Friday, April 22, 2011

ये जो जल रहा है दंदाकरान्य के जंगलों में
चन्द्रिका, दण्डकारण्य के गाँवों से लौटकर (तहलका के अप्रैल अंक में प्रकाशित रिपोर्ट)
उन दिनों मिस्र के लोगों के चेहरों पर गुलाबी खुशियां थी और लीबिया से बारूद की महक दुनिया के हर देश तक पहुंच रही थी. हमारा पूरा देश बैट और बल्लों के खेल में अपना स्वाभिमान जगा रहा था. देश भक्ति के मायने थे कि हर जीत के बाद जश्न मनाओ और उस हुजूम में शामिल हो जाओ. देश के अधिकांश बुद्धिजीवी लोकतंत्र की दुहाई देते हुए भारत में तहरीर चौक बनने की किसी भी संभावना से इनकार कर रहे थे और कर रहे हैं. जब उनके घरों में आग लगाई गई और उन्हें तबाह कर दिया गया. जब उन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश में आग की लपटों के बीच अपने घरों के जलाये जाने का बस कारण पूछ रही थी. उस ६ साल की बच्ची को पीटा गया जो इतने सारे घरों को पहली बार एक साथ जलता हुआ देख कर रोने की जुर्रत कर रही थी. शायद यह रुदन की भाषा में घरों को जलाए जाने का प्रतिकार रहा होगा या फिर कोई सवाल. शायद बच्चों को यह तजुर्बा नहीं होता कि उन्हें कहाँ नहीं रोना चाहिए, उन्हें सैन्य बलों के साथ सुलूक का तजुर्बा भी नहीं होता. एक बच्चे की आखों में २०७ घरों को जलाए जाने की दहशत शायद ही समा पाए. छत्तीसगढ़ के दान्तेवाड़ा जिले की दहशतगर्दी में बच्चों को रोने के लिये सैन्य बलों और सलवा-जुडुम की इजाजत चाहिए. समय के साथ वे सबकुछ सीख रहे हैं. लड़ना और पीड़ाओं से उबरना, जलना और राख की ढेर पर फिर से निर्मित हो जाना. आदिवासियों के ये गाँव पिछले कुछ सालों से सैन्य बलों के लिए बरसात के कुकुरमुत्ते हो गये हैं जो राख की ढेर पर उग आते हैं और सलवा-जुडुम के बूटों तले कुचल दिए जाते हैं. २००५ से एक अंतहीन सा सिलसिला जिसमे तकरीबन ६०० गाँव अब तक उजड़ चुके हैं. इनकी जिंदगियां इतनी मामूली हो चुकी हैं कि इक्का-दुक्का हत्यायें और मौतें रोज-बरोज के जिंदगी का हिस्सा सी बन गयी हैं. इन पर कोई नहीं रोता, इनके लिए आंसू चुक से गये हैं..

दान्तेवाड़ा जिले में कोया कमांडो (सलवा-जुडुम के कार्यकर्ताओं) द्वारा जलाये गये ३ गाँव जंगलों से उठकर अखबारों के पन्नों के मोटे शब्द बन गये, ये गाँव छत्तीसगढ़ की विधानसभा में विपक्ष का मुद्दा बन गये और विधान सभा कई दिनों तक ठप्प पड़ गयी. मोरपल्ली, तीपापुरम और ताड़मेटला कोया कमांडो और सैन्य बलों के संयुक्त आगजनी के अभियान में ११ मार्च १४ मार्च और १६ मार्च को तबाह कर दिए गए. इस दौरान और इसके बाद भी इन इलाकों की नाकेबंदी कर दी गयी. सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों तक के जाने पर रोक लगा दी गयी. लगातार माओवादियों के साथ मुठभेढ़ की भ्रामक खबर फैलाई जाती रही ताकि इस तबाही को अंजाम दिया जा सके और आग बुझने व राख उड़ने के साथ वह सब कुछ दफ्न हो जाए जो उत्पात के तौर पर यहाँ किया गया.

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कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ हम किसी तरह इन गाँवों तक पहुंचने में सफल हुए. तब स्वामी अग्निवेश के रोके जाने और उन पर हमले किए जाने की खबरे लगातार आ रही थी, हमारे मोबाइल के मैसेज बाक्स में. बाद में उन्हें दलील दी गयी कि जंगल में भारी मुठभेड़ चल रही है लिहाजा किसी के भी जाने पर मनाही है. जंगल के रास्तों से पूरे एक दिन चलते हुए दूसरी सुबह हम उस गाँव तक पहुंच पाए थे जहाँ सबसे ज्यादा घरों को जलाया गया था, यह था तारमेटला. इस पूरे एक दिन और एक रात हमारे पास कोई खबर नहीं पहुंची. अलबत्ता जंगलों के बीच एक गाँव में जहाँ हम रुके वहाँ रेडियो के जरिये हमे पता चला कि स्वामी अग्निवेश और कई पत्रकारों के ऊपर अंडे फेंके गए और उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया गया. जंगल के इन इलाकों में रेडियो के अलावा संचार का कोई स्रोत नहीं था. एकतरफा संचार, जो आपको खबरें दे सकता है आपकी खबर नहीं ले सकता, जो अपने रोमांटिक गीतों के बीच उनके रुदन के स्वरों को दबा देता है. दिल्ली से लेकर दुनिया भर की तमाम खबरों से ये आदिवासी इसी रेडियो के जरिये भिज्ञ थे और दिल्ली से लेकर दुनिया भर के तमाम लोग अपनी तमाम तकनीकों के साथ इनकी खबरों से अनभिज्ञ. इन इलाकों में सब कुछ एकतरफा ही था, सुरक्षा भी जो सरकार ने भारी सैन्य बलों की तैनाती के साथ दे रखी थी. अब हम उन असुरक्षित गाँवों से होकर गुजर रहे थे जिसे प्रधानमंत्री देश के सबसे बड़े खतरे के रूप में इंगित करते हैं. ये माओवादियों की जनताना सरकार के गाँव थे. जिसे गाँव के लोग इस रूप में सुरक्षित मान रहे थे कि दुश्मन यानि कि सैन्य बल यहाँ कभी नहीं आ सकते. माओवादी यहाँ १९८० में पहली बार आये थे, शायद १९४७ से १९८० का लम्बा समय यहाँ के आदिवासियों ने भारतीय राज्य के आश और इंतज़ार में गुज़ारे थे.


जंगल की अंधेरी रातों के बीच गाँव होने का मतलब था, किसी सोलर लाइट की रोशनी, किसी बकरी की मिमियाहट, किसी मुर्गे के पंखों की फड़फड़ाहट. हम अपने रास्ते के दौरान कई गाँवों में रुके जो गोंडी आदिवासियों के मुरिया, कोया, राऊत समुदाय के गाँव होते थे. गाँव के किसी कोने पर खड़े होकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता कि गाँव में कितने घर हैं. वे खूबसूरत ऊची तिकोनी झोपडियों के बने होते और उनकी दीवालें लकड़ियों से बनाई हुई होती. घर काफी दूर-दूर तक बिखरे हुए होते और हर गाँव के अंत में प्रायः किसी माओवादी नेता या माओवादी सदस्य की शहादत के स्तूपम बने होते. लाल रंगों के स्तूपम, जिनमे शहीद होने वाले व्यक्तियों के नाम और उनके लिये सलाम के नारे होते. एक गाँव से गुजरते हुए हमने देखा कि माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो चेराकुरी राजकुमार आज़ाद का एक बड़ा स्तूपम बनाया गया था जिसे गाँव वालों ने मिलकर अभी हाल में ही तैयार किया था और उसके आसपास निर्माण प्रक्रिया के दौरान प्रयोग की गयी लकड़ियां अभी भी बिखरी हुई थी. उन्हें एक आदर्श नेता के रूप में सम्बोधित करते हुए लाल सलाम के नारे लिखे गये थे. आदिवासियों के इन गाँवों में यह एक परम्परा सी बन गयी है जिसमे गाँव के लोग शहादत के स्तूपम बनाते हैं और उसे संरक्षित भी करते है.

इन रास्तों से गुजरते हुए हमने कई कहानियां सुनी, वे कहानियाँ जो वर्षों पहले बीत चुकी हैं, कुछ अफसोसों के साथ. वो कहानियां जिनमे गांव लुटने के बाद फिर संवर चुके हैं, कहानियां जिनमे हत्याओं की दहशत और पीड़ा लोगों के चेहरे से उतर चुकी है और वे कहानिया भी जो कुछ बुजुर्गों की आंखों में अब भी बची हुई हैं, किसी पुरानी शिकार यात्रा की याद की तरह. कुंजाम बुधरी के पास बीते पैसठ सालों के किस्से हैं पर हमारे पास वक्त ही नहीं. देवा अपने २५ साल के नौजवान बेटे की हत्या को आधा ही बता पाते हैं....बाकी में खामोशी है. सोड़ी दीपक को अपनी उम्र का पता नहीं वे खुद को आपके सामने पेश करते हैं और कहते हैं आप खुद ही देख लो. गाँव के बच्चे आपको अचकचाई नजरों से देख रहे होते हैं और आपके तौर तरीकों पर हस रहे होते हैं.

उस सुबह हम ताड़मेटला गाँव में थे जहाँ बस घरों के दीवालों की मौजूदगी थी और आगजनी के कारण उन पर कालिख लिपट गयी थी. यह गोंडी आदिवासियों के मुरिया समुदाय का गाँव है. सोड़ी भीमा अपने जले हुए घर की लकड़ियां इकट्ठा कर रहे थे. हमे देखकर वे थोड़ी देर ठिठक गये, चुप रहे और फिर से अपने काम में जुट गये. हमने उनसे बात करने का प्रयास किया और वे अपने जले हुए घर की तरफ इशार करते हुए गोंडी मे देर तक कुछ बोलते रहे. उन्होंने हमे इशारा करते हुए घर के अंदर बुलाया, अंदर का मतलब उन जली हुई लकड़ियों और राख के ढेरों से था जिनके चारो तरफ दीवालों के महज निशान ही बचे हुए थे. जहाँ कुछ जले हुए बर्तन थे जो आधे पिघल से गये थे. एक टूटी हुई सायकिल उतनी ही बची थी जितना उसमे जलने के बाद बच जाना चाहिए. सोड़ी भीमा की आवाज कभी तेज तो कभी धीमी हो जाती जैसे उनकी आंखों की त्योरियों में कुछ उबल सा रहा हो. कोई आदमी पाकृतिक आपदाओं से मानसिक तौर पर शायद जल्दी उबर जाता हो पर मानवीय उपद्रव, सरकार की संरक्षण में किया गया उपद्रव, शायद उसमे बदले की भावना ही पैदा करता है. वे गुस्से में लगातार बोलते रहे. पास में खड़े एक व्यक्ति ने हमे हिन्दी में बताने का प्रयास किया भीमा कह रहे थे कि उनका पूरा साल भर का अनाज यहाँ रखा था जो जल गया. वे बता रहे थे कि १६ तारीख की सुबह जब लोग अपने घरों को बुहार रहे थे, जब लोग महुआ बीनने की तैयारी में थे और कुछ तो अभी सोकर उठे भी नहीं थे, ३०० की संख्या में सी.आर.पी.एफ. और कोया कमांडो आये. पहले उन्होंने हवा में फायरिंग की लोग डर के मारे अपने घरों से भागे और वे एक-एक कर गाँव के घरों को जलाते रहे. उन्होंने मेरा भी घर जला दिया आखिर हमारे गाँव वालों ने कोया कमांडो का क्या बिगाड़ा था.


माड़वी जोगी की आंखों में आंसू थे और कुछ भी बोलते हुए उनके होठ कंप रहे थे जैसे वो कोई इल्जाम कुबूल कर रही हो. शायद घरों को जलाने का कारण पूछना ही उनका इल्जाम था. उनके चेहरे पर घाव के निशान कुछ दिन पुराने और बासी से हो गये थे और पूरा चेहरा दर्द से फूल गया था. उनसे बात करते हुए ऐसा लगा जैसे हम फिर से उनके घावों को कुरेद रहे हो और हम ना को जानने के लिये शायद ऐसा कर भी रहे थे. यह उनके घर जलाने और पैसे लूटे जाने के मनाही का अंजाम था. जब घरों को जलाया जाने लगा तो वे जंगल में भागने के बजाय आगजनी का प्रतिकार करने लगी. पहले उन्हें बंदूक के बाटम से पीटा गया, उन्हें धक्के देकर जमीन पर गिरा दिया गया और फिर.....फिर वे चुप हो गई. वह बताने में माड़वी जोगी अक्षम हो गयी जो उनके साथ हुआ था. बाकी की कहानी किसी और को ही बतानी पड़ी कि कैसे उन्हें बगल के झाड़ी में ऊपर की तरफ ले जाया गया और बलात्कार किया गया. कुछ घटनाओं के एहसास एक शब्द में अपनी अहमियत नहीं दे पाते. बीतते दिनों के साथ वे चेहरे पर भी कमजोर से पड़ जाते हैं. एक शब्द को कहते हुए साहस चुक सा जाता है, यह भाषा की नाइंसाफी होती है जो तमाम पीड़ाओं की बयानगी को एक साथ तो रख देती है पर उन तकलीफों को कहीं कमजोर सा बनाती हुई. कई घंटों तक वे वहाँ बेसुध पड़ी रही. पूरे गाँव का हर सख्श अपने ही घर की तबाही से बदहवास और हैरान था बाद में लक्के जो माड़वी जोगी की बहन थी उसने उसे कपड़ा पहनाया और वहाँ से लेकर आयी. अभी तक माड़वी जोगी को न तो कोई चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध हो पायी है और न ही किसी तरह की रिपोर्ट दर्ज की गयी.

इस गाँव से माड़वी आयता और माड़वी अंदा दो लोगों को सैन्य बल साथ लेकर गये तब से अब तक उनका कोई पता नहीं चला है. ९०० की आबादी वाले इस गाँव में कुल १५० के आसपास ही लोग हमे दिख रहे थे बाकी जंगलों में इधर-उधर चले गये हैं. शायद वे अब तक लौट आये हों या शायद न लौटने का इरादा बना लिया हो. ताड़मेटला गाँव में सरकारी राहत के तौर पर कुछ चावल भेज दिया गया है. इस चावल के सहारे इन आदिवासियों को अपनी भूख मिटानी है, अपना क्रोध मिटाना है और भुलाना है अपना पूरा का पूरा दर्द भी. ६ साल की बच्ची मड़वी भीमे तक को पीटा गया हम गाँव में उसकी तलाश कर रहे थे पर वह नहीं मिल सकी. लोगों ने बताया कि उसे सिर्फ इसलिए पीटा गया कि वह अकेली घर के बाहर खड़ी होकर रो रही थी. इसके पहले भी सलवा-जुडुम द्वारा २००९ में ताड़मेटला के कुछ घरों में आग लगाई जा चुकी है. कुछ लोग फिर से अपने घरों को बनाने के बारे में सोच रहे हैं और कुछ जिंदा रहने के लिए भूख की जरूरतों के बारे में. गाँव के बीचोबीच गाँव वालों के सहयोग से माओवादियों ने एक तालाब बनवाया है और सरकार ने इनकी झोपड़ियों के लिये आग, आखिर इन्हें किधर कूदना चाहिये. सोड़ी भीमा, गोंचे भीमा, मिड़ियम आयता, ताती अड़मा, एलमा देवा, लेकम उंगा ये सब इमली के एक पेड़ के नीचे इकट्ठा होकर शायद ऐसा ही कुछ सोच रहे थे. एस.डी.एम. आकर जा चुके हैं उन्होंने लिस्ट बनाने को कहा है और यह भी कि वे नुकसान की पूरी भरपाई करेंगे. भरपाई पीड़ाओं की, दुखों की, त्रासदी की तरह बीत रहे समय की और उसकी भी जो माड़वी जोगी के साथ हुआ.

मोरपल्ली गाँव के ३३ घरों को ११ मार्च को ही जला दिया गया. इन तीन गाँवों को जलाने की शुरुआत इसी गाँव से हुई. गाँवों

में लगाई गयी आग और जले हुए घरों की शक्ल के अलावा भी इसकी कुछ अलग कहानी है. ११ मार्च की सुबह पहले इस गाँव को लूटा गया. आदिवासी समाज में लुटने के लिये बत्तखे होती हैं, बकरियाँ होती हैं और मुर्गे इसके अलावा थोड़े बहुत पैसे जिसे वे अपने साथ ही लेकर चलते हैं. यह लूट कर जब सलवा-जुडुम (कोया कमांडो) के लोग जा रहे थे तो गाँव से १ किमी. की दूरी पर माओवादियों ने इस लूट के विरुद्ध उन पर हमला कर दिया. गाँव के लोगों ने बताया कि इस कुछ घंटे की कार्यवाही के दौरान ३ कोया कमांडो मारे गये और ९ धायल हुए. इस घटना में सुदर्शन नाम से एक माओवादी की भी मौत हुई और दो माओवादी जिसमे एक महिला भी शामिल है घायल हुए. तेरह मार्च के अखबारों में ३२ माओवादियों के मारे जाने की यही खबर थी. एक माओवादी के मारे जाने को ३२ की संख्या बताई गयी. गाँव के लोगों का कहना था कि मारे गये कोया कमांडो में एक महत्वपूर्ण लीडर भी मारा गया, इसके बाद लगातार इन गाँवों पर हमले किए गये. ३२ माओवादियों के मारे जाने की खबर और लगातार चल रही मुठभेढ़ की भ्रामकता ने इस इलाके की नाकेबंदी करने में मदद की ताकि गाँवों में आगजनी और तबाही को अंजाम दिया जा सके. चिंतलनार के निकट पोलमपल्ली गाँव में लगातार हवाई फायरिंग की जाती रही ताकि यह दर्शाया जा सके कि मुठभेड़ चल रही है और पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इस बिना पर रोक दिया गया यहाँ तक कि स्थानीय प्रशासन को भी. किसी भी तरह की राहत सामाग्री नहीं पहुंचाई जा सकी. यह बताया गया कि माओवादियों ने आगे के रास्तों पर बम बिछा रखा है. मोरपल्ली में एमला गुडे और माडवी गुडे के साथ बलात्कार किया गया. माड़वी सुले जो आगजनी के भय से भागकर एक इमली के पेड़ पर चढ़ गये थे उन्हें पेड़ पर ही गोली मार दी गयी. अंदाजा लगाया जा सकता है एक चिड़िया के शिकार की तरह रहा होगा यह वाकिया. इसके पहले २००७ में मोरपल्ली के ५० से अधिक घरों को सलवा-जुडुम द्वारा जलाया गया था और अब जबकि गाँव के लोग फिर से जीने की मूलभूत जरूरतों को जुटा चुके थे और जुटा रहे थे इन्हें सलवा-जुडुम की तबाही का एक और मंजर देखना पड़ा. एलमा गुडे की उम्र तीस साल है. जब उनको पकड़ कर उनके साथ बलात्कार किया गया तो वे महुवा बीन कर लौट रही थी. माड़वी लके को उनके पिता माड़वी जोगा और भाई माड़वी भीमा के साथ चिंतलनार स्टेशन ले जाया गया. इसका महज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब लके के साथ बलात्कार किया जा रहा था तो बगल की कोठरी में भाई और पिता उसकी चीखने की आवाजें सुन रहे थे, बेबस और निःशब्द होकर या शायद भय और विभत्सता में उन्होंने इन चीखती आवाजों को मंजूर कर लिया हो. दूसरी सुबह लके को निरवस्त्र अवस्था में ही पिता और भाई के हाथ सौप दिया गया. जहाँ से गांव तक वह उसी स्थिति में आने को मजबूर थी. गाँव के लोग हमे आगजनी करने वाले लोगों के नाम गिना रहे थे और उनके गाँव भी. दण्डकारन्य के इस इलाके में दूर-दूर तक फैले आदिवासी गाँवों में सब एक दूसरे को जानते हैं. इन गाँवों तक पहुंचने का कोई एक रास्ता नहीं होता, दिशाएं होती हैं और सूखी हुई पत्तियों के नीचे एक लकीर जिनके सहारे जंगल की झाड़ियां और छोटे पहाड़ों को पार करते हुए दूसरे गाँव तक पहुंचा जा सकता है. यह एक कठिन डगर है किसी बाहरी व्यक्ति के पहुंचने पर ग्राम कमेटी के लोग उसकी तफ्सीस करते हैं और लगातार संदिग्ध निगाहों से उसे परखते हैं. रात के वक्त कुछ टार्चें आपके नजदीक आती हैं, अपने कंधों पर रेडियो टांगे एक बच्चे को गोंद में उठाये और वे आपसे वाकिफ होते हैं. दरअसल यह माओवादियों की इंटेलीजेंसिया है जो बच्चे के रूप में, किसी बूढ़े के रूप में या फिर किसी नवजवान के रूप में आपसे मुलाकात करती है. गाँवों में घूमते हुए हमने माओवादियों के वे पर्चे भी प्राप्त किये जिसमे इस घटना की निंदा की गयी थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से इसे उजागर करने की अपील की गयी थी. तीन गाँवों का जिक्र करते हुए वह चौथा गाँव छूट जाता है जहाँ से बाड़से भीमा को लाकर तीमापुरम में १३ मार्च को काट दिया गया था. उन्हें पुल्लमपाड़ से लाया गया था. मोरपल्ली में आगजनी के वे चश्मदीद गवाह थे और सलवा-जुडुम के पूरी तरह से खिलाफ. लिहाजा उन्हें सिर्फ जिंदगी से ही हाथ नहीं धोना पड़ा बल्कि उनके अंगों को विभत्स तरीके से काटा गया. बाड़से भीमा की हत्या के पहले ही गाँव के लोग घर छोड़कर भाग गये और ३३ घरों को कोया कमांडो ने आग के हवाले कर दिया. मिसमा गाँव के करतम दुला, चरकाम गाँव के वंजम देवा, जगन्ना गुड़ा गाँव से रमेश और न जाने कितने नामों को गाँव वाले बता रहे थे, ये उनके नाम थे जो आगजनी करने में शामिल थे. तारमेटला के अलावा मोरपल्ली और तीमापुरम में अभी तक कोई राहत सामाग्री सरकार द्वारा नहीं पहुंचाई जा सकी. गाँव के लोगों ने बताया कि माओवादियों की जनताना सरकार की तरफ से हर घर को १००० रूपए और कुछ अनाज तेल दिया गया है जिसके सहारे वे पेड़ों के नीचे अपना पेट भरते हुए, अपने जले हुए घरों को फिर से ठीक करने को सोच रहे हैं.

जब राज्य अपनी बनायी हुई संस्थाओं यहाँ तक कि सर्वोच्च संस्थाओं से मुंह मोड़ ले, उसके आदेशों की अवहेलना करे तो शायद लोगों के बीच उसकी वैधता खो ही जानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों सलवा-जुडुम को बंद
करने का आदेश दिया पर वह जारी है. सर्वोच्च न्यायालय ने सैन्य बलों के कैम्प के रूप में प्रयुक्त किए जा रहे स्कूलों को खाली करने का आदेश दिया उसे अभी तक लागू नही किया गया. माओवादियों के उन्मूलन के लिए ९० के दशक से अब तक कई प्रयोग किए जा चुके हैं जो विफल रहे हैं. जन जागरण के नाम पर, शांति अभियानों के नाम पर. पुलिस यहाँ स्कूल अध्यापक बन कर आती, माओवादी दलम की शक्ल में वह घूमती और आदिवासियों के साथ जमीन पर बैठकर माओवादियों जैसा व्यवहार करती. पर यह सब, कुछ दिन ही चल सका बाद में गाँव वालों द्वारा उन्हें पहचान लिया गया और पुलिस को वहाँ से भागना पड़ा. दण्डकारन्य एक नाटक के मंच सा हो गया जहाँ सबकुछ वास्तविक रूप में खेला जा रहा है. हत्या के बाद वहाँ कोई पात्र उठकर अपने कपड़े नहीं बदलता, घटनाओं की जगह और शक्ल बदल जाती है हर बार वे और बढ़ जाती हैं. एक कहानी जो लंबे समय से किसी खेल की तरह आदिवासियों के साथ खेली जा रही है. साल, दिन और मौसम बदल रहे हैं, जिंदगियां यहाँ ठहर सी गयी हैं, पुरानी दहशतों को याद करती हुई और नये दहशतों के इंतजार में.
सम्पर्क- 9890987458, mail- chandrika.media@gmail.com
The Anna Hazare Scam
by Analytical Monthly Review

Analytical Monthly Review, published in Kharagpur, West Bengal, India, is a sister edition of Monthly Review. Its April 2011 issue features the following editorial. -- Ed.

In the last weeks we have had an illuminating example of how a thoroughly corrupt regime can manipulate a thoroughly pliable media. One can hope that in time we will see some careful academic examinations of how Anna Hazare was put to use by the Manmohan Singh/Chidambaram regime in late March and early April of 2011. It is too soon to speculate how long the Anna Hazare Scam will succeed in its goal of diverting outrage at the rising exposure of crimes at the highest level of government. With Anna Hazare on the scene, supposedly now all will be well. But already by the second week in April the "non-political Gandhian social activist" gives off a stench in the embrace of the blood-soaked Narendra Modi, and well-meaning persons momentarily caught up by the media frenzy may be experiencing a bit of disgust, or at least having some second thoughts.

Before the onset of the neoliberal regime in 1991, "anti-corruption" campaigns were a regular project of the business press. Typically such reporting would involve a hero from a merchants' association, who had succeeded in trapping into a bribery case some sub-inspector from the State Excise Department or the Railway Protection Force, or some hapless underpaid official of the local Municipal Corporation. The steady drumbeat of such stories, combined with what everyone knew of the entrenched culture of real political corruption, contributed to the media campaign that accompanied the turn to neoliberalism. In this story, the obstacle to development was the "license raj" that opened up prospects for such "corruption."

No sooner had the turn to "de-regulation" and "economic freedom" been set in motion by a government that featured Manmohan Singh as finance minister and Chidambaram as commerce minister, than we were given a startling glance at the real corruption waiting in the wings. The early days of the neoliberal turn was accompanied by a stock market boom. As we have since seen ad nauseum, the business press loudly celebrated with drums and bells the rise in share prices, a proof of success for the emerging neoliberal policies. Super-stockbroker Harshad Mehta was made into a media star, the "Big Bull".

But quickly, as with every boom since, came the bust. By the summer of 1992 it became known that Harshad Mehta had engineered much of the rise in prices through fraud. The mechanism was simple enough. Agreements to sell and repurchase securities at a higher price after a period of time ("repos") are among the leading options open to banks in their dealings with each other. At the time such dealings were done through broker intermediaries. The securities did not actually change hands, rather a "bank receipt" assured the purchasing (or lending) bank that the securities existed, and on its receipt the broker was furnished with the cash. Harshad Mehta found some banks willing to issue bank receipts on non-existent securities for payment of a fee. The cash was then invested in securities, and since prices were going up the "repurchase" was easily accomplished, leaving a growing sum of money in the hands of Harshad Mehta and his backers. When the scam was exposed and prices collapsed, among the victims was president of Vijaya Bank, who committed suicide. In this single scam, a harbinger of what was to come, surely more money was lost than in a decade or more of all the "license raj" sub-inspectors' bribes put together.

It developed that among the investors in the Harshad Mehta group was none other than commerce minister Chidambaram, through an investment in the name of his wife. And it further developed that the shares had been acquired at a "promoters' price" -- a small fraction of the then market price. Chidambaram resigned in disgrace, but no CBI probe took place. When a petition for such a probe was presented, Chidambaram was successfully represented by lawyer Arun Jaitley, then BJP leader of the opposition in the Rajya Sabha. Between the Chidambarams and Jaitleys there has never been any political difference as to what really matters.

The Harshad Mehta Scam proved to be the model for the ensuing decades of neoliberal corruption. Indeed one year ago Shashi Tharoor was forced to resign in disgrace as minister of state for external affairs, having acquired shares at far below market prices in the name of a "friend", exactly following the well established Chidambaram script down to the detail that no subsequent investigation was permitted to take place.

During these many years of successive and ever larger "free market" thefts and scams, the business press and the regime have worked out the Public Relations means of deflecting attention. As with Chidambaram, and most probably the equally arrogant U.S. trained Tharoor, the resignation at the height of the scandal will insure that it is short-lived, time will pass and the tainted figure can re-emerge to boast of the glories of the ever efficient "free market" -- and the business press can be relied upon not to refresh the public's memory.

A useful distraction from the first has been "anti-corruption" campaigns of the old style, aimed at the petty oppressors of small businessmen. A mere temporal coincidence in some sense, but not in others, the BVA ("People's Movement against Corruption") was launched in Maharashtra in 1991 by one Anna Hazare. A retired soldier, he had appeared in rural Maharashtra during Emergency and organised anti-alcohol vigilante groups, given to mob violence and the flogging of drinkers and drink sellers. This "non-political Gandhian" expanded his activities with NGO funding of a "model village", promising "non-political" solutions to growing rural unrest. Following the time-tested script, the "People's Movement against Corruption" targeted such minor figures as sub-inspectors in the forest department, and proved skilled in its ability to gain press attention.

A relentless attention seeker, Hazare developed the tactic of announcing "fast unto death" that always seemed to end after a few days with press releases announcing a marvelous success. A 2003 "fast unto death" ended with the announcement of an investigation of his charges against local politicians in Maharashtra. A 2006 "fast unto death" against a proposed amendment to the Right to Information Act 2005, ended after some days with a press release when the amendment was modified.

In early 2011 the Manmohan Singh regime was reeling from the revelations of ever more immense corruption involving Union ministers -- and the business press -- on a scale never before seen. The 2G Scam, involving resigned Union communications minister Andimuthu Raja, is believed to have cost the nation tens of thousands of crores, or more! Hazare, who had not managed to catch the public eye for some time, announced his intention to "fast unto death" unless a bill was drawn to create some investigatory authority. But in the crush of other more interesting news, from Japan earthquake to Arab revolts to cricket matches, Hazare was largely ignored.

Then on March 17, The Hindu published an account of secret cable #162458 sent by the U.S. embassy to the U.S. State Department on July 17, 2008, days before the Lok Sabha vote of confidence on the nuclear deal. As we now all know, the U.S. embassy's political counselor reported having been shown, by a political aide to Congress leader Satish Sharma, "two chests containing cash" that he was told was part of a fund of 50 to 60 crore Rs. that the party had put together to buy votes. Details of the vote buying scheme were set out in the cable, and evidently involved the entire regime, from the top down.

Even for the most gullible and trusting, a line had been crossed. Despite all desperate efforts coming from the regime, including a flat denial from Manmohan Singh himself, there is no credible reason why the U.S. embassy should mislead the State Department.

The verdict on the Manmohan Singh-Chidambaram regime is rendered. From its origin in the days of Harshad Mehta, through the ever increasing series of thefts and corruption up to the most recent and vast 2G scam, and now with proof of their successful corruption of what remains of Indian democracy, combined with proof of lickspittle servility to their U.S. masters, an honest future shall turn away from the memory of this crew in disgust.

But they still rule, and they still have the business press, and they still have vast amounts of money, and they still have the best Public Relations experts that can be rented on the "free market".

And so we now have the Anna Hazare Scam. Between March 14th and March 22nd, 2011, a search in GoogleNews limited to Indian sources yields a total of three (3) articles that mention his name. On Wednesday, March 23rd, Anna Hazare announced that the Prime Minister's Office had that very day called him. The Prime Minister's Office said they would enter into negotiations with Hazare about the "Lokpal" bill, the "anti-corruption" legislation he was demanding on pain of yet another "fast unto death". From March 24th through 31st a search on GoogleNews limited to Indian sources yields a total of four thousand two hundred and eighty-one (4,281) articles that mention his name. And then in April the final act played out in a non-stop media frenzy. The performance featured a few days of "fast unto death", appeals from Sonia Gandhi and various Bollywood personalities, and then the regime "gives in" and agrees to form a commission and pass anti-corruption legislation, and so on.

So let us make one point as clearly as we can: the regime did not "give in" to mass pressure caused by the latest Anna Hazare "fast unto death". No-one was paying any attention to this smug "Gandhian non-political" self-promoting voice of "civil society" and "fast unto death" publicity artist until the Prime Minister's Office called him. The regime created the publicity storm in order to give in to it.

It has been difficult to view the mass media during this period without gagging. But even the best of arranged scams eventually unwind, and this one is coming apart already. One cannot imagine that those well-meaning people who fell for the arranged media furor, Medha Patkar and Swami Agnivesh for two, are feeling very comfortable in the arms -- one degree removed -- of Narendra Modi.

So let us return to some basics. In the world of Manmohan Singh and Chidambaram and their U.S. masters, the only crimes are to be poor and -- especially -- to resist the rule of the rich. Everything is for sale in the "free market" and that includes: the votes of MPs, the mass media, Union ministers, "justice", "democracy", "civil society" and "Gandhian non-political social activists". The Anna Hazare Scam worked for the moment precisely because there are still many decent people who want to believe that this system can, despite the overwhelming evidence, be reformed by commissions and legislation. Our advice? Wake up, face facts, and do not permit yourself to be manipulated by the Public Relations wizards of the PMO and the mass media. Things have gone far past reformation by commissions and legislation, the regime is rotten to the core.

Friday, April 15, 2011


Sharmila accuses Centre of “double standards”

Irom Sharmila

IMPHAL: Irom Sharmila, who has been on a fast-unto-death since November 2, 2000 demanding the repeal of the Armed Forces (Special Powers) Act (AFSPA), 1958, has charged the Government of India with adopting “double standards.” She pointed out that the Centre had yielded to the demands of social activist Anna Hazare on the Lokpal Bill after he had been on hunger strike for only five days. Ms. Sharmila was produced in the court of the chief judicial magistrate, Imphal East for further judicial remand. She said despite Prime Minister Manmohan Singh himself terming the AFSPA a draconian law, the Centre had been turning a blind eye to her campaign. She recalled that a commission headed by Justice Jeevan Reddy had recommended the repeal of the Act. Ms. Sharmila, who said she would continue the fast, has been arrested and detained under Section 309 of the IPC (attempt to commit suicide).

Treated as criminal

Sobita Mangsatabam, an activist, said that while Mr. Hazare was lionised Ms. Sharmila was treated as a criminal. The relay hunger strike by women activists of the “Save Sharmila Group” crossed 1,000 days recently.

Sabhar: Hindu

Friday, April 8, 2011

दशरथ मांझी का सपना


पहाड़ का सीना चीर कर बीस फुट चौड़ा और आठ सौ साठ फुट लंबा रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी के परिवार एवं उनके गांव गहलौर की तस्वीर सरकार के लाख आश्वासनों-दावों के बावजूद आज भी वैसी है, जैसी तब थी, जब माउंटेन मैन ने अंतिम सांस ली. महादलितों की हमदर्द इस सरकार में कुछ नहीं बदला. न तो गांव की तस्वीर और न ही दशरथ मांझी के परिवार की क़िस्मत. सरकारी आश्वासन, घोषणा और वादे सब कुछ इस महादलित बस्ती के लिए खोखले साबित हुए हैं. माउंटेन मैन दशरथ मांझी के विकलांग पुत्र भगीरथ मांझी एवं विकलांग पुत्रवधू बसंती देवी आम महादलित परिवारों की तरह का़फी कठिनाई में छोटे से परिवार के साथ किसी तरह जीवनयापन के लिए मजबूर हैं. इस गांव में आने पर नहीं लगता है कि ह वही गांव है, जहां ’ज़दूर मंगरू मांझी एवं पतिया देवी की संतान दशरथ मांझी ने पहाड़ का सीना चीरकर इतिहास रच दिया.
दशरथ मांझी का सपना था कि जिस पहाड़ी को तोड़कर उन्होंने वजीरगंज और अतरी प्रखंड की दूरी अस्सी किलोमीटर से घटाकर चौदह किलोमीटर कर दी, उस रास्ते का सरकार पक्कीकरण कर दे.
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित अन्य दलित और महादलित बस्तियों की तरह है, गया ज़िले के मोहड़ा प्रखंड के गहलौर गांव का महादलित टोला दशरथ नगर. सुविधाओं के नाम पर दशरथ मांझी के निधन के बाद हां एक चापाकल लगा और एक छोटे से सामुदायिक भवन का निर्माण शुरू किया गया, जिसमें सामुदायिक भवन आज भी अधूरा पड़ा है. सरकारीकर्मियों की लूटखसोट और लापरवाही का नमूना है यह गांव. नरेगा में गड़बड़ी, बीपीएल सूची अनाज वितरण में अनियमितता, प्राथमिक विद्यालय में सप्ताह में सिर्फ दो-तीन दिन ही शिक्षकों का आना, आंगनबाड़ी केंद्र का न होना आदि शिकायतें पूर्व की तरह ही विद्यमान हैं.
इसी माहौल में जी रहे हैं दशरथ मांझी के विकलांग पुत्र एवं पुत्रवधू अपनी एकमात्र संतान लक्ष्मी कुमारी के साथ. आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली लक्ष्मी ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा है. वह मेहनत-मज़दूरी कर कमाती है, तो उसके विकलांग मां-बाप को रोटी नसीब होती है. सरकारी योजनाओं के अनुसार भगीरथ मांझी को दशरथ मांझी के जीवित रहने के समय से ही विकलांग होने के कारण सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिल रही है, लेकिन उनकी विकलांग पत्नी बसंती देवी को तमाम प्रयासों के बावजूद आज तक पेंशन नहीं मिल सकी. किसी तरह इंदिरा आवास मिला, जो उनके रहने का सहारा है. दशरथ मांझी के घर के बगल में स्थित प्राथमिक विद्यालय में भगीरथ मांझी एवं उनकी पत्नी बच्चों के लिए खिचड़ी बनाने का काम कर लेते हैं, जिससे प्रतिदिन दोनों को पचास रुपये मिल जाते हैं. बसंती देवी बताती हैं कि सप्ताह में तीन दिन ही मास्टर जी आते हैं, जिसके कारण तीन दिन ही खाना बन पाता है. भगीरथ मांझी बताते हैं कि सभी सरकारी घोषणाएं हवा-हवाई हो गईं. विकलांग होने के कारण वे लोग बहुत अधिक दौड़धूप नहीं कर पाते हैं. जब कभी भी सरकारी अधिकारियों से मुलाक़ात होती है, तो वह बाबा दशरथ मांझी के अधूरे सपने को पूरा करने के सरकार के वादे के बारे में पूछते ज़रूर हैं, लेकिन उन्हें सही जवाब नहीं मिल पाता. वैसे भी सुदूर पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण कभीकभार ही सरकारी कर्मचारियों का वहां आना-जाना होता है. नतीजतन, इस गांव के खुफिया और जन वितरण प्रणाली दुकानदार मनमानी कर महादलित परिवारों के इन ग़रीबों का शोषण करने से नहीं चूकते हैं. इसी गांव में रहता है दशरथ मांझी की विधवा पुत्री लौंगी देवी का परिवार. दशरथ मांझी के घरवालों के मतदाता पहचान पत्र आज तक नहीं बन पाए हैं. जबकि प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा समिति की सचिव बसंती देवी ही हैं. वह बताती हैं कि इस विद्यालय में डेढ़ सौ बच्चों को पढ़ाने वाले एकमात्र शिक्षक स्थानीय गहलौर के मुरली मनोहर पांडेय हैं. उन्हें 2006 से अब तक शिक्षा समिति के खाते से दो लाख से अधिक रुपये निकालकर दे चुकी हूं, लेकिन आज तक विद्यालय में विकास का कोई काम नहीं हुआ और न ही शिक्षक ने कोई हिसाब-किताब शिक्षा समिति को दिया है. वह बताती हैं कि दशरथ मांझी की पुत्री लौंगी देवी को अब तक इंदिरा आवास का दस हज़ार रुपया नहीं मिला है. इस गांव के अन्य महादलित परिवार बताते हैं कि जन वितरण प्रणाली का दुकानदार गहलौर गांव के एक संपन्न परिवार के दरवाजे पर दो-तीन महीने में एक महीने का अनाज बांटने आता है और तीन-चार महीने के कूपन ले लेता है. कुल मिलाकर दशरथ मांझी के परिवार और उनके महादलित टोले के लोग आज भी बदहाल हैं और का़फी मशक़्क़त से जीवन जी रहे हैं.
अब बात दशरथ मांझी के सपनों की. उनका सपना था कि जिस पहाड़ी को तोड़कर उन्होंने वजीरगंज और अतरी प्रखंड की दूरी अस्सी किलोमीटर से घटाकर चौदह किलोमीटर कर दी, उस रास्ते का सरकार पक्कीकरण कर दे. गांव में चिकित्सा सुविधा के लिए अस्पताल और एक अच्छे विद्यालय की व्यवस्था हो. साथ ही आरोपुर गांव में यातायात की सुविधा के लिए मुंगरा नदी पर पुल बनाया जाए. अपने इन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए दशरथ मांझी अनेक जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाते हुए मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के हां पहुंचे थे, जहां मुख्‍यमंत्री ने अपनी कुर्सी पर बैठाकर इस महान पुरुष को सम्मान दिया था. आज दशरथ मांझी को ग़ुजरे ढाई वर्ष से अधिक हो गए, पर अभी तक कोई मुक़म्मल कार्य नहीं हुआ. अभी गहलौर घाटी से कुछ दूरी पर रइदी मांझी, सुकर दास, विश्वंभर मांझी द्वारा दी गई भूमि पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के निर्यण के लिए काम शुरू किया गया है, लेकिन घाटी की पहाड़ी पर सड़क निर्माण के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है. गांव के एकमात्र प्राथमिक विद्यालय की स्थिति का़फी खराब है. डेढ़ सौ बच्चों पर केवल एक शिक्षामित्र है. इतना ज़रूर हुआ है कि दशरथ मांझी द्वारा पहाड़ तोड़कर बनाए गए रास्ते के प्रवेश स्थल पर उनके स्मारक का काम पूरा हो चुका है. गहलौर होकर अतरी की ओर जाने वाली मुख्य सड़क में काम मंथर गति से हो रहा है. मुंगरा नदी पर पुल बनाने का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है. इस प्रकार दशरथ मांझी के सपनों का गहलौर आज भी उपेक्षित और बदहाल है. अब दशरथ मांझी की संवेदनशीलता का भी उदाहरण देखिए, जब भारतीय स्टेट बैंक की वजीरगंज शाखा ने दशरथ मांझी को 2005 में सम्मानित करते हुए उपहार स्वरूप एक कंप्यूटर भेंट किया, तब दशरथ मांझी ने यह कहकर कंप्यूटर वापस कर दिया कि मैं इसका क्या करूंगा? इसके बदले हमारे गांव में रिंग बोरिंग करवाकर सार्वजनिक चापाकल लगवा दीजिए, जिससे लोगों और जानवरों को पेजल की सुविधा मिल सके. कंप्यूटर आज भी बैंक की शोभा बढ़ा रहा है, लेकिन बैंक ने चापाकल लगाना उचित नहीं समझा. दशरथ मांझी ने मज़दूरी करके परिवार की जीविका चलाते हुए जिस बिहारी आत्मसम्मान, कर्मठता, सहजता, विनम‘ता और गरिमा का परिचय दिया, वह किसी भी व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है. रेल पटरी के सहारे गया से पैदल दिल्ली यात्रा कर जगजीवन राम और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का अद्भुत कार्य भी दशरथ मांझी ने किया था. मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके निधन के बाद राजकीय सम्मान देकर एक मिसाल क़ायम तो की, लेकिन बिहार की तस्वीर बदलने का दावा करने वाले मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार दशरथ मांझी के गांव गहलौर की तस्वीर बदलने में अभी तक कामयाब नहीं हो पाए.
Sabhar: Chauthi Dunia

क्या वाकई रुक जाएगा भ्रष्टाचार

देवेन्द्र प्रताप
पिछले माह अमेरिका के अनिवासी भारतीयों ने भारत में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ करीब 240 मील लंबा मार्च निकाला। 12 मार्च को कैलिफोर्निया के सान डियागो में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के स्मारक से शुरु होकर लास एंजिल्स से होते हुए 26 मार्च को यह मार्च सैनफ्रांसिस्को में गांधी जी की प्रतिमा पर जाकर समाप्त हुआ। जवाहर कामभामपति और श्रीहरि अटलूरी के नेतृत्व के नाम से आयोजित में निकाले गए इस मार्च के समर्थन में अमेरिका और यूरोप के दूसरे मुल्कों में के अनिवासी भारतीयों ने भी भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ मार्च निकाला। यूरोप और अमेरिका में आयोजित इन प्रदर्शनों को ‘दूसरे दांडी मार्च’ का नाम दिया गया। इनकी मांग थी कि भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और ‘जन लोकपाल विधेयक’ को लागू किया जाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ विदेश में अनिवासी भारतीयों का यह अभी तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था, हांलाकि भारतीय मीडिया में इसे कम जगह ही मिली। भ्रष्टाचार के नीचे दबी भारत की जनता को इसके बारे में पता ही नहीं चल पाया। भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे, गांधीवादी अन्ना हजारे का आंदोलन इस मामले में ज्यादा असरकारी है। अन्ना हजारे के इस आंदोलन को योग गुरु बाबा रामदेव और आध्यात्मिक गुरु श्री रविशंकर जैसों का समर्थन मिल जाने से इसका विस्तार और बढ़ जाएगा। अन्ना हजारे के साथ किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल और दूसरे सामाजिक संगठनों के उतर आने से प्रगतिशील आंदोलन की धारा भी इसके साथ खड़ी होती हुई नजर आ रही है। यही वजह है कि आजाद भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन को सबसे ज्यादा ताकतवर आंदोलन माना जा रहा है। आंदोलन को मिल रहे जन समर्थन से ऐसा लग रहा है कि इस बार जन लोकपाल विधेयक के मसले पर सरकार का टालू रवैया उसके लिए खतरनाक हो सकता है। यह मसला अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाओं पर भी असर डाल सकता है। छोटे गांधी के नाम से मशहूर अन्ना हजारे ने भी गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे की तरह भूख हड़ताल पर जाने से पहले यह घोषणा कर दी है कि लोकपाल बिल के बिल के लिए भले ही उनकी जान ही क्यों न चली जाए, लेकिन अब वे पीछे नहीं हटेंगे। आखिर देश के इतने प्रतिष्ठित और 72 वर्षीय वृद्ध गांधीवादी नेता को भ्रष्टाचार के खिलाफ इस तरह की आर-पार की जंग छेड़ने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा। क्या सत्ता में बैठे लोगों को भ्रष्टाचार खत्म करने की जरुरत ही नहीं महसूर कर रहे? हकीकत तो फिलहाल यही लगती है। 2009 में सीबीई के निदेशक अश्विनी कुमार ने ‘सीबीआई और राज्यों के भ्रष्टाचार निरोधक व्यूरों के प्रमुखों’ के 17 वें सम्मेलन में ‘शीर्ष पदों पर विराजमान व्यक्तियों के नैतिक मूल्यों में ह्रास को भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह’ बताया था। इसके लिए उन्होंने देश के कमजोर न्यायतंत्र को भी जिम्मेदार माना, जहां भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई में वर्षों लग जाते हैं। इसी तरह का बयान सुप्रीम कोर्ट के कई न्यायाधीश तक दे चुके हैं। इसके बावजूद भ्रष्टाचार कम होने के बजाय लगातार बढ़ता ही गया है। भारत के भ्रष्टाचार की चर्चा प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स तक में हो चुकी है। पिछले दिनों वाशिंगटन में हुए एक अध्ययन के अनुसार भारत में आजादी के बाद से वर्ष 2008 तक करीब 20 लाख करोड़ रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। वाशिंगटन के आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ समूह ‘ग्लोबल फाइनेंशियस इंटिग्रिटी’ (जीएफआई) की इस रिपोर्ट (द ड्राइवर्स एंड डायनामिक्स आॅफ इलिसिट फाइनेंशियल फ्लो फ्रॉम इंडिया 1948-2008) के अनुसार यह धन भारत के ऊपर कुल कर्जे का दुगुना है। इस संस्था के संचालक रेमंड बेकर की मानें तो ‘भारत की गरीबी की यही सबसे बड़ी वजह’ है। आज अन्ना हजारे, किरण वेदी, अरविंद केजरीवाल जैसे बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता इसीलिए लोकपाल बिल के लिए सड़क पर उतरे हैं। यह स्थिति तब बनी जब सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली ‘नेशनल एडवाइजरी कौंसिल’ ने लोकपाल बिल के ड्राफ्ट को खारिज कर दिया। अन्ना हजारे के जज्बे को सलाम, लेकिन दिमाग में एक सवाल तो यह है ही कि क्या वाकई जन लोकपाल कानून बन जाने से भारत में भ्रष्टाचार रुक जाएगा।

Thursday, April 7, 2011

क्यों बनायेंगे अन्ना हजारे लोकपाल

लोकपाल बिल में वे सुझाव शामिल करने चाहिये जो अन्ना हजारे एवं अन्य की ओर रखे गए हैं, लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधि कानून बनाने से पहले समाज के उन लोगों से पूछे, जिन्हें समाज ने कभी नहीं चुना, यह कैसी उटपटांग मांग है... 

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

इस बात में कोई शक नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जानी चाहिये. इस मद्देनजर समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके साथियों की ओर से लोकपाल बिल की कमियों के बारे में कही गयी बातें पूरी तरह से न्यायोचित भी हैं, जिनका हर भारतवासी को समर्थन करना चाहिये.
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे और अन्ना
बावजूद इसके किसी भी दृष्टि से यह न्यायोचित नहीं है कि-‘सरकार अकेले लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करती है तो यह लोकशाही नहीं,निरंकुशता है’. ऐसा कहकर तो हजारे एवं उनके साथी सरकार की सम्प्रभु शक्ति को ही चुनौती दे रहे हैं.

हम सभी जानते हैं कि भारत में लोकशाही है और संसद लोकशाही का सर्वोच्च मन्दिर है. इस मन्दिर में जिन्हें भेजा जाता है,वे देश की सम्पूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं. निर्वाचित सांसदों द्वारा ही संवैधानिक तरीके से सरकार चुनी जाती है. ऐसे में सरकार के निर्णय को ‘निरंकुश’ या ‘अलोकतान्त्रिक’ कहना असंवैधानिक है.
लोकपाल बिल के बहाने लोकतन्त्र एवं संसद को चुनौती देना और गॉंधीवाद का सहारा लेना-नाटकीयता के सिवा कुछ भी नहीं है. यह संविधान का ज्ञान नहीं रखने वाले देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं के साथ खुला खिलवाड़ है. यदि सरकार इस प्रकार की प्रवृत्तियों के समक्ष झुक गयी तो आगे चलकर किसी भी बिल को सरकार द्वारा संसद से पारित नहीं करवाया जा सकेगा.
परोक्ष रूप से यह मांग भी की जा रही है कि लोकपाल बिल बनाने में अन्ना हजारे और विदेशों द्वारा सम्मानित लोगों की हिस्सेदारी और भागीदारी होनी चाहिये. आखिर क्यों हो इनकी भागीदारी ? हमें अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर विश्‍वास क्यों नहीं है. यदि विश्‍वास नहीं है तो हमने उन्हें चुना ही क्यों? हजारे की यह जिद उचित नहीं कही जा सकती.
यदि सरकार एक बार ऐसे लोगों के आगे झुक गयी तो सरकार को हर कदम पर झुकना होगा. कल को कोई दूसरा अन्ना हजारे जन्तर-मन्तर पर जाकर अनशन करने बैठ जायेगा और कहेगा कि-इस देश का धर्म हिन्दु धर्म होना चाहिये,कोई दूसरा कहेगा कि इस देश से मुसलमानों को बाहर निकालना चाहिये, कोई स्त्री स्वतन्त्रता का विरोधी मनुवादी कहेगा कि महिला आरक्षण बिल को वापस लिया जावे और इस देश में स्त्रियों को केवल चूल्हा चौका ही करना चाहिये,इसी प्रकार से समानता का तार्किक विश्‍लेषण करने वाला कोई अन्य यह मांग करेगा कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों का आरक्षण समाप्त कर दिया जाना चाहिये. जाहिर है ऐसी सैकड़ों प्रकार की मांग उठाई जा सकती है जिससे आखिरकार अराजकता ही फैलेगी.
इसलिए सरकार को लोकपाल बिल में वे सभी बातें शामिल करनी चाहिये जो हजारे एवं अन्य लोगों की ओर से प्रस्तुत की जा रही है. लेकिन इस प्रकार की मांग ठीक नहीं है कि निर्वाचित प्रतिनिधि कानून बनाने से पूर्व समाज के उन लोगों से पूछें, जिन्हें समाज ने कभी नहीं चुना. यह संविधान और लोकतन्त्र का खुला अपमान है और हमेशा-हमेशा के लिए संसद की सर्वोच्चता समाप्त करना है.
(जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र 'प्रेसपालिका' के सम्पादक. समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी,गैर-बराबरी के विरुद्ध 1993 से सेवारत.उनसे पर dr.purushottammeena@yahoo.in संपर्क किया जा सकता है.)

Wednesday, April 6, 2011

क्या है जन लोकपाल बिल?

न्यायाधीश संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगों द्वारा वेबसाइट पर दी गई प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया है। इस बिल को शांति भूषण, जे.एम. लिंग्दोह, किरन बेदी, अन्ना हजारे आदि का समर्थन प्राप्त है। इस बिल की प्रति प्रधानमंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक दिसम्बर को भेजा गया था।
1. इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।
2. यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी। कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा।
3. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लम्बित नहीं रहेंगे। किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
4. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा।
5. यह आम नागरिक की कैसे मदद करेगा : यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं होता, तो लोकपाल जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा।
6. अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महीने के भीतर कराना होगा। आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं जैसे सरकारी राशन की कालाबाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग। लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर पूरी करनी होगी। सुनवाई अगले एक साल में पूरी होगी और दोषी को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।
7. क्या सरकार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी? ये मुमकिन नहीं है क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीशों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों द्वारा किया जाएगा न कि नेताओं द्वारा। इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी।
8. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाए गए तो? लोकपाल / लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।
9. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा? सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (अंटी कारप्शन डिपार्टमेंट) का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा। लोकपाल को किसी न्यायाधीश, नेता या अधिकारी के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी।
प्रस्तुति: देवेन्द्र प्रताप

Tuesday, April 5, 2011

क्या है जन लोकपाल बिल

भ्रष्टाचार से निपटने का सबसे कारगर रास्ता हो सकता है जन लोकपाल बिल। अन्ना हजारे के अनशन पर बैठने से पहले इसी वर्ष 30 जनवरी को 60 शहरों में लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे। आखिर क्या है जन लोकपाल बिल? मौजूदा व्यवस्था क्या है? सरकार ने किस तरह का बिल लाना चाहती है? उस पर क्या है आपत्ति?
वर्तमान व्यवस्था क्या?
१. लोकपाल है ही नहीं। लोकायुक्त सलाहकार की भूमिका में।
२. लोकायुक्त की नियुक्ति मुख्यमंत्री हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और नेता प्रतिपक्ष की सहमति से करता है।
३. सीबीआई और सीवीसी सरकार के अधीन।
४. जजों के खिलाफ जांच के लिए चीफ जस्टिस की अनुमति जरूरी।
सरकार द्वारा तैयार लोकपाल बिल
१. लोकपाल तीन-सदस्ईय होगा। सभी रिटायर्ड जज।
२. चयन समिति में उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनों सदनों के नेता पक्ष और नेता प्रतिपक्ष, कानूनमंत्री और गृहमंत्री।
३.मंत्रियों, एमपी के खिलाफ जांच और मुकदमे के लिए लोकसभा/ राज्यसभा अध्यक्ष की अनुमति जरूरी। प्रधानमंत्री के खिलाफ जांच की अनुमति नहीं।
४. लोकायुक्त केवल सलाहकार की भूमिका में। एफआईआर से लेकर मुकदमा चलाने की प्रक्रिया पर विधेयक मौन। जजों के खिलाफ कार्रवाई पर मौन।
क्या है आपत्ति?
१. जजों को रिटायर होने के बाद सरकार से उपकृत होने की आशा रहने से निष्पक्षता प्रभावित होगी।
२. भ्रष्टाचार के आरोपियों के ही चयन समिति में रहने से ईमानदार लोगों का चयन होने में संदेह।
३. बोफोर्स, जेएमएम सांसद खरीद कांड, लखूभाई पाठक केस जैसे मामलों में प्रधानमंत्री की भूमिका की जांच ही नहीं हो पाएगी।
४. लोकायुक्त भी सीवीसी की तरह बिना दांत के शेर की तरह रहेगा। केजी बालाकृष्णन जैसे जजों के खिलाफ कार्रवाई संभव नहीं होगी।
५. जजों के खिलाफ जांच के लिए लोकपाल/लोकायुक्त को अधिकार।
आठ बार पेश होने के बावजूद इसलिए बिल पास नहीं में लोकपाल की स्थापना संबंधी बिल की अवधारणा सबसे पहले 1966 में सामने आई। ठ्ठ इसके बाद यह बिल लोकसभा में आठ बार पेश किया जा चुका है। लेकिन आज तक यह पारित नहीं हो पाया। ठ्ठ पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यकाल में एक बार 1996 में और अटलबिहारी वाजपेई के कार्यकाल में दो बार 1998 और 2001 में इसे लोकसभा में लाया गया। ठ्ठ वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वादा किया था कि जल्द ही लोकपाल बिल संसद में पेश किया जाएगा। अब तक सरकार ने इसकी सुध नहीं ली। ठ्ठ इस बिल के तहत प्रधानमंत्री को लाया जाए या नहीं इस पर लंबे समय से मशक्कत चल रही है। अब तक कोई नतीजा नहीं।
(Sabhar,Dainik Bhaskar)

Monday, April 4, 2011

...... जब चिड़िया चुग गई खेत



देवेन्द्र प्रताप
किसान जब अपने खेत में लहलहाती फसल देखता है तो आदतन सबसे पहले वह आसमान की ओर देखकर खुदा को धन्यवाद देता है और फिर उस धरती का, जिसने उसके खेतों में सोने सरीखी फसल पैदा की। उसकी मान्यता की बात छोड़ भी दें तो अगर आसमान मेहरबान रहे और धरती उर्वरा हो तो किसान के खेत में सोना ही उगता है। वर्तमान समय में वातावरण में प्रति टन कार्बन के अनुपात में धरती में मात्र 1.7 टन कार्बन ही बचा है। धरती में कार्बन की मात्रा वातावरण से दोगुनी होनी चाहिए। यह एक खतरनाक संकेत है। समय रहते इससे निपटा जाना चाहिए।
उर्वरा धरती

किसान की फसल का अच्छा बुरा होना धरती की सबसे ऊपरी परत के ऊपर निर्भर करता है। यही वह भट्ठी है जिसमें तपकर सोने जैसी फसल पैदा होती है। इस परत की खासियत यह है कि इसमें ऐसे बैक्टीरिया और फसल के लिए दूसरे जरुरी तत्व पाये जाते हैं जो फसल की पैदावार के लिए जिम्मेदार होते हैं। आंख से न दिखाई देने वाले इन सूक्ष्म जीवों में बहुत ही बड़े-बड़े गुन होते हैं। ये सूक्ष्म जीव गोबर या जैविक खाद को फसल के लिए फायदेमन्द पोषक तत्वों में बदल देते हैं।
धरती तरसे भोजन को
धरती दुनिया के सारे प्राणियों के लिए मां जैसे भूमिका निभाती है। मां अपने बच्चों को पालती-पोषती है, उनकी हर नाराजगी को हंस कर सह लेती है और कई बार तो वह खुद भूखी रहती है लेकिन अपने बच्चों को भूखा नहीं रहती। धरती के बच्चों में अनगिनत विशालकाय पेड़-पौधों से लेकर असंख्य ऐसे जीव भी हैं जिन्हें हम अपनी आंखों से नहीं देख सकते। पहले धरती की अपने बच्चों व खुद के लिए भी एक प्राकृतिक व्यवस्था की थी। इस प्राकृतिक व्यवस्था के कारण धरती और उसके बच्चों को भोजन की कमी नहीं होती थी। उसका परिवार धन-धान्य से भरपूर था। आज स्थिति बदल गयी है। उसके बच्चों में से सबसे ज्यादा बुद्धिमान होने का दावा करने वाले मनुष्यों ने अपने भोजन के लिए धरती से और ज्यादा भोजन की मांग करने लगे। रासायनिक खादों कीटनाशकों का इस्तेमाल किया। इससे धीरे-धीरे न सिर्फ धरती की उर्वरा क्षमता कमजोर हुई, वरन उसकी कोख में पलने वाले असंख्य सूक्ष्म जीवाणु - काई, कीडेÞ और अन्य सूक्ष्म जीव, जिनमें से अधिकतर नंगी आंखों से नहीं देखे जा सकते हैं- बेमौत मरने लगे। यही वजह रही कि धरती का कलेजा दु:ख सहते-सहते पत्थर जैसा होता गया। इन जीवों के मरने से प्राकृतिक असुंतन गड़बड़ा गया है। स्थिति यह हो गयी है कि आज वह खुद भी भूखी रहती है और उसके असंख्य बच्चे भी। वह करे भी तो क्या करे। वह लाचार है।
कृषि का औद्योगीकरण
हमारे देश में जब यूरोप और अमेरिका की तर्ज पर हरित क्रांति की शुरुआत हुई, तो यह तर्क दिया गया कि इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। धरती से ज्यादा पाने की खुशी में इसमें मौजूद जैव पदार्थों की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया। लेकिन धीरे-धीरे प्रकृति में मौजूद यह भण्डार कम होता गया। आज इसका दुष्परिणाम दुनिया के कई हिस्सों में सामने आ रहा है। धरती के खजाने में सबसे ज्यादा मात्रा कार्बन की होती है। दुनियां में कुल बनस्पतियों में मौजूद कार्बन को मिला भी दिया जाए तो भी धरती के खजाने में मौजूद भण्डार से इसकी मात्रा आधी ही होगी। लेकिन आज यह अनुपात गड़बड़ा गया है। हरित क्रांति की बयार के बहने के पहले हवा और मिट्टी के बीच संतुलन की स्थिति यह थी कि हवा में प्रत्येक टन कार्बन के मुकाबले मिट्टी में करीब दो टन कार्बन मौजूद होता है। वर्तमान समय में प्रति टन वातावरणीय कार्बन के अनुपात में धरती के पास मात्र 1.7 टन कार्बन ही बचा है। जाहिर है यह एक खतरनाक संकेत है। समय रहते इससे निपटा जाना चाहिए। नहीं तो फिर यही कहेंगे कि ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’।
जलवायु संकट
हरित क्रांति ने जलवायु संकट को भी बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। इसने बहुत ही तेजी से धरती की कोख को जैविक तत्वों से खाली करने का काम किया है। आज हालत यह है कि इन जैविक तत्वों को धरती की कोख में अगर वापस भी ला दिया जाए तो भी हम आज कार्बन डाई आॅक्साइड की जितनी मात्रा का पयावरण में उत्सर्जन कर चुके हैं उसका एक-तिहाई ही अवशोषित कर पाएंगे। वैज्ञानिकों की मानें तो अगर दुनिया भर में इसके लिए एक साथ प्रयास किया जाए तो भी हमें करीब 50 साल कार्बन डाई आक्साइड की दो तिहाई मात्रा को सामान्य स्थिति में ला पाएंगे।

बेरोजगार हाथ

तकनीकी विकास की बदौलत भले ही हमारा देश आज दुनिया के विकसित देशों की बराबरी करने का दम भर रहा है, लेकिन इसने पुश्तैनी पेशों के लिए संकट भी पैदा किया है। इसने गांव और शहर दोनों जगह तबाही मचाई है। मेरठ शहर एक समय हैंड एम्ब्राडरी का एक बड़ा केन्द्र हुआ करता था, लेकिन इस क्षेत्र में मशीनों के चलन ने हजारों हाथों को बेकार कर दिया है। जिन लोगों का यह पुश्तैनी पेशा था, उनके ऊपर यह संकट ज्यादा है। जो लोग इस पेशे के अलावा दूसरे कामों में भी लगे हुए थे, वे तो किसी तरह बच गये, लेकिन जिनके परिवार बाप-दादा के जमाने से ही यही एक पेशा था, उनमें से ज्यादातर बरबाद हो गये।
हैण्ड एंब्राडरी:
आफताब के पिता जी ने जिस समय लखनऊ से अपना घर बार छोड़ा उस समय वे अभी बालिग ही थे। घर की कलह से तंग आकर करीब 30 साल पहले वे मेरठ आ गये। लखनऊ में उनका पूरा परिवार हैंड एंब्राडरी का काम करता था। इसलिए यहां आने के बाद आफताब के पिता ने हैंड एम्ब्राडरी और ‘अड्डा वर्क’ का अपना पुस्तैनी काम शुरु कर दिया। चूंकि उन्हें इस काम का अच्छा खास अनुभव था, इसलिए जल्दी ही उन्होंने मेरठ में अपना काम जमा लिया। करीब 10 साल पहले मशीनों ने उनके हाथोंं से एम्ब्राडरी का काम छीन लिया। अब वे अपने परिवार के साथ अड्डा वर्क (जिसे मोती सितारे का काम भी कहा जाता है) का काम करते हैं। सदर में कुछ रेडीमेड गार्मेंट की दुकानों से उन्हें आर्डर मिलता है। अब यही उनकी आजीविका का सहारा है। शहर बनता गया, सजता गया। पहले के मुकाबले शहर ने अपनी रफ्तार भी बढ़ाई। यह सब बहुत अच्छा रहा। लेकिन दैनन्दिन जीवन में मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल ने पारम्परिक पेशों को भी तबाह करने का काम किया। शायद इसीलिए गांधी जी हिन्दुस्तान में मशीनों के नियंत्रित इस्तेमाल के पक्षधर थे। मशीनों को लेकर उनकी यह चिन्ता आफताब के परिवार के रुप में आज भी जिन्दा है।
बिंदिया:
मेरठ में भमिया का पुल, लाला की बाजार, सराय लाल दास आदि इलाकों में बिंदिया बनाने का काम होता है। इस काम को करने वाले बेहद गरीब परिवार के लोग हैं। ये लोग कई तरह की बिंदिया बनाने का काम करते हैं। पूनम (बदला हुआ नाम) का परिवार भी यह काम करता है। इन्होंने करीब साल भर पहले इस काम को शुरु किया। इनके पास आजीविका का कोई दूसरा जरिया न होने के कारण ये लोग इस काम करने को मजबूर हैं। पूनम ने बताया कि वे अपने बच्चों के साथ बेगमपुल के एक सेठ की दुकान के लिए सादी बिंदिया, नग वाली बिंदिया और जरी वाली बिंदिया बनाने का काम करती हैं। ये सेठ से बिंदिया में लगने वाले सामान और पत्ता लाते हैं। एक ब्रुश में 144 पत्ते होते हें। एक पत्ते मे चार या पांच बिंदिया बनानी होती है। पूनम बताती हैं कि सुबह 8 बजे से शाम के 6 बजे तक काम करने पर एक पत्ता तैयार होता है।
पूनम के साथ काम करने वाले उनके बड़े बेटे ने बताया कि बाजार में एक पत्ते की कीमत इस समय पांच रुपया है। जबकि बिंदिया बनाने वाले लोगों को एक पत्ता तैयार करने के एवज में पांच पैसा भी नहीं मिलता। सेठ की ओर से इन बिंदिया बनाने वालों को समय से भुगतान नही किया जाता नतजतन अक्सर इनके सामने भुखमरी का संकट मौजूद रहता है। ऐसे में कर्ज ही इन गरीबों का एकमात्र सहारा होता है। लेकिन इनके लिए कर्ज लें तब भी बुरा न लें तब भी बुरा।
Devendra Pratap
9719867313

मिलिए 1857 के क्रांतिकारियों से

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम मेरठ से ही शुरु हुआ। यह उस वक्त की बात है जब यह कहावत चलती थी कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी नहीं अस्त होगा’। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि जब मेरठ से बागी सैनिकों ने हिन्डन पार कर दिल्ली पर धावा बोला तो उसकी धमक लंदन तक सुनाई पड़ी। मुजफ्फर नगर, अलीगढ़, आगरा, मथुरा, सोनीपत, करनाल, पेशावर, लखनऊ, आदि शहरों में जैसे ही दिल्ली पर मेरठ के सैनिकों द्वारा धावा बोलने की खबर पहुंची, वे भी इसके साथ हो लिए। दिल्ली पर एकबारगी तो उन्होंने कब्जा भी कर लिया। लेकिन जब अंग्रेजी सेना ने चारों ओर से क्रांतिकारियों पर हमला बोला तो इस समूचे इलाके की मिट्टी लाल हो गयी। आजादी की जंग छेड़ने के एवज में मेरठ शहर को भी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। देश की आजादी की जंग में इस इलाके में जिताना खून बहा वह एक मिशाल है। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दुओं और मुसलमानों की एक एकता का मूकगवाह रहा है यह शहर।
आज भी इस शहर की पुरानी जर्जर इमारतों की दीवारों पर कान लगाएगें तो 1857 के क्रांतिकारियों का गीत ‘हम हैं इसके मालिक हिन्दुस्तान हमारा..’ आपको सुनाई देगा। इन क्रांतिकारियों की ऐसी अनगिनत यादें शहर में आज भी मौजूद हैं। इन्हीं शहीदों की याद में मेरठ शहर के बीचों-बीच बना है 1857 का संग्रहालय। जैसे ही आप मुख्य गेट से प्रवेश करेंगे तो सामने बने पत्थर के स्तम्भ पर आपकी निगाह पड़ेगी। इस पर खुदे नामों को जरा गौर से देखिएगा तो आप खुद-ब-खुद समझ जाएंगे कि यह कितना बेशकीमती है। इनसे विदा लेकर ज्योंही आप मुख्य द्वार से प्रवेश करते हैं तो 1857 के प्रसिद्ध क्रांतिकारी मंगल पाण्डे को अपने सामने खड़ा हुआ पाएंगे। आप चाहें तो उन्हें छू भी सकते हैं। यह अलग बात है कि न जाने क्यों वे एकदम से मौन खड़े रहते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने साथियों का इन्तजार कर रहे हैं। उनके बार्इं ओर बड़े से हाल में अंग्रेजी सेना के तोप के मुकाबले खड़ी है लाठी, डंडों और तलवारों या फिर लगभग निहत्थी जनता। जी हां सब कुछ अभी भी मौजूद है इस शहर में। क्रांतिकारी सेना के नायक नाना साहब और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भी हैं तो दूसरी ओर अजीमुल्ला, बेगम हजरत महल और अवन्तीबाई लोधी भी।
Devendra Pratap
9719867313

रहमान भाई बिरियानी वाले

आप अगर कभी मेरठ के घंटा घर से गुजरें तो किसी से रहमान भाई की बिरियानी की दुकान के बारे में पूछें तो आपको शायद ही कोई बंदा ऐसा मिलेगा जो आपको उनका पता न बताए। जी हां विश्वास न हो तो कभी आजमा कर देख लें। हां कुछ लोग उन्हें हाजी साहब कहते हैं तो कुछ अख्तर भाई। इतने से तो आप जरुर ही वहां पहुंच जाएंगे। चलिए मैं ही आपको उनका पता बताए देता हूं। घंटाघर से आप जिला महिला अस्पताल की ओर चलिए। अस्पताल के पहले गेट पर पहुंचकर रोड के उस पार निगाह डालिए रहमान भाई बिरियानी वाले का बोर्ड आपको नजर आ जाएगा। फिर भी न पहचान रहे हों तो लाइन से बिरियानी की दुकानों पर नजर डालिए जहां सबसे ज्यादा भीड़ लगी हो समझ जाइए आपकी मुराद पूरी हो गयी।
अख्तर भाई जिस समय बिरियानी तैयार करने में लगे रहते हैं न जाने कितने लोग उस समय ही एक बार उनकी दुकान पर चक्कर मार जाते हैं। बिरियानी तैयार हुई नहीं कि हाजी साहब 20 की, रहमान भाई 10 की, अख्तर भाई मुझे भी की आवाजें उनकी छोटी से दूकान में गूंजने लगती हैं। लेकिन अख्तर भाई को अब अपने चाहने वालों की इन आवाजों की इतनी आदत सी पड़ गयी है कि वे बिना कोई जवाब दिए चुपचाप लोगों की ओर प्लेट बढ़ाते रहते हैं। वे एक साथ अलग-अलग मांग के मुताबिक 10-12 लोगों से पैसा ले लेते हैं कई बार तो 15-20 लोगों से। लेकिन यह कभी इत्तेफाक भी नहीं होता कि वे किसी को गलत प्लेट पकड़ा दें या फिर उन्हें बिरियानी देना भूल जाएं।
बिरियानी परोसने में रहमान भाई के हाथ माडर्न टाइम्स फिल्म के नट-बोल्ट कसने वाले चार्ली चैप्लिन के हाथ की तरह हैं। फिल्म में जैसे-जैसे मशीन की स्पीड तेज होती जाती है चार्ली के हाथ भी उसी तरह उसका पीछा करने की कोशिश करते हैं। यही हाल रहमान भाई का है। वे पूरे समय शान्त तो रहते हैं। लेकिन इसका मतलब वे यह कदापि नहीं है कि वे आपकी आवाज को अनसुना कर रहे हैं। उनके कान सभी की बात सुनते रहते हैं और उनके हाथ की स्पीड उसी के साथ तेज होती जाती है। इधर आपने आवाज दी नहीं कि उधर 7-8 मिनट के अन्दर वे दो तीन लोगों को गर्मागर्म बिनियानी की प्लेट पकड़ा चुके होते हैं। स्वाद के साथ ही उनका बिरियानी परोसने का अंदाज इतना निराला है कि एक बार जो उनके हाथ की बिरियानी खाता है उनका मुरीद हो जाता है।
Devendra Pratap
9719867313

शान न इसकी जाने पाये..

पिछले दिनों एक दोस्त के साथ उनके आफिस जाना हुआ। मौका था 26 जनवरी का। मेरे दोस्त राष्ट्रवादी विचारों के हैं। कोढ़ में खाज यह कि वे परले दर्जे के भावुक हैं। इसलिए उनका अनुरोध टालना मेरे बस के बाहर था। उनके संस्थान के निदेशक का आदेश था कि सभी लोग 10 बजे तक हर हाल में इस दिन आयें। साहब का आदेश था तो भला किसकी हिम्मत थी कि न आता।
मेरे मित्र मुझे लेकर 9 बजे ही पहुंच गये। उस समय साहब लोगों में से कोई मौजूद नहीं था। उस संस्थान में दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर आफिस के एक चपरासी के साथ इन्तेजाम में लगे हुए थे। हमें देखते ही मजदूरों ने बारी-बारी सलामी ठोकी। ऐसा लग रहा था जैसे वे झण्डे को सलामी दे रहे हों। इसी दौरान एक मजदूर पाइप में बांधने के लिए झण्डा लेकर जा रहा था कि एकाएक दरवाजे पर हमसे टकरा गया। हड़बड़ाहट में उसके हाथ से झण्डा छूटकर जमीन पर गिर गया। झण्डा गिरना था कि मेरे दोस्त को लगा जैसे पाकिस्तान ने कश्मीर को फतह कर लिया हो। उन्होंने तेजी से उसे एक भद्दी गाली दी। तुम्हीं लोगों की वजह से आज देश की यह हालत है। मजदूर बस साहब..साहब .. कहता रह गया। ‘अब जाओ भी’ उन्होंने फिर से उसे डांटा।
10 बजे तक आॅफिस के ज्यादातर लोग आ चुके थे। निदेशक साहब 11 बजे के आसपास पहुंचे। पहुंचते ही वे तुरन्त स्टेज पर चढ़ गये। इधर उन्होंने झण्डे की डोर खींची कि तुरन्त मधुर स्वर में जन-गण-मन अधिनायक जय हे का गीत बजने लगा। सभी सावधान की मुद्रा में उसे दोहरा रहे थे। उनमें सबसे ज्यादा बेसुरी आवाज मेरे दोस्त की थी, इसलिए वह अलग से पहचान में आ रही थी। सब कुछ इतना रुटीन वर्क की तरह था कि सभी उसे करके अपना कोरम पूरा कर रहे थे। एकाएक मैंने ध्यान दिया कि वे लोग जिन्होंने इस पूरे आयोजन की तैयारी की थी, वे दीवार के पीछे छिपे हुए हैं। राष्ट्रगान जब हो रहा था तब उनके सिर का कुछ हिस्सा दिख रहा था। लेकिन जैसे ही निदेशक साहब ने बुलन्द आवाज में भाषण देना शुरु किया उनका सिर दिखना बन्द हो गया। शायद वे बैठ गये होगें...। उन्हें क्यों नहीं राष्ट्रगान के दौरान बुलाया गया? वे दीवार के पीछे क्यों चले गये? ऐसे ही कई सवाल मन में उठ रहे थे, लेकिन मित्र से पूछने में मैं डर रहा था।
झण्डा हवा में लहरा रहा था और मैं इन्हीं खयालों में डूबा मित्र के साथ अपने कमरे पर आ गया।
- देवेन्द्र प्रताप
9719867313

Sunday, April 3, 2011

तारीख के हवाले से मिस्र की गवाही

मिस्र में 18 दिनों के जनांदोलन ने 30 साल सत्ता पर काबिज रहे होस्नी मुबारक की रवानगी की इबारत लिखी. तारीख दर तारीख कैसे घटी ए घटनाएं, डालते हैं एक नजर.
25 जनवरी 2011: (पहला दिन) मिस्र की पुलिस के राष्ट्रिय अवकाश का दिन. हजारों की संख्या में लोग तहरीर चौक में जमा, आंसू गैस छोड़ कर प्रदर्शनकारियों पर काबू करने की कोशिश की गई.
26 जनवरी 2011: (दूसरा दिन) सरकार ने प्रदर्शनों पर रोक लगाई. सोशल नेटवर्किंग साइट्स और फेसबुक भी प्रतिबंधित लेकिन नहीं रुके प्रदर्शन.
27 जनवरी 2011: (तीसरा दिन) नोबल शांति पुरस्कार विजेता और मिस्र के प्रमुख विपक्षी नेता अलबारादाई मिस्र वापस लौटे.
28 जनवरी 2011: (चौथा दिन) इंटरनेट और मोबाइल सुविधाओं पर रोक. सेना के टैंक सड़कों पर उतरे.
29 जनवरी 2011: (पांचवा दिन) प्रदर्शन तेज हुए, कई लोगों की मौत. मुबारक ने जनता के गुस्से को काबू करने की कोशिशें कीं.
30 जनवरी 2011: (छठा दिन) भारी संख्या में विदेशियों और पर्यटकों ने मिस्र को छोड़ा.
31 जनवरी 2011: (सातवां दिन) सेना ने कहा प्रदर्शनकारियों पर बल का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वादा किया.
1 फरवरी 2011: (आठवां दिन) सेना के विश्वास पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे. मुबारक ने विपक्ष से बातचीत की पेशकश की.
2 फरवरी 2011: (नवां दिन) मुबारक के समर्थक भी सड़कों पर उतरे. जगह-जगह झड़पें और हिंसा. अर्थव्यवस्था चरमराई.
3 फरवरी 2011: (दसवां दिन) तहरीर चौक पहुंची विदेशी मीडिया पर हमले. सरकार पर सुनियोजित हमले कराने के आरोप लगे.
4 फरवरी 2011: (ग्यारहवां दिन) अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने पुराने मित्र मुबारक को सत्ता छोड़ने के कड़े संदेश दिए.
5 फरवरी 2011: (बारहवां दिन) मुबारक ने अपने बेटे सहित पार्टी के शीर्ष नेताओं को पद से हटाया, लेकिन सत्ता छोड़ने से इंकार किया.
6 फरवरी 2011: (तेहरवां दिन) प्रतिबंधित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड सहित प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से सरकार ने बातचीत की.
7 फरवरी 2011: (चौदहवां दिन) इंटरनेट के जरिए प्रदर्शनकारियों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाने वाले गूगल के अधिकारी वेल घोनिन को रिहा किया गया.
8 फरवरी 2011: (पंद्रहवां दिन) विदेशी और यूरोपीय देशों के साथ मुबारक के रिश्तों पर चर्चा गर्म हुई. अमरीका पर भी निशाना साधा गया.
9 फरवरी 2011: (सोलहवां दिन) मिस्र में तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़Þीं. अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़Þी लेकिन प्रदर्शनकारी तहरीर चौक पर डटे रहे.
10 फरवरी 2011: (सत्रहवां दिन) मिस्र के घटनाक्रम को देखते हुए सेना और नेताओं ने कयास लगाए कि मुबारक जल्द इस्तीफा देंगे, लेकिन मुबारक की घोषणा कि वो बनें रहेंगे.
12 फरवरी 2011: (अट्ठारवां दिन) घोषणा के बाद उमड़े जन सैलाब के आगे मुबारक झुके और सेना ने देश की कमान संभाली.

तहरीर स्क्वायर पर लिखी जा रही नई इबारत

देवेन्द्र प्रताप
मिस्र या ईजिप्ट उत्तरअफ्रीका का एक देश हैं। मिस्र की सीमा सिनाई प्रायद्वीप के द्वारा एशिया से भी जुड़ी हुई है। इसके उत्तर में भूमध्य सागर, उत्तर पूर्व में गाजा पट्टी और इस्राइल हैं। मिस्र के पूरब दिशा में लाल सागर जबकि पश्चिम में लीबिया एवं दक्षिण में सूडान स्थित हैं। मिस्र लगभग 10,10,000 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। घोर रेगिस्तान और समुद्र के अनूठे संगम के प्रतीक काहिरा शहर में मनोरंजन के तमाम तमाशे हैं। बेहद महंगे पंचतारा होटल हैं। चमचमाती टैक्सियां हैं। मसाज पार्लर हैं। तटों पर न्यूनतम वस्त्रों में धूप-स्रान करते लोग हैं, पर मूल शहर बेहद छोटा और दरिद्र है।
अरब क्षेत्र में मिस्र की सदा ही अपनी एक अलग पहचान रही है। इसलिए 19 वीं सदी में जब फ्रांस व ब्रिटेन ने इसे अपने कब्जे में लेना चाहा तो उन्हें बहुत सतर्कता बरतनी पड़ी। उन्होंने मिस्र पर बाहुबल का जोर आजमाने के बजाय, पिठ्ठू शासकों के माध्यम से अपने हितों को पूरा किया। बावजूद इसके मिस्र पर काबिज विदेशी शक्तियों को कभी भी मिस्र की जनता ने पशन्द नहीं किया। उन्नीसवीं सदी ब्रिटेन और फ्रांस के विरुद्ध मिस्र जनता के प्रतिरोध की गवाह बनी। इस सदी में वह विदेशी शक्तियों से अपने देश को आजाद तो नहीं करा पायी लेकिन उसने हार भी नहीं माना।1956 में मिस्र की जनता ने गमाल अबदेल नासिर के नेतृत्व मेंअपने बादशाह फारुक का तख्ता पलट दिया। इस क्रांति ने उसे समूचे अरब का नेता बना दिया। नासिर जब तक सत्ता में रहे उन्होंने अपने देश को विदेशी प्रभाव से बचाये रखा। नासिर को यूरोप की वैज्ञानिक प्रगति पशन्द थी। संकट यह था कि अगर वे इसके लिए यूरोप या फिर अमेरिका के आगे हाथ फैलाते तो फिर से गुलाम बनने का खतरा भी था। उन्हें देश का विकास तो पशन्द था लेकिन आजादी की कीमत पर नहीं। इसलिए उन्होंने भरसक कोशिश की कि मिस्र की आजादी को बरकरार रखते हुए देश का विकास किया जाए। उस समय यह संकट उन सभी देशों के साथ था जिन्होंने जल्दी ही उपनिवेशवाद से खुद को आजाद किया था। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन इसी का परिणाम था। तीसरी दुनिया की जनता मिस्र की इस भूमिका को कभी नहीं भूल सकती। वह उसके साथ करीबी महसूस करती है। यही वजह है कि आज जब मिस्र उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है तो भारत समेत तीसरी दुनिया के जनमत का बड़ा हिस्सा मिस्र की जनता के साथ है।
अंग्रेजों से आजादी हासिल करने के बाद से ही मिस्र की सत्ता पर सेना का कब्जा रहा। कर्नल नासिर भी सेना से आये थे। यह अलग बात है कि उनके काल में मिस्र में तानाशाही नहीं कायम हो पायी। नासिर के बादचाहे सद्दात रहे हों या फिर हुस्री मुबारक ये विशुद्ध रुप में सेना के प्रतिनिधि के तौर पर ही हुकूमत में रहे। यह भी कह सकते हैं कि सेना के सहारे ही इन्होंने अपनी हुकूमत को बचाये रखा। सेना की इसी भूमिका की वजह से ही वहां तानाशाही शासन के खिलाफ मिस्र की जनता सड़क पर उतरती रही।
मिस्र की जनता आज फिर अपने देश में तानाशाही हुकूमत के खात्में के लिए सड़कों पर है। वहां के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने मिस्र के ऊपर 30 सालों तक राज किया। जब टुनिसिया की जनता ने अपने यहां क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए आन्दोलन शुरु किया तो उसने बहुत जल्दी ही समूचे अरब को अपनी जद में ले लिया। मिस्र के ऊपर भी इसका प्रभाव पड़ा। नतीजा मिस्र की जनता ने भी तुनिसिया की राह पकड़ी। 24 जनवरी को मिस्र की राजधानी काहिरा की जनता ने मुबारक की तानाशाही के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। पांच ही दिनों में इस आन्दोलन की आग ने समूचे मिस्र को अपने लपेट में ले लिया। जनान्दोलन के बढ़ते दबाव का भांपकर मुबारक ने सबसे पहले अपने मंत्रिमण्डल को बर्खास्त कर आन्दोलन की आग को शान्त करना चाहा। जब इससे बात नहीं बनी तो 29 जनवरी को मुबारक ने अपने करीबियों को उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाकर जनता को शान्त करना चाहा। कहते हैं तानाशाह कभी नहीं सीखता। यह बात मुबारक के ऊपर एकदम फिट बैठती है। मुबारक के इन घड़ियाली आसुओं का जनता के कोई फरक नहीं पड़ा। आज काहिरा के इस कुरूक्षेत्र में समाज का हर तबका शामिल है। व्यापारी, पत्रकार,कालेजों के प्रोफेसर, वहां के आम नौकरी पेशा वाले लोगों के साथ फिल्मी जगत की दुनिया के कलाकर भी आज मुबारक के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। छात्र और नौजवान तो हर सामाजिक बदलाव में मुख्य शक्ति होते ही हैं। मिस्र में भी वे सबसे आगे हैं। जब पानी सर तक आ गया तब मुबारक को समझ में आया कि जनता इस बार निर्णायक लड़ाई के मूड में है। कहते हैं ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे'। मुबारक ने फिर पैंतरा बदला। आन्दोलन के 14 वें दिन एक अमेरिकी पत्रकार को दिए इंटरव्यू में मुबारक की यही खिसियाहट नजर आयी। उन्होंने कहा ‘मैं राष्ट्रपति पद से उकता गया हूं। मैं गद्दी छोड़ना चाहता हूं मगर डरता हूं कि मेरे हटते ही मिस्र में अराजकता फैल जाएगी’। वाह! क्या कहने मुबारक साहब!
1789 की क्रांति ने समूचे यूरोप को प्रभावित किया था। फ्रांस की जनता जब वर्साई के राजमहल पहुंची तो वह सिर्फ रोटी मांगने गयी थी। जो लोग वहां गये थे उनमें से ज्यादातर ने शायद ही अपने जीवन में कभी क्रांति के बारे में सोचा था। कइयों के लिए तो यह शब्द ही बेगाना था। वे एक ही चीच से परिचित थे, और वह थी रोटी। रानी ने उन्हें रोटी दिलवाने के बजाय सवाल किया कि ‘तुम लोगों को रोटी नहीं मिलती तो ब्रेड क्यों नहीं खाते?’इसके बाद भी सत्ता की ज्यादती और पुलिस का दमन जारी रहा। इसी ने फ्रांस की जनता को अपने यहां क्रांति करने के लिए मजबूर किया। फिर क्या था? यह आग वहां ऐसे फैली कि बाद के दौर में एक मुहावरा ही बन गया कि ‘पेरिस को छींक आते ही फ्रांस को बुखार आ जाता है।’
कमोवेश यही हालत मिस्र की भी है। वहां की राजधानी काहिरा की हलचल समूचे को मिस्र को और मिस्र की हलचल समूचे अरब को अपने साथ कर लेती है। जब तक अरब में अमेरिका घुसा नहीं था, तब तक वह दुनिया से कटा हुआ था। सांस्कृतिक तौर पर जुड़ाव की बात अलग है। लेकिन बावजूद इसके वह एक अलग ही दुनिया थी। जब उसने तेल पर कब्जे के लिए इस क्षेत्र में प्रवेश किया तभी इस विषय के जानकारों की ओर से यह भविष्यवाणी कर दी गयी थी कि ‘अरब के दलदल से दुनिया के तानाशाह का बच निकलना अब नामुमकिन है।’ इसलिए आज इस बात की बहुत ज्यादा सम्भावना है कि भूमण्डलीकरण के इस दौर में अरब की से हलचल से समूची धरती को बुखार आ जाए। वैसे अभी तो यह शुरुआत है। आगे आगे देखिए होता है क्या?
राख के नीचे सोया था दावानल
इस बार राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के खिलाफ मिस्र की जनता का आन्दोलन 17 जनवरी से शुरु हुआ। वहां के हालात एकाएक नहीं खराब हुए हैं। वहां की जनता तीस वर्षों से समस्याओं के नीचे दबी हुई थी। लेकिन मुबारक प्रशासन ने इस दौरान अपने कान में रुई डाले रखा। नतीजतन जनता ने आजिज आकर आन्दोलन का रास्ता अख्तियार किया। मिस्र की जनता के आन्दोलन के बारे में अमेरिका ने परस्पर विरोधी टिप्पड़ियां की हैं। इससे दुनिया का जनमानस मिस्र के आन्दोलन को लेकर भयंकर भ्रम में है। मिस्र के बुद्धिजीवियों ने अमेरिकी टिप्पड़ियों को सिरे से एक मनगढ़न्त किस्सा करार दिया है। डा. अल्ला अल अस्वनी मिस्र के ऐसे ही जनपक्षधर लेखकों में से एक हैं। उन्हें अरब की जनता प्यार करती है। उनका उपन्यास ‘इस्लाम एल-अती पेपर्स’ मुबारक शासन में कई वर्षों तक प्रतिबन्धित रहा। उन्होंने एक साक्षात्कार में आन्दोलन की कवरेज कर रहे विदेशी पत्रकारों को बताया कि ‘इस बार मुबारक के लिए सम्भव नहीं है कि वे अपनी सत्ता को बचा पायें, जैसा कि वे पिछले 30 सालों में करते आ रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि ‘मिस्र की जनता के अन्दर मुबारक सरकार के खिलाफ अर्से से आक्रोश जमा हुआ था। यह आन्दोलन तो बस जनता की भावनाओं का विस्फोट मात्र है। यहां की जनता ने वर्ष 2003 में भी मुबारक के खिलाफ आन्दोलन किया था लेकिन, मुबारक किसी तरह अपनी सत्ता को बचाने में कामयाब रहे। लेकिन आज मिस्र के हालात पहले से बहुत बदल गये हैं। यहां की जनता ने अपनी हार से सबक लिया है। मौजूदा आन्दोलन उसी का प्रतिफल है। तुनिसिया की जनता द्वारा अपने शासक को उतार फेंकने की घटना से भी मिस्र की जनता ने सबक और साथ ही प्रेरणा लेने का काम किया है।’
यह विशुद्ध रुप में एक जनआन्दोलन है न कि किसी तरह का अतिवादी आन्दोलन। अगर इसे मुश्लिम भाईचारे की भावना से प्रेरित आन्दोलन मानें (जैसा कि यूरोप और अमेरिका के कई मीडिया घराने इसे साबित करने पर तुले हुए हैं) तो भी यह सवाल उठना लाजिमी है आखिर क्यों मिस्र की जनता अपने ही धर्म के शासक के खिलाफ आन्दोलन करने पर उतारू हो गयी? आखिर ऐसी क्या बात रही कि सउदी अरब के शासक की मिस्र की जनता के नाम धार्मिक अपील का भी यहां की जनता के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ा।
इस आन्दोलन में लाखों की संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग, अमीर, गरीब व समाज के वे सभी तबके शामिल हुए जो वर्षों से मुबारक शासन से पीड़ित थे। तानाशाही के खिलाफ अतीत में भी जितने आन्दोलन हुए हैं, उसमें समाज के सभी तबके शामिल हुए हैं। यहां भी यही हाल रहा। इसलिए धार्मिक संगठनों का इस आन्दोलन में शामिल होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। जनता ने मुबारक के खिलाफ हर उस अस्त्र का इस्तेमाल किया है जो इस आन्दोलन की सफलता के लिए जरुरी है।
युवा आखों के सपने
मिस्र के आन्दोलन की शुरुआत युवाओं ने की। उन्होंने संचार के आधुनिक साधनों-फेसबुक, टिवटर और मोबाइल सेवाओं का जमकर इस्तेमाल किया। युवाओं की यह पीढ़ी मुबारक के शासन में ही जवान हुई है। इन्हीं लोगों ने सबसे पहले जनता को मुबारक सरकार को संगठित करने का काम शुरु किया। जनता ने भी युवा आंखों में तैरते नई दुनिया के ख्वाव को पढ़ लिया। इसलिए वह तुरन्त इनके साथ हो ली। ऐसा लगा जैसे वह पहले से ही तैयार बैठी थी।
सेना का रवैया
मुबारक के खिलाफ आन्दोलन छिड़े हुए अभी पांच दिन ही हुए थे कि सेना के लिए उन्हें नियंत्रित कर पाना सम्भव नहीं रह गया। एक हप्ते बाद सेना ने मुबारक प्रशासन को यह स्पस्ट कर दिया कि वह अपने नागरिकों के ऊपर गोली नहीं चलाएगी। आन्दोलन ने जैसे-जैसे गति पकड़ी, उसने सेना के बीच भी अपने समर्थक तैयार किया। सेना के सैकड़ों जवान अपनी नौकरी की परवाह छोड़ आन्दोलन में शामिल हो गये। इसने सेना के अन्दर आन्दोलन का आधार बढ़ाने का काम किया। अभी तक सेना तटस्थ रही है। दूसरी ओर जनता मुबारक को बिना हटाए तहरीर चौक हटने का नाम नहीं ले रही है। जब मुबारक ने जनता को डराने के लिए टैंक उतारे तो हजारों नौजवान टैंक के सामने लेट गये। आज वे काहिरा की सड़कों पर खड़े धूल फांक रहे हैं। जनता की एकता के सामने वे लाचार हैं।
बारहवें दिन के प्रदर्शन के दौरान जब उपराष्ट्रपति उमर सुलेमान तहरीर चौक गये तो उनके ऊपर फायरिंग हुई। हमले में बाल-बाल बच गए हैं जबकि उनके दो बॉडीगार्ड मारे गए। 14 वें दिन भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। सेना भी इंतजार कर रही है कि ‘ऊंट किस करवट बैठेगा?’
मुबारक का जाना अलबरदेई का आना
ऐसा अन्दाजा लगाया जा रहा है कि मुबारक अमेरिका के उद्देश्य को पूरा करने के योग्य नहीं रह गया था। इसलिए वह अलबरदेई को लांच करना चाह रहा है। मौका भी उसके हाथ लग गया। इसलिए वह चाहता है कि किसी तरह मुबारक को बचाते हुए अलबरदेई के हाथ में कमान संभाल दी जाए। उधर नये उपराष्ट्रपति ओमार सुलेमान भी अमेरिका के विश्वस्त हैं। अमेरिका ने मिस्र में नई व्यवस्था के लिए अपनी ओर से तैयारी पूरी कर ली है। अब देखना यह है कि वह इसे लागू कर पाता है कि नहीं।
सउदी अरब
सऊदी अरब के बादशाह ने मिस्र के घटनाक्रम की कड़ी आलोचना की है। उन्हें डर है कि कहीं यह आन्दोलन उनके अपने देश में न फैल जाए। सउदी अरब ने कहा है कि ‘कोई भी अरब या मुश्लिम देश अभिव्यक्ति की आजादी और स्वतंत्रता के नाम पर मिश्र की सुरक्षा और स्थिरता से खिलवाड़ करने वालों को बर्खास्त नहीं करेगा।’ वहीं दूसरी ओर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान समेत ताकतवर देश भी मुबारक को अपना मौन व गुप्त समर्थन जारी रखे हुए हैं। हांलाकि इनमें से ज्यादातर ने मीडिया में मुबारक को संयत बरतने व जनता की मांगों पर गौर करने के लिए मुबारक को नशीहत दी है।
मिस्र, इजराइल, फिलिस्तीन सम्बन्ध
काहिरा की हर धड़कन अरब में सुनी जा सकती है। फिलिस्तीनी समस्या के समाधान के दिशा में भी मिस्र ने काफी प्रयास किया है। कुल मिलाकर इससे अमेरिका को फायदा ही हुआ है। राष्ट्रपति सद्दात ने इजरायल के साथ एक कामकाजी समझौता किया था। उसके बाद से अरब जगत और इजरायल के बीच काफी सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध रहे। हांलाकि यह नहीं भूलना चाहिए कि सद्दात को इस समझौते की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी।
आज इजरायल अमेरिका के बल पर भले ही दम्भ से भर जाए लेकिन वह आज भी मिस्र को अहमियत देता है। अरब में एक कहावत प्रसिद्ध है-‘मिस्र के सहयोग के बिना यहां न तो युद्ध हो सकता है और न सीरिया के बिना कोई समझौता।’ मिस्र की सीमा इजरायल से भी लगती है। इसलिए वह बहुत ही बारीकी से मिस्र में हो रही घटनाओं का अध्ययन कर रहा है। उसका डर स्वाभाविक है। मिस्र में तख्तापलट का असर इजरायल समेत अरब के दूसरे देशों पर भी पड़ेगा।
ट्यूनीशिया
अल अबदीन बेन अली 35 वर्षों तक ट्यूनीशिया के रहे। साल के शुरु में उनकी सत्ता के खिलाफ बगावत फूटने के बाद वे सऊदी अरब भाग गये। इस समय तुनिसिया नये परिवर्तन की हवा चल रही है।
तुनिसिया की राह चले सीरिया व सूडान
मिस्र के अलावा यमन, सूडान और जॉर्डन में भी आम जनता सरकार के विरोध में सड़क पर उतर आयी है और शासन तथा शासकीय व्यवस्था में परिवर्तन की मांग कर रही है। जॉर्डन में यह मांग अभी वर्तमान सरकार के इस्तीफÞे तक ही सीमित है।
यमन
ट्यूनीशिया की घटना का यमन पर भी असर पड़ा है। यमन में जनता ने व्यवस्था परिवर्तन से कम कुछ भी मानने से इंकार कर दिया है। यमन में तानाशाही शासन बहुत ही क्रूर रहा है। यहां नागरिक स्वतंत्रता बस नाम की चीज है। वहां सैनिकों और इसलामी कट्टरपंथियों के बीच होने आने वाली बेहद आम बात है। पिछले दिनों यमन के बंदरगाह में अमेरिकी नौसेना के वाहन पर हुआ इसलामी कट्टरपंथियों ने हमला किया था। अमेरिका ने यहां की तमाम सरकारों को अभी तक अपना पिठ्ठू बनाकर काम किया है। बहुत ही छोटा मुल्क होने के बावजूद इसने अलकायदा से खिलाफ उसकी लड़ाई में अमेरिका का साथ दिया। यमन में इस समय अमेरिका के खिलाफ लोगों में गहरा आक्रोश है।
ईरान
ईरान ने इसके विपरीत यह आशा प्रकट की है कि मिस्र के शासक अपने देश की मुस्लिम आवाम की ‘आशा एवं आकांक्षाओं’ के अनुरूप शासकीय व्यवस्था में आवश्यक सुधार लायेंगे, न कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इसको कुचलने का प्रयास करेंगे।
एशिया में फैल रहा अरब डर
अरब के जानकारों का मानना है कि तुनिसिया की आग समूचे अरब में फैलेगी। लेकिन एक सवाल यह भी उठना चाहिए कि क्या एशिया पर इसका कोई असर नहीं होगा। एक सवाल सहज ही दिमाग में आता है कि क्या मिश्र की यह आग पाकिस्तान को भी अपने लपेटे में ले सकती है।
चीन
एशिया में चीन और जापान की खास अहमियत रही है। जैसे ही तुनिसिया में आन्दोलन फूटा चीनी सरकार तुरन्त सचेत हो गयी। उसने तुरन्त ही अरब जगत की हलचल से जुड़े समाचारों के प्रसारण के चीन मे प्रसारण पर पाबन्दी लगा दी।
भारत
भारत को करीब 70 फीसद तेल की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती है। हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाला‘मनीआॅर्डर’का मुख्य योगदान है। मिश्र में करीब 3600 भारतीय मूल के नागरिक (पीआईओ)रहते हैं। आन्दोलन के बाद से इनकी परेशानी बढ़ गयी है। पश्चिमी एशिया के साथ भारत के अच्छे व्यावसायिक सम्बन्ध रहे हैं। इसलिए अरब का दर्द भारत भी दुखी कर सकता है।
श्रीलंका
श्रीलंका की प्रमुख विपक्षी दल यूनाइटेड नेशनल पाटी ने अपने देश में ऐसे ही विद्रोह की चेतावनी दी है। यूएनपी ने कहा कि श्रीलंका सरकार की ओर से विपक्ष के ऊपर कराये जाने वाले हमले बढ़ते ही जा रहे हैं। सरकार ने अखबारों की स्वतंत्रता पर सेंसर लगा दिया है। वह अपने खिलाफ आने वाली हर खबर को दबा देती है। अब तो सामान्य मांगों के लिए आन्दोलन करने वाले छात्रों तक को गिरफ्तार किया जाने लगा है। अगर सरकार इन्हें नहीं रोकती तो श्रीलंका में भी अरब जगत जैसी ही बगावत छिड़ सकती है। पार्टी के डिप्टी लीडर जयसूर्या ने कहा है कि श्रीलंका की शासक पार्टी आम जनता की आवाज का ज्यादा दिनों तक नहीं दबा पाएगी। अरब जगत में हो रहे बदलाव से सरकार को सबक लेना चाहिए।
अमेरिका
मिस्र को अमेरिका से हर साल 1.3 अरब डालर की सैन्य मदद मिलती है। अमेरिकी मदद पाने वाले राष्ट्रों में मिश्र दुनिया में चौथा सबसे बड़ा देश है। मिस्र को मिलने वाली यह मदद अरब में उसकी मजबूत स्थिति के चलते है। फिलहाल तो अमेरिका ने इजराइल के रुप में अरब में अपना एक और हितैषी तैयार किया है। लेकिन जब बात फिलिस्तीन और इजराइल की हो तो मिस्र ही दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। ईरान, सीरिया जैसे देशों को काबू करने में भी मिश्र अमेरिका का मददगार रहा है। यही वजह है कि ईरान के मामले में सख्त रुख अपनाने वाले ओबामा, मिश्र में मुबारक को शालीनता का पाठ पढ़ा रहे हैं। अमेरिका लोकतंत्र समर्थकों से भी बैर नहीं लेना चाहता साथ ही, वह मध्यपूर्व के अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी को भी नहीं खोना चाहता।
मोहम्मद अलबरदेई
लोकतंत्र समर्थकों के नेता और आईएईए के पूर्व प्रमुख मोहम्मद अलबरदेई को अमेरिका का विश्वस्त माना जाता है। जैसे ही मिस्र में आन्दोलन शुरु हुआ वे अमेरिका से मिश्र पंहुचे। मिस्र पहुंचते ही उन्होंने ऐलान किया कि ‘मुबारक को अब जाना ही होगा।’
बाजार
डाबर ने मिस्र में अपना कारखाना बंद किया .मिस्र की सरकार की ओर से इंटरनेट,फेसबुक आदि पर पाबन्दी लगाने के कारण उसे अभी तक 410 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। आर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक co-operation ऐंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने कहा है कि यह घाटा तो शुरुआती दिनों का है। हर रोज यह घाटा बढ़ता ही जा रहा है। मिस्र की अर्थव्यवस्था में इंटरनेट और दूसरे संचार माध्यमों का योगदान तीन से चार प्रतिशत रहा है। इसलिए आन्दोलन जितना लम्बा खिंचेगा यह घाटा भी बढ़ेगा।
सबसे ज्यादा प्रभावित
-काहिरा, अलेक्सांड्रिया इस दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित रहे।
-शफाह शहर में सेना मुख्यालय पर जनता ने किया हमला।
-जनता की ताकत के आगे मुबारक के टैंक बेअसर
अरब जगत में तानाशाही
इस समय अरब जगत के कुल 25 देशों में से 16 में तानाशाही है। तुनिसिया में बगावत फूटने के बाद से दस देशों की जनता ने बगावती तेवर अख्तियार कर लिया है। अल कायदा काअल जवाहिरी भी इसी खूबसूरत देश का रहने वाला है। ट्यूनीशिया के तानाशाह जिन अल अबदीन बेन अली को तो देश छोड़कर भागना ही पड़ गया है। इस समय अरब के ज्यादातर राष्ट्राध्यक्ष डर के साये में हैं।

दलितों के बीच पहुंचे ब्राम्हण देवता

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की दलित मुख्यमंत्री के मेरठ स्थित कार्यालय पर यहां के दलितों ने कब्जा जमा लिया। इस घटना से जिला प्रशासन के हाथ-पांव फूल गये। घटना जरुर नई थी लेकिन विषय पुराना था। मेरठ के दलितों को लग रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों के ऊपर जिस तरह से हमले होते रहते हैं, उस पर अब मुख्यमंत्री की निगाह नहीं जाती है। सही मायने में देखा जाए तो बात भी सही लगती है। अभी पिछले दिनों शरण लिंबाले ने एक किताब लिखी है। किताब का शीर्षक है ‘दलित ब्राहम्ण’। इस किताब में शरण लिंबाले ने एक नई किंतु सही बहस उठाई है। अगर यहां के दलितों ने इस किताब को पढ़ा होता तो शायद वे आज मायावती से इतनी ज्यादा उम्मीद नहीं पालते। यह अलग बात है कि वे इसे शायद ही पढ़ पाएं क्योंकि मुश्किल से 30 पेज की इस किताब का मूल्य पूरे 60 रूपया है। बहरहाल, आज दलितों के बीच एक तबका ऐसा जरुर पैदा हुआ है जो अपने आचार व्यवहार में सवर्णों की नकल करने का काम करता है। वह भी गरीब दलितों के साथ वैसे ही व्यवहार करता है जैसे कि ब्राम्हण करते हैं। सांस्कृतिक तौर पर इसने जरुर नई बहस का श्रीगणेश किया है।
भारत के मार्क्सवादी लम्बे समय तक भारत में यूरोपीय जमीन की तलाश करते रहे। यानी वहां वर्ग संघर्ष का जो स्वरुप था, उसी नजरिए से भारत को भी देख रहे थे। नतीजा, उन्होंने शूद्र जातियों के दुर्दशा के लिए आर्थिक पहलू को ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने क्लास स्ट्रगल का काम तो भारत में किया लेकिन उनके दिमाग में संदर्भ यूरोप का था। इस बात में भी दो राय नहीं कि उन्होंने दलितों के बीच खूब काम किया। यहां तक कि उनकी पार्टी सीपीआई को शुरुआती दिनों में यहां के सवर्ण शूद्रों की पार्टी कहा करते थे। लेकिन इसके बावजूद वे सामन्तवाद की सांस्कृतिक ताकत का सही ढंग से नहीं समझ पाये। भारत के कम्युनिस्टों और कुुछ मायनों में दुनिया के कम्युनिस्टों की भी यह समझ चीन में माओ के नेतृत्व में हुई सांस्कृतिक क्रांति के बाद ही बनी। भारत के कम्युनिस्ट अपनी इस नासमझी के लिए अपने ही देश के विभिन्न राजनीतिक ग्रुपों और आम जनता से आज तक गाली गाली खाते हैं।
जाहिर सी बात है कम्युनिस्टों के इस काम को अम्बेडकर जैसे लोगों ने पूरा किया। इसलिए जब काशीराम ने अम्बेडकर के विचारों की रोशनी में दलितों की पार्टी का गठन किया तो उसे दलितों के बीच अपना बढ़ाने में वक्त नहीं लगा। अब हालत यह है कि दोनों ही पार्टियों का गरीब दलितों के बीच आधार सिकुड़ रहा है। एक का अपनी गलत समझदारी के आधार पर तो दूसरी वर्ग रुपान्तरण के कारण। शरण लिंबाले ने इस बात को सही ढंग से समझा है और उसे उठाया भी जोरदार ढंग से है। बावजूद इसके यह गम्भीर बहस का विषय है। क्योंकि जिस समय कम्युनिस्टों ने गलती की थी, उस समय समाज में पूजीवादी उत्पादन सम्बन्ध ठीक से विकसित नहीं हुए थे, जबकि आज सामन्तवादी उत्पादन सम्बन्ध अवशेष की स्थिति में पहुंच गये हैं।
देवेन्द्र प्रताप
मोबाइल नंबर - 08909982424