Friday, July 30, 2010

आदिवासी और माओवादी एक तरफ हैं और राजसत्ता दूसरी तरफ


‘पुलिस दुश्मन के साथ है’क्रांतिकारी कवि और विचारक वरवर राव बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में पुलिस कैंप पर हमला ऑपरेशन ग्रीन हंट के बदले में किया गया था. तहलका में प्रकाशित शोभिता नैथानी से बातचीत से अंश-साभार.

पश्चिम बंगाल में जवानों की निर्मम हत्या पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है। जवान माओवादियों के खिलाफ कॉम्बिंग ऑपरेशन का हिस्सा हैं. सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जंगल की जमीन सौंप कर आदिवासियों को संसाधनों से वंचित कर रही है. इस उद्देश्य से जब पुलिस भेजी जाती है तो पुलिस और माओवादियों के बीच संघर्ष होता है. सरकार अपने ही लोगों को विस्थापित कर रही है, उनकी हत्या कर रही है. इसलिए इस घटना को अलग करके नहीं देखिए, बल्कि ऐसे देखिए कि ये क्यों हो रहा है. ऐसा दो भिन्न विकास मॉडलों के बीच टकराव के कारण हो रहा है. सरकारी मॉडल को जनता से कुछ लेना-देना नहीं है.
लेकिन जो मारे गए वे गरीब कांस्टेबल थे, और अपने परिवार की जीविका कमाने के लिए ड्यूटी कर रहे थे।
किसी युद्ध के दौरान पुलिस गरीब लोगों की ही भर्ती करती है। लेकिन यहां वे दुश्मन के साथ है- उनके जरिए राजसत्ता लोगों पर दमन चलाती है.

इस हमले का लक्ष्य क्या है?

गणपति (भाकपा माओवादी के महासचिव) ने मांग की है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गतिविधियां खत्म की जाएं, अर्धसैनिक बलों को वापस बुलाया जाए और माओवादी नेताओं नारायण सान्याल, अमिताभ बागची, सुशील राय और कोबाद गांधी को छोड़ा जाए। और यह कि जंगल की संपत्ति और इसके खनिज को आदिवासियों के हाथों में सौंप दिया जाए. इसे एक क्रांति से और एक वकल्पिक जनता की सत्ता से ही पूरा किया जा सकता है.

इस हमले से क्या हासिल हुआ?

यह एक या दो हमलों की बात नहीं है। कोई हमला अलग-थलग हमला नहीं है. अगर राज्य हिंसा को नहीं रोकता है तो ऐसे हमले होंगे.
क्या पुलिस के अत्याचारों को रोकने का हिंसा एकमात्र रास्ता है? या मुद्दे को सुलझने के लिए कोई

लोकतांत्रिक जनांदोलन संभव है?

यह एक लोकतांत्रिक आंदोलन है।

आप इसे लोकतांत्रिक कैसे कह सकते हैं, जब इसमें हिंसा हो रही है?

एक सरकार जो संसदीय चुनावों के जरिए सत्ता में आती है और एक संसदीय लोकतंत्र के तहत शपथ लेती है, उसने देश के अधिकतर हिस्सों में सैनिक शासन चला रखा है, जिसमें मुठभेड़ों में हत्याएं और ऑपरेशन ग्रीन हंट शामिल है। क्या यह लोकतांत्रिक है?

माओवादी किनका प्रतिनिधित्व करते हैं?

मेहनतकश वर्ग, आदिवासियों, मुसलमानों, दलितों, महिलाओं- जो कोई भी उत्पादन की प्रक्रिया का हिस्सा है- माओवादी उन सबका प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन किशन से अलग हुए माओवादी जोनल कमांडर मार्शल ने तहलका को बताया है कि माओवादी आदिवासी समर्थक नहीं हैं। यह सलवा जुडूम जसी दलील है। सरकार कहती है कि सलवा जुडूम आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन यह सही नहीं है. सरकार उनको (मार्शल) नियंत्रित कर रही है और उनसे ऐसा बुलवा रही है.

साल पहले यह फैसला करने के बाद भी कि वे स्कूलों को नहीं गिराएंगे, माओवादी क्यों स्कूल की इमारतों को जला रहे हैं?

क्योंकि उनका उपयोग पुलिस कैंप के रूप में हो रहा था। आप केवल प्रतिक्रियाओं के बारे में पूछ रही हैं, कार्रवाइयों के बारे में नहीं पूछ रही हैं. माओवादी आदिवासियों के लिए स्कूल चला रहे हैं, और वे आदिवासियों के लिए स्वास्थ्य कार्यक्रम भी चला रहे हैं.

क्या इसकी संभावना है कि माओवादी हथियार डाल कर बातचीत शुरू कर सकते हैं?

अगर सरकार युद्धविराम की घोषणा करता है और माओवादियों पर से प्रतिबंध हटाता है तो वे बातचीत करेंगे।बहुत सारे आदिवासी माओवादियों और राज्य के बीच में फंसे हुए हैं।
यह आपका मानना है. माओवादी वहां आदिवासियों के लिए हैं. वे जंगल की जमीन की अपने लिए नहीं, आदिवासियों के लिए मांग कर रहे हैं. आदिवासी और माओवादी एक तरफ हैं और राजसत्ता दूसरी तरफ. जिन आदिवासियों को यह नहीं लगता कि माओवादी उनके साथ है, उन्हें जब इसका फायदा दिखेगा तो वे भी ऐसा मानने लगेंगे।

Tuesday, July 20, 2010

नेपाली माओवाद और भारत नेपाल संबंधों पर अमलेंदु उपाध्याय की आनंद स्वरुप वर्मा से बातचीत


आनन्द स्वरूप वर्मा देश के जाने माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। संभवत:नेपाल की राजनीति और खासतौर पर वहां की माओवादी राजनीति पर भारत में उनसे ज्यादा गहराई के साथ कम ही लोग जानते हैं। अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाने वाले वर्मा जी जब रौ में बोलते हैं तो इतना सच कि जुबां कड़वी हो जाए। जाहिर है सच कड़वा ही होता है। छपास डॉट कॉम के राजनीतिक संपादक अमलेन्दु उपाध्याय ने उनसे नेपाली माओवाद और भारत नेपाल संबंधों पर लम्बी बातचीत की। साभार प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-
आपकी फिल्म 'फ्लेम्स ऑफ स्नोÓ पर सेंसर बोर्ड ने पाबंदी क्यों लगा दी?सेंसर बोर्ड का कहना है कि इस देश में अभी जो माओवादी आन्दोलन है, उसका जो विस्तार हुआ है उसे देखते हुए हम इस फिल्म पर रोक लगा रहे हैं। लेकिन हमारा कहना है कि इस फिल्म में भारत के माओवादी आन्दोलन के विषय में एक शब्द भी नहीं कहा गया है, कोई फुटेज भी नहीं है कोई स्टिल भी नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर नेपाल के आन्दोलन पर, केवल माओवादी आन्दोलन पर नहीं बल्कि वहां के समग्र आन्दोलन पर कोई फिल्म बनाई जा रही है तो उसको यह बहाना देकर रोकना एकदम अनुचित है। क्योंकि यह फिल्म माओवादी आंदोलन के ऊपर नहीं है बल्कि उसके ऊपर केन्द्रित है। क्योंकि इस फिल्म की शुरूआत होती है जब पृथ्वीनारायण शाह ने नेपाल की स्थापना की थी यानि दो सौ ढाई सौ साल के दौरान जो आन्दोलन हुए उनकी झलक देते हुए यह माओवादी आन्दोलन पर केन्द्रित हो जाती है। क्योंकि यह मुख्य आन्दोलन था जिसने वहां राजशाही को समाप्त किया। अब अगर आप यह कहते हैं कि इस फिल्म से यहां के माओवादियों को प्रेरणा मिलेगी तो किसी एक जनतांत्रिक देश में इस तरह की बात कहकर किसी फिल्म को रोकना अनुचित है। तब तो अगर नेपाल के आन्दोलन पर कोई पुस्तक लिखी जाएगी तो भी प्रेरणा मिलेगी? यह स्थिति तो बिल्कुल जो हमारा फन्डामेन्टल राइट यानि अभिव्यक्ति की आजादी है उसका गला घोंटना है।
क्या भारत का माओवाद और नेपाल का माओवाद अलग-अलग है?मेरे विचार में हर देश का माओवाद अलग-अलग होता है। क्योंकि जितने भी विचारक रहे हैं मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओत्से तुंग या आज के दौर में प्रचण्ड, सबका यही कहना है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद जो एक सिद्धान्त है, उसको आप अपने देश की सांस्कृतिक, भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के अनुरूप लागू कीजिए। हर देश की राजनीतिक सामाजिक पृष्ठभूमि अलग होती है। नेपाल में राजतंत्र था और वहां एक जबर्दस्त सामंती राजनैतिक व्यवस्था थी। उसमें उन्होंने वहां किस परिस्थिति में माओवाद को लागू किया यह उनका मामला है। भारत के माओवाद और नेपाल के माओवाद में बहुत फर्क है। क्योंकि उन्होंने तो चुनाव में भी हिस्सा लिया और सरकार बनाई। जबकि भारत में अभी ऐसी स्थिति नहीं है। दोनों स्थितियों में फर्क तो काफी है। लेकिन नेपाल के माओवादी आन्दोलन से भारत के माओवादी आन्दोलन को प्रेरणा लेने का सवाल है, जैसा कि सेंसर बोर्ड कहता है तो वह यह भी प्रेरणा ले सकते हैं कि किस तरह कोई आन्दोलन आम जनता के बीच न केवल आदिवासियों के बीच पॉपुलर हो सकता है, मध्यवर्ग को भी प्रभावित कर सकता है, मध्यवर्ग को भी अपने दायरे में ले सकता है और वह एक निरंकुश व्यवस्था के खिलाफ सफल हो सकता है। तो दोनों में फर्क तो है। अब भारत में जो लोग हैं जो सत्ता में बैठे हैं जो सेंसर बोर्ड देख रहे हैं उनकी अकल इतनी नहीं है कि इतना विश्लेषण कर सकें।
क्या आपको लगता है कि भारत की सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था माओवादियों के खिलाफ हो चुकी है?
भारत के माओवादियों के?
नहीं यह तो एक दूसरा सवाल हो गया क्योंकि इसका मुझसे कोई मतलब नहीं है। ( हंसते हुए) अगर आप हमसे भारत के माओवादी आन्दोलन पर बातचीत करना चाहते हैं तो एक अलग बात है। हमसे तो नेपाल पर ही बात करें।
चलिए नेपाल पर ही केन्द्रित होते हैं। अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि नेपाल के माओवादियों से भारत के माओवादियों को समर्थन और मदद मिलती रही है और नेपाली माओवादियों का रुख हमेशा से भारत विरोधी रहा है। क्या नेपाली माओवादी वास्तव में भारत विरोधी हैं?
इसके लिए तो आपको यह देखना होगा कि भारत के माओवादियों की केन्द्रीय समिति और उनके बड़े नेता गणपति के हस्ताक्षर से अब से एक डेढ़ साल पहले खुली चि_ी नेपाल के माओवादियों को लिखी गई जिसमें नेपाली माओवादी आन्दोलन की तीखी आलोचना की गई। इस पत्र में यह आलोचना की गई कि नेपाली माओवादी क्रांति का रास्ता छोड़ करके संशोधानवादी हो गए। यह तो दोनों के संबंधों की बात है। जहां तक नेपाल के माओवादियों से मदद मिलते रहने की बात है तो वह इस स्थिति में कभी नहीं रहे कि भारत जैसे किसी विशाल देश के किसी संगठन को मदद कर सकें। अगर आप दोनों देशों के एरिया और आबादी की और रिसोर्सेस से तुलना करें तो देखेंगे कि वह भारत के मुकाबले कहीं ठहरते ही नहीं हैं। ऐसे में वह अपने को संभालेंगे कि भारत के माओवादियों की मदद करेंगे। इसलिए कोई भौतिक मदद या इस तरह की मदद की बात नहीं है लेकिन बिरादराना संबंध वह मानते हैं। वह तो भारत के माओवादियों के साथ, पेरू के माओवादियों के साथ, कोलंबिया के माओवादियों के साथ, हर देश के माओवादियों के साथ एक बिरादराना संबंध मानते हैं। वैसे ही भारत के माओवादियों के साथ मानते हैं। इससे ज्यादा उनका कोई लेना देना नहीं है।
लेकिन प्रचण्ड प्रधानमंत्री बनते ही पहले चीन गए जबकि परंपरा रही है कि नेपाल का राजनेता पहले भारत आता है। वैसे भी हम नेपाल के ज्यादा नजदीक हैं, क्योंकि हमारे सदियों पुराने संबंधा नेपाल से हैं। इस कदम से नहीं लगा कि प्रचण्ड के मन में भारत के प्रति कोई गांठ है?
देखिए यह कौन सी परंपरा है कि कोई प्रधानमंत्री जो बनेगा वह पहले भारत आएगा? भारत कोई मंदिर है जो वहां जाएगा और मत्था टेकेगा? जहां तक मेरा सवाल है मैं इस परंपरा के एकदम खिलाफ हूं। दूसरी बात किन परिस्थितियों में प्रचण्ड भारत न आकर चीन गए उसे देखना पड़ेगा। किसी भी विषय पर बात करते समय उस पूरी प्रक्रिया को देख लीजिए न कि केवल परिणिति। केवल परिणिति को देखने पर सही निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेंगे। वह पूरी प्रक्रिया क्या थी मैं आपको थोड़ा संक्षेप में बता दूं। वहां पर बीजिंग में ओलंपिक खेल चल रहे थे चीन में। खेलों के उद्धाटन के समय चीन ने वहां के राष्ट्रपति को निमंत्रण दिया। रामबरन यादव को, जो नेपाली कांग्रेस के हैं। वह जब निमंत्रण मिला तो भारत के नेपाल में राजदूत राकेश सूद ने राष्ट्रपति से कहा कि आप चीन मत जाइए, इससे भारत को अच्छा नहीं लगेगा। तो राष्ट्रपति ने कहा कि हम नहीं जाएंगे। अब केवल बात राष्ट्रपति और राकेश सूद के बीच की होती तो यह किसी भी तरह स्वीकार्य हो सकती थी। मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह भी स्वीकार्य नहीं है। लेकिन डिप्लोमैटिक रूप से एकबारगी यह स्वीकार्य हो सकता है। लेकिन राकेश सूद ने यह जानकारी प्रेस को दी कि हमने मना कर दिया और राष्ट्रपति नहीं गए। अब नेपाल की आम जनता को यह बात बहुत अच्छी नहीं लगी कि हमारे राष्ट्रपति को एक, मतलब राष्ट्रपति तो बहुत बड़ा पद है न, राष्ट्रपति को एक ब्यूरोक्रेट भारत का मना कर दे और वह मान जाए। जब समापन समारोह के लिए, तब यह प्रचण्ड प्रधानमंत्री नहीं बने थे, 15 अगस्त 2008 को बने हैं, और उनको जाना था 16 या 17 अगस्त को, इनको भी निमंत्रण मिला समापन समारोह के लिए और प्रचण्ड ने स्वीकृति दे दी थी। राकेश सूद ने उन्हें भी मना किया कि आप मत जाइए। तब प्रचण्ड ने कहा कि मैंने स्वीकृति दे दी है तो फिर सूद ने कहा कि आप मत जाइए भारत को अच्छा नहीं लगेगा। उन्होंने कहा मैं क्यों नहीं जाऊं जब मैंने स्वीकृति दे दी है मैं जाऊंगा। और वह चले गए। मान लीजिए कि प्रचण्ड उस समय नहीं जाते और राकेश सूद इस बात को भी प्रेस में देता ही कि हमने मना किया तो एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति और प्रधाानमंत्री को भारत का राजदूत मना कर दे कि आप यह न करें वह न करो, यह उचित नहीं है। इसलिए अपनी देश की जनता की भावनाओं को देखते हुए प्रचण्ड के लिए चीन जाना जरूरी हो गया था। अगर राकेश सूद ने यह गड़बडिय़ां नहीं की होतीं तो शायद वह इसको एवायड भी कर सकते थे। इसलिए इस घटना का विश्लेषण पूरी परिस्थिति देखकर ही करना चाहिए। हालांकि प्रचण्ड ने भी इसके बाद जो कहा मैं उससे भी बहुत सहमत नहीं हूं कि 'मेरी पहली राजनीतिक यात्रा तो भारत की ही होगी। क्या जरूरत थी यह भी कहने की। नेपाल एक संप्रभु राष्ट्र है वह भारत का कोई सूबा नहीं है कोई प्रॉविंस नहीं है कोई प्रांत नहीं है।
देखने में आ रहा है कि माओवादियों का आन्दोलन नेपाल में भी कुछ कमजोर पड़ता जा रहा है और आम जनता पर उनकी पकड़ कुछ ढीली पड़ती जा रही है। क्या कारण हैं कि माओवादी कमजोर पड़ रहे हैं?यह कहने का आधार कोई है?
जी बिल्कुल। अभी उन्होंने हड़ताल का आह्वान किया और लोगों ने सड़को पर उतरकर उसका विरोधा किया तो उन्हें हड़ताल वापस लेनी पड़ी?
नहीं। एक मई को जो हड़ताल का आह्वान किया था, वह आप नेपाल के किसी भी सोर्स से पता कर लीजिए अखबार से, जो बुर्जुआ अखबार हैं उनसे मालूम कीजिए वह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। रहा सवाल यह हड़ताल वापस लेने का तो वैसे भी उस को चार पांच दिन से अधिक नहीं चलाते क्योंकि उससे वहां की आम जनता को काफी दिक्कतें उठानी पड़तीं। लेकिन एक चीज का ध्यान दीजिए कि राजतंत्र समाप्त तो हो गया, भौतिक रूप से समाप्त हो गया। लेकिन अभी तमाम राजावादी तत्व सभी पार्टियों में मौजूद हैं। सामन्तवाद वहां अभी मौजूद है, वह तो समाप्त नहीं हुआ है। तो बहुत सारे ऐसे तत्व हैं जो इस समय अपने को माओवादियों के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान माओवाद विरोधी ताकतों को नजदीक आने का एक अच्छा मौका मिला है। इसमें बहुत सारी अन्तर्राष्ट्रीय ताकतें जिसमें अमेरिका और स्वयं भारत भी शामिल है, इन्होंने माओवाद के खिलाफ तत्वों की मदद की है। निश्चित रूप से जो खबरें आई हैं वह सही हैं कि कुछ प्रदर्शन हुए हैं काठमांडू में लेकिन काठमांडू और शहर तो कभी भी माओवादियों के आधार नहीं रहे उनका आधार तो ग्रामीण इलाका है। काठमांडू में जरूर इस तरह के तत्व हैं लेकिन केवल इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि उनकी पकड़ कमजोर पड़ गई है। क्योंकि जिस दिन माओवादियों की पकड़ कमजोर पड़ जाएगी उन्हें नष्ट करने में एक मिनट का भी समय वह ताकतें नहीं लगाएंगी जो उनकी विरोधी हैं।
प्रचण्ड ने बीच में एक बार आरोप लगाया था कि उनकी सरकार गिराने में विदेशी ताकतों का हाथ था और खासतौर पर उन्होंने भारत की तरफ इशारा किया था और आपने सुना भी होगा कि योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया था कि राजतंत्र की बहाली के लिए वह नेपाल जाएंगे, बाबा रामदेव भी वहां गए और आरएसएस के प्रचारक इन्द्रेश जी के भी नेपाल में पड़े रहने की खबरें आई थीं। तो क्या आपको लगता है कि भारत की दक्षिणपंथी ताकतें माओवादियों के खिलाफ नेपाल में काम कर रही हैं?
जी हां, प्रचण्ड ने केवल संकेत ही नहीं दिया था बल्कि उन्होंने खुलकर कहा था कि भारत ने उनकी सरकार गिराने में पूरी मदद की थी। और उसकी वजह थी कि सेनाध्यक्ष रुकमांगद कटवाल वाला प्रकरण। कटवाल को जब प्रचण्ड ने बर्खास्त किया तो तीन-तीन बार कटवाल ने प्रधानमंत्री के आदेशों की अवहेलना की थी। इसलिए जरूरी हो गया था उन्हें बर्खास्त करना। उस समय भी राकेश सूद ने प्रचण्ड से कहा था कि अगर आप कटवाल को बर्खास्त करेंगे तो इसके बहुत गम्भीर परिणाम होंगे। अपमानजनक शब्दावली प्रयोग की थी हमारे राजदूत ने। इस राजदूत ने तो ठेका ले रखा है नेपाल की जनता को भारत विरोधी बनाने का। जबकि हम लोग लगातार यह प्रयास करते हैं कि दोनों देशों की जनता के बीच एक सद्भाव बना रहे। लेकिन राकेश सूद की वजह से यह सद्भाव बहुत समय तक बना नहीं रह पाएगा। इसके बाद प्रचण्ड ने कटवाल को बर्खास्त किया। एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को यह अधिकार है कि वह सेनाधयक्ष को बर्खास्त कर सके। उन्होंने बर्खास्त किया और राष्ट्रपति ने उन्हें बहाल कर दिया। उन राजनीतिक दलों ने खासतौर पर नेकपा एमाले जो वहां की प्रमुख राजनीतिक दल है उसके अधयक्ष झलनाथ खनाल ने, जिनकी पार्टी सरकार में शामिल थी, वायदा किया कि कटवाल की बर्खास्तगी का वह समर्थन करेंगे। लेकिन जब प्रचण्ड ने बर्खास्त किया तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। यह प्रचण्ड का मानना है और वहां की जनता का मानना है कि नेकपा एमाले ने जो समर्थन वापिस लिया वह भारत के इशारे पर वापिस लिया। अब यह बात सही है या गलत मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। लेकिन आम नेपाली जनता के अन्दर धारणा यही है, राकेश सूद की हरकतों की वजह से, कि भारत ने ही प्रचण्ड की सरकार गिराने में मदद की। और यही बात प्रचण्ड ने भी कही है। तो एक बात तो है कि भारत की भूमिका इस समय अच्छी नहीं रही। जिस समय नवंबर 2005 में बारह सूत्रीय समझौता हुआ था उसके बाद से भारत की बहुत अच्छी गुडविल बन गई थी नेपाल में। और नेपाली जनता भारत सरकार के प्रति सकारात्मक रुख अख्तियार कर रही थी। लेकिन कटवाल प्रसंग के बाद से लगातार एक के बाद एक कई घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं जिनसे नेपाली जनता को लग रहा है कि भारत उसके हितों के खिलाफ काम कर रहा है। हाल के ही अखबार उठाकर देखिए, कांतिपुर और काठमांडू पोस्ट जो वहां के दो बड़े अखबार हैं, और यह माओवादी अखबार नहीं हैं। बाकायदा अखबार हैं जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया है या इंडियन एक्सप्रेस है, इनके प्रिन्ट के कोटा को अ_ाइस दिन से यहां रोक रखा है कलकत्ता बंदरगाह पर भारत सरकार के अधिकारियों ने। महज इसलिए कि इस अखबार ने लगातार यह लिखा कि मौजूदा परिस्थिति में माधाव नेपाल को इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि एक आम सहमति की सरकार बन सके। माधाव नेपाल की सरकार को चूंकि भारत सरकार समर्थन कर रही है इसलिए इनको यह चीज नागवार लगी। इतना ही नहीं राकेश सूद ने वहां के उद्योगपतियों को जो भारतीय उद्योगपति हैं, बुलाकर कहा कि आप लोग कांतिपुर को, काठमांडू पोस्ट को और कांतिपुर टेलीविजन को विज्ञापन देना बन्द कर दें। तो यह सारी चीजें जो हो रही हैं वह दोनों देशों की जनता के संबंधों को बहुत खराब करेंगी। मेरी चिन्ता यह है और अगर दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण होते हैं तो उससे नेपाल का नुकसान तो होगा ही क्योंकि वह छोटा देश है लेकिन भारत का भी कोई बहुत भला नहीं होने जा रहा है।
अगर प्रचण्ड यह समझ लेते कि कटवाल को बर्खास्त करने से भारत की तरफ से इस तरह का हस्तक्षेप हो सकता है तो क्या स्थिति थोड़ी सुधार सकती थी?
नहीं प्रचण्ड को तो यह मालूम पड़ गया था कि अगर हम कटवाल को बर्खास्त करेंगे तो ऐसा होगा क्योंकि उन्हें बहुत खुलकर धामकी दी थी राकेश सूद ने और शायद इस धामकी के जवाब में ही उन्हें कटवाल को बर्खास्त करना और ज्यादा जरूरी हो गया था। क्योंकि अतीत में भारत सरकार के राजदूतों के या भारत सरकार के ब्यूरोक्रेट्स की यह आदत पड़ गई थी कि वह नेपाल के प्रधानमंत्रियों को कुछ भी कह कर अपनी मनमर्जी करवाते थे। कम से कम प्रचण्ड के साथ यह बात नहीं है। उन्होंने कभी यह नहीं कहा, देखिए अगर आज नेपाल के अन्दर साक्षात् माओत्से-तुंग भी शासन करने आ जाएं तो भारत के साथ किसी तरह की दुश्मनी एफोर्ड नहीं कर सकते। इसको प्रचण्ड अच्छी तरह जानते हैं कि भारत से नेपाल तीन तरफ से घिरा हुआ है, यूं कहिए इण्डिया लॉक्ड कंट्री है। ठीक है। भारत से यह नाराजगी मोल लेंगे तो भारत उनकी जनता को कितना कष्ट पहुंचाएगा? तो अगर कोई पार्टी या कोई पार्टी का राजनेता जो सचमुच जनता के हितों की परवाह करता होगा, मैं यह मानता हूं कि माओवादी जनता की हितों की ज्यादा परवाह करते हैं और पार्टियों के मुकाबले, तो वह कभी नहीं चाहेगा कि भारत के साथ शत्रुतापूर्ण संबंधा हों, और प्रचण्ड ने कई मौकों पर यह कहा है कि हमारे पड़ोसी दो जरूर हैं चीन और भारत। हम राजनीतिक तौर से एक समान इक्वल डिस्टेंस रखेंगे दोनों से। लेकिन भारत के साथ हमारे जो संबंध हैं, सांस्कृतिक संबंध, भौगोलिक संबंध, इनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती चीन से। हमारे और भारत के बीच में रोटी और बेटी का संबंध है, यह शब्द प्रचण्ड ने इस्तेमाल किए थे। तो जब पूरा कल्चरली एक है, दोनों की खुली सीमा है। बिहार का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुले रूप से नेपाल आता जाता है। तो ऐसी स्थिति में प्रचण्ड खुद ऐसा नहीं चाहेंगे कि भारत के साथ हमारे संबंधा कटु हों। लेकिन उसके साथ-साथ एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते प्रचण्ड यह जरूर चाहेंगे कि भारत हमारी संप्रभुता का सम्मान करे। छोटे देश और बड़े देश में आकार तो हो सकता है कि अलगृअलग हों लेकिन कहीं यह नहीं होता है कि छोटे देश की संप्रभुता छोटी हो और बड़े देश की संप्रभुता बड़ी हो। अगर
ऐसा होता तो इंग्लैण्ड की संप्रभुता तो बड़ी छोटी होती, जो ढाई सौ तीन सौ साल तक भारत पर शासन कर सकी। इसलिए संप्रभुता छोटी बड़ी नहीं होती है देश का आकार छोटा बड़ा होता है। इस बात को भारत का ब्यूरोक्रेट नहीं समझता है। इसलिए जरूरत यह है रूलिंग क्लास के माइंड सेट को बदलने की।
एक आरोप यह लगता रहा है कि जैसा आपने भी कहा कि यहां का जो रूलिंग क्लास ब्यूरोक्रेट है, यह भारत की विदेश नीति के साथ हमेशा कुछ न कुछ गड़बड़ करता रहता है। कहीं न कहीं इसके पीछे इस वर्ग के अपने कुछ निहित स्वार्थ होते हैं या कुछ और इंट्रैस्ट होते हैं? क्या यह आरोप सही है?देखिए प्रमाण तो कोई नहीं हैं। लेकिन निश्चित तौर पर आखिर क्या वजह है कि किसी भी पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंधा अच्छे नहीं हैं। कुछ चीजें तो हैं जो हमारे वश में नहीं हैं। भौगोलिक सीमा, ठीक है भारत एक बड़ा देश है, उसके लिए हम कुछ नहीं कर सकते। बड़े देश का एरोगेन्स तो हम रोक सकते हैं न! तो यह जो प्रॉब्लम है। भूटान के राजतंत्र को हम लगातार समर्थन देते रहे हैं। आप समर्थन दीजिए लेकिन किसकी कॉस्ट पर? वहां की जनता जो रिफ्यूजी बना दी गई जनतंत्र की मांग करने पर! यह हमारी नीति है। और हम दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र हैं और हम दुनिया के सबसे सड़े गले राजतंत्र को समर्थन देते रहे आम जनता के साथ धोखा करके। तो यह बड़ी शर्मनाक स्थिति है और यह हमारी विदेश नीति की असफलता है कि आज सारे पड़ोसी देश हमसे खतरा महसूस करते हैं। बजाय इसके कि अगर आप एक बड़े भाई की तरह रहते या जुड़वां भाई की तरह रहते तो वह चीज नहीं है।

Saturday, July 17, 2010

मैं नास्तिक क्‍यों हूं -भगत सिंह

एक नया सवाल उभर कर आया है। क्या मैं एक मिथ्याभिमान के कारण सर्वशक्तिमान, विश्वव्यापी, त्रिकालदर्शी ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता? मैं ने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी कि मेरा सामना ऐसे किसी प्रश्न से होगा। लेकिन कुछ मित्रों के साथ बातचीत के दौरान मुझे यह संकेत मिला कि मेरे कुछ साथी, जिनके बारे में मैं ज्यादा समझने का दावा नहीं करता और जिनसे कि मेरा बहुत कम सम्पर्क रहा था, वो यह सोचने पर विवश थे कि मेरे द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को नकार देना मेरे द्वारा की गई एक ज्यादती थी तथा साथ ही कुछ अंश मिथ्याभिमान का भी था जिसने मुझे अविश्वास की ओर प्रवृत्त किया है। खैरसमस्या थोडी ग़म्भीर है। मैं यह भी नहीं कहता कि मैं इन सब मानवीय गुणों से परे हूं। मैं एक पुरुष हूं, उससे अधिक कुछ नहीं। उससे अधिक होने का कोई भी दावा नहीं कर सकता। मेरे अन्दर भी यह कमजोरी है। मिथ्याभिमान भी मेरे स्वभाव का एक छोटा सा हिस्सा है। मैं अपने कॉमरेड्स के बीच तानाशाह के नाम से जाना जाता था। यहां तक कि मेरे मित्र श्री बी के दत्त ने भी कभी कभी मुझे ऐसा कहा। कुछ अवसरों पर मैं एक आततायी के रूप में भी कोसा गया। मेरे कुछ मित्र बडी ग़ंभीरता से शिकायत करते थे कि मैं उनकी इच्छा के विरुध्द उन पर अपनी राय थोपता था और अपने प्रस्ताव स्वीकार करा लेता था। हालांकि कुछ अंश तक यह सच भी है, मैं इस बात से इनकार नहीं करता। यह अहम का भाव भी हो सकता था। मेरे अन्दर मिथ्याभिमान है वैसा ही जैसे कि हमारे क्रान्तिकारी समुदाय में है जो कि दूसरे लोकप्रिय मतानुयायियों में नहीं है। किन्तु यह व्यक्तिगत अहम् नहीं है। शायद यह हमारे क्रान्तिकारी समुदाय का वैधानिक गर्व है जो कि मिथ्याभिमान कदापि नहीं हो सकता।

मिथ्याभिमान और अगर ज्यादा सटीक होकर कहें तो अहंकार स्वयं में व्यर्थ गर्व की अत्याधिक भावना को कहते हैं। या तो यह व्यर्थ अभिमान का ही भाव है जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया या फिर यह इस विषय पर किया गया गहन अध्ययन व चिन्तन मुझे ईश्वर में अविश्वास के निष्कर्ष पर लेकर आया है, यही एक प्रश्न है, जिसकी मैं यहां पर चर्चा करना चाहता हूं। सर्वप्रथम मुझे यह स्पष्ट करने दें कि स्वाभिमान और मिथ्याभिमान दो अलग अलग चीजें हैं।
सबसे पहले, मैं यह समझने में असफल रहा हूं कि व्यर्थ का अभिमान और व्यर्थ की भव्यता भी कभी ईश्वर को मानने की राह में आडे अा सकती है। मैं किसी महान आदमी की महानता को पहचानने से इनकार कर सकता हूं अगर मैंने भी बिना किसी योग्यता के, बिना उन गुणों को प्राप्त किये जो कि इस उद्देश्य के लिये अति आवश्यक हैं, कुछ हद तक लोकप्रियता हासिल की हो। इतना तो सोचा जा सकता है। लेकिन किस प्रकार एक भगवान में विश्वास करने वाला व्यक्ति, अपने मिथ्याभिमान के कारण विश्वास करना बन्द कर सकता है? इसके दो ही कारण हैं। या तो व्यक्ति स्वयं को भगवान का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या फिर स्वयं को ही भगवान मान ले। इन दोनों ही स्थितियों में वह एक सच्चा नास्तिक नहीं हो सकता। पहले मामले में वह भगवान के अस्तित्व को नकार नहीं रहा और दूसरे मामले में भी वह यह स्वीकार करता है कि कोई तो चैतन्य अस्तित्व है जो परदे के पीछे से प्रकृति के सारे क्रियाकलापों को नियन्त्रित करता है। यहां यह महत्वहीन है कि या तो वह स्वयं को परमात्मा समझे या वह यह सोचे कि परमात्मा कोई है जो उससे भिन्न है। यहां उसका मूल उपस्थित है। यहां उसका विश्वास है। वह किसी भी अर्थ में नास्तिक नहीं। और मैं दोनों में से किसी वर्ग से ताल्लुक नहीं रखता।
मैं परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास को ही अस्वीकार करता हूं। मैं यह क्यों अस्वीकार करता हूं, इस बारे में बाद में चर्चा करेंगे। यहां मैं एक चीज स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यह मिथ्याभिमान कतई नहीं है जिसने कि मुझे नास्तिकता के मत की ओर प्रेरित किया। न तो मैं उस परमात्मा का प्रतिद्वन्द्वी हूं, न ही कोई उसका अवतार और न ही स्वयं परमात्मा हूं। यहां यह बिन्दु स्पष्ट हो चुका है कि किसी अभिमान की वजह ने मुझे इस सोचने के तरीके की ओर नहीं ढकेला है। मुझे सत्यों की जांच कर लेने दें ताकि मैं अपने ऊपर लगे इन आरोपों को गलत सिध्द कर सकूं। मेरे इन मित्रों के अनुसार मैं वृथाभिमान के साथ बडा हुआ हूं शायद अनापेक्षित लोकिप्रियता प्राप्त करने की वजह से जो कि मुकदमों के दौरान दोनों केसों, दिल्ली बम काण्ड तथा लाहौर काण्ड के बाद मिली थी। ठीक है चलिये देखते हैं कि क्या उनके वक्तव्य सही है!
मेरी नास्तिकता अभी हाल ही में नहीं आरंभ हुई है। मैंने ईश्वर में विश्वास करना तभी छोड दिया था जब मैं एक अप्रसिध्द युवक था, जिसके अस्तित्व के बारे में मेरे उल्लेखित मित्रों को कुछ पता भी नहीं था। कम से कम एक कॉलेज का सामान्य छात्र तो अनपेक्षित अहंकार को पोषित नहीं कर सकता जो कि उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। हालांकि कुछ प्रोफेसर्स का मैं प्रिय छात्र था और कुछ मुझे नापसन्द करते थे, मैं कभी एक परिश्रमी तथा पढाकू लडक़ा नहीं रहा। मुझे ऐसा कोई मौका ही नहीं मिला कि मैं वृथाभिमान जैसी किसी भावना में डूबता। बल्कि मैं तो एक शर्मीले स्वभाव का लडक़ा था, जिसका भविष्य को लेकर कोई आशाजनक प्रबन्ध नहीं था। और उन दिनों मैं एक पूर्ण नास्तिक भी नहीं था। मेरे दादा जी जिनके प्रभाव में पला बढा वे घोर आर्यसमाजी थे। और एक आर्यसमाजी कुछ भी हो सकता है पर नास्तिक नहीं। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद मैं पूरा एक साल लाहौर के डी ए वी स्कूल में पढा और हॉस्टल में रहा, वहां सुबह से लेकर शाम की प्रार्थना तक मैं गायत्री मंत्र'' का जाप किया करता था घण्टों तक। तब मैं पूरी तरह श्रध्दालू था। बाद में मैं अपने पिता के साथ रहने लगा। जहां तक धार्मिक रूढिवादिता का सम्बन्ध है वे थोडे स्वतन्त्र विचारों के हैें। यह उनकी ही शिक्षा थी कि मैंने अपना जीवन स्वतन्त्रता प्राप्ति की महत्वाकांक्षा में लगा दिया। पर वे नास्तिक नहीं हैं। वे दृढ विश्वासी हैं। वे मुझे प्रेरित करते थे कि मैं रोज प्रार्थना किया करुं। तो, इस तरह मैं पला बढा। असहयोग आन्दोलन के समय मैंने नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया। यह तभी कि बात है कि मैंने स्वतन्त्र तौर पर सोचना और सभी धार्मिक समस्याओं तथा ईश्वर के बारे में चर्चा और आलोचना करना शुरु किया था। पर तब तक भी मैं धर्मविश्वासी था। तब तक मैं ने अपने अपने लम्बे केशों को बांधना शुरु कर दिया था पर मैं कभी पौराणिक गाथाओं तथा सिख धर्म या अन्य धर्म के मतों में विश्वास नहीं कर सका। पर मेरा दृढ विश्वास था कि ईश्वर का अस्तित्व तो है।
बाद में मैं रिवोल्यूशनरी पार्टी में शामिल हुआ। पहले नेता जिनके सम्पर्क में मैं आया, उनके सामने हालांकि मैं पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया था किन्तु ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस भी मुझमें न था। मेरे ईश्वर को लेकर दुराग्रही पू छताछ के कारण वे कहा करते, '' जब चाहो प्रार्थना करो।'' अब यह नास्तिकता है, इस समुदाय के मत को स्वीकार करने लिये कम साहस की आवश्यकता होती है। दूसरे नेता जिनके सम्पर्क में मैं आया वे ईश्वर के प्रति दृढ विश्वासी थे। उनका नाम था - आदरणीय कामरेड सचिन्द्र नाथ सान्याल, जो कि आजकल कराची काण्ड के सन्दर्भ में कालापानी की सजा काट रहे हैं। उनकी एकमात्र प्रसिध्द पुस्तक बन्दी जीवन के प्रथम पृष्ठ से ही ईश्वर भव्यता की स्तुति का गुणगान बढाचढा कर किया गया है। इस पुस्तक के दूसरे भाग का आखिरी पृष्ठ वेदान्तिक प्रशंसा और ईश्वर की रहस्यवादिता से ओत प्रोत है जो कि उनके विचारों का एक बहुत ही पवित्र हिस्सा है।
' क्रान्तिकारी पर्चे जो कि 28 जनवरी 1925 को पूरे भारत में वितरित किये गये, अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार ये उनकी बौध्दिक मेहनत का नतीजा थे, इस गुप्त कार्य में प्रमुख नेता ने ही अपने विचार व्यक्त किये हैं। ये विचार उनके स्वयं के व्यक्तित्व के बेहद करीब हैं और अब यह अपरिहार्य था कि बाकि के सभी कार्यकर्ताओं को उनसे मतभेद होते हुए भी इनसे साम्यता रखनी होगी। इन परचों में एक पूरा पैराग्राफ परमात्मा की प्रशंसा में समर्पित था। यह पूरा रहस्यवाद था। यहां मैं यह इंगित करना चाहता था कि ईश्वर में अविश्वास का विचार क्रान्तिकारी पार्टी में अभी अंकुरित तक न हुआ था। काकोरी के प्रसिध्द शहीद - चारों ने अपने अंतिम दिन प्रार्थना करते हुए बिताए। रामप्रसाद बिस्मिल एक रूढिवादी आर्यसमाजी थे, समाजवाद और कम्यूनिज्म के बारे में व्यापक अध्ययन किये हुए होने के बावजूद भी। राजन लाहिडी भी उपनिषदों तथा गीता के श्लोकों के वाचन की अपनी इच्छा को न दबा सके। मैंने उन सब में सिर्फ एक व्यक्ति को देखा जिसने कभी प्रार्थना नहीं की, वे कहा करते थे, '' दर्शनशास्त्र मानवीय कमजाेरियों और ज्ञान की सीमाओं का ही परिणाम है।'' वे भी कालापानी की सजा काट रहे हैं। किन्तु वे भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस नहीं कर सके।
उस समय तक मैं भी एक उदात्त, आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। तब तक हमें महज अनुसरण ही करना होता था। अब वह समय आया जबकि जब कन्धों पर पूरी जिम्मेदारी का बोझ उठाना था। कुछ अपरिहार्य प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप पार्टी का अस्तित्व असंभव सा प्रतीत होने लगा था। उत्साही कामरेडों - विरोधी नेताओं ने हमारा उपहास उडाना शुरु कर दिया था। कुछ समय के लिये मैं भी डर गया था कि कहीं एक दिन मैं भी अपने कार्यक्रमों की निरर्थकता में विश्वास न करने लगूं। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड था। ''अध्ययन'' मेरे दिमाग के गलियारोें में यही आवाज गूंज रही थी। अपने आपको अपने विरोधियों के द्वारा दिये हुए तर्कों का मुकाबला करने के लिये अध्ययन करो। अपने समुदाय के पक्ष में तर्क करने के लिये अपने आपको समर्थ करने के लिये मैं ने पढना शुरु किया। मेरे पिछले विश्वास और सही गलत समझने की क्षमता में एक गज़ब का बदलाव आया। हमारी पिछली पीढी क़े क्रान्तिकारियों में हिंसा के मार्ग के प्रति एकमात्र लगाव जो प्रमुख था, अब गंभीर विचारों में बदलने लगा था। अब कोई रहस्यवाद न था, न ही अंधविश्वास! यथार्थ ही अब हमारा मत था।
बल का प्रयोग तभी न्यायोचित है जब वह अत्यन्त आवश्यक हो। अहिंसा की नीति सभी जनआन्दोलनों के लिये अपरिहार्य है। तरीकों के बारे में काफी कह चुका।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह आदर्श जिसके लिये कि हम लड रहे हैं उसकी साफ तसवीर हमारे जहन में हो। जबकि लडाई में कोई महत्वपूर्ण गतिविधि में नहीं हो रही थी, मुझे विभिन्न विश्व क्रान्तियों के प्रणेताओं के बारे में पढने का काफी अवसर मिले। मैं ने बेकनिन को पढा, एक अराजकतावादी नेता, कुछ मार्क्स के बारे में जो कि कम्यूनिज्म के पितामह हैं और काफी सारा लेनिन, ट्रोट्स्की और अन्य क्रान्तिकारी जिन्होंने सफलता पूर्वक अपने अपने देशों में क्रान्ति का संचालन किया था। ये सभी नास्तिक थे। बेकनिन की '' गॉड एण्ड स्टेट '' जो कि खण्डों में है, और इस विषय के बारे एक रोचक अध्ययन प्रस्तुत करती है। बाद में मैं ने एक किताब देखी जिसका शीर्षक था कॉमन सेन्स जो कि निर्लम्बा स्वामी द्वारा लिखी गई थी। यह एक प्रकार की रहस्यवादी नास्तिकता के विषय में थी। यह विषय मेरे लिये सर्वथा रुचिकर हो चला था। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात की आधारहीनता पर पूर्ण विश्वास हो गया था कि किसी परमात्मा जिसने कि सबको बनाया और जो समस्त ब्रह्माण्ड का नियंत्रक और मार्गदर्शक है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। मैं ने अपने इस ईश्वर में अविश्वास को उजागर करना आरंभ किया और मैं ने इस विषय पर अपने मित्रों से चर्चा करना शुरु कर दिया था। अब मैं गंभीर नास्तिक घोषित हो चुका था। लेकिन इसका क्या औचित्य था इस पर मैं अब चर्चा करुंगा।
मई 1927 में लाहौर में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी मेरे लिये आश्चर्यजनक थी। मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि पुलिस मेरी तलाश में थी। अचानक एक बाग से गुजरते हुए मैंने अपने आपको पुलिस के बीच घिरा पाया। मैं स्वयं आश्चर्य में था कि उस वक्त मैं इतना शांत था। मुझे कोई संवेदन महसूस नहीं हो रहे थे ना ही मैं ने किसी उत्तेजना का अनुभव किया। मुझे पुलिस की हिरासत में ले लिया गया। अगले दिन मुझे रेल्वे पुलिस के लॉकअप में ले जाया गया जहां कि मुझे पूरा एक महीना काटना था। पुलिस अफसरों के साथ कई दिनों की बातचीत के बाद मैं ने अनुमान लगाया कि उनके पास कोई सूचना थी जिससे मेरा काकोरी काण्ड के लोगों से और अन्य क्रान्तिकारी गतिविधियों से सम्बन्ध जोडा जा सकता था। उन्होंने मुझे कहा कि जब काकोरी काण्ड का मुकदमा चल रहा था तब मैं लखनऊ गया था और मैं उनके भाग जाने की खास योजना के बारे में व्यवस्था कर रहा था। उनकी अनुमति मिलने के बाद हमने कुछ बम जमा किये और प्रयोग करने की खातिर उनमें से एक बम हमने 1926 के दशहरा के अवसर पर भीड में फेंका था। उन्होंने आगे बताया कि, अगर मैं उन्हें क्रान्तिकारी पार्टी की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला बयान दे दूं तो इसीमें मेरी भलाई है। तब मुझे जेल में नहीं रखा जायेगा और छोड दिया जायेगा और इनाम भी मिलेगा, कोर्ट में वायदामाफ गवाह की तरह भी पेश नहीं किया जायेगा। उनके प्रस्ताव पर मुझे हंसी आ गई। यह पूर्णत: छल कपट था।
हमारे जैसे आदर्शों को मानने वाले लोग अपने ही निर्दोष लोगों पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह मि न्यूमेन जो कि तब सीआईडी सीनीयर सुपरिटेन्डेन्ट थे, मेरे पास आए। और काफी सहानुभूति पूर्ण बातचीत के बाद उन्होंने मुझे यह खेदजनक समाचार बताया कि अगर मैं ने कोई बयान नहीं दिया, जैसा कि वे चाहते थे, तो वे मुझ पर काकोरी काण्ड के सन्दर्भ में राज्य के साथ युध्द करने के षडयन्त्र में और दशहरा बम काण्ड में निर्दोष लोगों की हत्या के सम्बन्ध में मुकदमे दायर करेंगे। और उन्होंने आगे यह भी बताया कि उनके पास इस बात के काफी सबूत हैं जिनकी बिना पर मुझे दोषी ठहरा कर फांसी दी जा सकती है।
उन दिनों मुझे विश्वास था - हालांकि मैं पूर्णत: निर्दोष था - कि पुलिस चाहे तो ऐसा भी कर सकती है। उसी दिन कुछ पुलिस अधिकारियों ने मुझसे आग्रह करना शुरु किया कि मैं भगवान की दोनों वक्त नियमित रूप से प्रार्थना किया करुं। अब मैं एक नास्तिक था। मैं अपने लिये निर्णय करना चाहता था कि मैं शान्ति और खुशहाली के दिनों में नास्तिक होने का दंभ भरता था या ऐसे कठिन समय में भी मैं अपने उन्हीं सिध्दान्तों से भी जुडा रह सकता था। काफी सोच समझ के बाद मैं ने फैसला किया कि मैं भगवान में विश्वास करने तथा उसकी प्रार्थना के लिये स्वयं को प्रेरित नहीं कर सकता। नहीं, कदापि नहीं। यही मेरी असली परीक्षा थी और मैं इसमें सफल रहा। एक पल के लिये भी मैं ने दूसरी कुछ चीज़ों की कीमत पर भी कभी अपनी गर्दन नहीं बचानी चाही। इस प्रकार मैं एक कट्टर नास्तिक था: और उसके बाद हमेशा रहा। इस परीक्षा में खरा उतरना आसान काम न था।
यह विश्वास कठिनाई के दौर को कोमल बना देता है, यहां तक कि कठिनाईयों को खुशगवार बना सकता है। भगवान में आदमी एक मजबूत सहारा व सांत्वना पा सकता है, लेकिन बिना उसके आदमी को स्वयं पर निर्भर रहना होता है। तेज तूफानों और चक्रवातों के बीच किसी का स्वयं अपने पैरों पर खडे रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। ऐसी परीक्षा की घडियों में, मिथ्याभिमान अगर कोई होता भी है तो काफूर हो जाता है, और इन्सान आम विश्वासों को चुनौती देने का साहस नहीं कर सकता, अगर वह करता है तो हमें यही निष्कर्ष निकालना चाहिये कि, मात्र मिथ्याभिमान के अलावा उसके पास कोई विशेष शक्ति अवश्य है। अब बिलकुल यही परिस्थिति है मेरे सम्मुख।

Bant Singh can still sing

Gaddar 5

Bandenaka Bandi Katti - Gaddar Folk Songs

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