Wednesday, August 31, 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार


आनंद स्वरूप वर्मा
जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधों का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उद्धारक की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना। अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिद्धि के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए। अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/अघनिष्ठ रूप से जुड़े/बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उद्धारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है। क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उद्धारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्तारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोध की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फिल्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी। अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ, दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।
(आनंद स्वरुप वर्मा तीसरी दुनिया पत्रिका के संपादक हैं. जिन साथियों को पत्रिका की सदस्यता लेनी हो वे उनसे क्यू-63, सेक्टर-12, नोएडा के पते पर संपर्क कर सकते हैं.)

Tuesday, August 30, 2011

यूरोप- अमेरिका दलदल में

जितेंद्र

भारत के पुराणों में एक कहानी है। एक था राजा ययाति। जीवन में भरपूर सुख और ऐश भोगने के बाद जब उसका बुढ़ापा आया तो उसने वृद्ध होना नहीं चाहा। उसे लगातार सुख भोगते जाने की लालसा थी। लेकिन बुढ़ापा उसकी लालसा में बाधक बन रहा था। उसने अपनी तीनों लड़कों को बुलाया और पूछा कि कौन अपने यौवन के बदले उसका बुढ़ापा ले सकता है। दो लड़कों ने तो इंकार कर दिया लेकिन तीसरा लड़का जो संवेदनशील था, अपना यौवन ययाति को देकर खुद बूढ़ा होकर जंगल चला गया। ययाति एक बार फिर युवा बनकर हजारों साल तक जीवन का सुख लेता रहा। धन की ऐसी महिमा है कि उसकी हवस कभी खत्‍म नहीं होती है। आज की विश्‍व पूंजीवादी व्‍यवस्‍था धनी व्‍यक्तियों का ही तंत्र है जिसका यौवन खत्‍म हुए सौ साल से ज्‍़यादा का समय बीत चुका है। अब तक तो उसे इस धरती से विदा हो जाना चाहिए था। लेकिन वो दुनिया के मेहनतकश वर्ग के यौवन की कीमत पर न सिर्फ अभी तक कायम है बल्कि बहुत मजबूती के साथ कायम है। युद्ध, आतंकवाद और भुखमरी जैसी समस्‍याएं आज अगर पूरी मानवता को अभी भी रौंद रही है तो सिर्फ इसलिए कि यह धरती एक अस्‍वस्‍थ और अप्राकृतिक व्‍यवस्‍था की गिरफ्त में है। यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्‍य देशों का ताजातरीन आर्थिक संकट इसी का एक लक्षण है।
यूरोप:- यूरोप की अर्थव्‍यवस्‍थाएं पिछले छह-सात साल से लगातार आर्थिक संकट को झेल रही है। ग्रीस, पुर्तगाल, स्‍पेन, इटली और फ्रांस की जनता ने भारी तादाद में सड़कों पर उतरकर आर्थिक नीतियों का विरोध किया। यूरोप के ये देश 2008-09 की आर्थिक मंदी से अभी उबर भी नहीं पाए थे कि वे एक बार फिर मंदी के दलदल में फंस गए। मौजूदा संकट भी इतना व्‍यापक और गहरा कि यूरो मुद्रा के अस्तित्‍व पर ही सवाल खड़ा हो गया और यूरोपीय संघ की सारी चमक फीकी पड़ गई। ग्रीस लगभग दिवालिया हो चुका था, स्‍पेन और इटली भी दिवालिया होने की कगार पर है हालांकि यूरोप के केंद्रीय बैंक ने धन उपलब्‍ध कराकर समस्‍या को फिलहाल टाल तो दिया लेकिन इसके एवज में इन देशों की जनता से इसकी भारी कीमत वसूली गई थी। अब इन देशों की सरकारों को खर्च में कटौती के नाम पर उन नीतियों को लागू करना पड़ेगा जो आम जनता के जीवन को और ज्‍यादा दूभर बनाती हैं। इन नीतियों के विरोध में स्‍पेन और ग्रीस में लाखों की तादाद में जनता सड़कों पर उतर आई। ग्रीस की जनता ने अपनी संसद के सामने हजारों की संख्‍या में इकट्ठा होकर चोर-चोर के नारे भी लगाए। जनता की राय बहुत स्‍पष्‍ट है कि जिस संकट के लिए पूंजीपति और राजनेता जिम्‍मेदार हैं उसकी कीमत आम जनता से क्‍यों वसूली जाए। इस बीच ग्रीस को दिवालिया होने से बचाने के लिए कर्ज दिया जाए या नहीं यह तय करने के लिए जर्मन अधिकारी ग्रीस आए और जांच-पड़ताल की। उन्‍होंने वहां के कर्मचारियों से भी सवालात किए। ग्रीस की जनता को यह बेहद अपमानजनक और नागवार गुजरा। अतीत में ग्रीस सभ्‍यता और संस्‍कृति का केंद्र रहा है। उसने साम्राज्‍य के उत्‍थान और पतन को भी देखा है। उन्‍हें ये बर्दाश्‍त करना कठिन होता है कि यूरोप के बड़े देश और थैलीशाह पहले तो उन्‍हें भिखमंगा साबित करें, फिर उन पर कर्ज और शर्तें थोपें।
बहरहाल, इस संकट ने एकबार फिर यह साबित कर दिया कि यूरोपीय संघ का बनना और यूरो मुद्रा की जरूरत यूरोप के पूंजीपति वर्ग और खासतौर जर्मनी और फ्रांस जैसे धनी देशों की आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए थी। जबकि यूरोप की आम जनता खासतौर छोटे और कम धनी देशों को इसकी कीमत चुकानी थी।
अमेरिका:- अमेरिका भी ऐतिहासिक आर्थिक संकट के दलदल में फंस चुका है। दरअसल वह 2008-09 की भीषण आर्थिक मंदी के दौर से कभी उबर नहीं पाया। मंदी से उबरने की झूठी घोषणाएं होती रहीं जबकि उसकी आर्थिक विकास दर एक से डेढ़ प्रतिशत से अधिक कभी नहीं हो पाया। लेकिन कर्ज के संकट को हल करने के लिए 1 अगस्‍त के दिन सरकार और विपक्ष ने मिलकर जो समझौता किया उससे अमेरिकी समाज का संकट अधिक तीखा हो जाएगा इसमें और कोई संदेह नहीं रह गया है। इस समझौते की वजह से अमेरिकी सरकार को अगले दस साल के दौरान अपने खर्चों में 2.4 खरब डॉलर की कटौती करनी पड़ेगी। जाहिरा तौर पर ये कटौतियां आम जनता के लिए होने वाले सामाजिक सुरक्षा और मेडिकल खर्चों में ही की जाएगी। हालांकि कर्ज के संकट का समाधान अमीरों पर टैक्‍स लगाकर भी किया जा सकता था क्‍योंकि अमेरिका की कुल आमदनी का 83 प्रतिशत हिस्‍सा मात्र 20 प्रतिशत लोगों की जेब में जाता है। लेकिन सरकार और विपक्ष ने उस विकल्‍प को नहीं चुना। ऐसी आर्थिक नीतियों का मतलब बहुत साफ है कि मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को 1) टैक्‍स छूट के रास्‍ते अमीरजादों तक पहुंचाना तथा 2) तीसरी दुनिया के देशों पर कब्‍जा जमाने और दुनिया में चौधराहट कायम रखने के लिए सैन्‍य खर्च की भरपाई करना। पिछले तीस सालों के दौरान अमेरिका में इस नीति को बार-बार अपनाया गया है लेकिन वर्ष 2000 से तो लगातार यही नीति लागू हो रही है। अभी चार साल पहले अमेरिकी जनता ने देखा कि किस तरह वहां की सरकार ने उन्‍हीं वित्तीय संस्‍थानों और बैंकों को सैकड़ों-अरबों डॉलर की मदद की जिनकी बेइंतहा मुनाफाखोरी ने आर्थिक मंदी को जन्‍म दिया था। जबकि पूरी दुनिया में उन पर नकेल कसने की आवाज उठी थी। जनता ने यह भी देखा बल्कि आज भी देख रही है कि किस तरह अमेरिका पूरी दुनिया पर अपना सैन्‍य प्रभुत्‍व कायम रखने के लिए इराक, अफगानिस्‍तान, पाकिस्‍तान, मिस्र और लीबिया में खरबों डॉलर लुटा रहा है। यह सारा का सारा धन अमेरिका के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मेहनतकशों के श्रम और उनकी प्राकृतिक संपदाओं की लूट से हासिल किया गया है। इन नीतियों ने अमेरिकी समाज में अमीर-गरीब की खाई को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। अमेरिका में आज काम करने वाली कुल आबादी का 42 प्रतिशत हिस्‍सा बेरोजगार हो चुका है। ये आंकड़ा और भी बढ़ने वाला है। स्थितियां इतनी निराशाजनक हैं कि अमेरिका के भविष्‍य को लेकर कोई भी अच्‍छी उम्‍मीद नहीं बांध पा रहा है। वैश्‍वीकरण के झंडाबरदारों के मुंह से आज सिर्फ विलाप के शब्‍द ही फूट रहे हैं। न्‍यूयार्क टाइम्‍स का थॉमस फ्रीडमैन विलाप करते हुए कहता है ''हमने शीतयुद्ध की समाप्ति को एक ऐसी विजय मान लिया था जो हमारे लिए नई समृद्धि का रास्‍ता खोल देगी। लेकिन हम गलत थे। उसने वास्‍तव में हमारे सामने अब तक की सबसे भीषण चुनौतियां पेश कर दी हैं।'' इसी तरह लंदन का मशहूर अखबार टेलीग्राफ कहता है ''इस बार हम जल्‍दी ही दोबारा मंदी के खतरों से घिर गए हैं। लेकिन इस बार हमारा सहारा बनने वाला कोई नहीं है। चीन अपने सफल घरेलू उत्‍पाद का 200 प्रतिशत कर्ज के रूप में पहले ही झोंक चुका है।''
संकट के कारण:- यूं तो आर्थिक संकट का पूंजीवाद से नाता उसके जन्‍मकाल से ही है। पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था की मूल प्रेरक शक्ति मुनाफा होता है। इसलिए मुनाफे के लिए तीव्र होड़ करना, कुछ लोगों के हाथों पूंजी या संपति का इकट्ठा होते जाना व शेष आबादी का संपतिहीन होते जाना और इस कारण बीच-बीच में आर्थिक मंदी पैदा होते रहना पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था के लिए बड़ी आम सी बात है। लेकिन मौजूदा संकट कोई आम संकट नहीं है। पूंजीवाद का संकट और मुनाफे के लिए होड़ अब एक नई मंजिल तक पहुंच गई है। आज कुछ लोगों के हाथों में पूंजी या संपति इतनी इकट्ठा हो गई है कि उसकी कल्‍पना भी आम आदमी नहीं कर सकता है। इस पूंजी में वित्तीय और सट्टेबाजी की पूंजी की मात्रा सबसे ज्‍यादा है इसलिए मुनाफे के लिए होड़ भी उतनी ही तीखी हो चुकी है। इस होड़ में जो सबसे आगे और सबसे ताकतवर व प्रभावशाली होगा वही सबसे ज्‍यादा मुनाफे का भागीदार होगा। इसी कारण पूंजी को पैदा करने वाले मजदूर और मेहनतकश तबके का शोषण और उसकी तबाही भी उतनी ही तेज हो गई है। इसलिए आज का शासनतंत्र पूरी तरह एक परजीवी तंत्र में तब्‍दील हो चुका है। गरीब देशों की तीव्र लूट के बिना अमेरिकी-यूरोपीय तंत्र आज कायम नहीं रह सकता। ठीक इसी तरह मजदूरों और मेहनतकशों की तीव्र लूट के बिना आज पूंजीपति भी अपनी हैसियत नहीं बनाए रख सकता। भारत में भी इस परिघटना को देखा जा सकता है। उदारीकरण के जिस दौर में यहां पूंजीपतियों की संपतियों में तीन गुना की बढ़ोतरी हुई, उसी दौर में मजदूरों और मेहनतकशों का शोषण भी उसी मात्रा में बढ़ा। यह परजीवी तंत्र ही दुनिया के तमाम संकटों का मूल कारण है और इसका खात्‍मा इसका एकमात्र समाधान है। (मेहनतकश पत्रिका, अंक-५ से साभार. मेहनतकश पढ़ने के लिए के-२१४१, चितरंजन पार्क, नयी दिल्ली, पर संपर्क कर सकते हैं. या ०९३१०८१८७५० पर फोन कर सकते हैं.)

Friday, August 26, 2011

अरुंधति तुमने चिदंबरम को ऑक्सीजन क्यों दिया?


विश्वदीपक
करीब एक दशक पहले इलाहाबाद के आनंद भवन (जहां हिंदुस्तान के कॉरपोरेट नीति के पैगंबर जवाहर लाल नेहरू पैदा हुए थे जिसका एक छोर अन्ना तक जाता है और दूसरा तुम तक) के सामने फुटपाथ पर लगने वाली किताबों की दुकान पर तुम्हे देखा था… नीली बरसाती के ऊपर धूल से सनी हुई. मटमैली सी. अनेक मोटी-पतली, नई-ताजी, सड़ी-गली किताबों के बीच तुम्हारे चेहरे पर इलाहाबाद युनिवर्सिटी के ग्योथिक स्टाइल में बने बुर्ज की छाया पड़ रही थी. लापरवाही से (बाद में पता चला कि सावधानी पूर्वक) चेहरे की आखिरी सीमा को छूती तुम्हारी लटों में हमने गुस्सा महसूस किया था. लेकिन हमारा मन तुम्हारे दाएं नाक के समानांतर उभरे तिल और पार्ददर्शी आंखों पर अटक गया. तब हम तुम्हारा नाम भी नहीं जानते थे. फ्लैप पलटकर देखा तो पता चला कि तुम ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ की लेखिका अरूंधति हो.तब से लेकर आज तक किसी आयत की तरह तुम हमारी जिंदगी में घुली मिली हो.तुमने लिखा है कि ऐसा कोई दिन नहीं जब तुमने ‘नोम चोम्स्की जिंदाबाद’ (the loneliness of Nom Chomski) न बोला हो. और आज हम तुम्हें ये बता रहे हैं कि हमारी जिंदगी का शायद ही ऐसा कोई पल रहा होगा जब हमने ‘अरुंधति जिंदाबाद’ न गुनगुनाया होगा. बाद में जब हमने तुम्हें दिल्ली में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के दौरान देखा तो समझ आया कि ‘अंधेरे में’ जीने वाले हिंदी के कवि मुक्तिबोध ने ‘संवेदनात्क ज्ञान’ किसे कहा था. तुमने शायद मुक्तिबोध का नाम भी नहीं सुना होगा. लेकिन ये तय है कि ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उन्होंने ये बातें तुम्हारे जैसी किसी अरुंधति को देखकर ही लिखा होगा! अरुंधति, तुम्हारे तर्क हमें सम्मोहन की हद तक ले जाते हैं. अकाट्य. पुख्ता. बेजोड़. दुनिया के अनजान रहस्यों से पर्दा उठाने वाली तुम्हारी नर्म कोमल आवाज, लापरवाह दिखने वाली मासूम मर्मभेदी आंखों की चमक ने हमें ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ (ऐसा अमेरिकी साम्राज्यवाद का मानना है) पर शक करना सिखा दिया, हमें सोचने के लिए मजबूर किया. कॉरपोरेट लूट के प्रति आगाह किया. पर आज… इस देश को वास्तविक गृहयुद्ध में झोंकने वाला (जबकि तुमने आंदोलन पर गृहयुद्ध का आरोप लगाया है) गृहमंत्री जश्न मना रहा होगा. जिसके माथे पर माओवादी प्रवक्ता, आज़ाद की हत्या का दाग़ है. और जिसने पूरे मध्यभारत को नरसंहार की जमीन बना दिया है. और जो पिछले काफी समय से आंतरिक दबाब में घुट रहा था तुमने उसके लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की व्यवस्था कर दी है. यह इतिहास का सबसे विचित्र किंतु दुखदायी तालमेल है. एक असंगत त्रासदी. क्या तुम बता सकती हो कि तुमने अपने लेख में इंकलाब जिंदाबाद का जिक्र क्यों नहीं किया? जबकि ये नारा भी लोगों ने प्रमुखता से लगाया है. ये तुम्हारी लापरवाही है या जानबूझकर तुमने इसे ड्रॉप किया है? क्या तुमने भी वामपंथी-प्रगतिशील-क्लब की सदस्यता ले ली है? जिस भारतीय राज्य को तुम ‘बनाना रिपब्लिक’ कहती हो उसके लिए इस नए नवेले मोह का कारण क्या है? (अरूणा रॉय का हश्र हमें मालूम है) किस आधार पर तुमने ये निष्कर्ष निकाल लिया कि अन्ना के आंदोलन में शामिल लोग भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं? क्या तुम्हें माओवादियों और अन्ना के आंदोलन के लक्ष्य का फर्क समझाने की जरूरत है? तुम न सिर्फ माओवादी आंदोलन को रिड्यूस कर रही हो बल्कि उसी सरकारी तर्क को हवा दे रही हो जिसके मुताबिक हर विरोध करने वाले को माओवादी करार दिया जाता है. ताकि उसकी हत्या करने में आसानी हो. गनीमत है कि इस आंदोलन में अब तक कोई हिंसा नहीं हुई है. तुमने इस आंदोलन की नीयत पर ‘कॉरपोरेट भ्रष्टाचार’ को लेकर सवाल उठाया है. क्या तुमसे ये कहने की जरूरत है कि भारतीय राजनीति में संभवत सबसे विनम्र, ईमानदार, प्रधानमंत्री, जो पहले वित्तमंत्री भी रह चुके हैं, की देखरेख में कॉरपोरेट लीडरान को बकायदा लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर संसदीय नेता बनाया गया. चिदंबरम क्या हैं—कॉरपोरेट या नेता? विजय माल्या, नवीन जिंदल? इन्हें किस जातिवाचक संज्ञा के दायरे में रखा जा सकता है? राजनीतिक भ्रष्टाचार और कॉरपोरेट भ्रष्टाचार पानी और शक्कर की तरह आपस में घुल चुके हैं. इन्हें तुम कैसे अलग-अलग इकाई के रूप में देख रही हो यह समझ नहीं आता. हर देश, समाज और यहां तक कि व्यक्ति अपने-अपने तरीके से खुद को अभिव्यक्त करता है. (चीन, रूस, ईरान, दक्षिणी अमेरिकी आंदोलन इसके गवाह हैं. सबके कुछ न कुछ राष्ट्रीय प्रतीक हैं) क्या हिंदुस्तान का झंडा हमेशा ही सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का ही प्रतीक है? पिछले कई दशकों में तुम या तुम्हारे जैसे लोग जनता को दूसरा झंडा क्यों नहीं थमा सके? जब मिस्र में ‘मुस्लिम ब्रदर हुड’ लोकतांत्रिक तानाशाह, होस्नी मुबारक के ख़िलाफ़ आंदोलन का नेतृत्व करता है तो तुम जैसों को प्रगतिशीलता नजर आती है. गोएल गोनिम, सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय निगम, गूगल का कर्मचारी उस आंदोलन का नेतृत्व करता है तब तुम जैसे इंटरनेशनल-हिंदुस्तानी एलीट को दिक्कत नहीं होती. उस वक्त तुम लोगों के दिमाग में कॉरपोरेट नैतिकता का सवाल पैदा नहीं होता. तुमने आंदोलन को एक ‘तमाशा’ बताया है और जनता को “भीड़”. शायद तुम्हारी आंखें तमाशा देखने की आदी हो गई हैं. तब तो तुम ये भी कह सकती हो कि प्रशांत भूषण इस तमाशे के सबसे बड़े रिंग मास्टर हैं. सातारा, झांसी, बगहा, मुजफ्फरपुर, जबलपुर जैसे छोटे कस्बे के लोग जिनकी सम्मिलित कमाई तुम्हारी रॉयल्टी से कम होगी-तमाशा करने निकले हैं? बेशक तुम आंदोलन के इस रूप से असहमत हो सकती हो लेकिन क्या तुमने इस भीड़ के बीच उतरकर इसकी नाड़ी नापने की कोशिश की है? ये उबाल पहले, लोकतंत्राकि फासीवादी व्यव्स्था और उसी कॉरपोरेट लूट के खिलाफ है जिसकी तुम बात करती हो. दूसरे नंबर पर ये जनलोकपाल के साथ है. तुमने अरविंद केजरीवाल को फोर्ड फाउंडेशन से मिलने वाले 4 लाख डॉलर अनुदान की बात की है. हम इसकी आलोचना करते हैं. तुम पर संदेह करें हमारा दिल गवाही नहीं देता. हम फिर अरविंद की आलोचना करते हैं. और उनसे इस बारे में जवाब भी मांगेंगे. लेकिन -क्या तुम बता सकती हो कि दुनिया जिस बुकर पुरस्कार की वजह से तुम्हें जानती है उसको स्पांसर करने वाले ‘द मैन ग्रुप’ की पुरस्कार राशि तुमने इसलिए स्वीकार की क्योंकि ये निगम जनवादी है? सिडनी शांति पुरस्कार के पीछे कौन सा पवित्र कॉरपोरेट हाउस है? तुम्हारी किताबें हार्पर कॉलिन्स और पेंगुइन (दोनों मीडिया मुगल उर्फ मर्डौक की कंपनियां हैं जिनके ख़िलाफ़ अपराध और फर्जीवाड़े के जाने कितने आरोप हैं) से छपती हैं तो क्या हम तुम्हें मोहब्बत करना बंद कर दें. तुम्हारे साथ खड़े होना बंद कर दें? हम एजाज अहमद के उस तर्क को क्यों न स्वीकार कर लें जिसमें उन्होंने कहा था कि तुम्हें बुकर इसलिए दिया गया ताकि हिंदुस्तान के वामपंथी आंदोलन को कमजोर किया जा सके.

(‘The God of Small Things is too much anxiously written, and therefore overwritten…the book panders to the prevailing anti-Communist sentiment which damages it both ideologically and formally…she has neither a feel for Communist politics nor a rudimentary knowledge of it’— Aijaz Ahmed, ‘Reading Arundhati Roy Politically.)

तुमने भारतीय राज्य की दमनकारी ‘नीतियों का विरोध करने और अपनी असहमतियों को पुन: दृढ़ता से कहने के लिए’ (tehelka, jan 2006) में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया. लेकिन उससे पहले जब तुम्हें ‘अहिंसा की वकालत’ के लिए मई 2004 में ‘सिडनी शांति पुरस्कार’ दिया गया तब तुम चुप बैठ गई. पूरे इराक को क्रबगाह बना देने वाले और हमेशा हमेशा के लिए इराक को बंजर-नपुंसक बना देने वाले अमेरिका के छोटे प्यादे, ऑस्ट्रेलिया की नीतियों से तुम्हें दिक्कत नहीं हुई? और आखिर में. तुम जिस जनता को ‘बेवकूफ’ समझती हो. वो दरअसल है नहीं. वो झंडे लहराने से अगर प्रभावित होती तो हिंदुस्तान में कब की वामपंथी क्रांति हो चुकी होती. कब का इंडिया शाइन हो चुका होता. इसी जनता ने इंदिरा से लेकर अटल जैसे नेताओं को खारिज कर दिया है. अगर अरविंद और अन्ना इसके साथ धोखा करेंगे तो ये उन्हें भी खारिज कर देगी. और हां, तुम्हें भी. शायद तुम्हें भी.

मैं अन्ना नहीं होना चाहूँगी


अरुंधती राय
जो कुछ भी हम टी. वी. पर देख रहे हैं अगर वह सचमुच क्रान्ति है तो हाल फिलहाल यह सबसे शर्मनाक और समझ में न आने वाली क्रान्ति होगी. इस समय जन लोकपाल बिल के बारे में आपके जो भी सवाल हों उम्मीद है कि आपको ये जवाब मिलेंगे : किसी एक पर निशान लगा लीजिए - (अ) वन्दे मातरम, (ब) भारत माता की जय, (स) इंडिया इज अन्ना, अन्ना इज इंडिया, (द) जय हिंद. आप यह कह सकते हैं कि, बिलकुल अलग वजहों से और बिलकुल अलग तरीके से, माओवादियों और जन लोकपाल बिल में एक बात सामान्य है. वे दोनों ही भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं. एक नीचे से ऊपर की ओर काम करते हुए, मुख्यतया सबसे गरीब लोगों से गठित आदिवासी सेना द्वारा छेड़े गए सशस्त्र संघर्ष के जरिए, तो दूसरा ऊपर से नीचे की तरफ काम करते हुए ताजा-ताजा गढ़े गए एक संत के नेतृत्व में, अहिंसक गांधीवादी तरीके से जिसकी सेना में मुख्यतया शहरी और निश्चित रूप से बेहतर ज़िंदगी जी रहे लोग शामिल हैं. (इस दूसरे वाले में सरकार भी खुद को उखाड़ फेंके जाने के लिए हर संभव सहयोग करती है.) अप्रैल 2011 में, अन्ना हजारे के पहले "आमरण अनशन" के कुछ दिनों बाद भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों से, जिसने सरकार की साख को चूर-चूर कर दिया था, जनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने टीम अन्ना को ("सिविल सोसायटी" ग्रुप ने यही ब्रांड नाम चुना है) नए भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का न्योता दिया. कुछ महीनों बाद ही इस कोशिश को धता बताते हुए उसने अपना खुद का विधेयक संसद में पेश कर दिया जिसमें इतनी कमियाँ थीं कि उसे गंभीरता से लिया ही नहीं जा सकता था. फिर अपने दूसरे "आमरण अनशन" के लिए तय तारीख 16 अगस्त की सुबह, अनशन शुरू करने या किसी भी तरह का अपराध करने के पहले ही अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. जन लोकपाल बिल के लिए किया जाने वाला संघर्ष अब विरोध करने के अधिकार के लिए संघर्ष और खुद लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जुड़ गया. इस 'आजादी की दूसरी लड़ाई' के कुछ ही घंटों के भीतर अन्ना को रिहा कर दिया गया. उन्होंने होशियारी से जेल छोड़ने से इन्कार कर दिया, बतौर एक सम्मानित मेहमान तिहाड़ जेल में बने रहे और किसी सार्वजनिक स्थान पर अनशन करने के अधिकार की मांग करते हुए वहीं पर अपना अनशन शुरू कर दिया. तीन दिनों तक जबकि तमाम लोग और टी.वी. चैनलों की वैन बाहर जमी हुई थीं, टीम अन्ना के सदस्य उच्च सुरक्षा वाली इस जेल में अन्दर-बाहर डोलते रहे और देश भर के टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने के लिए उनके वीडियो सन्देश लेकर आते रहे. (यह सुविधा क्या किसी और को मिल सकती है?) इस बीच दिल्ली नगर निगम के 250 कर्मचारी, 15 ट्रक और 6 जे सी बी मशीनें कीचड़ युक्त रामलीला मैदान को सप्ताहांत के बड़े तमाशे के लिए तैयार करने में दिन रात लगे रहे. अब कीर्तन करती भीड़ और क्रेन पर लगे कैमरों के सामने, भारत के सबसे महंगे डाक्टरों की देख रेख में, बहुप्रतीक्षित अन्ना के आमरण अनशन का तीसरा दौर शुरू हो चुका है. टी.वी. उद्घोषकों ने हमें बताया कि "कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है." उनके तौर-तरीके गांधीवादी हो सकते हैं मगर अन्ना हजारे की मांगें कतई गांधीवादी नहीं हैं. सत्ता के विकेंद्रीकरण के गांधी जी के विचारों के विपरीत जन लोकपाल बिल एक कठोर भ्रष्टाचार निरोधी क़ानून है जिसमें सावधानीपूर्वक चुने गए लोगों का एक दल हजारों कर्मचारियों वाली एक बहुत बड़ी नौकरशाही के माध्यम प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, संसद सदस्य, और सबसे निचले सरकारी अधिकारी तक यानी पूरी नौकरशाही पर नियंत्रण रखेगा. लोकपाल को जांच करने, निगरानी करने और अभियोजन की शक्तियां प्राप्त होंगी. इस तथ्य के अतिरिक्त कि उसके पास खुद की जेलें नहीं होंगी यह एक स्वतंत्र निजाम की तरह कार्य करेगा, उस मुटाए,
गैरजिम्मेदार और भ्रष्ट निजाम के जवाब में जो हमारे पास पहले से ही है. एक की बजाए, बहुत थोड़े से लोगों द्वारा शासित दो व्यवस्थाएं. यह काम करेगी या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक कानूनी सवाल, वित्तीय अनियमितता या घूसखोरी का मामला है या एक बेहद असमान समाज में सामाजिक लेन-देन की व्यापकता है जिसमें सत्ता थोड़े से लोगों के हाथों में संकेंद्रित रहती है? मसलन शापिंग मालों के एक शहर की कल्पना करिए जिसकी सड़कों पर फेरी लगाकर सामान बेचना प्रतिबंधित हो. एक फेरी वाली, हल्के के गश्ती सिपाही और नगर पालिका वाले को एक छोटी सी रकम घूस में देती है ताकि वह क़ानून के खिलाफ उन लोगों को अपने सामान बेंच सके जिनकी हैसियत शापिंग मालों में खरीददारी करने की नहीं है. क्या यह बहुत बड़ी बात होगी? क्या भविष्य में उसे लोकपाल के प्रतिनिधियों को भी कुछ देना पड़ेगा? आम लोगों की समस्याओं के समाधान का रास्ता ढांचागत असमानता को दूर करने में है या एक और सत्ता केंद्र खड़ा कर देने में जिसके सामने लोगों को झुकना पड़े. अन्ना की क्रान्ति का मंच और नाच, आक्रामक राष्ट्रवाद और झंडे लहराना सबकुछ आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों, विश्व कप जीत के जुलूसों और परमाणु परीक्षण के जश्नों से उधार लिया हुआ है. वे हमें इशारा करते हैं कि अगर हमने अनशन का समर्थन नहीं किया तो हम 'सच्चे भारतीय' नहीं हैं. चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों ने तय कर लिया है कि देश भर में और कोई खबर दिखाए जाने लायक नहीं है. यहाँ अनशन का मतलब मणिपुर की सेना को केवल शक की बिना पर हत्या करने का अधिकार देने वाले क़ानून AFSPA के खिलाफ इरोम शर्मिला के अनशन से नहीं है जो दस साल तक चलता रहा (उन्हें अब जबरन भोजन दिया जा रहा है). अनशन का मतलब कोडनकुलम के दस हजार ग्रामीणों द्वारा परमाणु बिजली घर के खिलाफ किए जा रहे क्रमिक अनशन से भी नहीं है जो इस समय भी जारी है. 'जनता' का मतलब मणिपुर की जनता से नहीं है जो इरोम के अनशन का समर्थन करती है. वे हजारों लोग भी इसमें शामिल नहीं हैं जो जगतसिंहपुर या कलिंगनगर या नियमगिरि या बस्तर या जैतपुर में हथियारबंद पुलिसवालों और खनन माफियाओं से मुकाबला कर रहे हैं. 'जनता' से हमारा मतलब भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और नर्मदा घाटी के बांधों के विस्थापितों से भी नहीं होता. अपनी जमीन के अधिग्रहण का प्रतिरोध कर रहे नोयडा या पुणे या हरियाणा या देश में कहीं के भी किसान 'जनता' नहीं हैं. 'जनता' का मतलब सिर्फ उन दर्शकों से है जो 74 साल के उस बुजुर्गवार का तमाशा देखने जुटी हुई है जो धमकी दे रहे हैं कि वे भूखे मर जाएंगे यदि उनका जन लोकपाल बिल संसद में पेश करके पास नहीं किया जाता. वे दसियों हजार लोग 'जनता' हैं जिन्हें हमारे टी.वी. चैनलों ने करिश्माई ढंग से लाखों में गुणित कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे ईसा मसीह ने भूखों को भोजन कराने के लिए मछलियों और रोटी को कई गुना कर दिया था. "एक अरब लोगों की आवाज़" हमें बताया गया. "इंडिया इज अन्ना." वह सचमुच कौन हैं, यह नए संत, जनता की यह आवाज़? आश्चर्यजनक रूप से हमने उन्हें जरूरी मुद्दों पर कुछ भी बोलते हुए नहीं सुना है. अपने पड़ोस में किसानों की आत्महत्याओं के मामले पर या थोड़ा दूर आपरेशन ग्रीन हंट पर, सिंगूर, नंदीग्राम, लालगढ़ पर, पास्को, किसानों के आन्दोलन या सेज के अभिशाप पर, इनमें से किसी भी मुद्दे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा है. शायद मध्य भारत के वनों में सेना उतारने की सरकार की योजना पर भी वे कोई राय नहीं रखते. हालांकि वे राज ठाकरे के मराठी माणूस गैर-प्रान्तवासी द्वेष का समर्थन करते है और वे गुजरात के मुख्यमंत्री के विकास माडल की तारीफ़ भी कर चुके हैं जिन्होनें 2002 में मुस्लिमों की सामूहिक हत्याओं का इंतजाम किया था. (अन्ना ने लोगों के कड़े विरोध के बाद अपना वह बयान वापस ले लिया था मगर संभवतः अपनी वह सराहना नहीं.) इतने हंगामे के बावजूद गंभीर पत्रकारों ने वह काम किया है जो पत्रकार किया करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अन्ना के पुराने रिश्तों की स्याह कहानी के बारे में अब हम जानते हैं. अन्ना के ग्राम समाज रालेगान सिद्धि का अध्ययन करने वाले मुकुल शर्मा से हमने सुना है कि पिछले 25 सालों से वहां ग्राम पंचायत या सहकारी समिति के चुनाव नहीं हुए हैं. 'हरिजनों' के प्रति अन्ना के रुख को हम जानते हैं : "महात्मा गांधी का विचार था कि हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा. रालेगान सिद्धि में हम यही तरीका आजमा रहे हैं." क्या यह आश्चर्यजनक है कि टीम अन्ना के सदस्य आरक्षण विरोधी (और योग्यता समर्थक) आन्दोलन यूथ फार इक्वेलिटी से भी जुड़े रहे हैं? इस अभियान की बागडोर उनलोगों के हाथ में है जो ऐसे भारी आर्थिक अनुदान पाने वाले गैर सरकारी संगठनों को चलाते हैं जिनके दानदाताओं में कोका कोला और लेहमन
ब्रदर्स भी शामिल हैं. टीम अन्ना के मुख्य सदस्यों में से अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया द्वारा चलाए जाने वाले कबीर को पिछले तीन सालों में फोर्ड फाउंडेशन से 400000 डालर मिल चुके हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान के अंशदाताओं में ऎसी भारतीय कम्पनियां और संस्थान शामिल हैं जिनके पास अल्युमिनियम कारखाने हैं, जो बंदरगाह और सेज बनाते हैं, जिनके पास भू-संपदा के कारोबार हैं और जो करोड़ों करोड़ रूपए के वित्तीय साम्राज्य वाले राजनीतिकों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं. उनमें से कुछ के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं अन्य अपराधों की जांच भी चल रही है. आखिर वे इतने उत्साह में क्यों हैं ? याद रखिए कि विकीलीक्स द्वारा किए गए शर्मनाक खुलासों और एक के बाद दूसरे घोटालों के उजागर होने के समय ही जन लोकपाल बिल के अभियान ने भी जोर पकड़ा. इन घोटालों में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी था जिसमें बड़े कारपोरेशनों, वरिष्ठ पत्रकारों, सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने तमाम तरीके से साठ-गाँठ करके सरकारी खजाने का हजारों करोड़ रूपया चूस लिया. सालों में पहली बार पत्रकार और लाबीइंग करने वाले कलंकित हुए और ऐसा लगा कि कारपोरेट इंडिया के कुछ प्रमुख नायक जेल के सींखचों के पीछे होंगे. जनता के भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन के लिए बिल्कुल सटीक समय. मगर क्या सचमुच? ऐसे समय में जब राज्य अपने परम्परागत कर्तव्यों से पीछे हटता जा रहा है और निगम और गैर सरकारी संगठन सरकार के क्रिया कलापों को अपने हाथ में ले रहे हैं (जल एवं विद्युत् आपूर्ति, परिवहन, दूरसंचार, खनन, स्वास्थ्य, शिक्षा); ऐसे समय में जब कारपोरेट के स्वामित्व वाली मीडिया की डरावनी ताकत और पहुँच लोगों की कल्पना शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश में लगी है; किसी को सोचना चाहिए कि ये संस्थान भी -- निगम, मीडिया और गैर सरकारी संगठन -- लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में शामिल किए जाने चाहिए. इसकी बजाए प्रस्तावित विधेयक उन्हें पूरी तरह से छोड़ देता है. अब औरों से ज्यादा तेज चिल्लाने से, ऐसे अभियान को चलाने से जिसके निशाने पर सिर्फ दुष्ट नेता और सरकारी भ्रष्टाचार ही हो, बड़ी चालाकी से उन्होंने खुद को फंदे से निकाल लिया है. इससे भी बदतर यह कि केवल सरकार को राक्षस बताकर उन्होंने अपने लिए एक सिंहासन का निर्माण कर लिया है, जिसपर बैठकर वे सार्वजनिक क्षेत्र से राज्य के और पीछे हटने और दूसरे दौर के सुधारों को लागू करने की मांग कर सकते हैं और अधिक निजीकरण, आधारभूत संरचना और भारत के प्राकृतिक संसाधनों तक और अधिक पहुँच. ज्यादा समय नहीं लगेगा जब कारपोरेट भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा देकर उसका नाम लाबीइंग शुल्क कर दिया जाएगा. क्या ऎसी नीतियों को मजबूत करने से जो उन्हें गरीब बनाती जा रही है और इस देश को गृह युद्ध की तरफ धकेल रही है, 20 रूपए प्रतिदिन पर गुजर कर रहे तिरासी करोड़ लोगों का वाकई कोई भला होगा? यह डरावना संकट भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र के पूरी तरह से असफल होने की वजह से पैदा हुआ है. इसमें विधायिका का गठन अपराधियों और धनाढ्य राजनीतिकों से हो रहा है जो जनता की नुमाइन्द्गी करना बंद कर चुके हैं. इसमें एक भी ऐसा लोकतांत्रिक संस्थान नहीं है जो आम जनता के लिए सुगम हो. झंडे लहराए जाने से बेवकूफ मत बनिए. हम भारत को आधिपत्य के लिए एक ऐसे युद्ध में बंटते देख रहे हैं जो उतना ही घातक है जितना अफगानिस्तान के युद्ध नेताओं में छिड़ने वाली कोई जंग. बस यहाँ दांव पर बहुत कुछ है, बहुत कुछ.

Saturday, August 20, 2011

गार्मेंट फैक्ट्रियों के निशाने पर मेहनतकशों का मोहल्ला

देवेन्द्र प्रताप

देश की राजधानी दिल्ली में संगम विहार एक ऐसा इलाका है, जहां ओखला, तुगलकाबाद, नोएडा, गुड़गांव आदि इलाकों में काम करने वाली मजदूरों की बड़ी आबादी रहती है। मेहनतकशों के इस मोहल्ले की आबादी करीब चार लाख है, जिसका बहुलांश मजदूर है। यह इलाका महरौली और तुगलकाबाद के बीच में है। यहां से गुड़गांव,नोएडा और ओखला जाना बेहद आसान है, क्योंकि यह मेन रोड पर है। विश्व महाशक्ति की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हमारे देश की थोथी बयानबाजी को यह उसके ही घर में झूठ साबित करता है। यहां नगर निगम के पानी के टैंकर से पीने का पानी लेने के लिए लोग आए दिन बवाल करते रहते हैं। मोहल्ले की सड़कें ऐसी कि पैदल चलना भी मुश्किल। बारिश में समूचा इलाका ऐसा लगता है कि जैसे गंदा नाला उफन पड़ा हो।
कुल मिलाकर बुनियादी सुविधाओं से वंचितों का इलाका है संगम विहार। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग बेहद गरीबी में अपनी जिंदगी बसर करते हैं। इस इलाके के मजदूरों के श्रम पर गार्मेंट कंपनियों की गिद्ध नजर है। चूंकि संगम विहार का इलाका, नोएडा, गुडगांव और ओखला की मुख्य सड़क पर स्थित है, इसलिए यह इन इलाकों की गार्मेंट कं पनियों के अनियमित कामों के लिए बहुत ही मुफीद जगह है।
गुडगांव की एक नामी गिरामी गार्मेंट कम्पनी के लिए पीस तैयार करने वाले ठेकेदार नूरी लखनऊ में मलीहाबाद के रहने वाले हैं। उनके साथ उनका छोटा भीई रफीक भी काम करता है। रफीक अभी 13 साल का ही है। नूरी के परिवार के पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं है। इसलिए उनका परिवार धनी किसानों के खेतों पर काम करके किसी तरह अपना गुजारा करता है। नूरी 10 साल पहले ही ओखला आ गये थे। उन्होंने नोएडा और ओखला की गार्मेंट कम्पनियों में काम किया। साल भर नहीं होता था कि उन्हें गार्मेंट कम्पनी उन्हें सड़क पर फेंक देती थी। आजिज आकर उन्होंने संगम विहार में 1500 रुपये में दो छोटे-छोटे कमरे किराये पर लेकर गार्मेंट कम्पनियों के लिए खुद काम करना शुरू किया। एक साल हुआ जब उन्होंने अपने छोटे भाई रफीक को भी गांव से बुला लिया।
बाल श्रम के लिए लाखों रुपया डकारने वाले और जनता को गुमराह करने वाले एनजीओ (स्वयं सेवी संगठन) की कारस्तानी को नूरी बहुत अच्छी तरह समझता है। वह कहता है, 'बाल श्रम की जड़ में गरीबी है, जो परिवार वालों को अपने बच्चों से काम कराने पर मजबूर करती है। सरकार की ओर से चलने वाला बाल श्रम उन्मूलन अभियान, गरीब परिवारों की गरीबी को दूर करने के बजाय, बच्चों से उनका रोजगार ही छीन लेता है। नतीजतन आय का जरिया ही बंद हो जाता है और परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। हमें ऐसे कानून से कोई फायदा नहीं है, अलबत्ता नुकसान ही है।’
इस इलाके में पचासों एनजीओ काम करते हैं। कुकुरमुत्तों की तरह उगे ये संगठन दरअसल उन्हीं पूंजीवादी सरमायेदारों के पैसे से काम करते हैं जो इन मजदूरों का शोषण करते हैं। ये संगठन इन लुटेरों के धन से जनता की गरीबी दूर करने का भ्रम पैदा करते हैं। हकीकत यह है कि वे अपनी झोली भरने मे लगे हुए हैं।
बहरहाल, दिल्ली की अधिकांश बड़ी गार्मेंट कम्पनियां, जो विदेशों से आर्डर लेकर उनको कपड़ा निर्यात करती हैं, संगम विहार में ठेकेदारों की छोटी-छोटी यूनिटों में कपड़ा तैयार करवाने का काम करवाती हैं। गार्मेंट कम्पनियां उन्हें एक सैंपल देती हैं, जिसके आधार पर ठेकेदार (मजदूर इन्हें फैब्रीकेटर कहते हैं) अपने मजदूरों के साथ पीस तैयार करता है। इस व्यवसाय से जुड़े ज्यादातर ठेकेदार भी नूरी की तरह ही हैं। ठेकेदारी का यह काम उनकी आजीविका का एक सहारा है। इन ठेकेदारों में से ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। इसमें हर जाति और मजहब के लोग मिल जाएंगे। हालांकि सिलाई का काम करने वाले ठेकेदारों में सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश और विहार के ठेकेदारों की है। बड़ी कम्पनियों द्वारा कई बार इनका पेमेंट रोक देने से ये बर्बाद भी खूब होते हैं। यही वजह है कि इलाके में इनकी संख्या स्थिर नहीं रहती है। स्टिचिंग वर्क (सिलाई का काम) करने वाली ज्यादातर यूनिटों के मालिक (ठेकेदार) स्वयं भी अपने मजदूरों के साथ काम करते हं। इन ठेकेदारों में से 40 से 50 प्रतिशत ऐसे ठेकेदार हैं, जिन्होंने दिल्ली, नोएडा या फिर गुड़गाव की किसी फैक्ट्री में मजदूर के तौर पर काम किया है। इसलिए इन यूनिटों में मालिक-मजदूर का रिश्ता वैसा नहीं होता जैसा कि किसी बड़ी यूनिट में होता है। मजदूर और मालिक (ठेकेदारों) के बीच आपस में गाली-गलौज, हंसी-मजाक और यहां तक कि मारपीट भी बराबरी के स्तर पर ही होती है।
सिलाई के काम के अलावा संगम विहार का इलाका जरी या मोती सितारा के काम के लिए, एक मुख्य केन्द्र के रुप में भी जाना जाता है। यहां इस काम को करने वाले ज्यादातर लोग बरेली के रहने वाले हैं। बरेली में यह काम मुगलों के जमाने से होता आया है। इसलिए वहां के हुनरमंद मजदूर इस काम के लिए ज्यादा सही साबित होते हैं। बरेली का दिल्ली के करीब होना भी एक वजह है। संगम विहार में सिलाई के काम में जहां सबसे ज्यादा हिन्दू मजदूर हैं वहीं, मोती सितारा का काम करने वाले ज्यादातर मजदूर मुस्लिम हैं। ‘ संगम विहार में जरी के काम में लगे हुए करीब 70 प्रतिशत मजदूरों की उम्र 18 साल से कम है। करीब 60 प्रतिशत बाल मजदूर अभी 14 साल से कम के हैं। अक्सर ऐसा देखना में आता है कि इस काम में लगे हुए बच्चे ठेकेदार के परिवार के, उसके गांव के या फिर उसकी पहचान के होते हैं।
कुल मिलाकर इस इलाके में किया जाने वाला जरी का काम बाल श्रमिकों के ऊपर निर्भर है। बरेली से आने वाले बाल मजदूरों में से ज्यादातर भूमिहीन परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। आजीविका का कोई दूसरा जरिया नहीं होने के चलते वे इस काम को करने के लिए मजबूर हैं। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, हरदोई, शाहजहांपुर जैसे कुछ शहरों के मजदूर भी यहां यह काम करते हैं लेकिन, वे कुल मिलाकर भी 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं।
एक बड़े ठेकेदार के यहां मोती सितारे का काम करवाने वाले असलम ने बताया कि 'यहां कोई नियम नहीं है। बीमार होने पर दवा-दारु खुद ही करना होता है। एक बाल श्रमिक दिन-रात मेहनत करने के बाद भी महीने में 3000 रुपए से ज्यादा नहीं कमा पाता है। बराबर मेहनत करने के बावजूद बड़ी उम्र के लड़कों की तुलना हमें बहुत ही कम मजदूरी मिलती है। यह सारा काम पीस रेट पर होता है, इसलिए पता नहीं होता कि अगले महीने कितनी कमाई होगी। यहां कोई यूनियन नहीं है जो हमारी बात सुने। पुलिस तो बिकी हुई है। वह ठेकेदारों से हर महीने पैसा लेती है, इसलिए हमारी बात क्यों सुनेगी।’
असलम की उम्र 14-15 साल की होगी। अभी उसके चेहरे पर रोयें आना शुरू ही हुए हैं। लेकिन, इतनी कम उम्र के बजाय वह अपने गांव में टीवी की शिकार अपनी मां, अपनी दो बहनों और एक अभी का खर्च उठाने मे अपने पिता की मदद कर रहा है। शायद यह कहावत बिल्कुल सही है कि 'गरीबों के बच्चे जल्दी सयाने हो जाते हैं।’
गार्मेंट फैक्ट्रियां यहां धागा कटिंग, बटन लगवाने और हैंड इम्ब्राडरी का काम भी करवाती हैं। जहां मोती-सितारा और सिलाई करने के काम में पुरुषों मजदूरों की संख्या ज्यादा है, वहीं इस तीसरी तरह के काम में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। गार्मेंट फैक्ट्रियों के लिए बच्चों के साथ ही गरीब महिलाओं का शोषण करना भी आसान होता है। यह काम भी पीस रेट पर होता है। ठेकेदार को इस काम में ज्यादा फायदा नहीं होता है। इसलिए जिन्हें अड्डा वर्क या कपड़ा सिलने का काम नहीं मिलता, वही इस काम का ठेका लेते हैं। ठेकेदार मोहल्ले की महिलाओं से बेहद कम पैसे में यह काम करवाता है। आलम यह है कि यह काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं 4-5 घंटे रोज यह काम करती हैं तब भी महीने में हजार रुपए से ज्यादा नहीं कमा पातीं हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो गार्मेंट इंडस्ट्री में महिलाओं और बच्चों का शोषण बालिग पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा है।
गोविन्द पुरी, खिड़की गांव, तुगलकाबाद एक्सटेंसन आदि ऐसे इलाके हैं जहां गार्मेंट कम्पनियां अपना काम करवाती हैं। उन्होंने कपड़ा तैयार करने के अपने समूचे काम को छोटे-छोटे टुकड़े में तोड़कर मोहल्लों तक को अपनी असेम्बली लाइन से जोड़ दिया है। इससे न सिर्फ उनके मुनाफे में सैकड़ों गुना की बढ़ोत्तरी हुई है वरन उन्होंने मजदूरों के संगठन बनाने के रास्ते में भी अवरोध खड़ा कर दिया है। इसलिए आज पहले की तरह सिर्फ कारखाना केन्द्रित संगठन बनाकर काम नहीं किया जा सकता। निश्चित तौर पर पहली लड़ाई तो कारखानों से ही शुरू होगी लेकिन वह सही ढंग से तभी लड़ी जा सकती है जब संगम विहार जैसे इलाकों में भी यूनियन से जुड़ा हुआ कोई संगठन हो जो वहां के मजदूरों को कारखाना मजदूरों के साथ खड़ा करे। इसलिए आज मजदूर संगठनों या कारखाना केन्द्रित यूनियनों को अपनी पैठ उन मोहल्लों तक बनानी होगी जहां गार्मेंट कम्पनियां अपना काम करवाती हैं। अगर ऐसी कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो निश्चित तौर पर बिखरे हुए मजदूरों के बीच एकता की नई नींव पड़ेगी।

Thursday, August 18, 2011

कोलूशा


मैक्सिम गोर्की

कब्रिस्तान के मुफलिसों के घेरे में पत्तियों से ढकी और बारिश तथा हवा में ढेर बनी समाधियों के बीच एक सूती पोशाक पहने और सिर पर काला दुशाला डाले, दो सूखे भूर्ज वृक्षों की छाया में एक स्त्री बैठी है। उसके सिर के सफेद बालों की एक लट उसके कुम्हलाये गाल पर पड़ी है। उसके मजबूती से बंद होठों के सिरे कुछ फूले हुए-से हैं, जिससे मुहं के दोनों ओर शोक-सहूचक रेखाएं उभर आई है। आंखों की उसकी पलके सूजी हुई हैं, जैसे वह खूब रोई हो और कई लम्बी रातें उसकी जागते बीती हों।
मैं उससे कुछ ही फासले पर खड़ा देख रहा था, पर वह गुमसुम बैठी रही और जब मैं उसके नजदीक पहुंच गया तब भी उसमें कोई हलचल पैदा नहीं हुईं। महज अपनी बुझी हुई आंखों को उठाकर उसने मेरी ओर देखा और मेरे पास पहुंच जाने से जिस उत्सुकता, झिझक अथवा भावावेग की आशा की जाती थीं, उसे तनिक भी दिखाये बिना वह नीचे की ओर ताकती रही।
मैंने उसे नमस्कार किया। पूछा, "क्यों बहन, यह सामधि किसकी है?"
"मेरे लड़के की।" उसने बहत ही बेरुखी से जवाब दिया।
"क्या वह बहुत बड़ा था?"
"नहीं, बारह साल का था।"
"उसकी मौत कब हुई?"
"चार साल पहले।"
स्त्री ने दीर्घ निश्वास छोड़ी और अपने बालों की लट को दुशाले के नीचे कर लिया। उस दिन बड़ी गर्मी थी। मुर्दो की उस नगरी पर सूरज बड़ी बेरहमी से चमक रहा था। कब्रो पर जो थोड़ी बहुत घास उग आई थी। वह मारे गर्मी और धूल के पीली पड़ गई थी और सलीबों के बीच यत्र-तत्र धूल से भरे पेड़ ऐसे चुपचाप खड़े थे, मानों मौत ने उन्हें भी अपने सांये में ले लिया हो।
लड़के की सामधि की ओर सिर से इशारा करते हुए मैने पूछा, "उसकी मौत कैसे हुई?"
"घोड़ो की टापों से कुचलने से।" उसने गिने-चुने शब्दों में उत्तर दिया और समाधि को जैसे सहलाने के लिए झुर्रियों से भरा अपना हाथ उस ओर बढ़ा दिया।
"ऐसा कैसे हुआ?"
जानता था कि मैं अभद्रता दिखा रहा था, लेकिन उस स्त्री को इतना गुमसुम देखकर मेरा मन कुछ उत्तेजित और कुद खीज से भर उठा था। मेरे अन्दर सनक पैदा हुई कि उसकी आंखों में आंसू देखूं। उसकी उदासीनता में अस्वाभाविकता थी पर मुझे लगा कि वह उस ओर से बेसुध थी।
मेरे सवाल पर उसने अपनी आंखें ऊपर उठाई और मेरी ओर देखा। फिर सिर से पैर तक मुझे पर निगाह डालकर उसने धीरे-से आह भरी और बड़े मंद स्वर में अपनी कहानी कहनी शुरू की:
"घटना इस तरह घटी। इसके पिता गबन के मामले में डेढ़ साल के लिए जेल चले गये थे। हमारे पास जो जमा पूंजी थीं वह इस बीच खर्च हो गई। बचत की कमाई ज्यादा तो थी नहीं। जिस समय तक मेरा आदमी जेल से छूटा हम लोग घास जलाकर खाना पकाते थे। एक माली गाड़ी भर वह बेकार घास मुझे दे गया था। उसे मैंने सुखा लिया था और जलाते समय उसमें थोड़ा बुरादा मिला लेती थी। उसमें बड़ा ही बुरा धुआं निकलता था और खाने के स्वाद को खराब कर देता था। कोलूशा स्कूल चला जाता था। वह बड़ा तेज लड़का था और बहुत ही किफायतशार था। स्कूल से घर लौटते समय रास्ते में जो भी लट्ठे- लकड़ी मिल जाते थे, ले आता था। वंसत के दिन थे। बर्फ पिघल रही थी। और कोलूशा के पास पहनने को सिर्फ किरमिच के जूते थे। जब वह उन्हें उतारता था तो उसके पैर मारे सर्दी के लाल-सुर्ख हो जाते थे।
"उन्हीं दिनों उन लोगों ने लड़के के पिता को जेल से रिहा कर दिया और गाड़ी में घर लाये। जेल में उसे दिल का दौरा पड़ गया था। वह बिस्तर पर पड़ा मेरी ओर ताक रहा था। उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कराहट थी। मैंने उस पर निगाह डाली और मन-ही मन सोचा, 'तुमने मेरी यह हालत कर दी है! और अब मैं तुम्हारा पेट कैसे भरूंगी? तुम्हें
कीचड़ में पटक दूं। हां, मैं ऐसा ही करना चाहूंगी।
" लेकिन कोलूशा ने उसे देखा तो बिलख उठा। उसका चेहरा जर्द हो गया और बड़े बड़े आंसू उसके गालों पर बहने लगे। मॉँ, इनकी ऐसी हालत क्यों है?' उसने पूछा। मैंने कहा, यह अपना जीना जी चुके हैं'
"उस दिन के बाद से हमारी हालत बदतर होती गई। मैं रात दिन मेहनत करती, लेकिन अपना खून सुखा करके भी बीस कापेक से ज्यादा न जुट पाती और वह भी रोज नहीं, खुशकिस्मत दिनों में। यह हालत मौत से भी गई-बीती थी और मैं अक्सर अपनी जिन्दगी का खात्मा कर देना चाहती।
"कोलूशा यह देखता और बहुत परेशान होकर इधर-से-उधर भटकता। एक बार जब मुझे लगा कि यह सब मेरी बर्दाश्त से बाहर है तो मैंने कहा, 'आग लगे मेरी इस जिंदगी को! मैं मर क्यों नहीं जाती! तुम लोगों में से भी किसी की जान क्यों नहीं निकल जाती?'मेरा इशारा कोलूशा और और उसके पिता की ओर थ।
"उसके पिता ने सिर हिलाकर बस इतना कहा, मैं जल्दी ही चला जाऊंगा। मुझे जली कटी मत कहो। थोड़ा धीरज रक्खो।'
"लेकिन कोलूशा देर तक मेरी ओर ताकता रहा, फिर मुड़ा और घर से बाहर चला गया।
"वह जैसे ही बाहर गया, मुझे अपने शब्दों पर अफसोस होने लगा, पर अब हो क्या सकता था! तीर छूट चुका था।
"एक घंटा भी नहीं बीता होगा कि घोड़े पर सवार एक सिपाही आया।'क्या आप गौसपोजा शिशीनीना हैं?' उसने पूछा। मेरा दिल बैठने लगा। उसने आगे कहा, 'तुम्हें अस्पताल में बुलाया है। सौदागर ण्नोखिन के घोड़ों ने तुम्हारे बेटे को कुचल डाला है।'
"मैं फौरन गाड़ी में अस्पताल के लिए रवाना हो गई। मुझे लग रहा था, मानो किसी ने गाड़ी की सीट पर जलते कोयले बिछा दिये हैं" मैं अपने को कोस रही थी—अरी कम्बख्त, तुने यह क्या कर डाला!'
"आखिर हम अस्पताल पहुंचे। कोलूशा बिस्तर पर पड़ा था। उसके सारे बदन पर पट्टियां बंधी थीं। वह मेरी तरफ देखकर मुस्कराया! उसके गालों पर आंसू बहने लगे! धीमी आवाज में उसने कहा, 'मां, मुझे माफ करो। पुलिस के आदमी पैसे ले लिये हैं।'
"तुम किन पैसों की बात कर रहे हो, कोलूशा?" मैंने पूछा।
"वह बोला, अरे, वे पैसे, जो लोगों ने और एनोखिन ने मुझे दिये थे।'
"मैने पूछा, 'उन्होंने तुम्हें पैसे क्यों दिये?'
"उसने कहा, 'इसलिए...'
"उसने धिरे से आह भरी। उसकी आंखें तश्तरी जैसी बड़ी हो रही थीं।
'कोलूशा!' मैंने कहा, 'यह क्या हुआ कि तुमने घोड़े आते हुए नहीं देखे!'
"उसने साफ आवाज में हका, 'मां मैंने घोड़े आते देखे थे, लेकिन मेरे ऊपर से निकल जायंगे तो लोग मुझे जयादा पैसे देंगे, और उन्होंने दिये भी।'
"ये उसके शब्द थे। मैं सबकुछ समझ गई, सबकुछ समझ गई कि उस फरिश्ते लाल ने ऐसा क्यों किया; लेकिन अब तो कुछ भी नहीं किया जा सकता था।
"अगले दिन सबेरे ही वह मर गया। आखिरी सांस लेने तक उसकी चेतना बनी रही और वह बार-बार कहता रहा 'डैडी के लिए यह खरी लेना, वह खरी लेना और मां अपने लिए भी, 'जैसेकि उसके सामने पैसा-ही पैसा हो। वास्तव में सौंतालिस रूबल थे।
"मैं एनोखिन के पास गई; लेकिन मुझे कुल जमा पांच रूबल दिये और वे भी गड़बड़ा कर उसने कहा, 'लड़के ने अपने को घोड़े के बीच झोंक दिया। बहुत-से लोगों ने देखा। इसलिए तुम किस बात की भीख मांगने आई हो? मैं फिर कभी घर वापस नहीं गई। भैया, यह है सारी दास्तान!'
कब्रिस्तान में खामोशी और सन्नटा छाया था। सलीब, रोगी-जैसे पेड़, मिट्टी के ढेर और कब्र पर इतने दुखी भाव से गुमसुम बैठी वह स्त्री—इस सबसे मैं मृत्यु और इन्सानी दुख के बारे में सोचने लगा।
लेकिन आसमान साफ था और धरती पर ढलती गर्मी की वर्षा कर रहा था।
मैंने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उस स्त्री को ओर बढ़ा दिये, जिसे तकदीर ने मार डाला था, फिर भी वह जिये जा रही थी।
उसने सिर हिलया और बहुत ही रुकते-रुकते कहा, "भाई, तुम अपने को क्यों हैरान करते हो! आज के लिए मेरे पास बहुत हैं। अब मुझे ज्यादा की जरूरत भी नहीं है। मैं अकेली हूं-दुनिया में बिलकुल अकेली।"
उसने एक लम्बी सांस ली और फिर मुंह पर वेदना से उभरी रेखाओं के बीच अपने पतले होंठ बन्द कर लिये।

Tuesday, August 16, 2011

तिरुपुर: 'डालर शहर' में आत्महत्या की बाढ़

राजकुमार

तमिलनाडु के तिरुपुर शहर का नाम देश के कोने-कोने में जाना जाता है। गंजी-बनियान इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति कभी न कभी तिरुपुर में तैयार इस वस्त्र का जरुर इस्तेमाल किया होगा। लेकिन यह अब एक पुरानी बात हो गयी है। तिरुपुर अब विदेशों को सिले-सिलाए वस्त्र निर्यात करने वाला भारत का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया है। इसलिए आजकल इसे डालर शहर कहा जाता है। लेकिन पिछले साल भर से पूरे तिरुपुर जिले में गार्मेंट मजदूरों की आत्महत्या की घटनाओं में भारी बढ़ोत्त्री हुई है। बीस स्त्री पुरुष हर रोज! इन घटनाओं के चलते डालर शहर की चकाचौंध का दूसरा पक्ष भी उजागर हुआ है, जो कि बहुत ही ज्यादा बदसूरत और बर्बर है।
तिरुपुर और उसके आस-पास गार्मेंट उद्योग से जुड़ी कुल 6250 फैक्ट्रियां मौजूद हैं। इनमें करीब चार लाख मजदूर काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर बाहर से आये हुए मजदूर हैं। इन प्रवासी मजदूरों में तमिलनाडु के विभिन्न जिलों तथा उड़ीसा, विहार, झारखण्ड व राजस्थान के मजदूरों की संख्या ज्यादा है। अधिकांश मजदूर अभी 30 साल से कम उम्र के युवा हैं। मजदूरों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या ज्यादा है।
सिले-सिलाए या बुने हुए वस्त्रों की विदेशों में निर्यात कर डालर कमाने में तिरुपुर ने कमाल कर दिखाया है। सन् 1985 में यहां से मात्र 15 करोड़ मूल्य के कपड़े निर्यात हुआ था। जबकि पिछले साल यह 11,500 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। तिरुपुर की फैक्ट्रियां जिन कम्पनियों या ब्राण्डों के लिए कपड़े बनाती हैं उनमें वालमार्ट, एच एण्ड एम, स्विचर, केयर फोर, गैप, टामी हिल फिगर आदि हैं। ये कम्पनियां या ब्राण्ड दुनियां भर में मशहूर हैं। यूरोप और अमेरिका में इनकी सैकड़ों आलीशान दुकाने हैं जो अरबों डालर का व्यापार करती हैं। इन विदेशी कम्पनियों, तिरुपुर के निर्यातकों और व्यापारियों की अरबों डालर की कमाई जिन लाखों मजदूरों की बेहिसाब मेहनत के बल पर सम्भव होती है, उन मजदूरों का हाल दुनियां की नजरों से तब तक ओझल रहता है, जब तक कि कोई बड़ा हादसा नहीं हो जाता। लेकिन क्या गार्मेंट मजदूरों की आत्महत्या की घटनाओं के चर्चा में आ जाने से यहां काम करने वाले मजदूरों को कोई राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है? ऐसा नहीं लगता। गार्मेंट उद्योग का पूरा ढांचा ही मजदूर विरोधी है। इस ढांचे में सबसे ऊपर वे विशालकाय विदेशी कम्पनियां होती हैं जिनके आर्डर पर रेडीमेड गार्मेंट बनाए जाते हैं। ये कम्पनियां सबसे ज्यादा मुनाफा कमाती हैं और ढांचे के हर स्तर पर कीमतों का नियंत्रण करती हैं। देश के निर्यातकों, छोटी-छोटी इकाइयों, और ठेकेदारों का स्थान इनके बाद आता है। गार्मेंट उद्योग में मजदूरों का स्थान सबसे आखिर में होता है, जिनके ऊपर यह समूचा ढांचा टिका होता है। चूंकि कीमतें विदेशी कम्पनियों के पूरी तरह कब्जे में होती हैं और ये कम्पनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरने की होड़ में लगी रहती हैं। इसलिए, इस ढांचे में शामिल हर हिस्सा जबरदस्त प्रतियोगिता में शामिल रहता है। इन प्रतियोगिताओं का कुुल असर मजदूरों को कम से कम पैसे पर ज्यादा से ज्यादा काम कराने के रुप में होता है।तिरुपुर में भी निर्यातकों और फैक्ट्री मालिकों ने मजदूरों पर खर्च कम करने के लिए तरह-तरह के हथकण्डों को अपनाया। पिछड़े इलाकों से मजदूरों को लाकर 'हास्टल योजनाÓ के तहत फैक्ट्री परिसर में ही एक-एक कमरे में ठूंस-ठूंस कर रखा जाने लगा। इन्हें अन्य मजदूरों से कम मजदूरी दी जाती है। लड़कियों के लिए भी 'सुमंगली योजनाÓ चालू की गयी। इसके तहत लड़कियों को कमरे में एक साथ रहने व भोजन की व्यवस्था की गयी। इन्हें तीन साल के काम के बाद बीस हजार से पचास हजार रुपये एकमुस्त देने का वादा किया गया। ऐसी योजनाओं के तहत रखे गये स्त्री और पुरुषों के कामों के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती है। इन्हें हर रोज न्यूनतम 12घंटे तक करना होता है। जरुरत पडऩे पर आधी रात में जगाकर भी इनसे काम लिया जाता है। इतनी ज्यादा मेहनत एक नौजवान शरीर ही बर्दाश्त कर सकता है। इसलिए कोई लम्बे समय तक इसमें टिकने का सपना नहीं पालता।गार्मेंट उद्योग में ढेरों काम इस तरह के हैं जिनके लिए किसी विशेष ट्रेनिंग की जरुरत नहीं होती है। इसलिए गांवों और कस्बों की बेरोजगार युवक-युवतियां बड़े पैमाने पर इस उद्योग की ओर आकर्षित होते हैं। कम्पनियां भी दूर-दराज के गांवों तक जाकर फिल्मों के जरिए इस उद्योग की हसीन तस्वीर दिखाकर नौजवानों की भर्ती करती हैं। लेकिन गार्मेंट उद्योग में कुछ दिन काम करने के बाद ही उनके सपने टूटने लगते हैं। काम की कठोर परिस्थितियां, रोजगार की अनिश्चितता, और बिना किसी मनोरंजन के लगातार काम करते जाना, अभाव-गरीबी और अनिश्चित भविष्य मजदूरों में रोज-रोज हताशा और निराशा पैदा कर रहा है। परिवार के साथ रहने वाले मजदूरों के लिए मंहगाई का बोझ, बच्चों की चिन्ता तथा कर्ज का दबाव अलग से है। यही वे परिस्थितियां हैं जो तिरुपुर के डालर शहर में मजदूरों की आत्महत्या की जमीन को तैयार कर रही है।

Sunday, August 14, 2011

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?



बाबा नागार्जुन
किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?
कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?
सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला
शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्बीस

उसीका पन्द्रह अगस्त है बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है! गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है! गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है! गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है! देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है! मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है गऱीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्छों नहीं! कुच्छों नहीं ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है कुच्छों नहीं, कुच्छों नहीं ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है! किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है! कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है! सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है।

गार्मेन्ट उद्योग: सस्ते श्रम पर टिका साम्राज्य

शान्तनु
दुनिया के मशहूर ब्राण्ड या कम्पनियां जैसे वालमार्ट, गैप, हिल फीगर आदि के अरबों-खरबों डालर का साम्राज्य और हमारे देश के पांच सितारा होटलों में अक्सर होने वाले फैशन शो व फैशन की दुनिया के जलवों का भारत, बांग्लादेश, वियतनाम, कम्बोडिया आदि जगहों के गरीबी से जूझते करोड़ों गार्मेन्ट मजदूरों का क्या रिस्ता क्या हो सकता है इसे गार्मेन्ट उद्योग से परिचित हर आदमी जानता है ।
भारत में कुल सिले-सिलाए या बुने हुए कपड़ों का मात्र 25 प्रतिशत हिस्सा ही निर्यात होता है और 75 प्रतिशत हिस्सा घरेलू खपत में इस्तेमाल होता है। लेकिन गार्मेन्ट निर्यात का ग्लैमर कहीं ज्यादा है। क्योंकि निर्यात या एक्सपोर्ट के जरिए थोड़े समय में ही ज्यादा कमाई हो जाती है और यह कमाई भी अमेरिकी डालर में होती है।
इसके अलावा एक्सपोर्ट के धन्धे में काली कमाई की गुंजाइश भी बहुत ज्यादा होती है। आज भारत का कुल गार्मेन्ट निर्यात लगभग 50 हजार करोड़ रुपये का है। दिल्ली, गुडग़ांव, नोएडा, तिरुपुर, सूरत और मुम्बई इसके प्रमुख केन्द्र हैं। इस क्षेत्र में आज लगभग 15 लाख मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही संगठित क्षेत्र में आता है जबकि बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है। गार्मेन्ट उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की 50 प्रतिशत गार्मेन्ट तैयार करने का मुख्य काम करता है जबकि शेष अप्रत्यक्ष काम करते हैं। अप्रत्यक्ष कामों में-हाथ की सिलाई, एम्ब्रायडरी, बटन, बकल, जिप, स्टीकर आदि लगाना तथा पैकिंग आदि आता है। चूंकि इस क्षेत्र के ज्यादातर कामों के लिए कोई अलग से प्रशिक्षण देने की जरुरत नहीं होती है इसलिए गरीब व पिछड़े इलाकों से भारी आबादी इस ओर आकर्षित होती है। इस कारण गार्मेन्ट उद्योग में प्रवासी मजदूरों की संख्या ज्यादा होती है।
गार्मेन्ट निर्यात क्षेत्र की बनावट और इसका ताना बाना बेहद महत्व का होता है। इस क्षेत्र के सबसे शीर्ष में वे विदेशी ब्राण्ड या कम्पनियां होती हैं जिनके आर्डर पर गार्मेंट तैयार किया जाता है। पहले ये कम्पनियां आमतौर पर अपने-अपने ब्राण्डों का लेबल लगवाकर थोक बिक्री का काम करती थीं। लेकिन पिछले 20-25 साल के दौरान ये अपने ब्राण्डों की खुदरा बिक्री भी करने लगी हैं। आज पूरी दुनियां में इनकी हजारों आलीशान दुकानें मौजूद हैं। ये कम्पनियां गार्मेन्ट बनाने वाले हर देश में या उत्पादन क्षेत्र में अपने एजेन्ट (बायर) नियुक्त करती हैंै। इसके बाद एक्सपोर्टर की बारी आती है। एक्सपोर्टर के पास खुद अपनी फैक्ट्री हो भी सकती है या वह बाहर से माल बनवाकर एक्सपोर्ट कर सकता है।
गार्मेन्ट तैयार करने वाली फैक्ट्रियां सारा काम खुद नहीं करती हैं। वे ढेरों काम फैब्रिकेटर से करवाती हैं। ये फैब्रिकेटर छोटी-छोटी इकाइयों में थोड़े बहुत मजदूरों के बल पर अपना काम करते हैं। सिर्फ हाथ से होने वाले छोटे या बारीक कामों (जैसे- बटन लगाना, मोती सितारा लगाना, हैण्ड एम्ब्रायडरी आदि)को ठेकेदारों के द्वारा करवाया जाता है। ठेकेदार द्वारा करवाये जाने वाले इन कामों को महिलाएं और बच्चे भी करते हैं। इस तरह स्पस्ट है कि गार्मेन्ट उद्योग के इस विशाल ढांचे में मजदूरों का स्थान सबसे नीचे है। पर बैठी विदेशी कम्पनियों और देशी पूंजीपतियों को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा हो इसके लिए जरुरी है कि माल की ज्यादा से ज्यादा खपत हो, मजदूरी की दर कम हो और मजदूर संगठित भी न होने पाएं। लोग ज्यादा से ज्यादा कपड़ों को खरीदें इसके लिए माहौल बनाना भी जरुरी है। इस काम में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है। फैशन डिजाइनर, फैशन शो और माडलिंग की मायानगरी का निर्माण मीडिया ही करती है। इसके चलते ही मध्यवर्ग के एक तबके में इन कपड़ों को पाने की हवस बढ़ जाती है। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ गार्मेन्ट उद्योग के पूरे तंत्र में भीषण प्रतियोगिता को जन्म देता है जिसकी चपेट में मजदूर भी आ जाता है। देश की सीधी-सादी जनता की मेहनत पर खड़ा गार्मेन्ट निर्यात का पूरा तंत्र इतना स्वच्छन्द तरीके से काम ही नहीं कर पाता अगर उसे सरकारी नीतियों की मदद नहीं मिली होती। 1991 से जारी उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों ने जहां पूंजी और माल के आयात निर्यात पर लगी बंदिशों को ढीला कर दिया वहीं श्रम कानूनों को मानने की बाध्यता को भी व्यवहार में खत्म कर दिया। न्यूनतम मजदूरी कानून और ठेका मजदूरी कानून की धज्जियां उड़ा दी गयी। ईएसआई और पीएफ की बात कौन करे लाखों की संख्या में ऐसे मजदूर हैं जिन्हें कानून की नजर में मजदूर ही नहीं माना जाता। फैक्ट्रियों में मजदूरों के साथ मारपीट व गाली गलौज करना, 12-16 घंटे तक काम करवाना, जब चाहा निकाल देना, मजदूरों के पैसे को मार लेना-यही वे जमीनी हालात हैं जिसके ऊपर गार्मेन्ट और फैशन उद्योग का पूरा महल खड़ा है। दरअसल गार्मेन्ट एक्सपोर्ट उद्योग का पूरा अस्तित्व ही सस्ते श्रम पर टिका हुआ है। गार्मेन्ट उद्योग का मुख्य बाजार और कम्पनियां अमेरिकी और यूरोपीय देश हैं। सस्ते श्रम की खोज में ये कम्पनियां पूरी दुनिया में खाक छानती फिरती हैं। आज अमेरिका में मजदूरी की न्यूनतम दर 14 डालर (644 रुपये) प्रति घंटे की है जबकि चीन में यही दर 1.44 डालर (66.24 रुपये),भारत में 0.51 डालर (23.46 रुपये), इन्डोनेशिया में 0.44 डालर (20.24 रुपये), वियतनाम में 0.38 डालर (17.48 रुपये) और बांग्लादेश में 0.31 डालर (14.26 रुपये) है। आज बांग्लादेश ने इसी सस्ती मजदूरी के कारण दुनिया के 30 प्रतिशत कपड़े के बाजार को दूसरे देशों से छीन लिया है। यहां तक कि भारत की गार्मेन्ट फैक्ट्रियां भी बांग्लादेश में कपड़े तैयार करवाकर निर्यात करने लगी हैं। सस्ते श्रम की यह लूट गरीब देशों में भारी तबाही फैला रही है और सामाजिक ताने बाने को नष्ट कर रही है। यह सब आज इसलिए सम्भव हो पा रहा है क्योंकि गार्मेन्ट मजदूरों की जुबान आज बन्द है तथा वे संगठित नहीं हैं। उसके संगठन बनाने के रास्ते में बाधाएं खड़ी की गयी हैं। लेकिन जिस दिन मजदूर संगठित होकर अपनी मजदूरी का वाजिब दाम मांगेगा, सस्ते श्रम की लूट, फैशन के ग्लैमर की दुनियां और लाखों परोपजीवियों की शानोशौकत का यह सामा्रज्य भहराकर गिर जायेगा।
(शान्तनु एक सामाजिक कार्यकर्त्ता और मेहनतकश पत्रिका के संपादक हैं)

Tuesday, August 2, 2011

भूमि अधिग्रहण


कानून ही किस तरह आम जनता के शोषण-उत्पीड़न के लिए सत्ता के हाथ में एक हथियार की तरह होता है, किसानों के लिए फिलहाल इसका सबसे बढ़िया उदाहरण 1894 में बना अधिग्रहण कानून है। 1894 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया यह कानून, विकास के नाम पर जमीन के मालिकों को धोखे का एक सब्जबाग दिखाता है। देश में लोकतंत्र होने के बावजूद, इस कानून की अंतर्वस्तु में इसके लिए कोई जगह नहीं है। यही वजह है कि पूरे देश में जहां कहीं भी जमीन का अधिग्रहण हुआ है, वहां अधिग्रहण की समूची प्रक्रिया में किसानों की मर्जी का जरा भी ध्यान नहीं दिया गया। हकीकत तो यह है कि रियल स्टेट मालिकों, उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों के लिए किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण में, सरकार उनके एजेंट के तौर पर काम करती है। आप समझ ही सकते हैं कि यह ऐसा एजेंट है, जिसके पास असीम शक्तियां हैं। ‘क्षेत्र के विकास’ का मानक भी वही बनाता है, और मुआवजा भी वही तय करता है। यानी सब कुछ जबरन। आज इस नापाक गठबंधन की जो कीमत देश के किसानों को चुकानी पड़ रही है, आने वाले समय में इसकी कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि इसकी वजह से पहले ही सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी बेरोजगारी और भी विकराल रूप धारण करने वाली है। आगे बढ़ने से पहले एक लाइन में इतना बताते चलें कि मायावती द्वारा दर्जनों किसानों की हत्या के बाद बनाया गया कानून, उस बड़ी समस्या को हल करने में पूरी तरह नाकाम है, जो भविष्य में ज्यादा बड़े स्तर पर नजर आने वाली है।
पिछली साल जब टप्पल में किसानों ने आंदोलन किया तो वहां के पांच गांवों ने मिलकर एक मांगपत्रक बनाया था। इस मांग पत्रक में सबसे पहली मांग तो यही थी कि सरकार गांव के किसानों की जमीनों का अधिग्रहण न करे। किसानों का अगर बस चलता तो कभी अपनी जमीनों को नहीं बेचते। वैसे भी सदियों से खेती किसानी पर आश्रित किसानों की लिए परंपरा ने जमीन को मां की तरह पूज्य बना दिया है। जिस जमीन का जेपी ग्र्रुप के लिए सरकार अधिग्रहण कर रही थी, वह अलीगढ़ जिले की सबसे उपजाऊ जमीन है। वाकई इस मिट्टी में सोना पैदा होता है। अगर सरकार इस जमीन का अधिग्रहण करती, तो इस पर आश्रित भूमिहीन परिवार पूरी तरह उजड़ जाते। इसलिए किसानों की एक महत्वपूर्ण मांग यह थी कि उनकी जमीनों पर काम करने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिए सरकार वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करे। बतातें चलें कि टप्पल आंदोलन में किसानों के साथ बड़ी संख्या में भूमिहीन मजदूरों ने भी हिस्सा लिया था। किसानों की इस मांग का बहुत दूरगामी महत्व है।
दरअसल सरकार का उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण का काम, सदियों से आबाद एक भरी पूरी सभ्यता को उजाड़ने जैसा होता है। वहां का पारिस्थितिक तंत्र, पेड़-पौधे, उन पर बसेरा करने वाले जीव, कुंए, तालाब और सबसे बड़ी बात इन सब की वजह से और इन्हीं पर आश्रित आदमी को भी इसका दंड भुगतना पड़ता है। क्या मुआवजा भर दे देने से सरकार इस पाप से बच सकती है? क्या सरकार को वाकई भूमिहीन मजदूरों के लिए कुछ नहीं करना चाहिए? कानून इस मामले में मौन है। सरकार के लिए इस सवाल से बचने के लिए फिलहाल इतना काफी है।
इकोनॉमिक सर्वे आॅफ इंडिया 2009-2010 के अनुसार देश का कृषि क्षेत्र इस समय करीब 52.1 प्रतिशत लोगों को रोजगार मुहैया करवा रहा है। यह अलग बात है कि सकल घरेलू उत्पादन में इसका योगदान महज 13.2 प्रतिशत ही है। जीडीपी में ज्यादा हिस्सा सृजित करने के बावजूद, हकीकत यही है कि देश के उद्योगों के लिए, यहां मौजूद बेरोजगारों की कुल फौज को खपाना मुश्किल हो रहा है। बताते चलें कि जो लोग कृषि क्षेत्र पर आश्रित हैं, उनकी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है, हां किसी तरह नमक रोटी का जुगाड़ हो जाता है। ऐसे में सरकार का कृषि क्षेत्र के विकास पर अतिरिक्त ध्यान देने के बजाय, किसानों की जमीनों को छीनकर, उसे देश के उद्योगपतियों और रियल स्टेट मालिकों को देना, किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं है।
कम से कम एक बात तो बिल्कुल साफ है कि सरकार का यह कदम गरीब पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले युवाओं को बेरोजगार करेगा। या फिर जिन लोगों की आजीविका का एक मात्र सहारा ही यही है, उनसे इस आसरे को भी छीन लिया जाएगा। अगर मायावती के बहुजन पार्टी के संदर्भ में बात की जाए, तो उनके इस कदम को सीधे-सीधे दलित विरोधी करार दिया जा सकता है। क्योंकि जो लोग गांवों में भूमिहीन मजदूरों के तौर पर काम कर रहे हैं, उनका बड़ा हिस्सा दलितों और दूसरी पिछड़ी जातियों का ही है। इस मामले में मुलायम को भी माफ नहीं किया जा सकता। यहां फिलहाल इन्हीं दोनों पार्टियों को इसलिए संदर्भ के तौर पर दिया गया है, क्योंकि इनमें से एक अपने को दलित का मसीहा के रूप में जनता के सामने रखती है, तो दूसरी पिछड़ी जातियों का।
आज किसान सरकार के ‘क्षेत्र के विकास’ के पीछे के खेल को बहुत अच्छी तरह जान गए हैं। वे देख रहे हैं कि सरकार क्षेत्र के विकास के नाम पर उनकी जमीनों को लेकर जेपी, अंसल जैसी रियल स्टेट से जुड़ी कंपनियों को दे देती है और उनसे इसके एवज में कई गुना ज्यादा दाम वसूलती है। ये रियल स्टेट कंपनियां उसी जमीन पर बहुमंजिला भवन बनाकर सरकार को भुगतान की गई राशि से भी हजारों गुना ज्यादा दाम पर बेचती हैं। यानी इन दोनों के बीच में किसान ही मारा जाता है। अपने इसी अनुभव के चलते किसानों ने उस स्थिति में मुआवजे को बढ़ाने की मांग रखी, जब उनके पास अपनी जमीनों को बचाने का और कोई चारा शेष नहीं बचा।
यहां इस बात पर भी चर्चा जरूरी है कि सरकार ‘क्षेत्र के विकास’ के नाम पर जो जमीनें ले रही है क्या उनसे वहां से उजड़ने वाली आबादी को कोई फायदा होगा? फिलहाल तो सच्चाई यही है कि अधिग्रहण की जाने वाली जमीनों का बड़ा हिस्सा कारपोरेट हाउसों, हाइटेक कंपनियों, बड़े-बड़े आधुनिक उद्योगों, निजी शैक्षिक संस्थानों और सबसे ज्यादा रियल स्टेट कंपनियों के लिए लिया गया है। अभी तक तो यही देखने में आया है कि इनमें (क्षेत्र विशेष के) गांव के गरीबों के लिए कोई जगह नहीं होती है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि देश के गरीबों का बड़ा हिस्सा अनपढ़ है या फिर वह इन संस्थानों में रोजगार के लिए तय मानकों पर खरा नहीं उतरता है। गरीब किसानों के बच्चों को न तो कारपोरेट हाउसों में जगह मिलने वाली है और न ही कारपोरेट हाउस तक की तैयारी करवाने वाले शिक्षण संस्थानों में ही। इस समय पश्चिचमी यूपी, त्रावणकोर समेत देश के कई हिस्सों में ऐसे एजुकेशन हब बन रहे हैं, जिसमें सिर्फ खाते-पीते मध्यवर्ग के बच्चे ही शिक्षा ले सकते हैं। इनकी साल भर की फीस ही लाखों रुपये होती है। रियल स्टेट कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे मकान भी उसकी पहुंच से बाहर हैं और यहां भी उसके लिए रोजगार के अवसर न के बराबर होते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि हमारी सरकार गरीबों को उजाड़कर आखिर कौन सी दुनिया बनाने की तैयारी कर रहा है?
यह सुनकर और अजीब लगता है कि जिन जमीनों को तथाकथित क्षेत्र के विकास के नाम पर लिया जा रहा है, उनमें से ज्यादातर दसियों साल बीत जाने के बाद या तो खाली पड़ी हैं या फिर उनको बेचकर उद्योगपति भारी भरकम मुनाफा कमाने का काम कर रहे हैं। महाराष्ट्र में औद्योगिक विकास के नाम पर अभी तक जितनी भी जमीनें अधिग्रहीत की गई हैं, उनमें से करीब 50 प्रतिशत प्लॉट अभी भी खाली पड़े हैं। यह ऐसी इकलौती घटना नहीं है। ऐसा कई दूसरी जगहों पर भी देखने में आया है कि जिन उद्योगपतियों ने उद्योग स्थापित करने के नाम पर जमीनें लीं, या तो उनके प्लॉट अभी भी खाली पड़े हैं या फिर उन्होंने अपने प्लॉट को कई गुना ऊंचे दामों पर बेच दिया। गौर करने वाली बात यह है कि सरकार उन जमीनों को जिन किसानों से क्षेत्र के विकास के नाम पर लेती है, उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं। उनकी तुलना में जिन लोगों ने उन प्लॉट को खरीदा, वे कई गुना ज्यादा कीमत पर बेचकर भारी मुनाफा कमाते हैं। सरकार को करना तो यह चाहिए कि जिन प्लॉट्स पर लंबे समय तक कोई औद्योगिक इकाई न लगे उन्हें उनके पहले के मालिकों को वापस लौटा दे, या फिर कुछ ऐसा प्रावधान करे, ताकि जिस मकसद के लिए सरकार ने प्लॉट बेचे हों, उस जमीन पर वही काम हो। हांलाकि यह बात सभी लोग जानते हैं कि क्षेत्र के विकास के नाम पर पूंजीपतियों को दी जाने वाली जमीन से वास्तविक फायदा तो सिर्फ उद्योगपतियों को ही होता है। सरकार का यह कहना कि किसानों से ली जाने वाली जमीनों से उस क्षेत्र विशेष का विकास होगा, यह तो बस बहाना मात्र होता है।
जाहिर है जमीन अधिग्रहण रोजगार छीनने का काम कर रहा है। इसके चलते शहरों में पहले से ही मौजूद बेरोजगारो की फौज में इजाफा ही होगा। अगर इसे समय रहते सरकार रोकने का काम नहीं करती तो उसे इसका दुष्परिणाम भी भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए। जमीन अधिग्रहण की हिमायती सरकार और उसके लग्गू-भग्गुओं का एक तर्क यह भी है कि इससे रोजगार में वृद्धि होगी। यह सरासर गलत है। एक्सप्रेस वे बनने से गांव के किसान का आखिर क्या फायदा हो सकता है। रियल स्टेट कंपनियों के बहुमंजिला भवनों से किसानों को क्या फायदा मिलेगा। आखिर उसके बच्चों के लिए ये निर्माण कार्य किस तरह से रोजगार मुहैया करवाएंगे। जहां तक हाइटेक उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण की बात है, तो उनमें प्रयोग होनी वाली उन्नत टेक्नोलॉजी पहले से ही रोजगार के अवसर को कम कर देती है। दूसरी बात ये उद्योग जो थोड़ा बहुत रोजगार देगें भी वह भी पढ़े लिखे मध्यवर्ग के लिए आरक्षित होता है, न कि गांव के गरीबों के लिए। जहां-जहां सेज के लिए जमीनें ली गर्इं, उसके पीछे भी यह तर्क दिया गया कि इससे बड़ी संख्या में रोजगार का सृजन होगा। आज इसकी हकीकत भी सबके सामने आ चुकी है। सेज मजदूरों के लिए यातना गृह बन गए हैं। कई जगहों पर सरकार ने किसानों से जबरन ली गई जमीनों पर बड़े-बड़े शिक्षण संस्थान खोले गए। ये शिक्षण संस्थान देश के गरीब किसानों के बच्चों को किस तरह शिक्षित कर रहे हैं, यह जगजाहिर है। इनकी फीस ही लाखों रुपये में होती है। ऐसे में दिमाग मेंं यह बात सहज ही आती है कि आखिर सरकार किसे मूर्ख बना रही है। यही सवाल किसानों का भी है। जाहिर है इस तरह की नीतियां समाज में पहले ही मौजूद गैरबराबरी को और ज्यादा बढ़ाने का काम करेंगी। पूंजीपतियों के प्यार में अंधी हो चुकी सरकारों को सोचना चाहिए कि खेती किसानी लाभ के लिए नहीं है, वरन यह समाज की जरूरत है। इसे खत्म करके वे क्या इन सड़कों और बहुमंजिला भवनों को खाकर अपना पेट भरेंगे। आज पूंजीपतियों का यह वर्ग अपनी मूर्खता, अहंकार और तानाशाही के मामले में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है। आज वह इस तरह के सारे अनैतिक कामों को डंके की चोट पर कर रहा है। किसान अगर कहता है कि वह उसकी खेती-किसानी की जमीन को छोड़कर ऊसर, बंजर पड़ी जमीनों का अधिग्रहण करे, तो जैसे उसके अहं पर हथौड़ा चलने लगता है। वह आम लोगों को कुछ समझता ही नहीं। नतीजा यह होता है कि अपने अहं तुष्टि के लिए वह किसानों पर गोलियां चलवाता है, उनके ऊपर फर्जी मुकद्में दायर करता है यहां तक कभी-कभी वह अपने गुंडों तक को किसानों का दमन करने के लिए इस्तेमाल करता है, जैसा कि टप्पल के मामले में हुआ। आखिर जब कोर्ट, कचहरी, पुलिस और सबसे बड़ी बात सत्ता ही उसकी ही मुठ्ठी में हो, तो फिर ऐसे में अहं से भर जाना स्वाभाविक भी है। अपनी इसी मानसिकता का प्रदर्शन उसने नंदीग्राम, सिंगूर, टप्पल, कुशीनगर, नोएडा, ग्रेटर नोएडा आदि जगहों पर किया है और आगे भी अभी हजारों इलाकों में हम उसकी इस नंगई का प्रदर्शन देखेंगे। अगर सरकार ने किसानों से ली गई जमीनों कृषि आधारित उद्योग खड़ा किया होता या फिर सघन श्रम वाले उद्योग खोला होता, तो किसानों की ओर से इस स्तर का विरोध कभी नहीं होता। आखिर किसानों को भी अपने देश-समाज की तरक्की पसंद है, बल्कि सच कहा जाए तो इन पूंजीपतियों से कहीं ज्यादा ही। इसलिए अगर सरकार के अंदर जरा भी गैरत बाकी है, तो उसके सुधरने के लिए अभी भी वक्त है। उसे किसानों से अपनी गलती के लिए माफी मांगनी चाहिए। किसानों का दिल बहुत बड़ा है। आखिरकार वह सबका अन्नदाता जो है। वह अवश्य ही इन्हें माफ कर देगा। अगर वे आज ऐसा नहीं करते, तो यह निश्चित मानिए कि आज जो कुछ अरब में हो रहा है, वह सब हिंदुस्तान में भी दोहराया जाएगा।