Tuesday, May 17, 2011

पश्चिम बंगाल चुनावः नक्सलबाड़ी से जंगल महल


जाने-माने पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का यह आलेख आज प्रभात खबर,रांची में छपा है. पश्चिम बंगाल चुनावों के इतिहास और वर्तमान पर, उनके मुद्दों और राजनीति पर तथा उसके दूरगामी नतीजों पर रोशनी डालता हुआ यह आलेख उन सभी आलेखों से अलग है, जो या तो सीपीएम पर निशाना साधते हुए कम्युनिज्म को भी खारिज कर रहे हैं या फिर सीपीएम के समर्थन में ममता बनर्जी की विधान सभा चुनाव में जीत के प्रतिक्रियावादी अर्थ तलाश रहे हैं. जाहिर है, ममता बनर्जी उस राजनीति का हिस्सा हैं और उस राजनीति के जरिए ही सत्ता में आयी हैं जो फासीवादी और जनविरोधी चरित्र के आधार पर खड़ी है. ऐसे में उनके लिए सीपीएम या किसी भी पार्टी से बहुत अलग कुछ कर पाने की उम्मीद सही नहीं है. इसके संकेत दिखने भी लगे हैं, जब प बंगाल के वित्त मंत्री और दूसरे मंत्रालयों के लिए उद्योग जगत से जुड़ी हस्तियों के नाम सामने आ रहे हैं. फिर भी, पिछले साढ़े तीन दशक के सीपीएम के कथित वामपंथी शासन के बाद एक मध्यमार्गी पार्टी के राज्य के शासन में आने का क्या अर्थ है और इसमें कैसे भविष्य की आहटें छुपी हैं, इसकी तरफ यह आलेख संकेत करता है.
आमार बाड़ी नक्सलबाड़ी. यह नारा 1967 में लगा, तो सत्ता में सीपीएम के आने का रास्ता खुला. और पहली बार 2007 में जब आमारबाड़ी नंदीग्राम का नारा लगा, तो सत्ता में ममता बनर्जी के आने का रास्ता खुला.
1967 के विधानसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस हारी और पहली बार मुख्यमंत्री प्रफ़ुल्ल चंद्र सेन भी हारे. वहीं 2011 में पहली बार सीपीएम हारी और पहली बार सीपीएम के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी हारे. बुद्धदेव को उनके दौर में मुख्य सचिव रहे मनीष गुप्ता ने ठीक उसी तरह हराया, जैसे 1967 में कांग्रेसी सीएम प्रफ़ुल्ल सेन को उनके अपने मंत्री अजय मुखर्जी ने हराया. ममता के मंत्रिमंडल के अनमोल हीरे मनीष गुप्ता हैं और 1967 में तो अजय मुखर्जी ही संयुक्त मोरचे की अगुवाई करते हुए मुख्यमंत्री बने.
1967 में नक्सलबाड़ी से निकले वाम आंदोलन ने उन्हीं मुद्दों को कांग्रेस के खिलाफ़ खड़ा किया, जिसकी आवाज नक्सलवादी लगा रहे थे. किसान, मजदूर और जमीन का सवाल लेकर नक्सलबाड़ी ने जो आग पकड़ी, उसकी हद में कांग्रेस की सियासत भी आयी और वाम दलों का संघर्ष भी. और उस वक्त कांग्रेस ने वामपंथियों पर सीधा निशाना यह कह कर साधा कि संविधान के खिलाफ़ नक्सलवादियों की पहल का साथ वामपंथी दे रहे हैं. और संयोग देखिये 2007 में जब नंदीग्राम में केमिकल हब के विरोध में माओवादियों की अगुवाई में जब किसान अपनी जमीन के लिए व मजदूर-आदिवासी अपनी रोजी-रोटी के सवाल को लेकर खड़े हुए, तो इसकी आग में वामपंथी सत्ता भी आयी और ममता बनर्जी ने भी ठीक उसी तर्ज पर माओवादियों के मुद्दों को हाथों-हाथ लपका, जैसे 1967 में सीपीएम ने नक्सलवादियों के मुद्दों को लपका था.
यानी इन 44 बरस में बंगाल में सत्ता परिवर्तन के दौर को परखें, तो वाकई यह सवाल बड़ा हो जाता है कि जिस संगठन को संसदीय चुनाव पर भरोसा नहीं है, उसकी राजनीतिक कवायद को जिस राजनीतिक दल ने अपनाया, उसे सत्ता मिली और जिसने विरोध किया, उसकी सत्ता चली गयी. 1967 के बंगाल चुनाव में पहली बार सीपीएम ने ही भूमि सुधार से लेकर किसान मजदूर के वही सवाल उठाये, जो उस वक्त नक्सलबाड़ी एवं कृषक संग्राम सहायक कमेटी ने उठाये. 2007 में नंदीग्राम में केमिकल हब की जद में किसानों की जमीन आयी, तो माओवादियों ने ही सबसे पहले जमीन अधिग्रहण को किसान- मजदूर विरोधी करार दिया. और यही सुर ममता ने पकड़ा.
1967 से लेकर 1977 के दौर में जब तक सीपीएम की अगुवाई में पूर्ण बहुमत वाम मोरचा को नहीं मिला, तब तक राजनीतिक हिंसा में पांच हजार से ज्यादा हत्याएं हुईं. जिसमें तीन हजार से ज्यादा नक्सलवादी तो डेढ़ हजार से ज्यादा वामपंथी कैडर मारे गये. सैकड़ों छात्र जो मार्क्स- लेनिन की थ्योरी में विकल्प का सपना संजोये किसान-मजदूरों के हक का सवाल खड़ा कर रहे थे, वह भी राज्य हिंसा के शिकार हुए. हजार से ज्यादा को जेल में ठंस दिया गया. और इसी कड़ी ने कांग्रेसियों को पूरी तरह 1977 में सत्ता से ऐसा उखाड़ फ़ेंका कि बीते तीन दशक से बंगाल में आज भी कोई बंगाली कांग्रेस के हाथ सत्ता देने को तैयार नहीं है. इसीलिए राष्ट्रीय पार्टी का तमगा लिये कांग्रेस ने 1967 के दाग को मिटाने के लिए उसी ममता के पीछे खड़ा होना सही माना, जिसने 1997 में कांग्रेस को सीपीएम की बी टीम से लेकर चमचा तक कहते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में बगावत कर अपनी नयी पार्टी तृणमूल बनाने का ऐलान किया था.
लेकिन ममता के लिए 2011 के चुनाव परिणाम सिर्फ़ माओवादियों के साथ खड़े होकर मुद्दों की लड़ाई लड़ना भर नहीं है. बल्कि 1971-1972 में जो तांडव कांग्रेसी सिद्धार्थ शंकर रे नक्सलबाड़ी के नाम पर कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज तक में कर रहे थे. कुछ ऐसी ही कार्रवाई 2007 से 2011 के दौर में बुद्धदेव भट्टाचार्य के जरिये जंगल महल के नाम पर कोलकाता तक में नजर आया. इसी का परिणाम हुआ कि मई 2007 में नंदीग्राम में जब 14 किसान पुलिस फ़ायिरग में मारे गये, उसके बाद से 13 मई 2011 तक यानी ममता बनर्जी के जीतने और वाम मोरचे की करारी हार से पहले राजनीतिक हिंसा में एक हजार से ज्यादा मौतें हुई. करीब 700 को जेल में ठूंसा गया. आंकड़ों के लिहाज से अगर इस दौर में दलों और संगठनों के दावों को देखें, तो माओवादियों के 550 कार्यकर्ता मारे गये. तृणमूल कांग्रेस के 358 कार्यकर्ता मारे गये. सौ से ज्यादा आम ग्रामीण- आदिवासी मारे गये. सिर्फ़ जंगल महल के 700 से ज्यादा ग्रामीणों को जेल में ठूंस दिया गया. तो क्या जिन परिस्थितियों के खिलाफ़ साठ और सत्तर के दशक में वामपंथियों ने लड़ाई लड़ी, जिन मुद्दों के आसरे उस दौर में कांग्रेस की सत्ता को चुनौती दी, उन्हीं परिस्थितियों और उन्हीं मुद्दों को 44 बरस बाद वामपंथियों ने सत्ता संभालते हुए पैदा कर दी. जाहिर है ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि सत्ता संभालने के बाद ममता बनर्जी नहीं भटकेगी, इसकी क्या गारंटी है. जबकि ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद जो पहला निर्णय लिया था, वह नक्सलवादियों के संघर्ष के मूल मुद्दे से ही उपजा था.
21 जून 1977 को ज्योति बसु ने सीएम पद की शपथ ली और 29 सितंबर 1977 को वेस्ट बंगाल लैंड अमेंडमेंट बिल विधानसभा में पारित करा दिया. और दो साल बाद 30 अगस्त 1979 में चार संशोधन के साथ दि वेस्ट बंगाल लैंड फ़ार्म होल्डिंग रेवेन्यू बिल-1979 विधानसभा में पारित करवाने के बाद कहा, अब हम पूर्ण रूप से सामंती राजस्व व्यवस्था से बाहर आ गये. और इसके एक साल बाद 27 मई 1980 को ट्रेड यूनियनों से छीने गये सभी अधिकार वापस देने का बिल भी पास किया. इसी बीच 10 वीं तक मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा भी ज्योति बसु ने दिलायी. यानी ध्यान दें तो सीपीएम पहले पांच बरस में नक्सलबाड़ी से उपजे मुद्दों के अमलीकरण में ही लगी रही. और जनता से उसे ताकत भी जनवादी मुद्दों की दिशा में बढ़ते कदम के साथ मिला. लेकिन जैसे-जैसे चुनावी प्रक्रिया में सत्ता के लिए वामपंथियों ने अपनी लड़ाई पंचायत से लेकर लोकसभा तक के लिए फ़ैलायी और चुनाव के केंद्र में सत्ता न गंवाने की सोच शुरू हुई, वैसे-वैसे सीपीएम के भीतर ही कैडर में प्रभावी ताकतों का मतलब वोट बटोरनेवाले औजार हो गये. और यहीं से राजनीति जनता से हट कर सत्ता के लिए घुमड़ने लगी.
जाहिर है ममता ने भी चुनाव जनता को जोर पर मां, माटी, मानुष के नारे तले जीता है. और सत्ता उसे जनता ने दी है. इसलिए ममता के सत्ता संभालने के बाद बिलकुल ज्योति बसु की तर्ज पर बंगाल में कुछ निर्णय पारदर्शी होंगे. जैसे जंगल महल के इलाके में ज्वाइंट-फ़ोर्स का ऑपरेशन जो माओवादियों को खत्म करने के नाम पर हो रहा है, वह बंद होगा. राज्य की बंजर जमीन पर इंफ्रास्ट्रक्चर शुरू कर औद्योगिक विकास का रास्ता खुलेगा. छोटे किसान, मजदूर और आदिवासियों के लिए रोजगार और रोजगार की व्यवस्था होने से पहले रोजी-रोटी की व्यवस्था ममता अपने हाथ में लेगी. बीपीएल की नयी सूची बनाने और राशन कार्ड बांटने के लिए एक खास विभाग बना कर काम तुरंत शुरू करने की दिशा में नीतिगत फ़ैसला होगा. जमीन अधिग्रहण के एवज में सिर्फ़ मुआवजे की थ्योरी को खारिज कर औद्योगिक विकास में किसानों की भागीदारी शुरू होगी. यानी कह सकते हैं कि माओवादियों के उठाये मुद्दे राज्य नीति का हिस्सा बनेंगे. लेकिन यहीं से ममता की असल परीक्षा भी शुरू होगी.

ममता के सामने चुनौती माओवादियों को मुख्यधारा में लाने का भी होगा और अभी तक सत्ताधारी रहे वाम कैडर को कानून-व्यवस्था के दायरे में बांधने का भी.ज्योति बसु ने नक्सलवादियों को ठिकाने अपने कैडर और पुलिसिया कार्रवाई से लगाया. और उस वक्त सत्ता राइट से लेफ्ट में आयी थी. लेकिन ममता का सोच अलग है. यहां लेफ्ट के राइट में बदलने को ही बंगाल बरदाश्त नहीं कर पाया, राइट से निकली ममता कहीं ज्यादा लेफ्ट हो गयी. इसलिए बंगाल पुलिस के पास भी वह नैतिक साहस नहीं है, जिसमें वह माओवादियों को खत्म कर सके. क्योंकि बंगाल पुलिस का लालन-पोषण बीते दौर में उन्हीं वामपंथियों ने किया, जिसका कैडर वाम फ़िलासफ़ी को जमीन में गढ़ कर सत्ता में प्रभावी बना. जाहिर है ममता ने सीपीएम का हश्र देख लिया और बंगाल के मानुष के अतिवाम मिजाज को भी समझ लिया है, जो बीते 44 बरस में नहीं बदला है.
इसलिए ममता डिगेगी यह तो असंभव है, लेकिन ममता माओवादियों से तालमेल बैठा कर कैसे सत्ता चलाती है और बंगाल को कैसे बदलती है, नजर सभी की इसी पर है.
Sabhar Hasia blog

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