Saturday, September 18, 2010

क्या हम भगत सिंह को जानते हैं?

कुँवरपाल सिंह
पूछिए तो कहते हैं कि हाँ बहुत बड़ा क्रांतिकारी बलिदानी व्यक्ति था। देश के लिए अपनी जान दे दी। हमारा प्रेरणा स्रोत है। किन्तु बहुत कम लोग जानते हैं कि भगत सिंह बीसवीं शताब्दी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच एक प्रमुख बुद्धिजीवी भी थे। आज उन्हें इसी रूप में याद करने की आवश्यकता है। लगभग दो साल वे जेल में रहे। इस बीच उन्होंने बहुत सी पुस्तकें पढ़ीं। इनमें यूरोप-अमरीका के विद्वान, चिंतक, बुद्धिजीवी साहित्यकारों की पुस्तकें हैं। उनका पूर्ण राजनीतिक जीवन 18 साल का रहा और कुल उम्र 25 साल। अजीब संयोग है कि रानी लक्ष्मीबाई भी 23 साल की उम्र में अँग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हो गयीं। भगत सिंह के अन्य साथी यतीन्द्रनाथ ने 65 दिन तक आमरण अनशन किया-जेल सुधार तथा मानवाधिकारों के लिए। इसके बाद वह भी 23 वर्ष की आयु में शहीद हो गये। उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। ब्रिटिश सरकार भी मजबूर हो गयी। क्रान्तिकारियों का यह प्रभाव भी पड़ा कि वहाँ पढ़ने लिखने की सामग्री दी जाने लगी। यह सुधार कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ, लगभग उसी रूप में आज भी मौजूद है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनकी चार महत्वपूर्ण कृतियाँ- The ideal Of Socialism (समाजवाद का आदर्श), History of Revolutionary Movement in India (भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास), At the Door of Death (मौत के दरवाजे पर), जेल से बाहर तो आई थीं किन्तु वे कहाँ गयीं किसी को पता नहीं। उनकी जेल नोटबुक जरूर प्रकाश में आई, जो उनके भाई कुलबीर सिंह के पास थी। यह बात रूसी विद्वान एल.वी. मित्रोखिन के जरिए मालूम हुई। यह नोटबुक उन्हें 1977 में मिल गयी। 1981 में उन्होंने भगत सिंह पर एक विस्तृत शोध-निबंध लिखा था। बाद में जगमोहन सिंह तथा डॉ. चमनलाल ने भगत सिंह के दस्तावेजों को हिन्दी में प्रकाशित करवाया। फिर भगत सिंह की जेल नोटबुक को लम्बी भूमिका के साथ 'शहीदे आजम की जेल डायरी' नाम से सत्यम वर्मा ने संपादित किया तथा यह 1999 में परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित हुई। यह जेल नोटबुक भगत सिंह तथा क्रांतिकारी आंदोलन के बारे में हमारी ज्ञान-वृद्धि करती है। भगत सिंह लाहौर जेल में 1929 से 23 मार्च, 1931 तक, फाँसी पर चढ़ाए जाने से पूर्व नोटबुक लिखते रहे।
बीसवीं सदी के किसी भी लेखक या बुद्धिजीवी में इतनी वैचारिक प्रगति नहीं दिखती, जितनी भगत सिंह में। 1918 से उनका आंदोलनकारी सफर आरंभ हुआ। तब वे आर्य समाजी थे, फिर सुधारवादी फिर अराजकतावादी होते हुए अंत में वैज्ञानिक समाजवाद के साये में आये। आतंकवाद को वे गलत समझते थे। उनका विचार था कि बिना संगठन और पार्टी के कोई परिवर्तन संभव नहीं है, क्रांतिकारी के रूप में ये दोनों बहुत आवश्यक हैं। लेनिन उनके आदर्श थे। कहना प्रासंगिक होगा कि फाँसी का बुलावा आया तो भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे, तब उन्होंने एक हाथ उठा कर कहा कि रुको, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है। उन्होंने नौजवानों से अपील की कि ''व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ने के लिए आपको जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, वह है एक पार्टी जिसके पास जिस टाइप के कार्यकर्ताओं का ऊपर जिक्र किया जा चुका है, वैसे कार्यकर्ता हों-ऐसे कार्यकर्ता जिनके दिमाग साफ हों और जिनमें समस्याओं की तीखी पकड़ हों और पहल करने और तुरन्त फैसला लेने की क्षमता हो। इससे पार्टी का अनुशासन बहुत कठोर होगा और यह जरूरी नहीं है कि वह भूमिगत पार्टी हो, बल्कि भूमिगत नहीं होनी चाहिए- पार्टी को अपने काम की शुरूआत अवाम के बीच प्रचार से करनी चाहिए। किसानों और मज़दूरों को संगठित करने और उनकी सक्रिय सहानुभूति प्राप्त करने के लिए यह बहुत जरूरी है। इस पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टी का नाम दिया जा सकता है।'' (दो फरवरी 1931 को युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम अपील से) भगत सिंह ने इस देश की जनता को तीन नारे दिये- 1. इंकलाब-जिन्‍दाबाद, 2. किसान-मजदूर जिन्‍दाबाद (कम्युनिस्ट पार्टी का आज भी यही नारा है) 3. साम्राज्यवाद का नाश हो। ये तीनों नारे आज हमारी श्रमिक एवं संघर्षशील जनता के कंठहार हैं। भगत सिंह ने महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि अपने समय के क्रांतिकारी आंदोलन को पुराने क्रांतिकारी आंदोलन की रूढ़वादी परम्परा से विमुक्त किया। पुराने क्रांतिकारी किसी न किसी देवी-देवता के उपासक थे और दृढ़ ईश्वर विश्वासी थे। वे इस सबको नियति का खेल मानते थे। भगत सिंह ने कहा कि इस प्रकार के क्रांतिकारी अंत में साधु-सन्यासी बन जाते हैं। उन्होंने धर्म को राजनीति से अलग रखने का सबसे अधिक प्रयास किया। राजनीति और धर्म के मेल में देशभक्ति की भावना मर जाती है, अपने इसी विचार को नौजवानों तक पहुँचाने के लिए भगत सिंह ने एक लेख लिखा-'मैं नास्तिक क्यों हूँ' जो आज भी बहुत चाव से पढ़ा जाता है। भगत सिंह ने यह भी कहा कि ''हमें धर्मनिरपेक्ष राजनीति की जरूरत है। हमें ऐसी राजनीति की जरूरत नहीं जो किसी भी धर्म को महत्व दे।'' भगत सिंह की यह बात बहुत सही ठहरती है क्यों कि पिछले 40 साल से धर्म की राजनीति हो रही है और दंगे कराये जा रहे हैं। आज तो इस में जाति का भी समावेश हो गया है। धर्म की राजनीति करने वाले लोग हर समस्या का हल अतीत में देखते हैं। उनके लिए हर समस्या का हल उनके धार्मिक ग्रंथों में निहित है। ऐसे दिवास्वप्न देखने वाले लोग देश का क्या भला करेंगे। भगत सिंह की रचनाओं के आधार पर उनका एक संक्षिप्त मूल्यांकन हमने किया है। यह वर्ष उनका जन्म शताब्दी वर्ष है। 'वर्तमान साहित्य' उन पर यत्किंचित सामग्री दे रहा है। भगत सिंह पर उनके साथी शिव वर्मा के संस्मरण तथा उनके द्वारा लिखी पुस्तक 'भगत सिंह की चुनी हुई रचनाएं' हिन्दी व अँग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध हैं। इसे विशेष रूप से पढ़ने का आग्रह है। भगत सिंह ने भारत में क्रांति की संभावना पर जो विचार दिया है वह आज भी सार्थक है-''क्रान्ति परिश्रमी विचारकों और परिश्रमी कार्यकर्ताओं की पैदावार होती है। दुर्भाग्य से भारतीय क्रान्ति का बौद्धिक पक्ष हमेशा दुर्बल रहा है। इसलिए क्रान्ति की आवश्यक चीजों और किये गये काम के प्रभाव पर ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए एक क्रान्तिकारी को अध्ययन मनन को अपनी पवित्र जिम्मेदारी बना लेना चाहिए।''
(वरिष्ठ साहित्यकार कुंवरपाल सिंह का लेख साभार प्रस्तुत कर रहे है)

वह शहीद नहीं था

सुरजीत पातर
उसने कब कहा
शहीद हूं मैं
फांसी का रस्सा चूमने से कुछ रोज पहले
उसने तो केवल यही कहा था
कि मुझसे बढ़ कौन होगा खुशकिस्मत ...
मुझे नाज़ है अपने आप पर
अब तो बेहद बेताबी से
अंतिम परीक्षा की है प्रतिक्षा मुझे
कब कहा था उसने : मैं शहीद हूं


शहीद तो उसे धरती ने कहा था
सतलुज की गवाही पर
शहीद तो, पांचों दरिया ने कहा था
गंगा ने कहा था
ब्रह्मपुत्र ने कहा था
शहीद तो उसे वृक्षों के पत्ते-पत्ते ने कहा था


आप जो अब धरती से युद्धरत हो
आप जो नदियों से युद्धरत हो
आप जो वृक्षों के पत्तों तक से युद्धरत हो


आपके लिये बस दुआ ही मांग सकता हूं मैं
कि बचाये आपको
रब्ब
धरती के शाप से
नदियों की बद्दुआ से
वृक्षों की चित्कार से।
(पंजाबी से अनुवाद- मनोज शर्मा)

पाश की भगत सिंह पर एक कविता

अवतार सिंह संधु 'पाश' पंजाबी के प्रख्‍यात शायर थे । वे वामपंथी आंदोलन में सक्रिय रहे। आजाद मुल्‍क़ के लिए जैसे समाज का ख्‍़वाब भगत‍ सिंह देख रहे थे, पाश वैसे ही समाज बनाने की जद्दोजहद में लगे थे। पंजाब में जिस दौरान अलगाववादी आंदोलन चरम पर था, पाश ने इसका खुलकर विरोध किया। ज़ाहिर है, वे इसके ख़तरे से अच्‍छी तरह वाकि़फ़ भी थे। ... पाश भी उसी दिन शहीद हो गये जिस दिन भगत सिंह शहीद हुए थे... सिर्फ सन् अलग- अलग थे। पाश महज़ 38 साल की उम्र में 23 मार्च 1988 को शहीद हो गये थे। भगत‍ सिंह पर लिखी गयी उनकी कविता यहॉं पेश है-

शहीद भगत सिंह
-पाश
पहला चिंतक था पंजाब का
सामाजिक संरचना पर जिसने
वैज्ञानिक नज़रिये से विचार किया था

पहला बौद्धि‍क
जिसने सामाजिक विषमताओं की, पीड़ा की
जड़ों तक पहचान की थी

पहला देशभक्‍त
जिसके मन में
समाज सुधार का
ए‍क निश्चित दृष्टिकोण था

पहला महान पंजाबी था वह
जिसने भावनाओं व बुद्धि‍ के सामंजस्‍य के लिए
धुँधली मान्‍यताओं का आसरा नहीं लिया था
ऐसा पहला पंजाबी
जो देशभक्ति के प्रदर्शनकारी प्रपंच से
मुक्‍त हो सका
पंजाब की विचारधारा को उसकी देन
सांडर्स की हत्‍या
असेम्‍बली में बम फेंकने और
फॉंसी के फंदे पर लटक जाने से कहीं अधिक है
भगत सिंह ने पहली बार
पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
ब‍ुद्धि‍वाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फांसी दी गयी
उसकी कोठरी में
लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्‍ना मोड़ा गया था
पंजाब की जवानी को
उसके आखिरी दिन से
इस मुड़े पन्‍ने से बढ़ना है आगे
चलना है आगे
(पंजाबी से अनुवाद: मनोज शर्मा, साभार: उद्भावना)

हम हैं इसके मालिक, हिन्‍दुस्‍तान हमारा

सन् 1857 के महासमर के 150 साल हो रहे हैं। हमारी कोशिश होगी कि शहीद ए आज़म पर इस महासमर से जुड़ी चीज़ें पाठकों के लिए मुहैया करायें। ख़ासकर वैसी सामग्री, जो आमतौर पर नहीं मिल पातीं।
आज यहां एक ऐसी कविता दी जा रही है, जिसे आप इस मुल्‍क का पहला क़ौमी तराना कहें तो शायद गलत नहीं होगा। आज से 150 साल पहले, मुल्‍क़ का ऐसा तसव्‍वुर नहीं था। राजा- रजवाड़ों के दिमाग में भी नहीं। यह गीत महासमर के एक मशहूर योद्धा अजीमुल्‍ला खां ने रचा था।
हम हैं इसके मालिक हिन्‍दुस्‍तान हमारा,पाक वतन है कौम का जन्‍नत से भी न्‍यारा।
ये है हमारी मिल्कियत, हिन्‍दुस्‍तान हमाराइनकी रूहानियत से रोशन है जग सारा।
कितना कदीम कितना नईम, सब दुनिया से प्‍यारा,करती है ज़रख़ेज़ जिसे गंगो-जमुन की धारा।
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा,नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्‍कारा।
इसकी खानें उगल रही हैं, सोना, हीरा, पारा,इसकी शानो-शौकत का दुनिया में जयकारा।
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा,लूटा दोनों हाथ से, प्‍यारा वतन हमारा।
आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा,तोड़ो गुलामी की जंज़ीरें बरसाओ अंगारा।
हिन्‍दू-मुसलमां, सिख हमारा भाई-भाई प्‍यारा,यह है आजादी का झंडा, इसे सलाम हमारा।

भगत सिंह होने का मतलब

इरफ़ान हबीब
'मैं घोषणा करता हूं कि मैं आतंकवादी नहीं हूं और अपने क्रांतिकारी जीवन के आरंभिक दिनों को छोड़कर शायद कभी नहीं था। और मैं मानता हूं कि उन तरीकों से हम कुछ हासिल नहीं कर सकते।'
-भगत सिंह
निस्संदेह भगतसिंह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के सर्वाधिक प्रसिद्ध शहीदों में से एक रहे हैं। हालांकि अधिकतर उन्हें गोली चलाने वाले युवा राष्ट्रवादी की रोमांटिक छवि से परे नहीं देख पाते। इसका कारण शायद यह है कि उनकी यही छवि औपनिवेशिक दौर के सरकारी दस्तावेजों में दर्ज की गई। लोग भगतसिंह को एक ऐसे शख्स के रूप में देखते थे,जो अपने हिंसात्मक कारनामों से ब्रिटिश शासन को आतंकित कर देता था। उनकी जबरदस्त हिम्मत ने उन्हें एक प्रतिमान बना दिया। भगतसिंह को आज भी प्यार और श्रद्धा की नजर से देखा जाता है,लेकिन क्या हमें उनकी राजनीति और विचारों के बारे में कुछ पता है?और क्या उनके हिंसा व आतंक में विश्वास के शुरुआती नजरिए के बारे में भी कुछ पता है (जो मौजूदा आतंकवादी हिंसा से एकदम अलग चीज थी),जिसे उन्होंने शीघ्र ही एक ऐसे क्रांतिकारी दृष्टिकोण में बदल लिया जो स्वाधीन भारत को एक धर्मनिरपेक्ष,समाजवादी और समतावादी समाज में बदलने से वास्ता रखता था।
भगत सिंह को जनता की ओर से इस तरह का मुक्त समर्थन क्यों मिला,जबकि उसके पास पहले से ही नायकों की कमी नहीं थी?इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है। जब देश के सबसे बड़े नेताओं का तात्कालिक लक्ष्य स्वतंत्रता प्राप्ति था,उस समय भगत सिंह,जो बमुश्किल अपनी किशोरावस्था से बाहर आये थे,उनके पास इस तात्कालिक लक्ष्य से परे देखने की दूरदृष्टि थी। उनका दृष्टिकोण एक वर्गविहीन समाज की स्थापना का था और उनका अल्पकालिक जीवन इस आदर्श को समर्पित रहा। भगत सिंह और उनके साथी दो मूलभूत मुद्दों को लेकर सजग थे,जो तात्कालिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक थे। पहला,बढ़ती हुई धार्मिक व सांस्कृतिक वैमन्स्यता और दूसरा,समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन। भगत सिंह और उनके कामरेडों ने क्रांतिकारी पार्टी के मुख्य लक्ष्यों में से एक के बतौर समाजवाद को लाने की जरूरत महसूस की। सितंबर 1928 में दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में महत्वपूर्ण क्रांतिकारियों की बैठक में इस पर विचार विमर्श के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) में सोशलिस्ट शब्द जोड़ कर एचएसआरए बना दिया गया। भगत सिंह अपने साथियों को यह समझाने में सक्षम थे कि भारत की मुक्ति सिर्फ राजनीतिक आजादी में नहीं,बल्कि आर्थिक आजादी में है।
समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता 8 अप्रैल 1929 को उनके द्वारा असेंबली में बम फेंकने की कार्रवाई में भी प्रकट हुई। भगतसिंह दरअसल 1920 के दौर में सांप्रदायिकता के बढ़ते खतरे के प्रति सजग हुए। उसी दशक में आरएसएस और तबलीगी जमात का उदय हुआ। उन्होंने सांप्रदायिकतावादी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की नीति पर सवाल किए।
एक राजनीतिक विचारक के रूप में वह तब परिपक्व हुए जब अपनी शहादत से पहले उन्होंने दो साल जेल में रहते हुए गुजारे। उनकी जेल डायरी पूरी स्पष्टता से उनकी राजनीतिक बनावट के विकास को दिखाती है। जेल में ही उन्होंने अपना विख्यात लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं' लिखा। यह लेख तार्किकता की दृढ़ पक्षधरता के साथ अंधविश्वास का पुरजोर खंडन करता है। भगत सिंह मानते थे कि धर्म शोषकों के हाथ का औजार है जिसका इस्तेमाल वे जनता में ईश्वर का भय बनाए रखकर उनका शोषण करने के लिए करते हैं।
एचएसआरए के नेताओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण समय के साथ विकसित हुआ और उनमें से अधिकतर समाजवादी आदर्श या साम्यवाद के करीब आए। वे व्यक्तिगत कार्रवाइयों के बजाय जनांदोलन में भरोसा रखते थे। भगत सिंह उस संघर्ष को लेकर एकदम स्पष्ट राय रखते थे। उन्होंने अपने आखिरी दिनों में कहा था-
‘भारत में यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठी भर शोषक आम जनता के श्रम का शोषण करते रहेंगे। यह कोई मायने नहीं रखता कि ये शोषक खालिस ब्रिटिश हैं, ब्रिटिश व भारतीय दोनों सम्मिलित रूप से हैं या विशुद्ध भारतीय हैं।’
हमें भगतसिंह की जन्मशती के मौके पर उनके द्वारा सोचे गए शासन के वैकल्पिक ढांचे पर रोशनी डालनी चाहिए,जिसमें आतंक या हिंसा नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय सर्वोपरि होगा।

दुर्गा भाभी: एक परिचय

जेण्‍डर विभेद सिर्फ परिवारों में ही नहीं होता बल्कि समाज के हर क्षेत्र में इसका बोलबाला है। फिर चाहे वो क्रांतिकारियों को याद करने का ही मामला क्‍यों न हो। आजादी के लिए जान न्‍योछावर करने वाले को ही हम कितना याद करते हैं, यह खुद एक सवाल है। महिला क्रांतिकारियों की तो बात जाने दें। इसके बावजूद पुरुष क्रांतिकारी के बारे में फिर भी कुछ पता होता है, महिला क्रांतिकारियों के बारे में तो तलाशने पर भी मुश्किल से जानकारी मिल पाती है। आज ऐसी ही एक महिला क्रांतिकारी की पैदाइश का दिन है... उनकी पैदाइश की सौवीं सालगिरह।
एक दृश्‍य- पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की शहादत के बाद अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्‍या। हत्‍यारों की तलाश में हर जगह जबरदस्‍त मोर्चाबंदी। लाहौर रेलवे स्‍टेशन। 18 दिसम्‍बर 1928। चार लोग। दो मर्द, एक औरत और एक बच्‍चा। इनमें दो लोग पति-पत्नी थे और बच्‍चे के साथ ट्रेन के पहले दर्जे के डिब्बे में बैठे। नौकर तीसरे दर्जे में था। ये और कोई नहीं बल्कि वे क्रांतिकारी थे, जिन्‍होंने पंजाब केसरी की मौत का बदला लिया था। पति के रूप में भगत सिंह थे तो पत्‍नी दुर्गावती देवी थीं और नौकर सुखदेव। दुर्गावती देवी, एक और क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की जीवन साथी और बाकि क्रांतिकरियों की दुर्गा भाभी। और इस तरह दुर्गा भाभी ने साहसी काम कर दिखाया और भगत सिंह को अपना शौहर बनाकर लाहौर से अंग्रेजों के जबड़े से निकालकर कलकत्‍ता पहुँचा आयीं।
आने वाले दिनों में भगत सिंह ने जो किया, वो उन्‍हें शहीदे आज़म के दर्जे तक ले गया और उनकी जन्‍म शताब्‍दी का भी यह साल है। पर उनके साथ ही यह साल दुर्गाभाभी की भी जन्‍म शताब्‍दी का साल है। भगत सिंह तो याद रहे पर दुर्गा भाभी आज के क्रांतिकारियों को भी याद नहीं रहीं। यहां तक कि इंटरनेट, जिसे जानकारी का खजाना माना जाता है, वहां भी दुर्गा भाभी के बारे में न तो जानकारी मिलती है, फोटो की बात तो दूर है। भगत सिंह 28 सितम्‍बर 1907 में पैदा हुए थे और दुर्गा भाभी उसी साल सात अक्‍टूबर को इलाहाबाद में। 11 साल की उम्र में उनकी शादी लाहौर के भगवती चरण वोहरा से हुई। भगवती चरण वोहरा पढ़ाई के दौरान क्रांतिकारी आंदोलन के हिस्‍सा बन गये और उनके साथ ही दुर्गावती देवी भी कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगीं। ये दोनों भगत सिंह के काफी करीब थे। क्रांतिकारी आंदोलन के जो भी खतरे थे, दुर्गा भाभी ने वो सारे खतरे उठाये और एक मजबूत क्रांतिकारी बन कर उभरीं। भगत सिंह और उनके साथियों को जब सजा हो गयी तो उन्‍हें छुड़ाने की योजना बनी। लाहौर में बनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने भी इनका योगदान था। इसी योजना के तहत बम बन रहे थे। उन बम का परीक्षण रावी नदी के तट पर होना तय हुआ। परीक्षण के दौरान ही बम फट गया और भगवती चरण वोहरा की मौत हो गयी... और दुर्गा भाभी को आखिरी वक्‍त में उनका चेहरा भी देखने को नहीं मिला। इस व्‍यक्तिगत और भयानक हादसे के बावजूद वो डिगी नहीं... टूटी नहीं। आंदोलन का हिस्‍सा बनी रहीं।
इसी दौरान क्रांतिकारियों ने बम्‍बई के अत्‍याचारी गर्वनर हेली को मारने की योजना बनाई गयी। इस योजना को अंजाम देने वालों में दुर्गा भाभी भी थीं। उन्‍होंने गोलियां भी चलाईं। लेकिन यह वक्‍त क्रांतिकारी आंदोलन के उरुज और अवसान दोनों का था। एक एक करके क्रांतिकारी आंदोलन के बड़े कारकुन शहीद हो गये... भगवती चरण वोहरा, शालिग्राम शुक्‍ल, चन्‍द्रशेखर आजाद और फिर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु। इस हालत में भी दुर्गा भाभी आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश्‍ा करती रही। वे पुलिस की पकड़ में भी आयीं। जेल भी गयी और नजरबंद भी रहीं। सन् 1936 में वे गाजियाबाद आ गयीं। फिर लखनऊ। 20 जुलाई 1940 को उन्‍होंने लखनऊ में पहला मांटेसरी स्‍कूल स्‍थापित किया। उन्‍होंने अपना मकान शहीदों के बारे में शोध के लिए दान दे दिया। आखिरी वक्‍त में वे अपने पुत्र शचीन्‍द्र वोहरा के पास गाजियाबाद चली गयी थीं। इस महान क्रांतिकारी ने 14 अक्‍तूबर 1999 को 92 साल की उम्र में हमेशा के लिए इस जहाँ से विदा ले लिया।
जिसने अपने सुख दुख की परवाह किये बगैर, बिना कुछ चाहने की ख्‍वाहिश रखे अपना सब कुछ दॉंव पर लगा दिया हो, उस महान महिला क्रांतिकारी को याद रखना हमारी जिम्‍मेदारी है। क्‍या हम उस जिम्‍मेदारी को निभा रहे हैं।

Friday, September 17, 2010

तब लोगों को मेरी याद आएगी- भगत सिंह

23 मार्च भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत का दिन है। हालाँकि किसी को पुण्यतिथि या जन्‍मदिन पर याद करना, औपचारिकता ही लगती है। इसके बावजूद यह औपचारिकता कई बार जरूरी है। खासतौर पर उस वक्‍त जब हम देशभक्ति की बातें तो बड़ी-बड़ी करें पर देश में रहने वाले लोगों के बारे में ज़रा भी न सोचें। इसी बात को याद दिलाने के लिए भगत सिंह (Bhagat Singh) की रचनाओं में से चुनी गई कुछ लाइनें यहाँ पेश है।
भगत सिंह (Bhagat Singh) के चंद विचार ''चारों ओर काफी समझदार लोग नज़र आते हैं लेकिन हरेक को अपनी जिंदगी खुशहाली से बिताने की फिक्र है। तब हम अपने हालात, देश के हालात सुधरने की क्‍या उम्‍मीद कर रहे हैं।''
(1928)
'' वे लोग जो महल बनाते हैं और झोंपडि़यों में रहते हैं, वे लोग जो सुंदर-सुंदर आरामदायक चीज़ें बनाते हैं, खुद पुरानी और गंदी चटाइयों पर सोते हैं। ऐसी स्थिति में क्‍या करना चाहिए? ऐसी स्थितियाँ यदि भूतकाल में रही हैं तो भविष्‍य में क्‍यों नहीं बदलाव आना चाहिए? अगर हम चाहते हैं कि देश की जनता की हालत आज से अच्‍छी हो, तो यह स्थितियाँ बदलनी होंगी। हमें परिवर्तनकारी होना होगा।''
(अगस्‍त 1928)
'' हमारा देश बहुत अध्‍यात्मिक है लेकिन हम मनुष्‍य को मनुष्‍य का दर्जा देते हुए भी हिचकते हैं।''
'' उठो, अछूत कहलाने वाले असली जन सेवकों तथा भाइयों उठो... तुम ही तो देश का मुख्‍य आधार हो, वास्‍तविक शक्ति हो... सोए हुए शेरों। उठो, और बग़ावत खड़ी कर दो।''
(अछूत समस्‍या 1928)
'' संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्‍ट्र के हों, हक एक ही हैं।''
'' धर्म व्‍यक्ति का निजी मामला है, इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं, न ही इसे राजनीति में घुसना चाहिए।''
(1927)
''जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्‍दीली से लोग हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और घोर निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, अन्‍यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है।''
''अंग्रेजों की जड़ें हिल गई हैं और 15 साल बाद में वे यहाँ से चले जाएँगे। बाद में काफी अफरा-तफरी होगी तब लोगों को मेरी याद आएगी।''
(12 मार्च 1931)
''मैं पुरजोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर जीवन की समस्‍त रंग‍ीनियों से ओतप्रोत हूँ। लेकिन वक्‍त आने पर मैं सबकुछ कुरबान कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है।''
(सुखदेव के नाम पत्र, 13 अप्रैल 1929)
जहाँ तक प्‍यार के नैतिक स्‍तर का सम्‍बंध है... '' मैं कह सकता हूँ कि नौजवान युवक-युवतियाँ आपस में प्‍यार कर सकते हैं और वे अपने प्‍यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं।''
(सुखदेव को पत्र , 1928)
-नसीरुद्दीन

भगत सिंह- राजगुरु- सुखदेव की याद

Nasiruddin
आज भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत का दिन है। मुझे नहीं मालूम कि हम में से कितने लोगों को यह दिन याद रहता है। लेकिन इनकी शहादत को याद रखना मेरे लिए काफी अहम है। मैं भूलना भी चाहूँ तो शायद मुमकिन नहीं। इसीलिए महीनों से ब्‍लॉग की दुनिया से दूर रहने के बावजूद मैं यह पोस्‍ट करने पर मजबूर हो रहा हूँ।
तेइस साल। यही उम्र थी भगत सिंह की जब उन्‍हें फाँसी दी गई। मैं तो तेइस साल में कुछ नहीं कर पाया। भगत सिंह के बारे में आप जितना ही पढ़ते जाएँगे, आप अपने होने पर सवाल खड़े करने लगेंगे। आपको लगेगा कि क्‍या वाकई में हम एक ऐसे नौजवान के वारिस हैं, जिसने इतनी कच्‍ची उम्र में इतने पक्‍के खयालात बनाए। देश-दुनिया के बारे में इतना पढ़ गया, जितना हममें से कई दश्‍कों में नहीं पढ़ पाते। इतना कह और सोच गया कि लाख छिपाने पर उसके विचार छिप न सके।
यह कहना की भगत सिंह महान थे, जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है उस राह पर चलना जिस पर भगत सिंह ने हँसते-हँसते जान न्‍यौछावर कर दिया। यह काम कोई सिरफिरा या पागल नहीं कर सकता था। यह काम वही कर सकता था, जिसे अपने मकसद के बारे में जरा भी गलतफहमी नहीं थी।
जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो अक्‍सर ऐसे टीचर और नेताओं से मुलाकात होती, जो हमें तो भगत सिंह के विचारों से प्रेरित होने और उनके रास्‍ते पर चलने की सलाह देते। लेकिन अपने बेटे- बेटियों से हमेशा यह राह छिपा कर रखा करते। अगर किसी का बेटा या बेटी भटकता हुआ उधर गुजरने की कोशिश करता तो उसे यह समझाकर वापस लौटा लाते कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं। (भौतिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हुई हैं।) ‘यानी भगत सिंह बहुत महान। बहुत अच्‍छे। लेकिन भगत सिंह मेरे घर में नहीं बल्कि पड़ोसी के घर पैदा लें।‘ यही आज के मध्‍यवर्ग का मानस भी है। आज इसी मानस का फैलाव दूर-दूर तक है। इसलिए भगत‍ सिंह की वीरता के गान हम भले ही आज जितना गा लें। उनके विचार से दो चार होने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते क्‍योंकि विचार बड़े बदलाव की ओर ले जाते हैं। बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती।