सोमवार, 4 अप्रैल 2011

शान न इसकी जाने पाये..

पिछले दिनों एक दोस्त के साथ उनके आफिस जाना हुआ। मौका था 26 जनवरी का। मेरे दोस्त राष्ट्रवादी विचारों के हैं। कोढ़ में खाज यह कि वे परले दर्जे के भावुक हैं। इसलिए उनका अनुरोध टालना मेरे बस के बाहर था। उनके संस्थान के निदेशक का आदेश था कि सभी लोग 10 बजे तक हर हाल में इस दिन आयें। साहब का आदेश था तो भला किसकी हिम्मत थी कि न आता।
मेरे मित्र मुझे लेकर 9 बजे ही पहुंच गये। उस समय साहब लोगों में से कोई मौजूद नहीं था। उस संस्थान में दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर आफिस के एक चपरासी के साथ इन्तेजाम में लगे हुए थे। हमें देखते ही मजदूरों ने बारी-बारी सलामी ठोकी। ऐसा लग रहा था जैसे वे झण्डे को सलामी दे रहे हों। इसी दौरान एक मजदूर पाइप में बांधने के लिए झण्डा लेकर जा रहा था कि एकाएक दरवाजे पर हमसे टकरा गया। हड़बड़ाहट में उसके हाथ से झण्डा छूटकर जमीन पर गिर गया। झण्डा गिरना था कि मेरे दोस्त को लगा जैसे पाकिस्तान ने कश्मीर को फतह कर लिया हो। उन्होंने तेजी से उसे एक भद्दी गाली दी। तुम्हीं लोगों की वजह से आज देश की यह हालत है। मजदूर बस साहब..साहब .. कहता रह गया। ‘अब जाओ भी’ उन्होंने फिर से उसे डांटा।
10 बजे तक आॅफिस के ज्यादातर लोग आ चुके थे। निदेशक साहब 11 बजे के आसपास पहुंचे। पहुंचते ही वे तुरन्त स्टेज पर चढ़ गये। इधर उन्होंने झण्डे की डोर खींची कि तुरन्त मधुर स्वर में जन-गण-मन अधिनायक जय हे का गीत बजने लगा। सभी सावधान की मुद्रा में उसे दोहरा रहे थे। उनमें सबसे ज्यादा बेसुरी आवाज मेरे दोस्त की थी, इसलिए वह अलग से पहचान में आ रही थी। सब कुछ इतना रुटीन वर्क की तरह था कि सभी उसे करके अपना कोरम पूरा कर रहे थे। एकाएक मैंने ध्यान दिया कि वे लोग जिन्होंने इस पूरे आयोजन की तैयारी की थी, वे दीवार के पीछे छिपे हुए हैं। राष्ट्रगान जब हो रहा था तब उनके सिर का कुछ हिस्सा दिख रहा था। लेकिन जैसे ही निदेशक साहब ने बुलन्द आवाज में भाषण देना शुरु किया उनका सिर दिखना बन्द हो गया। शायद वे बैठ गये होगें...। उन्हें क्यों नहीं राष्ट्रगान के दौरान बुलाया गया? वे दीवार के पीछे क्यों चले गये? ऐसे ही कई सवाल मन में उठ रहे थे, लेकिन मित्र से पूछने में मैं डर रहा था।
झण्डा हवा में लहरा रहा था और मैं इन्हीं खयालों में डूबा मित्र के साथ अपने कमरे पर आ गया।
- देवेन्द्र प्रताप
9719867313

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