Monday, March 28, 2011

आजादी

हम कितने आजाद है

अनिल चमड़िया

आजादी का कोई एक अर्थ नहीं होता।जितने हिस्सों में पूरी दुनिया में समाज बंटा है , उसमें सबके लिए फौरी तौर पर आजादी के मतलब अलग अलग होते हैं। अपने समाज में भी आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों के देश से भगाने से जुड़ा रहा है।यदि आजादी की एक परिभाषा पूछी जाए तो इसके जवाब में केवल यही कहा जा सकता है कि मानव समाज का हर सदस्य अपने तमाम तरह के बंधनों से मुक्ति चाहता है। बंधन राजनीतिक , आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक होते है , ये केवल बंधनों को समझने का एक आसान तरीका है। हम जिन अर्थों में आज इस विषय पर चर्चा कर रहे है वह 1947 तक अंग्रेज शासको के खिलाफ चले आंदोलन से जुड़ा हैं। 1947 से पहले का सैकड़ों वर्ष हमारी गुलामी में कटा है, ऐसा माना जाता है। यह गुलामी इन अर्थों में कि इस भूगोल में जो लोग राजकाज चलाते थे वे बाहर से आए थे और हमलों के जरिये यहां के शासन व्यवस्था पर काबिज हो गए। हम सभी उनके मताहत होकर रहने लगे। हमने ये नारा दिया कि यदि शासन व्यवस्था की कमान यहां के मूल बासिंदों हाथों में आ जाएगी तो हमारे समाज में जो गैर बराबरी है, जो अन्याय हैं वो सब खत्म हो जाएंगे। हमने 1947 में ये हासिल कर लिया ये दावा किया जाता है। लेकिन 1947 में जो स्थिति हमारे समाज की थी क्या उससे आजादी हमें मिल सकी है ? मोटेतौर पर देखें तो समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने को आजादी की स्थिति में कतई महसूस नहीं करता है।वह बाहरी लोगों की गुलामी को ही बेहतर मानता है। इसीलिए अब भी लोग यह कहते हुए मिल सकते हैं कि अंग्रेज ही अच्छे थे।

1947 में देश के लोगों के बीच जो मिलजूलकर रहने का एक समझौता हुआ था वह समझौता कामयाब नहीं दिख रहा है। देश के एक बड़े हिस्से में इस शासन व्यवस्था को भी लोग पराये लोगों की शासन व्यवस्था के रूप में देखते हैं। उत्तर पूर्व का बड़ा हिस्सा मानता है कि उसके साथ जो अब तक व्यवहार किया गया है , वह पराये लोगों द्वारा किए जाने वाले व्यवहार से भी बदत्तर हैं। कश्मीर के लोग कहते है कि वे अपनी आजादी चाहते हैं। गरीब अमीर के मताहत है। छोटी जातियां बड़ी जातियों के मातहत है। औरतें पुरूषों की गुलामी में रहती है ऐसा उनका मानना है। मजदूर बड़े किसानों और सामंतों के मताहत गुलाम है। हमारे मूल्क में आजादी का प्रश्न समाजवादी व्यवस्था से जुड़ा है। संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि जाति, धर्म, लिंग, भाषा किसी भी आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। केवल बराबरी का नारा ही आजादी के नारे का जवाब हो सकता है। लेकिन हकीकत है कि बराबरी का ये संकल्प हमने केवल संविधान की किताब के लिए किया है। देश में चंद अमीर है तो ढेरों गरीब है। 20 रूपये रोजाना पर सत्तहतर प्रतिशत से ज्यादा आबादी रहती है। आजादी की लड़ाई के वक्त गांधी ने बताया था कि एक अंग्रेज और एक आम हिन्दुस्तानी की कमाई में पांच हजार गुना का अंतर है। जबकि यह अंतर करोड़ों में पहुंच गया है।देश का धार्मिक अल्पसंख्यक अपने को बहुसंख्यकों के उन्माद के आगे असुरक्षित महसूस करता है। पंजाब की एक बड़ी आबादी अपने देश को छोड़कर जा चुकी है। मशहूर चित्रकार हुसैन ने तो भारत की नागरिकता तक छोड़ दी।ऐसे ढेरों उदाहरण है जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि 1947 में जिस तरह की आजादी के आने का दावा किया गया उस आजादी के कुछ बड़े हिस्सेदार है तो कुछ छोटे और बहुत सारे ऐसे है जिन्हें कोई हिस्सा नहीं मिला।संविधान आबादी की हर ईकाई को अपना नागरिक मानता है लेकिन जमीनी सच है कि आबादी का बड़ा हिस्सा नागरिक का दर्जा भी प्राप्त नहीं कर सका है।दरअसल आजादी का अर्थ यहां बुनियादी जरूरतों के पूरा करने से जुड़ा रहा है।यूरोप और अमीर देशों में आजादी के अर्थ बुनियादी जरूरतों की पूर्ति से आगे निकल गए हैं।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी सबके लिए अलग अलग हदें हैं।

आंदोलनों की एक बड़ी भूमिका यह होती है कि आंदोलनों के बाद शासन व्यवस्था पर चाहें जिसका कब्जा हो जाए लेकिन आजादी का नारा हर उस व्यक्ति को एक बड़े हथियार के रूप में मिल जाता है जोकि खुद को गुलामी में महसूस करता है। अंग्रेजों के जाने के बाद आजादी के कई अर्थ सामने लाए गए। मसलन कहा गया कि राजनीतिक आजादी तो मिल गई लेकिन आर्थिक आजादी नहीं मिली। मसलन कहा गया कि दूसरी आजादी की जरूरत है। जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में जब जनता सरकार बन गई और विफल हो गई तो कहा जाने लगा कि तीसरी आजादी की जरूरत है। मसलन कहा गया कि 1947 की आजादी झुठी है। आजादी की पहली लड़ाई 1857 की है और उस लड़ाई को पूरी करके आजादी हासिल करनी है। कहने का मतलब है कि आजादी की भाषा में समाज के विभिन्न वर्ग व तबके अपनी अपनी आजादी की तलाश कर रहे हैं।

1947 के बाद कई अर्थों में आजादी की लड़ाई व्यापक हुई हैं। अपना देश बनाने की आजादी से लेकर घरों तक में वह पहुंची है।दरअसल आजादी के नारे का अब दो तरह से इस्तेमाल हो रहा है। समाज का बड़ा हिस्सा आजादी को सही अर्थों में अपने अपने तरीके से तलाश रहा है। लेकिन दूसरा हिस्सा जोकि बहुत छोटा है वह आजादी के हथियार को हमले के लिए इस्तेमाल कर रहा है।1947 के बाद के देश में जो वर्ग संपन्न हुआ है वह दुनिया में खुद के सबसे ज्यादा ताकतवरों की जमात में शामिल होना चाहता है। इसीलिए वह यह बात जोरशोर से कहता है कि वह राष्ट्र को सबसे ज्यादा ताकतवर बनाना चाहता है।इसके लिए वह देश के सबसे निर्धन और पिछड़े लोगों के घरों और पैरों के नीचे की जमीन को अपने कब्जे में करना चाहता है। आदिवासियों के जल जंगल जमीन को वह अपनी ताकत बढ़ाने के लिए हथियाना चाहता है। उनकी निर्ममता से पिटाई की जा रही है। जाहिर सी बात है कि जिस आजाद राष्ट्र को ताकतवर बनाने की बात यह वर्ग कर रहा है वह आदिवासियों को राष्ट्र का नागरिक नहीं मानता। राष्ट्र का मतलब संपन्न वर्ग की सत्ता के रूप में उभरकर सामने आता है। आजादी का मतलब इसी वर्ग की आजादी के रूप में उभरकर सामने आता है। हम आजाद है , यह मुख्यधारा के वर्ग का दावा है।

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