष की कामुकता का परिणाम नहीं है बल्कि यह आम जन के आत्मसम्मान व गरीमा को जलील कर देने का सोचा समझा हुआ तरीका है। जो लोग खुद की रक्षा में खड़े हो रहे हैं उन्हें आतंकवादी बता दिया जा रहा है।
यह युद्ध सिर्फ इन अपनाये गये पारंपरिक तौरतरीकों के चलते ही क्रूरतापूर्ण नहीं है बल्कि खुद भारतीय राज्य के नियम व कानून का भी सरकार एक राज्य के बतौर भी खुला उलघंन कर रही हैं। भारत में एनकाउटंर एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ सामान्य शब्दकोष में पाये जाने वाले अर्थ से भिन्न है। भारत में इस विशिष्ट शब्दावली का अर्थ सरकार के कारिन्दों द्वारा कपटपूर्ण तरीके से महत्वपूर्ण अवांछनीय राजनीतिक हस्ती की हत्या है। आजाद की हत्या सरकार द्वारा युद्ध विराम के लिए वार्ता करने के राजनीतिक आश्वासन के झांसे में की गई। हाल ही में  किशन जी का भी ‘‘एनकाउटंर’’ किया गया।
    हालांकि इन सारी बातों के साथ इस घिनौने युद्ध में भी कोई अनोखी बात नहीं है। जनता के खिलाफ इस युद्ध के पीछे आम आर्थिक कारण ही हैं। लालच और मुनाफा। यह एक ऐसा सच् है जो भारत सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों में भी दर्ज है। आप इसे यहां देख सकते हैं: ‘‘कमेटी आॅन स्टेट एग्रेरियन रिलेशंस एण्ड अनफिनिश्ड टास्क आॅफ लैंड रिफार्म’’, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, भाग1 (ड्राफ्ट रिपोर्ट, मार्च 2009), निष्कर्ष -‘‘कोलबंस के बाद आदिवासी जमीनों की सबसे बड़ी लूट’’।
     जैसा कि मैंने कहा कि भारत में इस युद्ध को लोग अच्छी तरह जान रहे हैं। लेकिन विदेशों में, हमारे देश में, जिसे भारत में जाना जा रहा है और रिपोर्ट किया जा रहा है, को गैरजानकारी में रखा जा रहा है; या कुछ दबे-दबाये और चंद बातों से ही वे कुछ जान पा रहे हैं। इसका एक बहुत सामान्य सा कारण है। आधिकारिक मीडिया या तो बड़ी नीजी आर्थिक हितों के हाथों में हैं जो भारत के संसाधनों के लूट के लोभ-लालच में जुटी हुई हैं या वे सरकार के हाथों में हैं जिसका अपना साम्राज्यवादी हित है और जो भारत की वास्तविकता को आम बहस में लाने की खिलाफत में है।
यह अपने समय की एक आम बात है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के किसी भी अध्ययन में गुजरी शताब्दी में यह दिखता ही है कि मीडिया छोटे से छोटे सवाल पर भी बमुश्किल ही आजाद रही है। और जब यह युद्ध, दूसरे देशों पर कब्जा या साम्राज्यवाद जैसे बड़े और निर्णायक सवालों का हो तब तो मीडिया ताकतवरों का मुंह और मंच बन जाता है जहां युद्ध को भड़काया जाता है और लूट-शोषण का पक्ष लिया जाता है।
     कुछ पत्रकार और लेखक तो रहे ही हैं और आज भी इस दिशा में प्रयास करते हुए काम करने वाले हैं ही जो सही सूचनाओं को हासिल कर बड़ी मीडिया के माध्यम से फैलाने में सफलता हासिल कर रहे हैं। हम इससे परिचित हैं। लेकिन मालिकों का हित साधने वाले संपादकीय दरबान सतर्क हैं। ईमानदार रिपोर्टर चंद लोग रहे हैं और आज भी कम ही हैं और जब भी हालात कठिन बनते हैं उनका मुंह बंद कर दिया जाता है। आप एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय अमेरीकी लेखक एडगर स्नो को याद करिये। उन्हें शीत युद्ध के समय काॅमिक्स का अनुवाद कर के जीविका चलानी पड़ी। उन्हें अमेरीका की बड़ी मीडिया ने चिन्हित कर किनारे फेंक दिया था क्योंकि वे अच्छी तरह बातों से वाकिफ और विद्वान थे।
     भारत में युद्ध के बारे में जानकारी है। शासक वर्ग का जनता के खिलाफ चलाए जा रहे इस युद्ध पर आ रहे कुछ विमर्श और रिपोर्ट में अपना हित है। लेकिन भारत से बाहर एक आम सन्नाटा है। इसका कारण भारत सरकार द्वारा भारत के चारों ओर खड़ा किया गया प्रतिबंधन घेरा नहीं है। इसकी तो तब तक जरूरत नहीं है जब तक कि साम्राज्यवादी देशों की आधिकारिक मीडिया के दरबान यह काम कर रहे हैं।
    मैं उन लोगों को नहीं जानता जो भारत से रिपोर्टिग कर रहे हैं। जब वे लोग धरोहरों और लोक कला और भारत के आर्थिक व वैज्ञानिक विस्तार के बारे में बताते हैं, बहुधा दिलचस्प होता है। मैं जितना जानता हूं उनके रिपोर्ट का यह सबसे अच्छा हिस्सा है। मेरा भरोसा है कि वे सभी सम्मानित लोग हैं। हां, वे सम्मानित लोग हैं। लेकिन हम देख सकते हैं कि वे रिपोर्टर ही अपने देश -साम्राज्यवादी देशों, के लोगों को भारत की जनता मसलन, आदिवासी और दलितों के वास्तविक हालात के बारे में रिपोर्ट नहीं करते हैं। हो सकता है कि इसमें रिपोर्टरों की दिलचस्पी न बनती हो। लेकिन मेरा मानना है कि इसके पीछे गृहदेश में बैठे संपादकों द्वारा इसकी अनुमति न देना है।
    इन्हीं कारणों से भारत की जनता के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन इंटरनेट और स्वतंत्र पत्रिकाओं और अखबारों -जो सरकारों द्वारा या एकाधिकारी पूंजी द्वारा समर्थित न हो, के माध्यम से सूचनाओं को विस्तारित करना मुख्य मुद्दा मानता है। अमेरीका और दूसरी सरकारें इंटरनेट की सापेक्षिक आजादी को छीनने का प्रयास कर रही हैं। फिर भी हम अपने लोगों के बीच सूचना विस्तारित करने के माध्यम की तरह इसका प्रयोग कर सकते हैं।
    इसमें आप सभी का सहयोग चाहिए। हमें और आपको भी आधिकारिक रिपोर्टरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इस सबके बावजूद भी कि वे कुछ अलग करना चाहते हैं और ईमानदारी से रिपोर्ट करते है, वे वैसा ही गाने के लिए नौकरी पर रखे गए है जिन गानों के लिए उन्हें तनख्वाह दी जाती है। यदि वे ईमानदार हैं और इतने मजबूत हैं कि दरबानों पर पार पा जाते हैं: यह अच्छा है! यदि नहीं, तो जरूरी है कि हम दूसरे रास्तों का प्रयोग करें।
     मेरी एक राजनीतिक धारणा है। स्वीडिश सरकार को यदि मुझे लताड़ने के लिए कोई बहुत कड़ा शब्द नहीं मिलता है तो मुझे पुर्वाग्रही कह सकती है। मैं एकजुटता आंदोलन का हिस्सा भी हूं। हालांकि भारतीय जनता के समर्थन में बना अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता आंदोलन एक ही जैसे लोगों का नहीं है। यह एकहद तक  बहुविध और विस्तारित आंदोलन है। यही इसकी ताकत है। यह कोई पार्टी नहीं है। इसके भागीदार धार्मिक या सामाजिक सवालों पर एकमत नहीं हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि सभी लोगों की वैसी ही साम्राज्यवाद पर या भारतीय राज्य के चरित्र की एक ही व्याख्या हो जैसा कि मेरी समझ है। लेकिन वे सभी भारत की जनता के समर्थन की जरूरत के विशिष्ट मुद्दे पर एकराय हैं।
इस बात को याद रखना महत्वपूर्ण है। भारत की जनता के साथ खड़े एकजुटता आंदोलन का आधार बहुत  व्यापक होना चाहिए। आप कह सकते हैं कि पिछली शताब्दी में युद्ध, साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक दमन के खिलाफ राजनीतिक काम में गतिविधियों  के दौरान हमने गलतियां की और खुद को कमजोर साबित किया। इराक की जनता के खिलाफ अमेरीकी युद्ध के खिलाफत में हुए प्रदर्शनों -स्टाकहोम व इस्तानबुल, में मैंने हिस्सेदारी की। ये विरोध प्रदर्शन मेरे जीवन में देखे गये सबसे बड़े प्रदर्शन थे। लेकिन तब भी हमारी सरकार -और वो पार्टियां भी जो खुद को ‘‘वामपंथी’’ कहती हैं, इराक को तबाह करने को समर्थन करती रहीं।
हां, हम इतने मजबूत नहीं थे कि उन्हें ऐसा करने में बाधा बन सकें। इसके लिए हमारी आलोचना हो सकती है। लेकिन इन्हीं दशकों में हम सफल भी हुए हैं। हमने ‘‘स्टाॅकहोम अपील’’ को लेकर 1952 में सोवियत यूनियन के खिलाफ अमेरीका के नाभिकीय युद्ध करने की संभावना को रोकने का विश्व स्तरीय अभियान चलाया। अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ दक्षिण पूर्व एशिया के सशस्त्र संघर्ष कर रही जनता के पक्ष में हमने अपने देशों में जनसमर्थन निर्माण का महत्वपूर्ण काम किया। स्वीडन में सरकार ने हम लोगों के खिलाफ 20 दिसंबर 1967 को घुड़सवार पुलिस को भेजा। लेकिन हम लोगों को इतना विशाल जनसमर्थन मिला कि दो हफ्तों बाद ही ठीक वही सरकार जो हम लोगों के खिलाफ पुलिस को पीटने के लिए भेजा था, ओल्फ पा मे अमेरीकी युद्ध के खिलाफ जन प्रदर्शनों में आगे आगे चला। स्वीडन सरकार की यह नई अवस्थिति (‘‘जिसे तुम हरा नहीं सकते - उनके साथ हो जाओ!’’) एकजुटता आंदोलन का ही परिणाम था। और इससे दक्षिण पूर्व एशिया की लड़ रही जनता को काफी सहयोग मिला।
     स्वीडन भारत से काफी दूर का एक देश है। फिर भी वहां भारत की जनता के पक्ष में एकजुटता आंदोलन की लोकप्रियता बढ़ रही है। प्रदर्शन, अध्ययन समूहों, मीटीगों, पर्चा और साहित्य द्वारा उभर रहा एकजुटता आंदोलन ‘‘दूसरों’’ के लिए भाव के साथ होने वाली गतिविधियां नहीं हैं। मैंने जान डन को उद्धृत किया क्योंकि उन्होंने सचाई को व्यक्त किया है। एकजुटता आंदोलन उस समय मजबूत बनता है जब इसके भागीदार मनुष्य की इस सचाई से चेतन हो कि कोई भी इंसान खुद में द्वीप नहीं होता। भारत की जनता के अधिकारों की रक्षा करना स्वीडन की जनता की रक्षा करना है!
(यह विश्वप्रसिद्ध लेखक यान मिर्डल द्वारा दुनियाभर के जनांदोलनों के समर्थन में लिखा गया भाषण है. इसे साथी अंजनी ने उपलब्ध करवाया है.)


साम्राज्यवादी साजिशों के बीच सीरिया


सीरिया आज चारों ओर से साम्राज्यवादी देशों की साजिशों से घिर चुका है और उस देश के जनता आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जिसके एक ओर खाई है तो दूसरी ओर खंदक है। सीरिया के बारे में साम्राज्यवादियों द्वारा बोले जा रहे झूठों के खिलाफ ढेरों सबूत सामने आ चुके हैं। फिर भी वह निहायत ही बेहयाई से सीरिया में भी उसी खेल को दुहराने की साजिश रच रहा है जिसे उसने कुछ ही दिनों पहले लीबिया में खेला था। और अरब लीग के झण्डे तले इकठ्ठा इलाके कें तमाम प्रतिक्रियावादी शासक उसे इस काम में मदद कर रहे हैं और उसके 'अग्रिम चौकी' का काम कर रहे है। रूस और चीन के वीटो से इन साजिशों में एक आंशिक विराम ही आया है। इन साम्राज्यवादी चालबाजियों को समझ कर, ऐसा लगता है, सीरियाई जनता भी उस बशर अल-असद के शासन के पीछे लामबन्द हो गयी है, जिसका कुछ दिन पहले तक वह विरोध कर रही थी। और इस तरह से, ऐसा लगता है कि विद्रोहियों की ताकत कमजोर हुई है।
   साम्राज्यवादी एक और देश को तबाह करने की जी-तोड़ कोशिश में लगे हुए हैं। इसमें भारत के शासक भी अपना भरपूर योगदान कर रहे हैं। बेशक वे ऐसा किसी दुर्भावना के कारण नहीं बल्कि अपने क्षुद्र हितों की पूर्ति के लिए कर रहे हैं। यह देश है सीरिया। अरब दुनिया के अन्य देशों की ही तरह इस देश में भी 2011 की शुरुआत में विद्रोह-विरोध प्रदर्शन की लहर उठी थी। लेकिन अन्य देशों की तरह यहाँ भी विद्रोह का इस्तेमाल कर अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए साम्राज्यवादी तुरन्त सक्रिय हो गये। नतीजतन, आज जहाँ एक ओर, सीरिया मजदूर-मेहनतकश जनता के विद्रोह और तानाशाह राष्ट्रपति बशीर असद द्वारा इसके कठोर दमन के दरपेश है, वहीं दूसरी ओर, एक उससे भी बड़े खतरे, साम्राज्यवादी दखलन्दाजी की सम्भावना के रूबरू है क्योकि दुनिया की तमाम साम्राज्यवादी शक्तियाँ और उनके तमाम स्थानीय प्रतिक्रियावादी गुर्गे जनविद्रोह की आग में अपनी अपनी रोटियाँ सेंकने के लिए सक्रिय हो गए हैं और  भाँति-भाँति के षड्यन्त्रों में मशगूल हैं।
   सीरिया में आज साम्राज्यवादियों का बहुत कुछ दाँव पर लगा है। सीरिया लम्बे समय से सोवियत (और बाद में रूसी) साम्राज्यवादियों के करीब रहा है। यहाँ रूसी नौसेना का एक बेड़ा तथा सैनिक अड्डा भी है। सीरिया में असद के पतन और किसी पश्चिमी साम्राज्यवाद परस्त सरकार के गठन से यह सब खतरे में पड़ जायेगा।
दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादियों, खासकर अमेरिकी-ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए असद के पतन से सम्भावनाओं के अनेक द्वार खुल जायेंगे। पहला तो यही कि इससे यहाँ रूसी प्रभाव का खात्मा हो जायेगा। दूसरे इससे पूरे पश्चिम एशिया में नये समीकरण बनाने में बहुत मदद मिलेगी। सीरिया का वर्तमान शासन लेबनान के हिजबुल्ला और फिलीस्तीन के हमास का समर्थन करता है। यहाँ भारी मात्रा मे फिलीस्तीनी शरण लिए हुए हैं। असद के पतन से इनकी स्थिति कमजोर होगी और क्षेत्रीय सन्तुलन में  इजराइल का  पलड़ा और भारी हो जायेगा। इससे राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण इस इलाके में अमेरिकी-ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए परिस्थितियाँ और अधिक अनुकूल हो जाएँगी। यही नहीं, आज सीरिया का ईरान के साथ गठबंधन है और सद्दाम हुसैन के पतन के बाद  ईरान इस क्षेत्र में और अधिक मजबूत ताकत बन कर उभरा है। इराक के आन्तरिक घटनाक्रमों को प्रभावित करने में उसका हाथ जगजाहिर है तथा वहाँ की हालात को पश्चिमी साम्राज्यवादियों के मन-माफिक न बनने देने का पूरा प्रयास कर रहा है। असद के सत्ताच्युत होने के बाद अमेरिका के लिए ईरान को काबू करना ज्यादा आसान हो जायेगा, अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद जिसमें अभी तक वह सफल नहीं हो पाया है।
   इन सब कारणों से सीरिया में विद्रोह की शुरुआत होते ही साम्राज्यवादी सक्रिय हो गये। उन्होंने खाड़ी देशों के अपने पिट्ठुओं के माध्यम से वहाँ हथियार और लड़ाके भेजने शुरु कर दिये। इसमें सऊदी अरब व कतर के धुर प्रतिक्रियावादी शेखों ने प्रमुख भूमिका निभायी। इसमें उन्होंने मुस्मिल ब्रदरहुड को अपने एजेण्ट की तरह इस्तेमाल किया। इसी के साथ उन्होंने सीरिया में सम्प्रदायगत बँटवारे का इस्तेमाल कर वैमनस्य को भड़काने का प्रयास किया। उन्होंने खुले तौर पर एक धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक साम्प्रदायिक उन्माद फैलाया।
   अभी तक सीरिया के सहयोगी रहे तुर्की के शासकों ने भी कुछ समय बाद पैंतरा बदल लिया और बाकियों से बढ़-चढ़कर सीरिया में बलात सत्ता परिवर्तन करवाने की इस मुहिम में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। तुर्की के शासकों केा अब पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव फैलाने की सम्भावना नजर आने लगी थी। सीरिया से लगा तुर्की का इलाका तथाकथित 'फ्री सीरियन आर्मी' तथा अन्य हथियारबन्द लड़ाकों का आधार क्षेत्र बन गया और यहाँ  न केवल तुर्की बल्कि पश्चिम साम्राज्यवादी भी लड़ाकों को प्रशिक्षित करने लगे।
इसके बाद पश्चिमी साम्राज्यवादी और इनके ये पिट्ठू सीरिया के भीतर अपने गुर्गों से कहने लगे कि वे असद के दमन के खिलाफ 'अन्तरराष्ट्रीय समुदाय’ (यानी साम्राज्यवादियों) द्वारा ‘नो फ्लाई जोन’ की माँग करें, बावजूद इसके कि अभी तक असद ने दमन के लिए हवाई जहाजों का इस्तेमाल नहीं किया था। लीबिया के उदाहरण के बाद, पहले तो इन गुर्गों की हिम्मत नहीं पड़ी, पर बाद में वे दबी जुबान से सीरिया में बाहरी हस्तक्षेप की माँग करने लगे। साम्राज्यवादी और उनके पिट्ठू अब इन्हीं गुर्गों की बातों का हवाला देकर वहाँ हस्तक्षेप करने की हरसम्भव कोशिश कर रहे हैं।
   सीरिया में इस समय तीन तरह की ताकतें सक्रिय हैं। एक तरफ असद शासन और दूसरी तरफ उनके विरोधी है। साम्राज्यवादी दखलन्दाजी ने, दरअसल, असद शासन के वास्तविक विरोध को कमजोर किया है और विरोधियों को दो हिस्सों में बाँट दिया है। एक ओर वास्तविक विद्रोही हैं, जो देश में किसी भी विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ हैं जबकि  दूसरी ओर हैं साम्राज्यवादियों द्वारा ख़रीदे या भ्रष्ट बनाये गए उनके गुर्गे या उनसे तालमेल बैठाने वाले लोग हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड इसी दूसरी श्रेणी में हैं। पश्चिमी साम्राज्यवादी इन्हीं दूसरी तरह के लोगों का इस्तेमाल कर न केवल असद शासन को उखाड़ फेंकना चाहते हैं बल्कि असली विद्रोहियों को भी कुचल कर अपने गुर्गों का शासन स्थापित करना चाहते हैं। लीबिया में वे पहले ही ऐसा कर चुके हैं। लेकिन लीबिया के उदाहरण के चलते ही उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं हो रहा है। लीबिया मे इन्होंने झूठ और बेहयाई का सहारा लेते हुए गद्दाफी शासन को उखाड़ फेंका और गद्दाफी की हत्या कर वहाँ अपने गुर्गों को शासन में बैठा दिया। रूसी साम्राज्यवादी और चीनी शासक देखते रह गये और सौदेबाजी में तय अपना हिस्सा न पाकर उन्होंने छला हुआ महसूस किया।
   अब ये दोनों दोबारा उसी स्थिति में पड़ने को तैयार नहीं हैं। वे ज्यादा कड़ी सौदेबाजी कर रहे हैं। सीरिया पर सुरक्षा परिषद के जिस प्रस्ताव के खिलाफ उन्होंने वीटो किया वह, दरअसल, असद शासन की समाप्ति और किसी पश्चिमी साम्राज्यवाद परस्त शासन के गठन का प्रस्ताव था। ऐसा कोई भी बदलाव रूस और चीन के हितों के खिलाफ है। उन्होंने अबकी बार अधिक सक्रिय हसक्षेप करने की ठान ली है। ऐसा नहीं है कि रूसी साम्राज्यवादी और चीनी शासक हमेशा ऐसे ही पश्चिमी साम्राज्यवादियों का विरोध करते रहेंगे। वे पर्दे के पीछे लगातार सौदेबाजी में लगे हुए हैं। सौदा पट जाने पर वे पलटी भी खा सकते हैं।
भारत के पतित पूँजीवादी शासकों ने तो इस प्रस्ताव में मतदान के समय यह पलटी मार भी दी। भारत का सीरिया के असद शासन से चार दशक का सम्बन्ध है, जिसके मद्देनजर अभी हाल तक भारतीय शासक वहाँ बाहरी हस्तक्षेप के द्वारा सत्ता परिवर्तन का विरोध करते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने अपने इस रवैये को त्याग कर, न केवल, सीरिया में सत्ता परिवर्तन वाले प्रस्ताव के पक्ष में मतदान कर दिया, बल्कि रुस और चीन द्वारा प्रस्ताव को वीटो किये जाने की निन्दा भी की।
  भारत के पतित शासकों का यह व्यवहार अन्य चीजों के साथ-साथ, उनके अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ तथाकथित रणनीतिक संश्रय का नतीजा भी है। इसी के चलते, उन्होंने लीबिया पर हमले वाले प्रस्ताव पर मतदान न देकर उनका साथ दिया था और अब सीरिया में सत्ता परिवर्तन के मामले में खुलकर उनके साथ हो गये हैं। ये पतित शासक यह भूल जाते हैं कि विदेशी हस्तक्षेप के इस तर्क को यदि स्वीकार कर लिया जाय तो इनके द्वारा कश्मीर, उत्तर पूर्व भारत तथा मध्य भारत में किये जाने वाले दमन के कारण भारत में बाहरी हस्तक्षेप करने को उतना ही जायज ठहराया जा है। सीरिया की विद्रोही जनता के लिए यह विकट समय है। उसे अपने तानाशाह असद से भी निपटना और दूसरी ओर साम्राज्यवादियों और पिट्ठुओं और गुर्गों से भी। लीबिया का कटु उदाहरण उनके सामने है। यह उदाहरण उन्हें हमेशा इस बात के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ बनाता रहेगा कि बाहरी हस्तक्षेप के किसी भी रूप को दृढता से ठुकरा दें।
(nagrik.com पर प्रकाशित लेख में किंचित परिवर्तनों के साथ रेड ट्यूलिप पर प्रकाशित)

यूनान : नव उदारवादी सामाजिक इंजीनियरिंग की चरम प्रयोगशाला

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      यूनान फिर उबाल पर है। यूनानी संसद नें यूरोपीय संघयूरोपीय केंद्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की खूंखार तिकड़ी द्वारा दिए जाने वाले 170 अरब अमेरिकी डॉलर (यानी 130 अरब यूरो) के बेलआउट कोष के बदले 15,000 सरकारी नौकरियों में कटौती करने और न्यूनतम मजदूरी को 22 प्रतिशत घटाने की संस्तुति कर दी है। यूनान के वित्त मन्त्री एवांगेलोस वेनिज़ेलोस ने फ़रमाया है कि "हमें यह जरूर दिखाना चाहिए कि यूनानियों से जब ख़राब और निकृष्टतम के बीच चुनाव करने को कहा गया तो उन्होंने निकृष्टतम से बचने के लिए ख़राब का चुनाव किया।" और निकृष्ट का चुनाव कर लिया गया है भले ही छह मन्त्रियों ने इस्तीफ़ा दे दिया हो। 
      इसकी प्रतिक्रिया में एथेन्स में जो कुछ हुआ या हो रहा है उसकी जानकारी अधिकतर लोगों को मिल चुकी होगी। रविवार को एथेन्स के सडकों पर 80,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने मार्च कियाजिनमें मजदूर-कर्मचारी और छात्र-युवा सभी शामिल थे और उन्होंने पुलिस के घोर दमनकारी रवैये का बहादुरी के साथ मुकाबला किया। पुलिस के उकसावे के बीच भीड़ के एक हिस्से ने दुकानों को लूटा और जम कर तबाही मचायी। 34 इमारतों को आग के हवाले किया गया जिसमें एक अमेरिकी काफी कम्पनी स्टारबक्स का भवन और एक ऐसा भूमिगत छवि गृह शामिल था जिसे कभी गेस्टापो ने अपने यातना गृह के तौर पर इस्तेमाल किया था। एक वृद्ध महिला का कहना था, " यह चालीस के दशक के भी बुरा है...इस समय तो सरकार ही जर्मनों का आदेश मन रही है।"
        ऐसा लगता है कि यूनान नव उदारवादी सामाजिक इंजीनियरिंग की एक चरम प्रयोगशाला में तब्दील हो गया है। यूरोपीय संघयूरोपीय केंद्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बदनाम तिकड़ी द्वारा बेलआउट पैकेज के माध्यम से यूनान पर जो शर्तें थोपी जा रही हैंवे सामूहिक सामाजिक अधिकारों में से वहाँ जो कुछ भी थोडा बहुत बच रहा है उन्हें पूरी तरह तबाह कर देने तथा वेतन और कार्यस्थल के सहूलियतों को 1960 के दशक तक वापस ले जाने की भयानक कोशिश है। यह एक ऐसी कोशिश है जिसे पूरे यूरोप के पैमाने पर लागू किये जाने के पहले यूनान में अजमाया जा रहा है।
        रविवार की देर शाम को यूनानी संसद द्वारा इस मितव्ययिता कार्यक्रम को पारित किये जाने के बावजूद कल होने वाले यूरो ज़ोन के वित्त मन्त्रियों की बैठक में यूनान से और कटौतियाँ करने की मांग की जाएगी। इसके अलावा बेलआउट के करार पर हस्ताक्षर किये जाने से पूर्व यूनान के राजनितिक नेताओं से करार की शर्तों को लागू किये जाने के गारण्टी देने की भी मांग की जाएगी।  इसके बावजूद न तो इस बात के कोई गारण्टी ही है कि बेलआउट की यह धनराशि वाकई यूनान को हासिल होगी (क्योकि इसे एक निलम्ब खाते यानी एस्क्रो अकाउंट में डाले जाने की चर्चा है) और न तो इस बात की ही कोई उम्मीद है कि वह पहले से लदे कर्ज के बोझ को चुका कर मौजूदा संकट से निकल पायेगा। 
      स्थिति ऐसी बन गयी है कि कटौती और मितव्ययिता की एक खेप पर सहमति बनने के साथ हीउसके अमल में आने के पहले ही तिकड़ी के अधिकारी कटौती के नए माँग पत्र्रक के साथ तैयार रहते हैं। ऐसा लगता है चार वर्षों की मन्दी और तीन वर्षों की मितव्ययिता की मार ने यूनान को एक सामाजिक क्रान्ति के मुहाने पर ला दिया है। यूरोपीय अधिकारीगण भी उसे लगातार उसी दिशा में धकेल रहे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यूनान ही वह देश है जो 1821 में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता अर्जित करने वाला महाद्वीप का पहला देश बना। 1940 में 'नहींकहने के माध्यम से इसी ने फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत की। सत्तर के दशक में सैनिक तानाशाही के खिलाफ इसके विद्रोह ने दक्षिण यूरोप और लातिनी अमेरिका में ऐसे ही उत्पीड़न के शिकार देशों की जनता को अनुप्राणित किया। ऐसी स्थिति में यह आश्चर्यजनक नहीं होगा अगर वह फिर से एक नए परिवर्तन का बिगुल फूंके। युद्धोत्तर पश्चिमी यूरोप की दृष्टि से यूनान की मौजूदा परिस्थिति अभूतपूर्व है। देश की पहले से ख़राब आर्थिक स्थिति बाद से बदतर होती जा रही है। ऐसे में सरकार के लिए मितव्ययिता की एक नई खुराक को जनता के गले उतरना कत्तई आसन नहीं होगाखास कर तब जब जनता पहले से सडकों पर है और आगामी शनिवार 18 फ़रवरी 2012 को उनके समर्थन में अन्तरराष्ट्रीय लामबन्दी का आह्वान किया जा रहा है।      
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'स्लेवेरी बाई अनदर नेम' : एक अमेरिकी वित्तचित्र


'स्लेवेरी बाई अनदर नेम' एक 90 मिनट का अमेरिकी वित्तचित्र है जो अमेरिका में एक बहु प्रचारित धारणा को चुनौती देता है। वह धारणा इस बात पर विश्वास है कि इस देश में दासता की प्रथा 1863 के अब्राहम लिंकन के मुक्ति की घोषणा के साथ समाप्त हो गयी थी। वाल स्ट्रीट जर्नल के वरिष्ठ लेखक डगलस . ब्लैकमन की पुलित्ज़र पुरस्कार प्राप्त पुस्तक पर आधारित यह वित्तचित्र मुक्ति के बाद के युग की उस कहानी की परतें उधेड़ती हैं, जिसकी बहुत कम लोगों को जानकारी है, जब अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में श्रम सम्बन्धी तौर तरीकों और कानूनों ने वस्तुतः एक नये किस्म की गुलामी को जन्म दिया जो बीसवीं शताब्दी तक जारी रही। यह   वित्तचित्र ट्विन सिटीज़ पब्लिक टेलीविजन द्वारा तैयार की गई है और उसे विगत सोमवार 13 फ़रवरी को अमेरिका के अधिकांश शहरों में प्रदर्शित किया गया। जो साथी अपेक्षाकृत तेज इंटरनेट कनेक्शन पर हैं वे इसे इस डिस्पैच के अन्त में दिए गए लिंक को क्लिक कर के देख सकते हैं। यह  फिल्म विस्तार से दक्षिणी अमेरिका में वास्तविक दासता की पुनर्स्थापना का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करती है जो बीसवीं शताब्दी में परवान चढ़ी और पर्ल हार्बर की घटना तक अमेरिका के न्याय विभाग के वरदहस्त से बदस्तूर जारी रही। अफ्रीकी-अमेरिकी परिवारों के लिए इसका परिणाम भयावह था और यह एक किस्म के न्यायिक, राजनीतिक और आर्थिक आतंकवाद का पर्याय था और इसकी गूँज अभी भी अमेरिकी राजनीति में सुनायी देती है। यह फिल्म उन सैकड़ो हजार अफ्रीकी-अमेरिकी परिवारों में से कुछ की कहानियों पर खुद को केन्द्रित करता है जिन्हें 'बन्दी उधार प्रणाली' में घसीट लिया गया और कोयला खानों  और कृषि में लगाया गया जो इनके लिए मौत के परवाने की तरह होता था लेकिन उन निगमों के लिए जो उन्हें इस्तेमाल करती थीं, भरी मुनाफे का सौदा होता था।  'बन्दी उधार प्रणालीका दक्षिणी अमेरिका के इतिहास के एक सबसे महत्वपूर्ण हड़ताल को समाप्त करने के लिए किया गया जब 'यूएमडब्लूए' ने बिर्मिन्घम के कोयला खानों में इस प्रणाली को ख़त्म करने की कोशिश की। इस हड़ताल का अभूतपूर्व निर्ममता से दमन किया गया।  
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Red Tulips

Thursday, February 2, 2012

उद्योगों की उपेक्षा अमरीका का आत्मघाती कदम, भारत यह भूल न करे

  डा. बनवारी लाल शर्मा
 दुनिया को विकास का पाठ पढ़ाने वाले विकसित देश -अमरीका और यूरोपीय संघ आज दुनिया को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे हैं। बात पुरानी नहीं है, कोई 30 साल पहले 1980 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन की आयरन लेडी प्रधानमंत्री मारगरेट थैचर ने शिकागो स्कूल के अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन के साथ दुनिया को विकास का मंत्र दिया था जिसे वाशिंगटन आमराय (वाशिंगटन कान्सेन्सस) कहा गया।  इसके तहत दुनिया को विकास की सीढ़ी पर चढ़ने के लिए उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और निजीकरण का रास्ता बताया गया। विश्व बैंक और मुद्राकोष के कर्ज के चाबुक से फिर बाद में विश्व व्यापार संगठन-डब्लूटीओ के ताकतवर कोड़े से ना-नुकर करते देशों को इस रास्ते पर धकेला गया। दुनिया भर के देशों के बाजार खोल दिये गये इन धनी देशों के कारपोरेटों के लिए। कई सदियों तक अपने उपनिवेश स्थापित करके दुनिया को लूटने वाले इन औद्योगिक देशों को फिर से लूटने का नया मौका मिल गया, राज्य उपनिवेशवाद की जगह कारपोरेट उपनिवेशवाद कायम करके। लूट की इस नयी कारपोरेटी व्यवस्था में एक पोल रह गयी जो इस औद्योगिक देशों के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रही है। सस्ते श्रम वाले गरीब देशों के बाजार खुल जाने के बाद अमरीका और यूरोप के औद्योगिक देशों के कारपोरेटों ने अपने उद्योगों को ‘डिलोकलाज’ करना शुरू कर दिया, यानी उद्योगों का मैन्यूफैक्चरिंग भाग तीसरी दुनिया के देशों में कराना चालू कर दिया। वहाँ सस्ते श्रम और कमजोर श्रम और पर्यावरणीय कानूनों का लाभ उठाकर खूब मुनाफा कमाया। इसे अर्थशास्त्र के तुलनात्मक लाभ के सिद्धान्त से उचित ठहराया। 
नतीजा यह हुआ है कि कारपोरेटों को सस्ता श्रम मिल जाने के कारण मुनाफा तो हुआ, पर अमरीका और यूरोप के देशों के रोजगार नष्ट होते गये और डि-इण्डस्ट्रलाइजेशन (अनौद्योगीकरण) शुरु हो गया। इन कारपोरेटों ने सस्ता सामान बनवाकर उसे अपने देश (और अन्य देशों में) खपाने के लिए भारी विज्ञापन किया और आम लोगों के दिमाग में खूब लालच भरा। नतीजन, इन देशों के नागरिक उत्पादन तो कम करते हैं, पर उपभोग खूब करते हैं। इस अजीबोगरीब हालात के कुछ नमूने देखें। अमरीका में पैनसैल्वानिया राज्य में, रीडिंग नामक एक शहर है। यह मजदूरों के शहर के नाम से मशहूर था। तरह-तरह के उद्योग, खासतौर से स्टील के कारखाने यहाँ चलते थे। 86,000 की आबादी वाले इस शहर में 1993 से 2005 के बीच 20 कारखानों पर ताला पड़ गया। इन कारखानों में हरेक में 300 से लेकर 4000 मजदूर काम करते थे। अमरीका के सेंसस ब्यूरों के अनुसार, यह शहर अमरीका का सबसे गरीब शहर हो गया है, यहाँ 41.3 प्रतिशत निवासी गरीबी रेखा के नीचे हैं। हालात ये हैं कि ग्रेटर बकर््स फुड बैंक संस्था इन गरीब लोगों को मुफ्त खाद्य सामग्री बाँटती है। कपड़े, जूते, कारें जैसे सामान बनाने वाली और बड़ी संख्या में रोजगार देने वाली कम्पनियो जैसे नाइक, एडिडास, रीबाॅक आदि ने अपना 100 प्रतिशत उत्पादन कारोबार विदेशों जैसे ंबंगलादेश, हाँगकाँग, चीन,  अमरीका और यूरोप में बेरोजगारी और अर्धबेरोजगारी का कारण उद्योगों को अन्य देशों में भेजना तो है ही, एक और कारण भी है। इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं में उद्योग के स्थान पर वित्तीय और सेवा क्षेत्र ;पिदंदबम ंदक ेमतअपबम ेमबजवतेद्ध को ज्यादा बढ़ावा दिया है। वित्तीय क्षेत्र में सट्टेबाजी के कारण अस्थिरता आयी और फिर ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में बड़ी-बड़ी बैंकों और बीमा कंपनियों ने गलत नीतियाँ अपनायी जिससे 2007 से वित्तीय संकट पैदा हो गया। सर्विस सैक्टर में सूचना तकनीक ;प् ज्द्ध का ज्यादा बोलबाला है। पर इसमें विदेशों में सस्ते श्रम वाले काॅलसेंटरों में रोजगार ट्रान्सफर हो गया।
    इन धनी देशों के कारपोरेट भस्मासुर बन गये हैं। अब ये अपने ही देशों को घूल चटा रहे हैं। हालात ऐसे बन गये हैं कि कम्पनियाँ और बैंकों को तो बेल आउट देना ही पड़ रहा है, देश भी दिवालिया हो गये हैं, उन्हें भी बड़े-बड़े बेलआउट दिये जा रहे हैं। ग्रीस, पुर्तगाल, इटली, आयरलेंड के उदाहरण सामने हैं। सबसे बड़ा नुकसान हुआ है रोजगारों का। भयंकर बेरोजगारी इन दुनिया के चैधरी कहलाने वाले देशों में फैल रही है। अमरीका में 9-10 प्रतिशत है, यूरोप में तो 20 प्रतिशत के आस पास है। काफी समय तक इसे बर्दाश्त करने के बाद लोगों का धीरज अब टूट गया है और लोग अमरीका और यूरोप में सड़क पर उतर आये हैं। आॅक्यूपाई वाल स्ट्रीट आदि आन्दोलन इसी के नतीजे हैं। यों तो भारत सरकार अमरीका को अपना आदर्श मानती है पर उससे सबक नही ले रही है। भारत भी वही गलती कर रहा है जो अमरीका ने की है। भारत में भी उद्योगों का विनाश हो रहा है। देशी-विदेशी बड़े कारपोरेटों के हाथ में अर्थव्यवस्था थमाने से छोटे-मझोले उद्योग खत्म हो चले हैं। मैन्यूफैक्चरिंग के बड़े उद्योगों का विकास गिर रहा है। जहाँ औद्योगिक विकास दर 12-13 प्रतिशत थी, वह इस समय 2-3 प्रतिशत पर आ गयी है। विदेशों, खासतौर से चीन के बने सामानों ने भारत के बाजार पाट दिये हैं। कौन सा सामान बचा है जो चीन से न आता हो? दीपावली के दिये और गणेश-लक्ष्मी भी तो चीन के बने आ रहे हैं। अमरीका की तर्ज पर भारत के कारपोरेट भी विदेशों में पूंजी निवेश करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।  यहाँ भी सरकार वित्तीय और सर्विस क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दे रही है। खेती की उपेक्षा तो हो ही रही थी, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र भी पिट रहा है। इन सबका कुल मिलाकर नतीजा यह है कि देश में बेरोजगारी आसमान छू रही है। उस पर महँगाई ने आग में घी डालने का काम किया है। खुदरा बाजार में विदेशी पूंजी निवेश 51 प्रतिशत करके बेरोजगारी को और बढ़ाने का काम होगा और परिस्थिति विस्फोटक हो सकती है।  इस देश को अमरीकी-यूरोपीय माॅडल को फेंक देना होगा, कृषि को अधिक लाभकारी बनाना होगा और कृषि से सम्बद्ध छोटे मझोले उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, तभी देश की बेरोजगारी दूर होगी और देश खुशहाल बनेगा।

खलबली वाला साल रहा 2011


increasing-world-populationपृथ्वी पर सात अरब की आबादी लाँघ गया वर्ष 2011 खलबली वाला रहा …
विश्व रंगमंच पर ओसामा बिन लादेन का मारा जाना शायद साल की सबसे बड़ी घटना थी। एबटाबाद में आतंक के इस सरगना को जिस तरह अमेरिकी कमांडो ने मारा, उसके घाव पाकिस्तान अभी भी सहला रहा है। यहाँ तक कि मजहब के नाम पर एक पृथक राष्ट्र बने हमारे ही देश के इस पुराने हिस्से के अस्तित्व पर खतरे के बादल मँडराने लगे हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि एक बार फिर वहाँ लोकतंत्र के स्थान पर तानाशाही आ जाये। हालाँकि यह मानना बेवकूफी है कि ओसामा के मरने से आतंकवाद समूल नष्ट हो जायेगा। आतंकवाद का उत्स तो अमेरिका में है और वहाँ बदलाव आये बगैर कुछ नहीं हो सकता। पिछले चार महीनों से ‘हम 99 प्रतिशत हैं’ के नारे के साथ अमेरिका में चल रहे ‘ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट’ आन्दोलनने यह दिखलाया है कि उस समाज में भी बेचैनी बढ़ रही है। सामान्य अमरीकी महसूस करने लगा है कि पूँजीवाद का मौजूदा स्वरूप उसकी बदहाली बढ़ा रहा है। लेकिन अभी तक इस अराजक आन्दोलन में खिलंदड़ापन ही ज्यादा दिखाई दे रहा है। बसन्त में ट्यूनीशिया और मिस्र में हुए सत्तापलट, जिससे प्रेरित होकर यह आन्दोलन शुरू हुआ है, जैसा संकल्प इसके पीछे नहीं दिखाई दे रहा है। हालाँकि ट्यूनीशिया और मिस्र की जन क्रांतियों ने भी नेपाल की तरह निराश ही किया। नेपाल में ‘जैसे थे’ वाले हालात लौटने लगे हैं और ट्यूनीशिया तथा मिस्र में कट्टरपंथी पकड़ बनाते दिखाई दे रहे हैं। लीबिया में भी मुअम्मर गद्दाफी, जो अपनी जनता के लिये कम, मगर दुनिया भर के आततायी तानाशाहों के सरपरस्त अमेरिका के लिये ज्यादा खतरनाक थे, के बाद कट्टरपंथी ही आते दिखाई दे रहे हैं। क्रांतियाँ तो हों, लेकिन उसके बाद जनता की वह ऊर्जा निरुद्देश्य बह जाये, इससे ज्यादा हताशापूर्ण और कुछ नहीं हो सकता। अपने देश में अण्णा हजारे के आन्दोलन में भी कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति आने लगी है। मगर अण्णा हजारे पर चर्चा करें, इससे पूर्व इस वर्ष जापान में आये भूकम्प के बाद फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर में हुई तबाही का जिक्र करना जरूरी है।
इस दुर्घटना के बाद जापान ने अपना परमाणु कार्यक्रम समेटने का इरादा बनाया है। अनेक देश पहले ही लाखों वर्ष तक खत्म न होने वाले परमाणु कचरे के खतरे देख कर इस तकनीकी से किनारा कर चुके हैं। मगर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गुलाम भारत की सरकार इतनी बेहयायी पर उतर आई है कि फुकुशिमा के बाद भी उसने चेरिनोबिल दुर्घटना के ठीक 25 वर्ष पूरे होने के दिन महाराष्ट्र में लग रहे जैतापुर परमाणु बिजलीघर को हरी झंडी दी। इससे भी ज्यादा ताज्जुब तो तब हुआ जब तमिलनाडु के कुडनकुलम में निर्माणाधीन परमाणु बिजलीघर के जबर्दस्त जन विरोध को मटियामेट करने के अपने प्रयास में केन्द्र सरकार पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को अपने पक्ष में ले आयी। भारतीय मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में नायक का दर्जा रखने वाले कलाम साहब ने ‘नदी जोड़’ प्रस्ताव के बाद इस प्रकरण में दूसरी बार अपना दिमागी दिवालियापन उजागर किया।
अपने देश में इस साल संसदीय लोकतंत्र की चूलें हिला देने वाले अण्णा हजारे के लोकपाल आन्दोलन को इसी आलोक में देखा जाना चाहिये। कॉमनवेल्थ घोटाले और नीरा राडिया टेपों के बाद जब 4,000 करोड़ रुपये का टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानी आदमी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। ऐसे में अवतरित हुए किशन बापट बाबूराव हजारे उर्फ अण्णा साहब। अब तक मूलतः महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव रालेगण सिद्धि में ही सक्रिय रहे इस 74 वर्षीय समाजसेवी ने एनजीओ के एक बेहद कुशल समूह की मदद से देश की जनता को यह विश्वास दिला दिया कि यदि उनके द्वारा सुझाया गया लोकपाल बिल पारित हो गया तो देश में भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा। उधर बाबा रामदेव भी कह रहे थे कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस ले आया जाये तो देश की समस्याओं का समाधान हो जायेगा। लेकिन महज दस वर्षों में रहस्यपूर्ण ढंग से सामान्य संन्यासी से कॉरपोरेट बन गये योगगुरु रामदेव बेहद ईमानदार और हठी अण्णा हजारे जितनी लोकप्रियता हासिल नहीं कर सके और दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकारी दमन के बीच औरतों के कपड़े पहन कर भागने से अपनी विश्वसनीयता गँवा बैठे।
i-am-Annaबहरहाल गले-गले तक काले धन में डूबे भ्रष्ट मीडिया ने भी अत्यन्त आश्चर्यजनक रूप से अण्णा हजारे के अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। तिरंगा लहराना और वंदे मातरम् के नारे लगाना तथा मैं ‘अण्णा हजारे हूँ’ लिखी टोपी पहनना रोजमर्रा की जिन्दगी में घूस खाने वाले व्यक्ति के लिये भी देशभक्ति का प्रमाण बन गया। अप्रेल, अगस्त और अभी दिसम्बर प्रथम सप्ताह में किये गये अण्णा के उपवासों ने संसद को तक हिला दिया। दिसम्बर में तो उन्होंने सड़क पर ही संसद लगा कर साबित कर दिया कि संविधान में ‘हम भारत के लोग’ का उद्घोष करने वाली जनता ही लोकतंत्र में सर्वोच्च है। लेकिन कुटिल राजनीतिज्ञों ने साल खत्म होते-होते अण्णा के आन्दोलन की धार कुन्द करने में कुछ हद तक सफलता पा ली। यह डर लगने लगा है कि अण्णा के आगामी उपवासों में पहली जितनी जन भागीदारी नहीं होगी।
मगर अण्णा के पास भी इस बात का जवाब नहीं है कि महज लोकपाल बन जाने से भ्रष्टाचार कैसे खत्म हो जायेगा। क्या एक खराब गाड़ी को खींच कर उठवा लेने से वह ठीक हो जाती है ? क्या एक जर्जर होते हुए मकान के बगल में नया मकान बना कर उससे पुराने मकान को कस देने से वह मजबूत हो जाता है ? भ्रष्टाचार जहाँ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के लिये भी प्राणवायु बनता दिखाई दे रहा हो, उस देश में हम ईमानदार लोकपाल क्या स्वर्गलोक से उतार कर लायेंगे ? हमारी क्षुद्र बुद्धि में तो यही आता है कि चुनावों में काले धन की दिनोंदिन बढ़ती ताकत से योग्य व्यक्ति का लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर हो जाने और विधायिकाओं में विभिन्न राजनैतिक दलों के माध्यम से आये बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दलालों और ठेकेदारों का बोलबाला हो जाने के बाद इस तरह भ्रष्टाचार का रुक पाना संभव नहीं है। लोकपाल, यदि वह अण्णा की अपेक्षाओं के अनुरूप काम करना शुरू भी कर दे, तो भी कुछ वर्षों में ही अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की तरह निष्क्रिय हो जायेगा। भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता। मगर उसे न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है। उसके लिये तरीका एक ही हो सकता है कि पिछले साठ सालों में हमने केन्द्र को लगातार मजबूत करते हुए निरंकुश बना दिया है, अब महात्मा गांधी के सपनों के अनुरूप ग्राम गणराज्य बनाने के लिये विकेन्द्रीकरण की दिशा में मुड़ें। सौभाग्य से हमारे पास 73वें तथा 74वें संविधान संशोधनों के रूप में दो मजबूत कानून हैं, जिन्हें अनेक कारणों से ईमानदारी से लागू ही नहीं किया गया। अब हम अपनी ताकत इन कानूनों को समग्रता में लागू करने में लगायें तो तमाम समस्याओं का समाधान निकल सकता है। फिलहाल खतरा यह है कि मीडिया अण्णा से ऊबने लगा है, अखबार और चैनलों में अण्णा के अभियान के लिये जगह कम हो रही है, उसी अनुपात में अण्णा के साथ लग रही भीड़ भी घट रही है। कुछ महीनों बाद यह हो सकता है कि जिस वर्ग के लिये वर्ष 2011 में क्रिकेट का विश्व कप जीतना भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, वह अण्णा का साथ पूरी तरह छोड़ दे। मगर तब भी हजारों ईमानदार लोग होंगे जो अपने कैरियर दाँव पर लगा कर, अपना सब कुछ छोड़छाड़ कर अण्णा के साथ आये हैं। जब उन्हें भी लगेगा कि लोकपाल से कुछ नहीं होगा तो वे हताशा की उस खाई में जा गिरेंगे, जहाँ से ऊपर आना मुश्किल होगा।
यहाँ उत्तराखंड में हम एक विधानसभा चुनाव में प्रविष्ट हो रहे हैं। यह तो निश्चित है कि जो चुन कर आयेंगे, वे पहले वालों से कम दुष्ट, अज्ञानी और बेईमान नहीं होंगे। लेकिन वे कौन होगे, यह जानने की उत्सुकता तो है ही।
….तो चलिये इन्तजार करें विधानसभा चुनाव के नतीजों का और वर्ष 2012 में होने वाली महत्वपूर्ण हलचलों का…